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Namobudhay Like a beautiful flower, full of colour and full of fragrance, even more fragrant & colourful are the words o...
20/10/2023

Namobudhay Like a beautiful flower, full of colour and full of fragrance, even more fragrant & colourful are the words of one who practices them.
May you be wholesome & restrained with your speech actions and thoughts. May this day bring you much joy & happiness.
M**h sithin .. Compassion is what makes the heart of the good. It crushes and destroys the pain of others. This is called compassion. It is called compassion because it shelters and embraces the
The Dhammapada
distressed.
नमोबुधाय एक सुंदर फूल की तरह, रंग से भरपूर और सुगंध से भरपूर, उससे भी अधिक सुगंधित और रंगीन उस व्यक्ति के शब्द हैं जो उनका अभ्यास करता है।
आप स्वस्थ रहें और अपनी वाणी, कार्यों और विचारों से संयमित रहें। यह दिन आपके लिए ढेर सारी खुशियाँ और खुशियाँ लेकर आए।
मेथ सिथिन .. करुणा वह है जो अच्छे लोगों का दिल बनाती है। यह दूसरों के दर्द को कुचलता और नष्ट करता है। इसे करुणा कहते हैं. इसे करुणा कहा जाता है क्योंकि यह आश्रय देती है और गले लगाती है
धम्मपद
व्यथित.

🌻 Namobudhay 🌹[अकिंचन का दान] त्रिपिटक के खुद्दक निकाय के धम्मपद अट्ठकथा में एक बड़ा मार्मिक प्रसंग है।यह प्रसंग भगवान क...
20/10/2023

🌻 Namobudhay 🌹
[अकिंचन का दान]
त्रिपिटक के खुद्दक निकाय के धम्मपद अट्ठकथा में एक बड़ा मार्मिक प्रसंग है।
यह प्रसंग भगवान काश्यप बुद्ध के समय का है, जिसे स्वयं भगवान गौतम बुद्ध सुनाते हैं ।
एक बार भगवान काश्यप बुद्ध क्षीणास्रव भिक्खुओं के विशाल संघ के साथ वाराणसी पधारे। जब तक भगवान वाराणसी में विहार करते रहे तब तक कुछ श्रद्धालु उपासक-उपासिकाओं ने संगठन बनाकर उत्साहपूर्वक बुद्ध प्रमुख पावन संघ के लिए महादान किया।
एक दिन महादान के उपरान्त अनुमोदन देशना में भगवान काश्यप बुद्ध ने बताया कि दानकर्ता चार प्रकार के होते हैं:
1. एक, जो स्वयं तो दान करते हैं, लेकिन लोगों को दान के लिए प्रेरित या उत्साहित नहीं करते।
2. दूसरे, जो लोगों को दान के लिए प्रेरित व उत्साहित करते रहते हैं, लेकिन स्वयं दान नहीं करते।
3. तीसरे, जो न स्वयं दान करते हैं, न लोगों को दान के लिए प्रेरित या उत्साहित करते हैं।
4. चौथे, जो स्वयं भी दान करते हैं और लोगों को भी दान के लिए प्रेरित व उत्साहित करते हैं।
ये चार प्रकार के दानकर्ताओं को चार प्रकार का फल मिलता है:
1. जो स्वयं तो दान करते हैं, लेकिन लोगों को दान के लिए प्रेरित या उत्साहित नहीं करते, सोचते हैं कि लोगों को प्रेरित करने का क्या लाभ? ऐसे दानकर्ता स्वयं तो भोगसम्पत्ति, ऐश्वर्य प्राप्त करते हैं, लेकिन उनको परिजन, परिवेश निर्धन मिलता है।
2. जो लोगों को दान के लिए प्रेरित व उत्साहित करते रहते हैं, लेकिन स्वयं दान नहीं करते। ऐसे व्यक्ति को परिजन, परिवेश सम्पन्न व समृद्ध मिलता है, लेकिन स्वयं भोगसम्पत्ति से वंचित रहता है।
3. जो न स्वयं दान करते हैं, न लोगों को दान के लिए प्रेरित या उत्साहित करते हैं, वो न स्वयं कुछ भोगैश्वर्य प्राप्त कर पाते हैं, न उसके परिवार को ही कुछ मिलता है। वह लोगों का उच्छिष्ट भोजन ही प्राप्त कर पाता है।
4. जो स्वयं भी दान करते हैं तथा लोगों को भी दान के लिए प्रेरित व उत्साहित करते हैं, वो वह स्वयं भी विपुल भोगसम्पत्ति पाते ही हैं, उसको अपना परिजन, परिवेश भी अटूट भोगेश्वर्यसम्पन्न मिलता है।
भगवान की धम्मदेशना सुन कर धम्मसभा में बैठे एक श्रद्धालु उपासक ने संकल्प लिया- मैं अब ऐसा करूँगा कि जिससे मुझे उभयविध सम्पत्ति प्राप्त हो।
उसने भगवान को नमन किया और कहा- कृपया कल का भोजनदान स्वीकार कीजिये।
भगवान ने पूछा- उपासक! कितने भिक्खुओं को भोजन कराना चाहते हो?
श्रद्धालु उपासक ने कहा- भगवान, आप सहित पूरे संघ को।
भगवान ने मौन रह कर स्वीकृति दी।
भगवान की स्वीकृति मिलते ही वह उपासक गांव में जाकर सबसे कहने लगा- बहनों, भाइयों! कल मैंने बुद्ध प्रमुख भिक्खु संघ को भोजनदान के निमन्त्रित किया है। आप जितने भिक्खुओं को दान देने में समर्थ हों उतनों को दान दें।
यह कहकर गांव में घूमता हुआ वह सब लोगों से दान की स्वीकृति लेने लगा। तब अपनी-अपनी स्वसामर्थ्यानुसार किसी ने दस का, किसी ने बीस का, किसी ने सौ का, किसी ने पांच सौ भिक्खुओं का भोजनदान स्वीकार कर लिया। ऐसा सुनकर उसने सब भोजनदाताओं के नाम क्रमश: एक दानप्रपत्र पर लिख लिये।
उस समय उस नगर में एक अत्यन्त निर्धन रहता था। सब का नाम लिख रहा वह श्रद्धालु व उत्साही उपासक उस निर्धन के पास भी गया। उसके पास भी जाकर बोला- सौम्य! कल मैंने बुद्धप्रमुख भिक्खुसंघ को भोजनदान के लिए निमन्त्रित किया है। कल सभी नगरवासी यथाशक्ति भोजनदान देंगे। तुम कितने भिक्खुओं को भोजन कराओगे?
वह बोला- स्वामि! मुझे भिक्खुओं से क्या प्रयोजन। भिक्खुओं का प्रयोजन तो धनवानों से होता है। मेरे पास तो स्वयं कल के लिये न यवागू है, न मुट्ठी भर चावल तक है। मैं तो स्वयं मेहनत-मजदूरी करके जीवनयापन करता हूँ। मैं भिक्खुओं का क्या करूँगा।
दान के लिए प्रेरककर्ता को धैर्यवान और बुद्धिमान भी होना चाहिए। दाता द्वार 'नहीं' कह दिये जाने पर भी चुप न रहना चाहिये। यह सोच कर उस उत्साही, श्रद्धालु उपासक ने उस निर्धन अकिंचन से कहा- सौम्य! अच्छा भोजन कर, अच्छे वस्त्र पहन कर, नाना अलङ्कारों से स्वयं को भूषित कर बहुत से लोग महँगे पलंगों पर सोते हुए अपनी सम्पत्ति का उपभोग करते हैं, परन्तु एक तू है कि दिन भर मेहनत-मजदूरी करके पेट भरने के लिये आवश्यकता भर चावल तक भी जुटा नहीं पाता! क्या तू यह नहीं जानता कि पहले भी कभी तूने कोई पुण्य कर्म नहीं किया होगा, तभी तो आज तेरी यह दुर्गति है?
बड़े दीन स्वर में उस अकिंचन ने कहा- जानता हूँ, स्वामि!
वह प्रोत्साहक प्रेरित करते हुए बोला- तो सौम्य, अवसर मिलने पर भी फिर तुम अब पुण्य क्यों नहीं कर रहे हो? तू तो युवक है, बलवान है, क्या तेरे पास दिन भर मजदूरी करके इतना धन भी नहीं जुट सकता कि यथाशक्ति एक भिक्खु को ही भोजन करा सके?
प्रोत्साहक की प्रेरणा से उस निर्धन अकिंचन के मन में भी धम्म संवेग जाग पड़ा। उसने बड़ी व्याकुलता से कहा- कल एक भिक्खु को भोजनदान के लिए मेरा नाम भी लिख लो।
प्रोत्साहक उपासक के साथ संगठन का जो दूसरा साथी था, जो सबके नाम लिख रहा था, उसने मन में उपेक्षापूर्वक सोचा- एक भिक्खु के लिए निर्धन का नाम क्या लिखना, किसी एक को भेज देंगे। यूँ दानपात्र में वह उसका नाम लिखे बिना ही आगे बढ़ गया।
वह निर्धन अकिंचन बड़े उत्साह से घर पहुँच कर अपनी भार्या से बोला- भद्रे! नगरवासी कल बुद्ध प्रमुख भिक्खु संघ को भोजनदान देंगे। एक प्रोत्साहक द्वारा प्रोत्साहित किये जाने पर मैं भी उसे वचन दे चुका हूँ कि हम भी कल अपने घर पर एक भिक्खु को भोजनदान देंगे।
तब उसकी भार्या ने यह न कहकर कि 'हम तो स्वयं दरिद्र हैं, हम दूसरों को क्या भोजन देंगे, तुमने यह कैसे स्वीकार कर लिया', बल्कि यह कहा- स्वामि! आपने बहुत उचित किया। हमने पहले कभी किसी को कुछ न दिया होगा, उसी का फल आज इस दरिद्रता से भोग रहे हैं। अतः हम दोनों ही कोई काम ढूढ़ कर इतना धन तो जुटा लेंगे कि एक भिक्खु को भोजनदान दे सकें।
यों कह कर वे दोनों ही घर से काम की तलाश निकल लिए। देखा पूरे नगर में हर घर के सामने बुद्ध प्रमुख भिक्खु संघ के लिए कल के भोजनदान की तैयारी चल रही है।
ऐसे ही तैयारी में लगे एक सेठ ने अकिंचन व उसकी पत्नी को देख कर आवाज दी- क्यों रे, कुछ काम करेगा?
"अवश्य, स्वामि!", पति-पत्नी दोनों ने उत्साह से कहा।
"क्या कर सकता है?"
"जो आप कहेंगे, स्वामी!"
"तो सुनो! कल मैंने दो-तीन सौ भिक्खुओं को भोजनदान का निमन्त्रण दे रखा है, उनके भोजन बनाने के लिये कुछ लकड़ियाँ फाड़ दो।"
यों कहते हुए उसको बसूला एवं कुल्हाड़ा थमा दिया। उस अकिंचन ने कमर कस कर, उत्साहसम्पन्न होकर बसूले, कुल्हाड़े से लकड़ियाँ फाड़ना शुरू कर किया। उसको इतना उत्साहित देख कर सेठ ने पूछा- सौम्य, आज तो तुम बहुत उत्साह से काम कर रहे हो, क्या कारण है?
"स्वामि! कल मुझे भी एक भिक्खु को भोजन कराना है।", अकिंचन ने कहा।
यह सुनकर सेठ ने प्रसन्नमन होकर विचारा- अरे! इसने तो बड़ा कठोर व्रत ले लिया है। 'मैं स्वयं दरिद्र हूँ'- यह न मान कर यह एक भिक्खु को भोजन कराने जा रहा है।"
अकिंचन की भार्या को सेठानी ने काम सौंप दिया- ऊखल देकर कहा कि कल भिक्खुओं के भोजनदान के लिए धान से चावल निकाल दे!
गाते-गुनगुनाते बड़े उत्साह से अकिंचन भार्या धान कूटने लगी।
सेठानी ने हैरानी से पूछा- आज तो तू बहुत उत्साह में है! क्या कारण है?
अकिंचन भार्या बोली- कल हमने भी एक भिक्खु को भोजनदान के लिए आमंत्रित किया है।
सेठानी बड़ी प्रसन्न हुई, कहने लगी- तूने तो बड़ा महान संकल्प ले लिया है।
उस जमाने में मु़द्रा विनिमय नहीं था, वस्तु विनिमय होता था। वस्तुओं के आदान-प्रदान से लोक व्यवहार चलता था।
शाम को सेठ-सेठानी दोनों ने अकिंचन व उसकी भार्या को निर्धारित से भी अधिक मेहनताना दिया- तेल, घी, शहद, चावल, दूध, खाण्ड, मसाले आदि इतनी मात्रा में दे दिया कि दो नहीं वरन नौ लोगों के लिए पर्याप्त हो सके।
अकिंचन व उसकी भार्या अत्यन्त प्रसन्न हो गये कि न केवल एक भिक्खु के भोजनदान भर के लिए बल्कि उससे भी अधिक सामग्री मिल गयी है। दोनों अगली सुबह की तैयारी में लग गये।
सुबह भिक्खु के भोजनदान की तैयारी में लगी अकिंचन की भार्या ने अपने पति से कहा- भोजन परोसने के लिए पत्तल ले आओ।
अंकिचन उत्साह से नदी किनारे जाकर गाते-गुनगुनाते हुए पेड़ों से पत्ते तोड़ने लगा। उसके उत्साहित कण्ठ का मुदित स्वर सुन कर तट पर बैठे मल्लाह ने पूछा- बात क्या है? आज बड़े खुश लग रहे हो।
अकिंचन ने बड़े मुदित स्वर में कहा- आज हम दम्पत्ति एक भिक्खु को भोजनदान देंगे।
मल्लाह ने कहा- कुछ मेरा भी काम कर दो, हम भी तुम्हें कुछ दे देंगे।
"काम क्या है?"
मेरी नाव से यात्रियों को नदी पार कराओ, मैं घर कार्य से लौट कर आता हूँ।
अकिंचन ने खुशी-खुशी वह सेवा शीघ्रता से सम्पादित कर दी। मल्लाह ने भी आमदनी में से अकिंचन को अंश दिया। वह पत्तल लेकर घर की तरफ भागा।
अपनी गन्धकुटी में बैठे हुए भगवान काश्यप बुद्ध ने अपने दिव्य चक्षुओं से लोकावलोकन किया तो अकिंचन दम्पत्ति की श्रद्धा देख कर मुदित हुए। भगवान को मुदित देख कर एक देव सत्ता अकिंचन भार्या के घर पहुँच कर मजदूर वेश में रसोइया बन कर बिना मूल्य के अपनी सेवा देने को तत्पर हो गया। खाना बनाने में मदद करने लगा ताकि भोजन समय तैयार हो जाए।
भोजन तैयार हो जाने पर भार्या ने बड़े मुदित मन से अपने पति से कहा- जाओ, एक भन्ते को ले आओ।
पति-पत्नी के जीवन में यह पहला अवसर था कि जब वे किसी को भोजन कराने के लिए इतना श्रम कर रहे थे, अन्यथा तो जीवन भर बस अपने ही भरण-पोषण के लिए मशक्कत करते रहते थे।
पत्नी के संकेत पर अकिंचन तेज पगों से वह प्रोत्साहक के पास पहुँचा जिसने उसे एक भिक्खु को भोजनदान के लिए प्रेरित किया था। प्रोत्साहक ने सूची देखी तो सभी भिक्खु यथाघर भोजनदान के लिए जा चुके थे। अकिंचन के घर भेजने के लिए एक भी भिक्खु बचा नहीं था। सच तो यह था कि अकिंचन का नाम दानपात्र में लिखा ही नहीं था, इसलिए यह भूल हो गयी।
जैसे ही दान प्रोत्साहक ने यह कहा- तुम्हारे घर भेजने के लिए कोई भिक्खु नहीं बचा है, सब भोजनदान के लिए यथाघर जा चुके हैं, अब किसी के घर से भिक्खु वापस तो बुलाउंगा नहीं।
इतना सुनते ही अकिंचन को ऐसा लगा जैसे उसके सीने में किसी ने भाला भोंक दिया । वह अकिंचन प्रोत्साहक की बाँह पकड़ कर रोने लगा- मैं हूँ ही अभागा! मेरा अनर्थ हो गया। तुमने ही मुझे प्रेरित किया और तुमने ही धोखा दे दिया, अब मैं कहाँ जाऊँ, किसको बुलाऊँ? मैं नष्ट हो गया।
अकिंचन को रोता हुआ देख कर भीड़ इकट्ठा हो गयी। पूरा प्रसंग सुना तो सब प्रोत्साहक की ही निन्दा करने लगे- तुम्हारा इतना पुण्य व्यर्थ गया, एक निर्धन को वादा करके नहीं निभाया, इतना बड़ा पाप, किसी एक भिक्खु की व्यवस्था तो इस अकिंचन के लिए करो।
वह अकिंचन की आंसुओं की धार थी कि रुकने का नाम नहीं ले रही थी और सब लोग प्रोत्साहक को निन्दित कर रहे थे। प्रोत्साहक स्वयं बड़ी ग्लानि से भर गया। उसे अपनी त्रुटि सुधार का कोई उपाय नहीं सूझ रहा था। कहने लगा कि अब किसी के घर से एक भिक्खु वापस बुलाउंगा तो और निन्दा होगी। वह अकिंचन से कहने लगा- सौम्य! मुझे माफ करो।
इतना सुनते ही वह अकिंचन और फूट-फूट कर रोने लगा- अपनी पत्नी को जाकर क्या बताऊ? वह भोजन बना कर एक भिक्खु का इंतजार कर रही हैं।
अकिंचन का विलाप सुन कर हताश प्रोत्साहक ने कहा- एक उपाय है। अभी भगवान अपनी गन्धकुटी में हैं, वह किसके घर जाएंगे, वह ही जानते हैं। कुटी के द्वार पर राजा, राजकुमार, सेनापति, आमात्य खड़े है, तुम भी जाकर खड़े हो जाओ, वह जिसके हाथ में अपना पात्र दे देंगे, उसके ही घर जाएंगे, उसके ही घर भोजन करेंगे। भगवान तो अकिंचनों के प्रति अहेतुक कृपालु होते हैं, तुम्हारा पुण्य होगा वह तुम्हारे घर भी जा सकते हैं।
साथ खड़े लोगों ने भी अनुमोदन किया- दान प्रोत्साहक ठीक कह रहे हैं।
वह अकिंचन भागता हुआ भगवान की कुटी पर पहुँचा। कुटी के द्वार पर खड़े राजा, राजकुमार, सेनापति, आमात्य उसे रोकने लगे- अभी भोजन हो नहीं गया है जो मांगने चले आए, हटो यहाँ से।
वह प्रोत्साहक भी मन ही मन प्रार्थना करने लगा- भगवान, आप ही आखरी उम्मीद हैं, मेरी त्रुटि आप ही सुधार सकते हैं, वरना आज मुझे बड़ा पाप लगेेगा, लोक निन्दा हो रही है।
गन्धकुटी के बाहर खड़े राजा, राजकुमार, सेनापति, आमात्यों के द्वारा रोके जाने पर अकिंचन ने दीन स्वर में कहा- मुझे बस भगवान की कुटी की दहलीज पर माथा टेकना है।
लोगों ने उसे आगे बढ़ने दिया। गन्धकुटी के द्वार पर माथा रख कर वह रोने लगा- भगवान, आपकी कृपा हो जाए, मैं तो जन्म से ही अभागा हूँ, आज एक पुण्य करने का अवसर मिला, वह भी हाथ से निकला जा रहा है, अपनी भार्या को जाकर क्या मुँह दिखाउंगा। कृपा करके आप ही मेरे आश्रय बनिये, इस नगर में मुझसे ज्यादा दीन कोई नहीं है।
वह दहलीज पर माथा रखे रो ही रहा था कि भगवान ने गन्ध कुटी खोली। कुटी का द्वार खुलते ही भगवान का दर्शन करते ही वह भावविव्हल हो हाथ जोड़ कर खड़ा हो गया और आँखों से आंसुओं की धार बहे जा रही है। सारे राजा, राजकुमार, सेनापति, आमात्य हाथ जोड़ कर त्वरित पगों से आगे बढ़े। भगवान आगे बढ़े और हाथ बढ़ा कर अपना पात्र अकिंचन के हाथ में रख दिया।
उस पल अकिंचन को लगा जैसे उसे वह चक्रवर्ती सम्राट हो गया है, सब लोकों का साम्राज्य पा गया है। सारे राजा, राजकुमार, सेनापति, आमात्य ताकते रह गये। आपस में एक-दूसरे का मुँह देखने लगे। कई का मन तो किया कि अकिंचन के हाथ से पात्र ही छीन लें, लेकिन भगवान के सामने किसका साहस! कुछ ने आगे बढ़ कर अकिंचन से निवेदन करना ही बेहतर समझा- यह पात्र आज मुझे दे दो, जितना धन चाहे मांग लो।
अकिंचन ने कहा- अपना राज्य भी दे दीजिये तो भी यह पात्र आज किसी को नहीं दूँगा।
अकिंचन आगे-आगे, भगवान पीछे-पीछे उसके घर की ओर बढ़ते हुए और पीछे सारे राजा, राजकुमार, सेनापति, आमात्यगण।
सब अपने को समझाने लगे- निर्धन के प्रति सहानुभूति के कारण भगवान ने उसे पात्र दे दिया है, उसके यहाँ कुछ औपचारिकतावश खाएंगे, फिर व्यंजन तो हम ही खिलाएंगे। इसी विचार में वे पीछे-पीछे चलने लगे और साथ में यह उत्सुकता भी कि देखें अकिंचन क्या खिलाता है।
अकिंचन की झोपड़ी के निकट पहुँचते ही व्यंजनों की सुगन्धि हवा में तैर रही थी। आखिर देवराज शक्र स्वयं रसोइया बने भोजन पका रहे थे। वो व्यंजनों की गुणवत्ता तथा सुगन्धि देख कर सारे राजा, राजकुमार, सेनापति, आमात्यगण चुपचाप वापस हो लिए।
भगवान ने तृप्तिभर भोजन किया। तदोपरान्त श्रद्धालु दम्पत्ति को अनुमोदन देशना दी। श्रद्धालु दम्पत्ति का रोम-रोम प्रीति की तरंगों से पुलकित हो उठा। दम्पत्ति ने भगवान का पात्र धोया और भगवान को गन्धकुटी तक पहुँचा कर आया। भगवान के चले जाने के बाद शक्र देव ने सारे बर्तन स्वयं साफ किये और विदा होने से पहले सारे बर्तनों में, घर के कोने-कोने में स्वर्ण मुद्राएं व सप्तविध रत्न भर दिये।
अकिंचन लौट कर आया तो अपने बच्चों व भार्या को घर के बाहर खड़े पाया। कारण पूछने पर मालूम हुआ कि पूरा घर सप्तविध रत्नों से भर गया है। वह विपुल सम्पत्ति देख कर हैरान रह गया। सोचने लगा कि बुद्ध को दिये दान का फल इतनी जल्दी मिलता है। लेकिन उसके मन में लोभ नहीं आया।
उसने तत्काल राजा को सूचित किया, क्योंकि उस समय का ऐसा विधान था कि अज्ञात स्रोत से मिली सम्पत्ति पर राजा का अधिकार होता था। राजा बड़ा हैरान हुआ कि बुद्ध को भोजनदान कराने का फल इतनी जल्दी मिलता है। उसने अपने मन्त्रिगणों से पूछा- जिसके पास इतनी सम्पत्ति हो, उसका कैसे सत्कार करना चाहिये?
सब ने एक स्वर से कहा- ऐसी अपार सम्पत्ति वाले को नगरसेठ के पद पर प्रतिष्ठित करना चाहिये।
राजा ने वैसा ही किया, उस अकिंचन को समारोहपूर्वक नगर सेठ के पद पर आसीन कर दिया और एक भूखण्ड उसका आवास निर्मित करने के लिए दे दिया। आवास निर्माण के समय खुदाई में भूमि के अन्दर दबे हुए स्वर्ण मुहरों के मटके मिले।
नवप्रतिष्ठित नगर सेठ ने पुन: राजा को सूचित किया कि यह सम्पत्ति आपकी प्रदान की भूमि से निकली है, अतः आपकी है। राजा ने कहा- यह भूमि आपको दी जा चुकी है, अत: आपकी है।
देखते ही देखते अकिंचन का कायाकल्प हो गया। नगर सेठ के पद पर प्रतिष्ठित हो कर उसने आजीवन संघ के लिए महादान किया, अपार पुण्य अर्जित किया।
चार स्थितियों में दान का फल तत्काल मिलता है:
1. शील, समाधि, प्रज्ञा सम्पन्न व्यक्ति या व्यक्तियों का संघ अथवा इस मार्ग पर लगे हुए लोगों का संघ मिले।
2. ऐसा सुअवसर मिले तो दान देने के लिए ईमानदारी से अर्जित धन, अन्न, सामग्री हो।
3. दान करने से पहले, दान करने के दौरान, दान करने के उपरान्त मन में क्लेश की लहर भी न उठे कि बहुत अधिक खर्च हो गया।
4. किया गया दान जिसको दिया है उसके लिए हितकारी, सुखकारी हो।
ये चार स्थितियाँ एक समय में एक साथ घटित होने पर दान का फल तत्काल मिलता है।
दस पारमिताओं में दान प्रथम पारमिता है।
मज्झिम निकाय, दक्खिनाविभङ्ग सुत्त में भगवान बुद्ध के वचन हैं:
"संघ को दिया दान बुद्ध को दिये दान से भी अधिक पुण्यकारक है। संघ को दान देने से संघ पूजित होता है, उसमें बुद्ध भी पूजित होते हैं, क्यों समस्त दान बुद्ध के निमित्त ही दिया जाता है।"
संघ का सत्कार करना बुद्ध का सत्कार करना है। विनयबद्ध संघ को नमन करना बुद्ध को नमन करना है। संघ ही बुद्ध का साकार रूप है।
🌷🌷🌷नमो बुद्धाय 💐💐💐

🌻धम्म प्रभात🌻[ब्रह्म विहार यानी मैत्री, करूणा,मुदिता,उपेक्षा ]शान्ति पद की प्राप्ति चाहने वाले मनुष्य को चाहिए सभी प्राण...
20/10/2023

🌻धम्म प्रभात🌻
[ब्रह्म विहार यानी मैत्री, करूणा,मुदिता,उपेक्षा ]
शान्ति पद की प्राप्ति चाहने वाले मनुष्य को चाहिए सभी प्राणियों के प्रति मैत्री भावना होना।
चार भावनाओं का अभ्यास है
ब्रह्म विहार ।
कौन सी चार भावनाएं हैं?
यह हैं -
मैत्री,
करूणा,
मुदिता
और उपेक्षा।
Friendship
(friendship is a relationship of mutual affection between people)
है मैत्री।
Compassion
है करूणा ( अनुकंपा )।"co-suffering."
It involves "feeling for another" and is a precursor to empathy, the "feeling as another" capacity for better person-centered acts of active compassion; in common parlance active compassion is the desire to alleviate another's suffering.
Sympathetic Joy है मुदिता। sympathy in others' welfare.
Equanimity है उपेक्षा ( समभाव )।
Equanimity is a calm state of mind and attitude to life, so that you never lose your temper or become upset.
जो मनुष्य खडे रहते, चलते, बैठते या सोते, जब तक जागृत रहे, तब तक ब्रह्म विहारी होते हैं वह मनुष्य किसी मिथ्या दृष्टि में नहीं पड़ता हैं, शील का पालन करता हैं और तृष्णाओं का समुच्छेद करके भवचक्र से मुक्त हो जाता है।
करणीयमेत्त सुत्त [ मेत्त-सुत्त ]
यस्सानुभावतो यक्खा,
नेव देस्सेन्ति भीसनं।
यञ्हि चेवानुयुञ्जन्तो, रत्तिन्दिवमतन्दितो।
सुखं सुपति सुत्तो च,
पापं किञ्चि न पस्सति।
एवमादि गुणूपेतं,
परित्तं तं भणामहे।।
करणीयमत्थकुसलेन,
यन्तं सन्तं पदं अभिसमेच्च।
सक्को उजू च सूहजू च,
सूवचो चस्स मुदु अनतिमानी।।(१)
सन्तुस्सको च सुभरो च,
अप्पकिच्चो च सल्लहुकवुत्ति।
सन्तिन्द्रियो च निपको च, अप्पगब्भो कुलेसु अननुगिद्धो।।(२)
न च खुदं समाचरे किञ्चि,
येन विञ्ञू परे उपवदेय्युं।
सुखिनो वा खेमिनो होन्तु,
सब्बे सत्ता भवन्तु सुखितत्ता।।(३)
ये केचि पाणभूतेत्थि,
तसा वा थावरा वा अनवसेसा।
दीघा वा ये महन्ता वा,
मज्झिमा रस्सका अणुकथूला ।।(४)
दिट्ठा वा ये व अदिट्ठा,
ये च दूरे वसन्ति अविदूरे।
भूता वा सम्भवेसी वा,
सब्बे सत्ता भवन्तु सुखितत्ता।।(५)
न परो परं निकुब्बेथ, नातिमञ्ञेथ कत्थचि नं कञ्चि।
ब्यारोसना पटिघसञ्ञा, नाञ्ञमञ्ञस्स दुक्खमिच्छेय्य।।(६)
माता यथा नियं पुत्तं,आयुसा एकपुत्तमनुरक्खे।
एवम्पि सब्बभूतेसु,
मानसं भावये अपरिमाणं।।
(७)
मेतञ्च सब्ब-लोकस्मिं,
मानसं भावये अपरिमाणं।
उद्धं अधो च तिरियञ्च, असम्बाधं अवेरं असपत्तं ।।
(८)
तिट्ठं चरं निसिन्नो वा,
सयानो वा यावतास्स विगतमिद्धो।
एतं सतिं अधिट्ठेय्य,
ब्रह्ममेतं विहारम इधमाहु ।।
(९)
दिट्ठिंञ्च अनुपग्गम्म,
सीलवा दस्सनेन सम्पन्नो।
कामेसु विनेय्य गेधं ,
न हि जातु गब्भसेय्यं पुनरेतीति ।। (१०)
'सब्बे सत्ता भवन्तु सुखितत्ता' की भावना रखनेवाले सत्व आवागमन से मुक्त हो सकते है।
नमो बुद्धाय🙏🙏🙏
10.10.2023

[बैर से बैर बढता है, मैत्री से बैर खत्म होता है।]"अक्कोच्छि मं अवधि मं,अजिनि मं अहासि मे।ये च तं उपनय्हन्ति,वेरं तेसं न ...
20/10/2023

[बैर से बैर बढता है, मैत्री से बैर खत्म होता है।]
"अक्कोच्छि मं अवधि मं,अजिनि मं अहासि मे।
ये च तं उपनय्हन्ति,वेरं तेसं न सम्मति।।"
- तथागत बुद्ध
"अक्कोच्छि मं अवधि मं, अजनि मं अहासि मे।
ये तं न उपनय्हन्ति, वेरं तेसूपसम्मति।।"
- तथागत बुद्ध
"वेरं तेसं न सम्मति"- उसके वैर का समन नहि होता।
"वेरं तेसूपसम्मति" उसके वैर का समन होता है।-
जिसके मन में गांठ है यानी मन में सोचता रहता है-
उसने मुझे हराया,
उसने मुझे पीटा,
उसने मुझे लूटा,
जिसने बदला लेने की भावना रखी उसका बदला कभी नाश नहीं होता। वैर बढ़ता है, घटता नहीं।
लेकिन जो अतीत को भूल जाता है उसका वैर मिट जाता है और वैर नहीं बढ़ता।
"न हि वेरेन वेरानि,सम्मन्तीध कुदाचनं ।
अवेरेन च सम्मन्ति,एस धम्मो सनन्तनो ।" - तथागत बुद्ध
इस संसार में वैर से वैर कभी शान्त नहीं होता, मैत्री से ही (वैर) शान्त होता है। यही संसार का सनातन सत्य है।
भगवान बुद्ध के यह अमृत वचन सदैव हमें प्रेरणा देता है।
इस प्रकार, एक नया जीवन शुरू करने के लिए, पुराने अपमान, आरोप, प्रति आरोप, टीका टिप्पण,या वैर के जहर को भूलना होगा। जो भूल जाता है वह सुख, शांति और समृद्धि प्राप्त करता है। जो नहीं भूलते वे प्रतिशोध और ईर्ष्या की आग से दुखी होते हैं और अन्य को भी दु:खी करते हैं। अतीत को भूल जाना फायदेमंद है।
नमो बुद्धाय🙏🙏🙏
13.10.2023

Namobudhay today Sunday school 🏫 🌻धम्म प्रभात🌻[माता-पिता की सेवा वंदना ही श्रेष्ठ है] शास्ता बुद्ध ने कहा-"भिक्षुओ ! जिन...
20/10/2023

Namobudhay today Sunday school 🏫 🌻धम्म प्रभात🌻
[माता-पिता की सेवा वंदना ही श्रेष्ठ है]
शास्ता बुद्ध ने कहा-
"भिक्षुओ ! जिन कुलों के पुत्र माता- पिता की घर में पूजा करते है वे कुल में जहां ब्रह्मा वास करते है।
जिन कुलों के पुत्र माता- पिता की घर में पूजा करते है वे ऐसे कुल में जहां पूर्वाचार्य वास करते है।
भिक्षुओ ! जिन कुलों के पुत्र माता-पिता की घर में पूजा करते है वे कुल दान देने योग्य है अर्थात पूज्य है।
भगवान ने आगे कहा-
भिक्षुओ ! ब्रह्मा- यह माता-पिता का ही पर्याय है।
भिक्षुओ ! पूर्वाचार्य- यह भी माता-पिता का पर्याय है।
भिक्षुओ ! जो व्यक्ति दान देने योग्य है वे भी माता-पिता के ही पर्याय है।
यह किसलिए?
भिक्षुओ, माता-पिता का अपने संतान पर बहुत उपकार होता है। वे पालन- पोषणकरने वाले हैं उन्होंने इस लोक से परिचय कराया है।
ब्रह्माति मातापितरो,
पुब्बाचरियाति वुच्चरे।
आहुनेय्या च पुत्तानं,
पजाय अनुकम्पका।।
तस्मा हि ने नमस्सेय्य,
सक्केरेय्य च पण्डितो।
अन्नेन अथ पानेन,
वत्थेन सयनेन च।
उच्छादनेन न्हापनेन,
पादानं धोवनेन च।।
ताय नं पारिचरियाय,
मातापितूसु पण्डिता।
इधेव नं पसंसन्ति,
पेच्च सग्गे पमोदती'ति।।
अर्थात:
माता पिता ही ब्रह्मा कहे जाते है। माता- पिता ही पूर्वाचार्य कहे जाते है। माता पिता ही दान देने योग्य कहे जाते है। वे अपने संतान पर बहुत अनुकंपा करने वाले है। इसलिए बुद्धिमान संतान को चाहिए कि उन्हें नमस्कार करें। उनको अन्न से ,पान से, वस्त्र से,शयनासन से सत्कार करें। उनको मालिश करें, नहला करें, पाँव धोकर। उनकी सेवा करें, सत्कार करें। जो पण्डित परिचर्या से माता-पिता को संतुष्ट करता है उसकी यहां भी प्रशंसा होती है और मृत्यु होने पर वह स्वर्ग में भी आनंदित होता है।"
माता पिता ही ब्रह्मा है, माता-पिता ही पूर्वाचार्य है। उनके अनंत उपकार अपनी संतान पर है।
माता-पिता की सेवा वंदना ही श्रेष्ठ है।
नमो बुद्धाय🙏🏻🙏🏻🙏🏻

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