06/19/2026
जय श्रीकृष्ण 🙏
श्रीमद्भागवत महापुराण (कविता रूप में)
स्कंध 1 • अध्याय 8 — कुंती की स्तुति
(विपत्तियों में प्रभु-दर्शन और भक्ति का परम रहस्य)
अश्वत्थामा के क्रूर अस्त्र से, जब काँपा था कुल–भविष्य,
उत्तरा के गर्भ में छिपा था, पाण्डव–वंश का अंतिम दीप।
दौड़ी माता व्याकुल होकर, कृष्ण–चरणों में गिर पड़ी,
“रक्षा कीजिए नाथ! मेरे गर्भ पर मृत्यु–छाया चढ़ी।”
करुण पुकार सुन प्रभु ने तब, योगमाया का रूप धरा,
सूक्ष्म ज्योति बन गर्भ–मध्य में, जीवन का संरक्षण किया।
ब्रह्मास्त्र का दाह बुझा सहसा, मृत्यु लौट गई पराजित,
पाण्डव–वंश का अंकुर बचा, हरि–कृपा से पुनः प्रतिष्ठित।
यह लीला देख कुंती माता, प्रेम–विभोर हुईं तत्काल,
नेत्र सजल, कंठ अवरुद्ध, हृदय बना भक्ति–विशाल।
जोड़ कर दोनों कर–कमल, प्रभु के सम्मुख शीश नवाया,
और भाव–सुधा की धारा बन, स्तवन का अमृत बरसाया।
“नमामि देव! जगन्निवास! प्रकृति–पार पुरुषोत्तम तुम,
माया के पट में छिपकर भी, जग के अंतर्यामी तुम।
नेत्र तुम्हें पहचान न पाते, बुद्धि न पाती पार तुम्हारा,
पर भक्त–हृदय के प्रेम–दीप में, झलक उठे स्वरूप तुम्हारा।”
“यदुवंशी बनकर आए हो, वसुदेव–देवकी के लाल,
किन्तु तुम्हारे चरणों में ही, ब्रह्मांडों का है जंजाल।
जो जन तुमको मानव समझे, वह माया में भरमाता है,
जो तुममें ब्रह्म स्वरूप निहारे, भव–सागर तर जाता है।”
“कभी बने हो ग्वाल–बाल तुम, कभी बने रणधीर महान,
कभी रथी बन अर्जुन के, कभी बने जग के भगवान।
लीलाएँ ऐसी अपरम्पार, जिन्हें न वेद समझ पाते,
ज्ञान–शिखर पर बैठे ऋषि भी, अंत तुम्हारा न पाते।”
“हम पर कैसी कृपा रही है, स्मरण करूँ तो अश्रु बहें,
विष का प्याला, लाक्षागृह, वन–वन के संकट सब कहें।
सभा–मध्य अपमान–घड़ी हो, या रण का विकराल प्रहार,
हर विपदा में तुम ही आए, बनकर जीवन के आधार।”
“इस कारण हे दीनदयाल! एक वरदान मुझे दे दो,
विपदाएँ फिर–फिर आती रहें, ऐसा वर भी दे दो।
क्योंकि विपदा में ही नाथ! तुम्हारा दर्शन हो पाता,
और तुम्हारे दर्शन से ही जन्म–मरण भय मिट जाता।”
सभा सुन रही स्तब्ध भाव से, यह अनोखी प्रार्थना,
जहाँ सुख नहीं, दुःख माँगा था, पाने को हरि–आराधना।
कृष्ण मुस्काए प्रेम सहित, जान लिया वह भाव महान,
जो केवल भक्त–हृदय में खिलता, बनकर निर्मल भक्ति–प्राण।
कुंती बोलीं—“राज्य, वैभव, कुल–गौरव सब क्षणभंगुर है,
जल–बुलबुले से ये सुख सारे, जीवन का पथ दुर्गम है।
अहंकारों की भीड़ जहाँ हो, वहाँ न भक्ति पनप पाती,
दीनता के निर्मल उपवन में, प्रेम–लता ही फलती जाती।”
“जन्म, ऐश्वर्य, ज्ञान, प्रतिष्ठा—सब बन जाते भारी जाल,
जो इनमें उलझा रहता है, भूल जाता चरण–कमल।
पर जो दीन, सरल और निष्कपट, हरि–नाम का आश्रय ले,
वही तुम्हारी कृपा–दृष्टि से, मुक्ति–सुधा का रस पी ले।”
“हे कृष्ण! हे वासुदेव! हे नंद–नंदन गोपाल!
हे गोविन्द! हे भक्त–वत्सल! हे जग के प्रतिपाल!
मेरा चित्त सदा तुम्हीं में, गंगा–धारा सा बह जाए,
जैसे नदी समुद्र में मिलकर, फिर लौटकर न आ पाए।”
“मेरा मोह कटे परिवारों का, बंधन सारे टूट चलें,
मन के सारे तंतु प्रभो! बस तुमसे ही आकर जुड़ें।
पाण्डव, यादव, मित्र, स्नेही—सबमें तेरा ही प्रतिबिम्ब,
तेरे अतिरिक्त कुछ न दिखे, ऐसा कर दो अंतर्मन।”
कहकर कुंती मौन हुईं, आँसू बने चरणों का हार,
भक्ति स्वयं बनकर उतरी थी, उस दिन धरती पर साकार।
ऋषि, देव और वीर सभी, सुनते थे स्तुति अविराम,
मानो वेदों ने धारण कर ली हो माता की कोमल तान।
कृष्ण खड़े थे शांत, सहज, अधरों पर मधुर मुस्कान,
भक्त–हृदय की निष्कपटता पर रीझ गए थे भगवान।
जो माँगे सुख, उसे सुख मिलता; जो माँगे धन, धन पाता है,
पर जो माँगे केवल प्रभु को, प्रभु स्वयं उसके हो जाता है।
जय हो कुंती–भक्ति की, जय विपदा–मंगल ज्ञान,
जय उस प्रेम की, जो देखे दुःख में भी भगवान।
जो सुनता है यह पावन स्तुति, उसका अंतर हो निर्मल,
विपदा में भी हरि दिख जाएँ, ऐसा हो जीवन सफल॥
जय श्रीकृष्ण 🙏
#स्कंध_एक_अध्याय_आठ