Lord Krishna

Lord Krishna Krishna Vasudeva is supreme lord. He is sitting in hearts of all beings. He is sustainer, witness of actions, protectors, complete knowledge and supreme lord.

he is knowledge, knower and to be known. Knowing Him, one gets Nirvana, Absolute Truth .

09/01/2026

SUPREME LORD KRISHNA IS CREATOR, SUSTAINER AND CAUSE OF DESTRUCTION.
हर वस्तु सुप्रीम से पैदा होती है, सुप्रीम ही उसका पालन करता है, और अंत में सुप्रीम में ही समा जाती है - यह एक वाक्य नहीं, पूरे वेदांत का सार है।

इसे हमारे ऋषियों ने ऐसे कहा था:

यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते। येन जातानि जीवन्ति। यत् प्रयन्त्यभिसंविशन्ति। तद् विजिज्ञासस्व। तद् ब्रह्मेति।
जिससे ये सब प्राणी पैदा होते हैं, पैदा होकर जिसके आधार पर जीते हैं, और अंत में जिसमें लौट जाते हैं, वही ब्रह्म है - उसे ही जानो।

आइए इसे तीन स्तरों पर समझें:

1. पैदा होना - सुप्रीम ही स्रोत है
जैसे समुद्र से ही लहरें उठती हैं, समुद्र से अलग लहर का कोई अस्तित्व नहीं। वैसे ही यह सारा जगत - शरीर, मन, विचार, ग्रह-नक्षत्र - उस एक चैतन्य सागर से ही उठा है।

हम सोचते हैं मैं बना रहा हूँ, मैं कर रहा हूँ। पर गहराई से देखो तो आपकी एक श्वास भी आपकी बनाई हुई नहीं है। आँखों में देखने की शक्ति, मन में सोचने की शक्ति, बीज में वृक्ष बनने की शक्ति - सब उसी एक स्रोत से आ रही है।

2. पालन होना - सुप्रीम ही आधार है
गीता में कृष्ण कहते हैं - "अहं सर्वस्य प्रभवो मत्तः सर्वं प्रवर्तते" - मैं ही सबका मूल हूँ, मेरे ही कारण सब चल रहा है।

पैदा होने के बाद भी कोई वस्तु अपने दम पर नहीं टिकती। फूल को खिले रहने के लिए धूप, पानी, हवा चाहिए और उन सबके पीछे वही एक व्यवस्था काम कर रही है। आपके शरीर के 37 ट्रिलियन सेल हर क्षण काम कर रहे हैं, हृदय धड़क रहा है, बिना आपके कहे। कौन पालन कर रहा है? वही सुप्रीम।

हम इसे माया के कारण भूल जाते हैं और लगता है कि मैं पाल रहा हूँ परिवार को, मैं चला रहा हूँ व्यापार को। जबकि हम तो केवल निमित्त हैं, पालनहार तो वही है।

3. समा जाना - सुप्रीम ही अंतिम विश्राम है
अंत में हर वस्तु उसी में लौट जाती है। लहर फिर समुद्र बन जाती है। शरीर मिट्टी में, मिट्टी पृथ्वी में, पृथ्वी ऊर्जा में, ऊर्जा उसी सुप्रीम चेतना में लीन हो जाती है। इसे ही लय कहते हैं।

मृत्यु कोई अंत नहीं, वापसी है। जैसे दिन भर घूम कर बच्चा माँ की गोद में लौट आता है, वैसे ही सारा अस्तित्व थक कर उसी गोद में लौटता है।

तो फिर हमारे लिए इसका क्या अर्थ है?

जब आप यह जान लेते हैं, तो जीवन का भय समाप्त हो जाता है।

अभिमान मिटता है: मैं कर्ता हूँ, यह भाव चला जाता है।
भय मिटता है: जो उसी से आया है, उसी में पल रहा है, उसे खोने का डर कैसा? आप कभी उससे अलग हुए ही नहीं।
ध्यान सहज हो जाता है: ध्यान में हम यही तो करते हैं—स्रोत की ओर लौटना। विचारों को, श्वास को देखते-देखते हम उसी सुप्रीम में समाने लगते हैं, जहाँ से हम आये थे।
इसीलिए ज्ञानी कहते हैं—इस जगत को पकड़ो मत, देखो। यह उसी का खेल है, उसी में हो रहा है, उसी में समा रहा है। आप सिर्फ साक्षी बनकर इस लीला को देखें।

आप स्वयं को जब-जब शांत, स्थिर, मौन पाते हैं—उस क्षण आप उसी सुप्रीम में समाए हुए होते हैं।
RAM DHAMI, NEW YORK, USA.
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