कृपालु महाप्रभु दिव्य तत्त्वज्ञान

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कृपालु महाप्रभु दिव्य तत्त्वज्ञान Devotee / Works at JKP - Nepal
Jagadguru Kripalu Pratishthan Nepal

Radhey Radhey

देव-प्रबोधिनी एकादशी का महत्त्व -बहुत समय पहले, महाप्रलय के बाद भगवान् हमेशा सोया करते थे। वे करोड़ों युगों तक सोते रहते ...
01/11/2025

देव-प्रबोधिनी एकादशी का महत्त्व -
बहुत समय पहले, महाप्रलय के बाद भगवान् हमेशा सोया करते थे। वे करोड़ों युगों तक सोते रहते थे, क्योंकि कोई सृष्टि नहीं थी, तो कोई काम भी नहीं था। तब लक्ष्मी जी ने उनसे कहा, "आप इतने युग लगातार जागते रहते हैं, तो इसके बदले आप एक साल में कुछ लिमिट तय कर लीजिए।" भगवान् ने कहा, "ठीक है, मैं हर साल चार महीने सोया करूँगा।"
उन्हीं चार महीनों को चौमासा कहते हैं।

इन चार महीनों में महात्मा लोग एक ही जगह रहते हैं। वृन्दावन में सारे तीर्थ आकर चार महीने तक वहीं निवास करते हैं। आज के दिन ठाकुर जी और सभी देवता लोग उठते हैं। इस दिन को देव प्रबोधिनी एकादशी कहते हैं - अर्थात् देवताओं के जागने वाली एकादशी।

इसका बड़ा महत्त्व है। इस दिन व्रत रखना चाहिए, और भगवान् में ही मन का चिंतन होना चाहिए। दान आदि धार्मिक कार्यों का इस दिन विशेष महत्त्व होता है।

#भक्तियोगरसावतार_जगद्गुरु_श्री_कृपालु_जी_महाराज

ये मन का मैल स्प्रिचुअल पॉवर आयेगी जब, भगवान् आदि तब शुद्ध होगा।मन शुद्ध करना ही आपकी ड्युटी है बस और सब काम तो गुरु करे...
26/10/2025

ये मन का मैल स्प्रिचुअल पॉवर आयेगी जब, भगवान् आदि तब शुद्ध होगा।मन शुद्ध करना ही आपकी ड्युटी है बस और सब काम तो गुरु करेगा।

#भक्तियोगरसावतार_जगद्गुरु_श्री_कृपालु_जी_महाराज

गुरु के व्यवहार को कभी भी मत देखो।सदा यह सोचो कि वो कुछ भी करें, कैसा भी व्यवहार करें, हमें इससे कोई मतलव नहीं।बस,हमें त...
23/09/2025

गुरु के व्यवहार को कभी भी मत देखो।सदा यह सोचो कि वो कुछ भी करें, कैसा भी व्यवहार करें, हमें इससे कोई मतलव नहीं।बस,हमें तो उनकी आज्ञा पालन करना है।चाहे वो हमसे आँखें फेर लें, चाहे उदासीन हो जायें, चाहे डाँट लगायें,लेकिन हमारे प्यार में कमीं नहीं आयेगी।सदा उनको सुख पहुँचाना ही हमारे जीवन का प्रथम लक्ष्य है।

#भक्तियोगरसावतार_जगद्गुरु_श्री_कृपालु_जी_महाराज

तो सोचिये जब तक कम्पलीट सरेण्डर न हो जाय तब तक ठाकुर जी का क्या रुप होगा ?'समोऽहं सर्वभूतेषु'।मेरा कोई दोस्त नहीं,मेरा क...
14/04/2025

तो सोचिये जब तक कम्पलीट सरेण्डर न हो जाय तब तक ठाकुर जी का क्या रुप होगा ?'समोऽहं सर्वभूतेषु'।मेरा कोई दोस्त नहीं,मेरा कोई दुश्मन नहीं।मैं तो न्यायाधीश हूँ,जज हूँ,फैसला करता हूँ,कर्मफल देता हूँ।ये तुकाराम,तुलसीदास, सूरदास,मीरा,कबीर आदि के लिये आप क्या है ?उनका मैं योगक्षेम वहन करता हूँ क्योंकि वो 'तेषां नित्याभियुक्ताम्' हो चुके।अनन्य प्लस नित्य सरेण्डर उनका हो चुका।तो जब तक हमारा कम्पलीट सरेण्डर न हो तब तक श्रीकृष्ण भीतर बैठे हैं तो ०/१००।अवतार लेकर सामने खड़े हों,आप लिपटे हों तो भी ०/१००।कुछ नहीं मिलेगा आपको।दिमाग खराब होगा सो अलग।मिलना-विलना कुछ नहीं।ये जो आप लोग सुनते हैं मीठी-मीठी बातें की बड़े-बड़े सनकादिक परमहंस,जनकादिक परमहंस,भगवान शंकर आदि जिसने भी श्रीकृष्ण की मुस्कान देखा वो पागल हो गये।ये लोग तो सिद्धातिसिद्ध हैं इसलिये पागल हो गये।इनके पास दिव्य दृष्टि है इसलिये श्रीकृष्ण के दिव्य चिन्मय विग्रह को ये देख रहे हैं।आपके सामने श्रीकृष्ण आ जायेंगे तो आपको प्राकृत दिखाई पड़ेंगे,जैसे आप लोग वैसे ही वो भी।थोड़ा-सा मान लिया कि अगर आपका अन्त:करण कुछ परसेन्ट शुद्ध है तो कुछ परसेन्ट विशेषता दिखाई पड़ेगी।लड़का जरा काबिल है,जीनियस है।इसमें कोई शक नहीं,बस। जरा सुन्दर है।ये थोड़ी-थोड़ी विशेषताएँ आपको लगेंगी जरुर अगर अन्त:करण शुद्ध है तो।और अगर शुद्ध नहीं है तो फिर आपको अपने से भी खराब लगेंगे वो।

#भक्तियोगरसावतार_जगद्गुरु_श्री_कृपालु_जी_महाराज

साधनावस्था में संसार के बहिरंग ऐश्वर्यों से बचना है क्योंकि संसार के ऐश्वर्य बड़े-बड़े साधकों को पाताल में ढकेल देते हैं...
11/04/2025

साधनावस्था में संसार के बहिरंग ऐश्वर्यों से बचना है क्योंकि संसार के ऐश्वर्य बड़े-बड़े साधकों को पाताल में ढकेल देते हैं।

#भक्तियोगरसावतार_जगद्गुरु_श्री_कृपालु_जी_महाराज

अरे मन ! लाख टका की बात सुन ! जो पुत्र,पिता,भाई आदि तुझे अपना मानते रहते हैं,यह सब धोखा है।क्योंकि वो लोग अपनी स्वार्थ स...
07/03/2025

अरे मन ! लाख टका की बात सुन ! जो पुत्र,पिता,भाई आदि तुझे अपना मानते रहते हैं,यह सब धोखा है।क्योंकि वो लोग अपनी स्वार्थ सिद्धि के लिए ही ऐसा करते हैं।अरे मन ! जब ये लोग अपना ही वास्तविक हित नहीं समझते और सांसारिक विषयों में भटकते रहते हैं तब भला ये तेरा क्या हित करेंगे।तू इन पर क्या विश्वास करता है।अरे मन ! अब तू सबसे नाता तोड़कर एकमात्र श्यामसुन्दर से नाता जोड़ ले।

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महाशिवरात्रि पर्व की सभी को बहुत बहुत शुभकामनाएंजैसा‌ कि आप‌ सभी जानते हैं कि भगवान शंकर जी को वैष्णवों में सर्वश्रेष्ठ ...
26/02/2025

महाशिवरात्रि पर्व की सभी को बहुत बहुत शुभकामनाएं

जैसा‌ कि आप‌ सभी जानते हैं कि भगवान शंकर जी को वैष्णवों में सर्वश्रेष्ठ माना जाता है- वैष्णवानां यथा शंभो- ऐसा वेद कहता है।
भगवान शंकर को भी रासलीला में प्रवेश मिला था। रासलीला में प्रवेश केवल समर्था रति वाले सर्वश्रेष्ठ वैष्णवों को ही मिलता है। ये सब‌ गोपी प्रेम वाले भक्त‌ होते हैं। शंकर भगवान को भी रासलीला में प्रवेश करने के लिए गोपी बनना पड़ा था। गोपी बनने के कारण उन्हें गोपीश्वर कहा जाता है और भगवान श्रीकृष्ण को गोपेश्वर।
ऐसे गोपी प्रेम प्राप्त भगवान शंकर की आराधना कर उनसे गोपीप्रेम की याचना करने का यह आज का दिन बड़ा ही‌ शुभ दिन है।

(ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय, मेरा न कोई तेरे सिवाय।

श्यामा श्याम सो मोहुँ मिलाय, टुक ब्रज रस दो मोहुँ चखाय।।

शिव शंकर हर अवढर दानी,ब्रजरस दे दो निज जन जानी।।)

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१० प्राकार के नामापराध नामापराध शब्द को सुना होगा । वे नामापराध निम्नलिखित है - (१) सत्पुरुष-निन्दा(२) शिवादि नामों में ...
24/02/2025

१० प्राकार के नामापराध

नामापराध शब्द को सुना होगा । वे नामापराध निम्नलिखित है -

(१) सत्पुरुष-निन्दा
(२) शिवादि नामों में भेद-भाव
(३) गुरु-निन्दा
(४) शास्त्र-निन्दा
(५) हरि-नाम को स्तुतिमात्र समझना
(६) नाम के ओट में पाप करना
(७) महापुरुषों के मुख से नाम का माहात्य सुनकर भी
नाम में प्रेम न होना
(८) महापुरुष की शरणागति का स्वाँग रचते हुये भी मैं
मेरे में लगे रहना
(६) यज्ञ, दानादि धर्मों से हरि-नाम की तुलना करना
(१०) अश्रद्धालु को अंतरङ्ग रहस्यों का उपदेश करना

ये १० नामापराध हैं । इनसे सदा ही सावधान रहना, तथा यह भी समझे रहना चाहिये कि इन समस्त नामापराधों में भी भगवद्भक्तों के प्रति किया हुआ अपराध भगवान् से भी सर्वथा अक्षम्य रहता है । इन नामापराधों का प्रायश्चित्त कोई भी वैदिक, पौराणिक कर्म नहीं है । नामापराध को, या तो महापुरुष, अथवा हृदय से अपने आप को अपराधी मानकर भगवन्नाम संकीर्तन करना ही क्षमा कर सकता है । यथा :-

"नामापराधयुक्तानां नामान्येव हरन्त्यघम्"

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प्रश्न : महाराज जी ! कुम्भ का क्या महत्व है, जरा यह बता दीजिए।उत्तर : ये महत्व नहीं हुआ करता, मन की भावना का सब महत्व हो...
13/01/2025

प्रश्न : महाराज जी ! कुम्भ का क्या महत्व है, जरा यह बता दीजिए।

उत्तर : ये महत्व नहीं हुआ करता, मन की भावना का सब महत्व होता है। वैसे कहानी किस्से हैं सबके पुराणों में। कुम्भ माने घड़ा। अमृत का घड़ा जहाँ-जहाँ रखा गया, वहाँ कुम्भ मेला होने लगा। लेकिन ये सब तो बातें हैं, असली बात तो है, अपने मन की भावना। गंगा जी हो, जमुना जी हो, सरस्वती जी हो, कोई हो, हमारी भावना यदि उनमें दिव्य है तो हमको दिव्य फल मिलेगा, और यदि भावना मायिक है तो मायिक फल मिलेगा। उसमें न कुम्भ कुछ करेगा, न जन्माष्टमी, न रामनवमी, न वृन्दावन, न चारों धाम ? सब बकवास है। ये तो इसलिए है कि प्राचीनकाल में सब सन्त लोग वहाँ जाया करते थे और गृहस्थी भी जाया करते थे, तो गृहस्थी लोग सन्तों के द्वारा उपदेश लेकर साधना करते थे। अब सन्त लोग तो शायद दो-चार ही जाते हैं, बाकी पाखंडी लोग लाखों जाते हैं, हजारों नहीं।

तो अगर कोई गृहस्थी जाकर वहाँ उपदेश प्राप्त करना चाहे, तो पाखंडियों के चक्कर में पड़ जाएगा, अज्ञानियों के और हानि हो जाएगी। मनुष्य अज्ञ है, इसलिए वह भोला है। वह ग़लत जगह को सही मान लेता है, गलत आदमी को सिद्ध महापुरुष मान लेता है। वो सब पंडाल देखता है। इस पंडाल में ज्यादा विशेषता है, बड़ी लाइट है, बहुत बड़ा है, यह बहुत बड़ा बाबा होगा। हाँ! हाँ ! ऐसी भावनायें आ जाती हैं और वह श्रद्धा कर लेता है।

जैसे पोलिटिक्स में जितना चालाक, चार सौ बीस आदमी होता है, उतना सफल हो जाता है, ऐसे ही भगवत् विषय में है। जितना आदमी अच्छा प्रोपेगंडा कर लेता है- ये बाबाजी ऐसे हैं, हिमालय से आए हैं, इनकी उम्र २०० वर्ष है, ये ऐसा करते हैं, जिसको जो चाहे दे देते हैं। अनेक प्रकार के गलत प्रचार करके लोगों को अपनी ओर आकृष्ट करते हैं उनके यहाँ ज्यादा भीड़ होती है। लोग धोखे में पड़ जाते हैं। अब कोई तीर्थ-वीर्थ इन मामलों में कोई महत्व नहीं रखता। बस ये है कि भावना अपनी भगवत्संबंधी बनावें, तो वृन्दावन में रहे तो भी ठीक है, और नरक में रहे तो भी ठीक है। इसमें कोई अन्तर नहीं है।

एकोदेवः सर्वभूतेषु गूढ़ः सर्वव्यापी सर्वभूतान्तरात्मा ।

वेद कह रहा है कि भगवान् ने संसार बनाया और सर्वव्यापक हो गए- 'प्रभु व्यापक सर्वत्र समाना' समान रूप से व्याप्त हुए। ऐसा नहीं है कि मयखाने में छोटा भगवान् है, मन्दिर में बड़ा भगवान् है। एक से, वही पूर्ण भगवान् सर्वत्र व्याप्त हैं। इसका प्रमाण भी दिया है भगवान् ने कि इतना बड़ा राक्षस हिरण्यकशिपु, जब उसने प्रश्न किया प्रह्लाद से कि क्या इस खम्भे में भी तेरा भगवान् है? उसने कहा- हाँ है। नृसिंह उसी खम्भे से प्रगट हो गए। हाँ-हाँ मैं हूँ, देख।

तो पवित्र अपवित्र से मतलब नहीं है, तीर्थ गैर-तीर्थ से मतलब नहीं है, मतलब है अपनी भावना का। कितने लोग वृन्दावन में रहते हैं, अयोध्या में रहते हैं, काशी में रहते हैं, उज्जैन में रहते हैं, ये समझकर कि वहाँ मरेंगे तो मुक्ति मिल जायगी। सब धोखा है। तीर्थ स्थानों में पाप करने से और बड़ा पाप माना जाता है। अरे! पाप तो सभी जगह पाप है, लेकिन भगवान् के धाम में, सन्त के सामने, मन्दिर में तो अच्छी भावना बननी चाहिए। वहाँ भी जो पाप करे वो बहुत बड़ा पाप है। लेकिन अगर अपराध करता है तो उसको नामापराध बोलते हैं, और उसका प्रायश्चित कोई शास्त्रों में नहीं लिखा, बस महापुरुष ही क्षमा कर सकता है। तो तीर्थों का क्या महत्व होगा, जब भगवान् सर्वव्यापक हैं, चाहे प्रयाग हो, चाहे काशी हो। कबीरदास ने कहा- 'जो कबिरा काशी गरे तो रामहिं कौन निहोर।' हम काशी में नहीं मरेंगे, हम मगहर में जाकर मरेंगे, देखें कैसे नरक मिलता है। क्योंकि भगवान् तो सर्वव्यापक है, यह महापुरुष जानता है इसलिए उसके दिमाग में ये बीमारी नहीं है कि यह स्थान अधिक महत्वपूर्ण है। हाँ हाँ, आज कोई सन्त है, किसी जगह, जब तक वह सन्त है, तब तक उस स्थान का महत्व है क्योंकि उससे लाभ मिल रहा है जीवों को। लेकिन कल उसी जगह राक्षस आकर बस जाये तो क्या महत्व रह जाएगा ? भगवान् सर्वव्यापक सब जगह हैं, अन्दर ही बैठे हैं, बाहर की कौन कहे। लेकिन कोई लाभ नहीं मिल रहा है। तो सारा लाभ भावना से मिलता है, मन की भावना सही हो-

जाकी रही भावना जैसी। प्रभु मूरति देखी तिन तैसी ॥

कुम्भ मेले में हजारों आदमी जाते हैं ऐसे भी। जिनका लक्ष्य- अनाचार, पापाचार, भ्रष्टाचार, दुराचार, जेब काटना, यही धन्धा है, वह भी जाते हैं कुम्भ में। उनका व्यापार अच्छा चलता है। अरे यार! आज बात बन गई। क्या हुआ ? दस जेब काटा आज। उनके लिए कुम्भ जो है, पाप का घर है।

रहस्य जानना जरूरी है। गंगाजी कौन हैं, यह पहले जानो, फिर मानो, फिर उसके पास जाओ, तब असली लाभ मिलेगा। वर्ना जाओगे किसी महात्मा के पास क्या देखोगे ? सिर, पैर, हाथ, कान, नाक। इनसे क्या मिलेगा ? ये तो सबके एक से होते ही हैं। अरे । थोड़ा-थोड़ा परिवर्तन होता है, उसका मुँह ऐसा है, उसकी नाक ऐसी है, और क्या खास बात होगी। वह चाहे शंकराचार्य हों, चाहे वल्लभाचार्य हों, चाहे निम्बार्काचार्य हों, कोई जगद्‌गुरु हों, चाहे गधा गुरु हो, शरीर तो सबका वैसे ही है। जो कुछ उसका माल-मसाला है, वो तो भीतर है; उसको समझो, और उसको पाने के लिए जो साधन है, उसको करो।

#भक्तियोगरसावतार_जगद्गुरु_श्री_कृपालु_जी_महाराज
( पुस्तक- प्रश्नोतरी भाग -१ , पेज ११४ से ११८)

बड़ी दीदी :- अभी तक क्या किया, उसका अफसोस छोड़ो, आगे क्या करना इसकी सोचो , जब उनको अपना गुरू मान चुके हो और इस बात का एह...
24/11/2024

बड़ी दीदी :- अभी तक क्या किया, उसका अफसोस छोड़ो, आगे क्या करना इसकी सोचो , जब उनको अपना गुरू मान चुके हो और इस बात का एहसास भी है कि अभी तक कुछ भी नहीं कर पाए तो गुरू के बतलाए मार्ग पर चलना तुरंत शुरू कर दो और अपना बना लो, कल्याण कर लो , नहीं तो अभी तक क्या किया इस बात का अफसोस करते रह जाओगे जीवन भर और समय निकल जाएगा हाथ से , फिर कुछ भी नहीं कर पाओगे । :-परम पुज्यनियां सुश्री विशाखा दीदी जी द्वारा मनगढ़ धाम में एक साधक को निर्देश पिकनिक में ।

गोपाष्टमी की हार्दिक शुभकामनाएँ!गोपाष्टमी पर गौ दान -आज गोपाष्टमी का महान पर्व है। भगवान् श्री कृष्ण आज ही के दिन से गाय...
09/11/2024

गोपाष्टमी की हार्दिक शुभकामनाएँ!

गोपाष्टमी पर गौ दान -
आज गोपाष्टमी का महान पर्व है। भगवान् श्री कृष्ण आज ही के दिन से गाय चराने के लिए घर से बाहर निकले थे, गाय का पूजन किया था। गाय का दान करना श्रीकृष्ण प्रियता का आदर्श है। श्रीकृष्ण गोप्रिय हैं, गोपाल हैं, गोविन्द है। इसलिए आज गोदान करने का बड़ा महत्त्व है। इससे श्री कृष्ण की प्रसन्नता मिलती है। इसलिए जो लोग समर्थ हैं, वो आज गोदान का संकल्प करें। भागवत में लिखा है कि जब भगवान् श्री कृष्ण गृहस्थ में गए, द्वारिका में 16108 ब्याह किए और 16108 महल बनवाकर, अपने 16108 रूप बनाकर वहाँ रहने लगे, तो प्रतिदिन 84,013 गाय ब्राह्मणों को रोज़ दान करते थे। गृहस्थ में, ब्राह्मणों को दान करना बाकी वर्णों का धर्म है। इसलिए हम लोगों को भी उनका अनुकरण करके गोदान करना चाहिए। 84,013 गायों का दान न कर सकें, तो कम से कम एक गाय का तो दान करें।

गोपाल भगवान् की जय !
प्यार दे दे, प्यार दे दे, गोपाल प्यारे।
प्यार का भिखारी आया, गोपाल द्वारे॥

#भक्तियोगरसावतार_जगद्गुरु_श्री_कृपालु_जी_महाराज

साधक के लिए दो मुख्य बातें:1. खाली समय में कहीं भी, कभी भी राधे नाम का श्वास श्वास से जाप कीजिये। श्वास खींचते समय सोचो ...
05/11/2024

साधक के लिए दो मुख्य बातें:
1. खाली समय में कहीं भी, कभी भी राधे नाम का श्वास श्वास से जाप कीजिये। श्वास खींचते समय सोचो 'रा' और छोड़ते समय 'धे'। नहीं तो मन अभ्यास वश गंदे संसार का ही चिंतन करेगा।
2. कम से कम बोलो, जितने में काम चल जाये। क्योंकि अधिक बोलने में कोई न कोई वाक्य गड़बड़ निकल जायेगा। इससे नुकसान हो जायेगा। सोचने में सिर्फ हमारा नुकसान है, बोलने में डबल नुकसान है क्योंकि बोलने से दूसरे का भी नुकसान होगा।

ये दोनों करने में पहले मेहनत पड़ेगी, लेकिन फिर अपने आप होने लग जायेगा। महीने भर अभ्यास कर लो, बहुत बड़ा फायदा होगा।

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