27/01/2026
59वें संत समागम, महाराष्ट्र ने यह साबित कर दिया कि कृपा कोई किताब में पढ़ी जाने वाली चीज़ नहीं है—इसे जिया जाता है, महसूस किया जाता है।
वह बाँसुरी वादक, जिसने आँखें बंद कीं और सुरों में खुद को खो दिया। वह दादी माँ, जिनके घुटने बैठने की गुज़ारिश कर रहे थे, फिर भी वे श्रद्धा में खड़ी रहीं। पिता के कंधों पर बैठा वह नन्हा बच्चा, जो शब्दों को जाने बिना ही आस्था का अर्थ सीख रहा था। और वह संत, जिसकी निर्मल खुशी के साथ किया गया नृत्य हज़ारों चेहरों पर मुस्कान ले आया। वहाँ उम्र का कोई महत्व नहीं था, थकान का कोई अस्तित्व नहीं था—बस चलती हुई भक्ति थी।
इस समागम का हर क्षण सतगुरु माता जी और निरंकारी राजपिता जी की कृपा से ओत-प्रोत था। कोई उत्तर खोजने आया था, कोई शांति की तलाश में। लेकिन हम सब यहाँ से यह एहसास लेकर लौटे कि हमने अपना घर पा लिया है 🏠🤍