Meditation & Awakening

Meditation & Awakening दिल है कदमो पर किसिके , सर झुका हो या ना ?

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21/07/2026

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"मनुष्य को छोड़कर कोई भी आत्महत्या नहीं करता—न कोई वृक्ष, न कोई पक्षी। मनुष्य को छोड़कर किसी को भी मनोचिकित्सक (साइकियाट...
06/07/2026

"मनुष्य को छोड़कर कोई भी आत्महत्या नहीं करता—न कोई वृक्ष, न कोई पक्षी। मनुष्य को छोड़कर किसी को भी मनोचिकित्सक (साइकियाट्रिस्ट) की आवश्यकता नहीं पड़ती।
मनुष्य को छोड़कर, हर चीज़ ठीक वहीं है जहाँ उसे होना चाहिए—पूर्णतः प्रसन्न।
इन पक्षियों के स्वरों में क्या तुम्हें कहीं कोई उदासी सुनाई देती है? वहाँ तो केवल उमड़ता हुआ आनंद है। ऐसा नहीं कि वे किसी महान दार्शनिक विचारधारा पर चर्चा कर रहे हैं, ऐसा भी नहीं कि वे अपने गिरजाघरों में प्रार्थना कर रहे हैं, और न ही वे कोई विशेष बात कह रहे हैं। केवल ऊर्जा का उमड़ता हुआ आनंद ही उन्हें अपने घर जैसा अनुभव कराता है।
और उनके पास कुछ भी नहीं है—न धन, न सत्ता, न प्रतिष्ठा। वे न ही हीनभावना से ग्रस्त हैं और न ही श्रेष्ठता की भावना से। वे कभी विभाजित व्यक्तित्व (स्किज़ोफ्रेनिया) के शिकार नहीं होते।
मनुष्य को वृक्षों से, पक्षियों से और पशुओं से बहुत कुछ सीखना चाहिए।"
— ओशो

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06/07/2026

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जब कोई संदेह शेष नहीं रह जाता, जब तुम जान लेते हो कि कुछ भी जाना नहीं जा सकता, कि ज्ञान असंभव है; जब तुम उसी समझ पर पहुँ...
22/04/2026

जब कोई संदेह शेष नहीं रह जाता, जब तुम जान लेते हो कि कुछ भी जाना नहीं जा सकता, कि ज्ञान असंभव है; जब तुम उसी समझ पर पहुँचते हो जहाँ Socrates पहुँचे थे — ‘मैं केवल एक ही बात जानता हूँ, कि मैं कुछ नहीं जानता’ — अगर यह मासूमियत तुम्हारे भीतर घटित हो जाए, तब कुछ भी शेष नहीं रहता, यहाँ तक कि कोई अनुत्तरित प्रश्न भी नहीं। ‘प्रश्न’ शब्द ही अर्थहीन हो जाता है।
एक मौन शेष रह जाता है — गहरा मौन, और एक महान आनंद, एक आशीर्वाद शेष रह जाता है। जीवन तुम्हारे भीतर बहता है, तुमसे होकर गुजरता है, कोई प्रश्न पैदा किए बिना। तुम बस उसे जीते हो।
यही है सादगी — न कि किसी साधु या संन्यासी द्वारा बनाई गई सादगी, बल्कि यह है मासूमियत की सादगी, जो बनाई हुई नहीं है। तब हर चीज़ के प्रति एक गहरा आश्चर्य होता है, एक विस्मय होता है। तुम एक वृक्ष की पूजा कर सकते हो, एक पत्थर की पूजा कर सकते हो, क्योंकि जैसे ही प्रश्न समाप्त हो जाते हैं और तुम्हारा हृदय रहस्य और चमत्कार से भर जाता है, तुम्हारा पूरा जीवन एक प्रार्थना बन जाता है, एक पूजा बन जाता है।
यह कितना अद्भुत है कि हम जीवित हैं — बिना किसी कारण के! — कि हम सांस ले रहे हैं, देख सकते हैं, स्वाद ले सकते हैं, सुन सकते हैं, प्रेम कर सकते हैं, हमारा हृदय धड़क रहा है, जीवन हमसे होकर बह रहा है, जीवन ने हमें अपने माध्यम के रूप में चुना है।
सिर्फ इसे जान लेना ही कृतज्ञ होने के लिए पर्याप्त है, सिर्फ इसे महसूस कर लेना ही प्रार्थनापूर्ण होने के लिए पर्याप्त है। प्रार्थना करने के लिए किसी भगवान की आवश्यकता नहीं है।”

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22/04/2026

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मा धर्म ज्योति : मुझे अभी तक भरोसा नहीं होता कि मैंने ऐसे व्यक्ति का प्रवचन सुना है, जो अभी सिर्फ छत्तीस ही वर्ष का है। ...
17/04/2026

मा धर्म ज्योति : मुझे अभी तक भरोसा नहीं होता कि मैंने ऐसे व्यक्ति का प्रवचन सुना है, जो अभी सिर्फ छत्तीस ही वर्ष का है। उनकी वाणी से ऐसा महसूस हुआ, जैसे उपनिषदकाल का कोई प्राचीन ऋषि बोल रहा हो…
मैं छब्बीस वर्ष की हूँ। 21 जनवरी 1968—रविवार का दिन है, और आज शाम 4 बजे ओशो बंबई के षण्मुखानंद हॉल में बोलने वाले हैं। मेरी एक मित्र, जो सत्य की मेरी खोज से परिचित है, मुझे उन्हें सुनने के लिए जाने को कहती है। मैं इतने तथाकथित संतों और महात्माओं को सुन चुकी हूँ कि भारत में चल रहे इन धार्मिक आडंबरों से मेरा विश्वास उठ चुका है। लेकिन फिर भी, ओशो, जो आचार्य रजनीश के नाम से जाने जाते हैं, मुझे आकर्षित करते हैं। मैं उनके प्रवचन में जाने का फैसला कर लेती हूँ।
शाम चार बजे मैं षण्मुखानंद हॉल की दूसरी मंजिल वाली बालकनी में पहुँचती हूँ, जो कि पूरी तरह भरी हुई है। बहुत से लोग दीवारों के साथ-साथ किनारों पर भी खड़े हुए हैं। हवा में एक उमंग है, एक उत्साह है। बहुत शोर हो रहा है। यह हॉल बंबई के सबसे बड़े सभागारों में से है, जहाँ पाँच हजार लोग बैठ सकते हैं। मैं एक सीट खोजकर आराम से बैठ जाती हूँ।
कुछ ही मिनटों में सफेद लुंगी और शॉल ओढ़े, एक दाढ़ी वाले व्यक्ति मंच पर नज़र आते हैं, जो दोनों हाथ जोड़कर सबको नमस्कार करते हुए धीरे से पद्मासन में बैठ जाते हैं। मैं मंच से बहुत दूर बैठी हूँ और बामुश्किल उनका चेहरा ही देख पा रही हूँ, लेकिन मेरा हृदय इस अनजान व्यक्ति को सुनने की आकांक्षा से आतुर है।
कुछ ही क्षणों में मुझे उनकी मधुर लेकिन सशक्त वाणी सुनाई पड़ती है; वे श्रोताओं को संबोधित कर रहे हैं—“मेरे प्रिय आत्मन…।” अचानक सभागार में एक गहन सन्नाटा छा जाता है। मुझे महसूस होता है कि उनकी आवाज मुझे एक गहरे विश्राम में लिए जा रही है और मैं बिल्कुल शांत होकर उन्हें सुन रही हूँ। मेरा मन पूरी तरह रुक गया है—मात्र उनकी वाणी ही मेरे भीतर गूँज रही है। मैं पूर्ण रूप से ‘अहा’ के भाव में हूँ, विस्मय की स्थिति में हूँ। वे मेरे उन सभी प्रश्नों का उत्तर दे रहे हैं, जो वर्षों से मुझे सताते रहे हैं।
प्रवचन समाप्त हो गया; मेरा हृदय आनंद से नाच रहा है, और मैं अपनी मित्र से कहती हूँ—“यही वह गुरु हैं, जिन्हें मैं खोज रही हूँ। मैंने उन्हें पा लिया है।” बाहर आकर मैं उनकी कुछ पुस्तकें और ‘ज्योतिशिखा’ नाम की पत्रिका खरीदती हूँ। मैं जैसे ही ज्योतिशिखा को खोलती हूँ, तो सामने पृष्ठ पर लिखा दिखाई पड़ता है—“आचार्य रजनीश का छत्तीसवाँ जन्मोत्सव।” मैं विश्वास नहीं कर पाती। मुझे लगता है, प्रिंटिंग में किसी गलती के कारण ‘63’ का ‘36’ हो गया है। काउंटर पर खड़ी युवती से जब मैं पूछती हूँ, तो वह हँस पड़ती है और कहती है—“36 सही है।”
मुझे अभी तक भरोसा नहीं होता कि मैंने ऐसे व्यक्ति का प्रवचन सुना है, जो अभी सिर्फ छत्तीस ही वर्ष का है। उनकी वाणी से ऐसा महसूस हुआ, जैसे उपनिषदकाल का कोई प्राचीन ऋषि बोल रहा हो।
— मा धर्म ज्योति
पुस्तक : दस हजार बुद्धों के लिए एक सौ गाथाएं — (मा धर्मज्योति)
अध्याय — एक

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