Laxmihari Das,Spiritual Mentor-ISKCON

Laxmihari Das,Spiritual Mentor-ISKCON Laxmihari Das has served ISKCON in various ways as a preacher at differenet ISKCON centers in India like SKCON Delhi,ISKCON Mayapur and ISKCON Yamunanagar.

07/05/2023
12/01/2018

One who is saturated with substantial knowledge of Srimad Bhagavatam and Bhagavad gita will never be entangled with any material things or activities even amidst the biggest network of material illusions.

03/01/2018

अविनाशि तु तद्विद्धि येन सर्वमिदं ततम् |
विनाशमव्ययस्यास्य न कश्र्चित्कर्तुमर्हति || १७ ||

जो सारे शरीर में व्याप्त है उसे ही अविनाशी समझो | उस अव्यय आत्मा को नष्ट करने में कोई भी समर्थ नहीं है |

तात्पर्यः इस श्लोक में सम्पूर्ण शरीर में व्याप्त आत्मा की प्रकृति का अधिक स्पष्ट वर्णन हुआ है | सभी लोग समझते हैं कि जो सारे शरीर में व्याप्त है वह चेतना है | प्रत्येक व्यक्ति को शरीर में किसी अंश या पूरे भाग में सुख-दुख का अनुभव होता है | किन्तु चेतना की यह व्याप्ति किसी के शरीर तक ही सीमित रहती है | एक शरीर के सुख तथा दुख का बोध दूसरे शरीर को नहीं हो पाता | फलतः प्रत्येक शरीर में व्यष्टि आत्मा है और इस आत्मा की उपस्थिति का लक्षण व्यष्टि चेतना द्वारा परिलक्षित होता है | इस आत्मा को बाल के अग्रभाग के दस हजारवें भाग के तुल्य बताया जाता है | श्र्वेताश्र्वतरउपनिषद् में (५.९) इसकी पुष्टि हुई है –

बालाग्रशतभागस्य शतधा कल्पितस्य च |
भागो जीवः स विज्ञेयः स चानन्त्याय कल्पते ||

“यदि बाल के अग्रभाग को एक सौ भागों में विभाजित किया जाय और फिर इनमें से प्रत्येक भाग को एक सौ भागों में विभाजित किया जाय तो इस तरह के प्रत्येक भाग की माप आत्मा का परिमाप है |” इसी प्रकार यही कथन निम्नलिखित श्लोक में मिलता है –

केशाग्रशतभागस्य शतांशः सादृशात्मकः |
जीवः सूक्ष्मस्वरूपोऽयं संख्यातीतो हि चित्कणः ||

“आत्मा के परमाणुओं के अनन्त कण हैं जो माप में बाल के अगले भाग (नोक) के दस हजारवें भाग के बराबर हैं |”

इस प्रकार आत्मा का प्रत्येक कण भौतिक परमाणुओं से भी छोटा है और ऐसे असंख्य कण हैं | यह अत्यन्त लघु आत्म-संफुलिंग भौतिक शरीर का मूल आधार है और इस आत्म-संफुलिंग का प्रभाव सारे शरीर में उसी तरह व्याप्त है जिस प्रकार किसी औषधि का प्रभाव व्याप्त रहता है | आत्मा की यह धरा (विद्युतधारा) सारे शरीर में चेतना के रूप में अनुभव की जाती हैं और यही आत्मा के अस्तित्व का प्रमाण है | सामान्य से सामान्य व्यक्ति भी समझ सकता है कि यह भौतिक शरीर चेतनारहित होने पर मृतक हो जाता है और शरीर में इस चेतना को किसी भी भौतिक उपचार से वापस नहीं लाया जा सकता | अतः यह भौतिक संयोग के फलस्वरूप नहीं है, अपितु आत्मा के कारण है | मुण्डक उपनिषद् में (३.१.९) सूक्ष्म (परमाणविक) आत्मा की और अधिक विवेचना हुई है –

एषोऽणुरात्मा चेतसा वेदितव्यो यस्मिन्प्राणः पञ्चधा संविवेश |
प्राणैश्र्चित्तं सर्वमोतं प्रजानां यस्मिन् विशुद्धे विभवत्येष आत्मा ||

“आत्मा आकार में अणु तुल्य है जिसे पूर्ण बुद्धि के द्वारा जाना जा सकता है | यह अणु-आत्मा पाँच प्रकार के प्राणों में तैर रहा है (प्राण, अपान, व्यान, समान और उदान); यह हृदय के भीतर स्थित है और देहधारी जीव के पूरे शरीर में अपने प्रभाव का विस्तार करता है | जब आत्मा को पाँच वायुओं के कल्मष से शुद्ध कर लिया जाता है तो इसका आध्यात्मिक प्रभाव प्रकट होता है |”

हठ-योग का प्रयोजन विविध आसनों द्वारा उन पाँच प्रकार के प्राणों को नियन्त्रित करना है जो आत्मा की घेरे हुए हैं | यह योग किसी भौतिक लाभ के लिए नहीं, अपितु भौतिक आकाश के बन्धन से अणु-आत्मा की मुक्ति के लिए किया जाता है |

इस प्रकार अणु-आत्मा को सारे वैदिक साहित्य ने स्वीकारा है और प्रत्येक बुद्धिमान व्यक्ति अपने व्यावहारिक अनुभव से इसका प्रत्यक्ष अनुभव करता है | केवल मुर्ख व्यक्ति ही इस अणु-आत्मा को सर्वव्यापी विष्णु-तत्त्व के रूप में सोच सकता है |

अणु-आत्मा का प्रभाव पूरे शरीर में व्याप्त हो सकता है | मुण्डक उपनिषद् के अनुसार यह अणु-आत्मा प्रत्येक जीव के हृदय में स्थित है और चूँकि भौतिक विज्ञानी इस अणु-आत्मा को माप सकने में असमर्थ हैं, उसे उनमें से कुछ यह अनुभव करते हैं कि आत्मा है ही नहीं | व्यष्टि आत्मा तो निस्सन्देह परमात्मा के साथ-साथ हृदय में हैं और इसीलिए शारीरिक गतियों की सारी शक्ति शरीर के इसी भाग से उद्भूत है | जो लाल रक्तगण फेफड़ों से आक्सीजन ले जाते हैं वे आत्मा से ही शक्ति प्राप्त करते हैं | अतः जब आत्मा इस स्थान से निकल जाता है तो रक्तोपादक संलयन (fusion) बन्द हो जाता है | औषधि विज्ञान लाल रक्तकणों की महत्ता को स्वीकार करता है, किन्तु वह यह निश्चित नहीं कर पाता कि शक्ति का स्त्रोत आत्मा है | जो भी हो, औषधि विज्ञान यह स्वीकार करता है कि शरीर की सारी शक्ति का उद्गमस्थल हृदय है |

पूर्ण आत्मा के ऐसे अनुकणों की तुलना सूर्य-प्रकाश के कणों से की जाती है | इस सूर्य-प्रकाश में असंख्य तेजोमय अणु होते हैं | इसी प्रकार परमेश्र्वर के अंश उनकी किरणों के परमाणु स्फुलिंग है और प्रभा या परा शक्ति कहलाते हैं | अतः चाहे कोई वैदिक ज्ञान का अनुगामी हो या आधुनिक विज्ञान का, वह शरीर में आत्मा के अस्तित्व को नकार नहीं सकता | भगवान् ने स्वयं भगवद्गीता में आत्मा के इस विज्ञान का विशद वर्णन किया है |

28/12/2017

मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः |
अगामापायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत || १४ ||

हे कुन्तीपुत्र! सुख तथा दुख का क्षणिक उदय तथा कालक्रम में उनका अन्तर्धान होना सर्दी तथा गर्मी की ऋतुओं के आने जाने के समान है | हे भरतवंशी! वे इन्द्रियबोध से उत्पन्न होते हैं और मनुष्य को चाहिए कि अविचल भाव से उनको सहन करना सीखे |

तात्पर्यः कर्तव्य-निर्वाह करते हुए मनुष्य को सुख तथा दुख के क्षणिक आने-जाने को सहन करने का अभ्यास करना चाहिए | वैदिक आदेशानुसार मनुष्य को माघ (जनवरी-फरवरी) के मास में भी प्रातःकाल स्नान करना चाहिए | उस समय अत्यधिक ठंड पड़ती है, किन्तु जो धार्मिक नियमों का पालन करने वाला है, वह स्नान करने में तनिक भी झिझकता नहीं | इसी प्रकार एक गृहिणी भीषण से भीषण गर्मी की ऋतु में (मई-जून के महीनों में) भोजन पकाने से हिचकती नहीं | जलवायु सम्बन्धी असुविधाएँ होते हुए भी मनुष्य को अपना कर्तव्य निभाना होता है | इसी प्रकार युद्ध करना क्षत्रिय का धर्म है अतः उसे अपने किसी मित्र या परिजन से भी युद्ध करना पड़े तो उसे अपने धर्म से विचलित नहीं होना चाहिए | मनुष्य को ज्ञान प्राप्त करने के लिए धर्म के विधि-विधान पालन करने होते हैं क्योंकि ज्ञान तथा भक्ति से ही मनुष्य अपने आपको माया के बंधन से छुड़ा सकता है |

अर्जुन को जिन दो नामों से सम्भोधित किया गया है, वे भी महत्त्वपूर्ण हैं| कौन्तेय कहकर संबोधित करने से यह प्रकट होता है कि वह अपनी माता की और (मातृकुल) से सम्बंधित है और भारत कहने से उसके पिता की और (पितृकुल) से सम्बन्ध प्रकट होता है | दोनों और से उसको महान विरासत प्राप्त है | महान विरासत प्राप्त होने के फलस्वरूप कर्तव्यनिर्वाह का उत्तरदायित्व आ पड़ता है, अतः अर्जुन युद्ध से विमुख नहीं हो सकता |

21/12/2017

श्री मद् भगवद्गगीता यथारुप (भक्तीवेदान्त स्वामी प्रभूपाद द्वारा अनूवाद एवं टीका)

न हि प्रपश्यामि ममापनुद्याद्-
यच्छोकमुच्छोषणमिन्द्रियाणाम् |
अवाप्य भूमावसपत्नमृद्धं
राज्यं सुराणामपि चाधिपत्यम् || ८ ||

मुझे ऐसा कोई साधन नहीं दिखता जो मेरी इन्द्रियों को सुखाने वाले इस शोक को दूर कर सके | स्वर्ग पर देवताओं के आधिपत्य की तरह इस धनधान्य-सम्पन्न सारी पृथ्वी पर निष्कंटक राज्य प्राप्त करके भी मैं इस शोक को दूर नहीं कर सकूँगा |

तात्पर्यः यद्यपि अर्जुन धर्म तथा सदाचार के नियमों पर आधारित अनेक तर्क प्रस्तुत करता है, किन्तु ऐसा प्रतीत होता है कि वह अपने गुरु भगवान् श्रीकृष्ण की सहायता के बिना अपनी असली समस्या को हल नहीं कर पा रहा | वह समझ गया था कि उसका तथाकथित ज्ञान उसकी उन समस्याओं को दूर करने में व्यर्थ है जो उसके सारे अस्तित्व (शरीर) को सुखाये दे रही थीं | उसे इन उलझनों को भगवान् कृष्ण जैसे आध्यात्मिक गुरु की सहायता के बिना हल कर पाना असम्भव लग रहा था | शैक्षिक ज्ञान, विद्वता, उच्च पद – ये सब जीवन की समस्याओं का हल करने में व्यर्थ हैं | यदि कोई इसमें सहायता कर सकता है, तो वह है एकमात्र गुरु | अतः निष्कर्ष यह निकला कि गुरु जो शत-प्रतिशत कृष्णभावनाभावित होता है, वही एकमात्र प्रमाणिक गुरु है और वही जीवन की समस्याओं को हल कर सकता है | भगवान् चैतन्य ने कहा है कि जो कृष्णभावनामृत के विज्ञान में दक्ष हो, कृष्णतत्त्ववेत्ता हो, चाहे वह जिस किसी जाति का हो, वही वास्तविक गुरु है –

किबा विप्र, किबा न्यासी, शुद्र केने नय |
येइ कृष्णतत्त्ववेत्ता, सेइ ‘गुरु’ हय ||

“कोई व्यक्ति चाहे वह विप्र (वैदिक ज्ञान में दक्ष) हो, निम्न जाति में जन्मा शुद्र हो या कि संन्यासी, यदि कृष्ण के विज्ञान में दक्ष (कृष्णतत्त्ववेत्ता) है तो वह यथार्थ प्रामाणिक गुरु है |” (चैतन्य-चरितामृत, मध्य ८.१२८) | अतः कृष्णतत्त्ववेत्ता हुए बिना कोई भी प्रामाणिक गुरु नहीं हो सकता | वैदिक साहित्य में भी कहा गया है –

षट्कर्मनिपुणो विप्रो मन्त्रतन्त्रविशारदः |
अवैष्णवो गुरुर्न स्याद् वैष्णवः श्र्वपचो गुरुः ||

“विद्वान ब्राह्मण, भले ही वह सम्पूर्ण वैदिक ज्ञान में पारंगत क्यों न हो, यदि वह वैष्णव नहीं है या कृष्णभावनामृत में दक्ष नहीं है तो गुरु बनने का पात्र नहीं है | किन्तु शुद्र, यदि वह वैष्णव या कृष्णभक्त है तो गुरु बन सकता है |” (पद्मपुराण)

संसार की समस्याओं – जन्म, जरा, व्याधि तथा मृत्यु – की निवृत्ति धन-संचय तथा आर्थिक विकास से संभव नहीं है | विश्र्व के विभिन्न भागों में ऐसे राज्य हैं जो जीवन की सारी सुविधाओं से तथा सम्पत्ति एवं आर्थिक विकास से पूरित हैं, किन्तु फिर भी उनके सांसारिक जीवन की समस्याएँ ज्यों की त्यों बनी हुई हैं | वे विभिन्न साधनों से शान्ति खोजते हैं, किन्तु वास्तविक सुख उन्हें तभी मिल पाता है जब वे कृष्णभावनामृत से युक्त कृष्ण के प्रामाणिक प्रतिनिधि के माध्यम से कृष्ण अथवा कृष्णतत्त्वपूरक भगवद्गीता तथा श्रीमद्भागवत के परामर्श को ग्रहण करते हैं |

यदि आर्थिक विकास तथा भौतिक सुख किसी के पारिवारिक, सामाजिक, राष्ट्रीय या अन्तर्राष्ट्रीय अव्यवस्था से उत्पन्न हुए शोकों को दूर कर पाते, तो अर्जुन यह न कहता कि पृथ्वी का अप्रतिम राज्य या स्वर्गलोक में देवताओं की सर्वोच्चता भी उसके शोकों को दूर नहीं कर सकती | इसीलिए उसने कृष्णभावनामृत का ही आश्रय ग्रहण किया और यही शान्ति तथा समरसता का उचित मार्ग है | आर्थिक विकास या विश्र्व आधिपत्य प्राकृतिक प्रलय द्वारा किसी भी क्षण समाप्त हो सकता है | यहाँ तक कि चन्द्रलोक जैसे उच्च लोकों की यात्रा भी, जिसके लिए मनुष्य प्रयत्नशील हैं, एक झटके में समाप्त हो सकती है | भगवद्गीता इसकी पुष्टि करती है – क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति– जब पुण्यकर्मों के फल समाप्त हो जाते हैं तो मनुष्य सुख के शिखर से जीवन के निम्नतम स्टार पर गिर जाता है | इस तरह से विश्र्व के अनेक राजनीतिज्ञों का पतन हुआ है | ऐसा अधःपतन शोक का कारण बनता है |

अतः यदि हम सदा के लिए शोक का निवारण चाहते हैं तो हमें कृष्ण की शरण ग्रहण करनी होगी, जिस तरह अर्जुन ने की | अर्जुन ने कृष्ण से प्रार्थना की कि वे असकी समस्या का निश्चित समाधान कर दें और यही कृष्णभावनामृत की विधि है |

Laxmihari Das
ISKCON Yamunanagar
Haryana

20/12/2017

कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः
पृच्छामि त्वां धर्मसम्मूढचेताः |
यच्छ्रेयः स्यान्निश्र्चितं ब्रूहि तन्मे
शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम् || ७ ||

अब मैं अपनी कृपण-दुर्बलता के कारण अपना कर्तव्य भूल गया हूँ और सारा धैर्य खो चूका हूँ | ऐसी अवस्था में मैं आपसे पूछ रहा हूँ कि जो मेरे लिए श्रेयस्कर हो उसे निश्चित रूप से बताएँ | अब मैं आपका शिष्य हूँ और शरणागत हूँ | कृप्या मुझे उपदेश दें |

तात्पर्यः यह प्राकृतिक नियम है कि भौतिक कार्यकलाप की प्रणाली ही हर एक के लिए चिन्ता का कारण है | पग-पग पर उलझन मिलती है, अतः प्रामाणिक गुरु के पास जाना आवश्यक है, जो जीवन के उद्देश्य को पूरा करने के लिए समुचित पथ-निर्देश दे सके | समग्र वैदिक ग्रंथ हमें यह उपदेश देते हैं कि जीवन की अनचाही उलझनों से मुक्त होने के लिए प्रामाणिक गुरु के पास जाना चाहिए | ये उलझनें उस दावाग्नि के समान हैं जो किसी के द्वारा लगाये बिना भभक उठती हैं | इसी प्रकार विश्र्व की स्थिति ऐसी है कि बिना चाहे जीवन की उलझनें स्वतः उत्पन्न हो जाती हैं | कोई नहीं चाहता कि आग लगे, किन्तु फिर भी वह लगती है और हम अत्याधिक व्याकुल हो उठते हैं | अतः वैदिक वाङ्मय उपदेश देता है कि जीवन की उलझनों को समझने तथा समाधान करने के लिए हमें परम्परागत गुरु के पास जाना चाहिए | जिस व्यक्ति का प्रामाणिक गुरु होता है वह सब कुछ जानता है | अतः मनुष्य को भौतिक उलझनों में न रह कर गुरु के पास जाना चाहिए | यही इस श्लोक का तात्पर्य है |

आखिर भौतिक उलझनों में कौन सा व्यक्ति पड़ता है? वह जो जीवन की समस्याओं को नहीं समझता | बृहदारण्यक उपनिषद् में (३.८.१०) व्याकुल (व्यग्र) मनुष्य का वर्णन इस प्रकार हुआ है – यो वा एतदक्षरं गार्ग्यविदित्वास्माँल्लोकात्प्रैतिसकृपणः– “कृपण वह है जो मानव जीवन की समस्याओं को हल नहीं करता और आत्म-साक्षात्कार के विज्ञान को समझे बिना कूकर-सूकर की भाँति संसार को त्यागकर चला जाता है |” जीव के लिए मनुष्य जीवन अत्यन्त मूल्यवान निधि है, जिसका उपयोग वह अपने जीवन की समस्याओं को हल करने में कर सकता है, अतः जो इस अवसर का लाभ नहीं उठाता वह कृपण है | ब्राह्मण इसके विपरीत होता है जो इस शरीर का उपयोग जीवन की समस्त समस्याओं को हल करने में करता है | य एतदक्षरं गार्गि विदित्वास्माँल्लोकात्प्रैति स ब्राह्मणः | देहात्मबुद्धि वश कृपण या कंजूस लोग अपना सारा समय परिवार, समाज, देश आदि के अत्यधिक प्रेम में गवाँ देते हैं | मनुष्य प्राय चर्मरोग के आधार पर अपने पारिवारिक जीवन अर्थात् पत्नी, बच्चों तथा परिजनों में आसक्त रहता है | कृपण यह सोचता है कि वह अपने परिवार को मृत्यु से बचा सकता है अथवा वह यह सोचता है कि उसका परिवार या समाज उसे मृत्यु से बचा सकता है | ऐसी पारिवारिक आसक्ति निम्न पशुओं में भी पाई जाती है क्योंकि वे भी बच्चों की देखभाल करते हैं | बुद्धिमान् होने के कारण अर्जुन समझ गया कि पारिवारिक सदस्यों के प्रति उसका अनुराग तथा मृत्यु से उनकी रक्षा करने की उसकी इच्छा ही उसकी उलझनों का कारण है | यद्यपि वह समझ रहा था कि युद्ध करने का कर्तव्य उसकी प्रतीक्षा कर रहा था, किन्तु कृपण-दुर्बलता (कार्पण्यदोष) के कारण वह अपना कर्तव्य नहीं निभा रहा था | अतः वह परम गुरु भगवान् कृष्ण से कोई निश्चित हल निकालने का अनुरोध कर रहा है | वह कृष्ण का शिष्यत्व ग्रहण करता है | वह मित्रतापूर्ण बातें बंद करना चाहता है | गुरु तथा शिष्य की बातें गम्भीर होती हैं और अब अर्जुन अपने मान्य गुरु के समक्ष गम्भीरतापूर्वक बातें करना चाहता है इसीलिए कृष्ण भगवद्गीता-ज्ञान के आदि गुरु है और अर्जुन गीता समझने वाला प्रथम शिष्य है | अर्जुन भगवद्गीता को किस तरह समझता है यह गीता में वर्णित है | तो भी मुर्ख संसारी विद्वान् बताते हैं कि किसी को मनुष्य-रूप कृष्ण की नहीं बल्कि “अजन्मा कृष्ण” की शरण ग्रहण करनी चाहिए | कृष्ण के अन्तः तथा बाह्य में कोई अन्तर नहीं है | इस ज्ञान के बिना जो भगवद्गीता को समझने का प्रयास करता है, वह सबसे बड़ा मुर्ख है |

14/12/2017

🍃 Arogya 🍃
स्वस्थ रहें
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1-- 90 प्रतिशत रोग केवल पेट से होते हैं। पेट में कब्ज नहीं रहना चाहिए। अन्यथा रोगों की कभी कमी नहीं रहेगी।

2-- कुल 13 अधारणीय वेग हैं |

3--160 रोग केवल मांसाहार से होते है |

4-- 103 रोग भोजन के बाद जल पीने से होते हैं। भोजन के 1 घंटे बाद ही जल पीना चाहिये।

5-- 80 रोग चाय पीने से होते हैं।

6-- 48 रोग ऐलुमिनियम के बर्तन या कुकर के खाने से होते हैं।

7-- शराब, कोल्डड्रिंक और चाय के सेवन से हृदय रोग होता है।

8-- अण्डा खाने से हृदयरोग, पथरी और गुर्दे खराब होते हैं।

9-- ठंडे जल (फ्रिज) और आइसक्रीम से बड़ी आंत सिकुड़ जाती है।

10-- मैगी, गुटका, शराब, सूअर का माँस, पिज्जा, बर्गर, बीड़ी, सिगरेट, पेप्सी, कोक से बड़ी आंत सड़ती है।

11-- भोजन के पश्चात् स्नान करने से पाचनशक्ति मन्द हो जाती है और शरीर कमजोर हो जाता है।

12-- बाल रंगने वाले द्रव्यों (हेयरकलर) से आँखों को हानि (अंधापन भी) होती है।

13-- दूध (चाय) के साथ नमक (नमकीन पदार्थ) खाने से चर्म रोग हो जाता है।

14-- शैम्पू, कंडीशनर और विभिन्न प्रकार के तेलों से बाल पकने, झड़ने और दोमुहें होने लगते हैं।

15-- गर्म जल से स्नान से शरीर की प्रतिरोधक शक्ति कम हो जाती है और शरीर कमजोर हो जाता है। गर्म जल सिर पर डालने से आँखें कमजोर हो जाती हैं।

16-- टाई बांधने से आँखों और मस्तिश्क हो हानि पहुँचती है।

17-- खड़े होकर जल पीने से घुटनों (जोड़ों) में पीड़ा होती है।

18-- खड़े होकर मूत्र-त्याग करने से रीढ़ की हड्डी को हानि होती है।

19-- भोजन पकाने के बाद उसमें नमक डालने से रक्तचाप (ब्लडप्रेशर) बढ़ता है।

20-- जोर लगाकर छींकने से कानों को क्षति पहुँचती है।

21-- मुँह से साँस लेने पर आयु कम होती है।

22-- पुस्तक पर अधिक झुकने से फेफड़े खराब हो जाते हैं और क्षय (टीबी) होने का डर रहता है।

23-- चैत्र माह में नीम के पत्ते खाने से रक्त शुद्ध हो जाता है, मलेरिया नहीं होता है।

24-- तुलसी के सेवन से मलेरिया नहीं होता है।

25-- मूली प्रतिदिन खाने से व्यक्ति अनेक रोगों से मुक्त रहता है।

26-- अनार आंव, संग्रहणी, पुरानी खांसी व हृदय रोगों के लिए सर्वश्रेश्ठ है।

27-- हृदय-रोगी के लिए अर्जुन की छाल, लौकी का रस, तुलसी, पुदीना, मौसमी, सेंधा नमक, गुड़, चोकर-युक्त आटा, छिलके-युक्त अनाज औशधियां हैं।

28-- भोजन के पश्चात् पान, गुड़ या सौंफ खाने से पाचन अच्छा होता है। अपच नहीं होता है।

29-- अपक्व भोजन (जो आग पर न पकाया गया हो) से शरीर स्वस्थ रहता है और आयु दीर्घ होती है।

30-- मुलहठी चूसने से कफ बाहर आता है और आवाज मधुर होती है।

31-- जल सदैव ताजा (चापाकल, कुएं आदि का) पीना चाहिये, बोतलबंद (फ्रिज) पानी बासी और अनेक रोगों के कारण होते हैं।

32-- नीबू गंदे पानी के रोग (यकृत, टाइफाइड, दस्त, पेट के रोग) तथा हैजा से बचाता है।

33-- चोकर खाने से शरीर की प्रतिरोधक शक्ति बढ़ती है। इसलिए सदैव गेहूं मोटा ही पिसवाना चाहिए।

34-- फल, मीठा और घी या तेल से बने पदार्थ खाकर तुरन्त जल नहीं पीना चाहिए।

35-- भोजन पकने के 48 मिनट के अन्दर खा लेना चाहिए। उसके पश्चात् उसकी पोशकता कम होने लगती है। 12 घण्टे के बाद पशुओं के खाने लायक भी नहीं रहता है।

36-- मिट्टी के बर्तन में भोजन पकाने से पोशकता 100%, कांसे के बर्तन में 97%, पीतल के बर्तन में 93%, अल्युमिनियम के बर्तन और प्रेशर कुकर में 7-13% ही बचते हैं।

37-- गेहूँ का आटा 15 दिनों पुराना और चना, ज्वार, बाजरा, मक्का का आटा 7 दिनों से अधिक पुराना नहीं प्रयोग करना चाहिए।

38-- 14 वर्श से कम उम्र के बच्चों को मैदा (बिस्कुट, बे्रड, समोसा आदि) कभी भी नहीं खिलाना चाहिए।

39-- खाने के लिए सेंधा नमक सर्वश्रेश्ठ होता है उसके बाद काला नमक का स्थान आता है। सफेद नमक जहर के समान होता है।

40-- जल जाने पर आलू का रस, हल्दी, शहद, घृतकुमारी में से कुछ भी लगाने पर जलन ठीक हो जाती है और फफोले नहीं पड़ते।

41-- सरसों, तिल, मूंगफली या नारियल का तेल ही खाना चाहिए। देशी घी ही खाना चाहिए है। रिफाइंड तेल और वनस्पति घी (डालडा) जहर होता है।

42-- पैर के अंगूठे के नाखूनों को सरसों तेल से भिगोने से आँखों की खुजली लाली और जलन ठीक हो जाती है।

43-- खाने का चूना 70 रोगों को ठीक करता है।

44-- चोट, सूजन, दर्द, घाव, फोड़ा होने पर उस पर 5-20 मिनट तक चुम्बक रखने से जल्दी ठीक होता है। हड्डी टूटने पर चुम्बक का प्रयोग करने से आधे से भी कम समय में ठीक होती है।

45-- मीठे में मिश्री, गुड़, शहद, देशी (कच्ची) चीनी का प्रयोग करना चाहिए सफेद चीनी जहर होता है।

46-- कुत्ता काटने पर हल्दी लगाना चाहिए।

47-- बर्तन मिटटी के ही परयोग करन चाहिए।

48-- टूथपेस्ट और ब्रश के स्थान पर दातून और मंजन करना चाहिए दाँत मजबूत रहेंगे। (आँखों के रोग में दातून नहीं करना)

49-- यदि सम्भव हो तो सूर्यास्त के पश्चात् न तो पढ़े और लिखने का काम तो न ही करें तो अच्छा है।

50-- निरोग रहने के लिए अच्छी नींद और अच्छा (ताजा) भोजन अत्यन्त आवश्यक है।

51-- देर रात तक जागने से शरीर की प्रतिरोधक शक्ति कमजोर हो जाती है। भोजन का पाचन भी ठीक से नहीं हो पाता है आँखों के रोग भी होते हैं।

52-- प्रातः का भोजन राजकुमार के समान, दोपहर का राजा और रात्रि का भिखारी के समान।

आशा है स्वयं के परिवार में भी इसे लागु करेंगे।

09/12/2017

*भक्ति की श्रेष्ठता*

जब बच्चा जन्म लेता है, तो कुछ दिनों में ही अपनी माँ को प्रेम करने लगता है, फिर अपने पिता को | धीरे धीरे वह अपने अन्य भाई,बहन को प्रेम करने लगता है | क्या उसे कोई यह प्रेम करना सिखाता है? नहीं | भगवान प्रत्येक जीव को प्रेम करने की शक्ति अर्थात भक्ति देकर ही इस जगत में भेजतें हैं | लेकिन हम इस शक्ति को शरीर के रिश्तेदारों व संसारिक वस्तुओं में निवेशित करते रहते हैं जबकि इसे हमें भगवान की सेवा या भक्ति में नियोजित करना होता है | तभी हम भगवत-प्रेम का विकास अपने हृदय में कर सकते हैं | वस्तुतः भगवान के साथ हमारा सम्बन्ध, सेवा का सम्बन्ध है | भगवान परम भोक्ता हैं और हम सारे जीव उनके भोग(सेवा) के लिए बने हैं और यदि हम भगवान के साथ उस नित्य भोग में भाग लेते हैं तो हम वास्तव में सुखी बनते है तथ आनन्द का उपभोग करते हैं, क्योंकि भगवान आनन्द के आगार हैं | हम किसी अन्य प्रकार से या स्वंतत्र रूप से कभी भी सुखी नही बन सकते |
भक्ति-कर्म दो प्रकार का है; राग भक्ति (स्वतः स्फूर्त) तथा विधि भक्ति (साधन भक्ति) | रागानुगा भक्ति से मनुष्य को मूल भगवान अर्थात कृष्ण की प्राप्ति होती है और विधि-विधानों से भक्ति करने पर मनुष्य को भगवान का विस्तार रूप प्राप्त होता है | माता यशोदा के पुत्र भगवान कृष्ण रागानुगा प्रेमा-भक्ति में लगे भक्तों के लिए उपलब्ध हैं | वैधि भक्ति करने से मनुष्य नारायण का पार्षद बनता हैं *(चै.च.मध्य लीला २४.८४ -८७)* |

प्रहलाद महाराज ने अपने पिता दैत्य-राज हिरन्यकशिपू के पूछने पर सर्वश्रेष्ठ शिक्षा के रूप में नवधा भक्ति (९ प्रकार की भक्ति) का वर्णन किया *(श्रीमद् भागवतम – ७.५.२३)* :

*१. श्रवणं:* भगवान के पवित्र नाम को सुनना भक्ति का शुभारम्भ है | श्रीमद् भागवतम के पाठ को सुनना सर्वाधिक महत्वपूर्ण श्रवण विधि है | श्रवण से प्रारम्भ करके भक्ति द्वारा ही मनुष्य पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान तक पहुँच सकता है *(चै.च.आदि लीला ७.१४१)*| परीक्षित महाराज ने केवल श्रवण से मोक्ष प्राप्त किया |

*२.कीर्तनं:* भगवान् के पवित्र नाम का सदैव कीर्तन करना | चैतन्य महाप्रभु ने संस्तुति की है: “कलह तथा कपट के इस युग में उद्धार का एक मात्र साधन भगवान् के नाम का कीर्तन है | कोई अन्य उपाय नहीं है, कोई अन्य उपाय नहीं है, कोई अन्य उपाय नहीं है | निरपराध होकर हरे कृष्ण महामंत्र का कीर्तन करने मात्र से सारे पाप-कर्म दूर होजाते हैं और भगवतप्रेम की कारणस्वरूपा शुद्ध भक्ति प्रकट होती है *(चै.च.आदि लीला ८.२६)* |भगवान का पवित्र नाम भगवान के ही समान शक्तिमान है, अतः भगवान के नाम के कीर्तन तथा श्रवण-मात्र से लोग दुर्लघ्य मृत्यु को शीघ्र ही पार कर लेते हैं *(श्रीमद् भागवतम ४.१०.३०)* | शुकदेव गोस्वामी जी ने केवल कीर्तन से मोक्ष प्राप्त किया |

*३.स्मरणं:* श्रवण तथा कीर्तन विधियों को नियमित रूप से संपन्न करने तथा अंत:करण को शुद्ध कर लेने के बाद स्मरण की संस्तुति की गयी है | मनुष्य को स्मरण की सिद्धि तभी मिलती है जब वह निरन्तर भगवान के चरण कमलों का चिंतन करता है | भक्तियोग का मूल सिद्धांत है भगवान के विषय में निरंतर चिंतन करना, चाहे कोई किसी तरह से भी चिंतन करे | प्रह्लाद महाराज ने भगवान के निरन्तर स्मरण से मोक्ष प्राप्त किया |

*४.पाद-सेवनम:* भगवान के चरण कमलों के चिंतन में गहन आसक्ति होने को पाद-सेवनम कहते हैं | वैष्णव, तुलसी, गंगा तथा यमुना की सेवा, पाद-सेवनम में शामिल है | लक्ष्मी जी ने भगवान के चरण कमलों की सेवा कर के सिद्धि प्राप्त की |

*५.अर्चनं:* अर्चनं अर्थात भगवान के अर्चाविग्रह की पूजा | अर्चाविग्रह की पूजा अनिवार्य है | प्रथु महाराज ने भगवान के अर्चाविग्रह की पूजा कर के मोक्ष प्राप्त किया |

*६.वन्दनं:* भगवान की वंदना या स्तुति करना | अक्रूरजी ने वंदना के द्वारा मोक्ष प्राप्त किया |

*७.दास्यम:* दास के रूप में भगवान की सेवा करना | हनुमान जी ने भगवान राम की सेवा कर के मोक्ष प्राप्त किया |

*८.साख्यं:* मित्र के रूप में भगवान की पूजा करना | सखा शब्द प्रगाढ़ प्रेम का सूचक है | अर्जुन ने भगवान से मैत्री स्थापित कर के मोक्ष प्राप्त किया | तथा

*९.आत्मनिवेदनम:* जब भक्त अपना सर्वस्व भगवान को अर्पित कर देता है और हर कार्य भगवान को प्रसन्न करने के लिए करता है, यह अवस्था आत्मनिवेदनम है | आत्मनिवेदनम का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण बलि महाराज तथा अम्बरीष महाराज का है | आत्मसमर्पण करने के फलस्वरूप भगवान बलि महाराज के द्वारपाल बन गये तथा उन्होंने सुदर्शन चक्र को अम्बरीष महाराज की सेवा में नियुक्त कर दिया |

भक्ति सम्पन्न करने की नौ संस्तुत विधियाँ सर्वश्रेष्ठ हैं, क्योंकि इन विधियों में कृष्ण तथा उनके प्रति प्रेम प्रदान करने की महान शक्ति निहित है *(चै च.अन्त्य लीला ४.७०)* | भक्ति का फल जीवन का चरम लक्ष्य भगवत्प्रेम है *(चै च.मध्य लीला २३.३)* | श्री चैतन्य महाप्रभु ने कहा है: “जब मनुष्य श्रवण, कीर्तन से आरम्भ होने वाली इन नौ विधियों से कृष्ण की प्रेममयी सेवा करता है, तब उसे सिद्धि का पाँचवां पद एवं जीवन के लक्ष्य की सीमा भगवत्प्रेम की प्राप्ति होती है” *(चै च.मध्य लीला ९.२६१)* | जब कोई व्यक्ति भक्ति में स्थिर हो जाता है, तो चाहे एक विधि को सम्पन्न करे या अनेक विधियों को, उसमे भगवत्प्रेम जागृत हो जाता है *(चै च.मध्य लीला २२.१३४)* | वह भी श्री कृष्ण को प्रसन्न कर सकता है, जिस प्रकार उपरोक्त ने किया है |

*श्रीमद् भागवतम (४.८.५९ -६१)* में नारद मुनि ध्रुव को समझाते हैं: “जो कोई गम्भीरता तथा निष्ठा से अपने मन,वचन तथा शरीर से भगवान की भक्ति करता है और जो बताई गई भक्ति-विधियों के कार्यों में मग्न रहता है, उसे उसकी इच्छानुसार भगवान वर देते हैं | यदि भक्त धर्म,अर्थ, काम या भौतिक संसार से मोक्ष चाहता है, तो भगवान इन सभी फलों को प्रदान करते हैं | लेकिन यदि कोई मुक्ति के लिए अत्यंत उत्सुक हो तो उसे दिव्य प्रेमाभक्ति की पद्धति का द्रढ़ता से पालन कर समाधी की सर्वोच्च अवस्था में रहना चाहिए और इन्द्रिय-तृप्ति के समस्त कार्यों से पूर्णतया विरक्त रहना चाहिए” |

भक्ति में विशेष प्रगति करने के लिए श्रवण तथा कीर्तन विधियों को संपन्न करते समय हमें भगवान का स्मरण (भगवान के सर्वआकर्षक रूप का ध्यान) अवश्य करना चाहिए| श्रवण, कीर्तन, स्मरण इत्यादि आध्यात्मिक कार्यकलाप भक्ति के स्वाभाविक लक्षण है | इसका तटस्थ लक्षण यह है कि इससे कृष्ण के प्रति शुद्ध प्रेम उत्पन्न होता है *(चै.च.मध्य लीला २२.१०६)* | यमराज कहते हैं कि “भगवान के नाम के कीर्तन से प्रारंभ होने वाली भक्ति ही इस भौतिक जगत में जीव के लिए परम धार्मिक सिद्धांत है” *(श्रीमद् भागवतम ६.३.२२)* | अतः जो व्यक्ति भवबंधन से मुक्त होना चाहता है, उसे चाहिए कि भगवान के नाम, यश, रूप, तथा लीलाओ के कीर्तन तथा गुणगान की विधि को अपनाए *(श्रीमद् भागवतम ६.२.४६)* | हे नरहरी, जिन जीवों ने यह मनुष्य जीवन प्राप्त किया है यदि वे आपका श्रवण, कीर्तन, स्मरण तथा अन्य भक्ति कार्य करके आपकी पूजा करने से चूक जाते हैं तो वह व्यर्थ ही जीवित हैं और धोंकनी के समान ही स्वांस लेते रहते हैं *(श्रील श्रीधर स्वामी)* |

जिस व्यक्ति ने कभी भी भगवान के शुद्ध भक्त की चरण-धूलि अपने मस्तक पर धारण नही की, वह निश्चित रूप से शव है तथा जिस व्यक्ति ने भगवान के चरण-कमलो पर चढे तुलसी-दलों की सुगन्धि का अनुभव नही किया,वह स्वांस लेते हुए भी मृत देह के तुल्य है *(श्रीमद् भागवतम २.३.२३)* | चाहे निष्काम हो, चाहे समस्त कामनाओं से युक्त हो, अथवा मोक्ष चाहता हो, बुद्धिमान व्यक्ति को चाहिए कि भक्ति योग के द्वारा भगवान श्री कृष्ण की आराधना करे | वैदिक ग्रंथों में कृष्ण आकर्षण के केन्द्रबिन्दु हैं और उनकी सेवा करना हमारा कर्म है | हमारे जीवन का चरम लक्ष्य कृष्ण-प्रेम प्राप्त करना है | अतएव कृष्ण, कृष्ण की सेवा तथा कृष्ण-प्रेम; ये जीवन के तीन महाधन हैं *(चै.च.मध्य लीला २०.१४३)* | भक्ति का अर्थ है समस्त इन्द्रियों के स्वामी, पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान की सेवा में अपनी सारी इन्द्रियों को लगाना | भगवान की सेवा में लगे रहने मात्र से व्यक्ति की इन्द्रियाँ शुद्ध हो जाती हैं *(चै.च.मध्य लीला १९.१७०) * | इन्द्रियों के द्वारा इन्द्रियों के स्वामी की सेवा करना ही भक्ति है | अपनी खुद की इन्द्रियों की तृप्ति करने की इच्छा “काम” है, किन्तु कृष्ण की इन्द्रियों को तुष्ट करने की इच्छा “प्रेम” है *(चै.च.आदि लीला ४.१६५)* |

प्रह्लाद महाराज भगवान नृसिंह की प्रार्थना करते हुए भक्ति की श्रेष्ठता का वर्णन करते हुए कहते हैं: “भले ही मनुष्य के पास सम्पत्ति, राजसी परिवार, सौन्दर्य, तपस्या, शिक्षा, दक्षता, कान्ति, शारीरिक शक्ति, बुद्धि तथा योगशक्ति क्यों न हों, किन्तु इन सारी योग्यताओं से भी कोई व्यक्ति भगवान को प्रसन्न नही कर सकता | केवल भक्ति से वह ऐसा कर सकता है ((श्रीमद् भागवतम ७.९.९)( | न तो भौतिक प्रकृति के तीन गुण, न इन तीन गुणों के नियामक अधिष्ठाता देव, न पांच स्थूल तत्व, न देवता, न मनुष्य ही आपको समझ सकते हैं क्योंकि ये सभी जन्म- मृत्यु के वशीभूत रहते हैं ऐसा विचार करके बुद्धिमान व्यक्ति वैदिक अध्ययन की परवाह नही करते, अपितु वे आपकी भक्ति में अपने आप को लगाते हैं | *श्रीमद् भागवतम (४.२२.२२ – २३)* ( में सनत्कुमार राजा पृथू को समझाते हुए कहते हैं: “भक्ति करने,भगवान के प्रति जिज्ञासा करने, जीवन में श्रद्धा पूर्वक भक्तियोग का पालन करने, भगवान की पूजा करने तथा भगवान की महिमा का श्रवण व कीर्तन करने से परमेश्वर के प्रति आसक्ति बढ़ाई जा सकती है | मनुष्य को अपना जीवन इस प्रकार ढालना चाहिए कि उसे भगवान हरि की महिमा का अमृत पान किये बिना चैन न मिले” | तथा शुकदेव गोस्वामी शौनकादि ऋषियों से कहते हैं” “भगवान कृष्ण के चरण-कमलों की स्मृति प्रत्येक अशुभ वस्तु को नष्ट करती है और परम सौभाग्य प्रदान करती है | यह हृदय को परिशुद्ध करती है तथा भक्ति के साथ साथ त्याग से युक्त ज्ञान प्रदान करती है” *(श्रीमद् भागवतम १२.१२.५५)* |

*श्रीमद् भागवतम (६.९.४८)* में भगवान कहते हैं: “यह सत्य है कि मेरे प्रसन्न हो जाने पर किसी के लिए कुछ भी प्राप्त कर लेना कठिन नही है, तो भी शुद्ध भक्त जिसका मन अनन्य भाव से मुझ पर स्थिर है, वह मेरी भक्ति में निरत रहने के अवसर के अतिरिक्त मुझ से और कुछ नही मांगता”| भक्ति इतनी प्रबल है कि जब कोई इसमें लग जाता है, तो वह क्रमशः समस्त भौतिक इच्छाओं का परित्याग कर देता है और पूरी तरह से कृष्ण के चरण-कमलों के प्रति अनुरुक्त हो जाता है यह सब भगवान के दिव्य गुणों के प्रति आकर्षण से ही सम्भव हो पाता है *(चै.च.मध्य लीला २४.१९८)* | भगवान वासुदेव में अविचल भक्ति रखने वाले व्यक्ति के चरित्र में समस्त सद्गुण स्वतः आ जाते हैं *(श्रीमद् भागवतम ५.१८.१२)* | यदि किसी में कृष्ण के प्रति अविचल भक्तिमयी श्रद्धा है, तो उसमें सारे देवताओं के सद्गुण धीरे-धीरे प्रकट हो जाते हैं *(चै.च.आदि लीला ८.५८)* | श्री सूत गोस्वामी ने जन साधारण के परम कल्याण के विषय पर ऋषियों के पूंछने पर बताया कि “सम्पूर्ण मानवता के लिए परमवृति (धर्म) वही है, जिसके द्वारा सारे मनुष्य भगवान की प्रेम-भक्ति प्राप्त कर सके | ऐसी भक्ति अकारण तथा अखंड होनी चाहिये जिससे आत्मा पूर्ण रूप से तुष्ट हो सके | भगवान श्री कृष्ण की भक्ति करने से मनुष्य तुरन्त ही अहैतुक ज्ञान तथा संसार से वैराग्य प्राप्त कर लेता है” *(श्रीमद् भागवतम १.२.६-७)* | श्रीमद् भागवतम *(४.२४.५९)* में *शिवजी कहते हैं:*“जिसका ह्रदय भक्तियोग से पूर्ण रूप से पवित्र हो चुका हो तथा जिस पर भक्ति देवी की कृपा हो, ऐसा भक्त कभी भी अंधकूप सद्रश्य माया द्वारा मोहग्रस्त नहीं होता” |

श्रीमद् भागवतम *(१२.३.४५-४६)* में शुकदेव गोस्वामी कलियुग के लक्षण बताने के बाद महाराज परीक्षित को बताते हैं कि “कलियुग में वस्तुएँ, स्थान तथा व्यक्ति भी सभी प्रदूषित हो जाते हैं | किन्तु यदि कोई व्यक्ति हृदय के भीतर स्थित परमेश्वर के विषय में सुनता है, उनकी महिमा का गान करता है, उनका ध्यान करता है उनकी पूजा करता है तो भगवान उस व्यक्ति के मन से हजारों जन्मों से संचित कल्मष को दूर कर देते हैं”| तथा श्रीमद् भागवतम के स्कन्द १० को शुकदेव गोस्वामी इस श्लोक से समाप्त करते हैं: नित्यप्रति अधिकाधिक निष्ठापूर्वक भगवान मुकुन्द की सुन्दर कथाओं के नियमित श्रवण, कीर्तन तथा ध्यान से मर्त्य प्राणी को भगवान का दैवीधाम प्राप्त होगा जहाँ मृत्यु की दुस्तर शक्ति का शासन नहीं है *(श्रीमद् भागवतम १०.९०.५०)*

LAST DAYS (LAST MESSAGE)Shortly thereafter, Śrīla Sarasvatī Ṭhākura became afflicted by fever. Kuñja Bihārī Prabhu calle...
05/12/2017

LAST DAYS (LAST MESSAGE)
Shortly thereafter, Śrīla Sarasvatī Ṭhākura became afflicted by fever. Kuñja Bihārī Prabhu called in some of the most reputed doctors in the city to treat his guru-mahārāja, who informed each of them of the temporality of the body and the need to perform Hari-sevā. And when a doctor wanted to give him an injection Śrīla Sarasvatī Ṭhākura protested, “Why are you disturbing me in this way? Simply chant harināma, that's all.”
Upon receiving news of Śrīla Bhaktisiddhānta Sarasvatī's condition, disciples started streaming in from far and near. On 20 December, he rose and startled the also bedridden Ananta Vāsudeva Prabhu, whom he had not seen for several days, by visiting him in his room. About ten days before his disappearance, Śrīla Bhaktisiddhānta Sarasvatī stated that he had much service to perform in Vṛndāvana but because of internal quarrels in the maṭha his life was being shortened by ten years.
On 23 December 1936, eight days before leaving this world, Śrīla Bhaktisiddhānta Sarasvatī instructed in a weak, halting voice the devotees assembled at his bedside. Those vital and immortal words were to become famous as his last address, expressing the essence of his perennial message, and would be featured in innumerable publications. Sundarānanda Prabhu jotted them down:
“I have upset many persons’ minds. Many might have considered me their enemy, because I was obliged to speak the plain truth of service and devotion toward the Absolute Godhead. I have given them all those troubles only so they might turn their face toward the Personality of Godhead without any desire for gain, and with unalloyed devotion.
Surely some day they will be able to understand that. All of you propagate the message of Rūpa-Raghunātha with supreme enthusiasm. Our ultimate desire is to become dust at the lotus feet of the rūpānugas. All should remain united in following the āśraya-vigraha, for the sake of serving the advaya-jñāna. In this ephemeral sphere you should live somehow or other only for Hari-bhajana. In spite of all dangers, criticisms, and discomforts, do not give up Hari-bhajana. Don't be disappointed that most people in the world do not accept topics of unduplicitious Kṛṣṇa-sevā. Do not forsake your own bhajana of Kṛṣṇa-kathā-śravaṇa-kīrtana, which is your all in all. With humility like a straw and forbearance like a tree, you should always perform Hari-kīrtana.
Let our bodies, which are like those of aged oxen, be offered into the saṅkīrtana-yajña of Lord Caitanya and His associates. We do not aspire to be any kind of heroes of karma or dharma, but our constitutional position and all in all is to in every birth to become dust at Śrī Rūpa-Raghunātha's lotus feet. The bhaktivinoda-dhārā will never stop. With all your energy, devote yourself to fulfilling the desire of Śrīla Bhaktivinoda Ṭhākura. There are many among you who are well qualified and able workers. We have no other wish whatsoever. Our only motto is:
adadānas tṛṇaṁ dantair idaṁ yāce punaḥ punaḥ
śrīmad-rūpa-padāmbhoja- dhūliḥ syāṁ janma-janmani
Taking a blade of grass between my teeth, I fall down and pray again and again to becomedust at Śrīmad Rūpa's lotus feet, birth after birth.
Certainly there are multiple inconveniences while we are in this mortal domain, but there is no need either to be overwhelmed by them or to try to overcome them. Rather, even during the duration of our present life we must become acquainted with what we shall gain after surpassing all those difficulties, and what shall be the mode of our permanent existence. In this world we are compelled to make decisions regarding objects that evoke our attraction and revulsion, both those that we want and those we do not. Attachment and detachment in this damned existence increase according to the degree that we are separated from Śrī Kṛṣṇa's lotus feet. When we are able to transcend the position of attachment and detachment in this world of death and are attracted by the holy name of Godhead, then only can we understand the taste of Kṛṣṇa-sevā-rasa.
At the present time, Kṛṣṇa's instructions seem highly startling and perplexing. Knowingly or unknowingly, everyone who is considered a human being is more or less struggling to eliminate those invading elements that baffle our perception of our eternal need. Our onlyrequirement is to enter into the kingdom of our eternal necessity, by going beyond dualities. We have no love or hatred toward anyone in this world. All arrangements made herein are but temporary. Therefore that supreme goal is indispensably necessary for everyone in this world. All of you should work unitedly and harmoniously for the same objective of attaining eligibilty for sevā to the original āśraya-vigraha. May the conceptions of the rūpānugas flow in the world. Let us never feel the slightest dejection while engaged in the seven-tongued flame of saṅkīrtana-yajña.
Only if we have undaunted and ever-increasing attachment for it shall we achieve all perfection. Under the guidance of the rūpānugas, all of you should fearlessly and with utmost energy preach Rūpa-Raghunātha-kathā.”
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“Sri Bhaktisiddhanta Vaibhava” book by HH Bhakti Vikasa Swami,
Volume One
Chapter Six "Winding Up His Pastimes", "Last dayst"
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