जैन विज्ञान तंत्र मंत्र यंत्र

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जैन विज्ञान तंत्र मंत्र यंत्र जैनम जयति शासनम

23/05/2026

*🔱🚩श्री कनकधारा यंत्र🚩🔱*
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भगवती महालक्ष्मी की कृपा पाने हेतु कलिकाल में सबसे अमोध माना जाने वाला श्री कनकधारा यन्त्र पुर्ण पुरातन यन्त्र विधान के मुताबिक असली अष्टगन्ध जो गोरोचन्, केशर, अगर, तगर, जटामासी, कस्तूरी और कुछ अमोध गुप्त सामग्री के द्वारा निर्मित अष्टगन्ध से हस्तलिखित भोजपत्र पर निर्माण किया जाता है, साधक के नामकरण और गोत्र की विधि से सिद्ध कर प्रदान किया जाता है। जो धन समस्या से, ऋण समस्या या व्यापार हानि से परेशान है वो साधक सदस्य इसे स्थापित कर सकते है। जो साधक सदस्य यह स्थापित करने हेतु निर्माण करने के इच्छुक है वो 9879963555 पर मुज़ से whatapp संपर्क कर सकते है। इसके साथ गोपनीय विधान और मन्त्र विधि साधक सदस्य को प्रदान की जाएगी।

जय माँ महालक्ष्मी
🙏🙏🙏🙏🙏

23/05/2026
जैन धर्म को विश्व के सबसे प्राचीन धार्मिक और दार्शनिक संप्रदायों में से एक माना जाता है। आधुनिक इतिहासकारों और शोधकर्ताओ...
22/05/2026

जैन धर्म को विश्व के सबसे प्राचीन धार्मिक और दार्शनिक संप्रदायों में से एक माना जाता है। आधुनिक इतिहासकारों और शोधकर्ताओं के अनुसार, जैन धर्म कोई नया आंदोलन नहीं था, बल्कि इसकी जड़ें भारत की प्रागैतिहासिक (Prehistoric) संस्कृति से जुड़ी हैं।
इसकी ऐतिहासिकता को हम मुख्य रूप से तीन दृष्टिकोणों से समझ सकते हैं:
1. २४ तीर्थंकरों की परंपरा
जैन परंपरा के अनुसार, इस धर्म में २४ तीर्थंकर (पथ-प्रदर्शक) हुए हैं, जिन्होंने समय-समय पर शाश्वत सत्य का उपदेश दिया।

ऋषभदेव (प्रथम तीर्थंकर):-जैन मान्यता के अनुसार वे इस युग के पहले तीर्थंकर थे। उन्हें आदिनाथ भी कहा जाता है।ऐतिहासिक रूप से, ऋग्वेद, विष्णु पुराण और भागवत पुराण जैसे प्राचीन हिंदू ग्रंथों में भी ऋषभदेव का आदरपूर्वक उल्लेख मिलता है, जो उनकी प्राचीनता को प्रमाणित करता है।
पार्श्वनाथ (२३वें तीर्थंकर):- आधुनिक इतिहासकार इन्हें पूरी तरह से एक ऐतिहासिक पुरुष मानते हैं। पार्श्वनाथ का समय महावीर स्वामी से लगभग २५० वर्ष पहले (ईसा पूर्व ८वीं सदी) माना जाता है। वे काशी (वाराणसी) के राजा अश्वसेन के पुत्र थे। उन्होंने 'चातुर्याम धर्म' (चार महाव्रत: सत्य, अहिंसा, अचौर्य और अपरिग्रह) का उपदेश दिया था।
महावीर स्वामी (२४वें तीर्थंकर):- वर्धमान महावीर (५९९ ईसा पूर्व - ५२७ ईसा पूर्व) जैन धर्म के अंतिम तीर्थंकर थे। उन्होंने पार्श्वनाथ की परंपरा को आगे बढ़ाया और उसमें पांचवां व्रत 'ब्रह्मचर्य' जोड़ा। इतिहास में उन्हें जैन धर्म का 'संस्थापक' नहीं, बल्कि 'पुनरुद्धारक' माना जाता है, जिन्होंने धर्म को एक संगठित रूप दिया।
2. समकालीन बौद्ध और वैदिक साक्ष्य
बौद्ध धर्म के प्राचीन ग्रंथ (जैसे *मज्झिम निकाय*) महावीर स्वामी के समकालीन होने की पुष्टि करते हैं।
बौद्ध ग्रंथों में महावीर स्वामी को 'निगण्ठ नातपुत्त' (निर्ग्रंथ ज्ञातृपुत्र) कहा गया है।
इन ग्रंथों से पता चलता है कि बुद्ध के समय में 'निगण्ठ' (जैन भिक्षु) पहले से ही समाज में एक प्रतिष्ठित और स्थापित संप्रदाय के रूप में मौजूद थे, जो यह साबित करता है कि जैन धर्म महावीर से पहले भी अस्तित्व में था।
3. पुरातात्विक साक्ष्य (Archaeological Evidence)
जैन धर्म की ऐतिहासिकता को मजबूत करने वाले कई पुरातात्विक प्रमाण भारत के विभिन्न हिस्सों से मिले हैं:
हड़प्पा संस्कृति:- सिंधु घाटी सभ्यता (Mohenjo-daro और Harappa) से प्राप्त कुछ मोहरों पर कायोत्सर्ग मुद्रा (खड़े होकर ध्यान लगाने की जैन विधि) में नग्न मूर्तियां मिली हैं। कई विद्वान (जैसे डॉ. रामप्रसाद चंदा) इन्हें प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव से जोड़कर देखते हैं।
हाथीगुम्फा अभिलेख:- ओडिशा के उदयगिरि में कलिंग राजा खारवेल (ईसा पूर्व दूसरी शताब्दी) का शिलालेख मिला है। इसमें जैन 'नमोकार मंत्र' की शुरुआती पंक्तियां हैं और मगध के राजा द्वारा ले जाई गई 'कलिंग जिन' की मूर्ति को वापस लाने का उल्लेख है, जो जैन मूर्तिपूजा की प्राचीनता को दर्शाता है।
मथुरा की कला:- उत्तर प्रदेश के मथुरा (कंकाली टीला) से कुषाण काल ​​के बड़े पैमाने पर जैन स्तूप, मूर्तियां और आयागपट्ट (पूजा की चौकियां) मिले हैं, जिससे ईसा की शुरुआती सदियों में जैन धर्म के व्यापक प्रसार का पता चलता है।

संक्षेप में कहें तो, जहाँ महावीर स्वामी ने जैन धर्म को ऐतिहासिक युग में एक नई दिशा और पहचान दी, वहीं पुरातात्विक और साहित्यिक साक्ष्य यह स्पष्ट करते हैं कि जैन दर्शन की धारा ईसा पूर्व आठवीं शताब्दी से कहीं अधिक प्राचीन है और यह भारत की मूल श्रमण संस्कृति का प्रतिनिधित्व करती है।

भगवान पार्श्वनाथ जैन धर्म के २३वें तीर्थंकर हैं। आधुनिक इतिहासकार उन्हें भारत के पहले प्रमाणित ऐतिहासिक महापुरुषों में से एक मानते हैं। महावीर स्वामी से लगभग २५० वर्ष पहले अवतरित हुए पार्श्वनाथ ने जैन श्रमण परंपरा को एक सुव्यवस्थित आधार दिया था।
उनके जीवन, दर्शन और ऐतिहासिक महत्व से जुड़ी मुख्य बातें नीचे दी गई हैं:
1. जीवन परिचय और ऐतिहासिकता
जन्म और समय:- पार्श्वनाथ का जन्म ईसा पूर्व ८वीं शताब्दी (लगभग ८७७ ईसा पूर्व) में वाराणसी (काशी) में हुआ था। इतिहासकार जैसे कि डॉ. जाकोबी और अन्य विद्वान उनके ऐतिहासिक अस्तित्व को पूरी तरह स्वीकार करते हैं।
वे काशी के इक्ष्वाकु वंशीय राजा अश्वसेन के पुत्र थे और उनकी माता का नाम वामा देवी था। उनकी पत्नी का नाम प्रभावती था।
राजा के पुत्र होने के कारण उनका जीवन वैभवशाली था, लेकिन ३० वर्ष की आयु में उन्होंने संसार का त्याग कर दिया और संन्यासी (श्रमण) बन गए।
कैवल्य ज्ञान (ज्ञान की प्राप्ति):-८३ दिनों की कठिन तपस्या के बाद, ८४वें दिन उन्हें सम्मेद शिखरजी (वर्तमान में झारखंड का पारसनाथ पर्वत) पर 'कैवल्य ज्ञान' (परम ज्ञान) की प्राप्ति हुई।
2. चातुर्याम धर्म (चार महाव्रत)
पार्श्वनाथ ने समाज को जो आध्यात्मिक मार्ग दिखाया, उसे 'चातुर्याम धर्म' कहा जाता है। उन्होंने अपने अनुयायियों के लिए चार मुख्य प्रतिज्ञाएँ या महाव्रत निर्धारित किए थे:
1. अहिंसा:- किसी भी जीव को मन, वचन या कर्म से कष्ट न पहुंचाना।
2. सत्य:- हमेशा सत्य और मधुर बोलना।
3. अचौर्य (अस्तेय):-बिना दी गई या बिना अनुमति के किसी की वस्तु न लेना (चोरी न करना)।
4. अपरिग्रह:- धन, संपत्ति या सांसारिक वस्तुओं का आवश्यकता से अधिक संचय न करना।
बाद में २४वें तीर्थंकर महावीर स्वामी ने इसी 'चातुर्याम धर्म' में पांचवां व्रत 'ब्रह्मचर्य' जोड़ा, जिसके बाद यह 'पंचमहाव्रत' कहलाया। इससे पता चलता है कि महावीर स्वामी ने पार्श्वनाथ की ही स्थापित परंपरा को आगे बढ़ाया था।

3. प्रतीक और पहचान
जैन मूर्तिकला और चित्रों में पार्श्वनाथ की पहचान बहुत स्पष्ट होती है।
उनका मुख्य चिह्न (लांछन) सर्प (सांप) है।
उनकी मूर्तियों या चित्रों में उनके सिर के ऊपर धरणेंद्र (नागराज) के फणों का छत्र बना होता है।
जैन ग्रंथों के अनुसार, जब पार्श्वनाथ तपस्या कर रहे थे, तब 'कमठ' नामक एक असुर ने उन पर भारी उपसर्ग (संकट या पत्थरों की वर्षा) किया था। उस समय धरणेंद्र नाम के नाग ने अपने फणों से छत्र बनाकर उनकी रक्षा की थी।
4. महापरिनिर्वाण और प्रभाव
निर्वाण:-पार्श्वनाथ ने १०० वर्ष की लंबी आयु तक धर्म का प्रचार-प्रसार किया। अंत में, उन्होंने सम्मेद शिखर पर्वत पर ही 'निर्वाण' (मोक्ष) प्राप्त किया। उन्हीं के नाम पर आज इस पावन पर्वत को 'पारसनाथ पहाड़ी' कहा जाता है, जो जैन धर्म का सबसे पवित्र तीर्थ स्थल है।
पार्श्वनाथ के समय उनका संघ बहुत बड़ा था, जिसमें हजारों भिक्षु, भिक्षुणियां और लाखों गृहस्थ अनुयायी थे। महावीर स्वामी के माता-पिता (राजा सिद्धार्थ और रानी त्रिशला) भी पार्श्वनाथ की ही परंपरा के अनुयायी थे।
पार्श्वनाथ का दर्शन अत्यंत व्यावहारिक और अहिंसा प्रधान था, जिसने तत्कालीन समाज में व्याप्त कुरीतियों और जटिलताओं को दूर करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

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जैन धर्म में रक्षा पोटली का सर्वप्रथम उल्लेख किसमें मिलता है? सर्वप्रथम किसके हाथो में बाँधी गयी थी? जैन धर्म में रक्षा ...
22/05/2026

जैन धर्म में रक्षा पोटली का सर्वप्रथम उल्लेख किसमें मिलता है? सर्वप्रथम किसके हाथो में बाँधी गयी थी?

जैन धर्म में रक्षा पोटली या रक्षा सूत्र का सर्वप्रथम उल्लेख जैन पुराणों और प्राचीन कथाओं में 18वें तीर्थंकर भगवान अरहनाथ के काल की ऐतिहासिक घटना में मिलता है। सर्वप्रथम यह रक्षा सूत्र 700 जैन मुनियों (अकंपनाचार्य और उनके शिष्य मुनिराजों) की कलाई पर रक्षा के संकल्प के रूप में बाँधा गया था।जैन धर्म के अनुसार इस परंपरा का विस्तृत इतिहास और विवरण इस प्रकार है:

1. सर्वप्रथम उल्लेख कहाँ मिलता है?

जैन वास्तुकला और साहित्य में इसका सर्वप्रथम प्रामाणिक उल्लेख जैन पुराणों (जैसे 'हरिवंश पुराण' और 'आदिपुराण' की उत्तर कथाओं) में 'रक्षाबंधन पर्व' या 'मुनि रक्षा पर्व' की कथा के अंतर्गत आता है। जैन ग्रंथों में इस दिन को 'श्रमण संस्कृति रक्षा दिवस' या 'वात्सल्य दिवस' भी कहा गया है।

2. सर्वप्रथम किसके हाथों में बाँधी गयी थी?

जैन मान्यताओं के अनुसार, सबसे पहले यह रक्षा सूत्र परमयोगी दिगम्बर जैन मुनि अकंपनाचार्य और उनके ससंघ 700 मुनिराजों की कलाइयों पर बाँधा गया था।ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: हस्तिनापुर (या उज्जैनी नगरी की कथा) में जब राजा श्रीवर्मा के चार मंत्रियों—बलि, बृहस्पति, नमुचि और प्रह्लाद ने जैन मुनियों पर भारी अत्याचार (उपसर्ग) किया और उन्हें अग्नि व धुएँ के संकट में डाल दिया, तब महामुनि विष्णु कुमार ने वामन रूप धारण करके अपनी विक्रिया ऋद्धि से मुनियों पर हो रहे उस घोर कष्ट को दूर किया था।रक्षा सूत्र का प्रारंभ: मुनियों के संकटमुक्त होने की इस पावन घटना के बाद, श्रावक (गृहस्थ जैन समाज) ने अत्यंत हर्षित होकर मुनियों की वैयावृत्ति (सेवा) की और भविष्य में जैन धर्म, जैन संतों और संस्कृति की रक्षा का संकल्प लेते हुए 700 मुनियों के हाथों (कलाई) पर सूत का रक्षा धागा (रक्षा सूत्र) बाँधा था।तब से लेकर आज तक जैन धर्म में श्रावण शुक्ल पूर्णिमा को जैन मंदिरों में देव-दर्शन और पूजन के बाद श्रावक अपने दाहिने हाथ की कलाई पर पवित्र रक्षा सूत्र/रक्षा पोटली बाँधते हैं, जो बाह्य रूप से धर्म और आत्मिक गुणों की रक्षा का प्रतीक है।

जैन धर्म में रक्षा पोटली (या रक्षा सूत्र) का संबंध भौतिक धागे से अधिक आंतरिक सुरक्षा, संयम और जिनागम की रक्षा से है | इसे किसी बाहरी मंत्र के बजाय नव-देवताओं के स्मरण, णमोकार महामंत्र की शक्ति और अपने सदकर्मों (पुण्य) को असली रक्षक मानकर धारण किया जाता है |रक्षा पोटली धारण करते समय या इस पर्व के अवसर पर जैन साधकों द्वारा मुख्य रूप से आत्मरक्षा के लिए 'जैन रक्षा स्तोत्र और 'णमोकार मंत्र कल्प' के श्लोकों का शास्त्रों में उल्लेख मिलता है |

1. जैन रक्षा स्तोत्रम् (Jain Raksha Strotam)यह स्तोत्र शरीर, अंगों और दसों दिशाओं की रक्षा के लिए जपा जाता है | इसके प्रारंभिक और मुख्य श्लोक इस प्रकार हैं:

श्रीजिनं भक्तिो नत्वा त्रैलोक्याह्लादकारकम्।
जैनरक्षामहं वक्ष्ये देहिनां देहरक्षकम्।।1।।

अर्थ: तीनों लोकों को आह्लादित करने वाले एवं देहधारियों के देह की रक्षा करने वाले भगवान् जिनेश्वर को भक्तिपूर्वक नमस्कार करके, मैं 'जैन-रक्षा-स्तोत्र' को कहता हूँ |

ॐ ह्रीं आदिश्वरः पातु शिरसि सर्वदा मम।
ॐ ह्रीं श्रीं अजितो देवो भालं पातु सर्वदा।।2।।
नेत्रयोः रक्षको भूयाद् ॐ आं क्रौं सम्भवो जिनः।

अर्थ: ॐ ह्रीं! भगवान आदिनाथ मेरे मस्तक की सदा रक्षा करें। ॐ ह्रीं श्रीं! अजितदेव मेरे भाल (माथे) की सदा रक्षा करें। ॐ आं क्रौं! सम्भवनाथ जिन मेरे नेत्रों के रक्षक हों |

2. जैन आत्मरक्षा स्तोत्र यह स्तोत्र णमोकार महामंत्र के नव-पदों की ऊर्जा को शरीर के चारों ओर एक सुरक्षा कवच (वज्र-पिंजर) के रूप में स्थापित करता है:

ॐ परमेष्ठि नमस्कारं, सारं नवपदात्मकं ।
आत्मरक्षाकरं वज्र-पञ्जराभं स्मराम्यहम् ।।

अर्थ: मैं नव-पद वाले, सारभूत परमेष्ठी नमस्कार का स्मरण करता हूँ, जो आत्मरक्षा करने वाला और वज्र के पिंजर (कवच) के समान है |

रक्षा का मूल भाव:

शास्त्रों (जैसे 'हरिवंश पुराण') के अनुसार, इस दिन विष्णुकुमार मुनि ने हस्तिनापुर में मुनियों पर हो रहे उपसर्ग को दूर किया था | वास्तविक रक्षा जैन धर्म के अनुसार सम्यक् दर्शन, ज्ञान, चारित्र और अपने पुण्य से ही होती है | रक्षा पोटली मात्र इस आंतरिक संकल्प का बाहरी प्रतीक है |

#आर्यवर्त

22/05/2026

सभी साधक सदस्यो, ज्ञानी गुणीजन, पाठक बन्धु को
🙏🙏जय जिनेन्द्र🙏🙏
पुनः पेज पे लेख सुरु कर रहा हु!!

मुल्तान, पाकिस्तान में एक शानदार 150 साल पुराना जैन मंदिर...जैन मंदिर की दीवारों पर जैन धर्म के सभी तीर्थंकरों के चित्र ...
22/05/2026

मुल्तान, पाकिस्तान में एक शानदार 150 साल पुराना जैन मंदिर...

जैन मंदिर की दीवारों पर जैन धर्म के सभी तीर्थंकरों के चित्र आज भी मौजूद हैं। मंदिर की दीवार पर नवकार मंत्र अंकित है। यह जैन मंदिर 150 साल पुराना था।

जब 1947 में भारत और पाकिस्तान का बंटवारा हुआ। चारों ओर दंगे हुए थे। भारत से पाकिस्तान या पाकिस्तान से भारत जाने वाली ट्रेनें और बसें टर्मिनस पर पहुंचते ही कब्रिस्तान में तब्दील हो गईं।

पंजाब के मुल्तान में एक जैन मंदिर था जो बंटवारे के बाद अब पाकिस्तान में है। जैन समुदाय मुल्तान से भारत में मूर्तियों के हस्तांतरण के बारे में चिंतित था। दंगों के कारण वे बस या ट्रेन से भारत नहीं जा सकते थे और न ही पाकिस्तान में रह सकते थे।

समुदाय के कुछ लोग चार्टर्ड विमान लेने के लिए दिल्ली गए थे। लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिली तो वे बंबई चले गए। अंत में उन्हें एक निजी कंपनी से प्रति व्यक्ति 400 रुपये के किराए पर एक विमान मिला। (आप उस समय 400 Rs की कीमत की कल्पना कर सकते हैं)

विमान में लोगों के साथ मंदिर की 85 मूर्तियां, तमाम जिनवाणी, घरेलू सामान लाया गया। यह ओवरलोड हो गया। पायलट ने यह कहते हुए इसे उड़ाने से मना कर दिया कि यह डबल लोडेड है। उन्होंने केवल 2-3 मूर्तियाँ लेने का सुझाव दिया

सभी स्त्रियाँ रोते हुए विमान से उतर गईं और कहने लगीं हमें यहाँ छोड़ दो लेकिन सभी मूर्तियाँ और जिनवाणी ले जाओ। घर का सारा सामान निकालने के बाद भी प्लेन ओवरलोड था।

पायलट ने कहा कि या तो लोग जा सकते हैं या मूर्तियां। लोगों ने उनसे मूर्तियां ले जाने को कहा। लोगों का ऐसा विश्वास देखकर पायलट हैरान रह गया। उसने सोचा कि अगर वह उन्हें पाकिस्तान में छोड़ देगा तो वे वैसे भी मर जाएंगे। उसने मूर्तियों और लोगों दोनों को लेने का जोखिम उठाया।

अंत में विमान ने उड़ान भरी। सभी ने णमोकार मंत्र का जाप किया। उस समय विमान में सवार महिलाओं ने संकल्प लिया कि जब तक विमान जोधपुर नहीं पहुंचेगा तब तक न तो कुछ खाएंगे और न ही पानी पीएंगे। विमान सफलतापूर्वक जोधपुर हवाई अड्डे पर उतरा।

पायलट हैरान था कि डबल-लोडेड विमान इतनी आसानी से, सुरक्षित रूप से, बिना किसी परेशानी के उड़ गया। पायलट ने कहा कि उसने कभी ऐसा विमान नहीं उड़ाया जो इतना भार होने के बावजूद इतना हल्का महसूस करता हो। यह एक चमत्कार था। पायलट ने लोगों से उसे मूर्ति दिखाने को कहा नहीं तो वह उन्हें विमान से मूर्तियां नहीं ले जाने देगा।

पायलट सिख था। जैनियों ने उन्हें भगवान की मूर्ति के दर्शन (दर्शन) करने से पहले मांसाहार, पेय छोड़ने के लिए कहा, जो अहिंसा के प्रचारक हैं।

पायलट ने तुरंत अपने जीवन में मांसाहार न खाने की कसम खाई और अंत में मूर्तियों को प्रणाम किया।

ये मूर्तियां और जिनवाणी मुल्तान जैन मंदिर, आदर्श नगर, जयपुर में स्थित हैं। आप इसे देख सकते हैं। पंडित श्री टोडरमल जी की प्रसिद्ध "रहस्य पूर्णा चिट्ठी" मुल्तान के सन्यासियों के लिए लिखी गई है।

"अपने धर्म की रक्षा करो, धर्म तुम्हारी रक्षा करेगा।"

#आर्यवर्त

With Kanhaiya Mishra94:2048:Kanhaiya Mishra] – I'm on a streak! I've been a top fan for 5 months in a row. 🎉
04/03/2025

With Kanhaiya Mishra94:2048:Kanhaiya Mishra] – I'm on a streak! I've been a top fan for 5 months in a row. 🎉

*🚩🔱कुम्भमेला - वैदिकशास्त्रेषु🔱🚩* *🚩🔱उल्लिखिता अद्वितीया तीर्थयात्रा🔱🚩**~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~**कुंभ मेला: क्या ह...
19/02/2025

*🚩🔱कुम्भमेला - वैदिकशास्त्रेषु🔱🚩*
*🚩🔱उल्लिखिता अद्वितीया तीर्थयात्रा🔱🚩*
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*कुंभ मेला: क्या हमारे वैदिक ग्रंथों में इस अद्वितीय तीर्थयात्रा का उल्लेख है?*

प्रयागराज, हरिद्वार, नासिक और उज्जैन में कुंभ मेले से जुड़ी सबसे लोकप्रिय कहानी देवताओं और असुरों द्वारा समुद्र मंथन (समुद्र मंथन) से निकले अमृत कलश की है। हालांकि महाकाव्यों और पुराणों में इस कहानी के कई संदर्भ हैं, लेकिन न तो धरती पर अमृत की चार बूंदें गिरने का उल्लेख है और न ही कुंभ को एक उत्सव के रूप में मनाने का।

कुंभ मेले को भारत का सबसे बड़ा तीर्थ माना जाता है और इसे 2017 में यूनेस्को की मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत सूची में शामिल किया गया था। यह त्यौहार एक खगोलीय संयोग के दौरान मनाया जाता है जो हर 12 साल में चार नदियों के तट पर बारी-बारी से होता है - हरिद्वार में गंगा, प्रयागराज में गंगा, यमुना और पौराणिक सरस्वती का संगम, उज्जैन में शिप्रा और नासिक में गोदावरी। 12 साल की अवधि के दौरान छोटे-छोटे उत्सव भी मनाए जाते हैं।

*कुंभ की पवित्रता*

कुंभ मेला एक ऐसा त्यौहार है जहाँ श्रद्धालु - संत और गृहस्थ, अमीर और गरीब, बूढ़े और जवान, नंगे और कपड़े पहने, पुरुष और महिलाएँ - पवित्र स्नान के लिए बड़ी संख्या में एकत्रित होते हैं। इस त्यौहार की उत्पत्ति के बारे में कई मिथक हैं, जिनका हिंदू धर्म की सामाजिक-सांस्कृतिक नींव को मजबूत करने में महत्वपूर्ण प्रभाव रहा है। हालांकि, आश्चर्यजनक रूप से, प्राचीन भारतीय ग्रंथों में कुंभ मेले का बहुत कम या कोई उल्लेख नहीं है, और इस महत्वपूर्ण घटना के बारे में उपलब्ध अधिकांश जानकारी मौखिक परंपरा और सुनी-सुनाई बातों पर आधारित है।

दरअसल, इस त्योहार का उल्लेख वैदिक ग्रंथों, सूत्र साहित्य, महाकाव्य-पौराणिक ग्रंथों, स्मृतियों , धर्मशास्त्रों या अन्य किसी भी संग्रह में नहीं है। ऐसा माना जाता है कि कुंभ मेला उन स्थानों पर होता है जहां सुरों (देवताओं) और असुरों (राक्षसों) द्वारा समुद्र मंथन के दौरान अमृत की बूंदें गिरी थीं। मंथन से कई चीजें निकलीं, जिनमें अमृत का प्याला भी शामिल था। हालांकि समुद्र मंथन की कहानी महाकाव्य-पौराणिक ग्रंथों में मिलती है, लेकिन पृथ्वी पर चार स्थानों पर चार बूंदों के छलकने की घटना का उल्लेख नहीं है। ऐसा प्रतीत होता है कि कुंभ मेले की परंपरा को सम्मानजनक प्राचीनता प्रदान करने के लिए इस महाकाव्य-पौराणिक मिथक को किसी समय मौखिक रूप से जोड़ा गया था।

*तोपों और सितारों में कुंभ*

कुंभ मेले की ऐतिहासिकता को वैदिक काल से जोड़ने के लिए, कुछ रूढ़िवादी अनुयायी अथर्ववेद (IV.34.7; XIX.53.3) से दो अंश, ऋग्वेद (I.8.9, X.89.7, XII.3.23) से तीन अंश और यजुर्वेद ( माध्यंदिन , 19.87) से एक अंश उद्धृत करते हैं। अथर्ववेद के श्लोकों में से - ' चतुर्थ कुंभान्श्चतुर्धा ददामि ' और ' पूर्ण कुंभोषधिकाल आहितस्तं ' - पहला श्लोक विश्तारी यज्ञ की महिमा में एक भजन से संबंधित है और दूसरा 'ईश्वरीय समय' से संबंधित है। यहाँ, कुंभ का अर्थ संस्कृत शब्द 'पानी का घड़ा' है, न कि त्यौहार। यहां तक ​​कि मध्यकालीन भारत के वेदों के विद्वान, जैसे कि उद्गीथ (17वीं शताब्दी) और सायण (14वीं-15वीं शताब्दी), ने इन वाक्यांशों को किसी भी त्यौहार से नहीं जोड़ा, हालांकि 14वीं शताब्दी के बाद से तीर्थयात्राएं और त्यौहार बहुत आम थे। यहां तक ​​कि ऋग और अथर्ववेद के अंशों का अर्थ भी कुंभ त्यौहार से संबंधित नहीं है। तर्क का समर्थन करने वाला एक और तथ्य यह है कि रोमन/पश्चिमी राशि चिन्हों का ज्ञान - त्यौहार के पीछे महत्वपूर्ण कारकों में से एक - वैदिक लोगों के लिए अज्ञात था। भारत पश्चिमी राशि चक्र से केवल ईसाई युग की शुरुआत के आसपास ही परिचित हुआ।

कुंभ का उल्लेख कुछ पौराणिक ग्रंथों में मिलता है, लेकिन किसी भी प्रयोग में इसे किसी त्यौहार से नहीं जोड़ा गया है। वायु पुराण (II.15.47) में इसे श्राद्ध (पूर्वजों को प्रसन्न करने का अनुष्ठान) करने के लिए एक पवित्र स्थान के रूप में वर्णित किया गया है । वायु पुराण के इस कुंभ की पहचान नारदीय पुराण (II.65.100) में उल्लिखित तत्कालीन सरस्वती नदी पर श्री कुंभ नामक स्थान से की जा सकती है , जहाँ पवित्र स्नान से यज्ञ (अग्नि पूजा) करने के समान लाभ प्राप्त होता है। जो लोग अभी भी इन संदर्भों से भ्रमित हैं, उनके लिए काशी के शंखधारा (12वीं शताब्दी ई.) का उपयुक्त अवलोकन उपयोगी हो सकता है। वह कहते हैं, ' गुरुरगिर: पंचदिनानुपास्य वेदान्तशास्त्राणि दिन्त्रयं च, अमी समग्रवितर्कवाद: ('जो विद्वान शिक्षक द्वारा दिए गए पाठ को पांच दिनों में, वेदों और शास्त्रों को तीन दिनों में सीखते हैं, वे केवल सूंघकर ही तर्क या वितर्क का ज्ञान प्राप्त कर लेते हैं') (लताकामेलकम, II.14)।

प्रयागराज, नासिक और उज्जैन में कुंभयोग (कुंभ के तहत तारों का एक विशेष संयोजन) किसी भी खगोलीय पिंड के कुंभराशि (कुंभ राशि, या पानी का घड़ा) में होने से जुड़ा नहीं है। प्रयागराज, नासिक और उज्जैन में कुंभ मेला आयोजित करने की परंपराओं में कुंभ शब्द शामिल नहीं है, जिसका उपयोग विशेष रूप से हरिद्वार में त्योहार के लिए किया जाता है। नासिक और उज्जैन के त्योहारों को सिंहस्थ के रूप में जाना जाता है, कुंभ मेला नहीं। ऐसा इसलिए है क्योंकि यह आयोजन तब होता है जब बृहस्पति सिंह ( सिंहराशि ) में होता है। कुंभयोग का कोई खगोलीय या ज्योतिषीय संदर्भ उपलब्ध नहीं है। पुराणों से ऐसा प्रतीत होता है कि कुंभपर्व (कुंभ की अवधि) का नाम हरिद्वार में हर 12वें वर्ष होने वाले अनुष्ठान स्नान के शुभ अवसर से पड़ा इस खगोलीय संयोग का उल्लेख नारदीय पुराण (II.66.44) और भविष्य पुराण (III.iv.7.37-38) में हरिद्वार में गंगा स्नान के लिए पवित्र समय के रूप में किया गया है। इससे पता चलता है कि यह मेला मूल रूप से हरिद्वार में मनाया जाता था और इसे कुंभ कहा जाता था क्योंकि यह बृहस्पति के कुंभ राशि में होने के दौरान आयोजित किया जाता था।

*गंगा की केन्द्रीयता*

अमृत ​​के मिथक से जुड़ी एक और व्याख्या यह है कि वैदिक काल में अमृत खाद्यान्न था [i] , लेकिन महाकाव्य-पौराणिक युग में, व्याख्या को गंगा, या पानी से बदल दिया गया। जबकि खाद्यान्न भारत में कृषि की शुरुआत का प्रतीक था, इस अवधारणा को पौराणिक काल के दौरान जीवन-निर्वाह करने वाली गंगा की भव्यता को बनाए रखने के लिए बदल दिया गया था - जो कृषि के लिए समान रूप से महत्वपूर्ण है, और कुंभ मेला इस तथ्य का जश्न मनाने के लिए कार्य करता है। जिन चार स्थानों पर पौराणिक रूप से अमृत गिरा था, उनमें हरिद्वार और प्रयागराज गंगा के तट पर स्थित हैं। यहां तक ​​कि गोदावरी नदी, जिसके तट पर नासिक स्थित है, को पुराणों में 'गौतमी गंगा' कहा गया है ( ब्रह्म पुराण , 78.77)। उज्जैन का गंगा से संबंध स्कंद पुराण ( अवन्त्य-खंड ; II29,33,42) में दर्ज किया गया है उज्जैन में शिप्रा के दक्षिणी तट पर गंगेश्वर नामक एक लिंग (लिंग से बनी वस्तु) भी मिली थी। यह सब कुंभ मेले के महत्व की ओर इशारा करता है, जो गंगा से जुड़ा एक अनुष्ठानिक स्नान उत्सव है, जिसका पानी भारतीय इतिहास के मध्यकाल के दौरान कुंभपर्व की कथा के अज्ञात लेखकों के लिए अमृत के समान था। गुप्त काल (चौथी-पांचवीं शताब्दी) से कुंभ स्वयं भारतीय कला में गंगा की मूर्तिकला विशेषताओं में से एक बन गया।

दुनिया के सबसे बड़े धार्मिक शांतिपूर्ण समारोहों में से एक के रूप में पहचाने जाने वाले कुंभ मेले को अब एक महत्वपूर्ण हिंदू तीर्थयात्रा के रूप में मनाया जाने लगा है। यह मेला एक जैविक और लौकिक रूप में, भारतीय लोक और संस्कृत परंपराओं के व्यक्तिगत अनुभव को एक ऐसे पैमाने पर जीवंत करता है जो कहीं और नहीं देखा गया है, जो किसी स्थान और समय से संबंधित पवित्रता की परम भावना को दर्शाता है। प्राचीन पाठ्य मान्यताओं के बावजूद, कुंभ मेले का उत्सव पवित्र उद्भव और मानवीय भावना के साथ स्थान और समय के एकीकरण का प्रमाण है।

*🔱🚩।।अलख आदेश।।🔱🚩*
*🔱🚩।।हर हर महादेव।।🔱🚩*

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🚩💥अष्ट भुज कष्ट काप द्रार आविया दयाल.💥🚩◆●◆●◆●◆●◆●◆●◆●◆●◆●◆●◆●◆●◆●◆छंद=नाराचअष्ट भुज कष्ट काप द्रार आविया दयाल.नष्ट रोग ह...
19/02/2025

🚩💥अष्ट भुज कष्ट काप द्रार आविया दयाल.💥🚩
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छंद=नाराच

अष्ट भुज कष्ट काप द्रार आविया दयाल.
नष्ट रोग हो सबे बने निरामया न्याल.
सत्व सत्व शुध्ध बुध्ध तत्व बोध ले तरी.
जयो जयंम जयो जयंम भवानी अंब इशरी.
भवानी अम्ब इसरी (1)

निरुध्ध चित हो स्थिरा धरे सु ध्यान मंगला.
प्रतिष्ठ योग ले गति सुधर्म क्षेम अर्गला.
प्रकाश वाश हो अकाश भुत कोष ले भरी.
जयो जयंम जयो जयंम (2)

दुडंद चंद पंथ पोन दे तु मध्य मे मधु.
पुरक रेच कुंभका सव्यंत पींड ले बधु.
हो पंच प्राण पंच कोष दोष मुक्त शंकरी.
जयो जयंम जयो जयंम (3)

प्रक्रत पीत वात कफ शांत हो समान शा.
जठरअगन ज्वाल सात सम सम हो वशा.
हो सप्त धात ओज तेज मे प्रमान ऐकरी.
जयो जयंम जयो जयंम (4)

धरा हो अन्न धान परीपुर्ण विश्मभरी.
जले भरी नदी कलोल नद नद ध्वनकरी.
रसे भरी रसायनीज औषधी अमी भरी.
जयो जयंम जयो जयंम(5)

वरद हस्थे दे वरा टरा टरे विघन वडा.
हो ज्राग च्रक चेतना दिपे ज्यु कुडंली कडा.
सुना अवाज ओम ओम गोम गाज अंदरी.
जयो जयंम जयो जयंम (6)

नहो अरी रुदे कदी दियो अभे भुतेसरी.
अजात शत्रु हो सदा तवा सु बाल केसरी.
ओ अर्बुदा निवासनी भजामी भक्त वस्तरी.
जयो जयंम जयो जयंम(7)

दियो दिदार डोकरी तखे की राह टाबरा.
तवा चरण रज रज चख चख ले चरा.
छो आप आतमा उजास छंद छंद "विजरी".
जयो जयंम जयो जयंम (8)

रचनाकार : रचिता चारण कवि विजयभा हरदासभा बाटी
ध्रांगध्रां- गुजरात

#चारण_साहित्य #आर्यवरर

*🌷🌺श्री महालक्ष्मी दिव्यतम🌺🌷**🌷🌺कनकधारा स्तोत्र साधना🌺🌷**~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~**[[विशेष यन्त्र निर्माण विधान सहित]]**क...
15/02/2025

*🌷🌺श्री महालक्ष्मी दिव्यतम🌺🌷*
*🌷🌺कनकधारा स्तोत्र साधना🌺🌷*
*~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~*
*[[विशेष यन्त्र निर्माण विधान सहित]]*

*कनकधारा स्तोत्र की रचना आदिगुरु शंकराचार्य जी ने की थी। कनकधारा का अर्थ होता है स्वर्ण की धारा, कहते हैंकहा जाता है कि एक दरिद्र ब्राह्मण दंपत्ति कि दुर्दशा को देखकर करूणावश भगवती लक्ष्मी की स्तुति की जिसके फलस्वरूप माता लक्ष्मी जी ने उस ब्राह्मण दंपत्ति के आंगन में स्वर्ण बर्षा की सिद्ध मंत्र होने के कारण कनकधारा स्तोत्र का पाठ शीघ्र फल देनेवाला और दरिद्रता का नाश करनेवाला है।इसके नित्य पाठ से धन सम्बंधित सभी प्रकार के अवरोध दूर होते हैं और महालक्ष्मी की कृपा प्राप्त होती है।*

*लक्ष्मी प्राप्ति के लिये यह अत्यन्त दुर्लभ और रामबाण प्रयोग है। इस यंत्र के पूजन से दरिद्रता का नाश होता है। पूर्व में आद्य शंकराचार्य ने इसी यंत्र के प्रभाव से स्वर्ण के आंवलों की वर्षा करवायी थी। यह यंत्र रंक को राजा बनाने की सामर्थय रखता है। यह यंत्र अष्ट सिद्धि व नव निधियों को देने वाला है। इसमें बिन्दु त्रिकोण एवं दो वृहद कोण वृत्त अष्टदल वृत्त षोडस दल एव तीन भूपुर होते हैं। इस यंत्र के साथ कनकधारा स्तोत्र का पाठ करना अनिवार्य होता है।*

*कनकधारा यंत्रआज के युग में हर व्यक्ति अतिशीघ्र समृद्ध बनना चाहता हैं। धन प्राप्ति हेतु प्राण-प्रतिष्ठित कनकधारा यंत्र के सामने बैठकर कनकधारा स्तोत्र का पाठ करने से विशेष लाभ प्राप्त होता हैं। इस कनकधारा यंत्र कि पूजा अर्चना करने से ऋण और दरिद्रता से शीघ्र मुक्ति मिलती हैं। व्यापार में उन्नति होती हैं, बेरोजगार को रोजगार प्राप्ति होती हैं।श्री आदि शंकराचार्य द्वारा कनकधारा स्तोत्र कि रचना कुछ इस प्रकार कि हैं, जिसके श्रवण एवं पठन करने से आस-पास के वायुमंडल में विशेष अलौकिक दिव्य उर्जा उत्पन्न होती हैं। ठिक उसी प्रकार से कनकधारा यंत्र अत्यंत दुर्लभ यंत्रो में से एक यंत्र हैं जिसे मां लक्ष्मी कि प्राप्ति हेतु अचूक प्रभावा शाली माना गया हैं। कनकधारा यंत्र को विद्वानो ने स्वयंसिद्ध तथा सभी प्रकार के ऐश्वर्य प्रदान करने में समर्थ माना हैं। जगद्गुरु शंकराचार्य ने दरिद्र ब्राह्मण के घर कनकधारा स्तोत्र के पाठ से स्वर्ण वर्षा कराने का उल्लेख ग्रंथ शंकर दिग्विजय में मिलता हैं।*

*श्री महालक्ष्मी दिव्यतम कनकधारा स्तोत्र साधना (विशेष यंत्र निर्माण विधान) की साधना कुछ विशिष्ट विधिविधान संग अगर शास्त्रोक्त पद्धति से की जाए तो मनुष्य के जीवन मे धन का अपार सुख , अपूर्व समृद्धि, अतुल्य सौभाग्य मिलता है। जो साधक ऋण पीड़ित समस्या से परेशान हो, किसीका धंधा, व्यापार नही चल रहा हो, नोकरी ठीक से नही लग रही हो, धंधे में पैसे फस गए हो, जिनको धन की बचत ना होती हो, जो ऋण-धन सबंधित समस्या से परेशान हो वैसे मनुष्य के लिए यह साधना अति सरल, बहोत लाभकारी, शीघ्र फलदायी साबित होती है। जिस बात के शास्त्रो में प्रमाण मौजूद है।*

*जो साधक धन सबंधित समस्या से, अपार सुख, समृद्धि, धन निरोगी जीवन पाना चाहते है तो यह साधनाविधि पूर्ण रूप से करे। जो साधक यह विशिष्ट श्री महालक्ष्मी की कृपा हेतु अनुष्ठान करने के इच्छुक है वो अपना नामांकन कर सकते है। उनको एक लिंक दी जाएगी जिससे वो इस विशिष्ट कनकधारा स्त्रोत साधना के ग्रुप से जुड़ पाएंगे।*

*यह साधना जो करना चाहते है उन्हें ही यह शास्त्रोक्त और गुरुगम्य विद्या से मिला ज्ञान प्रदान करने की गुरु आज्ञा है। यह ज्ञान किसीको केवल ज्ञानार्जन के लिए नही दिया जाएगा। जो धन सबंधित समस्या से परेशान है ऐसे साधना करने के इच्छुक सदस्यों को, साधको ही दिया जाएगा।*

*भूतकाल में जब मकरसंक्राति पर साधना दी गई थी तब भी सबको सूचना दी गई थी कि जिसको साधना करनी है वो ही ग्रुप से जुड़ना और जुड़नेवाले को यहां दिया गया विधिविधान पूर्ण रूप से गुप्त ही रखना है, कही भी सार्वजनिक नही करना है, फिर भी नियमो की अवहेलना करते हुवे कुछ साधको केवल ज्ञानार्जन के उदषय से जुड़े थे और कुछ सदस्यों ने साधनाविधि को अपनी फेसबुक id पर अपने नाम से प्रसिद्धि कमाने या अन्य मकशद से सार्वजनिक भी कर दिया था, जो पूर्ण रूप से नियमो की अवज्ञा और गलत किया था। ऐसा गलत नियमो की विरुद्ध ज्ञान के संदर्भ में कृत्य करने पर साधना कभी फलदायी नही बनती है, साधना के नियमो को तोड़ने पर ज्ञानावरणीय कर्म का पापकर्म बंधित होता है, जो साधना मार्ग पर साधक के लिए बाधक बनता है।*

*जो भी साधक साधना करना चाहते है वो अपना प्रथम नामांकन करने हेतु मुझे 9879963555 पर बता सकते है। जो साधक या सदस्य यह साधना असल मे करना चाहता है वही ग्रुप से जुड़े उस उदषय से यह साधना विधि का प्रवेश शुल्क रखा गया है, जिससे जो साधना नही करना चाहते वो ना जुड़े। इस साधना विधि का प्रवेश शुल्क 201/- रुपिया रहेगा। जो सेवा कार्य मे या ग्रुप के लिए पुसतको का ग्रन्थालय या कोई सेवाकिय विशेष कार्य मे खर्च किये जायेंगे।*

*जो साधक या सदस्य यह साधनाविधि को पूर्ण रूप से पाकर शास्त्रोक्त विधिविधान से करने के उत्सुक है वो कनकधारा स्तोत्र साधना के ग्रुप में जुड़ने के लिए प्रवेश शुल्क 201/- रुपिया 9879963555 पर googel pay या phone pay कर उसका स्क्रीन शॉट इसी नंबर पर भेज दे उनको ग्रुप से लिंक के माध्यम से जोड़ दिया जाएगा।*

*जो नही करना चाहते है, वो व्यर्थ की दुविधा में ना पड़े, जो आवश्यक है वो नियम के तहत साधनाविधि देना आवश्यक है, पूरी कम्युनिटी की भलाई और कुछ गलत कार्य करनेवाले पाखंडियो से बचने के उद्देश्य से यह निर्णय लिया गया है।*

*🌺🌷जय माँ भगवती🌷🌺*
*🌺🌷जय माँ पराशक्ति🌷🌺*
*🌺🌷हर हर महादेव🌷🌺*

* #आर्यवर्त*

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