Balkrishan Ni Haveli, Vyara

Balkrishan Ni Haveli, Vyara વૈષ્ણવોની સાથે સત્સંગ કરવો.

26/05/2026

🙏🚩जय श्रीकृष्ण🚩🙏
सुप्रभात।🌞☀️🌄
आपका दिन शुभ रहो।

जीवन सुंदर ऐसे ही नहीं बनता,
इसे प्रार्थना, विनम्रता, त्याग, और प्रेम के साथ सुंदर बनाना पड़ता है.....!!!

25/05/2026

🚩🚩🚩🚩🚩
हे गिरिधर... 🌷

हर साँस में हो सुमिरन तेरा,
यूँ बीत जाये जीवन मेरा...
तेरी पूजा करते बीते साँझ सवेरा
यूँ बीत जाये जीवन मेरा...

नैनो की खिड़की से तुमको
पल पल मै निहारूँ
मन में बिठालू,
तेरी आरती उतारूँ..

डाले रहू तेरे चरणों में डेरा,
यूँ बीत जाए जीवन मेरा...
हर साँस में हो सुमिरन तेरा,
यूँ बीत जाए जीवन मेरा...

जो भी तेरा प्यारा हो,
वो मेरे दिल का प्यारा हो
मेरे सर का ताज मेरी
आँखों का तारा हो..

सबमे निहारूँ रूप सुनहरा,
यूँ बीत जाए जीवन मेरा...
हर साँस में हो सुमिरन तेरा,
यूँ बीत जाए जीवन मेरा...

प्यार हो, सत्कार हो,
एतबार हो तुम्हारा
सुख भी हो सारे
और याद हो इशारा...

हो आत्मा पर तेरा ही डेरा,
यूँ बीत जाए जीवन मेरा...
हर साँस में हो सुमिरन तेरा,
यूँ बीत जाए जीवन मेरा...

तेरी पूजा करते बीते साँझ सवेरा,
यूँ बीत जाए जीवन मेरा...
हर साँस में हो सुमिरन तेरा,
यूँ बीत जाए जीवन मेरा...

प्यारे यूँ बीत जाए जीवन मेरा

🌸राधे राधे
🌸🌸🌸🌸

🎹🎷🏵️🌾🌸🌾🏵️🎷🎹 *🥀🌷रूप देखि नैना पलक लगे नहीं🌷🥀* ❣️रूप देखि नैना पलक लगे नहीं 🌿गोवर्धनधर के अंग अंग प्रति❣️निरखि नैन मन रहत ...
25/05/2026

🎹🎷🏵️🌾🌸🌾🏵️🎷🎹

*🥀🌷रूप देखि नैना पलक लगे नहीं🌷🥀*

❣️रूप देखि नैना पलक लगे नहीं

🌿गोवर्धनधर के अंग अंग प्रति

❣️निरखि नैन मन रहत तिहि

🌿कहा री कहु कछु कहत न आवे

❣️चित चोर्यो वे मांगे दहीं

🌿कुम्भनदास प्रभु मिलवे की

❣️सुन्दर बात सखियन सो कही

🌿रूप देखि नैना पलक लगे नहीं

🎹🎷🏵️🌾🌸🌾🏵️🎷🎹

🎹🎷🏵️🌾🌸🌾🏵️🎷🎹 *🥀🌷श्रीवल्लभ मधुराकृति मेरे🌷🥀* 🌷श्रीवल्लभ मधुराकृति मेरे ।🌷सदा बसो मन यह जीवनधन। सबहीनसों जु कहत हों टेरे ॥१...
25/05/2026

🎹🎷🏵️🌾🌸🌾🏵️🎷🎹

*🥀🌷श्रीवल्लभ मधुराकृति मेरे🌷🥀*

🌷श्रीवल्लभ मधुराकृति मेरे ।

🌷सदा बसो मन यह जीवनधन। सबहीनसों जु कहत हों टेरे ॥१॥|

🌷मधुर बदन अति मधुर नयनयुग। मधुर भ्रोंह अलकनकी पांत।

🌷मधुर भाल बीच तिलक मधुर अति। मधुर नासिका कही न जात ॥ २॥

🌷मधुर अधर रसरूप मधुर छबि | मधुर मधुर अति ललित कपोल |

🌷मधुर श्रवनकुंडलकी झलकन | मधुर मकर मानो करत कलोल ॥।३॥

🌷मधुर कटाच्छ कृपापूरन अति। मधुर मनोहर वचन विलास।

🌷मधुर उगार देत दासनकों। मधुर बिराजत मुख मृदु हास ॥४॥

🌷मधुर कंठ आभूषणभूषित । मधुर उरस्थल रूपसमाज ।

🌷अति विशाल जानु अवलम्बित | मधुर बाहु परिरंभन काज ।।५॥

🌷मधुर उदर कंटि मधुर जानुयुग | मधुर चरण गति सब सुखरास |

🌷मधुर चरणकी रेनु निरन्‍्तर। जनमजनम मांगत हरिदास ॥६॥

🎹🎷🏵️🌾🌸🌾🏵️🎷🎹

24/05/2026
24/05/2026

🥭🍒🥭🍒🥭🍒🥭🍒🥭
‼️ સવંત ૨૦૮૨ એકાદશી ની યાદી ‼️
🥭🍇🥭🍇🥭🍇🥭🍇🥭
🍒૧૮) અધિક માસ જેઠ સુદ ૨૭-૦૫-૨૦૨૬ બુધવાર કમલા એકાદશી (ભાગ.)
🍒૧૯) અધિક માસ જેઠ વદ્ ૧૧-૦૬-૨૦૨૬ ગુરુવાર કમલા એકાદશી
🍒૨૦) નિજ જેઠ સુદ ૨૫-૦૬-૨૦૨૬ ગુરૂવાર ભીમ - નિર્જલા એકાદશી (કેરી)
🍒૨૧) નિજ જેઠ વદ્ ૧૦-૦૭-૨૦૨૬ શુક્રવાર યોગિની એકાદશી (સાકર) સ્માર્ત
🍒૨૨) નિજ જેઠ વદ્ ૧૧-૦૭-૨૦૨૬ શનિવાર યોગિની એકાદશી (સાકર) ભાગ.
🍒૨૩) અષાઢ સુદ ૨૫ - ૦૭-૨૦૨૬ શનિવાર દેવશયની એકાદશી (દ્રાક્ષ 🍇)
🍒૨૪) અષાઢ વદ્ ૦૯ - ૦૮-૨૦૨૬ રવિવાર કામિકા એકાદશી (ગૌ દુધ)
🍒૨૫) શ્રાવણ સુદ ૨૩-૦૮- ૨૦૨૬ રવિવાર પુત્રદા - પવિત્રા એકાદશી (શિંગોડા)
🍒૨૬) શ્રાવણ વદ્ ૦૭ -૦૯-૨૦૨૬ સોમવાર અજા એકાદશી (ખારેક)
🍒૨૭) ભાદરવા સુદ ૨૨- ૦૯- ૨૦૨૬ મંગળવાર પરિવર્તીની એકાદશી ( દહીં - કમરકાકડી)
🍒૨૮) ભાદરવા વદ્ ૦૬- ૧૦- ૨૦૨૬ ઈન્દિરા એકાદશી (ગોળ, ધી, કલાકંદ)
🍒૨૯) આસો સુદ ૨૨- ૧૦- ૨૦૨૬ ગુરૂવાર પાશાંકુશા એકાદશી (સક્કરટેટી) ભા
🍒 ૩૦) આસો વદ્ ૦૫- ૧૧- ૨૦૨૬ ગુરૂવાર રમા એકાદશી (પાકા કેળાં)*_
🍇🍇🍇🍇🍇🍇🍇🍇🍇🍇🍇🍇

18/05/2026

पूज्य गोस्वामी श्रीपुरुषोत्तमजी जूनागढ़ आप कह रहे है कि, पुष्टि मार्ग की दृष्टि से *अधिक मास* का कोई महत्व नहीं है। याने संप्रदाय में कोई अलग सेवा या मनोरथ का प्रकार श्रीमहाप्रभुजी द्वारा कहीं भी लिखा या बताया नहीं है।
क्योंकि हमारे घर नित्य में पूर्ण पुरुषोत्तम बिराजते है और सेवा अंगीकार करते है।

सेवा अंतर्गत उन लोगो को लगता है कि 3 साल बाद पुरुषोत्तम पधारते है। श्रीमहाप्रभुजी की आज्ञा अनुसार हमारे यहां तो नित्य बिराजमान है।

पहले से लेकर आजतक के सेवा प्रकार के ग्रंथों में कहीं भी इसका उल्लेख नहीं है।

अधिक फल के लिए सेवा करते है तब निषेध सकाम भक्ति हो जाती है। हम बहिर्मुख हो जाएंगे।

18/05/2026

*अधिक मास और संप्रदाय*

🌹🪻*विभाग C*🪻🌹

🪻*सूरदासजी का पद*🪻

*नीको लागत पुरुषोत्तम मास ||*
*जाकी महिमा जगत बखानत करत भक्त सब जाकी आस || १ ||*

*आपही सूरज आपही चंदा आपहीको सब होत प्रकास ||*
*आपही जोग भोग सब अर्पत वही प्रभु मम मन उल्लास || २ ||*

*ज्यो ज्यो दान करत प्रभु हित त्यों त्यों बढ़त प्रेमकी आस ||*
*सूरदास प्रभु सबके स्वामी दास को राखो चरण के पास || ३ ||*

गिरीश भाई,
सूरदास जी रचित अधिक मास याने पुरुषोत्तम मास का यह पद प्राप्त हुआ है। मेरा मानना है कि तब अधिकमास की जानकारी संप्रदायमें थी।

कृपया आपका क्या मंतव्य और प्रतिभाव है यह प्रकट करें । 🙏
नितेश शाह✍️

नितेश भाई, आपका खूब खूब आभार, आपको मेरी विभाग A और B की पोस्ट मिली होगी।

उसमें शास्त्र और पुराण में वर्णित अधिक मास की उत्पत्ति जो हजारो साल पहले हुई यह बताया है।
यह मास में शास्त्र द्वारा नैमितीक कर्म कांड जिसमें पहले *संकल्प*🫴करने की आवश्यकता है, उसका निषेध बताया है। अर्थात वह कार्य नहिं कर सकते परंतु, नित्य भक्ति करने में निषेध नहीं कहा।

पुराण में वर्णित पूर्ण पुरुषोत्तम की *भक्त वत्सलता और माहात्म्य* सूरदासजी बताते है।

जैसे पूर्ण पुरुषोत्तम ने शास्त्र द्वारा उपेक्षित निषिद्ध *मल मास* को अपना नाम दे कर उत्तम स्थान दिया और अपने *शरणागत भक्त की* महिमा बढ़ाई। वैसे अपने भक्त, दैवी जीव जो भगवद सूखार्थ सेवा स्मरण करते है उसको प्रेम का दान करते है। यहां सूरदासजी अपनी शरणागति दृढ़ करनेकी विनती करते है।

सूरदासजी अपने सेव्य प्रभुका यह माहात्म्य गान करके दास भाव से यह विनती करते है, आप सबके स्वामी हो। जब ऋषियों और शास्त्र द्वारा घोषित *मळ मास को* आपने अपना नाम देकर, अनाथ को सनाथ किया, आश्रय देकर कर निर्भय कीया वैसे मुजे भी अपने पास रखना।🙏

अर्थात यह प्रभु के *माहात्म्य गुणगान का, भक्त वत्सलता* और आश्रय का पद है।

🌹🪻🌹🪻🌹🪻🌹

श्रीमहाप्रभुजी के पुष्टि भक्ति संप्रदाय में जब हमने दीक्षा ली है तब उनकी आज्ञा का पालन हमें करना चाहिए।

*1.)* श्रीमहाप्रभुजी के वचन है,नवरत्न ग्रंथ में कहते है *सेवाकृतिर्गुरोराज्ञा*

*2.)* श्रीगुसांईजी *भक्ति हंस ग्रंथ* में स्पष्ट कहते है *अन्य संबंधगंधोपी कंधरामेवबांधते*

*3.)* श्रीमहाप्रभुजी की आज्ञानुसार *"भक्ति"* तो निष्काम निष्प्रयोजन निर्हेतुक होनी चाहिए। और संप्रदाय में हमें अपने घर में अपने द्रव्य से ऋतु अनुसार भगवद सूखार्थ, सेवा निष्प्रयोजन निर्हेतुक निष्काम करते है तब बाधक नहीं है।
अर्थात दूसरे से द्रव्य लेकर सकाम होती सेवा निषेध है।

*4.)* श्री गोकुलनाथजी कहते है, संप्रदाय में गुरुपद सिर्फ
*🔹श्रीमहाप्रभुजी श्रीगोपीनाथजी और श्रीगुसांईजी🔹 तक ही सीमित है।* ( हम सब गुरुद्वार है। ) अर्थात् उनकी🔹 आज्ञा गुरूआज्ञा है उसका पालन करना हमारा कर्तव्य है।

*5.)* श्रीहरिरायजी शिक्षापत्र १८ (श्लोक १४-१५ ) में यह आज्ञा करते है। उनके🔹 बराबर *भूतल पर किसीको नहीं जानने* जो वैष्णव उनके🔹 बराबर किसीको कहता है या जानता है तो वह *आसुरी* है।

🪻*-: संप्रदाय रहस्य :-*🪻

*(A)* मेरी समज से, ऊपर के सब विधान अंतर्गत *" नित्यसेवा क्रम में जब हम किसके कहने पर, अधिक मास का अनुसंधान रखकर अधिक मास के नाम पर या कारण"* सेवाक्रम में कुछ भी बढ़ाव लाते है तो ऊपर कही आज्ञा (2.) के अंतर्गत हमारा सेवा प्रकार *अन्य संबंध* युक्त हो जाएगा जो *"अन्याश्रय"* ही कहलाएगा।

*(B)* जब *अधिकस्य अधिकं फलं,* याने अधिकमास में सेवा स्मरण सत्संग अधिक करने पर *अधिक फल प्राप्त होगा*, ऐसे सोचते है *या* करते है तो सेवा *" सकामता युक्त हो गई,"* 😳 तब ऊपर *3)* के अंतर्गत *निषेध* हो जाएगी।

देखो 😳 अपने यहां तो *भगवद सुखार्थ या गुरु सुखार्थ* एक वैष्णव को दुसरे वैष्णव पर आधार रखना या *उसको भविष्य के आधार रूप मानना* या *समजना* या *सोचना* भी *अन्याश्रय* माना गया है।
【 देखो वार्ता २५२/ *१३४*, एक विरक्त गोकुलको वार्ता का यह वचन: *श्रीगुसाइंजी विचारे, जो वैष्णव को रंचक हू अन्याश्रय होइ तो भगवद प्राप्ति न होई।* 】🤔 (सोचो सोचो)

सोचो, तो अधिकमास की प्रधानता के कारण या माहात्म्य के कारण जब हम अधिक सेवा करेंगे तब *वह सेवा अन्याश्रय होगी कि नहीं*❓😳

🙏*शेष भगवद इच्छा*🙏

*संकलन :* गिरीशभाइ शाह
*Mo.no. :* 94292 54100

18/05/2026

🌹🪻*अधिक मास और संप्रदाय*🌹🪻

🌹*विभाग B*🌹

विभाग A में हमने विष्णु पुराण, खगौल शास्त्र, ज्योतिष विज्ञान, भविष्य पुराण अंतर्गत *अधिक मास के प्राकट्य* हेतु भगवद लीला देखी।

यहां विभाग B में अधिक मास हेतु शास्त्र आज्ञा और संप्रदाय के सिद्धांत अनुसार गृहसेवा के प्रकार की बात करेंगे।

🪐 *अधिक मास*🌙

पंचांग के आधार से यह जानकारी स्पष्ट है कि, हमारा *सूर्य वर्ष* ३६५ दिन और करीब ६ घंटे का होता है, वही *चन्द्र वर्ष* ३५४ दिन का बताया है। तिथियों के लोप होने के कारण और *सूर्य वर्ष और चन्द्र वर्ष के बीच के अंतर का संतुलन* बनाने हेतु सनातन हिन्दू वर्ष ३६० दिन का बताया है। और इसका संतुलन करने हेतु पंचांग के गणित से *अधिक मास प्रकट होता है।*

अधिक मास *चन्द्र वर्ष का* एक अतिरिक्त भाग है, जो *३२ मास, १६ दिन और ८ घटी / घडी के अंतर से* आता है। 【 अर्थात २ १/२ (ढाई) *से* ३ (तीन) साल बाद आता है। 】

विभाग A में देखा कि, *अधिक मास में सूर्य की संक्रान्ति याने प्रवेश कोई नई राशि या नक्षत्र में नहीं है।* इस लिए उस मास का *कोई अधिपति नक्षत्र नही है।* इस कारण से *अधिक मास* या *मल मास* कहा है।

इसी कारण से शास्त्र आज्ञा अनुसार *शास्त्रीय कर्म कांड के लिए यह मास निषेध हो जाता है।*

क्योंकि, प्रत्येक वैदिक कार्य शुरु करने से पहले हमें *संकल्प लेना पड़ता है* जिसमें हम बोलते है, "अमुक वारे, अमुक मासे, अमुक नक्षत्रे ..... "यहां जब अधिपति कोई नक्षत्र नहीं है तब *'यह संकल्प'* ले नहीं शकते। *जब* संकल्प ही नहीं ले सकते *तब* प्रत्येक शास्त्रीय कर्म जैसे वास्तु पूजन, विवाह कार्य उत्तरक्रिया वगैरह करना निषेध हो जाता है।

परंतु, परंपरा गत *इस मास में* नित्य-नैमित्तिक कर्म और पहले से जो *समारब्ध* यज्ञ सत्र या चांद्रायणादि प्रायश्चित कार्य हो सकते है। ( *समारब्ध* याने, जो वैदिक कर्मकाण्ड अधिक मास के पहले से शुरू हो गए हो वह सब कार्य, कर सकते है। ) लेकिन अतिरिक्त शास्त्रीय कर्म *संकल्प नहीं ले सकने के कारण नहीं किये जायेंगे, यह निषेध है।*

🌹*संप्रदाय और अधिकमास*🌹

अब संप्रदाय अंतर्गत अधिकमास में हमारा क्या कर्तव्य है? क्या अकर्तव्य है? उसे देखेंगे।

🤔 *अधिकमास की बघाई* जब हम एक दूसरे को देते है, *या* अति उत्साह के कारण कुछ भक्ति भाव के कारण *भगवद सुख के नाम पर या लौकिक कारणों से* अपनी नित्य की सेवा में मनोरथ आदि करते है, तब हम यह भूल जाते है कि, ......🤔

(1.) 🤔 *आज से २५० - ३०० साल पहले सम्प्रदाय में, अधिक मास निमित्त, सेवा स्मरण अंतर्गत आज जैसे कोई भी मनोरथ या कार्य कहीं भी देखने में नहीं आया है।*😳

(2.) 🤔 *न तो अधिक मास को सम्प्रदाय के कोइ भी श्रीमहाप्रभुजी, श्रीगोपीनाथजी श्रीगुसांइजी उनके सातों बालक श्रीहरिरायजी, श्रीपुरशोत्तमजी लेखवाले तक* *(१.)* कहीं भी अपने घर की सेवा प्रणालिका में महत्व दे कर *उत्सव के प्रकारमें* शामिल किया है। *(२.)* न तो *बधाई का* कोइ आग्रह या माहात्म्य बताया है।😳

(3.) 🤔 *पूर्वाचार्यो ने अधिक मास का कोई खास सेवा प्रकार का निर्देश, सेवा के कर्तव्य अंतर्गत संप्रदाय में नहीं लिखा है।*

(4.) 🤔 *न तो इन दिनों के कोई मनोरथ का उल्लेख, साज, वस्त्र, श्रृंगार और सेवा प्रकार में बदलाव की नोंध, "किसी भी घर" के व्रतोत्सव या टिप्पणी 📜में नहीं है।*

(5.) 🤔 *न कोई भगवद लीला का या सेवा अंतर्गत प्रमाण, किर्तन साहित्य से मिलता है।* ( सिर्फ एक रचना सुरदासजी की प्राप्त है जिसमें *पूर्णपुरषोत्तम का माहात्म्य* प्रकट किया है। पद में न तो व्रज की लीला या संप्रदाय के सेवा प्रकार की कोइ बात कही है। जिसकी चर्चा विभाग C में है। )

(6.) 🤔 हमें यह सोचना जरूरी है कि, संप्रदाय में प्रत्येक उत्सव अंतर्गत अनेक कीर्तन वैष्णव के अष्टसखा के मीलते है। *जब की अधिक मास के क्यों नहीं है ?*🤔

(7.) 🤔 *संप्रदाय के मार्गदर्शक ८४-२५२ वैष्णवो की वार्ता* में भी किसी भी प्रकार के सूचन या निर्देश प्राप्त नहीं होते है।

याने मेरी समझ और जानकारी अंतर्गत नित्य के सेवा प्रकार में *अधिक मास* के कारण या *अधिक मास* को ध्यान में रखकर, 🔸सकामता🔸 से *नित्य सेवाक्रम में अधिक कुछ करना वह स्पष्ट रूप से "अन्याश्रय प्रेरक" लगता है ।* 😳

अर्थात् ....🤔 🔸*अधिकस्य अधिकं फलं,*🔸 याने अधिकमास में सेवा स्मरण सत्संग अधिक करने पर *अधिक फल प्राप्त होगा*, ऐसे सोचने पर या करने पर तो, सेवा स्मरण सत्संग सब *" सकामता युक्त हो जाएगा।"* संप्रदाय में *"सकाम भक्ति" निषेध* है। 😳

🤔 श्रीमहाप्रभुजी की आज्ञानुसार हमारी भक्ति *निष्काम, निष्प्रयोजन, निर्हेतुक, अपने द्रव्य से* ऋतु अनुसार *भगवद सूखार्थ के भाव से होनी चाहिए।* सकामता से करते है तो बाधक है।

*और,* जब जगत में सब को दिखाने करेंगे *या* अधिक मास को महत्व देकर करेंगे तो, *अवश्य अन्याश्रय हो सकता है,* क्योंकि श्रीमहाप्रभुजी के वचन भगवद सेवा स्मरण *भगवद सूखार्थ* के भाव से ही होने चाहिए, किसी भी *अन्य हेतु या प्रकार से नहीं ।*

सेवा स्मरण में आप के वचन है *"अन्य संबंधगंधोपी कंधरामेव बाधते"*। 🤔
( अधिक मास के मनोरथ में *"अन्य संबंध,"* भक्ति या सेवा में *अधिकमास की प्रधानता की सोच या माहात्म्य है ।*) 😳

सोचो 🤔 अपने यहां तो भगवद सुखार्थ ( या गुरु सुखार्थ ) *एक वैष्णव को दुसरे वैष्णव पर आधार रखना* या *उसको हमारे भविष्य के आधार रूप मानना* या *समजना* या *सोचना* भी *अन्याश्रय* बताया है। 😳 देखो (१) वार्ता २५२/ *१३४*, एक विरक्त गोकुलको वार्ता का यह वचन: *"श्रीगुसांइजी विचारे, जो वैष्णव को रंचक हू अन्याश्रय होइ तो भगवद प्राप्ति न होई।

(२) २५२ / १११ वार्ता में बेटा की सेवा करते। लौकिक में मन क्यों चलायो ? ( ऐसे १० बेर कह्यो अर्थात सेवा में पुत्र का आग्रह रखना भी अन्याश्रय बताया है। )

🤔 तो.......क्या संप्रदाय अंतर्गत अधिकमास या मल मास पर *अधिकस्य अधिकं फलं,* सोच भी सकते है❓

ऐसे कहनेवाले और सोचनेवाले की बहिर्मुखता साबित होती है। 🤔

🤔 समझने वाले को तो इशारा काफी है। *शेष, तो भगवद इच्छा* ही प्रमाण है।🙏

🌹🪻🌹🪻🌹🪻🌹

प्रमाण 📜 रूप *पूज्य गो. श्रीशरद बावा ( कच्छ मांडवी )* के वचनामृत🙏
*पुरषोत्तम मास* में *वैष्णव के कर्तव्य* हेतु समाधान नीचे की प्रश्नोत्तरी से मिलता है।

परम आदरणीय वंदनीय
पूज्य गो, श्रीशरद बावा ( कच्छ मांडवी )।

पुष्टिमार्ग में अधिकमास का क्या भाव है ? और *अधिकस्य अधिकं फलं, भागवत सप्ताह* और मनोरथो की पत्रीकाएं आ रही है" क्या यह संप्रदाय में मान्य है ?
यह प्रश्नों को आपश्री अनुकूल समझे तो इस पर प्रकाश डालने की कृपा करें ।"
दंडवत प्रणाम🙏🏻

*उत्तर* : बड़े सौरवर्ष तथा छोटे चाँद्रवर्ष के *बीच की खाई पाटने के लिए* प्रति तीन वर्ष में अधिक मास आता है।

इस मास में सूर्य की संक्रान्ति नहीं होती है। अर्थात इस मास का कोई अधिपती नहीं है। इस कारण से शास्त्रीय परंपरा में *इस मास में नित्य-नैमित्तिक कर्म और पहले से समारब्ध यज्ञसत्र या चांद्रायणादि प्रायश्चित कर्मों* के अतिरिक्त अन्य कोई शास्त्रीय कर्म नहीं किये जाते हैं। ( *समारब्ध* याने पहले से शुरूआत किए भये वैदिक कर्म )

स्वस्ववर्णाश्रम अनुसार प्राप्त होते शास्त्रीय कर्मों के विषय में *पुष्टिमार्ग में परंपरा का समादर है।*

जहां तक अधिकमास में भगवत्सेवा के प्रकार का प्रश्न है तो *इस विषय में मूलाचार्यो के कोई लिखित विधान मिलते नहीं है।*

परंपरा अंतर्गत, दो तरह के भगवत्सेवा के प्रकार उपलब्ध होते है :
*1.* जिस ऋतु में अधिकमास आया हो उस ऋतु के *अनुसार नित्यसेवा करनी।* और
*2.* क्योंकि अधिकमास में ऋतु की मर्यादा के अतिरिक्त अन्य कोई मर्यादा नहीं होती है। कोइ उत्सव भी नहीं होते है। तब स्वगुरु गृह की प्रतिदिन की लिखित *सेवा - प्रणालिका* का बंधन भी नहीं होता है।

याने, वैष्णव को, *ऋतु का ध्यान रखते हुए, सेवाकर्ता "अपने सेव्य के सुखार्थ " निष्प्रयोजन निष्काम मनोरथ करना चाहे तो, अपने सामर्थ्य अनुसार अपने घर में अपने सेव्य के साथ कर सकते है।*

अधिकमास में प्रतिपदा (एकम) को *संवत्सर का*, द्वितीया को *भाईदूज का*, तृतीया के दिन *ठकुरानी तीज का* ऐसे तिथि के अनुसार मनोरथ करने की रीति *जो आज प्रचलित हुई है* उस मे ऋतु क्रम का विप्लव होता दीखता है जो उचित प्रतीत नहीं होता है।

और *अधिकमास* के नाम पर स्वसेव्य के मनोरथों द्वारा, 💰💸धन और भीड़ 👥👥 जुटाने की लालसावाले लाभ 💸💰 पूजा 🙌 पारायण लोग जिस तरह अपने सेव्य के मनोरथों की सूची 📜 सर्वत्र प्रसिद्ध कर के उसके द्वारा भगवत्सेवा के नाम पर अर्थोपार्जन 💸💰 करते हैं, वह तो *अतिजघन्य अपराध है।*

*भागवत सप्ताह, या पुराण का पारायण या कथा के विषय में* भी यही समझना चाहिए।

महाप्रभु श्रीवल्लभाचार्य का आदेश है, "पुष्टि मार्गिय वैष्णव को सेवा स्मरण सभी तरह के *लौकिक और पारलौकिक, हेतु - प्रयोजनों से रहित* होकर प्रयत्न पूर्वक नित्य नियम से स्वयं श्रीभागवत का पाठ करना चाहिए।"

संप्रदाय में तो *भागवत पठन यह नित्य कर्तव्य है* अतः अधिकमास के साथ इसका कोई संबंध नहीं है।

और जो *कथा-पारायण दक्षिणा देकर करवाये जाते है वह तो भगवन्नाम का विक्रय होने के कारण,* ऐसी कथा सत्संग या पारायण को सुनना *गंदी नाली के अपवित्र जल का पान करने के समान है।* ( जलभेद ग्रंथ )

श्रीमहाप्रभुजी द्वारा ऐसी कथा का श्रवण करना भी निषेध बताया होने से, *पुष्टिमार्गियों के लिए यह अक्षम्य अपराध है।*

*- गो. श्रीशरदरायजी ( कच्छ मांडवी हालोल ).*

🌹🌹 🌹 🌹 🌹

*संप्रदाय सार:-* याने हमें *स्व सेव्य के,* साथ अपने घर में, अपने द्रव्य से, मनोरथ *निष्प्रयोजन निष्काम ऋतु को ध्यान में रखकर, गुप्तता से भगवद सुखार्थ,* कर सकते है।

जैसे अब उष्णकाल है तो फूल मंडली, नाव को मनोरथ, बगीचा को मनोरथ, कुंज निकुंज के मनोरथ इत्यादि । (*सांझी के मनोरथ* तिथि बाध्य है इस लिए नहीं कर सकते। ) कोई भी मनोरथ *तिथि का आग्रह न रखकर ऋतु अनुसार करना* अत्यंत जरूरी है।

【 *निषेध :-* मनोरथ जिस लीला में प्रभु को श्रम हुआ है जैसे कालिय दमन, पूतना मोक्ष, दावानल पान, इत्यादि...
नहीं करने चाहिए।
मनोरथ जिसमें प्रभू को ऋतु के कारण श्रम हो सके, जैसे ठंड की ऋतु में नाव, फुलमंडली, वर्षाऋतु इत्यादि मनोरथ योग्य नहीं है।

दूसरे के द्रव्य 💰💸से और अन्य सब 👥👥 को दर्शन कराने हेतु कराते मनोरथ इत्यादि *सब निषेध अकर्तव्य समजने।* 】

🙏 *शेष भगवद इच्छा*🙏

*संकलन :* गिरीशभाइ शाह
*Mo.no. :* 94292 54100

18/05/2026

🌹*अधिकमास और संप्रदाय*🌹

*प्रश्न समाधान और कर्तव्य अकर्तव्य विचार*

*प्रश्न :-* (१.) कई गोस्वामी बालक और वैष्णव कहते है, की अधिकमास में सेवा स्मरण मनोरथ करने से अधिक फल प्राप्त होता है। ( *अधिकस्य अधिक फलम्* कहते है। ) इसे *संप्रदाय अंतर्गत कैसे समझना ?* (२.) संप्रदाय में अधिक मास की सेवा प्रकार अंतर्गत हमारा कर्तव्य अकर्तव्य क्या ? (३.) अधिक मास पर सूरदासजी का पद कौनसा है ? उसको कैसे समझना ?
आशा है कि आप समाधान करेंगे। 🙏

नितिनभाई, कल्पनाबेन अल्पेश भाई और अन्य✍️

*समाधान :-* इसकी चर्चा तीन विभाग में करेंगे।
*विभाग A* अधिक मास के प्राकट्य की जानकारी शास्त्र से, खगौल विज्ञान, ज्योतिष विज्ञान, भविष्य पुराण अंतर्गत देखेंगे।
*विभाग B* संप्रदाय के दृष्टिकोण से अधिक मास का प्रकार और जानकारी।
*विभाग C* सूरदासजी के पद की समझ और मार्ग दर्शन।

🪻*विभाग A*🪻

यहां अधिक मास के प्राकट्य की जानकारी शास्त्र से, खगौल विज्ञान, ज्योतिष विज्ञान, भविष्य पुराण अंतर्गत देखेंगे कि अधिकमास क्या है ? कब से और कैसे विज्ञान और शास्त्र द्वारा प्रकट हुआ ? उसका शुभ अशुभ फल क्या है?

🌹*(अ) अधिक मास प्राकट्य हेतु:-* हमने
*नृसिंह जयंती* पर *विभाग B* पोस्ट में सतयुग की विष्णु पुराण की कथा में हमने देखा कि, हिरण्यकशिपु ने कठोर तप करके ब्रह्माजी से अजय होने के वरदान लीये थे। उसमें एक वरदान था, *वर्ष के बारह मास में उसकी मृत्यु ना हो।*
इस वरदान को निष्क्रिय करने ( अर्थात उसके काट रूप ) पूर्ण पुरुषोत्तम ने ब्रह्माजी को आज्ञा देकर ( प्रत्येक ३२ से ३३ मास के बाद ) एक ज्यादा अतिरिक्त *तेरह मास का वर्ष* प्रकट करवाया।

ब्रह्माजी आप सृष्टि के निर्माता और नियंता है। भगवान की आज्ञा से उन्हों ने ग्रहों नक्षत्रों की गति विधि में फेर- बदल करके *एक मास अधिक* बनाया। जो हिरण्यकशिपु को दिए वरदान को निष्क्रिय करके वध का हेतु बना।

🌹*(ब) समझ खगौल विज्ञान, भविष्य पुराण से :-* ऊपर बताए अनुसार *अधिक मास* का प्राकट्य देखा। यहां खगौल विज्ञान, भविष्य पुराण और *पंचांग के आधार* पर अधिक मास को समझेंगे।

हमारे ऋषि मुनियों ने ब्रह्मांड स्थित ग्रहों नक्षत्रों की गतिविधि अंतर्गत कैसे अधिक मास होता है यह बताया। उन्होंने देखा
*1)* ब्रह्मांड में ग्रहों नक्षत्रों की स्थिति और भ्रमण निश्चित है।
*2)* राशियां *बारह* है।
*3)* पृथ्वी की भ्रमण कक्षा अपनी धुरी पर *और* सूर्य के आसपास है।
*4) "काल याने समय"* चंद्र की गतिविधि, नक्षत्रों की गतिविधि और पृथ्वी की गतिविधि पर निर्भर और आधारित है।

ऋषि मुनियों ने देखा कि पृथ्वी पर
*(१) सूर्य का प्रवेश* ( एक मास तक ) *एक ही नक्षत्र में* ( याने राशि में ) रहता है। एक मास बाद सूर्य *दूसरी नई राशि में* प्रवेश करता है।
*(२.)* जिस राशि / नक्षत्र में सूर्य प्रवेश करके एक मास हाजिर है उस मास का नाम उस राशि पर उन्हों ने रखा। ( उदाहरण सूर्य की हाजरी एक मास तक *श्रवण नक्षत्र* में है तब वह मास को *श्रावण मास* नाम दिया । )
*(३)* राशि बारह है, बारह मास का नाम प्रकट किए। इस तरह काल - समय बारह मास ( याने वर्ष ) का हुआ। 🤔

हमारे ऋषि मुनियों ने गणित करके देखा कि प्रत्येक *३२ मास, १६ दिन और ८ घटी / घडी के अंतर* पश्चात 【 अर्थात २ १/२ (ढाई) *से* ३ (तीन) साल बाद 】सूर्य का 🤔 प्रवेश का प्रकार नई राशि नहीं परंतु पुनः वोही राशि में है अर्थात *प्रवेश😳 वोही राशि में है।* याने एक ही राशि में *अधिक प्रवेश* है। तब उस संपूर्ण मास को *अधिक मास* बताया। ( अर्थात यह एक मास सूर्य की हाजरी वोही राशि में अधिक है। ) उस *अधिक मास* को ऋषियों ने *सब मासों के मल स्वरूप* बताया और उसका नाम *"मल मास"* घोषित किया ।

जब यह अधिक मास को ऋषियों ने *मल मास* कहकर शुभ कार्य, वैदिक कर्मकांड के लिए निषेध कहा । तब यह *मल मास* पूर्ण पुरुषोत्तम के शरण गया और विनंती करी। तब भगवान ने अपना नाम दिया इस कारण से मल मास *पुरुषोत्तम मास* के नाम से प्रकट हुआ, और भगवद भजन के लायक बना।

🌹*-: काल निर्णय :-*🌹
हमारे ऋषि मुनियों ने हमारी पृथ्वी पर होने वाले दिन रात और अन्य संधिकाल के समय का संदर्भ लेकर *एक संपूर्ण दिन का समय* याने *काल के निर्णय,* हेतु समय की तीन धाराएं बताई है।
१. चन्द्र आधारित,
२. नक्षत्र आधारित
३. सूर्य आधारित

हमारा *एक दिन और रात* के समय का आधार *पृथ्वी के भ्रमण और चंद्र के भ्रमण* पर है।
*(१.)* *पृथ्वी का भ्रमण* दो प्रकार का है, एक भ्रमण अपनी धूरी पर है, जो 24 घंटो का है। जिससे दिन और रात प्रकट होते है।
दुसरा भ्रमण सूर्य के इर्द-गिर्द भ्रमण जो *एक वर्ष का बारह मास के ऋतुचक्र* को प्रकट करता है।

*(२.)* *चन्द्र का भ्रमण* पृथ्वी के आसपास है जो 19 से 24 घंटो का है। जो *चंद्र की कला और नित्य की तिथि* को प्रकट करता है।

यह सब गतिविधियों का विचार करके हमारे ऋषियों ने *पंचांग* बनाया है। प्रत्येक दिन को *'पंचांग काल'* नाम दिया।【 पंचांग याने पांच अंग, *तिथि, वार, नक्षत्र, योग, और करण* जो काल (समय) के पांच प्रमुख अंग है। 】

आमतौर पर *एक दिन रात* का बदलाव *अंग्रेजी तारीख* 24 घंटे में है। जबकि हिन्दू पंचाग अनुसार *एक तिथि* का बदलाव *उन्नीस घंटे से लेकर चौबीस घंटे* तक का है। ( यह बदलाव ग्रह नक्षत्र सूर्य चंद्र पृथ्वी की गतिविधि पर आधारित है। )

इसका मतलब यह है कि कोई तिथि 19 घंटे की होगी तो कोई तिथि 24 घंटे की भी हो सकती है। अब यदि कोई तिथि 19 घंटे की है तब तिथि का बदलाव मध्याह्न में या मध्यरात्रि समय होता है।

*तिथि का निर्णय* पंचांग *सूर्योदय के समय* हाजर, चंद्र की कला और नक्षत्र से तय करता है।

ऋषि मुनियों ने 🌙 *चंद्रकी कला* पर आधारित प्रत्येक मास के पंद्रह पंद्रह दिन के दो पक्ष बनाए है *(१) शुकल पक्ष* 🌖🌕 १ से १४ तिथि और पूनम 🌕और और (२) *कृष्ण पक्ष🌘🌑।* १ से १४ तिथि और अमास 🌑 है। ऐसे चंद्र की अलग अलग ३० कला तिथि के रूप में निर्देशित है।

सनातन धर्म की संस्कृति के अन्तर्गत, शास्त्रो के वचन और आज्ञा के अनुसार सूर्य 🌞 चन्द्र🌙 ग्रहो 🪐नक्षत्र 💫 की भ्रमण कक्षा के आधार पर, दिन मास तय होते है, जिसका संबंध ऋतुओं के साथ भी जुड़ा हुआ है।

हमने ऊपर देखा कि सनातन धर्म में तिथि का निर्णय, सूर्योदय के साथ जुड़ा है। तिथि का समय *उन्नीस घंटे से लेकर चौबीस घंटे* तक का है इस के कारण, कभी कभी एक तिथि का *लोप* होता है, और तब दो दिन में एक ही तिथि का निर्णय लिया जाता है।

पंचांग ने *अक्षय तिथियां* भी बताई है। ( जैसे अक्षय तृतीया, अक्षय नोम की तिथि ) अर्थात यह तिथि का *क्षय अर्थात लोप* न तो हजारों सालों पहले हूआ है, न भविष्य में संभव है । जिसे NASA ने भी यह स्वीकार करके प्रमाणित किया है।

अब विभाग B विभाग C से विशेष जानकारी अलग दूसरी पोस्ट में समझेंगे।

🙏 *शेष भगवद इच्छा*🙏

*संकलन :* गिरीशभाइ शाह
*Mo.no. :* 94292 54100

Address

Vyara
394650

Website

Alerts

Be the first to know and let us send you an email when Balkrishan Ni Haveli, Vyara posts news and promotions. Your email address will not be used for any other purpose, and you can unsubscribe at any time.

Share

Category