18/05/2026
🌹🪻*अधिक मास और संप्रदाय*🌹🪻
🌹*विभाग B*🌹
विभाग A में हमने विष्णु पुराण, खगौल शास्त्र, ज्योतिष विज्ञान, भविष्य पुराण अंतर्गत *अधिक मास के प्राकट्य* हेतु भगवद लीला देखी।
यहां विभाग B में अधिक मास हेतु शास्त्र आज्ञा और संप्रदाय के सिद्धांत अनुसार गृहसेवा के प्रकार की बात करेंगे।
🪐 *अधिक मास*🌙
पंचांग के आधार से यह जानकारी स्पष्ट है कि, हमारा *सूर्य वर्ष* ३६५ दिन और करीब ६ घंटे का होता है, वही *चन्द्र वर्ष* ३५४ दिन का बताया है। तिथियों के लोप होने के कारण और *सूर्य वर्ष और चन्द्र वर्ष के बीच के अंतर का संतुलन* बनाने हेतु सनातन हिन्दू वर्ष ३६० दिन का बताया है। और इसका संतुलन करने हेतु पंचांग के गणित से *अधिक मास प्रकट होता है।*
अधिक मास *चन्द्र वर्ष का* एक अतिरिक्त भाग है, जो *३२ मास, १६ दिन और ८ घटी / घडी के अंतर से* आता है। 【 अर्थात २ १/२ (ढाई) *से* ३ (तीन) साल बाद आता है। 】
विभाग A में देखा कि, *अधिक मास में सूर्य की संक्रान्ति याने प्रवेश कोई नई राशि या नक्षत्र में नहीं है।* इस लिए उस मास का *कोई अधिपति नक्षत्र नही है।* इस कारण से *अधिक मास* या *मल मास* कहा है।
इसी कारण से शास्त्र आज्ञा अनुसार *शास्त्रीय कर्म कांड के लिए यह मास निषेध हो जाता है।*
क्योंकि, प्रत्येक वैदिक कार्य शुरु करने से पहले हमें *संकल्प लेना पड़ता है* जिसमें हम बोलते है, "अमुक वारे, अमुक मासे, अमुक नक्षत्रे ..... "यहां जब अधिपति कोई नक्षत्र नहीं है तब *'यह संकल्प'* ले नहीं शकते। *जब* संकल्प ही नहीं ले सकते *तब* प्रत्येक शास्त्रीय कर्म जैसे वास्तु पूजन, विवाह कार्य उत्तरक्रिया वगैरह करना निषेध हो जाता है।
परंतु, परंपरा गत *इस मास में* नित्य-नैमित्तिक कर्म और पहले से जो *समारब्ध* यज्ञ सत्र या चांद्रायणादि प्रायश्चित कार्य हो सकते है। ( *समारब्ध* याने, जो वैदिक कर्मकाण्ड अधिक मास के पहले से शुरू हो गए हो वह सब कार्य, कर सकते है। ) लेकिन अतिरिक्त शास्त्रीय कर्म *संकल्प नहीं ले सकने के कारण नहीं किये जायेंगे, यह निषेध है।*
🌹*संप्रदाय और अधिकमास*🌹
अब संप्रदाय अंतर्गत अधिकमास में हमारा क्या कर्तव्य है? क्या अकर्तव्य है? उसे देखेंगे।
🤔 *अधिकमास की बघाई* जब हम एक दूसरे को देते है, *या* अति उत्साह के कारण कुछ भक्ति भाव के कारण *भगवद सुख के नाम पर या लौकिक कारणों से* अपनी नित्य की सेवा में मनोरथ आदि करते है, तब हम यह भूल जाते है कि, ......🤔
(1.) 🤔 *आज से २५० - ३०० साल पहले सम्प्रदाय में, अधिक मास निमित्त, सेवा स्मरण अंतर्गत आज जैसे कोई भी मनोरथ या कार्य कहीं भी देखने में नहीं आया है।*😳
(2.) 🤔 *न तो अधिक मास को सम्प्रदाय के कोइ भी श्रीमहाप्रभुजी, श्रीगोपीनाथजी श्रीगुसांइजी उनके सातों बालक श्रीहरिरायजी, श्रीपुरशोत्तमजी लेखवाले तक* *(१.)* कहीं भी अपने घर की सेवा प्रणालिका में महत्व दे कर *उत्सव के प्रकारमें* शामिल किया है। *(२.)* न तो *बधाई का* कोइ आग्रह या माहात्म्य बताया है।😳
(3.) 🤔 *पूर्वाचार्यो ने अधिक मास का कोई खास सेवा प्रकार का निर्देश, सेवा के कर्तव्य अंतर्गत संप्रदाय में नहीं लिखा है।*
(4.) 🤔 *न तो इन दिनों के कोई मनोरथ का उल्लेख, साज, वस्त्र, श्रृंगार और सेवा प्रकार में बदलाव की नोंध, "किसी भी घर" के व्रतोत्सव या टिप्पणी 📜में नहीं है।*
(5.) 🤔 *न कोई भगवद लीला का या सेवा अंतर्गत प्रमाण, किर्तन साहित्य से मिलता है।* ( सिर्फ एक रचना सुरदासजी की प्राप्त है जिसमें *पूर्णपुरषोत्तम का माहात्म्य* प्रकट किया है। पद में न तो व्रज की लीला या संप्रदाय के सेवा प्रकार की कोइ बात कही है। जिसकी चर्चा विभाग C में है। )
(6.) 🤔 हमें यह सोचना जरूरी है कि, संप्रदाय में प्रत्येक उत्सव अंतर्गत अनेक कीर्तन वैष्णव के अष्टसखा के मीलते है। *जब की अधिक मास के क्यों नहीं है ?*🤔
(7.) 🤔 *संप्रदाय के मार्गदर्शक ८४-२५२ वैष्णवो की वार्ता* में भी किसी भी प्रकार के सूचन या निर्देश प्राप्त नहीं होते है।
याने मेरी समझ और जानकारी अंतर्गत नित्य के सेवा प्रकार में *अधिक मास* के कारण या *अधिक मास* को ध्यान में रखकर, 🔸सकामता🔸 से *नित्य सेवाक्रम में अधिक कुछ करना वह स्पष्ट रूप से "अन्याश्रय प्रेरक" लगता है ।* 😳
अर्थात् ....🤔 🔸*अधिकस्य अधिकं फलं,*🔸 याने अधिकमास में सेवा स्मरण सत्संग अधिक करने पर *अधिक फल प्राप्त होगा*, ऐसे सोचने पर या करने पर तो, सेवा स्मरण सत्संग सब *" सकामता युक्त हो जाएगा।"* संप्रदाय में *"सकाम भक्ति" निषेध* है। 😳
🤔 श्रीमहाप्रभुजी की आज्ञानुसार हमारी भक्ति *निष्काम, निष्प्रयोजन, निर्हेतुक, अपने द्रव्य से* ऋतु अनुसार *भगवद सूखार्थ के भाव से होनी चाहिए।* सकामता से करते है तो बाधक है।
*और,* जब जगत में सब को दिखाने करेंगे *या* अधिक मास को महत्व देकर करेंगे तो, *अवश्य अन्याश्रय हो सकता है,* क्योंकि श्रीमहाप्रभुजी के वचन भगवद सेवा स्मरण *भगवद सूखार्थ* के भाव से ही होने चाहिए, किसी भी *अन्य हेतु या प्रकार से नहीं ।*
सेवा स्मरण में आप के वचन है *"अन्य संबंधगंधोपी कंधरामेव बाधते"*। 🤔
( अधिक मास के मनोरथ में *"अन्य संबंध,"* भक्ति या सेवा में *अधिकमास की प्रधानता की सोच या माहात्म्य है ।*) 😳
सोचो 🤔 अपने यहां तो भगवद सुखार्थ ( या गुरु सुखार्थ ) *एक वैष्णव को दुसरे वैष्णव पर आधार रखना* या *उसको हमारे भविष्य के आधार रूप मानना* या *समजना* या *सोचना* भी *अन्याश्रय* बताया है। 😳 देखो (१) वार्ता २५२/ *१३४*, एक विरक्त गोकुलको वार्ता का यह वचन: *"श्रीगुसांइजी विचारे, जो वैष्णव को रंचक हू अन्याश्रय होइ तो भगवद प्राप्ति न होई।
(२) २५२ / १११ वार्ता में बेटा की सेवा करते। लौकिक में मन क्यों चलायो ? ( ऐसे १० बेर कह्यो अर्थात सेवा में पुत्र का आग्रह रखना भी अन्याश्रय बताया है। )
🤔 तो.......क्या संप्रदाय अंतर्गत अधिकमास या मल मास पर *अधिकस्य अधिकं फलं,* सोच भी सकते है❓
ऐसे कहनेवाले और सोचनेवाले की बहिर्मुखता साबित होती है। 🤔
🤔 समझने वाले को तो इशारा काफी है। *शेष, तो भगवद इच्छा* ही प्रमाण है।🙏
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प्रमाण 📜 रूप *पूज्य गो. श्रीशरद बावा ( कच्छ मांडवी )* के वचनामृत🙏
*पुरषोत्तम मास* में *वैष्णव के कर्तव्य* हेतु समाधान नीचे की प्रश्नोत्तरी से मिलता है।
परम आदरणीय वंदनीय
पूज्य गो, श्रीशरद बावा ( कच्छ मांडवी )।
पुष्टिमार्ग में अधिकमास का क्या भाव है ? और *अधिकस्य अधिकं फलं, भागवत सप्ताह* और मनोरथो की पत्रीकाएं आ रही है" क्या यह संप्रदाय में मान्य है ?
यह प्रश्नों को आपश्री अनुकूल समझे तो इस पर प्रकाश डालने की कृपा करें ।"
दंडवत प्रणाम🙏🏻
*उत्तर* : बड़े सौरवर्ष तथा छोटे चाँद्रवर्ष के *बीच की खाई पाटने के लिए* प्रति तीन वर्ष में अधिक मास आता है।
इस मास में सूर्य की संक्रान्ति नहीं होती है। अर्थात इस मास का कोई अधिपती नहीं है। इस कारण से शास्त्रीय परंपरा में *इस मास में नित्य-नैमित्तिक कर्म और पहले से समारब्ध यज्ञसत्र या चांद्रायणादि प्रायश्चित कर्मों* के अतिरिक्त अन्य कोई शास्त्रीय कर्म नहीं किये जाते हैं। ( *समारब्ध* याने पहले से शुरूआत किए भये वैदिक कर्म )
स्वस्ववर्णाश्रम अनुसार प्राप्त होते शास्त्रीय कर्मों के विषय में *पुष्टिमार्ग में परंपरा का समादर है।*
जहां तक अधिकमास में भगवत्सेवा के प्रकार का प्रश्न है तो *इस विषय में मूलाचार्यो के कोई लिखित विधान मिलते नहीं है।*
परंपरा अंतर्गत, दो तरह के भगवत्सेवा के प्रकार उपलब्ध होते है :
*1.* जिस ऋतु में अधिकमास आया हो उस ऋतु के *अनुसार नित्यसेवा करनी।* और
*2.* क्योंकि अधिकमास में ऋतु की मर्यादा के अतिरिक्त अन्य कोई मर्यादा नहीं होती है। कोइ उत्सव भी नहीं होते है। तब स्वगुरु गृह की प्रतिदिन की लिखित *सेवा - प्रणालिका* का बंधन भी नहीं होता है।
याने, वैष्णव को, *ऋतु का ध्यान रखते हुए, सेवाकर्ता "अपने सेव्य के सुखार्थ " निष्प्रयोजन निष्काम मनोरथ करना चाहे तो, अपने सामर्थ्य अनुसार अपने घर में अपने सेव्य के साथ कर सकते है।*
अधिकमास में प्रतिपदा (एकम) को *संवत्सर का*, द्वितीया को *भाईदूज का*, तृतीया के दिन *ठकुरानी तीज का* ऐसे तिथि के अनुसार मनोरथ करने की रीति *जो आज प्रचलित हुई है* उस मे ऋतु क्रम का विप्लव होता दीखता है जो उचित प्रतीत नहीं होता है।
और *अधिकमास* के नाम पर स्वसेव्य के मनोरथों द्वारा, 💰💸धन और भीड़ 👥👥 जुटाने की लालसावाले लाभ 💸💰 पूजा 🙌 पारायण लोग जिस तरह अपने सेव्य के मनोरथों की सूची 📜 सर्वत्र प्रसिद्ध कर के उसके द्वारा भगवत्सेवा के नाम पर अर्थोपार्जन 💸💰 करते हैं, वह तो *अतिजघन्य अपराध है।*
*भागवत सप्ताह, या पुराण का पारायण या कथा के विषय में* भी यही समझना चाहिए।
महाप्रभु श्रीवल्लभाचार्य का आदेश है, "पुष्टि मार्गिय वैष्णव को सेवा स्मरण सभी तरह के *लौकिक और पारलौकिक, हेतु - प्रयोजनों से रहित* होकर प्रयत्न पूर्वक नित्य नियम से स्वयं श्रीभागवत का पाठ करना चाहिए।"
संप्रदाय में तो *भागवत पठन यह नित्य कर्तव्य है* अतः अधिकमास के साथ इसका कोई संबंध नहीं है।
और जो *कथा-पारायण दक्षिणा देकर करवाये जाते है वह तो भगवन्नाम का विक्रय होने के कारण,* ऐसी कथा सत्संग या पारायण को सुनना *गंदी नाली के अपवित्र जल का पान करने के समान है।* ( जलभेद ग्रंथ )
श्रीमहाप्रभुजी द्वारा ऐसी कथा का श्रवण करना भी निषेध बताया होने से, *पुष्टिमार्गियों के लिए यह अक्षम्य अपराध है।*
*- गो. श्रीशरदरायजी ( कच्छ मांडवी हालोल ).*
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*संप्रदाय सार:-* याने हमें *स्व सेव्य के,* साथ अपने घर में, अपने द्रव्य से, मनोरथ *निष्प्रयोजन निष्काम ऋतु को ध्यान में रखकर, गुप्तता से भगवद सुखार्थ,* कर सकते है।
जैसे अब उष्णकाल है तो फूल मंडली, नाव को मनोरथ, बगीचा को मनोरथ, कुंज निकुंज के मनोरथ इत्यादि । (*सांझी के मनोरथ* तिथि बाध्य है इस लिए नहीं कर सकते। ) कोई भी मनोरथ *तिथि का आग्रह न रखकर ऋतु अनुसार करना* अत्यंत जरूरी है।
【 *निषेध :-* मनोरथ जिस लीला में प्रभु को श्रम हुआ है जैसे कालिय दमन, पूतना मोक्ष, दावानल पान, इत्यादि...
नहीं करने चाहिए।
मनोरथ जिसमें प्रभू को ऋतु के कारण श्रम हो सके, जैसे ठंड की ऋतु में नाव, फुलमंडली, वर्षाऋतु इत्यादि मनोरथ योग्य नहीं है।
दूसरे के द्रव्य 💰💸से और अन्य सब 👥👥 को दर्शन कराने हेतु कराते मनोरथ इत्यादि *सब निषेध अकर्तव्य समजने।* 】
🙏 *शेष भगवद इच्छा*🙏
*संकलन :* गिरीशभाइ शाह
*Mo.no. :* 94292 54100