ज्ञान की राह - Gyan Ki Rah

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15/01/2026

• भारतीय मन :-
😫दुःख में - "हे राम"
😢पीड़ा में - "अरे राम"
😌लज्जा में - "हाय राम"
😟अशुभ में - "अरे राम राम"
😚अभिवादन में - "राम राम"
😏शपथ में - "राम दुहाई"
😖अज्ञानता में - "राम जाने"
🫢अनिश्चितता में - "राम भरोसे"
🫡अचूकता के लिए - "रामबाण"
🙄सुशासन के लिए - "रामराज्य"
😪मृत्यु के लिए - "राम नाम सत्य"
जैसी अभिव्यक्तियां पग-पग पर "राम" को साथ खड़ा करतीं हैं !

"राम" भी इतने सरल हैं कि हर जगह खड़े हो जाते हैं !

जिसका कोई नहीं उसके लिए "राम" हैं -
"निर्बल" के बल "राम" !!

जय जय श्री राम!🙏🚩

1 से 14 मुखी रुद्राक्ष
23/12/2025

1 से 14 मुखी रुद्राक्ष

Spritual Watch
21/12/2025

Spritual Watch

Shri Krishna family tree
20/12/2025

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जीवन
14/12/2025

जीवन

मेरा जूता है जापानी
01/11/2025

मेरा जूता है जापानी

06/10/2025

* #बढ़ती #उम्र में इन्हें छोड़ दीजिए।।*

#एक दो बार समझाने से यदि कोई नहीं #समझ रहा है तो सामने वाले को समझाना,
*छोड़ दीजिए*

#बच्चे बड़े होने पर वो ख़ुद के निर्णय लेने लगे तो उनके पीछे लगना,
*छोड़ दीजिए।*

गिने चुने लोगों से अपने #विचार मिलते हैं, यदि एक दो से नहीं मिलते तो उन्हें,
*छोड़ दीजिए।*

एक #उम्र के बाद कोई आपको न पूछे या कोई पीठ पीछे आपके बारे में #गलत कह रहा है तो #दिल पर लेना,
*छोड़ दीजिए।*

अपने हाथ कुछ नहीं, ये #अनुभव आने पर भविष्य की #चिंता करना,
*छोड़ दीजिए।*

यदि #इच्छा और #क्षमता में बहुत #फर्क पड़ रहा है तो खुद से #अपेक्षा करना,
*छोड़ दीजिए।*

हर किसी का पद, कद, मद, सब अलग है इसलिए तुलना करना,
*छोड़ दीजिए।*

बढ़ती उम्र में जीवन का #आनंद लीजिए, रोज जमा #खर्च की चिंता करना,
*छोड़ दीजिए।*

#उम्मीदें होंगी तो सदमे भी बहुत होंगे, यदि #सुकून से रहना है तो उम्मीदें करना,
*छोड दीजिए।*

मैसेज अच्छा लगे तो कापी करने का विचार *छोड़ दीजिए *
और न लगे तो फारवर्ड करने का विचार,
*छोड़ दीजिये।*

नवधा भक्ति :श्रवणं कीर्तनं विष्णोः स्मरणं पादसेवनम्।अर्चनं वन्दनं दास्यं सख्यमात्मनिवेदनम् ॥श्रवण (परीक्षित), कीर्तन (शु...
06/10/2025

नवधा भक्ति :

श्रवणं कीर्तनं विष्णोः स्मरणं पादसेवनम्।
अर्चनं वन्दनं दास्यं सख्यमात्मनिवेदनम् ॥

श्रवण (परीक्षित), कीर्तन (शुकदेव), स्मरण (प्रह्लाद), पादसेवन (लक्ष्मी), अर्चन (पृथुराजा), वंदन (अक्रूर), दास्य (हनुमान), सख्य (अर्जुन) और आत्मनिवेदन (बलि राजा) - इन्हें नवधा भक्ति कहते हैं।

नवधा भक्ति दो युगों में दो महान लोगों द्वारा कही गई है। सतयुग में, प्रह्लाद ने पिता हिरण्यकशिपु से कहा था। फिर त्रेतायुग में, भगवान श्रीराम ने माँ शबरी से कहा था।

‘नवधा’ का अर्थ है नौ प्रकार से या नौ भेद। अतः‘नवधा भक्ति’ यानी ‘नौ प्रकार की भक्ति’ को कहते है इस भक्ति का विधिवत पालन करने से भक्त भगवान को प्राप्त कर सकता है।

रामचरितमानस के अरण्यकाण्ड में, श्री राम ने माँ शबरी को नवधा भक्ति समझाते है। आइये जानिए नवधा भक्ति की चौपाई एवं उनके अर्थ।

श्रीरामचरितमानस से अवधी भाषा में नवधा भक्ति।

नवधा भगति कहउं तोहि पाहीं। सावधान सुनु धरु मन माहीं॥

प्रथम भगति संतन्ह कर संगा।
दुसरि रति मम कथा प्रसंगा॥

गुरु पद पंकज सेवा तीसरि भगति अमान।
चौथि भगति मम गुन गन करइ कपट तजि गान॥

मंत्र जाप मम दृढ़ बिस्वासा। पंचम भजन सो बेद प्रकासा॥
छठ दम सील बिरति बहु करमा। निरत निरंतर सज्जन धरमा॥

सातवँ सम मोहि मय जग देखा। मोतें संत अधिक करि लेखा॥
आठवँ जथालाभ संतोषा। सपनेहुं नहिं देखइ परदोषा॥

नवम सरल सब सन छलहीना। मम भरोस हिय हरष न दीना॥

नव महुं एकउ जिन्ह कें होई। नारि पुरूष सचराचर कोई॥
सोइ अतिसय प्रिय भामिनी मोरें। सकल प्रकार भगति दृढ़ तोरें॥

श्री राम जी कहते है शबरी से कि अब मैं तुम्हे नवधा भक्ति की जो ज्ञान है उसे सुनाने जा रहा हूँ। तुम उसे बड़े ध्यान से सुनो।

पहला भक्ति यही कहलाती है कि संतो कि संगत करनी चाहिए।

दूसरी भक्ति है कि मेरे कथाओं और भजन में मग्न रहना और उसी में लीन हो जाना।

बिना किसी बात के गर्व करते हुए अपने गुरु कि निरन्तर सेवा करना तीसरी भक्ति है।

चौथी भक्ति में वह माना जाएगा जो छल-कपट रहित होकर श्रद्धा प्रेम व लगन के साथ प्रभु नाम सुमिरन करता है।

अपने ह्रदय में विश्वास के साथ मेरे नाम का निरतर जाप करना वेदो के अनुसार पांचवी भक्ति है।

छठवीं भक्ति है, जो शीलवान पुरुष अपने ज्ञान और कर्मेन्द्रियों पर नियंत्रण रखते हुए भगवद् सुमिरन करते हैं।

सातवीं भक्ति है कि पूरी दुनिया को भगवान् के रूप में देखना चाहिए और संत जनो को भगवन से ऊपर का पद देना चाहिए।

आठवीं भक्ति है कि जिन मिले उतना में ही संतुष्ट हो जाना। सभी इक्छा का कामना छोड़ कर सपने में भी किसी का बुरा मत सोचना।

नवम भक्ति है कि एक छोटे बच्चे कि तरह बन कर अपने आप को पूरी तरह भगवन को सौप दे और अपना हर कार्य और जीवन चलने का बिनती भगवन से करे। जब पूरे जगत के रचेता तुम्हारा जीवन चलाएंगे तो भला कोई बुरा जीवन में कभी आ सकता है?

श्री रामचन्द्र जी महतपस्विनि माता शबरी से कहते है कि इन भक्तियो में से एक भी किसी के पास हो तो वह प्राणी मुझे बहुत प्रिये है और तुम में तो यह सभी भक्ति है। तुम धन्य हो माता तुम धन्य हो।

श्रीमद् भागवत महापुराण में नवधा भक्ति के बारे में क्या बताया?

प्रह्लाद जी द्वारा कही गई नवधा भक्ति श्रीमद् भागवत महापुराण के सातवें स्कन्ध के पांचवें अध्याय में है। वह इस प्रकार है:

हिरण्यकशिपु पुत्र प्रेम में विभोर होकर प्रसन्न मुख प्रह्लाद को अपनी गोद में बैठाकर पूछा -

भागवत पुराण ७.५.२२
प्रह्रादानूच्यतां तात स्वधीतं किञ्चिदुत्तमम्।
कालेनैतावतायुष्मन्यदशिक्षद्गुरोर्भवान्॥

हिरण्यकशिपु ने कहा, "बेटा प्रह्राद! इतने दिनों में तुमने गुरु जी से जो शिक्षा प्राप्त की है, उनमें से कोई अच्छी-सी बात हमें सुनाओ।"

भागवत पुराण ७.५.२३-२५
श्रवणं कीर्तनं विष्णोः स्मरणं पादसेवनम्।
अर्चनं वन्दनं दास्यं सख्यमात्मनिवेदनम्॥
इति पुंसार्पिता विष्णौ भक्तिश्चेन्नवलक्षणा।
क्रियेत भगवत्यद्धा तन्मन्येऽधीतमुत्तमम्॥

तब प्रह्लाद जी कहते है, "पिताश्री! विष्णु भगवान की भक्ति में नौ भेद है भगवान के गुण-लीला आदि का श्रवण,कीर्तन, रूप-नाम आदि का स्मरण, उनके चरणों की सेवा (पाद सेवन), पूजा-अर्चन, वन्दन, दास्य, सख्य और आत्मनिवेदन। यदि भगवान के प्रति समर्पण के भाव से यह नौ प्रकार की भक्ति की जाय, तो मैं उसी को उत्तम अध्ययन को समझता हूँ।"

श्रवण:
भगवान के चरित्र, लीला, महिमा, गुण, नाम तथा उनके प्रेम एवं प्रभावों की बातों का श्रद्धापूर्वक सदा सुनना और उसी के अनुसार आचरण करने की चेष्टा करना, श्रवण भक्ति है। श्रवण का अर्थ सुनना होता है इस प्रकार की भक्ति में भक्त सुनकर ईश्वर के प्रति अपने प्रेम को बढ़ाता है।

कीर्तन:
भगवान की लीला, कीर्ति, शक्ति, महिमा, चरित्र, गुण, नाम आदि का प्रेमपूर्वक करना कीर्तन भक्ति है। श्रीनारद, व्यास, वालमीकि, शुकदेव, चैतन्य महाप्रभु आदि इसी श्रेणी के भक्त माने जाते है। ऐसी मान्यता है कि कीर्तन के समय भक्त प्रभु के सबसे निकट होता है। इस कीर्तन भक्ति में प्रभु के भजन को गाकर भक्त अपने भावों को दृढ़ करता है।

स्मरण:
सदा अन्नय भाव से भगवान के गुण प्रभाव सहित उनके स्वरूप का चिन्तन करना और बारम्बार उनपर मुग्ध होना स्मरण भक्ति है। स्मरण का अर्थ याद करना है। थोड़े-थोड़े समय बाद प्रभु को याद करते रहना इस भक्ति में आता है। प्रहलाद, धुव्र, भरत, भीष्म, गोपियां आदि इसी श्रेणी के भक्त है।

चरणसेवन:
भगवान के जिस रूप की उपासना करते हो, उसी का चरण सेवन करना या सब में ईश्वर को देखकर उन्हें प्रणाम करना। इस भक्ति में भगवान के चरणों की आराधना का महत्व है।

पूजन:
अपनी रुचि के अनुसार भगवान की किसी मूर्ति या मानसिक स्वरूप का नित्य भक्तिपूर्वक पूजन करना। नित्य दीप प्रज्जवलित कर भगवान की आरती व पूजा करना इस भक्ति के अंतर्गत आता है। राजा पृथु, अम्बरीष आदि इसी श्रेणी के भक्त है।

वन्दन:
ईश्वर या समस्त जग को ईश्वर का स्वरूप समझकर वन्दन करना वन्दन भक्ति है। जब भी ईश्वर के किसी भी स्वरूप के दर्शन हो तो वन्दन करने से इस प्रकार की भक्ति बढ़ती है। अक्रूर वन्दन भक्त है।

दास्य:
ईश्वर को अपना मालिक मन से स्वीकार कर स्वयं को उनका दास मान लेना दास्य भक्ति है। ईश्वर की सेवा कर प्रसन्न होना। भगवान को अपना सर्वस्व मान लेना दास्य भक्ति कहलाता है। हनुमानजी और लक्ष्मण जी दास्य भाव के भक्त है।

सख्य:
भगवान को अपना परम हितकारी मानकर उन्हें अपना दोस्त मान लेना सख्य भाव की भक्ति है। यह अत्यंत सरल भक्ति है। जिस प्रकार अपने दोस्त के साथ संबंध होते है ठीक उसी प्रकार ईश्वर को अपना मित्र मानना। अर्जुन, उद्धव, सुदामा इस श्रेणी के भक्त है।

आत्मनिवेदन या समर्पण :
अंहकार रहित होकर अपना सर्वस्व ईश्वर को अर्पण कर देना। स्वयं को ईश्वर को मन से सौप देना आत्मनिवेदन या समर्पण भक्ति कहलाता है। महाराज बलि, गोपियां आदि इसी श्रेणी के भक्त है।

👌👌👌👌👌       "मिडिल-क्लास"  का होना भी        किसी वरदान से कम नहीं है.          कभी बोरियत नहीं होती.      जिंदगी भर कुछ...
27/09/2025

👌👌👌👌👌
"मिडिल-क्लास" का होना भी
किसी वरदान से कम नहीं है.
कभी बोरियत नहीं होती.

जिंदगी भर कुछ ना कुछ आफत
लगी ही रहती है.

मिडिल क्लास वालों की स्थिति
सबसे दयनीय होती है,

न इन्हें तैमूर जैसा बचपन नसीब होता है
न अनूप जलोटा जैसा बुढ़ापा, फिर भी
अपने आप में उलझते हुए
व्यस्त रहते हैं.

मिडिल क्लास होने का भी
अपना फायदा है.
चाहे BMW का भाव बढ़े या AUDI का
या फिर नया i phone लाँच हो जाये,
कोई फर्क नहीं पड़ता.

मिडिल क्लास लोगों की
आधी जिंदगी तो ... झड़ते हुए बाल
और बढ़ते हुए पेट को रोकने में ही
चली जाती है.

इन घरों में पनीर की सब्जी तभी बनती है,
जब दूध गलती से फट जाता है, और
मिक्स-वेज की सब्ज़ी भी तभी बनती हैं
जब रात वाली सब्जी बच जाती है.

इनके यहाँ फ्रूटी, कोल्ड ड्रिंक
एक साथ तभी आते हैं , जब घर में कोई
बढ़िया वाला रिश्तेदार आ रहा होता है.

मिडिल क्लास वालों के यहाँ
कपड़ों की तरह ही
खाने वाले चावल की भी
तीन वेराईटी होती है ~
डेली, कैजुवल और पार्टी वाला.

छानते समय चायपत्ती को दबा कर
लास्ट बून्द तक निचोड़ लेना ही
मिडिल क्लास वालों के लिए
परमसुख की अनुभुति होती है.

ये लोग रूम फ्रेशनर का इस्तेमाल
नहीं करते, सीधे
अगरबत्ती जला लेते हैं.

मिडिल क्लास भारतीय परिवार के
घरों में Get together नहीं होता,
यहाँ 'सत्यनारायण भगवान की'
कथा होती है.

इनका फैमिली बजट इतना
सटीक होता है, कि सैलरी अगर
31 के बजाय 1 को आये, तो
गुल्लक फोड़ना पड़ जाता है.

मिडिल क्लास लोगों की
आधी ज़िन्दगी तो
"बहुत महँगा है" बोलने में ही
निकल जाती है.

इनकी "भूख" भी ...
होटल के रेट्स पर डिपेंड करती है.
दरअसल ....
महंगे होटलों की मेन्यू-बुक में
मिडिल क्लास इंसान
'फूड-आइटम्स' नहीं बल्कि
अपनी "औकात" ढूंढ रहा होता है.

इश्क-मोहब्बत तो
अमीरों के चोंचले हैं.
मिडिल क्लास वाले तो सीधे
"ब्याह" करते हैं.

इनके जीवन में कोई
वैलेंटाइन नहीं होता.
"जिम्मेदारियाँ" जिंदगी भर
बजरंग-दल सी ... पीछे लगी रहती हैं.

मध्यम वर्गीय दूल्हा-दुल्हन भी
मंच पर ऐसे बैठे रहते हैं मानो जैसे
किसी भारी सदमे में हों.

अमीर शादी के बाद
हनीमून पर चले जाते हैं , और
मिडिल क्लास लोगों की शादी के बाद
टेन्ट बर्तन वाले ही
इनके पीछे पड़ जाते हैं.

मिडिल क्लास बंदे को
पर्सनल बेड और रूम भी
शादी के बाद ही अलाॅट हो पाता है.

मिडिल क्लास ... बस ये समझ लो कि
जो तेल सर पे लगाते हैं , वही तेल
मुँह पर भी रगड़ लेते हैं.

एक सच्चा मिडिल क्लास आदमी
गीजर बंद करके
तब तक नहाता रहता है
जब तक कि नल से
ठंडा पानी आना शुरू ना हो जाए.

रूम ठंडा होते ही AC बंद करने वाला
मिडिल क्लास आदमी चंदा देने के वक्त
नास्तिक हो जाता है, और
प्रसाद खाने के वक्त आस्तिक.

दरअसल मिडिल-क्लास तो
चौराहे पर लगी घण्टी के समान है,
जिसे लूली-लगंड़ी, अंधी-बहरी,
अल्पमत-पूर्णमत
हर प्रकार की सरकार
पूरा दम से बजाती है.

मिडिल क्लास को आज तक बजट में
वही मिला है, जो अक्सर हम
🔔 मंदिर में बजाते हैं. 🔔

फिर भी हिम्मत करके
मिडिल क्लास आदमी
पैसा बचाने की
बहुत कोशिश करता है,
लेकिन
बचा कुछ भी नहीं पाता.

हकीकत में मिडिल मैन की हालत
पंगत के बीच बैठे हुए
उस आदमी की तरह होती है
जिसके पास पूड़ी-सब्जी
चाहे इधर से आये, चाहे उधर से
उस तक आते-आते
खत्म हो जाती है.

मिडिल क्लास के सपने भी
लिमिटेड होते हैं.
"टंकी भर गई है, मोटर बंद करना है"
गैस पर दूध उबल गया है,
चावल जल गया है,
इसी टाईप के सपने आते हैं.😁

दिल में अनगिनत सपने लिए
बस चलता ही जा ता है ...
चलता ही जाता है.

🌹🌷 राधे राधे 🌷🌹
🙏🙏
#

काशी में मणिकर्णिका घाट पर चिता जब शांत हो जाती है तब मुखाग्नि देने वाला व्यक्ति चिता भस्म पर 94 लिखता है। यह सभी को नही...
26/09/2025

काशी में मणिकर्णिका घाट पर चिता जब शांत हो जाती है तब मुखाग्नि देने वाला व्यक्ति चिता भस्म पर 94 लिखता है।

यह सभी को नहीं मालूम है। खांटी बनारसी लोग या अगल बगल के लोग ही इस परम्परा को जानते हैं। बाहर से आये शवदाहक जन इस बात को नहीं जानते।

जीवन के शतपथ होते हैं। 100 शुभ कर्मों को करने वाला व्यक्ति मरने के बाद उसी के आधार पर अगला जीवन शुभ या अशुभ प्राप्त करता है। 94 कर्म मनुष्य के अधीन हैं। वह इन्हें करने में समर्थ है पर 6 कर्म का परिणाम ब्रह्मा जी के अधीन होता है।हानि-लाभ, जीवन-मरण, यश- अपयश ये 6 कर्म विधि के नियंत्रण में होते हैं।

अतः आज चिता के साथ ही तुम्हारे 94 कर्म भस्म हो गये। आगे के 6 कर्म अब तुम्हारे लिए नया जीवन सृजित करेंगे।
अतः 100 - 6 = 94 लिखा जाता है।

गीता में भी प्रतिपादित है कि मृत्यु के बाद मन अपने साथ 5 ज्ञानेन्द्रियों को लेकर जाता है। यह संख्या 6 होती है। मन और पांच ज्ञान इन्द्रियाँ।
अगला जन्म किस देश में कहाँ और किन लोगों के बीच होगा यह प्रकृति के अतिरिक्त किसी को ज्ञात नहीं होता है। अतः 94 कर्म भस्म हुए 6 साथ जा रहे हैं।
विदा यात्री। तुम्हारे 6 कर्म तुम्हारे साथ हैं।

आपके लिए इन 100 शुभ कर्मों का विस्तृत विवरण दिया जा रहा है जो जीवन को धर्म और सत्कर्म की ओर ले जाते हैं एवं यह सूची आपके जीवन को सत्कर्म करने की प्रेरणा देगी......

100 शुभ कर्मों की गणना
धर्म और नैतिकता के कर्म-
1.सत्य बोलना
2.अहिंसा का पालन
3.चोरी न करना
4.लोभ से बचना
5.क्रोध पर नियंत्रण
6.क्षमा करना
7.दया भाव रखना
8.दूसरों की सहायता करना
9.दान देना (अन्न, वस्त्र, धन)
10.गुरु की सेवा
11.माता-पिता का सम्मान
12.अतिथि सत्कार
13.धर्मग्रंथों का अध्ययन
14.वेदों और शास्त्रों का पाठ
15.तीर्थ यात्रा करना
16.यज्ञ और हवन करना
17.मंदिर में पूजा-अर्चना
18.पवित्र नदियों में स्नान
19.संयम और ब्रह्मचर्य का पालन
20.नियमित ध्यान और योग
सामाजिक
और पारिवारिक कर्म
21.परिवार का पालन-पोषण
22.बच्चों को अच्छी शिक्षा देना
23.गरीबों को भोजन देना
24.रोगियों की सेवा
25.अनाथों की सहायता
26.वृद्धों का सम्मान
27.समाज में शांति स्थापना
28.झूठे वाद-विवाद से बचना
29.दूसरों की निंदा न करना
30.सत्य और न्याय का समर्थन
31.परोपकार करना
32.सामाजिक कार्यों में भाग लेना
33.पर्यावरण की रक्षा
34.वृक्षारोपण करना
35.जल संरक्षण
36.पशु-पक्षियों की रक्षा
37.सामाजिक एकता को बढ़ावा देना
38.दूसरों को प्रेरित करना
39.समाज में कमजोर वर्गों का उत्थान
40.धर्म के प्रचार में सहयोग
आध्यात्मिक.और.व्यक्तिगत.कर्म
41.नियमित जप करना
42.भगवान का स्मरण
43.प्राणायाम करना
44.आत्मचिंतन
45.मन की शुद्धि
46.इंद्रियों पर नियंत्रण
47.लालच से मुक्ति
48.मोह-माया से दूरी
49.सादा जीवन जीना
50.स्वाध्याय (आत्म-अध्ययन)
51.संतों का सान्निध्य
52.सत्संग में भाग लेना
53.भक्ति में लीन होना
54.कर्मफल भगवान को समर्पित करना
55.तृष्णा का त्याग
56.ईर्ष्या से बचना
57.शांति का प्रसार
58.आत्मविश्वास बनाए रखना
59.दूसरों के प्रति उदारता
60.सकारात्मक सोच रखना
सेवा.और.दान.के.कर्म
61.भूखों को भोजन देना
62.नग्न को वस्त्र देना
63.बेघर को आश्रय देना
64.शिक्षा के लिए दान
65.चिकित्सा के लिए सहायता
66.धार्मिक स्थानों का निर्माण
67.गौ सेवा
68.पशुओं को चारा देना
69.जलाशयों की सफाई
70.रास्तों का निर्माण
71.यात्री निवास बनवाना
72.स्कूलों को सहायता
73.पुस्तकालय स्थापना
74.धार्मिक उत्सवों में सहयोग
75.गरीबों के लिए निःशुल्क भोजन
76.वस्त्र दान
77.औषधि दान
78.विद्या दान
79.कन्या दान
80.भूमि दान
नैतिक.और.मानवीय.कर्म
81.विश्वासघात न करना
82.वचन का पालन
83.कर्तव्यनिष्ठा
84.समय की प्रतिबद्धता
85.धैर्य रखना
86.दूसरों की भावनाओं का सम्मान
87.सत्य के लिए संघर्ष
88.अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाना
89.दुखियों के आँसू पोंछना
90.बच्चों को नैतिक शिक्षा
91.प्रकृति के प्रति कृतज्ञता
92.दूसरों को प्रोत्साहन
93.मन, वचन, कर्म से शुद्धता
94.जीवन में संतुलन बनाए रखना
विधि के अधीन.
6 कर्म
95.हानि
96.लाभ
97.जीवन
98.मरण
99.यश
100.अपय

पूजा करते समय इन बातों का ध्यान दें
10/09/2025

पूजा करते समय इन बातों का ध्यान दें

30/08/2025

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