Iskcon Sri Sri Radha Govind Temple

Iskcon Sri Sri Radha Govind Temple Krishna consciousness

22/05/2026
*कृष्णा के मुकुट पर सिर्फ मोर पंख ही क्यों*कृष्णा के मुखुट पर मोरपंख होने के बहुत सारे कारण विद्वान् व्यक्ति देते आये है...
22/05/2026

*कृष्णा के मुकुट पर सिर्फ मोर पंख ही क्यों*

कृष्णा के मुखुट पर मोरपंख होने के बहुत सारे कारण विद्वान् व्यक्ति देते आये है जिनमे से कुछ इस तरह है |
१) मोर एकमात्र ऐसा प्राणी है जो सम्पूर्ण जीवन में ब्रह्मचर्य का पालन करता है | मोरनी का गर्भ भी मोर के आंसुओ को पीकर ही धारण होता है | इत: इतने पवित्र पक्षी के पंख भगवान खुद अपने सर पर सजाते है |
२) भगवान कृष्णा मित्र और शत्रु के लिए समान भावना रखते है इसके पीछे भी मोरपंख का उद्दारण देखकर हम यह कह सकते है | कृष्णा के भाई थे शेषनाग के अवतार बलराम और नागो के दुश्मन होते है मोर | अत: मोरपंख सर पर लगाके कृष्णा का यह सभी को सन्देश है की वो सबके लिए समभाव रखते है |
३) राधा भी बनी मोरमुकुट का कारण :
कहते है की राधा जी के महलो में बहुत सारे मोर हुआ करते थे | जब कृष्णा की बांसुरी पर राधा नाचती थी तब उनके साथ वो मोर भी नाचा करते थे | तब एक दिन किसी मोर का पंख नृत्य करते करते गिर गया | कृष्णा ने उसे झट से उताकर अपने सिर पर सज्जा लिया | उनके लिए यह राधा के प्रेम की धरोहर ही थी |
४) मोरपंख में सभी रंग है गहरे भी और हलके भी | कृष्णा अपने भक्तो को ऐसे रंगों को देखकर यही सन्देश देते है जीवन ही इस तरह सभी रंगों से भरा हुआ है कभी सुख, कभी दुख।
#वैष्णवअपराध #श्रीमद्भागवतम् #श्रीचैतन्यमहाप्रभु

🌿 **वैष्णव अपराध — भक्ति रूपी लता का विनाशक** 🌿📚📖शास्त्रों में कहा गया है कि भगवान के प्रति किया गया अपराध क्षमा हो सकता...
21/05/2026

🌿 **वैष्णव अपराध — भक्ति रूपी लता का विनाशक** 🌿

📚📖शास्त्रों में कहा गया है कि भगवान के प्रति किया गया अपराध क्षमा हो सकता है🙌
🙂‍↕️परंतु भगवान के शुद्ध भक्तों के प्रति किया गया अपराध अत्यंत भयावह माना गया है।👺
इसीलिए वैष्णव अपराध को भक्ति मार्ग में “मत्त हाथी” 🦣के समान बताया गया है, जो साधक की वर्षों की साधना और भक्ति रूपी लता को नष्ट कर देता है।🌿🌿🌿✅✅

📖 **🌹श्री चैतन्य चरितामृत** में कहा गया है —🌹

🙏*"वैष्णव-अपराध उठे हाथी माता।
उपाड़े वा छिन्दे, तारा शुकि' याय पाता॥"*😢

अर्थात — वैष्णव अपराध पागल हाथी 🦣के समान है, जो भक्ति की लता को जड़ सहित उखाड़ देता है।🌿✅

📖 **पद्म पुराण** के अनुसार, भगवान के भक्तों के प्रति अनादर, द्वेष, निंदा या अपमान ही वैष्णव अपराध कहलाता है।🪷✅✅

✨ **वैष्णव अपराध के मुख्य रूप** ✨

🔸 वैष्णव को शारीरिक कष्ट देना
🔸 भक्तों की निंदा या आलोचना करना
🔸 मन में द्वेष या ईर्ष्या रखना
🔸 सामने होने पर भी आदरपूर्वक प्रणाम न करना
🔸 बिना कारण क्रोधित होना
🔸 भक्तों को देखकर प्रसन्न न होना

📖 **श्रीमद्भागवत (3.15.25)** में भगवान कहते हैं —

*"ये मे भक्तजनाः पार्थ न मे भक्ताश्च ते जनाः।
मद्भक्तानां च ये भक्तास्ते मे भक्ततमा मताः॥"*

अर्थात — जो केवल मेरे भक्त हैं, वे मेरे श्रेष्ठ भक्त नहीं; जो मेरे भक्तों के भक्त हैं, वही मुझे सबसे प्रिय हैं।

🌸 **वैष्णव अपराध से बचने का उपाय** 🌸

✅ सदैव विनम्र रहना
✅ भक्तों का सम्मान और सेवा करना
✅ किसी की निंदा से दूर रहना
✅ अपराध हो जाए तो सच्चे हृदय से क्षमा मांगना
✅ साधु-संग और हरिनाम में स्थिर रहना👳

🙏 आइए, हम सभी अपने जीवन में नम्रता, सेवा और वैष्णव सम्मान को अपनाकर श्री हरि की कृपा प्राप्त करें।🙌🙌🙂‍↕️

🪷वांछा कल्पतरुभ्यश्च कृपा-सिन्धुभ्य एव च,
पतितानां पावनेभ्यो वैष्णवेभ्यो नमो नमः।"👏👏

📖अर्थ: मैं भगवान के उन सभी भक्तों (वैष्णवों) को बारंबार प्रणाम करता हूँ, जो सभी की इच्छाएं पूरी करने में कल्पतरु (इच्छा पूरी करने वाला वृक्ष) के समान हैं, जो दया के सागर हैं, और जो पतितों (गिरे हुए लोगों) का भी उद्धार करने वाले हैं।✅✅

✨ **हरिनाम से बढ़कर कुछ नहीं, और वैष्णव सेवा से श्रेष्ठ
कोई साधना नहीं।** ✨

🇭 🇦 🇷 🇪 🇰 🇷 🇮 🇸 🇭 🇳 🇦

🪷महामंत्र सदा जपे🪷👏 📿
और प्रसन्न रहे 😊
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे।
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे।।
✍️आपका तुच्छ दास
🌿 रघुकुल विभूषण दास 🌿
#वैष्णवअपराध #श्रीचैतन्यमहाप्रभु #भक्तिसाधना #हरिनाम #वैष्णवसेवा #श्रीमद्भागवतम् #भक्ति #सनातनधर्म #हरेकृष्ण

✨ *दूसरों में गुण देखने की कला* ✨🛕एक बार की बात है, कोलकाता मंदिर में एक शराबी व्यक्ति नशे की हालत में मंदिर में आ गया। ...
20/05/2026

✨ *दूसरों में गुण देखने की कला* ✨

🛕एक बार की बात है, कोलकाता मंदिर में एक शराबी व्यक्ति नशे की हालत में मंदिर में आ गया। कुछ भक्तों ने यह देखकर तुरंत श्रील प्रभुपाद जी के पास जाकर कहा —
“प्रभुपाद जी! एक शराबी मंदिर में घुस आया है।”👏

🌹लेकिन प्रभुपाद जी शांत रहे और अपने पुस्तक अनुवाद कार्य में लगे रहे।🙂‍↕️

,🌹दूसरे दिन वह व्यक्ति पहले से भी अधिक नशे में मंदिर आया। भक्तों ने फिर जाकर कहा —
“प्रभुपाद जी! आज फिर वही शराबी मंदिर में आ गया है।”

फिर भी प्रभुपाद जी मौन रहे।🙂‍↕️

,🌿तीसरे दिन वह व्यक्ति इतना नशे में था कि मंदिर में प्रवेश करते ही गिर पड़ा। भक्त दौड़ते हुए प्रभुपाद जी के पास गए और बोले —
“प्रभुपाद जी! आज तो उसने हद कर दी, वह होश में भी नहीं है और आते ही गिर गया।”✅

तभी प्रभुपाद जी मुस्कुराकर बोले —😊
“वह तो राधा-गोविंद जी को प्रणाम कर रहा है।”👏👏

🌸 यही महानता थी श्रील प्रभुपाद जी की —
वे हर व्यक्ति में दोष नहीं, गुण देखते थे।😊

🌿जब तक हम दूसरों की कमियाँ देखते रहेंगे, तब तक भगवान हमें नहीं देखेंगे।✅
लेकिन जिस दिन हम दूसरों के भीतर अच्छाई और गुण देखने लगेंगे, उसी दिन से भगवान की कृपा-दृष्टि हम पर पड़ने लगेगी। ✨✅✅
🇭 🇦 🇷 🇪 🇰 🇷 🇮 🇸 🇭 🇳 🇦

🪷महामंत्र सदा जपे🪷👏 📿
और प्रसन्न रहे 😊
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे।
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे।।
✍️आपका तुच्छ दास
🌿रघुकुल विभूषण दास
#श्रीलप्रभुपाद
#राधागोविंद
#भक्ति
#वैष्णव
#कृष्णभक्ति
#सनातनधर्म
#भक्तिवेदांत
#हरेकृष्ण






18/05/2026

Hare Krishna 🙏🙏

नैमिषारण्य में ऋषियों की सभा: सूतजी का आगमन, ऋषियों ने सांसारिक बातें छोड़ केवल अमृतमयी भगवद्-कथा सुनाने की प्रार्थना की...
18/05/2026

नैमिषारण्य में ऋषियों की सभा: सूतजी का आगमन, ऋषियों ने सांसारिक बातें छोड़ केवल अमृतमयी भगवद्-कथा सुनाने की प्रार्थना की।

✨ ॥ श्री पुरुषोत्तम मास महात्म्य ॥ ✨
​॥ द्वितीय अध्याय ॥

॥ प्रश्नविधिर्नाम (२/३१) ॥

सूतजी बोले – राजा परीक्षित् के पूछने पर भगवान् शुक द्वारा कथित परम पुण्यप्रद श्रीमद्भागवत शुकदेवजी के प्रसाद से सुनकर अनन्तर राजा का मोक्ष भी देख कर ॥ १ ॥

अब यहाँ यज्ञ करने को उद्यत ब्राह्मणों को देखने के लिये मैं आया हूँ और यहाँ यज्ञ में दीक्षा लिये हुए ब्राह्मणों का दर्शन कर मैं कृतार्थ हुआ ॥ २ ॥

ऋषि बोले – हे साधो! अन्य विषय की बातों को त्यागकर भगवान् कृष्णद्वैपायन के प्रसाद से उनके मुख से जो आपने सुना है वही अपूर्व विषय हे सूत! आप हम लोगों से कहिये॥ ३ ॥

हे महाभाग! संसार में जिससे परे कोई सार नहीं है, ऐसी मन को प्रसन्न करने वाली और जो सुधा से भी अधिकतर हितकर है ऐसी पुण्य कथा, हम लोगों को सुनाइये॥ ४ ॥

सूतजी बोले – विलोम (ब्राह्मण के चरु में क्षत्रिय का चरु मिल जाने) से उत्पन्न होने पर भी मैं धन्य हूँ जो श्रेष्ठ पुरुष भी आप लोग मुझसे पूछ रहे हैं, भगवान् व्यास के मुख से जो मैंने सुना है वह यथाज्ञान मैं कहता हूँ ॥ ५ ॥

एक समय नारदमुनि नरनारायण के आश्रम में गये, जो आश्रम बहुत से तपस्वियों, सिद्धों तथा देवताओं से भी युक्त है॥ ६ ॥

और बैर, बहेड़ा, आँवला, बेल, आम, अमड़ा, कैथ, जामुन, कदम्बादि और भी अनेक वृक्षों से सुशोभित है ॥ ७ ॥

भगवान् विष्णु के चरणों से निकली हुई पवित्र गंगा और अलकनन्दा भी जहाँ बह रही है, ऐसे नर नारायण के स्थान में श्री नारद मुनि ने जाकर महामुनि नारायण को प्रणाम किया ॥ ८ ॥

और परब्रह्म की चिन्ता में लगा हुआ है मन जिसका ऐसे, जितेन्द्रिय, काम क्रोधादि छओ शत्रुओं को जीते हुए, निर्मल, चमक रही है अत्यन्त प्रभा जिनके शरीर से, ऐसे देवताओं के भी देव, तपस्वी नारायण को साष्टांग दण्डवत् प्रणाम कर और हाथ जोड़कर नारद उस मुनि व्यापक प्रभु की स्तुति करने लगे ॥ ९-१० ॥

नारदजी बोले – हे देवदेव! हे जगन्नाथ! हे कृपासागर सत्पते! आप सत्यव्रत हो, त्रिसत्य हो, सत्य आत्मा हो, और सत्यसम्भव हो ॥ ११ ॥

हे सत्ययोने! आप को नमस्कार है, मैं आपकी शरण में आया हूँ, आपका जो तप है वह सम्पूर्ण प्राणियों की शिक्षा के लिये और मर्यादा की स्थापना के लिये है ॥ १२ ॥

यदि आप तपस्या न करें तो – जैसे कलियुग में एक के पाप करने से सारी पृथ्वी डूबती है, वैसे ही एक के पुण्य करने से सारी पृथ्वी तरती है, इसमें तनिक भी संशय नहीं है ॥ १३ ॥

‘पहिले सत्ययुग आदि में जैसे एक पाप करता था, तो सभी पापी हो जाते थे’ ऐसी स्थिति हटाकर कलियुग में केवल कर्ता ही पापों से लिप्त होता है, यह आप के तप की स्थिति है, हे भगवन्! कलि में जितने प्राणी हैं सब विषयों में आसक्त हैं ॥ १४-१५ ॥

स्त्री, पुत्र गृह में लगा है, चित्त जिनका ऐसे प्राणियों का हित करने वाला जो हो और मेरा भी थोड़ा कल्याण हो ऐसा विषय विचार कर आप कहने के योग्य हैं ॥ १६ ॥

आपके मुख से सुनने की इच्छा से मैं ब्रह्मलोक से यहाँ आया हूँ, उपकारप्रिय विष्णु हैं ऐसा वेदों में निश्रित है ॥ १७ ॥
इसलिये लोकोपकार के लिये कथा का सार इस समय आप सुनाइये, जिसके श्रवणमात्र से निर्भय मोक्षपद को प्राप्त करते हैं ॥ १८ ॥

इस प्रकार नारदजी का वचन सुन भगवान्‌ ऋषि आनन्द से खिलखिला उठे और भुवन को पवित्र करने वाली पुण्यकथा आरम्भ की ॥ १९ ॥

श्रीनारायण बोले – गोपों की स्त्रियों के मुखकमल के भ्रमर, रास के ईश्‍वर, रसिकों के आभरण, वृन्दावनबिहारी, व्रज के पति आदिपुरुष भगवान् की पुण्य कथा को कहते हैं, हे नारद! आप सुनो ॥ २० ॥

जो निमेषमात्र समय में जगत्‌ को उत्पन्न करने वाले हैं, उनके कर्मों को हे वत्स! इस पृथ्वी पर कौन वर्णन कर सकता है? हे नारदमुने! आप भी भगवान्‌ के चरित्र का सरस सार जानते हैं और यह भी जानते हैं कि भगवच्चरित्र वाणी द्वारा नहीं कहा जा सकता ॥ २१ ॥

तथापि अद्भुत पुरुषोत्तम माहात्म्य आदर से कहते हैं, यह पुरुषोत्तम माहात्म्य दरिद्रता और वैधव्य को नाश करने वाला, यश का दाता एवं सत्पुत्र और मोक्ष को देने वाला है, अतः शीघ्र ही इसका प्रयोग करना चाहिये ॥ २२ ॥

नारद बोले – हे मुने! पुरुषोत्तम नामक कौन देवता हैं? उनका माहात्म्य क्या है? यह अद्‌भुत-सा प्रतीत होता है, अतः आप मुझसे विस्तारपूर्वक कहिये ॥ २३ ॥

सूतजी बोले – श्रीनारद का वचन सुन नारायण क्षणमात्र पुरुषोत्तम में अच्छी तरह मन लगाकर बोले ॥ २४ ॥

श्रीनारायण बोले – ‘पुरुषोत्तम’ यह मास का नाम जो पड़ा है, वह भी कारण से युक्त, पुरुषोत्तम मास के स्वामी दयासागर पुरुषोत्तम ही हैं ॥ २५ ॥

इसीलिये ऋषिगण इसको पुरुषोत्तमास कहते हैं, पुरुषोत्तम मास के व्रत करने से भगवान् पुरुषोत्तम प्रसन्न होते हैं ॥ २६ ॥
नारदजी बोले – चैत्रादि मास जो हैं, वे अपने-अपने स्वामी देवताओं से युक्त हैं, ऐसा मैंने सुना है, परन्तु उनके बीच में पुरुषोत्तम नाम का मास नहीं सुना है ॥ २७ ॥

पुरुषोत्तम मास कौन हैं? और पुरुषोत्तम मास के स्वामी कृपा के निधि पुरुषोत्तम कैसे हुए? हे कृपानिधे! यह आप मुझसे कहिये ॥ २८ ॥

इस मास का स्वरूप विधान के सहित हे प्रभो! कहिये, हे सत्पते! इस मास में क्या करना? कैसे स्‍नान करना? क्या दान करना? ॥ २९ ॥

इस मास का जप पूजा उपवास आदि क्या साधन है? कहिये, इस मास के विधान से कौन देवता प्रसन्न होते हैं? और क्या फल देते हैं? ॥ ३० ॥

इसके अतिरिक्त और जो कुछ भी तथ्य हो वह हे तपोधन! कहिये, साधु दीनों के ऊपर कृपा करने वाले होते हैं, वे बिना पूछे कृपा करके सदुपदेश दिया करते हैं ॥ ३१ ॥

इस पृथ्वी पर जो मनुष्य दूसरों के भाग्य के अनुवर्ती, दरिद्रता से पीड़ित, नित्य रोगी रहने वाले, पुत्र चाहने वाले ॥ ३२ ॥

जड़, गूँगे, ऊपर से अपने को बड़े धार्मिक दरसाने वाले, विद्या विहीन, मलिन वस्त्रों को धारण करने वाले, नास्तिक, परस्त्रीगामी, नीच, जर्जर, दासवृत्ति करने वाले ॥ ३३ ॥

आशा जिनकी नष्ट हो गयी है, संकल्प जिनके भग्न हो गये हैं, तत्त्व जिनके क्षीण हो गये हैं, कुरुपी, रोगी, कुष्ठी, टेढ़े-मेढ़े अंग वाले, अन्धे ॥ ३४ ॥

इष्टवियोग, मित्रवियोग, स्त्रीवियोग, आप्तपुरुषवियोग, मातापिताविहीन, शोक दुःख आदि से सूख गये हैं अंग जिनके, अपनी इष्ट वस्तु से रहित उत्पन्न हुआ करते हैं ॥ ३५ ॥

वैसे जिस अनुष्ठान के करने और सुनने से, पुनः उत्पन्न न हों, हे प्रभो! ऐसा प्रयोग हमको सुनाइये ॥ ३६ ॥

वैधव्य, वन्ध्यादोष, अंगहीनता, दुष्ट व्याधियाँ, रक्तपित्त आदि, मिर्गी राजयक्ष्मादि जो दोष हैं ॥ ३७ ॥

इन दोषों से दुःखित मनुष्यों को देखकर हे जगन्नाथ! मैं दुःखी हूँ, अतः मेरे ऊपर दया करके ॥ ३८ ॥

हे ब्रह्मन्! मेरे मन को प्रसन्न करने वाले विषय को विस्तार से कहिये, हे प्रभो! आप सर्वज्ञ हैं, समस्त तत्त्वों के आयतन हैं ॥ ३९ ॥

सूतजी बोले – इस प्रकार नारद के परोपकारी मधुर वचनों को सुन कर देवदेव नारायण, चन्द्रमा की तरह शान्त महामुनि नारद से नये मेघ के समान गम्भीर वचन बोले ॥ ४० ॥

॥ इति श्रीबृहन्नारदीये पुरुषोत्तममासमाहात्म्ये द्वितीयोऽध्यायः समाप्त ॥ २ ॥

​🙏 ऋषियों और नारद जी की तरह हमारे जीवन के दुखों को भी केवल भगवान की कथा ही दूर कर सकती है। आपको यह अध्याय कैसा लगा, हमें कमेंट में जरूर बताएं। सनातन धर्म के प्रचार-प्रसार के लिए 'सनातन पंचांग' पेज को फॉलो करें और इस पोस्ट को अपने मित्रों के साथ शेयर करें। 🙏

🦚 ॐ नमो भगवते वासुदेवाय 🦚

​ #सनातन_पंचांग #पुरुषोत्तम_मास_महात्म्य #पुरुषोत्तम_मास #अधिक_मास #मलमास #श्री_पुरुषोत्तम_माहात्म्य #भागवत_कथा #नारद_नारायण_संवाद #सूत_जी #नैमिषारण्य #भगवान_विष्णु #वासुदेव #धार्मिक_कथा #सनातन_धर्म

🌺✨ पुरुषोत्तम मास महिमा ✨🌺“कलियुग में भगवान श्रीकृष्ण की विशेष कृपा प्राप्त करने का दिव्य अवसर” 🙏📖 शास्त्रों में वर्णित ...
16/05/2026

🌺✨ पुरुषोत्तम मास महिमा ✨🌺
“कलियुग में भगवान श्रीकृष्ण की विशेष कृपा प्राप्त करने का दिव्य अवसर” 🙏

📖 शास्त्रों में वर्णित है कि अधिक मास स्वयं भगवान श्रीकृष्ण का स्वरूप है।
इसी कारण इसे “पुरुषोत्तम मास” कहा जाता है।
यह मास प्रत्येक तीन वर्ष में आता है और वर्ष 2026 में 17 मई से 15 जून तक रहेगा। 🌿

🌼 मलमास से पुरुषोत्तम मास बनने की दिव्य कथा 🌼

प्राचीन समय में इस अतिरिक्त महीने को “मलमास” कहा जाता था।
इसका कोई स्वामी देवता नहीं था, इसलिए सभी इसकी निंदा करते थे।
दुखी होकर यह महीना भगवान विष्णु के चरणों में पहुँचा और अपनी व्यथा सुनाई।

तब भगवान विष्णु उसे लेकर गोलोक धाम गए, जहाँ स्वयं श्रीकृष्ण विराजमान थे।
करुणामयी श्रीकृष्ण ने कहा—

✨ “आज से तुम मेरे नाम पुरुषोत्तम से प्रसिद्ध होगे।
जो भी भक्त इस मास में भक्ति, जप, तप, दान और कथा करेगा, उसे अनंत गुना फल प्राप्त होगा।” ✨

📚 शास्त्र प्रमाण:
“अधिकमासो हि नाम्ना पुरुषोत्तम उच्यते।”
— स्कन्द पुराण

🦁 नरसिंह अवतार और अधिक मास 🦁

कथा के अनुसार दैत्यराज हिरण्यकश्यप को वरदान था कि उसका वध वर्ष के किसी भी 12 महीनों में नहीं हो सकता।
तब भगवान विष्णु ने एक अतिरिक्त माह की रचना की और नरसिंह रूप में संध्या समय उसका वध किया।
इस प्रकार अधिक मास भगवान की अद्भुत लीला का प्रतीक बना।

👑 पांडवों को मिला खोया हुआ राज्य 👑

वनवास के समय पांडव अत्यंत दुखी थे।
तब श्रीकृष्ण ने उन्हें पुरुषोत्तम मास का व्रत और महात्म्य बताया।
श्रद्धापूर्वक व्रत, जप और दान करने से पांडवों को पुनः राज्य प्राप्त हुआ।

🌿 पुरुषोत्तम मास में क्या करें? 🌿

✅ हरिनाम जप
✅ श्रीमद्भागवत श्रवण
✅ गीता पाठ
✅ दीपदान
✅ गौ सेवा
✅ तुलसी पूजा
✅ दान-पुण्य

🚫 क्या न करें? 🚫

❌ विवाह
❌ गृह प्रवेश
❌ मुंडन
❌ सगाई आदि मांगलिक कार्य

🌺 इस मास में किया गया थोड़ा सा भजन भी अक्षय फल देने वाला होता है।
इसलिए यह महीना भगवान की विशेष कृपा प्राप्त करने का स्वर्णिम अवसर है। 🙏
🇭 🇦 🇷 🇪 🇰 🇷 🇮 🇸 🇭 🇳 🇦

🪷महामंत्र सदा जपे🪷👏 📿
और प्रसन्न रहे 😊
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे।
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे।।
✍️आपका तुच्छ दास
,🌿रघुकुल विभूषण दास 🌿
#पुरुषोत्तममास
#अधिकमास
#मलमास
#श्रीकृष्ण
#भगवानविष्णु
#भक्तिमार्ग
#सनातनधर्म
#हरिनाम
#श्रीमद्भागवत
#वैष्णव
#भक्ति



Address

SRI SRI Radha Govind Temple
Vrindavan

Website

Alerts

Be the first to know and let us send you an email when Iskcon Sri Sri Radha Govind Temple posts news and promotions. Your email address will not be used for any other purpose, and you can unsubscribe at any time.

Share