Garud Govind Temple Vrindavan

Garud Govind Temple Vrindavan Shri Garud–Govind Ji Temple is a remarkable and ancient shrine located in Chhatikara on NH‑2 in Vrindavan, Uttar Pradesh .

The temple is world-famous for rituals related to Kālsarpa Dosh and Pitra Dosh. Contact:- Acharya Krishna
8077860654 ; 7452065554

जय गोविंद जी 🙏
25/03/2026

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"अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो, न हन्यते हन्यमाने शरीरे।"
25/03/2026

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08/03/2026

समय बहुत कम है...
#सत्य_की_खोज

हाल ही में एलन मस्क ने एक ऐसा तर्क दुनिया के सामने रखा था, जिसने पूरी दुनिया मे सनसनी मचा दी थी । एलन मस्क ने कहा :- मस्...
07/03/2026

हाल ही में एलन मस्क ने
एक ऐसा तर्क दुनिया के सामने रखा था,
जिसने पूरी दुनिया मे सनसनी मचा दी थी ।
एलन मस्क ने कहा :-

मस्क कहते हैं कि इस बात की संभावना
बहुत कम है कि हम एक "बेस रियलिटी"
(असली दुनिया) में रह रहे हैं।

उनके अनुसार,
हम किसी उन्नत सभ्यता के बनाए गए
कंप्यूटर सिमुलेशन का हिस्सा हो सकते हैं।

एलन मस्क का यह विचार ,
जिसे सिमुलेशन थ्योरी कहा जाता है,
सुनने में किसी साइंस-फिक्शन फिल्म (जैसे 'द मैट्रिक्स') जैसा लगता है, लेकिन इसके पीछे गहरा सांख्यिकीय
और तकनीकी तर्क है।

मस्क का तर्क था ...

​40 साल पहले हमारे पास 'पोंग' जैसा गेम था,
जिसमें केवल दो आयत और एक बिंदु होता था।
आज हमारे पास 'फोटोरियलिस्टिक' 3D गेम्स हैं, जिन्हें लाखों लोग एक साथ खेल रहे हैं।
अब 'वर्चुअल रियलिटी' (VR) और 'ऑगमेंटेड रियलिटी' (AR) का दौर है।

मस्क कहता है ..
यदि आप तकनीक के इसी विकास की कल्पना
अगले 10,000 साल के लिए करें,
तो गेम्स और वास्तविकता के बीच का फर्क
पूरी तरह खत्म हो जाएगा।
गेम्स इतने असली होंगे कि उनमें रहने वाले 'कैरेक्टर्स' को
यह पता भी नहीं होगा कि वे एक प्रोग्राम के अंदर हैं।

​मस्क के अनुसार, 'बेस रियलिटी' वह असली, भौतिक दुनिया है जहाँ से यह सब शुरू हुआ। उनका तर्क है कि अगर कोई भी सभ्यता (चाहे वह इंसानी हो या एलियंस) इतनी उन्नत हो जाती है कि वह ब्रह्मांड का सिमुलेशन बना सके, तो वह एक नहीं, बल्कि करोड़ों सिमुलेशन बनाएगी।
​ऐसे में, इस बात की संभावना बहुत कम है कि हम उस 'एक' असली दुनिया में रह रहे हैं। ​संभावना इस बात की ज्यादा है कि हम उन करोड़ों 'नकली' या 'सिमुलेटेड' दुनियाओं में से एक का हिस्सा हैं।.....................................................................

क्या इस बात की पुष्टि हमारे शास्त्र भी करते है ....
राजा जनक और अष्टावक्र की यह कथा ध्यान से पढ़िय ...

राजा जनक अपने महल में शयन कर रहे थे।
उन्हें एक सपना आया, अजीब सा सपना ...

सपने में राजा में देखा वे एक दीन-हीन भिक्षुक हैं।
तीन दिन तक खाने-पीने को कुछ नहीं मिला।
कहीं से किसी प्रकार चावल-दाल मिले।

उन चावल दाल को वे मिट्टी के बर्तन में पकाने लगे ।

उसी समय लड़ते हुए दो बैल वहाँ आये।
वह खिचड़ी नष्ट-भ्रष्ट हो गयी।
नींद टूट गयी और स्वप्न के दृश्य अदृश्य हो गये।

महल, पलंग, रात्रिका सुख-शयन सब ज्यों-का-त्यों मिला।

अब राजा जनक के मन मे प्रश्न उठा, 'यह सत्य कि वह सत्य' अर्थात् जो स्वप्न देखा वह सत्य या जाग्रत में देखा वह सत्य ?

राजा जनक की सभा में आने लगे विद्वान्
और होने लगे प्रश्न-समाधान।

किंतु समस्या रही ज्यों-की-त्यों 'यह सत्य कि वह सत्य ?'

अन्ततोगत्वा श्रीअष्टावक्र महामुनि पधारे।
उनके टेढ़े-मेढ़े शरीर, विचित्र रंग-ढंग, लुढ़कते हुए चलना आदि देखकर सभासद् हँसने लगे।

राजा जनक को भी हँसी आ गयी।

अष्टावक्रजी ने धीर-गम्भीर स्वर से पूछा-
आपलोग किसको देखकर हँस रहे हैं?

शरीर के उपादान अर्थात् पञ्चभूत, परमाणु, प्रकृति, माया या परब्रह्म को ?
भाई, उसमें तो कोई भेद नहीं है।
सबका मूल मसाला एक ही है।
यदि बनाने वाले परमेश्वर पर हँस रहे हो तो उसकी रचना, उसके कला-कौशल को देख-देखकर आनन्द लेने को है।
उसकी हँसी उड़ाने का कोई कारण नहीं है।

सम्पूर्ण सभा में गम्भीरता छा गयी।
इस बे-डीलडौल के बालक ने कमाल कर दिया।
सत्य तो यह है कि ज्ञान किसी आकृति की अपेक्षा नहीं रखता और न तो व्यक्ति-विशेष के पराधीन ही है।
वह स्वयंप्रकाश ही है।

बात यह थी कि वरुण लोक में बड़े-बड़े विद्वानों की आवश्यकता थी।
वरुण ने अपना एक विशिष्ट विद्वान् जनक की सभा में भेज दिया। वह शास्त्रार्थ में जिस किसी को पराजित करता उसे जल में डूबो दिया जाता। वरुण के दूत उसको आदरपूर्वक आयोजित सभा में ले जाते। उन्हीं डुबोये हुए विद्वानों में अष्टावक्र के पिता कहोल ऋषि भी थे।

जब अष्टावक्र को यह ज्ञात हुआ
तब वे राजा जनकन्की सभा में पधारे और वहाँ यही प्रश्न ही था- 'यह सत्य या वह सत्य ?'

विद्वद्-वृन्द इस प्रश्न का उत्तर देने में असमर्थ था।

अष्टावक्रजी ने घोषणा कर दी - 'न यह सत्य न वह सत्य ।' स्वप्न, जाग्रत दोनों ही जिस अधिष्ठान में अध्यस्त हैं, जिस स्वयं-प्रकाश, प्रकाश के द्वारा प्रकाशित हैं- एक मात्र वही सत्य है। सत् अधिष्ठान एवं चित् प्रकाश दोनों एक ही है और वह अपना आत्मा ही है। यह, वह, मैं, तुम, ये सब व्यर्थ हैं, मिथ्या हैं।
____________________________________________

​राजा जनक का संशय था कि महल सत्य है या वह गरीबी का सपना?
अष्टावक्र ने कहा— दोनों असत्य हैं।

​अष्टावक्र का दर्शन: सपना इसलिए झूठ है क्योंकि वह जागने पर नहीं रहता। जागृत अवस्था इसलिए झूठ है क्योंकि वह सोने पर नहीं रहती। सत्य वह है जो तीनों काल में अपरिवर्तित रहे— यानी आपकी चेतना

आज विज्ञान या ​एलन मस्क का तर्क भी यही है ... मस्क कहते हैं कि इस बात की संभावना 'अरबों में एक' है कि हम "बेस रियलिटी" (मूल सत्य) में जी रहे हैं। जिस तरह हम वीडियो गेम (जैसे GTA या Matrix) बनाते हैं जो हर गुजरते साल के साथ अधिक वास्तविक होते जा रहे हैं, वैसे ही संभव है कि किसी उच्च सभ्यता ने हमें एक 'डिजिटल सिमुलेशन' में डाल रखा हो।

अष्टावक्र ने शरीर को 'मिट्टी का बर्तन' और 'पंचभूत' मात्र बताया। उन्होंने कहा कि "मूल मसाला" यानि कि Source Code एक ही है।

सिमुलेशन थ्योरी में: हमारा शरीर, ब्रह्मांड के तारे और राजा जनक की वह खिचड़ी, सब कुछ 0 और 1 (Binary Code) या पिक्सेल से बने हैं।

मस्क के अनुसार, जिसे हम "ठोस पदार्थ" समझते हैं, वह केवल एक जटिल कंप्यूटर प्रोग्राम का रेंडरिंग मात्र है।
अष्टावक्र का 'ब्रह्म' या 'आत्मा' ही वह सुपर-कंप्यूटर है जिस पर यह पूरा संसार (सॉफ्टवेयर) चल रहा है।

जब अष्टावक्र कहते हैं कि "स्वप्न और जाग्रत दोनों जिस प्रकाश से प्रकाशित हैं, वही सत्य है", तो वे उस प्लेयर की बात कर रहे हैं जो गेम खेल रहा है।

एलन मस्क जिस उत्तर की तलाश में गणित और कंप्यूटिंग का सहारा ले रहे हैं, अष्टावक्र ने उसे "स्वयं-प्रकाश" कहकर परिभाषित किया था। राजा जनक की जिज्ञासा आज के क्वांटम फिजिक्स की ही जिज्ञासा है: "क्या वह असली है जिसे मैं छू सकता हूँ, या वह असली है जो देख रहा है?"

कुछ ऐसी ही बात गोस्वामी तुलसीदास जी ने कही -

"उमा कहूँ में अनुभव अपना
सत हरि भजन जगत सब सपना "

#अष्टावक्रगीता #राजाजनक #अद्वैतवेदांत #माया #आत्मज्ञान #सिमुलेशन_थ्योरी #चेतना #सत्य_की_खोज

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Address

Garud Govind Ji Temple
Vrindavan
281121

Website

https://garudgovindjitemple.blogspot.com/, https://maps.app.goo.gl/Eq2k9h7XQ1DCn

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