Shrimad Bhagwat Katha mission

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15/11/2021

29/01/2021

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Radhe radhey
24/01/2021

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राधे राधे बोलो
11/10/2020

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02/09/2020
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जय जय श्री राम।

जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनाएं  देवी @माधुरी जी
29/08/2020

जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनाएं देवी @माधुरी जी

श्री बड़ा रामद्वारा, सूरसागर के महंत परमहंस श्री १०८ श्री रामप्रसादजी महाराज के अवतरण दिवस की बहुत बहुत बधाई एवं हार्दिक ...
29/08/2020

श्री बड़ा रामद्वारा, सूरसागर के महंत परमहंस श्री १०८ श्री रामप्रसादजी महाराज के अवतरण दिवस की बहुत बहुत बधाई एवं हार्दिक शुभकामनाएं।

'श्रद्धया दीयते यत्‌ तत्‌ श्राद्धम्‌'~~~★ पितरों की तृप्ति के लिए जो सनातन विधि से जो कर्म किया जाता है उसे श्राद्ध कहते...
28/08/2020

'श्रद्धया दीयते यत्‌ तत्‌ श्राद्धम्‌'~~~

★ पितरों की तृप्ति के लिए जो सनातन विधि से जो कर्म किया जाता है उसे श्राद्ध कहते हैं।

★ किसी भी कर्म को यदि श्रद्धा और विश्वास से नहीं किया जाता तो वह निष्फल होता है।

☝🏻 महर्षि पाराशर का मत है कि देश-काल के अनुसार यज्ञ पात्र में हवन आदि के द्वारा, तिल, जौ, कुशा तथा मंत्रों से परिपूर्ण कर्म श्राद्ध होता है।

★ इस प्रकार किया जाने वाला यह पितृ यज्ञ कर्ता के सांसारिक जीवन को सुखमय बनाने के साथ परलोक भी सुधारता है।
★ साथ ही जिस दिव्य आत्मा का श्राद्ध किया जाता है उसे तृप्ति एवं कर्म बंधनों से मुक्ति भी मिल जाती है।

*अनेक धर्मग्रंथों के अनुसार नित्य, नैमित्तिक, काम्य, वृद्धि एवं पार्वण पाँच प्रकार के श्राद्ध बताए गए हैं।*

👉🏻 जिनमें प्रतिदिन पितृ और ऋषि तर्पण आदि द्वारा किया जाने वाला श्राद्ध नित्य श्राद्ध कहलाता है।
★ इसमें केवल जल प्रदान करने से भी कर्म की पूर्ति हो जाती है।

👉🏻 इसी प्रकार, एकोद्दिष्ट श्राद्ध को नैमित्तिक~~~

👉🏻 किसी कामना की पूर्ति हेतु काम्य श्राद्ध~~~

👉🏻 पुत्र प्राप्ति, विवाह आदि मांगलिक कार्यों में जिनसे कुल वृद्धि होती है, के पूजन के साथ पितरों को प्रसन्न करने के लिए वृद्धि श्राद्ध किया जाता है।
*जिसे नान्दी श्राद्ध भी कहते हैं।*

👉🏻 इसके अतिरिक्त पुण्यतिथि, अमावस्या अथवा पितृ पक्ष (महालय) में किया जाने वाला श्राद्ध कर्म पार्वण श्राद्ध कहलाता है।

☝🏻 *भादों की पूर्णिमा से आश्विन अमावस्या तक के सोलह दिन पितरों की जागृति के दिन होते हैं जिसमें पितर देवलोक से चलकर पृथ्वी की परिधि में सूक्ष्म रूप में उपस्थित हो जाते हैं तथा भोज्य पदार्थ एवं जल को अपने वंशजों से श्रद्धा रूप में स्वीकार करते हैं।*

★ आज के प्रगतिवादी युग में प्रायः लोगों के पास इस विज्ञान के रहस्य को जानने की अपेक्षा नकारने की हठधार्मिता ज्यादा दिखाई देती है।

★ यदि हम विचार करें तो सामान्य सांसारिक व्यवहारों में भी दावत या पार्टियों में इष्ट मित्रों की उपस्थिति से कितनी प्रसन्नता होती है।
★ यदि हम अपने पूर्वजों की स्मृति में वर्ष में एक-दो बार श्रद्धा पर्व मनाते हुए स्वादिष्ट भोज्य पदार्थों का पितृ प्रसाद मिल बाँट कर खाएँ तो उससे जो आत्मीय सुख प्राप्त होता है वह शायद मौज-मस्ती के निमित्त की गई पार्टियों से कहीं आगे होगा।

🤔 *कुछ लोग यह भी सोचते होंगे कि श्राद्ध में प्रदान की गई अन्न, जल, वस्तुएँ आदि सामग्री पितरों को कैसे प्राप्त होती होगी।*

🧐 *यहाँ यह भी तर्क दिया जाता है कि कर्मगति के अनुसार जीव को अलग-अलग गतियाँ प्राप्त होती हैं। कोई देव बनता है तो कोई पितर, कोई प्रेत तो कोई पशु पक्षी। अतः श्राद्ध में दिए गए पिण्डदान एवं एक धारा जल से कैसे कोई तृप्त होता होगा???*

☝🏻 *इन प्रश्नों के उत्तर हमारे शास्त्रों में सूक्ष्म दृष्टि से दिए गए हैं। 'नाम गोत्र के आश्रय से विश्वदेव एवं अग्निमुख हवन किए गए पदार्थ आदि दिव्य पितर ग्रास को पितरों को प्राप्त कराते हैं।*
👉🏻 यदि पूर्वज देव योनि को प्राप्त हो गए हों तो अर्पित किया गया अन्न-जल वहाँ अमृत कण के रूप में प्राप्त होगा क्योंकि देवता केवल अमृत पान करते हैं।

👉🏻 पूर्वज मनुष्य योनि में गए हों तो उन्हें अन्न के रूप में
तथा
👉🏻 पशु योनि में घास-तृण के रूप में पदार्थ की प्राप्ति होगी।
👉🏻 सर्प आदि योनियों में वायु रूप में,
👉🏻 यक्ष योनियों में जल आदि पेय पदार्थों के रूप में उन्हें श्राद्ध पर्व पर अर्पित पदार्थों का तत्व प्राप्त होगा।

*श्राद्ध पर अर्पण किए गए भोजन एवं तर्पण का जल उन्हें उसी रूप में प्राप्त होगा जिस योनि में जो उनके लिए तृप्ति कर वस्तु पदार्थ परमात्मा ने बनाए हैं।*
*वेद मंत्रों की इतनी शक्ति होती है कि जिस प्रकार गायों के झुंड में अपनी माता को बछड़ा खोज लेता है उसी प्रकार वेद मंत्रों की शक्ति के प्रभाव से श्रद्धा से अर्पण की गई वस्तु या पदार्थ पितरों को प्राप्त हो जाते हैं।*
*वस्तुतः श्रद्धा एवं संकल्प के साथ श्राद्ध कर्म के समय प्रदान किए गए पदार्थों को भक्ति के साथ बोले गए मंत्र पितरों तक पहुँचा देते हैं।*

*पिण्ड का अर्थ~*
*-----------------*
★ श्राद्ध-कर्म में पके हुए चावल, दूध और तिल को मिश्रित करके जो पिण्ड बनाते हैं।
👉🏻 *पिण्ड का अर्थ है शरीर।*
★ यह एक पारंपरिक विश्वास है, जिसे विज्ञान भी मानता है कि हर पीढी के भीतर मातृकुल तथा पितृकुल दोनों में पहले की पीढियों के समन्वित ‘गुणसूत्र’ उपस्थित होते हैं।
★ चावल के पिण्ड जो पिता, दादा, परदादा और पितामह के शरीरों का प्रतीक हैं, आपस में मिलकर फिर अलग बाँटते हैं।
★ यह प्रतीकात्मक अनुष्ठान जिन जिन लोगों के गुणसूत्र (जीन्स) श्राद्ध करने वाले की अपनी देह में हैं, उनकी तृप्ति के लिए होता है।
★ इस पिण्ड को गाय-कौओं को देने से पहले पिण्डदान करने वाला सूँघता भी है।
👉🏻 हमारे देश में सूंघना यानी कि आधा भोजन करना माना जाता है। इस प्रकार श्राद्ध करने वाला पिण्डदान से पहले अपने पितरों की उपस्थिति को ख़ुद अपने भीतर भी ग्रहण करता है।

☝🏻 *पितृ पक्ष पन्द्रह दिन की समयावधि होती है जिसमें हिन्दू जन अपने पूर्वजों को भोजन अर्पण कर उन्हें श्रधांजलि देते हैं। अपने पूर्वजों के प्रति श्रद्धा भावना रखते हुए पितृ यज्ञ करना चाहिए और श्राद्ध कर्म करना बहुत आवश्यक होता है।*
👉🏻 इससे व्यक्ति का स्वास्थ्य अच्छा रहता है,
👉🏻 घर में समृद्धि व सुख-शांति बनी रहती है।
👉🏻 पूर्वजों की आत्मा को शांति मिलती है
और
👉🏻 उनका आशीर्वाद सदैव बना रहता है।

*श्राद्ध के लिए उचित बातें~*
*------------------------------*

👉🏻 श्राद्ध के लिए उचित द्रव्य हैं~
★ काले तिल,
★ चावल,
★ जौं,
★ जल,
★ मूल
और
★ फल।

👉🏻 तीन चीजें शुध्दिकारक हैं~
★ पुत्री का पुत्र,
★ काले तिल
और
★ कम्बल।

👉🏻 तीन बातें प्रशसनीय है~
★ स्वच्छता,
★ क्रोधहीनता
और
★ चैन (त्वरा शीघ्रता) का न होना।

👉🏻 श्राद्ध में महत्वपूर्ण बातें~
★ अपरान्ह का समय,
★ कुशा,
★ श्राद्धस्थली की स्वच्छ्ता,
★ उदारता से भोजन आदि की व्यवस्था
और
★ अच्छे ब्राह्मण की उपस्थिति।

*श्राद्ध का अधिकारी~*
*----------------------*

☝🏻 हिन्दू धर्म के मरणोपरांत संस्कारों को पूरा करने के लिए पुत्र का प्रमुख स्थान माना गया है।
★ शास्त्रों में लिखा है कि नरक से मुक्ति पुत्र द्वारा ही मिलती है।
★ इसलिए पुत्र को ही श्राद्ध, पिंडदान का अधिकारी माना गया है
और
★ नरक से रक्षा करने वाले पुत्र की कामना हर मनुष्य करता है।

*इसलिए यहां जानते हैं कि शास्त्रों के अनुसार पुत्र न होने पर कौन-कौन श्राद्ध का अधिकारी हो सकता है~*

👉🏻 पिता का श्राद्ध पुत्र को ही करना चाहिए।

👉🏻 पुत्र के न होने पर पत्नी श्राद्ध कर सकती है।

👉🏻 पत्नी न होने पर सगा भाई और
★ उसके भी अभाव में संपिंडों को श्राद्ध करना चाहिए।

👉🏻 एक से अधिक पुत्र होने पर सबसे बड़ा पुत्र श्राद्ध करता है।

👉🏻 पुत्री का पति एवं पुत्री का पुत्र भी श्राद्ध के अधिकारी हैं।

👉🏻 पुत्र के न होने पर पौत्र
या
★ प्रपौत्र भी श्राद्ध कर सकते हैं।

👉🏻 पुत्र, पौत्र या प्रपौत्र के न होने पर विधवा स्त्री श्राद्ध कर सकती है।

👉🏻 पत्नी का श्राद्ध तभी कर सकता है, जब कोई पुत्र न हो।

👉🏻 पुत्र, पौत्र या पुत्री का पुत्र न होने पर भतीजा भी श्राद्ध कर सकता है।

👉🏻 दत्तक (गोद में लिया पुत्र) भी श्राद्ध का अधिकारी है।

👉🏻 कोई न होने पर राजा को उसके धन से श्राद्ध करने का विधान है।

*श्राद्ध के प्रकार~*
*-----------------*

*नित्य~*
यह श्राद्ध के दिनों में मृतक के निधन की तिथी पर किया जाता है।

*नैमित्तिक~*
किसी विशेष पारिवारिक उत्सव, जैसे पुत्र जन्म पर मृतक को याद कर किया जाता है।

*काम्य~*
यह श्राद्ध किसी विशेष मनोकामना के लिए कृतिका या रोहिणी नक्षत्र में किया जाता है।

*श्राद्ध के लिए अनुचित बातें~*
*--------------------------------*

☝🏻 कुछ अन्न और खाद्य पदार्थ जो श्राद्ध में नहीं प्रयुक्त होते~

★ मसूर, राजमा, कोदों, चना, कपित्थ, तीसी, सन, बासी भोजन ,भैंस, हिरिणी, उँटनी, भेड़
और
👉🏻 एक खुरवाले पशु का दूध भी वर्जित है पर भैंस का घी वर्जित नहीं है।
👉🏻 श्राद्ध में दूध, दही और घी पितरों के लिए विशेष तुष्टिकारक माने जाते हैं।
👉🏻 श्राद्ध किसी दूसरे के घर में, दूसरे की भूमि में कभी नहीं किया जाता है।
👉🏻 जिस भूमि पर किसी का स्वामित्व न हो, सार्वजनिक हो, ऐसी भूमि पर श्राद्ध किया जा सकता है।

*एकैकस्य तिलैर्मिश्रांस्त्रींस्त्रीन दद्याज्जलाज्जलीन।*
*यावज्जीवकृतं पापं तत्क्षणदेव नश्यति।*

श्राद्ध पक्ष में अपने दिवंगत पितरों के निमित्त जो व्यक्ति तिल, जौ, अक्षत, कुशा, दूध, शहद व गंगाजल सहित पिण्डदान व तर्पणादि, हवन करने के बाद ब्राह्माणों को यथाशक्ति भोजन, फल-वस्त्र, दक्षिणा, गौ आदि का दान करता है, उसके पितर संतृप्त होकर साधक को दीर्घायु, आरोग्य, स्वास्थ्य, धन, यश, सम्पदा, पुत्र- पुत्री आदि का आशीर्वाद देते हैं।
जो व्यक्ति जान-बूझकर श्राद्ध कर्म नहीं करता, वह शापग्रस्त होकर अनेक प्रकार के कष्टों व दु:खों से पीड़ित रहता है।
अपने पूर्वज पितरों के प्रति श्रद्धा भावना रखते हुए पितृ यज्ञ व श्राद्ध कर्म करना नितांत
आवश्यक है। इससे स्वास्थ्य, समृद्धि, आयु एवं सुख-शांति में वृद्धि होती है।

*श्राद्ध में कुश और तिल का महत्व~*
*-----------------------------------*

☝🏻 दर्भ या कुश को जल और वनस्पतियों का सार माना जाता है।
★ यह भी मान्यता है कि कुश और तिल दोंनों विष्णु के शरीर से निकले हैं।
👉🏻 गरुड़ पुराण के अनुसार, तीनों देवता ब्रह्मा, विष्णु, महेश कुश में क्रमश: जड़, मध्य और अग्रभाग में रहते हैं।
★ कुश का अग्रभाग देवताओं का,
★ मध्य भाग मनुष्यों का
और
★ जड़ पितरों का माना जाता है।

👉🏻 तिल पितरों को प्रिय हैं और दुष्टात्माओं को दूर भगाने वाले माने जाते हैं।
★ मान्यता है कि बिना तिल बिखेरे श्राद्ध किया जाये तो दुष्टात्मायें हवि को ग्रहण कर लेती हैं।

*श्राद्ध के देवता~*
*-----------------*

👉🏻 वसु,
👉🏻 रुद्र
और
👉🏻 आदित्य श्राद्ध के देवता माने जाते हैं।

*मितव्ययी (कम ख़र्च में) श्राद्ध~*
*-------------------------*

👉🏻 विष्णु पुराण के अनुसार~
★ दरिद्र व्यक्ति केवल मोटा अन्न,
★ जंगली साग-पात-फल
और
★ न्यूनतम दक्षिणा,
👉🏻 वह भी ना हो तो सात या आठ तिल अंजलि में जल के साथ लेकर ब्राह्मण को देना चाहिए
या
👉🏻 किसी गाय को दिन भर घास खिला देनी चाहिए
अन्यथा
👉🏻 हाथ उठाकर दिक्पालों और सूर्य से याचना करनी चाहिए कि हे! प्रभु मैंने हाथ वायु में फैला दिये हैं, मेरे पितर मेरी भक्ति से संतुष्ट हों।

*श्राद्ध कर्म से कैसे मिलती सूक्ष्म शरीर को शक्ति~*
*--------------------------------------------------*

*"स्वधर्मे निधनं श्रेय: परधर्मो भयावह:।"*

अर्थात~ स्वयं के धर्म में निधन होना कल्याण कारण है जबकि दूसरे के धर्म में मरना भय को देने वाला है। मरने के बाद व्यक्ति की 3 तरह की गतियां होती हैं~

1✅ उर्ध्व गति,
2✅ स्थिर गति
तथा
3✅ अधो गति।

👉🏻 वेद में उल्लेखित नियमों का पालन करने वाले की उर्ध्व गति होती है।
👉🏻 पालन नहीं करने वालों की स्थिर गति होती है
और
👉🏻 जो व्यक्ति वेद विरुद्ध आचरण करता है उसकी अधोगति होती है।
*व्यक्ति जब देह छोड़ता है, तब सर्वप्रथम वह सूक्ष्म शरीर में प्रवेश कर जाता है। सूक्ष्म शरीर की शक्ति और गति के अनुसार ही वह भिन्न-भिन्न लोक में विचरण करता है और अंत में अपनी गति अनुसार ही पुन: गर्भ धारण करता है।*

☝🏻 *आत्मा के तीन स्वरूप माने गए हैं~*
✅ जीवात्मा,
✅ प्रेतात्मा
एवं
✅ सूक्ष्मात्मा।

👉🏻 जो भौतिक शरीर में वास करती है उसे जीवात्मा कहते हैं।

👉🏻 जब इस जीवात्मा का वासना और कामनामय शरीर में निवास होता है तब उसे प्रेतात्मा कहते हैं।
★ अर्थात जो आत्मा भोग-संभोग के अलावा कुछ भी नहीं सोच- समझ पाती वह शरीर में रहते हुए भी प्रेतात्मा है और मरने के बाद तो उसका प्रेत योनि में जाना तय है।

👉🏻 तीसरा स्वरूप है सूक्ष्म स्वरूप। मरने के बाद जब आत्मा सूक्ष्मतम शरीर में प्रवेश करती है, तब उसे सूक्ष्मात्मा कहते हैं।

*"विदूर्ध्वभागे पितरो वसन्त: स्वाध: सुधादीधीत मामनन्ति"।*

☝🏻 पांच तत्वों से बने इस शरीर में पांचों तत्वों का अपना- अपना अंश होता है।
👉🏻 इसमें वायु और जल तत्व सूक्ष्म शरीर को पुष्ट करने वाला है।
★ चन्द्रमा के प्रकाश से सूक्ष्म शरीर का संबंध है।
★ जल तत्व को सोम भी कहा जाता है।
★ सोम को रेतस इसलिए कहा जाता है कि उसमें सूक्ष्म शरीर को पुष्ट करने के लिए चन्द्र से संबंधित और भी तत्व शामिल होते हैं।

☝🏻 जब व्यक्ति जन्म लेता है तो उसमें 28 अंश रेतस होता है।

👉🏻 यह 28 अंश रेतस लेकर ही उसे चन्द्रलोक पहुंचना होता है।
★ 28 अंश रेतस लेकर आई महान आत्मा मरने के बाद चन्द्रलोक पहुंच जाती है,
★ जहां उससे वहीं 28 अंश रेतस मांगा जाता है।
*इसी 28 अंश रेतस को पितृ ऋण कहते हैं।*
★ चन्द्रलोक में वह आत्मा अपने स्वजातीय लोक में रहती है।

☝🏻 पृथ्वी लोक से उक्त आत्मा के लिए जो श्राद्ध कर्म किए जाते हैं उससे मार्ग में उसका शरीर पुष्ट होता है।
👉🏻 28 अंश रेतस के रूप में श्रद्धा नामक मार्ग से भेजे जाने वाले पिण्ड तथा जल आदि के दान को श्राद्ध कहते हैं।
★ इस श्रद्धा नामक मार्ग का संबंध मध्याह्नकाल में पृथ्वी से होता है इसलिए ही मध्याह्नकाल में श्राद्ध करने का विधान है।

☝🏻 पृथ्वी पर कोई भी वस्तु सूर्यमंडल तथा चन्द्रमंडल के संपर्क से ही बनती है।
👉🏻 संसार में सोम संबंधी वस्तु विशेषत: चावल और जौ ही हैं,
★ जौ में मेधा की अधिकता है, धान
और
★ जौ में रेतस (सोम) का अंश विशेष रूप से रहता है,
*अश्विन कृष्ण पक्ष में यदि चावल तथा जौ का पिण्डदान किया जाए तो चन्द्रमंडल को रेतस पहुंच जाता है, पितर इसी चन्द्रमा के ऊर्ध्व देश में रहते हैं।*
★ इस रेतस से वे तृप्त हो जाते हैं और उन्हें शक्ति मिलती है।

☝🏻 शास्त्र अनुसार माता-पिता आदि के निमित्त उनके नाम और उच्चारण मंत्रों द्वारा जो अन्न आदि सोम अर्पित किया जाता है, वह उनको व्याप्त होता है।

👉🏻 मान लो वे आत्मा देवयोनि प्राप्त कर गई है तो वह अन्न उन्हें अमृत के रूप में प्राप्त होता है

और

👉🏻 पितर या गंधर्व योनि प्राप्त हुई है तो वह अन्न उन्हें भोग्यरूप में प्राप्त हो जाता है।

👉🏻 यदि वह प्रेत योनि को प्राप्त होकर भटक रहा है तो यह अन्न उसे रुधिर रूप में प्राप्त होता है।

👉🏻 लेकिन यदि वह आत्मा धरती पर किसी पशु योनि में जन्म ले चुकी है तो वह अन्न उसे तृण रूप में प्राप्त हो जाता है

और

👉🏻 यदि वह कर्मानुसार पुन: मनुष्य योनि प्राप्त कर गया है तो वह अन्न उन्हें अन्न आदि रूप में प्राप्त हो जाता है।

★ इससे विशेष वैदिक मंत्रों के साथ ऐसे किया जाता है ताकि यह अन्न उस तक पहुंच जाए। फिर चाहे वह कहीं भी किसी भी रूप या योनि में हो।

*वेदानुसार यज्ञ पांच प्रकार के होते हैं~*

1✅ ब्रह्म यज्ञ
2✅ देव यज्ञ
3✅ पितृ यज्ञ
4✅ वैश्वदेव यज्ञ
एवं
5✅ अतिथि यज्ञ।

★ उक्त पांच यज्ञों को पुराणों और अन्य ग्रंथों में विस्तार से दिया गया है।
👉🏻 उक्त पांच यज्ञ में से ही एक यज्ञ है पितृ यज्ञ। इसे पुराण में श्राद्ध कर्म की संज्ञा दी गई है।

☝🏻 पूर्वजों के कार्यों के फलस्वरूप आने वाली पीढ़ी पर पड़ने वाले अशुभ प्रभाव को पितृ दोष कहते हैं।

*श्राद्ध कर्म : पितृदोष से मुक्ति का उपाय~*

☝🏻 पितृ दोष का अर्थ यह नहीं कि कोई पितृ अतृप्त होकर आपको कष्ट दे रहा है।
👉🏻 पितृ दोष का अर्थ वंशानुगत, मानसिक और शारीरिक रोग और शोक भी होते हैं।

★ घर और बाहर जो वायु है वह सभी पितरों को धूप, दीप और तर्पण देने से शुद्ध और सकारात्मक प्रभाव देने वाली बन जाती है। इस धूप, श्राद्ध और तर्पण से पितृलोक के तृप्त होने से पितृ दोष मिटता है।

★ पितरों के तृप्त होने से पितर आपके जीवन के दुखों को मिटाने में सहयोग करते हैं। पितृ यज्ञ और पितृ दोष एक वैज्ञानिक धारणा है।
*🧘🏻‍♂आशुतोष गौड़🔥आग्नेय🔥🧘🏻‍♂*

27/08/2020

दर्शन करिए 264 करोड़ की गणेश जी की मूर्ति के जिसमें 70 किलो सोना और 350 किलो चांदी लगी हुई है।

"शीघ्र सफलता के लालच में अनीति और बेईमानी की राह पर जो लोग चलते हैं वे अंततोगत्वा ठगे जाते हैं। सन्मार्ग पर चलते हुए धीर...
27/08/2020

"शीघ्र सफलता के लालच में अनीति और बेईमानी की राह पर जो लोग चलते हैं वे अंततोगत्वा ठगे जाते हैं। सन्मार्ग पर चलते हुए धीरज रखने का फल मीठा और देर तक आनन्द देने वाला होता है।"
‼ राधे राधे ‼

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