Krishna Deewane Sewa Samiti - Regd

Krishna Deewane Sewa Samiti - Regd Krishna awareness and Social Work in and around Vrindavan, Braj Bhoomi, Revival of Braj Culture.

The Page depicts the goals of the Krishna Deewane Sewa Samiti like
1) The restoration of Culture and environment of Braj Bhoomi.
2) To spread the message of GEETA.
3) To Uplift the living of the WIDOWS.
4) To Organise Events for Cleaniless of Vrindavan Dhaam and Ghats of Yamuna.
5) To run and manage Old Age Homes.
6) To work for the protection of Natural Habitat
for the locals species o

f Birds i.e Peacock etc
7) To establish GEETA Bhavans for the awareness of the message of Lord Krishna
8) To launch programmes for the eradication of
Drugs/Tobacco etc
9) To take up schemes for the protection of Girl Child.
10) To launch the schemes for Swachh Bharat Abhiyaan around Vrindavan in the rural areas.

29/08/2019

कान्हा जी हमें अपनी मुरली नही तो
अपनी मुरली की कोई धुन ही बना लो
और उसे अपने अधरों से इक बार तो बजा लो...
आपका दिन शुभ हो
जय श्रीराधेकृष्ण

28/07/2019

रमणीरम्या तरूतरतम्या, गुण आगम्या श्री राधे
धाम निवासी प्रभा प्रकाशी, सहज सुहासी श्री कृष्णा
जय राधे जय राधे राधे, जय राधे जय श्री राधे
जय कृष्णा जय कृष्णा कृष्णा, जय कृष्णा जय श्री कृष्णा...
आपका दिन शुभ हो
जय श्रीराधेकृष्णा

07/07/2019

नयन नयन सौं मनहिं मन झूमें
राग राग प्रतिराग जगायें
स्वाँस समीकरण मलय सुगन्धित
रस-रसना से रस सरसाये
राधा जू मधुर मधुर मुस्कायें....
आपका दिन शुभ हो
जय श्रीराधेकृष्ण

03/07/2019

मंद-मंद मंजुल मणि मरकत
मंगल स्मित-मोद मनायें
झपटि बासुँरी कर गहि लीन्हीं
अधर धरति अतिहिं शरमायें
राधा जू मधुर मधुर मुस्कायें...
आपका दिन शुभ हो
जय श्रीराधेकृष्ण

👏श्री चैतन्य महाप्रभु द्वारा गुंडिचा मंदिर मार्जन👏गुंडिचा मंदिर, ओडिशा के पुरी नामक स्थान पर स्थित श्री जगन्नाथ मंदिर से...
22/06/2019

👏श्री चैतन्य महाप्रभु द्वारा गुंडिचा मंदिर मार्जन👏

गुंडिचा मंदिर, ओडिशा के पुरी नामक स्थान पर स्थित श्री जगन्नाथ मंदिर से दो किलोमीटर की दूरीे पर उत्तर पूर्व दिशा में ग्रैंड रोड के अंत में स्थित है। गुंडिचा मंदिर को जगन्नाथ स्वामी का “जन्मस्थान” भी कहा जाता है, क्योंकी यहाँ “महावेदी” नामक एक विशेष मंच पर दिव्य शिल्पकार विश्वकर्मा ने राजा इन्द्रध्युम्न की इच्छानुसार जगन्नाथ, बलदेव और सुभद्रा के विग्रहों को दारु ब्रम्ह से प्रकट किया। यह मंदिर राजा इन्द्रध्युम्न की पत्नी, गुंडिचा महारानी के नाम पर है। इस क्षेत्र में राजा इन्द्रध्युम्न ने एक हजार अश्वमेध यज्ञ किया था ।

गुंडिचा मंदिर जहां स्थित है उस स्थान कों “सुंदराचल” कहा जाता है। सुंदराचल, की तुलना वृन्दावन से की गयी है, और नीलाचल जहाँ श्री जगन्नाथ रहते हैं वह द्वारका माना जाता है। भक्त जन ब्रजवासिओं के भाव में रथयात्रा के समय प्रभु जगन्नाथ से लौटने की प्रार्थना करते हैं इसलिए प्रभु उन भक्तों के साथ वृन्दावन यानि गुंडिचा आते हैं॥
पांच सौ वर्ष पूर्व श्री चैतन्य महाप्रभु ने रथयात्रा से एक दिन पहले यह सिखाया कि गुंडिचा मंदिर मार्जन की महिमा क्या है। हमें किस मनोवृत्ति से गुंडिचा मार्जन करना चाहिए एवं यह हमें कृष्ण के प्रति शुद्ध प्रेमभक्ति में अग्रसर होने के लिए किस प्रकार लाभकारी है ।
निम्नलिखित लेख श्रील भक्तिसिद्धान्त सरस्वती ठाकुर द्वारा गुंडिचा मंदिर मार्जन के पीछे के रहस्य को उजागर करता है।
अपनी लीलाओं से श्री चैतन्य महाप्रभु यह सिखा रहे हैं कि अगर कोई भाग्यवान जीव श्री भगवान को अपने हृदय में बैठाना चाहता है तो सर्वप्रथम उसे अपने हृदय से सभी मलिनताओं को निकालना होगा। भक्ति के लिए हृदय को स्वच्छ, शांतिमय एवं दोषरहित बनाना अनिवार्य है । यदि घास,रेत या धूल रूपी – अनर्थ – हमारे ह्रदय में रह जाते हैं तो हम श्री भगवान को वहां नहीं बैठा सकते ।
दूषित हृदय अर्थात अन्याभिलाषा (भगवान की सेवा के अतिरिक्त अन्य इच्छाएँ), कर्म (सांसारिक कार्य), ज्ञान (मनगढंत, निर्विशेष आदि ज्ञान) एवं योग इत्यादि से पूर्ण हृदय।
श्रील रूप गोस्वामी कहते है:
अन्याभिलाषिता शून्यं ज्ञान कर्माद्यनावृतम्|
अनुकूल्येन कृष्णानुशीलनं भक्तिरुत्तमा||
(भक्तिरसामृत सिंधु १.१.११ )
जहाँ भी भक्ति से असंबंधित इच्छाऐं, मनगढंत निर्विशेष आदि ज्ञान, सांसारिक कर्म, योग इत्यादि या भक्ति के लिए प्रतिकूल मानसिकता उपस्थित होगी वहां जीव की स्वाभाविक प्रवृत्ति या शुद्ध भक्ति नहीं हो सकती । और जहाँ शुद्ध भक्ति नहीं होगी वहां कृष्ण प्रकट नहीं होंगे ।
श्री गौरसुन्दर ने पहले कई दिनों से जमा धूल, रेत, घास-फूस इत्यादि के ढेरों को साफ़ किया। फिर झाड़ू एवं पानी से सम्पूर्ण मंदिर को दूसरी बार साफ़ किया। इसके बाद वे अपने अंगवस्त्र से मंदिर के कोने-कोने को साफ करने लगे ताकि कहीं लेश-मात्र धब्बा भी न रह जाये।
व्यापक घिसने और सफाई के पश्चात मंदिर न केवल धूल रहित हो गया अपितु वह शीतल भी हो गया । अर्थात इसी प्रकार साधक का हृदय न केवल अनर्थों से मुक्त होता है अपितु त्रितापों (तीन प्रकार के ताप (क्लेश): आध्यात्मिक: शरीर एवं मन द्वारा, अधिदैविक: देवताओं द्वारा, अधिभौतिक: अन्य जीवों द्वारा) से युक्त इस दावाग्नि रुपी भौतिक संसार में शीतलता का भी अनुभव करता है।
वास्तव में जब साधक के मन से भोग एवं मुक्ति की इच्छाएं, भौतिक संसार में सुखी रहने के लिए उग्र-प्रयत्न, मनगढंत निर्विशेष ज्ञान एवं योग इत्यादि दूर हो जाते हैं और जीव की स्वाभाविक प्रवृत्ति, शुद्ध भक्ति प्रकट होती है तो वह शांति एवं शीतलता का आभास करता है ।
कुछ साधक अज्ञानवश यह सोचते हैं कि अब तो आत्म-इन्द्रियतृप्ति को त्याग चुके हैं परन्तु उन्हें एक बात समझ नहीं आती कि हृदय के एक कोने में मुक्ति की इच्छा अभी भी बनी हुयी है। मुख्यतः निर्विशेषवादियो की “सायुज्य मुक्ति” कि इच्छा । महाप्रभु ने अपने अंगवस्त्र से रगड़ के जो दाग हटाये वे इस मुक्ति व अन्य चार प्रकार (सालोक्य, सायुज्य, सामीप्य एवं सार्ष्ठि) की मुक्तियों को दर्शाती है।
इस तरह, सभी जीवों के कल्याण हेतु एक जीव की मानसिकता को दर्शाते हुए, श्री गौरसुन्दर एक – गुरु के रूप में, व्यक्तिगत रूप से सीखाते हैं कि कैसे बड़े उत्साह के साथ एक साधक को चाहिए कि वो जोर से श्री कृष्ण का नाम लेते हुए अपने हृदय को स्वच्छ करे जिसमें श्री कृष्ण के लिए उपयुक्त स्थान बने, जहाँ वह सिर्फ कृष्ण की संतुष्टि के लिए कार्य कर सके।
श्रीमन महाप्रभु , हर भक्त के निकट आकर उनके हाथ पकड़ते और सिखाते कि कैसे मंदिर को साफ करना है। स्वयं श्री राधा-कृष्ण के युगल अवतार, चैतन्य महाप्रभु उन भक्तों की प्रशंसा करते जो उनके मानकों पर खरे उतरते हैं।

🐂कृष्णा गऊ चारण लीला 🐂              🐂❣गोपाष्टमी🐂❣       🐂 भगवान पोगंड अवस्था में प्रवेश करते हैं। भगवान की आयु हैं 5.30 ...
22/06/2019

🐂कृष्णा गऊ चारण लीला 🐂
🐂❣गोपाष्टमी🐂❣

🐂 भगवान पोगंड अवस्था में प्रवेश करते हैं। भगवान की आयु हैं 5.30 -6 वर्ष की। भगवान अपने पलंग पर सोये हैं। मैया चांदी के कटोरे में अधोटा(रबड़ी बनने से पहले उतार लिए जाये दूध जलने से पहले उतार ले ) लेकर आई हैं। लेकिन भगवान ने पीने से मना कर दिया। भगवान बोले की हम बड़े हो गए हैं। अब हम गौ चारण(Gau Charan) के लिए जायेंगे।

🐂 मैया बोली ये बात तुझे करनी हैं तो अपने पिता कर करियो। अब रात हो गई हैं तू ये बात अपने पिता से सुबह करियो जैसी वो आज्ञा देंगे वैसा हम प्रबंध करवा देंगे। तो मैया ने लाला को जैसे तैसे समझाया और अधोटा(Adhota) पिलाया और सुलाया। प्रातः काल भगवान सोकर उठे माँ को प्रणाम किया और नन्द बाबा के पास गए। और भगवान बोले बाबा, बाबा।

🐂 अब हम बड़े हो गए हैं। अब हमें बछड़ा चराना(Bachda Charan leela) अच्छो नही लगे हैं। हम गइया(Gaiyan) चरायेंगे। नन्द बाबा बोले की ऐसे थोड़ी जाओगे। पहले पंडित जी को बुलाएँगे और मुहर्त निकलवाएंगे।

🐂 लाला बोले की ठीक हैं मैं अभी पंडित जी को बुला कर आ जाता हूँ। भगवान पुरोहित जी के पास पहुंचे हैं। और बोले की पुरोहित जी आज मेरे बाबा के सामने आपको मेरे गऊ चारण का मुहर्त निकलना हैं। देखो अगर आपने आज का मुहर्त निकालो तो आपको लम्बी छोड़ी दक्षिणा दिलवाऊंगा और अगर आपने देरी की तो दक्षिणा के नाम ठन ठन पाल मदन गोपाल। फिर कुछ नही मिलेगा।

🐂 पंडित जी बोले की हमें तो अपनी दक्षिणा से मतलब हैं। तू जबका कहेगा हम तबका मुहर्त निकल देंगे। भगवान पंडित जी के साथ नन्द बाबा के पास पहुंचे और नन्द बाबा ने प्रणाम किया पंडित जी को आसन दिया।

🐂 और नन्द बाबा बोले की आप पंचांग खोलकर देखो यदि 2-4 महीने में मेरे लाला का गऊ चराने का अच्छा सा मुहर्त निकले तो बता दो।
🐂 पंडित जी ने पंचांग खोला तो कभी सर पर हाथ रखते हैं। कभी उँगलियों पर हिसाब गिनते हैं। 10-20 मिनट निकले

🐂 नन्द बाबा बोली की क्यों पण्डित जी कौई मुहुर्त नही है क्या।पण्डित जी बोले 10 साल तक कोई मुहूर्त नही है।नँद बाबा बोले कोई मुहूर्त नही है ये क्या बात हुवी।पण्डित जी बोले आज का मुहूर्त निकल रहा है।नँद बाबा बोले मेरे लाला आपको कुछ सीखा पड़ा के गया है क्या😂.पण्डित जी बोले कि आपका लाला मुजे क्या सुखायगो।ये हमारे पंचांग मैं लिखो है।प्रभु बोले अब तो मुहूरत निकल गया।अब बेजो मुजे।बाबा ने कहा नही तू आबि छोटा है।प्रभु उदास हो गए।और 1 कोने मैं जाकर रोने लगे।इधर सभी ग्वाल बाल अपनी गाय को निकलने की तयारी कर रहे हैं लेकिन गाय निकल नही रही।ग्वाल बाल नँद बाबा के पास गए और बोले आप अपने लाला को भेज दो।बाबा ने कृष्ण को कहा जाओ और ग्युवो को गौशाला से बाहर निकालो।कृष्णा ने 1 गाय का नाम बनसुरी मैं बोला ।जब गायो ने बंसी में अपना नाम सुना तो बागी चली आयी ओर कान्हा को चारो तरफ से गेर लिया।जब नँद बाबा ने देखा ओर यशोदा से बोले कि गाये इतना प्रेम करती है कान्हा को तो हमारा लाला आज ही जायगा गऊ चरण के लिए।वह दिन था कार्तिक शुक्ल पक्ष गोपाष्टमी।🐂
तबी से गोपाष्टमी मनाई जाती है।
🐂हरे कृष्णा🐂

निधिवन - जहाँ कान्हा आजभी रचाते है रास-5200 वर्ष पूर्व वृन्दावन की इसी धरा पर कान्हा जी ने राधारानी और गोपियों संग महारा...
19/06/2019

निधिवन - जहाँ कान्हा आजभी रचाते है रास
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5200 वर्ष पूर्व वृन्दावन की इसी धरा पर कान्हा जी ने राधारानी और गोपियों संग महारास रचाया था... द्वापर युग से आज तक हर रात राधे-कृष्ण यहां साक्षात प्रकट होते है... निधिवन में स्थित 16108 वृक्ष गोपियों मेंतब्दील होकर रातभर कान्हा संग महारास रचाती है... सूरज की पहली किरण फूटने से पहले ही गोपियां वृक्ष का आकार ले लेती है.. और भगवान कृष्ण राधिका रानी के संग अन्तर्धान हो जाते है।
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एक बार कलकत्ता का एक भक्त अपने गुरु की सुनाई हुई भागवत कथा से इतना मोहित हुआ कि वह हरसमय वृन्दावन आने की सोचने लगा उसके गुरु उसे निधिवन के बारे में बताया करते थे और कहते थे कि आज भी भगवान यहाँ रात्रि को रास रचाने आते है उस भक्त को इस बात पर विश्वास नहीं हो रहा था
और एक बार उसने निश्चय किया कि वृन्दावन जाऊंगा और ऐसा ही हुआ श्री राधा रानी की कृपा हुई और आ गया वृन्दावन उसने जी भर कर बिहारी जीका राधा रानी का दर्शन किया लेकिन अब भी उसे इसबात का यकीन नहीं था कि निधिवन में रात्रि को भगवान रास रचाते है उसने सोचा कि एक दिन निधिवन रुक कर देखता हू इसलिए वो वही पर रूक गयाऔर देर तक बैठा रहा और जब शाम होने को आई तब एक पेड़ की लता की आड़ में छिप गया
-जब शाम के वक़्त वहा के पुजारी निधिवन को खाली करवाने लगे तो उनकी नज़र उस भक्त पर पड गयी और उसे वहा से जाने को कहा तब तो वो भक्त वहा से चला गया लेकिन अगले दिन फिर से वहा जाकर छिपगया और फिर से शाम होते ही पुजारियों द्वारा निकाला गया और आखिर में उसने निधिवन में एक ऐसा कोना खोज निकाला जहा उसे कोई न ढूंढ़ सकता थाऔर वो आँखे मूंदे सारी रात वही निधिवन में बैठा रहा और अगले दिन जबसेविकाए निधिवन में साफ़ सफाई करने आई तो पाया कि एक व्यक्ति बेसुध पड़ा हुआ है और उसके मुह से झाग निकल रहा है
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तब उन सेविकाओ ने सभी कोबताया तो लोगो कि भीड़ वहा पर जमा हो गयी सभी ने उस व्यक्ति से बोलने की कोशिश की लेकिन वो कुछ भी नहीं बोल रहा था लोगो ने उसे खाने के लिएमिठाई आदि दी लेकिन उसने नहीं ली और ऐसे ही वो ३ दिन तक बिना कुछ खाएपीये ऐसे ही बेसुध पड़ा रहा और ५ दिन बाद उसके गुरु जो कि गोवर्धन में रहते थे बताया गया तब उसके गुरूजी वहा पहुचे और उसे गोवर्धन अपने आश्रम में ले आये आश्रम में भी वो ऐसे ही रहा और एक दिन सुबह सुबह उस व्यक्ति ने अपने गुरूजी से लिखने के लिए कलम और कागज़ माँगा गुरूजी ने ऐसा ही किया और उसे वो कलम और कागज़ देकर मानसी गंगा में स्नान करने चले गए जब गुरूजी स्नान करके आश्रममें आये
तो पाया कि उस भक्त ने दीवार के सहारे लग कर अपना शरीर त्याग दिया थाऔर उस कागज़ पर कुछ लिखा हुआ था उस पर लिखा था
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"गुरूजी मैंने यह बात किसी को भी नहीं बताई है,पहले सिर्फ आपको ही बताना चाहता हू ,आप कहतेथे न कि निधिवन में आज भी भगवान रास रचाने आते है और मैं आपकी कही बात पर यकीन नहीं करता था, लेकिन जब मैं निधिवन में रूका तब मैंने साक्षात बांके बिहारी का राधा रानी के साथ गोपियों के
साथ रास रचाते हुए दर्शन किया और अब मेरी जीने की कोई भी इच्छा नहीं है ,इस जीवन का जो लक्ष्य था वो लक्ष्य मैंने प्राप्त कर लिया है और अब मैं जीकर करूँगा भी क्या?
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श्याम सुन्दर की सुन्दरता के आगे ये दुनिया वालो की सुन्दरता कुछ भी नहीं है,इसलिए आपके श्री चरणों में मेरा अंतिम प्रणाम स्वीकार कीजिये"
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वो पत्र जो उस भक्त ने अपने गुरु के लिए लिखा था आज भी मथुरा के सरकारी संघ्रालय में रखा हुआ है और बंगाली भाषा में लिखा हुआ है
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कहा जाता है निधिवन के सारी लताये गोपियाँ है जो एक दूसरे कि बाहों में बाहें डाले खड़ी है जब रात में निधिवन में राधा रानी जी, बिहारी जीके साथ रास लीला करती हैतो वहाँ की लताये गोपियाँ बन जाती है, और फिर रास लीला आरंभ होती है,इस रास लीला को कोई नहीं देख सकता,दिन भर में हजारों बंदर, पक्षी,जीव जंतु निधिवन में रहते है पर जैसे ही शाम होती है,सब जीव जंतुबंदर अपने आप निधिवन में चले जाते है एक परिंदा भी फिर वहाँ पर नहीं रुकता यहाँ तक कि जमीन के अंदर के जीव चीटी आदि भी जमीन के अंदर चले जाते है रास लीला को कोई नहीं देख सकता क्योकि रास लीला इस लौकिक जगत की लीला नहीं है रास तो अलौकिक जगत की "परम दिव्यातिदिव्य लीला" है कोई साधारण व्यक्ति या जीव अपनी आँखों से देख ही नहीं सकता. जो बड़े बड़े संत है उन्हें निधिवन से राधारानी जी और गोपियों के नुपुर की ध्वनि सुनी है.
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जब रास करते करते राधा रानी जी थक जाती है तो बिहारी जी उनके चरण दबाते है. और रात्रि मेंशयन करते है आज भी निधिवन में शयन कक्ष है जहाँ पुजारी जी जल का पात्र, पान,फुल और प्रसाद रखते है, और जब सुबह पट खोलते... है तो जल पीया मिलता है पान चबाया हुआ मिलता है और फूल बिखरे हुए मिलते है.राधे..........राधे...
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वृन्दावन धाम या बरसाना कोई घूमने फिरने या पिकनिक मनाने की जगह नहीं है ये आपके इष्ट की जन्मभूमि लीलाभूमि व् तपोभूमि है सबसे ख़ास बात ये प्रेमभूमि है जब भी आओ इसको तपोभूमि समझ कर मानसिक व् शारीरिक तप किया करो शरीर से सेवा व् वाणी से राधा नाम गाया जाए तब ही धाम मे आना सार्थक है
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एक अद्भुत मस्ती ताकत व् आनंद ले कर वापिस जाया करो .आप की धाम निष्ठां मे वृद्धि हो इसी कामना से..........
।।श्री राधे श्री हरिदास जी।।

प्रभु श्री कृष्ण की प्राप्ति किसे होती है..?एक सुन्दर कहानी है :--एक राजा था। वह बहुत न्याय प्रिय तथा प्रजा वत्सल एवं धा...
13/05/2019

प्रभु श्री कृष्ण की प्राप्ति किसे होती है..?

एक सुन्दर कहानी है :--
एक राजा था। वह बहुत न्याय प्रिय तथा प्रजा वत्सल एवं धार्मिक स्वभाव का था। वह नित्य अपने इष्ट देव की बडी श्रद्धा से पूजा-पाठ और याद करता था।
एक बार भगवान श्री कृष्ण ने प्रसन्न होकर उसे दर्शन दिये तथा कहा -- "राजन् मैं तुमसे बहुत प्रसन्न हैं। बोलो तुम्हारी कोई इछा हॆ?"
प्रजा को चाहने वाला राजा बोला -- "भगवन् मेरे पास आपका दिया सब कुछ हैं आपकी कृपा से राज्य मे सब प्रकार सुख-शान्ति है। फिर भी मेरी एक ही ईच्छा हैं कि जैसे आपने मुझे दर्शन देकर धन्य किया, वैसे ही मेरी सारी प्रजा को भी कृपा कर दर्शन दीजिये।"
"यह तो सम्भव नहीं है" -- ऐसा कहते हुए भगवान ने राजा को समझाया। परन्तु प्रजा को चाहने वाला राजा भगवान् से जि्द करने लगा।
आखिर भगवान को अपने भक्त के सामने झुकना पडा ओर वे बोले -- "ठीक है, कल अपनी सारी प्रजा को उस पहाड़ी के पास ले आना और मैं पहाडी के ऊपर से सभी को दर्शन दूँगा ।"
ये सुन कर राजा अत्यन्त प्रसन्न हुअा और भगवान को धन्यवाद दिया। अगले दिन सारे नगर मे ढिंढोरा पिटवा दिया कि कल सभी पहाड़ के नीचे मेरे साथ पहुँचे, वहाँ भगवान् आप सबको दर्शन देगें। दूसरे दिन राजा अपने समस्त प्रजा और स्वजनों को साथ लेकर पहाडी की ओर चलने लगा।
चलते-चलते रास्ते मे एक स्थान पर तांबे कि सिक्कों का पहाड देखा। प्रजा में से कुछ एक लोग उस ओर भागने लगे। तभी ज्ञानी राजा ने सबको सर्तक किया कि कोई उस ओर ध्यान न दे, क्योकि तुम सब भगवान से मिलने जा रहे हो, इन तांबे के सिक्कों के पीछे अपने भाग्य को लात मत मारो ।
परन्तु लोभ-लालच मे वशीभूत प्रजा के कुछ एक लोग तो तांबे की सिक्कों वाली पहाड़ी की ओर भाग ही गयी और सिक्कों कि गठरी बनाकर अपने घर कि ओर चलने लगे। वे मन ही मन सोच रहे थे, पहले ये सिक्कों को समेट ले, भगवान से तो फिर कभी मिल ही लेगे ।
राजा खिन्न मन से आगे बढे। कुछ दूर चलने पर चांदी कि सिक्कों का चमचमाता पहाड़ दिखाई दिया । इस बार भी बचे हुये प्रजा में से कुछ लोग, उस ओर भागने लगे ओर चांदी के सिक्कों को गठरी बनाकर अपनी घर की ओर चलने लगे। उनके मन मे विचार चल रहा था कि ऐसा मौका बार-बार नहीं मिलता है। चांदी के इतने सारे सिक्के फिर मिले न मिले, भगवान तो फिर कभी मिल ही जायेगें. इसी प्रकार कुछ दूर और चलने पर सोने के सिक्कों का पहाड़ नजर आया। अब तो प्रजा जनो में बचे हुये सारे लोग तथा राजा के स्वजन भी उस ओर भागने लगे।
वे भी दूसरों की तरह सिक्कों कि गठरीयां लाद-लाद कर अपने-अपने घरों की
ओर चल दिये। अब केवल राजा ओर रानी ही शेष रह गये थे। राजा रानी से कहने लगे --
"देखो कितने लोभी ये लोग। भगवान से मिलने का महत्व ही नहीं जानते हैं। भगवान के सामने सारी दुनियां की दौलत क्या चीज हैं..?"
सही बात है -- रानी ने राजा कि बात का समर्थन किया और वह आगे बढने लगे कुछ दुर चलने पर राजा ओर रानी ने देखा कि सप्तरंगि आभा बिखरता हीरों का पहाड़ हैं । अब तो रानी से भी रहा नहीं गया, हीरों के आर्कषण से वह भी दौड पड़ी और हीरों कि गठरी बनाने लगी । फिर भी उसका मन नहीं भरा तो साड़ी के पल्लू मेँ भी बांधने लगी । वजन के कारण रानी के वस्त्र देह से अलग हो गये, परंतु हीरों का तृष्णा अभी भी नहीं मिटी। यह देख राजा को अत्यन्त ही ग्लानि ओर विरक्ति हुई । बड़े दुःखद मन से राजा अकेले ही आगे बढते गये ।
वहाँ सचमुच भगवान खड़े उसका इन्तजार कर रहे थे । राजा को देखते ही भगवान मुसकुराये ओर पुछा -- "कहाँ है तुम्हारी प्रजा और तुम्हारे प्रियजन । मैं तो कब से उनसे मिलने के लिये बेकरारी से उनका इन्तजार कर रहा हूॅ ।" राजा ने शर्म और आत्म-ग्लानि से अपना सर झुका दिया ।
तब भगवान ने राजा को समझाया --
"राजन, जो लोग अपने जीवन में भौतिक सांसारिक प्राप्ति को मुझसे अधिक मानते हैं, उन्हें कदाचित मेरी प्राप्ति नहीं होती और वह मेरे स्नेह तथा कृपा से भी वंचित रह जाते हैं..!!"
:
सार..
जो जीव अपनी मन, बुद्धि और आत्मा से भगवान की शरण में जाते हैं, और
सर्व लौकिक सम्बधों को छोडके प्रभु को ही अपना मानते हैं वो ही भगवान के प्रिय बनते हैं

हरे कृष्ण भक्तो दंडवत प्रणाम

राधे राधे जी पर्भु लीला भगवान श्रीकृष्ण की आठ रानियाँ थी जिनमे दो पहली रानियों का नाम था, सत्यभामा और रुक्मणी. दोनों ही ...
11/05/2019

राधे राधे जी
पर्भु लीला
भगवान श्रीकृष्ण की आठ रानियाँ थी जिनमे दो पहली रानियों का नाम था, सत्यभामा और रुक्मणी. दोनों ही भगवान कृष्ण से बहुत प्रेम करते थे. परन्तु सत्यभामा में एक कमी थी. सत्यभामा को अपने पिता के धन पर बहुत घमंड था. सत्यभामा के पिता के पास स्यमन्तक नामक एक मणि थी जो उन्हें सूर्य देव ने दी थी. वह मणि रोज एक किलो सोना देती थी. भगवान श्री कृष्ण ने अपनी पत्नी सत्यभामा के घमंड को तोड़ने के लिए एक लीला रची.
एक बार नारद मुनि द्वारिका पधारे, देवी सत्यभामा ने उनका खूब आदर-सत्कार किया. जब नारद जी वहा से जाने लगे तब सत्यभामा ने नारद जी को रोकते हुए कहा आप ब्रह्मचारी है, आप को किये हुए दान से असंख्य पुण्यो की प्राप्ति होती है अतः कृपया मेरे द्वारा दान ग्रहण कीजिये. नारद ने सत्यभामा से कहा देवी आप रहने दीजिये. मेरे द्वारा मांगी गई वस्तु आप दान नही कर पाएंगी. देवी सत्यभामा को धन का बहुत घमंड था अतः उन्होंने कहा ऐसी कोई भी वस्तु नही जो में दान न कर सकु.फिर भी में हाथ में इस जल को लेकर आपको वचन देती हु जो भी आप दान में मांगोगे में आपको दूंगी.नारद मुनि ने तुरंत भगवान श्री कृष्ण ही दान में मांग लिया. वचन से बंधे होने के कारण सत्यभामा ने श्री कृष्ण को दान में दे दिया.
फिर क्या था भगवान श्री कृष्ण और नारद मुनि ने अपनी लीला शुरू कर दी. नारद मुनि भगवान श्री कृष्ण को जैसा आदेश देते कृष्ण कहे अनुसार ही करते जाते. कभी वे नारद जी के पैर दबाते तो कभी उनके लिए भोजन पकाते. नारद मुनि के कहे पर वे उठते और बैठते थे. सारी रानियाँ कृष्ण की यह दशा देख दुखी हो गई. अंत में रानि सत्यभामा रोते हुए नारद जी के चरणो में गई तथा उनसे भगवान श्री कृष्ण के बदले में कुछ अन्य वस्तु मांगने की प्रार्थना करने लगी. परन्तु नारद मुनि ने भगवान श्री कृष्ण को वापस करने के बदले में एक शर्त रखी की देवी सत्यभामा आपको भगवान श्री कृष्ण के वजन के बराबर
स्वर्ण का दान करना होगा.
तब एक तुला मगाई गई जिसके एक छोर के पलड़े पर भगवान कृष्ण बैठे थे तथा दूसरे पलड़े पर रानियों ने अपने सभी आभूषण डाले. सत्यभामा ने अपने सभी खजाने खोल दिए और भगवान कृष्ण को उनसे तोलने लगी. परन्तु भगवान कृष्ण वाला पलड़ा अपनी पूर्व स्थिति में ही बना रहा. तब देवी रुक्मणी ने भगवान कृष्ण को अपने मन में याद किया और सारे आभूषणो को हटा कर उसकी जगह एक तुलसी का पत्ता रखा. देवी रुक्मणी के प्रेम से भरे उस पत्ते के भार से वह तराजू का पलड़ा भारी हो गया और कृष्ण वाला पलड़ा उपर उठ आया. तब सत्यभामा को अपने घमंड का अहसास हुआ और उन्होंने देवी रुक्मणी, भगवान कृष्ण और नारद मुनि से क्षमा मांगी !

18 अप्रैल 2018 दिन बुधवार (अक्षय तृतीया) इस दिन वृन्दावन के लाड़ले ओर हम सब के प्यारे श्री बाँके बिहारी लाल जी के चरण दर्...
18/04/2019

18 अप्रैल 2018 दिन बुधवार (अक्षय तृतीया) इस दिन वृन्दावन के लाड़ले ओर हम सब के प्यारे श्री बाँके बिहारी लाल जी के चरण दर्शन होते है
श्री बाँके बिहारी जी लाल के चरणों के दर्शन साल में सिर्फ एक बार ही होते है अन्यथा वो पोशाक में छिपे रहते है

इस दिन श्री बाँके बिहारी जी पेजेब भी पहनाई जाती है कहा जाता है जिनकी शादी में रुकावटे बहुत आती हो वो अक्षय तृतीया को बिहारी जी को पेजेब भेंट कर दे तो उनका वर जल्दी मिल जाता है

इस दिन अधिक गर्मी होने के कारण श्री बाँके बिहारी जी को चंदन का लेप भी किया जाता है जिससे उनको गर्मी से राहत मिल सके

अक्षय तृतीया के दिन श्री बाँके बिहारी जी पीले वस्त्रों में अपने भगतो को फूल बंगले में विराजकर दर्शन देगे।

अक्षय तृतीया को जो के आटे का सत्तू ,चने के आटे का सत्तू ,गेंहू के आटे का सत्तू,ओर भी अनेक प्रकार के सत्तू का शर्बत बनाकर ठाकुरजी की भोग लगता है परन्तु अब बड़े बड़े शहर होते जा रहे तो वहाँ सत्तू नही मिल पाता तो उसकी जगह आप मीठे शर्बत का प्रसाद भी लगा सकते है

सभी अपने लड्डू गोपाल, जुगल जोड़ी आदि सब का सुंदर श्रृंगार कर चंदन का लेप जरूर लगाए और ठाकुर जी को पायल भी पहनाए ओर शर्बत का भोग भी लगाए
🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏
🙏🌺जय जय श्री राधे🙏🌺

17/04/2019

निधिवन का रहस्य, क्या सच में रास रचाने आते हैं रात में राधा कृष्ण ......?

कहा जाता है निधिवन के सारी लताये गोपियाँ है जो एक दूसरे कि बाहों में बाहें डाले खड़ी है जब रात में निधिवन में राधा रानी जी, बिहारी जी के साथ रास लीला करती है

तो वहाँ की लताये गोपियाँ बन जाती है,और फिर रास लीला आरंभ होती है,इस रास लीला को कोई नहीं देख सकता,दिन भर में हजारों बंदर, पक्षी,जीव जंतु निधिवन में रहते है पर जैसे ही शाम होती हैं

सब जीव जंतु बंदर अपने आप निधिवन से चले जाते है एक परिंदा भी फिर वहाँ पर नहीं रुकता यहाँ तक कि जमीन के अंदर के जीव चीटी आदि भी जमीन के अंदर चले जाते है

रास लीला को कोई नहीं देख सकता क्योकि रास लीला इस लौकिक जगत की लीला नहीं है रास तो अलौकिक जगत की "परम दिव्यातिदिव्य लीला" है

कोई साधारण व्यक्ति या जीव अपनी आँखों से देख ही नहीं सकता. जो बड़े बड़े संत है उन्हें निधिवन से राधारानी जी और गोपियों के नुपुर की ध्वनि सुनी है.

जब रास करते करते राधा रानी जी थक जाती है तो बिहारी जी उनके चरण दबाते है. और रात्रि में शयन करते है शयन के लिए पलंग लगाया जाता है। सुबह बिस्तरों के देखने से प्रतीत होता है
कि यहां निश्चित ही कोई रात्रि विश्राम करने आया तथा प्रसाद भी ग्रहण किया है। लगभग दो ढ़ाई एकड़ क्षेत्रफल में फैले निधिवन के वृक्षों की खासियत यह है

कि इनमें से किसी भी वृक्ष के तने सीधे नहीं मिलेंगे तथा इन वृक्षों की डालियां नीचे की ओर झुकी तथा आपस में गुंथी हुई प्रतीत हाते हैं।

निधिवन परिसर में ही संगीत सम्राट एवं धुपद के जनक श्री स्वामी हरिदास जी की जीवित समाधि, रंग महल, बांके बिहारी जी का प्राकट्य स्थल, राधारानी बंशी चोर आदि दर्शनीय स्थान है।
निधिवन दर्शन के दौरान वृन्दावन के पंडे-पुजारी, गाईड द्वारा निधिवन के बारे में जो जानकारी दी जाती है,

उसके अनुसार निधिवन में प्रतिदिन रात्रि में होने वाली श्रीकृष्ण की रासलीला को देखने वाला अंधा, गूंगा, बहरा, पागल और उन्मादी हो जाता है ताकि वह इस रासलीला के बारे में किसी को बता ना सके।

इसी कारण रात्रि 8 बजे के बाद पशु-पक्षी, परिसर में दिनभर दिखाई देने वाले बन्दर, भक्त, पुजारी इत्यादि सभी यहां से चले जाते हैं। और परिसर के मुख्यद्वार पर ताला लगा दिया जाता है।

उनके अनुसार यहां जो भी रात को रुक जाते है वह सांसारिक बन्धन से मुक्त हो जाते हैं और जो मुक्त हो गए हैं, उनकी समाधियां परिसर में ही बनी हुई है।

इसी के साथ गाईड यह भी बताते हैं कि निधिवन में जो 16000 आपस में गुंथे हुए वृक्ष आप देख रहे हैं, वही रात में श्रीकृष्ण की 16000 रानियां बनकर उनके साथ रास रचाती हैं। रास के बाद श्रीराधा और श्रीकृष्ण परिसर के ही रंग महल में विश्राम करते हैं।

सुबह 5:30 बजे रंग महल का पट खुलने पर उनके लिए रखी दातून गीली मिलती है और सामान बिखरा हुआ मिलता है

जैसे कि रात को कोई पलंग पर विश्राम करके गया हो।
आज भी निधिवन में शयन कक्ष है जहाँ पुजारी जी जल का पात्र, पान,फुल और प्रसाद रखते है,
और जब सुबह पट खोलते है तो जल पीया मिलता है पान चबाया हुआ मिलता है और फूल बिखरे हुए मिलते है.

निधिवन परिसर में ही संगीत सम्राट एवं धुपद के जनक श्री स्वामी हरिदास जी की जीवित समाधि, रंग महल, बांके बिहारी जी का प्राकट्य स्थल, राधारानी बंशी चोर आदि दर्शनीय स्थान है।

वृन्दावन धाम या बरसना कोई घुमने फिरने या पिकनिक मनाने की जगह नहीं है
ये आपके इष्ट की जन्मभूमि लीलाभूमि व् तपोभूमि है

सबसे ख़ास बात ये प्रेमभूमि है
जब भी आओ इसको तपोभूमि समझ कर मानसिक व् शारीरिक तप किया करो

शरीर से सेवा व वाणी से राधा नाम गाया जाए तब ही धाम मे आना सार्थक है
एक अद्भुत मस्ती ताकत व आनंद ले कर वापिस जाया करो .
जै जै वृन्दावनधाम

*राजस्थान के सीकर जिले में श्री खाटू श्याम जी का सुप्रसिद्ध मंदिर है. वैसे तो खाटू श्याम बाबा के भक्तों की कोई गिनती नही...
27/03/2019

*राजस्थान के सीकर जिले में श्री खाटू श्याम जी का सुप्रसिद्ध मंदिर है. वैसे तो खाटू श्याम बाबा के भक्तों की कोई गिनती नहीं लेकिन इनमें खासकर वैश्य, मारवाड़ी जैसे व्यवसायी वर्ग अधिक संख्या में है. श्याम बाबा कौन थे, उनके जन्म और जीवन चरित्र के बारे में जानते हैं इस लेख में*

*खाटू श्याम बाबा कौन हैं* :-
खाटू श्याम जी का असली नाम बर्बरीक है. महाभारत की एक कहानी के अनुसार बर्बरीक का सिर राजस्थान प्रदेश के खाटू नगर में दफना दिया था. इसीलिए बर्बरीक जी का नाम खाटू श्याम बाबा के नाम से प्रसिद्ध हुआ. वर्तमान में खाटूनगर सीकर जिले के नाम से जाना जाता है. खाटू श्याम बाबा जी कलियुग में श्री कृष्ण भगवान के अवतार के रूप में माने जाते हैं.


*खाटू श्याम बाबा की कहानी* – :
श्याम बाबा घटोत्कच और नागकन्या नाग कन्या मौरवी के पुत्र हैं. पांचों पांडवों में सर्वाधिक बलशाली भीम और उनकी पत्नी हिडिम्बा बर्बरीक के दादा दादी थे. कहा जाता है कि जन्म के समय बर्बरीक के बाल बब्बर शेर के समान थे, अतः उनका नाम बर्बरीक रखा गया. बर्बरीक का नाम श्याम बाबा कैसे पड़ा, आइये इसकी कहानी जानते हैं.

*श्री खाटू श्याम बाबा जी की कहानी*

बर्बरीक बचपन में एक वीर और तेजस्वी बालक थे. बर्बरीक ने भगवान श्री कृष्ण और अपनी माँ मौरवी से युद्धकला, कौशल सीखकर निपुणता प्राप्त कर ली थी. बर्बरीक ने भगवान शिव की घोर तपस्या की थी, जिसके आशीर्वादस्वरुप भगवान ने शिव ने बर्बरीक को 3 चमत्कारी बाण प्रदान किए. इसी कारणवश बर्बरीक का नाम तीन बाणधारी के रूप में भी प्रसिद्ध है. भगवान अग्निदेव ने बर्बरीक को एक दिव्य धनुष दिया था, जिससे वो तीनों लोकों पर विजय प्राप्त करने में समर्थ थे.

जब कौरवों-पांडवों का युद्ध होने का सूचना बर्बरीक को मिली तो उन्होंने भी युद्ध में भाग लेने का निर्णय लिया. बर्बरीक अपनी माँ का आशीर्वाद लिए और उन्हें हारे हुए पक्ष का साथ देने का वचन देकर निकल पड़े. इसी वचन के कारण हारे का सहारा बाबा श्याम हमारा यह बात प्रसिद्ध हुई.


जब बर्बरीक जा रहे थे तो उन्हें मार्ग में एक ब्राह्मण मिला. यह ब्राह्मण कोई और नहीं, भगवान श्री कृष्ण थे जोकि बर्बरीक की परीक्षा लेना चाहते थे. ब्राह्मण बने श्री कृष्ण ने बर्बरीक से प्रश्न किया कि वो मात्र 3 बाण लेकर लड़ने को जा रहा है ? मात्र 3 बाण से कोई युद्ध कैसे लड़ सकता है. बर्बरीक ने कहा कि उनका एक ही बाण शत्रु सेना को समाप्त करने में सक्षम है और इसके बाद भी वह तीर नष्ट न होकर वापस उनके तरकश में आ जायेगा. अतः अगर तीनों तीर के उपयोग से तो सम्पूर्ण जगत का विनाश किया जा सकता है.

ब्राह्मण ने बर्बरीक से एक पीपल के वृक्ष की ओर इशारा करके कहा कि वो एक बाण से पेड़ के सारे पत्तों को भेदकर दिखाए. बर्बरीक ने भगवान का ध्यान कर एक बाण छोड़ दिया. उस बाण ने पीपल के सारे पत्तों को छेद दिया और उसके बाद बाण ब्राह्मण बने कृष्ण के पैर के चारों तरफ घूमने लगा. असल में कृष्ण ने एक पत्ता अपने पैर के नीचे छिपा दिया था. बर्बरीक समझ गये कि तीर उसी पत्ते को भेदने के लिए ब्राह्मण के पैर के चक्कर लगा रहा है. बर्बरीक बोले – हे ब्राह्मण अपना पैर हटा लो, नहीं तो ये आपके पैर को वेध देगा.


श्री कृष्ण बर्बरीक के पराक्रम से प्रसन्न हुए. उन्होंने पूंछा कि बर्बरीक किस पक्ष की तरफ से युद्ध करेंगे. बर्बरीक बोले कि उन्होंने लड़ने के लिए कोई पक्ष निर्धारित किया है, वो तो बस अपने वचन अनुसार हारे हुए पक्ष की ओर से लड़ेंगे. श्री कृष्ण ये सुनकर विचारमग्न हो गये क्योकि बर्बरीक के इस वचन के बारे में कौरव जानते थे. कौरवों ने योजना बनाई थी कि युद्ध के पहले दिन वो कम सेना के साथ युद्ध करेंगे. इससे कौरव युद्ध में हराने लगेंगे, जिसके कारण बर्बरीक कौरवों की तरफ से लड़ने आ जायेंगे. अगर बर्बरीक कौरवों की तरफ से लड़ेंगे तो उनके चमत्कारी बाण पांडवों का नाश कर देंगे.

कौरवों की योजना विफल करने के लिए ब्राह्मण बने कृष्ण ने बर्बरीक से एक दान देने का वचन माँगा. बर्बरीक ने दान देने का वचन दे दिया. अब ब्राह्मण ने बर्बरीक से कहा कि उसे दान में बर्बरीक का सिर चाहिए. इस अनोखे दान की मांग सुनकर बर्बरीक आश्चर्यचकित हुए और समझ गये कि यह ब्राह्मण कोई सामान्य व्यक्ति नहीं है. बर्बरीक ने प्रार्थना कि वो दिए गये वचन अनुसार अपने शीश का दान अवश्य करेंगे, लेकिन पहले ब्राह्मणदेव अपने वास्तविक रूप में प्रकट हों.

भगवान कृष्ण अपने असली रूप में प्रकट हुए. बर्बरीक बोले कि हे देव मैं अपना शीश देने के लिए बचनबद्ध हूँ लेकिन मेरी युद्ध अपनी आँखों से देखने की इच्छा है. श्री कृष्ण बर्बरीक ने बर्बरीक की वचनबद्धता से प्रसन्न होकर उसकी इच्छा पूरी करने का आशीर्वाद दिया. बर्बरीक ने अपना शीश काटकर कृष्ण को दे दिया. श्री कृष्ण ने बर्बरीक के सिर को 14 देवियों के द्वारा अमृत से सींचकर युद्धभूमि के पास एक पहाड़ी पर स्थित कर दिया, जहाँ से बर्बरीक युद्ध का दृश्य देख सकें. इसके पश्चात कृष्ण ने बर्बरीक के धड़ का शास्त्रोक्त विधि से अंतिम संस्कार कर दिया.

महाभारत का महान युद्ध समाप्त हुआ और पांडव विजयी हुए. विजय के बाद पांडवों में यह बहस होने लगी कि इस विजय का श्रेय किस योद्धा को जाता है. श्री कृष्ण ने कहा – चूंकि बर्बरीक इस युद्ध के साक्षी रहे हैं अतः इस प्रश्न का उत्तर उन्ही से जानना चाहिए. तब परमवीर बर्बरीक ने कहा कि इस युद्ध की विजय का श्रेय एकमात्र श्री कृष्ण को जाता है, क्योकि यह सब कुछ श्री कृष्ण की उत्कृष्ट युद्धनीति के कारण ही सम्भव हुआ. विजय के पीछे सबकुछ श्री कृष्ण की ही माया थी.


बर्बरीक के इस सत्य वचन से देवताओं ने बर्बरीक पर पुष्पों की वर्षा की और उनके गुणगान गाने लगे. श्री कृष्ण वीर बर्बरीक की महानता से अति प्रसन्न हुए और उन्होंने कहा – हे वीर बर्बरीक आप महान है. मेरे आशीर्वाद स्वरुप आज से आप मेरे नाम श्याम से प्रसिद्ध होओगे. कलियुग में आप कृष्णअवतार रूप में पूजे जायेंगे और अपने भक्तों के मनोरथ पूर्ण करेंगे.

भगवान श्री कृष्ण का वचन सिद्ध हुआ और आज हम देखते भी हैं कि भगवान श्री खाटू श्याम बाबा जी अपने भक्तों पर निरंतर अपनी कृपा बनाये रखते हैं. बाबा श्याम अपने वचन अनुसार हारे का सहारा बनते हैं. इसीलिए जो सारी दुनिया से हारा सताया गया होता है वो भी अगर सच्चे मन से बाबा श्याम के नामों का सच्चे मन से नाम ले और स्मरण करे तो उसका कल्याण अवश्य ही होता है. श्री खाटू श्याम बाबा की महिमा अपरम्पार है, सश्रद्धा विनती है कि बाबा श्याम इसी प्रकार अपने भक्तों पर अपनी कृपा बनाये रखें.

🌹🌹*जय श्री श्याम*🌹🌹

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