श्री गर्गाचार्य ज्योतिष अनुसंधान एवं सेवा ट्रस्ट

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विशेष=ज्योतिष शास्त्र, कुण्डली निर्माण , कुण्डली परामर्श,,हस्त रेखा, वास्तु शास्त्र ,अंक ज्योतिष,( श्री मद्भागवत कथा, श्री राम कथा,शिव पुराण कथा, विष्णु पुराण कथा,,देवी भागवत, कथा )कथा प्रवक्ता,= श्री गर्गाचार्य जी महाराज, 8736849010

🌺 || ॐ नमो भगवते वासुदेवाय || 🌺🔱 श्री गर्गाचार्य ज्योतिष अनुसंधान एवं सेवा ट्रस्ट 🔱📿 आचार्य , शिवम शुक्ल(ज्योतिषाचार्य ए...
21/05/2026

🌺 || ॐ नमो भगवते वासुदेवाय || 🌺
🔱 श्री गर्गाचार्य ज्योतिष अनुसंधान एवं सेवा ट्रस्ट 🔱
📿 आचार्य , शिवम शुक्ल
(ज्योतिषाचार्य एवं वास्तु विशेषज्ञ)
✨ हमारी सेवाएं ✨
🔸 ज्योतिष परामर्श
🔸 वास्तु समाधान
🔸 कुंडली विश्लेषण
🔸 विवाह एवं ग्रह दोष समाधान
🔸 आध्यात्मिक मार्गदर्शन
🔸 सामाजिक एवं धार्मिक सेवा कार्य
🌿 विश्वास • सेवा • संस्कार 🌿
📍 पता :
Vill. Ufrouli, Post. Bariganv,
Khajni, Gorakhpur, Uttar Pradesh
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8736849010
8948052010
🙏 “ज्योतिष से मार्गदर्शन, वास्तु से समृद्धि और सेवा से समाज कल्याण।” 🙏

👉🏻 होली पर्व 👈🏻होलीका दहन दिनांक और शुभ मुहूर्त 👇🏻०२ मार्च, सोमवार को कब से कब तक है पुर्णिमातिथि:-पंचांग के अनुसार २ मा...
25/02/2026

👉🏻 होली पर्व 👈🏻
होलीका दहन दिनांक और शुभ मुहूर्त 👇🏻

०२ मार्च, सोमवार को कब से कब तक है पुर्णिमा
तिथि:-
पंचांग के अनुसार २ मार्च सोमवार को चतुर्थी तिथि श्याम ०५ बजकर ५६ मिनट तक रहेगी। इसके बाद पुर्णिमा तिथि शुरू हो जायेगी।

०२ मार्च को नक्षत्र की बात करें तो सुबह ७ बजकर ४२ मिनट तक आश्लैषा नक्षत्र रहेगा, इसके बाद मघा नक्षत्र लग जायेगा।

०२ मार्च को दिन में दोपहर १२ बजकर १९ मिनट तक अतिगंड योग रहेगा, उसके बाद सुकर्मा योग बनेगा।

अगले दिन यानी ०३ मार्च मंगलवार को पुर्णिमा तिथि शाम ०५ बजकर ०८ मिनट तक रहेगी।

पुर्णिमा के दिन होलिका दहन किया जाता है। इसके लिए मुख्यत: दो नियम ध्यान में रखने चाहिए।

(१) पहला उस समय भद्रा,न हो
भद्रा का ही एक दुसरा नाम विष्टि करण भी है। जो कि ११ करणो में से एक है। एक करण तिथि के आधे भाग बराबर होता है। अतिआवश्यक होने पर भद्रा के पुच्छ काल में होलिका दहन किया जा सकता है।

(२) पुर्णिमा प्रदोषकाल - व्यापनी होनी चाहिए। सरल शब्दों में कहें तो उस दिन सुर्यास्त के बाद के तीन मुर्हु्र्तो में पुर्णिमा तिथि होनी चाहिए। अतः होलिका दहन रात्रि में ही किया जाता है।

होलिका दहन रात्रि में ही क्यों होता है- शास्त्रों के अनुसार होलिका दहन हमेशा रात में ओर पुर्णिमा तिथि में ही किया जाता है। दिन में होलिका जलानें की परम्परा नहीं है। यही वजह है कि होलिका दहन के लिए रात का समय ही माना गया है। इस बार पुर्णिमा तिथि ०२ मार्च की शाम से शुरू हो रही है, इसलिए होलिका दहन भी ०२ मार्च की रात में ही होगा।

भद्रा का साया और दहन का सही समय-:।
इस साल होलिका दहन पर भद्रा का प्रभाव भी है। पंचांग के अनुसार ०२ मार्च सोमवार को शाम ५ बजकर ५६ मिनट से लेकर ३ मार्च की शुबह ५ बजकर ३० मिनट तक भद्रा रहेगी। यानी पुरी रात भद्रा का साया रहेगा। शास्त्रों में कहा गया है कि होलिका दहन नहीं किया जाता, लेकिन अगर पुरी रात भद्रा हो तो भद्रा के पुच्छ भाग में दहन करना शुभ माना जाता है। इस साल भद्रा का पुच्छ भाग मध्य रात्रि ०१ बजकर २६ मिनट से रात ०२ बजकर ३८ मिनट तक रहेगा।
यही समय होलिका दहन के लिए अच्छा माना गया है। यानी ०२ मार्च की मध्य रात्रि ०१ : २६ से ०२:३८ के बिच होलिका दहन करना शुभ रहेगा। यह करीब १घटा १२ मिनट का समय है।

०३ मार्च को चन्द्र ग्रहण/ ०४ मार्च को छारंडी-:

रंग खेलने की परम्परा होलिका दहन के अगले दिन होती है। लेकिन इस बार चन्द्र ग्रहण लग रहा है। यह चंद्र ग्रहण भारत में दिखाई देगा।
जिस वजह से सूतक काल मान्य होगा। इस दिन किसी भी तरह के मांगलिक कार्य नहीं किय जायेंगे अतः इस बार छारंडी ( होलिका उत्सव ) ४ मार्च २०२६ को मनाया जाना ज्यादा उचित रहेगा।

गोत्र क्या है..? जिनके गोत्र अज्ञात हैं , उनका क्या होगा ?〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️आज से लगभग ढाई वर्ष पूर्व किसी Fa...
22/02/2026

गोत्र क्या है..? जिनके गोत्र अज्ञात हैं , उनका क्या होगा ?
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आज से लगभग ढाई वर्ष पूर्व किसी Facebook User ने हमसे प्रश्न किया था की यदि माता-पिता में से पिता विधर्मी (अलग धर्म से) हो तो संतानों का गोत्र क्या होगा ?

इस प्रश्न ने मुझे बहुत प्रभावित किया था और मैंने इसका विस्तृत व्याख्यात्मक उत्तर दिया था । वो तो अब मुझसे संपर्क में हैं नहीं किन्तु उसका प्रश्न वर्तमान परिप्रेक्ष्य में परम् प्रासंगिक हैं ।

मुझे घोर आश्चर्य तब होता हैं जब सनातन धर्मानुयायियों को इतने गम्भीर तकनीकी प्रश्न पर निरुत्तर पाता हूँ ।
गोत्र मानवमात्र का होता हैं ; चाहे उसकी मान्यता गोत्रों में हो या चाहे न हो , चाहे वो सनातन धर्मानुयायी हो या न हो । आज इस लेख के माध्यम से मैं “गोत्र” इस विषय को स्पष्ट करने का प्रयत्न करूंगा।

सुविधा एवम् सरलता की दृष्टि से पोस्ट को मैंने दो भागों में बांटा है :-

1) गोत्र होते क्या हैं ?
2) जिनके गोत्र अज्ञात हैं , उनका क्या होगा ?

1. गोत्र क्या हैं ?
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गोत्र मोटे तौर पर उन लोगों के समूह को कहते हैं जिनका वंश एक मूल पुरुष पूर्वज से अटूट क्रम में जुड़ा है । गोत्र जिसका अर्थ वंश भी है , यह एक ऋषि के माध्यम से शुरू होता है और हमें हमारे पूर्वजों की याद दिलाता है और हमें हमारे कर्तव्यों के बारे में बताता है । व्याकरण के प्रयोजनों के लिये पाणिनि में गोत्र की परिभाषा है 'अपात्यम पौत्रप्रभ्रति गोत्रम्' (४.१.१६२), अर्थात 'गोत्र शब्द का अर्थ है बेटे के बेटे के साथ शुरू होने वाली (एक ऋषि की) संतान् । गोत्र, कुल या वंश की संज्ञा है जो उसके किसी मूल पुरुष के अनुसार होती है ।
महाभारत के शान्तिपर्व (296-17, 18) में वर्णन है कि मूल चार गोत्र थे ; अंगिरा , कश्यप , वशिष्ठ और भृगु । बाद में आठ हो गए जब जमदन्गि, अत्रि, विश्वामित्र तथा अगस्त्य के नाम जुड़ गए । एक अन्य मान्यता है कि प्रारंभ में सात गोत्र थे कालांतर में दूसरे ऋषियों के सानिध्य के कारण अन्य गोत्र अस्तित्व में आये ।
*मेरे विचार*- एक मान्यता के अनुसार सात पीढ़ी बाद सगापन खत्म हो जाता है अर्थात सात पीढ़ी बाद गोत्र का मान बदल जाता है और आठवी पीढ़ी के पुरुष के नाम से नया गोत्र आरम्भ होता है (हम इस मान्यता के प्रबल समर्थक हैं) । हम गोत्र को Scientific व्यवस्था मानते हैं एवम् जीवन के (और जीवन के बाद भी) प्रत्येक क्षेत्र में “गोत्रों” का व्यापक महत्त्व स्वीकार करते हैं ।
व्यावहारिक रूप में "गोत्र" से आशय पहचान से है , जो ब्राह्मणों के लिए उनके ऋषिकुल से होती है ।

2. जिनके गोत्र अज्ञात हैं , उनका क्या होगा ?
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प्रत्येक मानव का गोत्र होता हैं , गोत्र एक Scientific व्यवस्था हैं । हिन्दू , मुस्लिम , ईसाई , अधर्मी , विधर्मी इन सबके गोत्र होते हैं – चाहे माने या न माने । कल्पना कीजिए एक बच्चा जिसे अपने माता-पिता के विषय में कुछ नहीं मालूम , उसका क्या होगा ?
- उसे “कश्यप गोत्रीय” अर्थात “कश्यप गोत्र” का माना जाएगा ।
इसकी शास्त्रोक्त व्यवस्था देखिए :-
“गोत्रस्य त्वपरिज्ञाने काश्यपं गोत्रमुच्यते।
यस्मादाह श्रुतिस्सर्वाः प्रजाः कश्यपसंभवाः।।“ (हेमाद्रि चन्द्रिका)

जिसका गोत्र अज्ञात हो उसे “कश्यप गोत्रीय" (कश्यप गोत्र का) माना जाएगा और यह एक शास्त्र सम्मत व्यवस्था है अर्थात् पूर्णतः निर्दोष व्यवस्था है।
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