15/01/2024
॥जय श्रीराम॥
॥श्रीरामचन्द्रचरणौ शरणं प्रपद्ये॥
आगामी पौष शुक्लपक्ष की द्वादशी तिथि, २२ जनवरी २०२४, को श्रीसाकेत धाम में अपने जन्म स्थान पर श्रीरामचन्द्रजी के अभिराम विग्रह की अपने नूतन मन्दिर में प्रतिष्ठा होने जा रही है। यह हमलोगों के लिए अतिशय आह्लादक क्षण है। इस क्षण की प्राप्ति के लिए असंख्य सनातनी योद्धाओं ने अपने प्राणों का उत्सर्ग और संघर्ष किया है। विभिन्न लोग विभिन्न प्रकार से अपनी हार्दिक भावनाओं के उद्गार के द्वारा इस उत्सव वेला को और भी मधुरिम बनाने के लिए प्रयत्नशील हैं। इस अवसर पर इस तुच्छ दास के द्वारा भी कुछ सेवापुष्प अर्पण किए जा रहें है। ये सेवापुष्प श्री-वैष्णव सम्प्रदाय के महान् दुर्धर्ष आचार्य, कवितार्किकसिंह और वेदान्तदेशिक के नाम से विख्यात श्रीवेंकटनाथ जी की ‘रघुवीरगद्य’ अथवा ‘महावीरवैभव’ नामक कृति में श्रीरामचन्द्र के गुण-लीलामय ९४ नामों की एक ऐसी शृंखला है जिसमें सम्पूर्ण वाल्मीकि रामायण समाहित है। अतः द्वादशी तिथि तक उनके द्वारा विरचित गुणलीलामय श्रीरामनाम-पुष्पों का क्रमशः समर्पण करते रहने की अभिलाषा दास के मन में उदित हुई है। श्रीरामजी इस अभिलाषा को पूर्ण करें। आपलोग भी इसका आस्वादन करते हुए कृतकृत्य होवें।
गद्य होने पर भी विरुदकाव्य की भाँति यह गेय काव्य है। श्रीदेशिकजी की भाषा की अतिप्रौढ़ता और भाव की गम्भीरता तो विश्वविदित है और यहाँ भी मूलांश पढ़नेवाले स्वयं समझ सकते हैं। इसके विपरीत दास की योग्यता बहुत न्यून है, इसलिए अनुवाद सर्वथा निर्दोष नहीं हो सकता है। तथापि, श्रीरामजी के शरणागत होकर इस भाषापरिवर्तनरूप संस्कार में प्रवृत्त होकर यह दास इन्हें आपलोगों के समक्ष प्रस्तुत कर रहा है। अतः श्रीरामजी, श्रीदेशिकजी और सुधीजन से इन दोषों के लिए दास क्षमाप्रार्थना करता है। ‘तद्वाग्विसर्गो जनताघविप्लवः’ (भा.१.५.११) इस श्रीभागवतप्रोक्त सिद्धान्त के अनुसार भक्तों को भगवन्नामयशोयुक्त काव्य दोषयुक्त होने पर भी प्रिय ही होता है। यही भावना आपलोगों से भी अपेक्षित है।
‘श्रीरामभद्र’ इस वैभव के प्रायः अन्त में, ९३वीं चूर्णिका में प्रयुक्त अन्तिम सम्बोधन है, अतः विशेष्यस्थानीय होने के कारण प्रत्येक चूर्णिका के अनुवाद में इसका प्रयोग किया गया है।
१. जय जय महावीर!
अर्थ—हे महान् वीर श्रीरामभद्र! आपकी जय हो! आपकी जय हो!!
२. महाधीर-धौरेय!
अर्थ—हे महान् धीरों में अग्रणी श्रीरामभद्र!
३ देव!
अर्थ—हे दिव्य लीलाशील श्रीरामभद्र!
४. महासमर-समय-समुदित-निखिल-निर्जर-निर्धारित-निरवधिक-माहात्म्य!
अर्थ—विष्णु और शिव के मध्य घटित महासमर के समय उपस्थित सकल देवताओं के द्वारा निर्धारित असमोर्ध्व माहात्म्यवाले हे श्रीरामभद्र!
५. दशवदन-दमित-दैवत-परिषदभ्यर्थित-दाशरथि-भाव!
अर्थ—दशानन रावण के द्वारा दमित देवगण के द्वारा प्रार्थित होकर राजा दशरथ के पुत्र के रूप में प्रकट होनेवाले हे श्रीरामभद्र!
६. दिनकर-कुल-कमल-दिवाकर!
अर्थ—सूर्य-कुल-कमल के लिए सूर्यसदृश हे श्रीरामभद्र!
७. दिविषदधिपति-रण-सहचरण-चतुर-दशरथ-चरम-ऋण-विमोचन!
अर्थ—देवासुर संग्राम में देवेन्द्र के साथ विचरण करनेमें चतुर दशरथ के चरम ऋण का विमोचन करनेवाले हे श्रीरामभद्र!
८. कोसलसुता-कुमार-भाव-कञ्चुकित-कारणाकार!
अर्थ—कोसलराजसुता कौशल्या के पुत्र के रूप में जन्म लेकर ब्रह्माण्ड के स्रष्टा आदि (कारण) होने के भावको आच्छादित करनेवाले हे श्रीरामभद्र!
९. कौमार-केलि-गोपायित-कौशिकाध्वर!
अर्थ—कौमार-क्रीड़ा करते हुए ही विश्वामित्र के यज्ञ की रक्षा करनेवाले हे श्रीरामभद्र!
१०. रणाध्वर-धुर्य-भव्य-दिव्यास्त्रवृन्द-वन्दित!
अर्थ—रणयज्ञ में अग्रणी रहनेवाले भव्य और दिव्य अस्त्रसमूह के द्वारा पूजित हे श्रीरामभद्र!
११. प्रणतजन-विमत-विमथन-दुर्ललित-दोर्ललित-तनुतर-विशिख-विताडन-विघटित-विशरारु-शरारु-ताटका-ताटकेय!
अर्थ—वन प्रदेश में सज्जनों के मध्य अबाधित होकर क्षति करनेवाले ताटका और उसके पुत्र जैसे राक्षसों को शक्तिशाली भुजाओं से अतितीक्ष्ण तेजस्वी छोटे बाणों की वर्षा कर समाप्त कर देनेवाले हे श्रीरामभद्र!
१२. जड-किरण-शकलधर-जटिल-नटपति-मकुटतट-नटन-पटु-विबुधसरिदतिबहुल-मधु-गलन-ललितपदनलिन-रजउपमृदित-निजवृजिन-जहदुपल-तनुरुचिर-परममुनिवर-युवति-नुत!
अर्थ—शीतल चन्द्र के खण्ड को सदा अपनी जटाओंमें धारण करनेवाले नटराज शिव के मुकुटतट में नटन करने में पटु देवसरित् (गंगा) जिस अतिशय मधु का क्षरण करनेवाले ललित चरण से प्रवाहित हुई है, उस चरण के परागकण से अपने पूर्वकृत जघन्य कृत्य के कारण पति के अभिशाप से प्राप्त पाषाणमय देह से उद्धार प्राप्त करने पर ऋषिप्रवर गौतम की सुन्दरी पत्नी अहल्या के द्वारा स्तुत हे श्रीरामभद्र!