28/05/2024
#दूर्वा
दूर्वाकी उत्पत्ति किस प्रकार हुई ? वस्तुतः इसका क्या स्वरूप है, इस रहस्यको #शतपथ-श्रुतिका एक आख्यान स्पष्ट करता है।
#सृष्टि की संरचना में संलग्न सृजक श्रम (तपस्या) से ब्रह्मा जी इतने निश्चिंत हो गये कि उनकी प्राण-शक्ति शरीर के मध्य से पार हो गयी। इस प्रकार जीवन के स्थानान्तरण से भयभीत सृष्टिकर्ता के केश (बाल) झड़ने लगे। विधाता ने जो वचन कहा कि इस प्राणशक्ति ने मेरी हिंसा की है- #माधूर्वीत् अत: हिंसा का वाचक #धूर्वी' (धूर्वी हिन्सायाम्)धातु का उच्चारण करने से वह जीवन 'धुर्वी' शब्द का वाचक बन गया। देवताओं को अप्रत्यक्ष नाम पसंद हैं, इसलिए उन्होंने 'धूर्व' शब्द, जो प्रत्यक्ष वृत्ति को दर्शाता है, के बजाय 'दूर्वा' शब्द का इस्तेमाल किया, जो अप्रत्यक्ष वृत्ति को दर्शाता है। दुनिया में दूर्वा और ऐसे कई शब्द जैसे सुवेद 1-स्वेद, इन्धा 2-इंद्र, अहिता 3-आहुत, यज-यज्ञ आदि इतने प्रचलित हो गए कि दूर्वा, वेद, इंद्र, आहुति और यज्ञ शब्द हमें तुरंत समझ में आ जाते हैं। -सहज समझ. धुर्व, सुवेद, इन्धा, अहिता और यज् शब्दों को हम अप्रत्यक्ष वृत्तियाँ समझते हैं, क्योंकि इन शब्दों को पढ़ने से तत्काल अर्थ नहीं मिलता।
उपर्युक्त प्रत्यक्ष एवं परोक्ष-वृत्तिका व्यवहार केवल वेदमें ही नहीं, अपितु लोक-व्यवहारमें भी प्रचलित है। हम किसी विशिष्ट या प्रिय व्यक्तिका मुख्य नाम न लेकर सम्मान-हेतु पिताजी (बाबूजी), भाईसाहब, मुन्ना आदि उपनाम या परोक्ष नामका व्यवहार करते हैं।
#ब्राह्मणग्रन्थोंमें ऐसे कई शब्दोंके निर्वचन किये गये हैं, जो देवताओंकी दृष्टिसे परोक्ष-वृत्तिवाले हैं और उन्हींका लौकिक व्याकरणमें तथा लोक-व्यवहारमें प्रत्यक्ष-वृत्तिमें प्रयोग (व्यवहार) होता है। स्रोत ( वेद कथांक)
#पं बनवारी भाई उपमन्यु