01/11/2025
🍁🍁देवोत्थान एकादशी का महत्त्व: एवम् कथा 🍁🍁
🍁🍁भीष्म पंचक व्रत विधि 🍁🍁🍁
🍁घर में तुलसी जी का विवाह, पूजा की सरल विधि🍁🍁 .🍁🍁 श्री तुलसी चालीसा---🍁🍁
🍁🍁भगवान विष्णु चालीसा 🍁🍁
🍁🍁भगवान जगदीश्वर महाविष्णु जी की आरती 🍁🍁
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🌷कार्तिक शुक्ल देवोत्थान एकादशी 🌷
👉01/11/2025 शनिवार (गृहस्थ एवं स्मार्त के लिए)
👉02/11/2025 रविवार ( संन्यासी और वैष्णव के लिए)
(व्रत और तुलसी विवाह तिथि का निर्णय अपने स्थानीय क्षेत्र और परिवार एवं परंपरा के अनुसार करें 🙏)
2025: हिंदू पंचांग के अनुसार, इस बार एकादशी तिथि 01 नवंबर को सुबह 09 बजकर 11 मिनट पर प्रारंभ होगी और एकादशी तिथि का समापन 02 नवंबर को सुबह 07 बजकर 31 मिनट पर होगा। अतः यह पर्व लगभग दो दिन मनाया जायेगा।
लेकिन अधिकांश लोगों के मतानुसार देवोत्थान एकादशी व्रत
1 नबंबर को ही रखा जाएगा। और उसका पारण 2नबंबर रविवार को होगा
लेकिन यदि आप चाहे तो वह तुलसी विवाह 2 नबंबर रविवार को द्वादशी युक्त एकादशी में भी कर सकते हैं ।
👉🍁देवउठनी एकादशी पूजन मुहूर्त
1 नबम्बर शनिवार 2025 का शुभ मुहूर्त
ब्रह्म मुहूर्त- 04:50 ए एम से 05:41 ए एम
अभिजित मुहूर्त- 11:42 ए एम से 12:27 पी एम
विजय मुहूर्त- 01:55 पी एम से 02:39 पी एम
गोधूलि मुहूर्त- 05:36 पी एम से 06:02 पी एम
अमृत काल- 11:17 ए एम से 12:51 पी एम
रवि योग- 06:33 ए एम से 06:20 पी एम
ऐसे में एकादशी व्रत का पारण 2 नवंबर को किया जाएगा। व्रत पारण का शुभ मुहूर्त दोपहर 01 बजकर 11 मिनट से दोपहर 03 बजकर 23 मिनट तक रहेगा। एकादशी व्रत का पारण अगले दिन सूर्योदय के बाद भी किया जा सकता है। 2 नवंबर को सूर्योदय सुबह 06 बजकर 34 मिनट पर होगा।
देवउठनी एकादशी का महत्व: देवउठनी एकादशी व्रत करने से जीवन में सुख-समृद्धि व खुशहाली आती है। इसके साथ ही व्यक्ति के समस्त पापों का नाश होता है। कहते हैं कि एकादशी व्रत करने वाला मनुष्य सभी सुखों को भोगकर अंत में मोक्ष को पाता है।
🌷🌷🌷देवोत्थान एकादशी का महत्त्व: एवम् कथा🌷🌷
🍁🍁एकादशी माहात्म्य 🍁🍁
कार्तिक शुक्ल एकादशी तिथि को देवउत्थान एकादशी या प्रबोधिनी एकादशी या देव उठनी ग्यारस कहा जाता है। इस दिन, भक्त एक दिन का उपवास रखते हैं और अगले दिन सूर्योदय के बाद जब द्वादशी तिथि को सूर्योदय के बाद पारण करते हैं।व्रत खोलते हैं।
देवोत्थान एकादशी बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि यह चतुर्मास अवधि के अंत का प्रतीक है, जिसे शुभ उत्सवों के आयोजन के लिए अशुभ माना जाता है। एकादशी में तुलसी विवाह के पश्चात विवाह एवं मांगलिक कार्यों के शुभ मुहूर्त प्रारम्भ हो जाते हैं।
इस दिन पवित्र तुलसी को शालिग्राम के रूप से या भगवान विष्णु की प्रतिमा या बालमुकुंद स्वरूप या श्री कृष्ण प्रतिमा से विवाह किया जाता है।
बहुत से लोग कार्तिक शुक्ल एकादशी से कार्तिक शुक्ल पूर्णिमा तक पांच दिनों का भीष्म पंचक व्रत भी रखना प्रारंभ करते।
🌷🌷देवोत्थान एकादशी की कथा 🌷🌷
धर्मराज युधिष्ठिर कहने लगे कि हे भगवान! मैंने कार्तिक कृष्ण एकादशी अर्थात रमा एकादशी का सविस्तार वर्णन सुना। अब आप कृपा करके मुझे कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी के विषय में भी बतलाइये। इस एकादशी का क्या नाम है तथा इसके व्रत का क्या विधान है? इसकी विधि क्या है? इसका व्रत करने से किस फल की प्राप्ति होती है? कृपया यह सब विधानपूर्वक कहिए।भगवान श्रीकृष्ण बोले: कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष मे तुलसी विवाह के दिन आने वाली इस एकादशी को विष्णु प्रबोधिनी एकादशी, देव-प्रबोधिनी एकादशी, देवोत्थान, देव उथव एकादशी, देवउठनी एकादशी, कार्तिक शुक्ल एकादशी तथा प्रबोधिनी एकादशी भी कहा जाता है। यह बड़े-बड़े पापों का नाश करने वाली है, इसका माहात्म्य मैं तुमसे कहता हूँ, ध्यानपूर्वक सुनो।
एक राजा के राज्य में सभी लोग एकादशी का व्रत रखते थे। प्रजा तथा नौकर-चाकरों से लेकर पशुओं तक को एकादशी के दिन अन्न नहीं दिया जाता था। एक दिन किसी दूसरे राज्य का एक व्यक्ति राजा के पास आकर बोला: महाराज! कृपा करके मुझे नौकरी पर रख लें। तब राजा ने उसके सामने एक शर्त रखी कि ठीक है, रख लेते हैं। किन्तु रोज तो तुम्हें खाने को सब कुछ मिलेगा, पर एकादशी को अन्न नहीं मिलेगा।
उस व्यक्ति ने उस समय हाँ कर ली, पर एकादशी के दिन जब उसे फलाहार का सामान दिया गया तो वह राजा के सामने जाकर गिड़गिड़ाने लगा: महाराज! इससे मेरा पेट नहीं भरेगा। मैं भूखा ही मर जाऊंगा, मुझे अन्न दे दो।
राजा ने उसे शर्त की बात याद दिलाई, पर वह अन्न छोड़ने को तैयार नहीं हुआ, तब राजा ने उसे आटा-दाल-चावल आदि दिए। वह नित्य की तरह नदी पर पहुंचा और स्नान कर भोजन पकाने लगा। जब भोजन बन गया तो वह भगवान को बुलाने लगा: आओ भगवान! भोजन तैयार है।
उसके बुलाने पर पीताम्बर धारण किए भगवान चतुर्भुज रूप में आ पहुँचे तथा प्रेम से उसके साथ भोजन करने लगे। भोजनादि करके भगवान अंतर्धान हो गए तथा वह अपने काम पर चला गया।
पंद्रह दिन बाद अगली एकादशी को वह राजा से कहने लगा कि महाराज, मुझे दुगुना सामान दीजिए। उस दिन तो मैं भूखा ही रह गया। राजा ने कारण पूछा तो उसने बताया कि हमारे साथ भगवान भी खाते हैं। इसीलिए हम दोनों के लिए ये सामान पूरा नहीं होता।
यह सुनकर राजा को बड़ा आश्चर्य हुआ। वह बोला: मैं नहीं मान सकता कि भगवान तुम्हारे साथ खाते हैं। मैं तो इतना व्रत रखता हूँ, पूजा करता हूँ, पर भगवान ने मुझे कभी दर्शन नहीं दिए।
राजा की बात सुनकर वह बोला: महाराज! यदि विश्वास न हो तो साथ चलकर देख लें। राजा एक पेड़ के पीछे छिपकर बैठ गया। उस व्यक्ति ने भोजन बनाया तथा भगवान को शाम तक पुकारता रहा, परंतु भगवान न आए। अंत में उसने कहा: हे भगवान! यदि आप नहीं आए तो मैं नदी में कूदकर प्राण त्याग दूंगा।
लेकिन भगवान नहीं आए, तब वह प्राण त्यागने के उद्देश्य से नदी की तरफ बढ़ा। प्राण त्यागने का उसका दृढ़ इरादा जान शीघ्र ही भगवान ने प्रकट होकर उसे रोक लिया और साथ बैठकर भोजन करने लगे। खा-पीकर वे उसे अपने विमान में बिठाकर अपने धाम ले गए। यह देख राजा ने सोचा कि व्रत-उपवास से तब तक कोई फायदा नहीं होता, जब तक मन शुद्ध न हो। इससे राजा को ज्ञान मिला। वह भी मन से व्रत-उपवास करने लगा और अंत में स्वर्ग को प्राप्त हुआ।
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🌷🌷🌷तुलसी विवाह पौराणिक कथा🌷🌷🌷
एक बार शिव ने अपने तेज को समुद्र में फैंक दिया था। उससे एक महातेजस्वी बालक ने जन्म लिया। यह बालक आगे चलकर जालंधर के नाम से पराक्रमी दैत्य राजा बना। इसकी राजधानी का नाम जालंधर नगरी था।
दैत्यराज कालनेमी की कन्या वृंदा का विवाह जालंधर से हुआ। जालंधर महाराक्षस था। अपनी सत्ता के मद में चूर उसने माता लक्ष्मी को पाने की कामना से युद्ध किया, परंतु समुद्र से ही उत्पन्न होने के कारण माता लक्ष्मी ने उसे अपने भाई के रूप में स्वीकार किया। वहाँ से पराजित होकर वह देवी पार्वती को पाने की लालसा से कैलाश पर्वत पर गया।
भगवान देवाधिदेव शिव का ही रूप धर कर माता पार्वती के समीप गया, परंतु माँ ने अपने योगबल से उसे तुरंत पहचान लिया तथा वहाँ से अंतर्ध्यान हो गईं। देवी पार्वती ने क्रुद्ध होकर सारा वृतांत भगवान विष्णु को सुनाया। जालंधर की पत्नी वृंदा अत्यन्त पतिव्रता स्त्री थी। उसी के पतिव्रत धर्म की शक्ति से जालंधर न तो मारा जाता था और न ही पराजित होता था। इसीलिए जालंधर का नाश करने के लिए वृंदा के पतिव्रत धर्म को भंग करना बहुत आवश्यक था।
इसी कारण मां पार्वती ने भगवान विष्णु से सती वृंदा का पतिव्रता धर्म भंग करने का अनुरोध किया।तब भगवान विष्णु
ऋषि का वेश धारण कर वन में जा पहुँचे, जहाँ वृंदा अकेली भ्रमण कर रही थीं। भगवान के साथ दो मायावी राक्षस भी थे, जिन्हें देखकर वृंदा भयभीत हो गईं। ऋषि ने वृंदा के सामने पल में दोनों को भस्म कर दिया। उनकी शक्ति देखकर वृंदा ने कैलाश पर्वत पर महादेव के साथ युद्ध कर रहे अपने पति जालंधर के बारे में पूछा। ऋषि ने अपने माया जाल से दो वानर प्रकट किए। एक वानर के हाथ में जालंधर का सिर था तथा दूसरे के हाथ में धड़। अपने पति की यह दशा देखकर वृंदा मूर्छित हो कर गिर पड़ीं। होश में आने पर उन्होंने ऋषि रूपी भगवान से विनती की कि वह उसके पति को जीवित करें।
भगवान ने अपनी माया से पुन: जालंधर का सिर धड़ से जोड़ दिया, परंतु स्वयं भी वह उसी शरीर में प्रवेश कर गए। वृंदा को इस छल का तनिक भी आभास न हुआ। जालंधर बने भगवान के साथ वृंदा पतिव्रता का व्यवहार करने लगी, जिससे उसका सतीत्व भंग हो गया। ऐसा होते ही वृंदा का पति जालंधर युद्ध में हार गया।
इस सारी लीला का जब वृंदा को पता चला, तो उसने क्रुद्ध होकर भगवान विष्णु को ह्रदयहीन शिला होने का श्राप दे दिया। अपने भक्त के श्राप को भगवान विष्णु ने स्वीकार किया और शालिग्राम पत्थर बन गये। सृष्टि के पालनकर्ता के पत्थर बन जाने से ब्रम्हांड में असंतुलन की स्थिति हो गई। यह देखकर सभी देवी देवताओ ने वृंदा से प्रार्थना की वह भगवान् विष्णु को श्राप मुक्त कर दे।
वृंदा ने भगवान विष्णु को श्राप मुक्त कर स्वयं आत्मदाह कर लिया। जहाँ वृंदा भस्म हुईं,। वहां आदिशक्ति का रूप तीन देवियां उमा रमा वाणी देवियां आई उन्होंने उस सती की चिताभस्म में कुछ दिव्य बीज डाले जिनसे तीन दिव्य पौधे उत्पन्न हुये
धात्री (आंवला, ) तुलसी और मालती यह तीन देवियां उन दिव्य वृक्षों की अधिष्ठात्री देवियां प्रकट हुई। भगवान शिव ने उन देवियों से भगवान विष्णु से विवाह करने को कहा। तुलसी और धात्री (आमलकी या आंवला) देवियों ने भगवान विष्णु से विवाह कर लिया परन्तु मालती देवी ने शिवजी की आज्ञा नहीं मानी
इसलिए शिव पूजा में मालती पुष्प वर्जित है।
भगवान विष्णु ने वृंदा से कहा: हे वृंदा। तुम अपने सतीत्व के कारण मुझे लक्ष्मी से भी अधिक प्रिय हो गई हो। अब तुम तुलसी के रूप में सदा मेरे साथ रहोगी।
।जो मनुष्य भी मेरे शालिग्राम रूप के साथ तुलसी का विवाह करेगा उसे इस लोक और परलोक में विपुल यश प्राप्त होगा।
तब से हर साल कार्तिक महीने के देव-उठावनी एकादशी का दिन तुलसी विवाह के रूप में मनाया जाता है।
उसी दैत्य जलंधर की यह भूमि जालंधर शहर पंजाब में है
सती वृंदा का मंदिर मोहल्ला कोट किशनचंद में स्थित है। कहते हैं कि इस स्थान पर एक प्राचीन गुफा भी थी, जो सीधी हरिद्वार तक जाती थी। सच्चे मन से 40 दिन तक सती वृंदा देवी के मंदिर में पूजा करने से सभी मनोरथ पूर्ण होते हैं।
जिस घर में तुलसी होती हैं, वहाँ यम के दूत भी असमय नहीं जा सकते। मृत्यु के समय जिसके प्राण मंजरी रहित तुलसी और गंगा जल मुख में रखकर निकल जाते हैं, वह पापों से मुक्त होकर वैकुंठ धाम को प्राप्त होता है। जो मनुष्य तुलसी व आंवलों की छाया में अपने पितरों का श्राद्ध करता है, उसके पितर मोक्ष को प्राप्त हो जाते हैं। बिना तुलसी के पत्तों के भोग प्रसाद चढ़ाने पर भगवान विष्णु और उनके अवतार प्रसन्न नहीं होते। इसलिए भगवान विष्णु और उनके अवतारों की
पूजा में आवश्यक रूप तुलसी दल मिलाया जाता है और
तुलसी दल और आंवला भगवान विष्णु और उनके अवतारों को चढ़ाया जाता है। लेकिन माता लक्ष्मी को तुलसी दल नहीं
चढ़ाना चाहिए । लेकिन आंवला और बिल्वपत्र लक्ष्मी जी को
चढ़ा सकते हैं
और लक्ष्मीनारायण दोनों को भोग प्रसाद में तुलसी मिला सकते हैं।
इसी प्रकार एक दूसरे कल्प में शंखचूड़ और उसकी पत्नी
कथा बताई जाती है
यह दोनों कथाएं अलग अलग कल्प की है। मूल रूप से
भगवती तुलसी देवी प्रकृति का स्वरूप है। गोलोक में भगवान
गोविन्द कृष्ण से उत्पन्न हुई उनकी प्रिय गोपी थी।
एक लीला में देवी राधिका ने उन्हें श्राप दिया था तो उन्हें
मानव रूप में जन्म लेकर शाप विमोचन करना पड़ा
शंखचूड़ और जालंधर दोनों भगवान कृष्ण के अंश सुदामा गोप का अवतार थे। जो शाप से असुर बना था
श्राप मुक्त हो तुलसी देवी पुनः भगवान गोविन्द कृष्ण की
प्रियतमा बनी।
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🌷🌷🌷 भीष्म पंचक व्रत 🌷🌷🌷
(कार्तिक शुक्ल एकादशी से कार्तिक शुक्ल पूर्णिमा तक
01/11/2025 शनिवार से 05/11/2025 बुधवार तक )
भीष्म पंचक का प्रारंभ कार्तिक शुक्ल एकादशी को हुआ और पूर्णिमा कार्तिक पूर्णिमा के दिन हुई. इस बार भीष्म पंचक 01 नवंबर शनिवार 2025 को एकादशी से प्रारंभ होगा और उसकी पूर्णता 05 नवंबर बुधवार को कार्तिक पूर्णिमा को होगी।
महाभारत युद्ध की समाप्ति के बाद शरशैया पर लेटे भीष्म पितामह ने पांच दिनों तक पांडवों को राजधर्म और नीति का उपदेश दिया था. इसका प्रारंभ कार्तिक शुक्ल एकादशी को हुआ और पूर्णिमा कार्तिक पूर्णिमा के दिन हुई. इसलिए इन पांच दिनों को भीष्म पंचक का नाम दिया गया. इस बार भीष्म पंचक 11 नवंबर को एकादशी से प्रारंभ होगा और उसकी पूर्णता 15 नवंबर शुक्रवार को कार्तिक पूर्णिमा , को होगी.
👉🍁भीष्म पंचक उपवास करने कि विधी 🍁
इस दिन स्नान आदि करने के बाद पापों का नाश करते हुए धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की प्राप्ति के व्रत का संकल्प करना चाहिए. घर के आंगन पर चार दरवाजों वाला मंडप बना कर उसे गोबर से लीपना चाहिए. बाद में वेदी बनाकर उसमें तिल भर कर कलश की स्थापना करें. ओम नमो भगवते वासुदेवाय मंत्र से भगवान वासुदेव की पूजा कर पांच दिनों तक लगातार घी का दीपक जलाएं और मौन हो कर मंत्र का जाप करें. पांच दिनों तक काम क्रोध आदि को भुलाकर ब्रह्मचर्य, क्षमा, दया और उदारता धारण करना चाहिए.
इन पांच दिनों भीष्म पितामह के नाम से भी सूर्य के सामने जल से तर्पण किया जाता है। जिससे भगवान कृष्ण प्रसन्न होते हैं।
🍁यह है व्रत का महत्व
महाभारत युद्ध की समाप्ति के बाद उत्तरायण सूर्य का इंतजार भीष्म पितामह शरशैया पर कर रहे थे. तभी भगवान श्री कृष्ण पांडवों को लेकर उनके पास पहुंचे तो धर्मराज युधिष्ठिर ने उनसे उपदेश देने का आग्रह किया तो पांच दिनों तक धर्म नीति आदि विषयों पर उन्होंने ज्ञान दिया. उनका उपदेश सुनकर वासुदेव श्री कृष्ण बहुत संतुष्ट हुए और बोले कि आपने कार्तिक शुक्ल एकादशी से लेकर कार्तिक पूर्णिमा तक पांच दिनों में राजधर्म संबंधी जो उपदेश दिए हैं उससे मैं बहुत ही प्रसन्न हूं. इसकी स्मृति में इन पांच दिनों को भीष्म पंचक व्रत के रूप में स्थापित करता हूं. जो लोग इसका पालन करेंगे वह संसार के कष्टों से मुक्त हो जाएंगे.
उन्हें पुत्र पौत्र और धन धान्य की कोई कमी नहीं रहेगी. जीवन के सभी सुख भोग कर वह मोक्ष को प्राप्त होंगे.
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🌷घर में तुलसी जी का विवाह, पूजा की सरल विधि🌷🌷
देवउठनी एकादशी के दिन तुलसी जी का विवाह.पूजन विधि
1 * शाम के समय सारा परिवार इसी तरह तैयार हो जैसे विवाह समारोह के लिए होते हैं।
2 * तुलसी का पौधा एक पटिये पर आंगन, छत या पूजा घर में बिलकुल बीच में रखें।
3 * तुलसी के गमले के ऊपर गन्ने का मंडप सजाएं।
4 * तुलसी देवी पर समस्त सुहाग सामग्री के साथ लाल चुनरी चढ़ाएं।
5 * गमले में सालिग्राम जी या भगवान विष्णु की प्रतिमा या उनके बालमुकुंद स्वरूप (लड्डू गोपाल)की प्रतिमा रखें।
6 * सालिग्राम जी पर चावल नहीं चढ़ते हैं। उन पर तिल चढ़ाई जा सकती है।
7 * तुलसी और सालिग्राम जी पर दूध में भीगी हल्दी लगाएं।
8 * गन्ने के मंडप पर भी हल्दी का लेप करें और उसकी
धूप दीप नैवेद्य से पूजन करें। गन्ने के मंडप के पास दीपक जलाएं
9 * अगर हिंदू धर्म में विवाह के समय बोला जाने वाला मंगलाष्टक आता है तो वह अवश्य करें।
(🍁🍁अथ तुलसी विवाह मंगलाष्टक मंत्र ॥🍁🍁
ॐ श्री मत्पंकजविष्टरो हरिहरौ, वायुमर्हेन्द्रोऽनलः।
चन्द्रो भास्कर वित्तपाल वरुण, प्रताधिपादिग्रहाः ।
प्रद्यम्नो नलकूबरौ सुरगजः, चिन्तामणिः कौस्तुभः,
स्वामी शक्तिधरश्च लांगलधरः, कुवर्न्तु वो मंगलम् ॥1
गंगा गोमतिगोपतिगर्णपतिः, गोविन्दगोवधर्नौ,
गीता गोमयगोरजौ गिरिसुता, गंगाधरो गौतमः ।
गायत्री गरुडो गदाधरगया, गम्भीरगोदावरी,
गन्धवर्ग्रहगोपगोकुलधराः, कुवर्न्तु वो मंगलम् ॥2
नेत्राणां त्रितयं महत्पशुपतेः अग्नेस्तु पादत्रयं,
तत्तद्विष्णुपदत्रयं त्रिभुवने, ख्यातं च रामत्रयम् ।
गंगावाहपथत्रयं सुविमलं, वेदत्रयं ब्राह्मणम्,
संध्यानां त्रितयं द्विजैरभिमतं, कुवर्न्तु वो मंगलम् ॥3
बाल्मीकिः सनकः सनन्दनमुनिः, व्यासोवसिष्ठो भृगुः,
जाबालिजर्मदग्निरत्रिजनकौ, गर्गोऽ गिरा गौतमः ।
मान्धाता भरतो नृपश्च सगरो, धन्यो दिलीपो नलः,
पुण्यो धमर्सुतो ययातिनहुषौ, कुवर्न्तु वो मंगलम् ॥4
गौरी श्रीकुलदेवता च सुभगा, कद्रूसुपणार्शिवाः,
सावित्री च सरस्वती च सुरभिः, सत्यव्रतारुन्धती ।
स्वाहा जाम्बवती च रुक्मभगिनी, दुःस्वप्नविध्वंसिनी,
वेला चाम्बुनिधेः समीनमकरा, कुवर्न्तु वो मंगलम् ॥5
गंगा सिन्धु सरस्वती च यमुना, गोदावरी नमर्दा,
कावेरी सरयू महेन्द्रतनया, चमर्ण्वती वेदिका ।
शिप्रा वेत्रवती महासुरनदी, ख्याता च या गण्डकी,
पूर्णाः पुण्यजलैः समुद्रसहिताः, कुवर्न्तु वो मंगलम् ॥6
लक्ष्मीः कौस्तुभपारिजातकसुरा, धन्वन्तरिश्चन्द्रमा,
गावः कामदुघाः सुरेश्वरगजो, रम्भादिदेवांगनाः ।
अश्वः सप्तमुखः सुधा हरिधनुः, शंखो विषं चाम्बुधे,
रतनानीति चतुदर्श प्रतिदिनं, कुवर्न्तु वो मंगलम् ॥7
ब्रह्मा वेदपतिः शिवः पशुपतिः, सूयोर् ग्रहाणां पतिः,
शुक्रो देवपतिनर्लो नरपतिः, स्कन्दश्च सेनापतिः ।
विष्णुयर्ज्ञपतियर्मः पितृपतिः, तारापतिश्चन्द्रमा,
इत्येते पतयस्सुपणर्सहिताः, कुवर्न्तु वो मंगलम् ॥8
॥ इति मंगलाष्टक समाप्त ॥)
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10 * देव प्रबोधिनी एकादशी से कुछ वस्तुएं खाना आरंभ किया जाता है। अत: भाजी, मूली़ बेर और आंवला जैसी सामग्री बाजार में पूजन में चढ़ाने के लिए मिलती है वह लेकर आएं।
11* कपूर या दीपक से तुलसी देवी और विष्णु जी की आरती करें।
🍁तुलसी जी की आरती 🍁
तुलसी महारानी नमो-नमो,
हरि की पटरानी नमो-नमो ।
धन तुलसी पूरण तप कीनो,
शालिग्राम बनी पटरानी ।
जाके पत्र मंजरी कोमल,
श्रीपति कमल चरण लपटानी ॥
धूप-दीप-नवैद्य आरती,
पुष्पन की वर्षा बरसानी ।
छप्पन भोग छत्तीसों व्यंजन,
बिन तुलसी हरि एक ना मानी ॥
सभी सखी मैया तेरो यश गावें,
भक्तिदान दीजै महारानी ।
नमो-नमो तुलसी महारानी,
तुलसी महारानी नमो-नमो ॥
तुलसी महारानी नमो-नमो,
हरि की पटरानी नमो-नमो ।
12 * प्रसाद चढ़ाएं।
( नारियल/मिठाई/फल /सात्विक भोजन जो उपलब्ध हो)
13 * 11 बार तुलसी जी की परिक्रमा करें।
14 * प्रसाद को मुख्य आहार के साथ ग्रहण करें।
15 * प्रसाद वितरण अवश्य करें।
16 * पूजा समाप्ति पर घर के सभी सदस्य चारों तरफ से पटिए को उठा कर भगवान विष्णु से जागने का आह्वान करें-उठो देव सांवरा, भाजी, बैर ,आंवला, गन्ना की झोपड़ी में, शंकर जी की यात्रा।
( * इस लोक आह्वान का भोला सा भावार्थ है - हे सांवले सलोने देव, भाजी, बोर, आंवला चढ़ाने के साथ हम चाहते हैं कि आप जाग्रत हों, सृष्टि का कार्यभार संभालें और शंकर जी को पुन: अपनी यात्रा की अनुमति दें।)
17 * इस मंत्र का उच्चारण करते हुए भी देव को जगाया जा सकता है-
'उत्तिष्ठ गोविन्द त्यज निद्रां जगत्पतये।
त्वयि सुप्ते जगन्नाथ जगत् सुप्तं भवेदिदम्॥'
'उत्थिते चेष्टते सर्वमुत्तिष्ठोत्तिष्ठ माधव।
गतामेघा वियच्चैव निर्मलं निर्मलादिशः॥'
'शारदानि च पुष्पाणि गृहाण मम केशव।'
(🍁देव उठनी ग्यारस में देव जगाने का लोकगीत 🍁)
देव उठनी ग्यारस में देव जगाने का लोकगीत 🌷
उठो देव बैठो देव पाटकली चटकाओ देव,
आषाढ़ मे सोये देव कार्तिक मे जागे देव,
कोरा कलशा मीठा पानी उठो देव पियो पानी,
हाथ पैर फटकारो देव अंगुलिया चटकारो देव,
कुंवारे का ब्याह कराओ देव ब्याही का गोना कराओ देव,
तुम पर फूल चढ़ाये देव घी का दीप जलाये देव,
आओ देव पधारों देव तुम को हम मनाये देव,
चुल्हा पीछे पांच पछीटा सासु जी बलदाऊजी तुम्हारे बैटा,
ओने कोने झांझ मजीरा सहोदरा किशन जी तुम्हारे बीरा,
ओने कोने रखे अनार ये है किशन जी तुम्हारे यार,
ओने कोने लटके चाबी ये सहोदरा ये है तुम्हारी भाभी,
जितनी खूंटी टांगू सूत ,उतने इस घर जनमे पूत,
जितनी इस घर सींक सिलाई उतनी इस घर बहुएं आएं,
जितने इस घर ईट व रोड़े उतने इस घर में हाथी घोड़े ,
उठ नारायण, बैठ नारायण, चल चना के खेत नारायण .
में बोऊँ तू सींच नारायण, में काटूं तू उठा नारायण.
मैं पीसूं तू छान नारायण, मैं पोऊं तू खा नारायण.
कोरा कलशा शीतल पानी, उठो देवो पियो पानी |
उठो देवा, बैठो देवा, आंगुरिया चटकाओ देवा ॥
गन्ने का भोग लगाओ देव सिंघाड़े का भोग लगाओ देव ,
आंवले का भोग लगाओ देव, सीताफल का भोग लगाओ
बैर का भोग लगाओं देव गाजर का भोग लगाओ देव।
पूये का भोग लगाओ देव हलवे का भोग लगाओ देव।
बैंगन मूली भाजी चढ़ाऊं देव,,खील बताशा चढ़ाऊं देव
बरफी पेड़ा चढ़ाऊं देव, खीर पूरी खिलाऊं देव,
आओ देव पधारो देव तुमको हम मनाएं देव
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🍁18
👉* तुलसी नामाष्टक पढ़ें :--
वृन्दा वृन्दावनी विश्वपूजिता विश्वपावनी।
पुष्पसारा नन्दनीच तुलसी कृष्ण जीवनी।।
एतभामांष्टक चैव स्रोतं नामर्थं संयुक्तम।
य: पठेत तां च सम्पूज् सौऽश्रमेघ फललंमेता।।
👉भगवान विष्णु के 28 नाम
मत्स्य, कूर्म, वराह, वामन, जनार्दन, गोविन्द, पुण्रीकाक्ष, माधव, मधुसूदन, पद्मनाभ, सहस्त्राक्ष, वनमाली, हलायुध, गोवर्धन, हृषीकेश, वैकुण्ठ, पुरुषोत्तम, विश्वरूप, वासुदेव, राम, नारायण, हरि, दामोदर, श्रीधर, वेदाङ्ग, गरुडध्वज, अनन्त और कृष्ण गोपाल ।
इन नामों का जाप करने वाले मनुष्य के भीतर पाप नहीं रहता।
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🌷🌷.. श्री तुलसी चालीसा---(१)🌷🌷🌷
।। दोहा ।।
जय जय तुलसी भगवती सत्यवती सुखदानी।
नमो नमो हरी प्रेयसी श्री वृंदा गुन खानी।।
श्री हरी शीश बिरजिनी , देहु अमर वर अम्ब।
जनहित हे वृन्दावनी अब न करहु विलम्ब ।।
। चौपाई ।
धन्य धन्य श्री तुलसी माता । महिमा अगम सदा श्रुति गाता ।।
हरी के प्राणहु से तुम प्यारी । हरीहीं हेतु कीन्हो ताप भारी।।
जब प्रसन्न है दर्शन दीन्ह्यो । तब कर जोरी विनय उस कीन्ह्यो ।।
हे भगवंत कंत मम होहू । दीन जानी जनि छाडाहू छोहु ।।
सुनी लख्मी तुलसी की बानी । दीन्हो श्राप कध पर आनी ।।
उस अयोग्य वर मांगन हारी । होहू विटप तुम जड़ तनु धारी ।।
सुनी तुलसी हीं श्रप्यो तेहिं ठामा । करहु वास तुहू नीचन धामा ।।
दियो वचन हरी तब तत्काला । सुनहु सुमुखी जनि होहू बिहाला।।
समय पाई व्हौ रौ पाती तोरा । पुजिहौ आस वचन सत मोरा ।।
तब गोकुल मह गोप सुदामा । तासु भई तुलसी तू बामा ।।
कृष्ण रास लीला के माही । राधे शक्यो प्रेम लखी नाही ।।
दियो श्राप तुलसिह तत्काला । नर लोकही तुम जन्महु बाला ।।
यो गोप वह दानव राजा । शंख चुड नामक शिर ताजा ।।
तुलसी भई तासु की नारी । परम सती गुण रूप अगारी ।।
अस द्वै कल्प बीत जब गयऊ । कल्प तृतीय जन्म तब भयऊ।।
वृंदा नाम भयो तुलसी को । असुर जलंधर नाम पति को ।।
करि अति द्वन्द अतुल बलधामा । लीन्हा शंकर से संग्राम ।।
जब निज सैन्य सहित शिव हारे । मरही न तब हर हरिही पुकारे ।।
पतिव्रता वृंदा थी नारी । कोऊ न सके पतिहि संहारी ।।
तब जलंधर ही भेष बनाई । वृंदा ढिग हरी पहुच्यो जाई ।।
शिव हित लही करि कपट प्रसंगा । कियो सतीत्व धर्म तोही भंगा ।।
भयो जलंधर कर संहारा। सुनी उर शोक उपारा ।।
तिही क्षण दियो कपट हरी टारी । लखी वृंदा दुःख गिरा उचारी ।।
जलंधर जस हत्यो अभीता । सोई रावन तस हरिही सीता ।।
अस प्रस्तर सम ह्रदय तुम्हारा । धर्म खंडी मम पतिहि संहारा ।।
यही कारण लही श्राप हमारा । होवे तनु पाषाण तुम्हारा।।
सुनी हरी तुरतहि वचन उचारे । दियो श्राप बिना विचारे ।।
लख्यो न निज करतूती पति को । छलन चह्यो जब पारवती को ।।
जड़मति तुहु अस हो जड़रूपा । जग मह तुलसी विटप अनूपा ।।
धरवो रूप हम शालिगरामा । नदी गण्डकी बीच ललामा ।।
जो तुलसी दल हमही चढ़ इहैं । सब सुख भोगी परम पद पईहै ।।
बिनु तुलसी हरी जलत शरीरा । अतिशय उठत शीश उर पीरा ।।
जो तुलसी दल हरी शिर धारत । सो सहस्त्र घट अमृत डारत ।।
तुलसी हरी मन रंजनी हारी। रोग दोष दुःख भंजनी हारी ।।
प्रेम सहित हरी भजन निरंतर । तुलसी राधा में नाही अंतर ।।
व्यंजन हो छप्पनहु प्रकारा । बिनु तुलसी दल न हरीहि प्यारा ।।
सकल तीर्थ तुलसी तरु छाही । लहत मुक्ति जन संशय नाही ।।
कवि सुन्दर इक हरी गुण गावत । तुलसिहि निकट सहसगुण पावत ।।
बसत निकट दुर्बासा धामा । जो प्रयास ते पूर्व ललामा ।।
पाठ करहि जो नित नर नारी । होही सुख भाषहि त्रिपुरारी ।।
।। दोहा ।।
तुलसी चालीसा पढ़ही तुलसी तरु ग्रह धारी ।
दीपदान करि पुत्र फल पावही बंध्यहु नारी ।।
सकल दुःख दरिद्र हरी हार ह्वै परम प्रसन्न ।
आशिय धन जन लड़हि ग्रह बसही पूर्णा अत्र ।।
लाही अभिमत फल जगत मह लाही पूर्ण सब काम।
जेई दल अर्पही तुलसी तंह सहस बसही हरीराम ।।
तुलसी महिमा नाम लख तुलसी सूत सुखराम।
मानस चालीस रच्यो जग महं तुलसीदास ।।
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🌷🌷🌷 भगवान विष्णु चालीसा 🌷🌷🌷
भगवान विष्णु को दया और प्रेम का सागर माना जाता है। विष्णु जी अपनी पत्नी देवी माता लक्ष्मी के साथ क्षीरसागर में वास करते हैं। सच्चे मन से आराधना करने पर वह व्यक्ति की सारी मनोकामनाएं पूरी करते हैं।
।।दोहा।।
विष्णु सुनिए विनय सेवक की चितलाय ।
कीरत कुछ वर्णन करूं दीजै ज्ञान बताय ॥
।।चौपाई।।
नमो विष्णु भगवान खरारी,
कष्ट नशावन अखिल बिहारी ।
प्रबल जगत में शक्ति तुम्हारी,
त्रिभुवन फैल रही उजियारी ॥
सुन्दर रूप मनोहर सूरत,
सरल स्वभाव मोहनी मूरत ।
तन पर पीताम्बर अति सोहत,
बैजन्ती माला मन मोहत ॥
शंख चक्र कर गदा विराजे,
देखत दैत्य असुर दल भाजे ।
सत्य धर्म मद लोभ न गाजे,
काम क्रोध मद लोभ न छाजे ॥
सन्तभक्त सज्जन मनरंजन,
दनुज असुर दुष्टन दल गंजन ।
सुख उपजाय कष्ट सब भंजन,
दोष मिटाय करत जन सज्जन ॥
पाप काट भव सिन्धु उतारण,
कष्ट नाशकर भक्त उबारण ।
करत अनेक रूप प्रभु धारण,
केवल आप भक्ति के कारण ॥
धरणि धेनु बन तुमहिं पुकारा,
तब तुम रूप राम का धारा ।
भार उतार असुर दल मारा,
रावण आदिक को संहारा ॥
आप वाराह रूप बनाया,
हिरण्याक्ष को मार गिराया ।
धर मत्स्य तन सिन्धु बनाया,
चौदह रतनन को निकलाया ॥
अमिलख असुरन द्वन्द मचाया,
रूप मोहनी आप दिखाया ।
देवन को अमृत पान कराया,
असुरन को छवि से बहलाया ॥
कूर्म रूप धर सिन्धु मझाया,
मन्द्राचल गिरि तुरत उठाया ।
शंकर का तुम फन्द छुड़ाया,
भस्मासुर को रूप दिखाया ॥
वेदन को जब असुर डुबाया,
कर प्रबन्ध उन्हें ढुढवाया ।
मोहित बनकर खलहि नचाया,
उसही कर से भस्म कराया ॥
असुर जलन्धर अति बलदाई,
शंकर से उन कीन्ह लड़ाई ।
हार पार शिव सकल बनाई,
कीन सती से छल खल जाई ॥
सुमिरन कीन तुम्हें शिवरानी,
बतलाई सब विपत कहानी ।
तब तुम बने मुनीश्वर ज्ञानी,
वृन्दा की सब सुरति भुलानी ॥
देखत तीन दनुज शैतानी,
वृन्दा आय तुम्हें लपटानी ।
हो स्पर्श धर्म क्षति मानी,
हना असुर उर शिव शैतानी ॥
तुमने ध्रुव प्रहलाद उबारे,
हिरणाकुश आदिक खल मारे ।
गणिका और अजामिल तारे,
बहुत भक्त भव सिन्धु उतारे ॥
हरहु सकल संताप हमारे,
कृपा करहु हरि सिरजन हारे ।
देखहुं मैं निज दरश तुम्हारे,
दीन बन्धु भक्तन हितकारे ॥
चाहता आपका सेवक दर्शन,
करहु दया अपनी मधुसूदन ।
जानूं नहीं योग्य जब पूजन,
होय यज्ञ स्तुति अनुमोदन ॥
शीलदया सन्तोष सुलक्षण,
विदित नहीं व्रतबोध विलक्षण ।
करहुं आपका किस विधि पूजन,
कुमति विलोक होत दुख भीषण ॥
करहुं प्रणाम कौन विधिसुमिरण,
कौन भांति मैं करहु समर्पण ।
सुर मुनि करत सदा सेवकाई,
हर्षित रहत परम गति पाई ॥
दीन दुखिन पर सदा सहाई,
निज जन जान लेव अपनाई ।
पाप दोष संताप नशाओ,
भव बन्धन से मुक्त कराओ ॥
सुत सम्पति दे सुख उपजाओ,
निज चरनन का दास बनाओ ।
निगम सदा ये विनय सुनावै,
पढ़ै सुनै सो जन सुख पावै ॥
॥ इति श्री विष्णु चालीसा ॥
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🌷भगवान जगदीश्वर महाविष्णु जी की आरती 🌷🌷
ॐ जय जगदीश हरे, स्वामी! जय जगदीश हरे।
भक्तजनों के संकट क्षण में दूर करे॥
जो ध्यावै फल पावै, दुख बिनसे मन का।
सुख-संपत्ति घर आवै, कष्ट मिटे तन का॥ ॐ जय...॥
मात-पिता तुम मेरे, शरण गहूं किसकी।
तुम बिनु और न दूजा, आस करूं जिसकी॥ ॐ जय...॥
तुम पूरन परमात्मा, तुम अंतरयामी॥
पारब्रह्म परेमश्वर, तुम सबके स्वामी॥ ॐ जय...॥
तुम करुणा के सागर तुम पालनकर्ता।
मैं मूरख खल कामी, कृपा करो भर्ता॥ ॐ जय...॥
तुम हो एक अगोचर, सबके प्राणपति।
किस विधि मिलूं दयामय! तुमको मैं कुमति॥ ॐ जय...॥
दीनबंधु दुखहर्ता, तुम ठाकुर मेरे।
अपने हाथ उठाओ, द्वार पड़ा तेरे॥ ॐ जय...॥
विषय विकार मिटाओ, पाप हरो देवा।
श्रद्धा-भक्ति बढ़ाओ, संतन की सेवा॥ ॐ जय...॥
तन-मन-धन और संपत्ति, सब कुछ है तेरा।
तेरा तुझको अर्पण क्या लागे मेरा॥ ॐ जय...॥
जगदीश्वरजी महाविष्णु जी की आरती जो कोई नर गावे।
कहत शिवानंद स्वामी, मनवांछित फल पावे॥ ॐ जय...॥
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