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12/04/2025
.                           "व्यास–गुरु पूर्णिमा"           महर्षि वेदव्यास जी अमर हैं। महान विभूति वेदव्यास का जन्म आषा...
03/07/2023

. "व्यास–गुरु पूर्णिमा"

महर्षि वेदव्यास जी अमर हैं। महान विभूति वेदव्यास का जन्म आषाढ़ पूर्णिमा को लगभग 3000 ई. पूर्व में हुआ था। महर्षि व्यास का पूरा नाम कृष्णद्वैपायन है। उन्होंने वेदों का विभाग किया, इसलिए उनको व्यास या वेदव्यास कहा जाता है। उनके पिता महर्षि पराशर तथा माता सत्यवती है।
भारत भर में गुरुपूर्णिमा के दिन गुरुदेव की पूजा के साथ महर्षि व्यास की पूजा भी की जाती है। महर्षि वेदव्यास भगवान विष्णु के कालावतार माने गए हैं। द्वापर युग के अंतिम भाग में व्यासजी प्रकट हुए थे। उन्होंने अपनी सर्वज्ञ दृष्टि से समझ लिया कि कलियुग में मनुष्यों की शारीरिक शक्ति और बुद्धि शक्ति बहुत घट जाएगी। इसलिए कलियुग के मनुष्यों को सभी वेदों का अध्ययन करना और उनको समझ लेना संभव नहीं रहेगा।
व्यासजी ने यह जानकर वेदों के चार विभाग कर दिए। जो लोग वेदों को पढ़, समझ नहीं सकते, उनके लिए महाभारत की रचना की। महाभारत में वेदों का सभी ज्ञान आ गया है। धर्मशास्त्र, नीतिशास्त्र, उपासना और ज्ञान-विज्ञान की सभी बातें महाभारत में बड़े सरल ढंग से समझाई गई हैं।
इसके अतिरिक्त पुराणों की अधिकांश कथाओं द्वारा हमारे देश, समाज तथा धर्म का पूरा इतिहास महाभारत में आया है। महाभारत की कथाएं बड़ी रोचक और उपदेशप्रद हैं। सब प्रकार की रुचि रखने वाले लोग भगवान की उपासना में लगें और इस प्रकार सभी मनुष्यों का कल्याण हो। इसी भाव से व्यासजी ने अठारह पुराणों की रचना की।
इन पुराणों में भगवान के सुंदर चरित्र व्यक्त किए गए हैं। भगवान के भक्त, धर्मात्मा लोगों की कथाएं पुराणों में सम्मिलित हैं। इसके साथ-साथ व्रत-उपवास को की विधि, तीर्थों का माहात्म्य आदि लाभदायक उपदेशों से पुराण परिपूर्ण है।
वेदांत दर्शन के रचना करने वाले महर्षि वेदव्यास ने वेदांत दर्शन को छोटे-छोटे सूत्रों में लिखा गया है, लेकिन गंभीर सूत्रों के कारण ही उनका अर्थ समझने के लिए बड़े-बड़े ग्रंथ लिखे हैं।
धार्मिक मान्यता के अनुसार ही गुरुपूर्णिमा पर गुरुदेव की पूजा के साथ ही महर्षि व्यास की पूजा भी की जाती है। हिन्दू धर्म के सभी भागों को व्यासजी ने पुराणों में भली-भांति समझाया है। महर्षि व्यास सभी हिन्दुओं के परम पुरुष हैं।
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03/07/2023

. चातुर्मास्य माहात्म्य

अध्याय - 02/10

इस अध्याय में पढ़िये–चातुर्मास्य में इष्ट वस्तु के परित्याग तथा नियम-पालन का महत्त्व

ब्रह्माजी कहते हैं- मनुष्य सदा प्रिय वस्तु की इच्छा करता है। अत: जो चातुर्मास्य में भगवान् नारायण की प्रीति के लिये अपने प्रिय भोगों का पूर्ण प्रयत्न पूर्वक त्याग करता है, उसकी त्यागी हुई वे वस्तुएँ उसे अक्षयरूप में प्राप्त होती हैं। जो मनुष्य श्रद्धा पूर्वक प्रिय वस्तु का त्याग करता है, वह अनन्त फल का भागी होता है। धातु पात्रों का त्याग करके पलाश के पत्ते में भोजन करने वाला मनुष्य ब्रह्म भाव को प्राप्त होता है। गृहस्थ मनुष्य ताँबे के पात्र में कदापि भोजन न करे चौमासे में तो ताँबे के पात्र में भोजन विशेष रूप से त्याज्य है। मदार के पत्ते में भोजन करने वाला मनुष्य अनुपम फल को पाता है। चातुर्मास्य में विशेषत: वट के पत्र में भोजन करना चाहिये चातुर्मास्य में भगवान् विष्णु को प्रीति के लिये गृहस्थ-आश्रम का परित्याग करके बाह्य आश्रम का सेवन करने वाले मनुष्य का पुनर्जन्म नहीं होता। मिर्च छोड़ने से राजा होता है, रेशमी वस्त्रों के त्याग से अक्षय सुख मिलता है, उड़द और चना छोड़ देने से पुनर्जन्म की प्राप्ति नहीं होती। चातुर्मास्य में विशेषतः काले रंग का वस्त्र त्याग देना चाहिये। नीले वस्त्र को देख लेने से जो दोष लगता है, उसकी शुद्धि भगवान् सूर्यनारायण के दर्शन से होती है। कुसुम्भ रंग के परित्याग करने से मनुष्य यमराज को नहीं देखता। केशर के त्याग से वह राजा का प्रिय होता है। फूलों को छोड़ने से मनुष्य ज्ञानी होता है, शय्या का परित्याग करने से महान् सुख की प्राप्ति होती है। असत्यभाषण के त्याग से मोक्ष का दरवाजा खुल जाता है। चातुर्मास्य में परनिन्दा का विशेषप रूप से परित्याग करे। पर-निन्दा महान् पाप है, पर निन्दा महान् भय है, पर निन्दा महान् दु:ख है और परनिन्दा से बढ़कर दूसरा कोई पातक नहीं है। परनिन्दा को सुनने वाला भी पापी होता है। चौमासे में केशों का सँवारना (हजामत) त्याग दे तो वह तीनों तापों से रहित होता है। जो भगवान् के शयन करने पर विशेषत: नख और रोम धारण किये रहता है, उसे प्रतिदिन गंगा स्नान का फल मिलता है। मनुष्य को सब उपायों द्वारा योगियों के ध्येय भगवान् विष्णु को ही प्रसन्न करना चाहिये। समस्त वर्णों एवं श्रेष्ठ पुरुषों के द्वारा भी भगवान् श्रीहरि का ही चिन्तन करना चाहिये। भगवान् विष्णु के नाम से मनुष्य घोर बन्धन से मुक्त हो जाता है। चातुर्मास्य में उनका विशेष रूप से स्मरण करना उचित है।
कर्क की संक्रान्ति के दिन भगवान् विष्णु का भक्ति पूर्वक पूजन करके प्रशस्त एवं शुभ जामुन के फलों से अर्घ्य देना चाहिये। अर्घ्य देते समय इस भाव का चिन्तन करे- 'छ: महीने के भीतर जहाँ कहीं भी मेरी मृत्यु हो जाय तो मानो मैंने स्वयं ही अपने-आपको भगवान् वासुदेव के चरणों में ही समर्पित कर दिया।' सर्वथा प्रयत्न करके भगवान् जनार्दन का सेवन करना चाहिये। जो मनुष्य भगवान् विष्णु की कथा, पूजा, ध्यान और नमस्कार सब कुछ उन्हीं श्रीहरि की प्रसन्नता के लिये करता है, वह मोक्ष का भागी होता है। सत्य स्वरूप सनातन विष्णु वर्णाश्रम-धर्म के स्वरूप हैं। जन्म-मृत्यु आदि के कष्ट का उन्हीं के द्वारा नाश होता है। अत: चातुर्मास्य में विशेष रूप से व्रत द्वारा श्रीहरि को ही ग्रहण करना चाहिये। तपोनिधि भगवान् नारायण के शयन करने पर अपने इस शरीर को तपस्या द्वारा शुद्ध करना चाहिये। भगवान् विष्णु की भक्ति से युक्त जो व्रत है, उसे विष्णुव्रत जानो। धर्म में संलग्न होना तप है। व्रतों में सबसे उत्तम व्रत है - ब्रह्मचर्य का पालन। ब्रह्मचर्य तपस्या का सार है और ब्रह्मचर्य महान् फल देने वाला है। इसलिये समस्त कर्मों में ब्रह्मचर्य को बढ़ावे। ब्रह्मचर्य के प्रभाव से उग्र तपस्या होती है। ब्रह्मचर्य से बढ़कर धर्म का उत्तम साधन दूसरा नहीं है। विशेषत: चातुर्मास्य में भगवान् विष्णु के शयन करने पर यह महान् व्रत संसार में अधिक गुणकारक है- ऐसा जानो। जो इस वैष्णवधर्म का पालन करता है, वह कभी कर्मो से लिप्त नहीं होता। भगवान् के शयन करने पर जो यह प्रतिज्ञा करके कि- 'हे भगवन्! मैं आपकी प्रसन्नता के लिये अमुक सत्कर्म करूँगा। उसका पालन करता है, तो उसी को व्रत कहते हैं। वह व्रत अधिक गुणों वाला होता है। अग्निहोत्र, ब्राह्मण भक्ति, धर्मविषयक श्रद्धा, उत्तम बुद्धि, सत्संग, विष्णुपूजा, सत्य भाषण, हृदय में दया, सरलता एवं कोमलता, मधुर वाणी, उत्तम चरित्र में अनुराग वेदपाठ, चोरी का त्याग, अहिंसा, लज्जा, क्षमा, मन और इन्द्रियों का संयम, लोभ, क्रोध और मोह का अभाव, इन्द्रिय संयम में प्रेम, वैदिक कर्मों का उत्तम ज्ञान तथा श्रीकृष्ण को अपने चित्त का समर्पण- ये नियम जिस पुरुष में स्थिर हैं, वह जीवन्मुक्त कहा गया है। वह पातकों से कभी लिप्त नहीं होता। एक बार का किया हुआ व्रत भी सदैव महान् फल देने वाला होता है। चातुर्मास्य में ब्रह्मचर्य आदि का सेवन अधिक फलद होता है। चातुर्मास्य व्रत का अनुष्ठान सभी वर्ण के लोगों के लिये महान् फलदायक है। व्रत के सेवन में लगे हुए मनुष्यो द्वारा सर्वत्र भगवान् विष्णु का दर्शन होता है। चातुर्मास्य आने पर व्रत का यत्न पूर्वक पालन करे। विष्णु, ब्राह्मण और अग्निस्वरूप तीर्थ का सेवन करे। चारों वेदमय स्वरूप वाले अजन्मा विराट् पुरुष को भजे, जिनके प्रसाद से मनुष्य मोक्षरूपी महान् वृक्ष के ऊपर चढ़ जाता है और कभी सन्ताप को नहीं प्राप्त होता।
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संदर्भ:- श्रीस्कन्द महापुराण

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02/07/2023

. चातुर्मास्य माहात्म्य

अध्याय–01/10

इस अध्याय में पढ़िये–चातुर्मास्य व्रत का माहात्म्य, संयम-नियम, दया धर्म तथा चौमासे में अन्न आदि दानों की महिमा

नारदजी बोले–'देवाधिदेव! इस समय मैं शुभ कारक चातुर्मास्य व्रत को सुनना चाहता हूँ।'
ब्रह्माजीने कहा–'देवर्षे! ये भगवान् विष्णु ही सबको मोक्ष देने वाले तथा संसार सागर से पार उतारने वाले हैं। इनके स्मरण मात्र से मनुष्य सब पापों से मुक्त हो जाता है। संसार में मनुष्य-जन्म दुर्लभ है। उसमें भी उत्तम कुल में जन्म पाना और दुर्लभ है। कुलीन होने पर भी दयालु स्वभाव का होना और कठिन है। यह सब होने पर भी कल्याणमय सत्संग प्राप्त होना और भी दुर्लभ है। जहाँ सत्संग नहीं, विष्णु भक्ति नहीं और व्रत नहीं हैं, वहाँ कल्याण की प्राप्ति दुर्लभ हैं। विशेषतः चातुर्मास्य में भगवान् विष्णु का व्रत करने वाला मनुष्य उत्तम माना गया है। सब तीर्थ, दान, पुण्य और देवस्थान चातुर्मास्य आने पर भगवान् विष्णु की शरण लेकर स्थित होते हैं। जो चातुर्मास्य में श्रीहरि को प्रणाम करता है, उसी का जीवन शुभ है। संसार में मनुष्य का जन्म और भगवान् विष्णु की भक्ति दोनों ही दुर्लभ हैं। जो मनुष्य चातुर्मास्य में नदी स्नान करता है, वह सिद्धि को प्राप्त होता है। जो झरना, तड़ाग और बावली में स्नान करता है, उसके सहस्त्रों पाप तत्काल नष्ट हो जाते हैं। पुष्कर, प्रयाग अथवा और किसी महातीर्थ के जल में जो चातुर्मास्य में स्नान करता है, उसके पुण्य की संख्या नहीं है। नर्मदा, भास्कर क्षेत्र, प्राची सरस्वती तथा समुद्र-संगम में एक दिन भी जो चातुर्मास्य में स्नान करता है, उसमें पाप का लेशमात्र भी नहीं रह जाता। जो नर्मदा में एकाग्रचित्त होकर तीन दिन भी चौमासे का स्नान करता है, उसके पाप के सहस्रों टुकड़े हो जाते हैं। जो गोदावरी नदी में सूर्योदय के समय चौमासे में पंद्रह दिन तक स्नान करता है, वह कर्मजनित शरीर का परित्याग करके भगवान् विष्णु के धाम में जाता है। जो मनुष्य तिल मिश्रित एवं आँवला मिश्रित जल से अथवा बिल्वपत्र के जल से चातुर्मास्य में स्नान करता है, उसमें दोष का लेशमात्र भी नहीं रह जाता। देवाधिदेव भगवान् विष्णु के चरणों के अंगुष्ठ से प्रवाहित होने वाली गंगाजी सदा ही पापनाशिनी कही गयी हैं चातुर्मास्य में उनका यह माहात्म्य विशेष रूप से प्रकट होता है। भगवान् विष्णु स्मरण करने पर सहस्रों पाप भस्म कर डालते हैं, इसलिये उनका चरणोदक मस्तक पर चौमासे में धारण किया जाय तो वह कल्याणकारी होता है। चातुर्मास्य में भगवान् नारायण जल में शयन करते हैं, अत: उसमें भगवान् विष्णु के तेज का अंश व्याप्त रहता है। उस समय उसमें किया हुआ स्नान सब तीर्थों से अधिक फल देने वाला होता है। नारद! बिना स्नान के जो पुण्यकार्यमय शुभ कर्म किया जाता है, वह निष्फल होता है, उसे राक्षस ग्रहण कर लेते हैं। स्नान से मनुष्य सत्य को पाता है। स्नान सनातन धर्म है, धर्म से मोक्ष रूप फल पाकर मनुष्य फिर दु:खी नहीं होता। रात को और सन्ध्या काल में बिना ग्रहण के स्नान न करे, गर्म जल से भी स्नान नहीं करना चाहिये। सूर्य के दर्शन से सब कर्मों में शुद्धि कही गयी है। चातुर्मास्य में विशेष रूप से जल की शुद्धि होती है। शरीर असमर्थ हो तो भस्मस्नान से उसकी शुद्धि होती है। मन्त्र स्नान से, भगवान् विष्णुके चरणोदक से अथवा भगवान् नारायण के आगे क्षेत्र, तीर्थ और नदी आदि में जो स्नान करता है, उसका चित्त शुद्ध हो जाता है। चातुर्मास्य में यह महत्त्व और बढ़ जाता है।
चातुर्मास्य में भगवान् के शयन करने पर प्रतिदिन स्नान के अन्तर में श्रद्धायुक्त चित्त से पितरों का तर्पण करना चाहिये। इससे महान् फल की प्राप्ति होती है। नदियों के संगम में स्नान के पश्चात् पितरों और देवताओं का तर्पण करके जप, होम आदि कर्म करने से अनन्त फल की प्राप्ति होती है। पहले भगवान् गोविन्द का स्मरण करके पीछे शुभ कर्मो का अनुष्ठान करना चाहिये। ये भगवान् गोविन्द ही देवता, पितर और मनुष्य आदिको तृप्ति देने वाले हैं। चातुर्मास्य सब गुणों से उत्कृष्ट समय है। उसमें धर्मयुक्त श्रद्धा एवं स्मृति से पवित्र समस्त कर्मो का अनुष्ठान करना चाहिये। सत्संग, ब्राह्मण भक्ति, गुरु, देवता और अग्नि का तर्पण, गोदान, वेदपाठ, सत्कर्म, सत्यभाषण, गोभक्ति और दान में प्रीति–ये सब सदा धर्म के साधन हैं। भगवान् विष्णु के शयन करने पर उक्त धर्मो का साधन एवं नियम भी महान् फल देने वाला होता है। दो घड़ी भी भगवान् विष्णु का ध्यान एवं उन निरंजन परमेश्वर के सेवन से सौ जन्मों का पाप भस्म हो जाता है। यदि मनुष्य चौमासे में भक्ति पूर्वक योग के अभ्यास में तत्पर न हुआ, तो नि:सन्देह उसके हाथ से अमृत गिर गया। बुद्धिमान् मनुष्य को सदैव मन को संयम में रखने का प्रयत्न करना चाहिये; क्योंकि मन के भली भाँति वश में होने से ही पूर्णतः ज्ञान की प्राप्ति होती है। यह बात निश्चय पूर्वक कही जा सकती है। अत: क्षमा के द्वारा मन को वश में करना चाहिये। एकमात्र सत्य ही परम धर्म है, एक सत्य ही परम तप है, केवल सत्य ही परम ज्ञान है और सत्य में ही धर्म की प्रतिष्ठा है। अहिंसा धर्म का मूल है, इसलिये उस अहिंसा को मन, वाणी और क्रिया के द्वारा आचरण में लाना चाहिये। पराये धन का अपहरण और चोरी आदि पाप कर्म सदा सब मनुष्यों के लिये वर्जित हैं। चातुर्मास्य में इनसे विशेष रूप से बचना चाहिये। ब्राह्मण तथा देवता की सम्पत्ति का विशेष रूप से त्याग करना चाहिये। न करने योग्य कर्मो का आचरण विद्वान् पुरुषों के लिये सदैव त्याज्य है। नारद! जो सम्पूर्ण कार्यों में निष्काम भाव से प्रवृत्त होता है, जिसमें अहं बुद्धि का अभाव है, जो बुद्धि के नेत्रों से ही देखता है, ऐसा पुरुष ही महाज्ञानी और योगी है। मनुष्यों के शरीर में यह अहंकार विष है। अत: वह सदैव त्याग देने योग्य है। मनुष्य कामना के त्याग द्वारा क्रोध और लोभ को जीते। ऐसे मनुष्य के सहस्त्रों पाप उसके शरीर से निकलकर सहस्रों टुकड़ों में नष्ट हो जाते हैं। शान्ति के द्वारा मोह और मन को जीत कर विचार के द्वारा शान्ति भाव को अपनाना चाहिये। सन्तोष से भी शान्ति का उदय होता है। जो अपनी कोमलता एवं सरलता के द्वारा ईर्ष्या भाव को दबा देता है, यह मुनीश्वर है। चातुर्मास्य में जीवदया विशेष धर्म है। प्राणियों से द्रोह करना कभी भी धर्म नहीं माना गया है। अत: सदा सब मासों में भूतद्रोह का परित्याग करना चाहिये। मनीषी पुरुष इस भूतद्रोह को सहस्रों पापों का मूल बताते हैं। इसलिये मनुष्यों को सर्वथा प्रयत्न करके प्राणियों के प्रति दया करनी चाहिये। सब प्राणियों के हृदय में सदा भगवान् विष्णु विराज रहे हैं। जो उन प्राणियों से द्रोह करने वाला है, उसके द्वारा भगवान् का ही तिरस्कार होता है। जिस धर्म में दया नहीं है, वह दूषित माना गया है दया के बिना न विज्ञान होता है, न धर्म होता है और न ज्ञान ही होता है। अत: सब प्राणियों के प्रति आत्मभाव रखकर सबके ऊपर दया करना सनातन, धर्म है, जो सब पुरुषों के द्वारा सदा सेवन करने योग्य है।
सब धर्मो में दान धर्म की विद्वान् लोग सदा प्रशंसा करते हैं। वेद में अन्न को ब्रह्म कहा गया है, अन्न में ही प्राणों की प्रतिष्ठा है। अत: मनुष्य सदा अन्न एवं जल का दान करे। जल देने वाला तृप्ति को और अन्न-दान करने वाला मनुष्य अक्षय सुख को पाता है। अन्न और जल के समान दूसरा कोई दान न हुआ है, न होगा। मणि, रत्न, मूँगा, चाँदी, सोना और वस्त्र तथा अन्य वस्तुओं के दानों में भी अन्नदान ही सबसे बढ़कर है। चातुर्मास्य में अन्न और जल का दान, गोदान, प्रतिदिन वेदपाठ और अग्नि में हवन-ये सब महान् फल देने वाले हैं। यदि भगवान् विष्णु के साथ समागम के लिये वैकुण्ठ धाम में जाने की इच्छा हो, तो सब पापों के नाश के लिये चौमासे में अन्नदान करना चाहिये। अन्नदान करने से सब प्राणी प्रसन्न होते हैं। देवता भी अन्नदाता की स्पृहा रखते हैं। गुरु और ब्राह्मणों को भोजन कराना, घृतदान करना तथा सत्कर्मों में संलग्न रहना- ये सब बातें चातुर्मास्य काल में जिसमें मौजूद हैं, वह साधारण मनुष्य नहीं है। सद्धर्म, सत्कथा, सत्पुरुषों की सेवा, संतों का दर्शन, भगवान् विष्णु का पूजन और दान में अनुराग–ये सब बातें चौमासे में दुर्लभ बतायी गयी हैं। जो मनुष्य चौमासे में पितरों के उद्देश्य से अन्नदान करता है, वह सब पापों से शुद्धचित्त होकर पितरों के लोक में जाता है। उसके अन्नदान से तृप्त हुए देवता लोग उसे मनोवांछित वस्तु प्रदान करते हैं। चींटी भी उसके घर से भोजन लेकर जाती है। अन्नदान सबसे उत्तम है, उसका न रात में निषेध है, न दिन में। चौमासे में वह विशेष रूप से पापों का नाश करने वाला है। शत्रुओं को भी अन्न देना मना नहीं है। चौमासे में दूध, दही एवं मट्टा का दान महान् फल देने वाला होता है। जन्म काल में जिससे यह शरीर पुष्ट हुआ है, उस अन्न एवं दुग्ध का दान उत्तम है। साग देने वाला मनुष्य न कभी नरक में जाता है और न यमलोक का दर्शन करता है। वस्त्र देने वाला प्रलय काल तक चन्द्रलोक में निवास करता है। जो चातुर्मास्य में चन्दन, अगुरु और धूप का दान करता है, वह मनुष्य पुत्र - पौत्रों सहित विष्णु रूप होता है। भगवान् विष्णु के शयन काल में जो मनुष्य वेदवेत्ता ब्राह्मण को फल दान करता है, वह यमलोक को नहीं देखता जो चौमासे में भगवान् विष्णु की प्रीति के लिये विद्यादान, गोदान और भूमिदान करता है, वह अपने पूर्वजों का उद्धार कर देता है। जो जिस देवता के उद्देश्य से चौमासे में गुड़, नमक, तेल, शहद, तिक्त पदार्थ, तिल और अन्न देता है, वह उसी के लोक में जाता है। विशेषतः चातुर्मास्य में मनुष्य को अग्नि में आहुति देनी चाहिये, ब्राह्मण को दान देना चाहिये और गौओं की भली भाँति सेवा पूजा करनी चाहिये। भविष्य में दान देने की प्रतिज्ञा न करके शीघ्र ही दे डालना चाहिये। मनुष्य जो कुछ देने की इच्छा करे, वह अवश्य दे डाले। जिसको देने का निश्चय किया हो उसे ही दे, दूसरे को न दे। दी हुई वस्तु उससे वापस न ले। जो श्रीहरि के शयनकाल में ब्राह्मणों के लिये सब प्रकार का दान देता है, वह पूर्वजों सहित अपने को पापों से मुक्त कर लेता है।
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संदर्भ:- श्रीस्कन्द महापुराण

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🚩ओम नमः भगवतय वासुदेवाय नमः 🙏🏻विशेष मंत्र और उनका अर्थ-:  👇                            Meri Radhey
10/02/2023

🚩ओम नमः भगवतय वासुदेवाय नमः 🙏🏻
विशेष मंत्र और उनका अर्थ-:

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Meri Radhey

10/02/2023
30/01/2023
02/01/2023

जय श्री राधे कृष्णा🙏
26/12/2022

जय श्री राधे कृष्णा🙏

.                       संक्षिप्त महाभारत-कथा                                 पोस्ट–078                                 ...
24/11/2022

. संक्षिप्त महाभारत-कथा

पोस्ट–078

(वन पर्व)

आज की कथा में:– पाण्डवों का वृषपर्वा और आर्ष्टिषेण के आश्रमों पर जाना तथा भीमसेन के हाथ से यक्ष और राक्षसों का वध तथा कुबेर के द्वारा शान्तिस्थापन एवं धौम्य का युधिष्ठिर को नाना स्थान दिखलाना और अर्जुन का गन्धमादन पर लौटकर आना
https://chat.whatsapp.com/IIRnG45eArT0UOs0vEEumP
वैशम्पायनजी कहते हैं–'जनमेजय ! जटासुर के मारे जाने पर महाराज युधिष्ठिर फिर श्रीनर-नारायण के आश्रम में आकर रहने लगे। इस समय उन्हें अपने भाई अर्जुन का स्मरण हो आया। वे द्रौपदी के सहित सब भाइयों को बुलाकर कहने लगे–'अर्जुन ने मुझसे कहा था कि 'मैं पाँच वर्ष तक स्वर्ग में अस्त्रविद्या सीखने के बाद यहाँ मृत्युलोक में लौट आऊँगा।' इसलिये जिस समय अर्जुन अस्त्रविद्या सीखकर यहाँ आवे, उस समय हम लोगों को उससे मिलने के लिये तैयार रहना चाहिये।'
इस प्रकार बातचीत करते हुए उन्होंने ब्राह्मण और भाइयों के साथ आगे के लिये प्रस्थान किया। वे कहीं तो पैदल चलते थे और कहीं राक्षस लोग उन्हें कन्धे पर बैठाकर ले चलते। इस प्रकार रास्ते में कैलासपर्वत, मैनाकपर्वत और गन्धमादन की तलैटी को, श्वेतगिरि को तथा ऊपर-ऊपर के पहाड़ों की अनेकों निर्मल नदियों को देखते वे सातवें दिन हिमालय के पवित्र पृष्ठ पर पहुँचे।
वहाँ उन्होंने राजर्षि वृषपर्वा का पवित्र आश्रम देखा। वह अनेकों प्रकार के पुष्पित वृक्षों से सुशोभित था। पाण्डवों ने उस आश्रम में पहुँचकर परमधार्मिक राजर्षि वृषपर्वा को प्रणाम किया।
राजर्षि ने पुत्रों के समान उनका अभिनन्दन किया। और उनसे सत्कृत हो पाण्डवों ने वहाँ सात रात निवास किया। आठवें दिन उन्होंने जगत् प्रसिद्ध वृषपर्वाजी से आगे जाने की इच्छा प्रकट की। उनके पास जो सामान बच रहा था, वह उन्होंने उन्हीं को दे दिया तथा अपने यज्ञपात्र, रत्न और आभूषण भी उन्हीं के आश्रममें छोड़ दिये।
राजर्षि वृषपर्वा भूत और भविष्यत् के ज्ञाता तथा समस्त धर्मों के मर्मज्ञ थे। उन्होंने चलते समय पाण्डवों को पुत्रों की तरह उपदेश दिया। फिर उनकी आज्ञा लेकर वे उत्तर दिशा को चले।
वहाँ से सत्यपराक्रमी कुन्तीनन्दन युधिष्ठिर भाइयों के सहित पैदल ही चले। वह प्रान्त अनेक प्रकार के मृगों से पूर्ण था। रास्ते में पहाड़ों के ऊपर तरह-तरह के वृक्षों की कुंजों में निवास करते हुए उन्होंने चौथे दिन श्वेतपर्वत पर पदार्पण किया।
श्वेताचल एक बहुत बड़े बादल के समान सफेद-सफेद दिखायी देता था; इस पर जल की अधिकता थी तथा मणि, सुवर्ण और चाँदी की शिलाएँ थीं। मार्ग में धौम्य, द्रौपदी, पाण्डव और महर्षि लोमश साथ-साथ ही चलते थे। उनमें से कोई भी थकता नहीं था। इस प्रकार चलते-चलते वे माल्यवान् पर्वत पर पहुँच गये। उसके ऊपर चढ़कर उन्होंने किम्पुरुष, सिद्ध और चारणों से सेवित गन्धमादन के दर्शन किये।
उसे देखकर उन्हें हर्ष से रोमांच हो आया। क्रमशः उन वीरों ने मन और नेत्रों को आनन्दित करने वाले परम पवित्र गन्धमादन के वन में प्रवेश किया। उस समय महाराज युधिष्ठिर ने भीमसेन से प्रेमपूर्वक कहा–'अहो ! यह गन्धमादन का जंगल कैसा शोभा सम्पन्न है। इस मनोहर वन में बड़े दिव्य वृक्ष हैं तथा पत्र, पुष्प और फलों से सुशोभित तरह तरह की लताएँ हैं।
इधर, इस परम पवित्र देवनदी गंगा की ओर तो देखो। इसमें अनेकों कलहंस क्रीडा कर रहे हैं तथा इसके तटपर ऋषि और किन्नर लोग निवास करते हैं। हे कुन्तीनन्दन भीम ! तरह-तरह के धातु, नदी, किन्नर, मृग, पक्षी, गन्धर्व, अप्सरा, मनोरम वन, अनेकों आकारों के सर्प और सैकड़ों शिखरों से सुशोभित इस पर्वतराज की ओर जरा दृष्टिपात करो।'
वैशम्पायनजी कहते हैं–'जनमेजय ! इस प्रकार शूरवीर पाण्डव अपने लक्ष्य स्थान पर पहुँचकर मन में बड़े ही आनन्दित हुए। उस पर्वतराज को देखते-देखते उन्हें तृप्ति नहीं होती थी। फिर उन्होंने फल-फूल वाले वृक्षों से सुशोभित राजर्षि आर्ष्टिषेण का आश्रम देखा।
राजर्षि बड़े ही तपस्वी थे उनका शरीर अत्यन्त कृश था, शरीर की नसें दिखायी देने लगी थीं और वे समस्त धर्मों के पारगामी थे। पाण्डवों ने उनके पास जाकर यथायोग्य प्रणाम किया। धर्मज्ञ आर्ष्टिषेण ने दिव्य दृष्टि से पाण्डवों को पहचान लिया और उनसे बैठने के लिये कहा।
पाण्डवों के बैठ जाने पर महातपा आर्ष्टिषेण ने कौरवों में श्रेष्ठ धर्मराज युधिष्ठिर का सत्कार करके पूछा–'राजन् ! तुम्हारा मन कभी असत्य में तो नहीं जाता, तुम बराबर धर्म में स्थित रहते हो न ?
तुम्हारे माता-पिता की सेवा में तो कोई अन्तर नहीं आता ? अपने समस्त गुरुजन, वृद्ध पुरुष और विद्वानों का तो तुम सत्कार करते हो न ? पापकर्मों में तो कभी तुम्हारा मन नहीं जाता ? तुम उपकार का बदला चुकाना और अपकार को भूल जाना तो अच्छी तरह जानते हो न और उस ज्ञान का तुम्हें अभिमान तो नहीं होता ?
तुमसे यथायोग्य मान पाकर साधुजन प्रसन्न रहते हैं न ? वनों में रहते समय भी तुम धर्म का ही अनुवर्तन करते हो न ? तुम्हारे व्यवहार से धौम्यजी को तो कभी कष्ट नहीं होता ? दान, धर्म, तप, शौच, आर्जव और तितिक्षा का आचरण करते हुए तुम अपने बाप दादों के शील का अनुसरण करते हो न ? तुम राजर्षियों के द्वारा आचरित मार्ग से ही चलते हो न ?
जब अपने कुल में पुत्र या नाती का जन्म होता है तो पितृलोक में रहने वाले पितर हँसते भी हैं और शोक भी मनाते हैं; क्योंकि वे सोचते हैं कि पता नहीं हमें इसके कुकर्मों से दुःख ही भोगना पड़ेगा या इसके शुभ कर्मों से सुख मिलेगा। हे पार्थ! जो पुरुष माता, पिता, अग्नि, गुरु और आत्मा की पूजा करता है, वह इहलोक और परलोक दोनों ही को जीत लेता है।'
इस पर महाराज युधिष्ठिर ने कहा–'भगवन् ! आपने यह धर्म के यथार्थ स्वरूप का वर्णन किया है। मैं भी यथाशक्ति अपनी योग्यता के अनुसार इसका विधिवत् पालन करता हूँ।'
आर्ष्टिषेण ने कहा–'पूर्णिमा और प्रतिपदा की सन्धि में इस पर्वत पर केवल जल या पवन का ही सेवन करने वाले मुनिगण आकाशमार्ग से आते हैं। उस समय यहाँ भेरी, पणव, शंख और मृदंगों का शब्द भी सुनायी देता है। आप लोगों को यहीं बैठे-बैठे उसे सुनना चाहिये, वहाँ जाने का विचार बिलकुल नहीं करना चाहिये।
यहाँ से आगे तुम्हारे लिये जाना सम्भव भी नहीं है; क्योंकि अब आगे देवताओं की विहार भूमि है, उसमें मनुष्यों की गति नहीं हो सकती इस कैलास के शिखर को लाँघकर केवल परमसिद्ध और देवर्षिगण ही जा सकते हैं। यदि कोई मनुष्य चपलतावश जाने का प्रयत्न करता है तो उससे समस्त पर्वतीय जीव द्वेष करने लगते हैं और राक्षस लोग उसे लोहे की बछियों से मारते हैं।
पर्वसंधियों पर यहाँ नरवाहन कुबेरजी भी बड़े ठाट बाट से आते हैं। इस कैलास के शिखर पर ही देवता, दानव, सिद्धों और कुबेर का उद्यान है। इस प्रकार पर्वसन्धियों पर यहाँ सभी प्राणियों को ऐसी ही बहुत सी विचित्र बातें दिखायी दिया करती हैं। अतः जबतक अर्जुन आवें, तब तक तुम यहीं निवास करो।'
अतुलित तेजस्वी मुनिवर आर्ष्टिषेण की यह हितकर बात सुनकर पाण्डव लोग निरन्तर उन्हीं की आज्ञा के अनुसार बर्ताव करने लगे। वे हिमालय पर रहकर महर्षि लोमश से तरह-तरह के उपदेश सुनते रहते थे।
इस प्रकार वहाँ रहते हुए उनके वनवास का पाँचवाँ वर्ष बीत गया। घटोत्कच तो राक्षसों के साथ पहले ही चला गया था। जाती बार वह कह गया था कि आवश्यकता पड़ने पर मैं फिर उपस्थित हो जाऊँगा। उस आश्रम पर पाण्डव लोग कई मास तक रहे और उन्होंने अनेकों अद्भुत घटनाएँ देखीं।
एक दिन बहता हुआ वायु ही हिमालय के शिखर से सब प्रकार के सुन्दर और सुगन्धित पुष्प उड़ा लाया। बन्धु बान्धवों के सहित पाण्डवों ने और यशस्विनी द्रौपदी ने वहाँ वे पचरंगे पुष्प देखे।
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एक दिन भीमसेन उस पर्वत पर आनन्द से एकान्त में बैठे थे। उस समय द्रौपदी ने उनसे कहा–'महाबाहो ! यदि समस्त राक्षस आपके बाहुबल से पीड़ित होकर इस पर्वत को छोड़कर भाग जायँ तो कैसा रहे ?'
फिर तो आपके सुहृदों को इस पर्वत का विचित्र पुष्पावलि-मण्डित मंगलमय शिखर सब प्रकार के भय और मोह से रहित दिखायी देगा। भीमसेन ! मेरे मन में बहुत दिनों से यह बात आ रही है।'
द्रौपदी की बात सुनकर भीमसेन ने सुवर्ण की पीठ वाला धनुष, तलवार और तरकस उठा लिये और वे हाथ में गदा लेकर बेखट के गन्धमादन पर आगे बढ़ने लगे। यह देखकर द्रौपदी का उल्लास उत्तरोत्तर बढ़ने लगा। पवनपुत्र भीमसेन पर ग्लानि, भय, कायरता और मत्सरता का प्रभाव तो किसी समय भी नहीं होता था।
उस पर्वत की चोटी पर जाकर वे वहाँ से कुबेर के महल को देखने लगे। वह सुवर्ण और स्फटिक के भवनों से सुशोभित था। उसके चारों ओर सोने का परकोटा बना हुआ था। उसमें सब प्रकार के रत्न जगमगा रहे थे और तरह-तरह के उद्यान उसकी शोभा बढ़ा रहे थे।
इस प्रकार राक्षसराज कुबेर के रत्नजटित और पुष्पमाला-मण्डित प्रासाद को देखकर उन्होंने अपने शत्रुओं के रोंगटे खड़े कर देने वाला शंख बजाया तथा अपने धनुष की प्रत्यंचा और तालियों का भीषण शब्द करके सब जीवों को मोहित कर दिया।
उस शब्द से यक्ष, राक्षस और गन्धर्वों के रोंगटे खड़े हो गये और वे गदा, परिघ, तलवार, त्रिशूल, शक्ति और फरसा लेकर भीमसेन की ओर दौड़े। फिर तो उनके साथ भीमसेन का युद्ध होने लगा। भीमसेन ने अपने प्रबल वेग वाले भाले से उनके चलाये हुए त्रिशूल, शक्ति और फर से आदि सभी शस्त्रों को काट डाला।
उनके हाथों से छूटे हुए आयुधों से कटे हुए यक्ष और राक्षसों के शरीर और सिर सब ओर दिखायी देने लगे। इस प्रकार अंग-भंग होने से यक्ष लोग भीमसेन से बहुत डर गये, उनके हाथ से सारे अस्त्र-शस्त्र गिर गये और वे भयंकर चीत्कार करने लगे।
अन्त में प्रचण्ड धनुर्धर भीमसेन से डरकर वे अपने गदा, त्रिशूल, तलवार, शक्ति और फरसे आदि फेंककर दक्षिण दिशा को भागे। उधर कुबेर का मित्र मणिमान् नाम का एक राक्षस रहता था। उसने यक्ष-राक्षसों को भागते देखकर मुसकराकर कहा–'अरे! तुम अनेकों को अकेले आदमी ने परास्त कर दिया ! अब तुम कुबेर के पास जाकर क्या कहोगे ?'
उन सबसे ऐसा कहकर वह राक्षस शक्ति, त्रिशूल और गदा लेकर भीमसेन पर टूट पड़ा। भीमसेन ने भी मदस्रावी हाथी के समान उसे अपनी ओर आते देखकर अपने वत्सदन्त नामक तीन बाणों से उसकी पसलियों पर प्रहार किया। इससे मणिमान् अत्यन्त क्रोध में भर गया और उसने अपनी भारी गदा उठाकर भीमसेन के ऊपर छोड़ी।
परन्तु भीमसेन गदायुद्ध की चालों में खूब दक्ष थे, अतः उन्होंने उसके उस प्रहार को व्यर्थ कर दिया। इसी समय उस राक्षस ने सोने की मूठवाली एक फौलाद की शक्ति छोड़ी। वह भीषण शक्ति भीमसेन के दाहिने हाथ को घायल करके अग्नि की लपटें निकालती हुई पृथ्वी पर गिर गयी।
उस शक्ति के लगने से अतुलित पराक्रमी भीमसेन की आँखें क्रोध से घूमने लगीं और उन्होंने अपनी सुवर्ण के पत्र से मढ़ी हुई गदा उठा ली। वे आकाश में उछलकर उस गदा को घुमाते हुए उसकी ओर दौड़े और संग्रामभूमि में भयंकर गर्जना करते हुए उसे मणिमान् के ऊपर फेंका।
वह गदा वायु के समान बड़े वेग से उस राक्षस का संहार करके पृथ्वी पर गिर गयी। मणिमान्‌ को मरकर पृथ्वी पर गिरते देख जो राक्षस मरने से बचे थे, वे भयंकर आर्तनाद करते पूर्व की ओर भाग गये।
इस समय पर्वत की गुफाओं को अनेक प्रकार के शब्दों से गूँजते देखकर अजातशत्रु युधिष्ठिर, नकुल, सहदेव, धौम्य, द्रौपदी, ब्राह्मण और सब सुहृद्गण भीमसेन को न देखकर उदास हो गये। फिर द्रौपदी को आर्ष्टिषेण मुनि को सौंपकर वे सब वीर अस्त्र-शस्त्र लेकर एक साथ पर्वत पर चढ़ने लगे।
पहाड़की चोटी पर पहुँचकर उन्होंने इधर-उधर दृष्टि डाली तो देखा कि एक ओर भीमसेन खड़े हैं और वहीं उनके मारे हुए अनेकों विशालकाय राक्षस पृथ्वी पर पड़े हैं।
भीमसेन को देखकर सब भाई उनसे गले मिले और फिर वहीं बैठ गये। महाराज युधिष्ठिर ने कुबेर के महल और मरे हुए राक्षसों की ओर देखकर भीमसेन से कहा–'भैया भीम ! तुमने यह पाप साहस या मोहवश ही किया है; तुम मुनियों का सा जीवन व्यतीत कर रहे हो, इस प्रकार व्यर्थ हत्या करना तुम्हें शोभा नहीं देता। देखो, यदि तुम मेरी प्रसन्नता करना चाहते हो तो फिर कभी ऐसा न करना।'
इधर भीमसेन के आक्रमण से बचे हुए कुछ राक्षस बड़ी तेजी से दौड़कर कुबेर के पास आये और चीख चीखकर उनसे कहने लगे–'यक्षराज ! आज संग्रामभूमि में एक अकेले मनुष्य ने क्रोधवश नाम के राक्षसों को मार डाला है। वे सब उसकी मार से निःसत्त्व और प्राणहीन हुए पड़े हैं। हम जैसे-तैसे उसके हाथ से बचकर आपके पास आये हैं। आपका सखा मणिमान् भी मारा जा चुका है। यह सब काण्ड एक मनुष्य ने ही कर डाला है। अब जो करना चाहें वह कीजिये।'
यह समाचार पाकर समस्त यक्ष और राक्षसों के स्वामी कुबेरजी बड़े ही कुपित हुए, उनकी आँखें लाल हो गयीं और वे बोले–'यह सब कैसे हुआ ?'
फिर यह दूसरा अपराध भी भीमसेन का ही सुनकर उन्हें बड़ा क्रोध हुआ और उन्होंने आज्ञा दी कि हमारा पर्वतशिखर के समान ऊँचा रथ सजा लाओ। रथ तैयार हो जाने पर राजराजेश्वर महाराज कुबेर उस पर चढ़कर चले। जब वे गन्धमादन पर पहुँचे तो यक्ष-राक्षसों से घिरे हुए प्रियदर्शन कुबेरजी को देखकर पाण्डवों को रोमांच हो आया।
तथा महाराज पाण्डु के धनुष-बाणधारी महारथी पुत्रों को देखकर कुबेरजी भी बड़े प्रसन्न हुए। वे उनसे देवताओं का एक कार्य कराना चाहते थे, इसलिये उन्हें देखकर वे हृदय में सन्तुष्ट ही हुए।
कुबेरजी के जो सेवक पीछे रह गये थे, वे पक्षियों के समान सीधे ही उस पर्वत पर पहुँच गये तथा यक्षराज को पाण्डवों पर प्रसन्न देखकर उनका मनमुटाव भी दूर हो गया।
धर्म के रहस्य को जानने वाले युधिष्ठिर, नकुल और सहदेव ने कुबेर को प्रणाम किया और अपने को उनका अपराधी-सा माना। अतः वे सब यक्षराज को घेरकर हाथ जोड़कर खड़े हो गये। इस समय भीमसेन के हाथ में पाश, खड्ग और धनुष सुशोभित थे और वे कुबेर की ओर देख रहे थे।
उन्हें देखकर नरवाहन कुबेरजी ने धर्मराज से कहा–'पार्थ! आप समस्त प्राणियों का हित करने में तत्पर रहते हैं–यह बात सब जीव जानते हैं। इसलिये आप भाइयों के सहित बेखट के इस पर्वत पर रहिये।
देखिये, भीमसेन के ऊपर आप क्रोध न करें; क्योंकि राक्षस तो अपने काल से ही मरे हैं, आपका भाई तो उसमें निमित्तमात्र है। राजन् ! एक बार कुशस्थली नाम के स्थान में देवताओं की एक मन्त्रणा हुई थी उसमें मुझे भी बुलाया गया था तब मैं तरह-तरह के अस्त्र-शस्त्रों से सुसज्जित अत्यन्त भयंकर तीन सौ महापद्म यक्षों के साथ वहाँ गया था।
मार्ग में मुझे मुनिवर अगस्त्यजी मिले। वे यमुनाजी के तट पर बड़ी कठोर तपस्या कर रहे थे। उस समय मेरा मित्र राक्षसराज मणिमान् भी मेरे साथ ही था। उसने मूर्खता, अज्ञान, गर्व और मोह के अधीन होकर ऊपर से उन महर्षि के ऊपर थूक दिया।
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तब मुनिवर ने कोप करके मुझसे कहा–'कुबेर ! देखो, तुम्हारे इस सखा ने मुझे कुछ न समझकर मेरा तिरस्कार किया है; इसलिये यह अपनी सेना के सहित केवल एक ही मनुष्य के हाथ से मारा जायगा। तुम्हें भी अपने इन सेनानियों के कारण दुःखी होना पड़ेगा और फिर उस मनुष्य का दर्शन करने पर ही तुम्हारा वह दुःख दूर होगा।'
इस प्रकार महर्षियों में श्रेष्ठ अगस्त्यजी ने मुझे यह शाप दिया था। उस शाप से आज आपके भाई ने मुझे मुक्त किया है। राजन् ! लौकिक व्यवहार में धैर्य, कुशलता, देश, काल और पराक्रम–इन पाँच साधनों की बड़ी आवश्यकता है।
सत्ययुग में लोग धैर्यवान्, अपने-अपने कर्म में कुशल और पराक्रमी होते थे। जो क्षत्रिय धैर्यवान्, देश काल का ज्ञान रखने वाला और सब प्रकार की धर्मविधि में निपुण होता है, वह बहुत समय तक पृथ्वी का शासन करता है जो पुरुष समस्त कर्मों में इस प्रकार बर्तता है, वह संसार में यश प्राप्त करता है और मरने पर सद्गति पाता है।
किन्तु जो क्रोध के आवेश में अपने पतन पर दृष्टि नहीं डालता और जिसके मन-बुद्धि पाप में ही रच-पच रहे हैं, वह तो केवल पाप का ही अनुसरण करता है। तथा कर्मों का विभाग न जानने के कारण वह इस लोक और परलोक में नाश को ही प्राप्त होता है।
यह भीमसेन भी धर्म को नहीं जानता, गर्वीला है; इसकी बुद्धि बालकों के समान है, सहन करना तो यह जानता ही नहीं और इसे किसी प्रकार का भय भी नहीं है। इसलिये आप फिर राजर्षि आष्र्ष्टिषेण के आश्रम में जाकर इसे समझाइये। यह कृष्ण पक्ष आप उसी आश्रम में व्यतीत कीजिये।
मेरी आज्ञा से अलकापुरी में रहने वाले समस्त यक्ष, गन्धर्व, किन्नर और पर्वतवासी आपकी देख-भाल रखेंगे। भीमसेन साहस करके यहाँ आ गया है, सो आप समझाकर इसे ऐसा करने से रोक दीजिये।
इससे छोटा आपका भाई अर्जुन तो व्यवहार विषय में निपुण है और सब प्रकार की धर्म-मर्यादा को भी जानता है। इसी से लोक में जितनी भी स्वर्गीय विभूतियाँ हैं, वे सब उसे प्राप्त हैं। उनके सिवा उसमें दम, दान, बल, बुद्धि, लज्जा, धैर्य और तेज–ये सब गुण भी हैं ही।'
कुबेर के ये वचन सुनकर पाण्डव बड़े प्रसन्न हुए। भीमसेन ने भी शक्ति, गदा, खड्ग और धनुष को पीठपर बाँधकर उन्हें प्रणाम किया। शरणागत वत्सल कुबेरजी ने भीमसेन से कहा–'तुम शत्रुओं का मान भंग करने वाले और सुहृदों के सुख की वृद्धि करने वाले होओ।'
फिर धर्मराज से बोले–'अब अर्जुन अस्त्रविद्या में निपुण हो गया है, देवराज इन्द्र ने भी उसे घर जाने की आज्ञा दे दी है; इसलिये अब वह शीघ्र ही यहाँ आवेगा।'
इस प्रकार उत्तम कर्म करने वाले धर्मराज युधिष्ठिर को उपदेश कर वे अपने स्थान को चले गये। भीमसेन के हाथ से जो राक्षस मारे गये थे, उनके शव कुबेरजी की आज्ञा से पहाड़ के नीचे लुढ़का दिये गये।
इस प्रकार युद्ध में मारे जाने से उन्हें मतिमान् अगस्त्यजी का जो शाप था, उसका भी अन्त हो गया। पाण्डवों ने वह रात बड़े आनन्द से कुबेरजी के महलों में ही बितायी।
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वैशम्पायनजी कहते हैं–'शत्रुदमन जनमेजय ! सूर्योदय होने पर मुनिवर धौम्य अपने आह्निक कर्म से निवृत्त हो राजर्षि आर्ष्टिषेण के साथ पाण्डवों की ओर चले। पाण्डवों ने उन दोनों के चरणों में प्रणाम किया और फिर हाथ जोड़कर अन्य सब ब्राह्मणों का भी अभिवादन किया।
फिर धौम्य ने धर्मराज का हाथ पकड़कर पूर्व दिशा की ओर संकेत करते हुए कहा–'महाराज ! यह जो समुद्र पर्यन्त पृथ्वी पर फैला हुआ महापर्वत दिखायी दे रहा है, इसका नाम मन्दराचल है। देखिये, इसकी कैसी शोभा हो रही है ! अहा ! पर्वतमाला और हरी-भरी वनावली से यह दिशा कैसी रमणीय जान पड़ती है।
यह दिशा इन्द्र और कुबेर का निवास स्थान कही जाती है। सर्वधर्मज्ञ, मुनिजन, प्रजाजन, सिद्ध, साध्य और देवता लोग इसी दिशा में उदित होते हुए सूर्य का पूजन करते हैं। समस्त प्राणियों के प्रभु परमधर्मज्ञ यमराज इस दक्षिण दिशा में रहते हैं, जो मरने वाले प्राणियों का गन्तव्य स्थान है।
यह पवित्र और अद्भुत दिखायी देने वाली संयमनीपुरी है। यही प्रेतराज यम का निवास स्थान है। इसका ऐश्वर्य भी बहुत बढ़ा चढ़ा है। इधर, पश्चिम की ओर जो पर्वत दिखायी देता है उसे अस्ताचल कहते हैं। महाराज वरुण इस पर्वत और महासमुद्र में रहकर प्राणियों की रक्षा करते हैं।
यह सामने उत्तर दिशा को आलोकित करता हुआ परम प्रतापी मेरुपर्वत खड़ा हुआ है। इस पर केवल ब्रह्मवेत्ता ही जा सकते हैं। इसी के ऊपर ब्रह्माजी की सभा है और इसी पर वे स्थावर-जंगम की रचना करते हुए निवास करते हैं। इसी पर्वत के ऊपर वसिष्ठादि सप्तर्षियों के उदय-अस्त होते रहते हैं।
तुम तनिक मेरुपर्वत के इस पवित्र शिखर के दर्शन करो। अनादि-निधन श्रीनारायण का स्थान इससे भी परे चमक रहा है। वह सर्वतेजोमय और परम पवित्र है, देवता भी उसका दर्शन नहीं कर सकते। अग्नि और सूर्य उस स्थान को प्रकाशित नहीं कर सकते, वह तो स्वयं अपने प्रकाश से ही प्रकाशित है। उसका दर्शन देवता और दानवों को भी दुर्लभ है।
उस स्थान पर अचिन्त्यमूर्ति श्रीहरि विराजते हैं। जो महान् तपस्वी और शुभकर्मों से पवित्रचित्त हो गये हैं, वे अज्ञान और मोह से रहित योगसिद्ध महात्मा यतिजन ही भक्ति के द्वारा उनके पास जा सकते हैं। वहाँ जाकर वे फिर इस लोक में नहीं आते।
राजन् ! यह परमेश्वर का स्थान ध्रुव, अक्षय और अविनाशी है; तुम इसे प्रणाम करो। देखो! सूर्य, चन्द्रमा और समस्त तारागण अपनी-अपनी मर्यादा में रहकर सर्वदा इस पर्वतराज मेरु की ही प्रदक्षिणा किया करते हैं। इसकी परिक्रमा करते हुए ही नक्षत्रों के सहित चन्द्रमा पर्वसन्धियों का समय आने पर महीनों का विभाग करते हैं तथा महातेजस्वी सूर्य वर्षा, वायु और तापरूप सुख के साधनों से प्राणियों का पोषण करते हैं।
हे भारत ! भगवान् सूर्य ही समस्त जीवों की आयु और कर्मोंका विभाग करके दिन, रात, कला, काष्ठा आदि कालके अवयवोंकी रचना करते हैं।'
वैशम्पायनजी कहते हैं–'राजन् ! फिर उत्तम व्रतों का पालन करने वाले पाण्डव लोग उस पर्वत पर ही निवास करने लगे।
अर्जुन अस्त्रविद्या सीखने के लिये इन्द्र के पास गये थे। वे पाँच वर्ष तक इन्द्र के भवन में रहे और उन्होंने देवराज से अग्नि, वरुण, चन्द्रमा, वायु, विष्णु, इन्द्र, पशुपति, परमेष्ठी ब्रह्मा, प्रजापति यम, धाता, सविता, त्वष्टा और कुबेर आदि देवताओं के अस्त्र प्राप्त किये। फिर इन्द्र ने उन्हें घर जाने की आज्ञा दे दी। तब वे उन्हें प्रणाम कर बड़ी खुशी-खुशी गन्धमादन पर्वत पर लौट गये।

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– साभार: गीताप्रेस (गोरखपुर)

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