24/11/2022
. संक्षिप्त महाभारत-कथा
पोस्ट–078
(वन पर्व)
आज की कथा में:– पाण्डवों का वृषपर्वा और आर्ष्टिषेण के आश्रमों पर जाना तथा भीमसेन के हाथ से यक्ष और राक्षसों का वध तथा कुबेर के द्वारा शान्तिस्थापन एवं धौम्य का युधिष्ठिर को नाना स्थान दिखलाना और अर्जुन का गन्धमादन पर लौटकर आना
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वैशम्पायनजी कहते हैं–'जनमेजय ! जटासुर के मारे जाने पर महाराज युधिष्ठिर फिर श्रीनर-नारायण के आश्रम में आकर रहने लगे। इस समय उन्हें अपने भाई अर्जुन का स्मरण हो आया। वे द्रौपदी के सहित सब भाइयों को बुलाकर कहने लगे–'अर्जुन ने मुझसे कहा था कि 'मैं पाँच वर्ष तक स्वर्ग में अस्त्रविद्या सीखने के बाद यहाँ मृत्युलोक में लौट आऊँगा।' इसलिये जिस समय अर्जुन अस्त्रविद्या सीखकर यहाँ आवे, उस समय हम लोगों को उससे मिलने के लिये तैयार रहना चाहिये।'
इस प्रकार बातचीत करते हुए उन्होंने ब्राह्मण और भाइयों के साथ आगे के लिये प्रस्थान किया। वे कहीं तो पैदल चलते थे और कहीं राक्षस लोग उन्हें कन्धे पर बैठाकर ले चलते। इस प्रकार रास्ते में कैलासपर्वत, मैनाकपर्वत और गन्धमादन की तलैटी को, श्वेतगिरि को तथा ऊपर-ऊपर के पहाड़ों की अनेकों निर्मल नदियों को देखते वे सातवें दिन हिमालय के पवित्र पृष्ठ पर पहुँचे।
वहाँ उन्होंने राजर्षि वृषपर्वा का पवित्र आश्रम देखा। वह अनेकों प्रकार के पुष्पित वृक्षों से सुशोभित था। पाण्डवों ने उस आश्रम में पहुँचकर परमधार्मिक राजर्षि वृषपर्वा को प्रणाम किया।
राजर्षि ने पुत्रों के समान उनका अभिनन्दन किया। और उनसे सत्कृत हो पाण्डवों ने वहाँ सात रात निवास किया। आठवें दिन उन्होंने जगत् प्रसिद्ध वृषपर्वाजी से आगे जाने की इच्छा प्रकट की। उनके पास जो सामान बच रहा था, वह उन्होंने उन्हीं को दे दिया तथा अपने यज्ञपात्र, रत्न और आभूषण भी उन्हीं के आश्रममें छोड़ दिये।
राजर्षि वृषपर्वा भूत और भविष्यत् के ज्ञाता तथा समस्त धर्मों के मर्मज्ञ थे। उन्होंने चलते समय पाण्डवों को पुत्रों की तरह उपदेश दिया। फिर उनकी आज्ञा लेकर वे उत्तर दिशा को चले।
वहाँ से सत्यपराक्रमी कुन्तीनन्दन युधिष्ठिर भाइयों के सहित पैदल ही चले। वह प्रान्त अनेक प्रकार के मृगों से पूर्ण था। रास्ते में पहाड़ों के ऊपर तरह-तरह के वृक्षों की कुंजों में निवास करते हुए उन्होंने चौथे दिन श्वेतपर्वत पर पदार्पण किया।
श्वेताचल एक बहुत बड़े बादल के समान सफेद-सफेद दिखायी देता था; इस पर जल की अधिकता थी तथा मणि, सुवर्ण और चाँदी की शिलाएँ थीं। मार्ग में धौम्य, द्रौपदी, पाण्डव और महर्षि लोमश साथ-साथ ही चलते थे। उनमें से कोई भी थकता नहीं था। इस प्रकार चलते-चलते वे माल्यवान् पर्वत पर पहुँच गये। उसके ऊपर चढ़कर उन्होंने किम्पुरुष, सिद्ध और चारणों से सेवित गन्धमादन के दर्शन किये।
उसे देखकर उन्हें हर्ष से रोमांच हो आया। क्रमशः उन वीरों ने मन और नेत्रों को आनन्दित करने वाले परम पवित्र गन्धमादन के वन में प्रवेश किया। उस समय महाराज युधिष्ठिर ने भीमसेन से प्रेमपूर्वक कहा–'अहो ! यह गन्धमादन का जंगल कैसा शोभा सम्पन्न है। इस मनोहर वन में बड़े दिव्य वृक्ष हैं तथा पत्र, पुष्प और फलों से सुशोभित तरह तरह की लताएँ हैं।
इधर, इस परम पवित्र देवनदी गंगा की ओर तो देखो। इसमें अनेकों कलहंस क्रीडा कर रहे हैं तथा इसके तटपर ऋषि और किन्नर लोग निवास करते हैं। हे कुन्तीनन्दन भीम ! तरह-तरह के धातु, नदी, किन्नर, मृग, पक्षी, गन्धर्व, अप्सरा, मनोरम वन, अनेकों आकारों के सर्प और सैकड़ों शिखरों से सुशोभित इस पर्वतराज की ओर जरा दृष्टिपात करो।'
वैशम्पायनजी कहते हैं–'जनमेजय ! इस प्रकार शूरवीर पाण्डव अपने लक्ष्य स्थान पर पहुँचकर मन में बड़े ही आनन्दित हुए। उस पर्वतराज को देखते-देखते उन्हें तृप्ति नहीं होती थी। फिर उन्होंने फल-फूल वाले वृक्षों से सुशोभित राजर्षि आर्ष्टिषेण का आश्रम देखा।
राजर्षि बड़े ही तपस्वी थे उनका शरीर अत्यन्त कृश था, शरीर की नसें दिखायी देने लगी थीं और वे समस्त धर्मों के पारगामी थे। पाण्डवों ने उनके पास जाकर यथायोग्य प्रणाम किया। धर्मज्ञ आर्ष्टिषेण ने दिव्य दृष्टि से पाण्डवों को पहचान लिया और उनसे बैठने के लिये कहा।
पाण्डवों के बैठ जाने पर महातपा आर्ष्टिषेण ने कौरवों में श्रेष्ठ धर्मराज युधिष्ठिर का सत्कार करके पूछा–'राजन् ! तुम्हारा मन कभी असत्य में तो नहीं जाता, तुम बराबर धर्म में स्थित रहते हो न ?
तुम्हारे माता-पिता की सेवा में तो कोई अन्तर नहीं आता ? अपने समस्त गुरुजन, वृद्ध पुरुष और विद्वानों का तो तुम सत्कार करते हो न ? पापकर्मों में तो कभी तुम्हारा मन नहीं जाता ? तुम उपकार का बदला चुकाना और अपकार को भूल जाना तो अच्छी तरह जानते हो न और उस ज्ञान का तुम्हें अभिमान तो नहीं होता ?
तुमसे यथायोग्य मान पाकर साधुजन प्रसन्न रहते हैं न ? वनों में रहते समय भी तुम धर्म का ही अनुवर्तन करते हो न ? तुम्हारे व्यवहार से धौम्यजी को तो कभी कष्ट नहीं होता ? दान, धर्म, तप, शौच, आर्जव और तितिक्षा का आचरण करते हुए तुम अपने बाप दादों के शील का अनुसरण करते हो न ? तुम राजर्षियों के द्वारा आचरित मार्ग से ही चलते हो न ?
जब अपने कुल में पुत्र या नाती का जन्म होता है तो पितृलोक में रहने वाले पितर हँसते भी हैं और शोक भी मनाते हैं; क्योंकि वे सोचते हैं कि पता नहीं हमें इसके कुकर्मों से दुःख ही भोगना पड़ेगा या इसके शुभ कर्मों से सुख मिलेगा। हे पार्थ! जो पुरुष माता, पिता, अग्नि, गुरु और आत्मा की पूजा करता है, वह इहलोक और परलोक दोनों ही को जीत लेता है।'
इस पर महाराज युधिष्ठिर ने कहा–'भगवन् ! आपने यह धर्म के यथार्थ स्वरूप का वर्णन किया है। मैं भी यथाशक्ति अपनी योग्यता के अनुसार इसका विधिवत् पालन करता हूँ।'
आर्ष्टिषेण ने कहा–'पूर्णिमा और प्रतिपदा की सन्धि में इस पर्वत पर केवल जल या पवन का ही सेवन करने वाले मुनिगण आकाशमार्ग से आते हैं। उस समय यहाँ भेरी, पणव, शंख और मृदंगों का शब्द भी सुनायी देता है। आप लोगों को यहीं बैठे-बैठे उसे सुनना चाहिये, वहाँ जाने का विचार बिलकुल नहीं करना चाहिये।
यहाँ से आगे तुम्हारे लिये जाना सम्भव भी नहीं है; क्योंकि अब आगे देवताओं की विहार भूमि है, उसमें मनुष्यों की गति नहीं हो सकती इस कैलास के शिखर को लाँघकर केवल परमसिद्ध और देवर्षिगण ही जा सकते हैं। यदि कोई मनुष्य चपलतावश जाने का प्रयत्न करता है तो उससे समस्त पर्वतीय जीव द्वेष करने लगते हैं और राक्षस लोग उसे लोहे की बछियों से मारते हैं।
पर्वसंधियों पर यहाँ नरवाहन कुबेरजी भी बड़े ठाट बाट से आते हैं। इस कैलास के शिखर पर ही देवता, दानव, सिद्धों और कुबेर का उद्यान है। इस प्रकार पर्वसन्धियों पर यहाँ सभी प्राणियों को ऐसी ही बहुत सी विचित्र बातें दिखायी दिया करती हैं। अतः जबतक अर्जुन आवें, तब तक तुम यहीं निवास करो।'
अतुलित तेजस्वी मुनिवर आर्ष्टिषेण की यह हितकर बात सुनकर पाण्डव लोग निरन्तर उन्हीं की आज्ञा के अनुसार बर्ताव करने लगे। वे हिमालय पर रहकर महर्षि लोमश से तरह-तरह के उपदेश सुनते रहते थे।
इस प्रकार वहाँ रहते हुए उनके वनवास का पाँचवाँ वर्ष बीत गया। घटोत्कच तो राक्षसों के साथ पहले ही चला गया था। जाती बार वह कह गया था कि आवश्यकता पड़ने पर मैं फिर उपस्थित हो जाऊँगा। उस आश्रम पर पाण्डव लोग कई मास तक रहे और उन्होंने अनेकों अद्भुत घटनाएँ देखीं।
एक दिन बहता हुआ वायु ही हिमालय के शिखर से सब प्रकार के सुन्दर और सुगन्धित पुष्प उड़ा लाया। बन्धु बान्धवों के सहित पाण्डवों ने और यशस्विनी द्रौपदी ने वहाँ वे पचरंगे पुष्प देखे।
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एक दिन भीमसेन उस पर्वत पर आनन्द से एकान्त में बैठे थे। उस समय द्रौपदी ने उनसे कहा–'महाबाहो ! यदि समस्त राक्षस आपके बाहुबल से पीड़ित होकर इस पर्वत को छोड़कर भाग जायँ तो कैसा रहे ?'
फिर तो आपके सुहृदों को इस पर्वत का विचित्र पुष्पावलि-मण्डित मंगलमय शिखर सब प्रकार के भय और मोह से रहित दिखायी देगा। भीमसेन ! मेरे मन में बहुत दिनों से यह बात आ रही है।'
द्रौपदी की बात सुनकर भीमसेन ने सुवर्ण की पीठ वाला धनुष, तलवार और तरकस उठा लिये और वे हाथ में गदा लेकर बेखट के गन्धमादन पर आगे बढ़ने लगे। यह देखकर द्रौपदी का उल्लास उत्तरोत्तर बढ़ने लगा। पवनपुत्र भीमसेन पर ग्लानि, भय, कायरता और मत्सरता का प्रभाव तो किसी समय भी नहीं होता था।
उस पर्वत की चोटी पर जाकर वे वहाँ से कुबेर के महल को देखने लगे। वह सुवर्ण और स्फटिक के भवनों से सुशोभित था। उसके चारों ओर सोने का परकोटा बना हुआ था। उसमें सब प्रकार के रत्न जगमगा रहे थे और तरह-तरह के उद्यान उसकी शोभा बढ़ा रहे थे।
इस प्रकार राक्षसराज कुबेर के रत्नजटित और पुष्पमाला-मण्डित प्रासाद को देखकर उन्होंने अपने शत्रुओं के रोंगटे खड़े कर देने वाला शंख बजाया तथा अपने धनुष की प्रत्यंचा और तालियों का भीषण शब्द करके सब जीवों को मोहित कर दिया।
उस शब्द से यक्ष, राक्षस और गन्धर्वों के रोंगटे खड़े हो गये और वे गदा, परिघ, तलवार, त्रिशूल, शक्ति और फरसा लेकर भीमसेन की ओर दौड़े। फिर तो उनके साथ भीमसेन का युद्ध होने लगा। भीमसेन ने अपने प्रबल वेग वाले भाले से उनके चलाये हुए त्रिशूल, शक्ति और फर से आदि सभी शस्त्रों को काट डाला।
उनके हाथों से छूटे हुए आयुधों से कटे हुए यक्ष और राक्षसों के शरीर और सिर सब ओर दिखायी देने लगे। इस प्रकार अंग-भंग होने से यक्ष लोग भीमसेन से बहुत डर गये, उनके हाथ से सारे अस्त्र-शस्त्र गिर गये और वे भयंकर चीत्कार करने लगे।
अन्त में प्रचण्ड धनुर्धर भीमसेन से डरकर वे अपने गदा, त्रिशूल, तलवार, शक्ति और फरसे आदि फेंककर दक्षिण दिशा को भागे। उधर कुबेर का मित्र मणिमान् नाम का एक राक्षस रहता था। उसने यक्ष-राक्षसों को भागते देखकर मुसकराकर कहा–'अरे! तुम अनेकों को अकेले आदमी ने परास्त कर दिया ! अब तुम कुबेर के पास जाकर क्या कहोगे ?'
उन सबसे ऐसा कहकर वह राक्षस शक्ति, त्रिशूल और गदा लेकर भीमसेन पर टूट पड़ा। भीमसेन ने भी मदस्रावी हाथी के समान उसे अपनी ओर आते देखकर अपने वत्सदन्त नामक तीन बाणों से उसकी पसलियों पर प्रहार किया। इससे मणिमान् अत्यन्त क्रोध में भर गया और उसने अपनी भारी गदा उठाकर भीमसेन के ऊपर छोड़ी।
परन्तु भीमसेन गदायुद्ध की चालों में खूब दक्ष थे, अतः उन्होंने उसके उस प्रहार को व्यर्थ कर दिया। इसी समय उस राक्षस ने सोने की मूठवाली एक फौलाद की शक्ति छोड़ी। वह भीषण शक्ति भीमसेन के दाहिने हाथ को घायल करके अग्नि की लपटें निकालती हुई पृथ्वी पर गिर गयी।
उस शक्ति के लगने से अतुलित पराक्रमी भीमसेन की आँखें क्रोध से घूमने लगीं और उन्होंने अपनी सुवर्ण के पत्र से मढ़ी हुई गदा उठा ली। वे आकाश में उछलकर उस गदा को घुमाते हुए उसकी ओर दौड़े और संग्रामभूमि में भयंकर गर्जना करते हुए उसे मणिमान् के ऊपर फेंका।
वह गदा वायु के समान बड़े वेग से उस राक्षस का संहार करके पृथ्वी पर गिर गयी। मणिमान् को मरकर पृथ्वी पर गिरते देख जो राक्षस मरने से बचे थे, वे भयंकर आर्तनाद करते पूर्व की ओर भाग गये।
इस समय पर्वत की गुफाओं को अनेक प्रकार के शब्दों से गूँजते देखकर अजातशत्रु युधिष्ठिर, नकुल, सहदेव, धौम्य, द्रौपदी, ब्राह्मण और सब सुहृद्गण भीमसेन को न देखकर उदास हो गये। फिर द्रौपदी को आर्ष्टिषेण मुनि को सौंपकर वे सब वीर अस्त्र-शस्त्र लेकर एक साथ पर्वत पर चढ़ने लगे।
पहाड़की चोटी पर पहुँचकर उन्होंने इधर-उधर दृष्टि डाली तो देखा कि एक ओर भीमसेन खड़े हैं और वहीं उनके मारे हुए अनेकों विशालकाय राक्षस पृथ्वी पर पड़े हैं।
भीमसेन को देखकर सब भाई उनसे गले मिले और फिर वहीं बैठ गये। महाराज युधिष्ठिर ने कुबेर के महल और मरे हुए राक्षसों की ओर देखकर भीमसेन से कहा–'भैया भीम ! तुमने यह पाप साहस या मोहवश ही किया है; तुम मुनियों का सा जीवन व्यतीत कर रहे हो, इस प्रकार व्यर्थ हत्या करना तुम्हें शोभा नहीं देता। देखो, यदि तुम मेरी प्रसन्नता करना चाहते हो तो फिर कभी ऐसा न करना।'
इधर भीमसेन के आक्रमण से बचे हुए कुछ राक्षस बड़ी तेजी से दौड़कर कुबेर के पास आये और चीख चीखकर उनसे कहने लगे–'यक्षराज ! आज संग्रामभूमि में एक अकेले मनुष्य ने क्रोधवश नाम के राक्षसों को मार डाला है। वे सब उसकी मार से निःसत्त्व और प्राणहीन हुए पड़े हैं। हम जैसे-तैसे उसके हाथ से बचकर आपके पास आये हैं। आपका सखा मणिमान् भी मारा जा चुका है। यह सब काण्ड एक मनुष्य ने ही कर डाला है। अब जो करना चाहें वह कीजिये।'
यह समाचार पाकर समस्त यक्ष और राक्षसों के स्वामी कुबेरजी बड़े ही कुपित हुए, उनकी आँखें लाल हो गयीं और वे बोले–'यह सब कैसे हुआ ?'
फिर यह दूसरा अपराध भी भीमसेन का ही सुनकर उन्हें बड़ा क्रोध हुआ और उन्होंने आज्ञा दी कि हमारा पर्वतशिखर के समान ऊँचा रथ सजा लाओ। रथ तैयार हो जाने पर राजराजेश्वर महाराज कुबेर उस पर चढ़कर चले। जब वे गन्धमादन पर पहुँचे तो यक्ष-राक्षसों से घिरे हुए प्रियदर्शन कुबेरजी को देखकर पाण्डवों को रोमांच हो आया।
तथा महाराज पाण्डु के धनुष-बाणधारी महारथी पुत्रों को देखकर कुबेरजी भी बड़े प्रसन्न हुए। वे उनसे देवताओं का एक कार्य कराना चाहते थे, इसलिये उन्हें देखकर वे हृदय में सन्तुष्ट ही हुए।
कुबेरजी के जो सेवक पीछे रह गये थे, वे पक्षियों के समान सीधे ही उस पर्वत पर पहुँच गये तथा यक्षराज को पाण्डवों पर प्रसन्न देखकर उनका मनमुटाव भी दूर हो गया।
धर्म के रहस्य को जानने वाले युधिष्ठिर, नकुल और सहदेव ने कुबेर को प्रणाम किया और अपने को उनका अपराधी-सा माना। अतः वे सब यक्षराज को घेरकर हाथ जोड़कर खड़े हो गये। इस समय भीमसेन के हाथ में पाश, खड्ग और धनुष सुशोभित थे और वे कुबेर की ओर देख रहे थे।
उन्हें देखकर नरवाहन कुबेरजी ने धर्मराज से कहा–'पार्थ! आप समस्त प्राणियों का हित करने में तत्पर रहते हैं–यह बात सब जीव जानते हैं। इसलिये आप भाइयों के सहित बेखट के इस पर्वत पर रहिये।
देखिये, भीमसेन के ऊपर आप क्रोध न करें; क्योंकि राक्षस तो अपने काल से ही मरे हैं, आपका भाई तो उसमें निमित्तमात्र है। राजन् ! एक बार कुशस्थली नाम के स्थान में देवताओं की एक मन्त्रणा हुई थी उसमें मुझे भी बुलाया गया था तब मैं तरह-तरह के अस्त्र-शस्त्रों से सुसज्जित अत्यन्त भयंकर तीन सौ महापद्म यक्षों के साथ वहाँ गया था।
मार्ग में मुझे मुनिवर अगस्त्यजी मिले। वे यमुनाजी के तट पर बड़ी कठोर तपस्या कर रहे थे। उस समय मेरा मित्र राक्षसराज मणिमान् भी मेरे साथ ही था। उसने मूर्खता, अज्ञान, गर्व और मोह के अधीन होकर ऊपर से उन महर्षि के ऊपर थूक दिया।
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तब मुनिवर ने कोप करके मुझसे कहा–'कुबेर ! देखो, तुम्हारे इस सखा ने मुझे कुछ न समझकर मेरा तिरस्कार किया है; इसलिये यह अपनी सेना के सहित केवल एक ही मनुष्य के हाथ से मारा जायगा। तुम्हें भी अपने इन सेनानियों के कारण दुःखी होना पड़ेगा और फिर उस मनुष्य का दर्शन करने पर ही तुम्हारा वह दुःख दूर होगा।'
इस प्रकार महर्षियों में श्रेष्ठ अगस्त्यजी ने मुझे यह शाप दिया था। उस शाप से आज आपके भाई ने मुझे मुक्त किया है। राजन् ! लौकिक व्यवहार में धैर्य, कुशलता, देश, काल और पराक्रम–इन पाँच साधनों की बड़ी आवश्यकता है।
सत्ययुग में लोग धैर्यवान्, अपने-अपने कर्म में कुशल और पराक्रमी होते थे। जो क्षत्रिय धैर्यवान्, देश काल का ज्ञान रखने वाला और सब प्रकार की धर्मविधि में निपुण होता है, वह बहुत समय तक पृथ्वी का शासन करता है जो पुरुष समस्त कर्मों में इस प्रकार बर्तता है, वह संसार में यश प्राप्त करता है और मरने पर सद्गति पाता है।
किन्तु जो क्रोध के आवेश में अपने पतन पर दृष्टि नहीं डालता और जिसके मन-बुद्धि पाप में ही रच-पच रहे हैं, वह तो केवल पाप का ही अनुसरण करता है। तथा कर्मों का विभाग न जानने के कारण वह इस लोक और परलोक में नाश को ही प्राप्त होता है।
यह भीमसेन भी धर्म को नहीं जानता, गर्वीला है; इसकी बुद्धि बालकों के समान है, सहन करना तो यह जानता ही नहीं और इसे किसी प्रकार का भय भी नहीं है। इसलिये आप फिर राजर्षि आष्र्ष्टिषेण के आश्रम में जाकर इसे समझाइये। यह कृष्ण पक्ष आप उसी आश्रम में व्यतीत कीजिये।
मेरी आज्ञा से अलकापुरी में रहने वाले समस्त यक्ष, गन्धर्व, किन्नर और पर्वतवासी आपकी देख-भाल रखेंगे। भीमसेन साहस करके यहाँ आ गया है, सो आप समझाकर इसे ऐसा करने से रोक दीजिये।
इससे छोटा आपका भाई अर्जुन तो व्यवहार विषय में निपुण है और सब प्रकार की धर्म-मर्यादा को भी जानता है। इसी से लोक में जितनी भी स्वर्गीय विभूतियाँ हैं, वे सब उसे प्राप्त हैं। उनके सिवा उसमें दम, दान, बल, बुद्धि, लज्जा, धैर्य और तेज–ये सब गुण भी हैं ही।'
कुबेर के ये वचन सुनकर पाण्डव बड़े प्रसन्न हुए। भीमसेन ने भी शक्ति, गदा, खड्ग और धनुष को पीठपर बाँधकर उन्हें प्रणाम किया। शरणागत वत्सल कुबेरजी ने भीमसेन से कहा–'तुम शत्रुओं का मान भंग करने वाले और सुहृदों के सुख की वृद्धि करने वाले होओ।'
फिर धर्मराज से बोले–'अब अर्जुन अस्त्रविद्या में निपुण हो गया है, देवराज इन्द्र ने भी उसे घर जाने की आज्ञा दे दी है; इसलिये अब वह शीघ्र ही यहाँ आवेगा।'
इस प्रकार उत्तम कर्म करने वाले धर्मराज युधिष्ठिर को उपदेश कर वे अपने स्थान को चले गये। भीमसेन के हाथ से जो राक्षस मारे गये थे, उनके शव कुबेरजी की आज्ञा से पहाड़ के नीचे लुढ़का दिये गये।
इस प्रकार युद्ध में मारे जाने से उन्हें मतिमान् अगस्त्यजी का जो शाप था, उसका भी अन्त हो गया। पाण्डवों ने वह रात बड़े आनन्द से कुबेरजी के महलों में ही बितायी।
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वैशम्पायनजी कहते हैं–'शत्रुदमन जनमेजय ! सूर्योदय होने पर मुनिवर धौम्य अपने आह्निक कर्म से निवृत्त हो राजर्षि आर्ष्टिषेण के साथ पाण्डवों की ओर चले। पाण्डवों ने उन दोनों के चरणों में प्रणाम किया और फिर हाथ जोड़कर अन्य सब ब्राह्मणों का भी अभिवादन किया।
फिर धौम्य ने धर्मराज का हाथ पकड़कर पूर्व दिशा की ओर संकेत करते हुए कहा–'महाराज ! यह जो समुद्र पर्यन्त पृथ्वी पर फैला हुआ महापर्वत दिखायी दे रहा है, इसका नाम मन्दराचल है। देखिये, इसकी कैसी शोभा हो रही है ! अहा ! पर्वतमाला और हरी-भरी वनावली से यह दिशा कैसी रमणीय जान पड़ती है।
यह दिशा इन्द्र और कुबेर का निवास स्थान कही जाती है। सर्वधर्मज्ञ, मुनिजन, प्रजाजन, सिद्ध, साध्य और देवता लोग इसी दिशा में उदित होते हुए सूर्य का पूजन करते हैं। समस्त प्राणियों के प्रभु परमधर्मज्ञ यमराज इस दक्षिण दिशा में रहते हैं, जो मरने वाले प्राणियों का गन्तव्य स्थान है।
यह पवित्र और अद्भुत दिखायी देने वाली संयमनीपुरी है। यही प्रेतराज यम का निवास स्थान है। इसका ऐश्वर्य भी बहुत बढ़ा चढ़ा है। इधर, पश्चिम की ओर जो पर्वत दिखायी देता है उसे अस्ताचल कहते हैं। महाराज वरुण इस पर्वत और महासमुद्र में रहकर प्राणियों की रक्षा करते हैं।
यह सामने उत्तर दिशा को आलोकित करता हुआ परम प्रतापी मेरुपर्वत खड़ा हुआ है। इस पर केवल ब्रह्मवेत्ता ही जा सकते हैं। इसी के ऊपर ब्रह्माजी की सभा है और इसी पर वे स्थावर-जंगम की रचना करते हुए निवास करते हैं। इसी पर्वत के ऊपर वसिष्ठादि सप्तर्षियों के उदय-अस्त होते रहते हैं।
तुम तनिक मेरुपर्वत के इस पवित्र शिखर के दर्शन करो। अनादि-निधन श्रीनारायण का स्थान इससे भी परे चमक रहा है। वह सर्वतेजोमय और परम पवित्र है, देवता भी उसका दर्शन नहीं कर सकते। अग्नि और सूर्य उस स्थान को प्रकाशित नहीं कर सकते, वह तो स्वयं अपने प्रकाश से ही प्रकाशित है। उसका दर्शन देवता और दानवों को भी दुर्लभ है।
उस स्थान पर अचिन्त्यमूर्ति श्रीहरि विराजते हैं। जो महान् तपस्वी और शुभकर्मों से पवित्रचित्त हो गये हैं, वे अज्ञान और मोह से रहित योगसिद्ध महात्मा यतिजन ही भक्ति के द्वारा उनके पास जा सकते हैं। वहाँ जाकर वे फिर इस लोक में नहीं आते।
राजन् ! यह परमेश्वर का स्थान ध्रुव, अक्षय और अविनाशी है; तुम इसे प्रणाम करो। देखो! सूर्य, चन्द्रमा और समस्त तारागण अपनी-अपनी मर्यादा में रहकर सर्वदा इस पर्वतराज मेरु की ही प्रदक्षिणा किया करते हैं। इसकी परिक्रमा करते हुए ही नक्षत्रों के सहित चन्द्रमा पर्वसन्धियों का समय आने पर महीनों का विभाग करते हैं तथा महातेजस्वी सूर्य वर्षा, वायु और तापरूप सुख के साधनों से प्राणियों का पोषण करते हैं।
हे भारत ! भगवान् सूर्य ही समस्त जीवों की आयु और कर्मोंका विभाग करके दिन, रात, कला, काष्ठा आदि कालके अवयवोंकी रचना करते हैं।'
वैशम्पायनजी कहते हैं–'राजन् ! फिर उत्तम व्रतों का पालन करने वाले पाण्डव लोग उस पर्वत पर ही निवास करने लगे।
अर्जुन अस्त्रविद्या सीखने के लिये इन्द्र के पास गये थे। वे पाँच वर्ष तक इन्द्र के भवन में रहे और उन्होंने देवराज से अग्नि, वरुण, चन्द्रमा, वायु, विष्णु, इन्द्र, पशुपति, परमेष्ठी ब्रह्मा, प्रजापति यम, धाता, सविता, त्वष्टा और कुबेर आदि देवताओं के अस्त्र प्राप्त किये। फिर इन्द्र ने उन्हें घर जाने की आज्ञा दे दी। तब वे उन्हें प्रणाम कर बड़ी खुशी-खुशी गन्धमादन पर्वत पर लौट गये।
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– साभार: गीताप्रेस (गोरखपुर)
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः
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