Radhe Krishna

Radhe Krishna Spread The Love Hare Krishna :)

31/07/2019

(((( बिना प्रेम रीझे नहीं नटवर ))))
एक बार की बात है कि यशोदा मैया प्रभु श्री कृष्ण के उलाहनों से तंग आ गयीं और छड़ी लेकर श्री कृष्ण की ओर दौड़ी।
जब प्रभु ने अपनी मैया को क्रोध में देखा तो वह अपना बचाव करने के लिबए भागने लगे।
भागते-भागते श्री कृष्ण एक कुम्हार के पास पहुँचे। कुम्हार तो अपने मिट्टी के घड़े बनाने में व्यस्त था।
लेकिन जैसे ही कुम्हार ने श्री कृष्ण को देखा तो वह बहुत प्रसन्न हुआ।
कुम्हार जानता था कि श्री कृष्ण साक्षात् परमेश्वर हैं।
तब प्रभु ने कुम्हार से कहा कि, कुम्हार जी, आज मेरी मैया मुझ पर बहुत क्रोधित है।
मैया छड़ी लेकर मेरे पीछे आ रही है। भैया, मुझे कहीं छुपा लो।
तब कुम्हार ने श्री कृष्ण को एक बडे से मटके के नीचे छिपा दिया।
कुछ ही क्षणों में मैया यशोदा भी वहाँ आ गयीं और कुम्हार से पूछने लगी, क्यूँ रे, कुम्हार ! तूने मेरे कन्हैया को कहीं देखा है, क्या ?
कुम्हार ने कह दिया, नहीं, मैया ! मैंने कन्हैया को नहीं देखा।
श्री कृष्ण ये सब बातें बड़े से घड़े के नीचे छुपकर सुन रहे थे। मैया तो वहाँ से चली गयीं।
अब प्रभु श्री कृष्ण कुम्हार से कहते हैं, कुम्हार जी, यदि मैया चली गयी हो तो मुझे इस घड़े से बाहर निकालो।
कुम्हार बोला, ऐसे नहीं, प्रभु जी ! पहले मुझे चौरासी लाख यानियों के बन्धन से मुक्त करने का वचन दो।
भगवान् मुस्कुराये और कहा, ठीक है, मैं तुम्हें चौरासी लाख योनियों से मुक्त करने का वचन देता हूँ। अब तो मुझे बाहर निकाल दो।
कुम्हार कहने लगा, मुझे अकेले नहीं, प्रभु जी ! मेरे परिवार के सभी लोगों को भी चौरासी लाख योनियों के बन्धन से मुक्त करने का वचन दोगे तो मैं आपको इस घड़े से बाहर निकालूँगा।
प्रभु जी कहते हैं, चलो ठीक है, उनको भी चौरासी लाख योनियों के बन्धन से मुक्त होने का मैं वचन देता हूँ। अब तो मुझे घड़े से बाहर निकाल दो।
अब कुम्हार कहता है, बस, प्रभु जी ! एक विनती और है। उसे भी पूरा करने का वचन दे दो तो मैं आपको घड़े से बाहर निकाल दूँगा।
भगवान् बोले, वो भी बता दे, क्या कहना चाहते हो ?
कुम्भार कहने लगा, प्रभु जी ! जिस घड़े के नीचे आप छुपे हो, उसकी मिट्टी मेरे बैलों के ऊपर लाद के लायी गयी है।
मेरे इन बैलों को भी चौरासी के बन्धन से मुक्त करने का वचन दो।
भगवान् ने कुम्हार के प्रेम पर प्रसन्न होकर उन बैलों को भी चौरासी के बन्धन से मुक्त होने का वचन दिया।
प्रभु बोले, अब तो तुम्हारी सब इच्छा पूरी हो गयी, अब तो मुझे घड़े से बाहर निकाल दो।
तब कुम्हार कहता है, अभी नहीं, भगवन् ! बस, एक अन्तिम इच्छा और है। उसे भी पूरा कर दीजिये..
और वो ये है, जो भी प्राणी हम दोनों के बीच के इस संवाद को सुनेगा, उसे भी आप चौरासी लाख योनियों के बन्धन से मुक्त करोगे।
बस, यह वचन दे दो तो मैं आपको इस घड़े से बाहर निकाल दूँगा।
कुम्हार की प्रेम भरी बातों को सुन कर प्रभु श्री कृष्ण बहुत खुश हुए और कुम्हार की इस इच्छा को भी पूरा करने का वचन दिया।
फिर कुम्हार ने बाल श्री कृष्ण को घड़े से बाहर निकाल दिया।
उनके चरणों में साष्टांग प्रणाम किया। प्रभु जी के चरण धोये और चरणामृत पीया।
अपनी पूरी झोंपड़ी में चरणामृत का छिड़काव किया और प्रभु जी के गले लगकर इतना रोये क़ि प्रभु में ही विलीन हो गये।
जरा सोच करके देखिये, जो बाल श्री कृष्ण सात कोस लम्बे-चौड़े गोवर्धन पर्वत को अपनी इक्क्नी अंगुली पर उठा सकते हैं, तो क्या वो एक घड़ा नहीं उठा सकते थे ।
लेकिन बिना प्रेम रीझे नहीं नटवर नन्द किशोर। कोई कितने भी यज्ञ करे, अनुष्ठान करे, कितना भी दान करे, चाहे कितनी भी भक्ति करे,
लेकिन जब तक आपके दिल मे प्राणी के लिए दुख दर्द नही है तो प्रभु श्री कन्हा जी की भक्ति व उनका दर्शन नही हो सकता।
Bhakti Kathayen भक्ति कथायें..
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((((((( जय जय श्री राधे )))))))
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(((( भगवान् का भरोसा ))))एक आदमी ने दुकानदार से पूछा, केले और सेब फल क्या भाव लगाऐ हैं ? केले 50 रु.दर्जन और सेब 80 रु. ...
16/07/2019

(((( भगवान् का भरोसा ))))
एक आदमी ने दुकानदार से पूछा, केले और सेब फल क्या भाव लगाऐ हैं ?
केले 50 रु.दर्जन और सेब 80 रु. किलो।
उसी समय एक गरीब सी औरत दुकान में आयी और बोली मुझे एक किलो सेब और एक दर्जन केले चाहिये..
क्या भाव है भैया ?
दुकानदार: केले 5 रु दर्जन और सेब 25 रु किलो। औरत ने कहा जल्दी से दे दीजिये।
दुकान में पहले से मौजूद ग्राहक ने खा जाने वाली निगाहों से घूरकर दुकानदार को देखा।
इससे पहले कि वो कुछ कहता - दुकानदार ने ग्राहक को इशारा करते हुये थोड़ा सा इंतजार करने को कहा।
औरत खुशी खुशी खरीदारी करके दुकान से निकलते हुये बड़बड़ाई..
हे भगवान तेरा लाख- लाख शुक्र है, मेरे बच्चे फलों को खाकर बहुत खुश होंगे।
औरत के जाने के बाद दुकानदार ने पहले से मौजूद ग्राहक की तरफ देखते हुये कहा...
ईश्वर गवाह है भाई साहब ! मैंने आपको कोई धोखा देने की कोशिश नहीं की..
यह विधवा महिला है जो चार अनाथ बच्चों की मां है। किसी से भी किसी तरह की मदद लेने को तैयार नहीं है।
मैंने कई बार कोशिश की है और हर बार नाकामी मिली है। तब मुझे यही तरीकीब सूझी है कि जब कभी ये आए तो मै उसे कम से कम दाम लगाकर चीज़े दे दूँ।
मैं यह चाहता हूँ कि उसका भरम बना रहे और उसे लगे कि वह किसी की मोहताज नहीं है।
मैं इस तरह भगवान् के बन्दों की पूजा कर लेता हूँ ।
थोड़ा रूक कर दुकानदार बोला.. यह औरत हफ्ते में एक बार आती है।
भगवान् गवाह है जिस दिन यह आ जाती है उस दिन मेरी बिक्री बढ़ जाती है और उस दिन परमात्मा मुझ पर मेहरबान हो जाता है।
ग्राहक की आंखों में आंसू आ गए, उसने आगे बढकर दुकानदार को गले लगा लिया और बिना किसी शिकायत के अपना सौदा खरीदकर खुशी खुशी चला गया।
खुशी अगर बांटना चाहो तो तरीका भी मिल जाता है l
बस एक कोशिश कीजिये और अपने आसपास ऐसे ज़रूरतमंद यतीमों, बेसहाराओ को ढूंढिये और उनकी मदद किजिए...
मंदिर मे सीमेंट या अन्न की बोरी देने से पहले अपने आस - पास किसी गरीब को देख लेना शायद उसको आटे की बोरी की ज्यादा जरुरत हो।
आपको पसंद आऐ तो सब काम छोड के ये मेसेज कम से कम एक या दो दोस्तों को जरुर शेयर जरूर करे ?
किसी गुरुप मे ऐसा देवता ईन्सान मिल जाऐ। कहीं ऐसे बच्चो को अपना भगवान् मिल जाए ।
कुछ समय के लिए एक गरीब बेसहारा की आँख मे आँख डालकर देखे, आपको क्या महसूस होता है ?
स्वयं में व समाज में बदलाव लाने के प्रयास जारी रखें ।
Bhakti Kathayen भक्ति कथायें..
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((((((( जय जय श्री राधे )))))))
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(((( विट्ठल विट्ठल विट्ठला ))))सुंदर नगर के राजा और रानी जो कि बहुत ही ठाकुर जी और किशोरी भक्त होते हैं।उनके घर एक बहुत ...
20/06/2019

(((( विट्ठल विट्ठल विट्ठला ))))
सुंदर नगर के राजा और रानी जो कि बहुत ही ठाकुर जी और किशोरी भक्त होते हैं।
उनके घर एक बहुत ही सुंदर गौर वर्ण वाली बेटी का जन्म होता है।
राजा और रानी बेटी को किशोरी जी का प्रसाद मानकर बड़े लाड प्यार से बड़ा करते हैं।
जब बेटी 2 साल की हो जाती है तो राजा अपने महल के पास बने बड़े मंदिर में एक भव्य आयोजन करते हैं।
दूर-दूर से बहुत से साधु महात्मा लोगों को अपनी बेटी को आशीर्वाद देने के लिए बुलाया जाता है।
बड़ी धूमधाम से आयोजन संपन्न होता है, सभी को बड़ी श्रद्धा से ठाकुर जी का प्रसाद खिलाया जाता है।
राजा रानी सब महात्मा लोगों का आशीर्वाद ले रहे होते हैं। तभी उनकी बेटी जो कि 2 साल की है एक महात्मा जी के पीछे पीछे चल पड़ती है।
महात्मा को नहीं पता होता कि लड़की उनके पीछे पीछे आ रही है, जब महात्मा जंगल के पास पहुंचते हैं तो उनका ध्यान पीछे पड़ता है,
पीछे किसी छोटी लड़की को देखकर वह हैरान हो जाते हैं। वह उसको पूछते तुम कौन हो ?
छोटी बच्ची क्या बोले वह राजकुमारी को नहीं जानते थे। क्योंकि मंदिर में बहुत भीड़ होने के कारण हर एक को राजकुमारी के दर्शन नहीं होते।
महात्मा हैरान होकर इधर-उधर देखते है वहां आसपास कोई नहीं होता वह थोड़ी आगे जाकर कुछ लोगों से पूछते है।
कोई भी उस लड़की के बारे में नहीं जानता, महात्मा अकेला जंगल में उस लड़की को छोड़ना भी उचित नहीं समझते।
लड़की एकदम से महात्मा की उंगली पकड़ लेती है, महात्मा पांडू नगर ले जाते हैं जहां से आए होते हैं
वह पांडू नगर में विट्ठल भगवान के मंदिर के पास के कुटिया बनाकर रहते हैं। और विट्ठल भगवान के बहुत बड़े भक्त होते हैं।
उधर राजकुमारी के गुम हो जाने से राजा रानी का रो रो कर बुरा हाल हो जाता है।
रानी को बेटी के वियोग में बार-बार मूर्छित हो जाती हैं। वह किशोरी जी और ठाकुर जी के आगे बहुत प्रार्थना करती है कि उनकी बेटी हमें वापस मिला दो।
बेटी के गुम होने से उसके वियोग में रानी बहुत बीमार रहने लग पड़ती है।
एक दिन वह किशोरी जू के बरसाना धाम में जाती है अपने आंसुओं से किशोरी जी की सीढ़ियों को धोते हुए उसके दरबार पहुँचती है।
और वहां किशोरी जू के सामने बड़ी दयामई दृष्टि से आंखों में आंसू की धारा बहाती हुई अपनी बेटी को वापस पाने के लिए किशोरी जी से प्रार्थना करती है और कहती है..
कर दो शमा किशोरी अपराध मेरे सारे बड़ी आस ले के आई दरबार में तुम्हारे..
वह बस यही गुणगान करती हुई और आंसू से किशोरी जी की चौखट को गीला करती रहती हैं।
लेकिन उसकी बेटी का तो कहीं और पालन-पोषण उसके भाग्य में लिखा था।
परंतु कुछ महीनों बाद किशोरी जी और ठाकुर जी की कृपा से रानी के घर एक सुंदर राजकुमार पैदा होता है।
बेटे के आने से रानी का ध्यान इधर उधर हो जाता है। परंतु बेटी को वह भूल नहीं पाती।
उसका गम तो घुन की तरह उसके शरीर को लग जाता है।
उधर राजकुमारी महात्मा के साथ रहकर हर रोज विट्ठल भगवान् के मंदिर जाती हैं।
अब तो विट्ठल भगवान् की शरण में ही रहती है। और वह विट्ठल भगवान् का गुणगान करती हैं।
उसके भजन और गुणगान को सुनने के लिए दूर-दूर से लोग आते हैं।
राजकुमार जो कि अब काफी बड़ा हो जाता है अपनी बीमार मां को और राजकुमारी का वियोग देख कर बहुत दुखी रहता है।
वह हर रोज ठाकुर जी और किशोरी जी के आगे अपनी मां को ठीक करने की प्रार्थना करता है।
एक दिन वह सुंदर नगर से पांडु नगर किसी काम से जाता है वहां पर शाम को अपने रथ पर सवार होकर मंदिर के आगे से गुजरता है।
वहां उसको बड़ी ही सुरीली आवाज में कोई गुणगान करता सुनाई देता है
विट्ठल विठ्ठल विटठला
माझा विट्ठल विट्ठला
वह इतना आकर्षित होता है, सोचता है कि कौन कितना सुंदर गायन कर रहा है और यह किस देवता का भजन है।
यही सोचते सोचते रथ से उतरकर मंदिर की तरफ जाता है।
परंतु तब तक गायन समाप्त हो जाता है। और जो गायन गाने वाली थी वह भी चली जाती है।
राजकुमार लोगों से पूछता है कि यह कौन गा रहा था..
लोग कहते हैं कि विट्ठल भगवान् की एक दासी है जो हर रोज विट्ठल भगवान् का बड़ी श्रद्धा से गुणगान करती है।
राजकुमार वह गायन सुनने के लिए इतना बेचैन हो जाता है कि वह पांडू नगर में ही रुक जाता है।
सुबह जब वह फिर उस मंदिर में जाता है तो फिर वही मधुर गान..
विट्ठल विट्ठल विट्ठला
माझा विट्ठला विट्ठला
का गुणगान हो रहा होता है। राजकुमार वहां जाकर देवी के चरणों में गिर पड़ता है और कहता है कि देवी तुम किसका गायन कर रही हो।
वह लड़की देखती है कि उसके पैरों में कोई राजकुमार सा बांका नौजवान पढ़ा हुआ है
उसको कहती है कि उठो यह विट्ठल भगवान् है, यहां जो भी एक बार आता है तो उसको खाली हाथ नहीं भेजते वह सबकी झोलियां भरते हैं।
राजकुमार कहता है कि क्या सच में ? क्या यह मेरी भी इच्छा पूरी करेंगे ?
वह लड़की कहती है क्यों नहीं एक बार मांग के तो देखो।
वह राजकुमार जब सामने देखता है तो एक सावंले रंग के बाँके नौजवान कमर पर हाथ रखकर मंद मंद मुस्कुरा रहे होते हैं।
राजकुमार उनके पैरों में गिर कर प्रार्थना करता है कि, हे विट्ठल भगवान् मेरी मां की बीमारी को ठीक कर दो, और मेरी खोई हुई बहन को मिला दो।
तभी विट्ठल भगवान् के गले से माला गिरकर राजकुमार के गले में पड़ जाती है..
वह लड़की राजकुमार को कहती है कि तुम्हारे पर तो विट्ठल भगवान् की कृपा हो गई जो माला परसादी तुम्हें मिल गई।
राजकुमार प्रसन्न मन से विट्ठल भगवान् को प्रणाम करके सुंदर नगर वापस चला जाता है।
वहां जाकर उसको विट्ठल भगवान् के नाम की ऐसी लगन लगती है कि सारा दिन विट्ठल भगवान् का गुणगान करता रहता है।
राजा राजकुमार से पूछता है कि यह किसका गुणगान कर रहे हो। राजकुमार उनको सारी बात बताता है।
एक दिन राजा फिर सुंदर नगर के मंदिर में एक भव्य आयोजन करता है और दूर-दूर से साधु महात्मा लोगों को बुलाता है।
राजकुमार राजा से कहता है कि क्या मैं पांडू नगर में रहने वाली उस देवी को भी बुला लूं।
राजा कहता है क्यों नहीं.. राजकुमार मंत्री के हाथों लड़की को आने का न्योता देते हैं।
वह लड़की आने के लिए मान जाती हैं।
तभी उस लड़की को महात्मा कहते हैं की बेटी तुम अकेले ना जाओ मैं तुम्हारे साथ चलूंगा मैं काफी साल पहले वहां गया हूं
महात्मा और लड़की वहां जाकर मंदिर में विट्ठल भगवान का गुणगान करते हैं।
सभी आए हुए लोग आनंद के साथ झूमते गाते हैं.. राजा रानी और राजकुमार भी खूब विट्ठल नाम का आनंद लेते हैं।
सभी लोग उस लड़की के रूप की तथा उसकी सुरीली आवाज की बहुत तारीफ करते हैं।
जब गायन संपन्न हो जाता है तो राजा महात्मा जी के पास आकर कहता है कि आपकी बेटी का स्वरूप पूर्ण रूप से किशोरी मयी है।
और आवाज में सरस्वती का निवास है।
महात्मा हाथ जोड़कर बड़ी विनम्रता से कहते हैं कि हे राजन, यह मेरी बेटी नहीं है..
काफी साल पहले जब एक बार इसी मंदिर में एक अयोजन था तब मैं पांडू नगर से यहां आया था..
तभी करीब 2 साल की एक लड़की मेरे पीछे पीछे आ गई इसके बारे में पता किया उसके माता-पिता का पता ना चला।
विट्ठल भगवान् की यही इच्छा थी, तभी से यह विट्ठल भगवान् की शरण में है।
यह बात सुनकर राजा और राजकुमार एकदम से हैरान हो जाते हैं और राजा कहता है कि यह तो हमारी खोई हुई राजकुमारी है।
रानी अपनी बेटी को पाकर बहुत प्रसन्न होती है, विट्ठल भगवान् की कृपा से जो कि ठाकुर जी का ही दूसरा रूप है सब मिल जाते हैं।
और वह सब मिलकर कर विट्ठल भगवान् की जय जयकार करते हैं।
बोलो विट्ठल भगवान की जय हो
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((((((( जय जय श्री राधे )))))))
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(((( अपने कन्हैया पर विश्वास ))))ऋषिकेश में गंगा जी के किनारे एक संत रहा करते, वह जन्मांध थे..और उनका नित्य का एक नियम थ...
24/04/2019

(((( अपने कन्हैया पर विश्वास ))))
ऋषिकेश में गंगा जी के किनारे एक संत रहा करते, वह जन्मांध थे..
और उनका नित्य का एक नियम था कि वह शाम के समय ऊपर गगन चुंबी पहाड़ों में भृमण करने के लिये निकल जाते और हरी नाम का संकीर्तन करते जाते।
एक दिन उनके एक शिष्य ने उनसे पूछा..
बाबा आप हर रोज इतने ऊंचे ऊंचे पहाड़ों पर भृमण हेतु जाते हैं..
वहां बहुत गहरी गहरी खाइयां भी हैं, और आपको आंखों से दिखलाई नहीं देता।
क्या आपको डर नहीं लगता ? अगर कभी पांव लड़खड़ा गये तो ?
बाबा ने कुछ नहीं कहा और शाम के समय शिष्य को साथ ले चले।
पहाड़ों के मध्य थे तो बाबा ने शिष्य से कहा, जैसे ही कोई गहरी खाई आये तो बताना।
दोनों चलते रहे और जैसे ही गहरी खाई आयी, शिष्य ने बताया कि बाबा गहरी खाई आ चुकी है।
बाबा ने कहा, मुझे इसमें धक्का दे दे।
अब तो शिष्य इतना सुनते ही सकपका गया।
उसने कहा बाबा मैं आपको धक्का कैसे दे सकता हूँ। मैं ऐसा हरगिज नहीं कर सकता।
आप तो मेरे गुरुदेव हैं, मैं तो किसी अपने शत्रु को भी इस खाई में नहीं धकेल सकता।
बाबा ने फिर कहा मैं कहता हूं कि मुझे इस खाई में धक्का दे दो।
यह मेरी आज्ञा है और मेरी आज्ञा की अवहेलना करोगे तो नर्क गामी होगे।
शिष्य ने कहा, बाबा मैं नर्क भोग लूंगा मगर आपको हरगिज इस खाई में नहीं धकेल सकता।
तब बाबा ने शिष्य से कहा, रे नादान बालक.. जब तुझ जैसा एक साधारण प्राणी मुझे खाई में नहीं धकेल सकता तो बता मेरा मालिक, मेरा 'कन्हैया' भला कैसे मुझे खाई में गिरने देगा।
उसे तो सिर्फ गिरे हुओं को उबारना आता है गिरे हुओं को उठाना आता है, वह कभी भी किसी को गिरने नहीं देता।
वह पल पल हमारे साथ है, बस हमें विश्वास रखना होगा उस पर।
Bhakti Kathayen भक्ति कथायें..
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((((((( जय जय श्री राधे )))))))
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(((( दया और सौम्यता ))))एक नगर में एक जुलाहा रहता था। वह स्वाभाव से अत्यंत शांत, नम्र तथा वफादार था। उसे क्रोध तो कभी आत...
10/04/2019

(((( दया और सौम्यता ))))
एक नगर में एक जुलाहा रहता था। वह स्वाभाव से अत्यंत शांत, नम्र तथा वफादार था। उसे क्रोध तो कभी आता ही नहीं था।
एक बार कुछ लड़कों को शरारत सूझी। वे सब उस जुलाहे के पास यह सोचकर पहुँचे कि देखें इसे गुस्सा कैसे नहीं आता ?
उन में एक लड़का धनवान माता-पिता का पुत्र था। वहाँ पहुँचकर वह बोला यह साड़ी कितने की दोगे ?
जुलाहे ने कहा - दस रुपये की।
तब लडके ने उसे चिढ़ाने के उद्देश्य से साड़ी के दो टुकड़े कर दिये...
और एक टुकड़ा हाथ में लेकर बोला - मुझे पूरी साड़ी नहीं चाहिए, आधी चाहिए। इसका क्या दाम लोगे ?
जुलाहे ने बड़ी शान्ति से कहा पाँच रुपये।
लडके ने उस टुकड़े के भी दो भाग किये और दाम पूछा ?
जुलाहे अब भी शांत था। उसने बताया - ढाई रुपये।
लड़का इसी प्रकार साड़ी के टुकड़े करता गया। अंत में बोला - अब मुझे यह साड़ी नहीं चाहिए। यह टुकड़े मेरे किस काम के ?
जुलाहे ने शांत भाव से कहा, बेटे ! अब यह टुकड़े तुम्हारे ही क्या, किसी के भी काम के नहीं रहे।
अब लडके को शर्म आई और कहने लगा - मैंने आपका नुकसान किया है। अंतः मैं आपकी साड़ी का दाम दे देता हूँ।
संत जुलाहे ने कहा कि जब आपने साड़ी ली ही नहीं तब मैं आपसे पैसे कैसे ले सकता हूँ ?
लडके का अभिमान जागा और वह कहने लगा कि, मैं बहुत अमीर आदमी हूँ। तुम गरीब हो।
मैं रुपये दे दूँगा तो मुझे कोई फर्क नहीं पड़ेगा, पर तुम यह घाटा कैसे सहोगे ?
और.. नुकसान मैंने किया है तो घाटा भी मुझे ही पूरा करना चाहिए।
संत जुलाहे मुस्कुराते हुए कहने लगे, तुम यह घाटा पूरा नहीं कर सकते।
सोचो, किसान का कितना श्रम लगा तब कपास पैदा हुई। फिर मेरी स्त्री ने अपनी मेहनत से उस कपास को बीना और सूत काता।
फिर मैंने उसे रंगा और बुना। इतनी मेहनत तभी सफल हो जब इसे कोई पहनता, इससे लाभ उठाता, इसका उपयोग करता।
पर तुमने उसके टुकड़े-टुकड़े कर डाले। रुपये से यह घाटा कैसे पूरा होगा ?
जुलाहे की आवाज़ में आक्रोश के स्थान पर अत्यंत दया और सौम्यता थी।
लड़का शर्म से पानी-पानी हो गया। उसकी आँखे भर आई और वह संत के पैरो में गिर गया।
जुलाहे ने बड़े प्यार से उसे उठाकर उसकी पीठ पर हाथ फिराते हुए कहा,
बेटा, यदि मैं तुम्हारे रुपये ले लेता तो, उस में मेरा काम चल जाता। पर तुम्हारी ज़िन्दगी का वही हाल होता जो उस साड़ी का हुआ।
कोई भी उससे लाभ नहीं होता। साड़ी एक गई, मैं दूसरी बना दूँगा। पर तुम्हारी ज़िन्दगी एक बार अहंकार में नष्ट हो गई तो दूसरी कहाँ से लाओगे तुम ?
तुम्हारा पश्चाताप ही मेरे लिए बहुत कीमती है। संत की उँची सोच-समझ ने लडके का जीवन बदल दिया।
ये कोई और नहीं, ये सन्त थे कबीर दास जी.
Bhakti Kathayen भक्ति कथायें..
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((((((( जय जय श्री राधे )))))))
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नव संवत्सर, चैत्र शुक्ल प्रतिपदा, विक्रमी संवत 2076 भारतीय ( हिन्दू ) नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं..(((( कन्हैया मुस्कुर...
06/04/2019

नव संवत्सर, चैत्र शुक्ल प्रतिपदा, विक्रमी संवत 2076 भारतीय ( हिन्दू ) नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं..
(((( कन्हैया मुस्कुरा रहे थे ))))
एक औरत रोटी बनाते बनाते "ॐ भगवते वासूदेवाय नम:" का जाप कर रही थी...
अलग से पूजा का समय कहाँ निकाल पाती थी बेचारी, तो बस काम करते करते ही!!
एकाएक धड़ाम से जोरों की आवाज हुई और साथ मे दर्दनाक चीख, कलेजा धक से रह गया...
जब आंगन में दौड़ कर झांकी तो आठ साल का चुन्नू चित्त पड़ा था, खुन से लथपथ।
मन हुआ दहाड़ मार कर रोये। परंतु घर मे उसके अलावा कोई था नही, रोकर भी किसे बुलाती, फिर चुन्नू को संभालना भी तो था।
दौड़ कर नीचे गई तो देखा चुन्नू आधी बेहोशी में माँ माँ की रट लगाए हुए है।
अंदर की ममता ने आंखों से निकल कर अपनी मौजूदगी का अहसास करवाया।
फिर 10 दिन पहले करवाये अपेंडिक्स के ऑपरेशन के बावजूद ना जाने कहाँ से इतनी शक्ति आ गयी कि चुन्नू को गोद मे उठा कर पड़ोस के नर्सिंग होम की ओर दौड़ी।
रास्ते भर भगवान् को जी भर कर कोसती रही, बड़बड़ाती रही, हे कन्हैया क्या बिगाड़ा था मैंने तुम्हारा, जो मेरे ही बच्चे को..!!
खैर डॉक्टर साहब मिल गए और समय पर इलाज होने पर चुन्नू बिल्कुल ठीक हो गया।
चोटें गहरी नही थी, ऊपरी थीं तो कोई खास परेशानी नही हुई...
रात को घर पर जब सब टीवी देख रहे थे तब उस औरत का मन बेचैन था।
भगवान् से विरक्ति होने लगी थी। एक मां की ममता प्रभुसत्ता को चुनौती दे रही थी।
उसके दिमाग मे दिन की सारी घटना चलचित्र की तरह चलने लगी। कैसे चुन्नू आंगन में गिरा की एकाएक उसकी आत्मा सिहर उठी,
कल ही तो पुराने चापाकल का पाइप का टुकड़ा आंगन से हटवाया है, ठीक उसी जगह था जहां चिंटू गिरा पड़ा था। अगर कल मिस्त्री न आया होता तो..?
उसका हाथ अब अपने पेट की तरफ गया जहां टांके अभी हरे ही थे, ऑपरेशन के।
आश्चर्य हुआ कि उसने 20-22 किलो के चुन्नू को उठाया कैसे, कैसे वो आधा किलोमीटर तक दौड़ती चली गयी ?
फूल सा हल्का लग रहा था चुन्नू। वैसे तो वो कपड़ों की बाल्टी तक छत पर नही ले जा पाती।
फिर उसे ख्याल आया कि डॉक्टर साहब तो 2 बजे तक ही रहते हैं और जब वो पहुंची तो साढ़े 3 बज रहे थे,
उसके जाते ही तुरंत इलाज हुआ, मानो किसी ने उन्हें रोक रखा था।
उसका सर प्रभु चरणों मे श्रद्धा से झुक गया। अब वो सारा खेल समझ चुकी थी। मन ही मन प्रभु से अपने शब्दों के लिए क्षमा मांगी।
तभी टीवी पर ध्यान गया तो प्रवचन आ रहा था..
प्रभु कहते हैं, मैं तुम्हारे आने वाले संकट रोक नहीं सकता, लेकिन तुम्हे इतनी शक्ति दे सकता हूँ कि तुम आसानी से उन्हें पार कर सको,
तुम्हारी राह आसान कर सकता हूँ। बस धर्म के मार्ग पर चलते रहो।
उस औरत ने घर के मंदिर में झांक कर देखा, कन्हैया मुस्कुरा रहे थे...
Bhakti Kathayen भक्ति कथायें..
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((((((( जय जय श्री राधे )))))))
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(((( पगली माई ))))आगरा में एक प्रतिष्ठित मुस्लिम परिवार रहता था। परिवार में एक बड़ी सुंदर कन्या थी जिसका नाम था जमीरन, उ...
05/04/2019

(((( पगली माई ))))
आगरा में एक प्रतिष्ठित मुस्लिम परिवार रहता था।
परिवार में एक बड़ी सुंदर कन्या थी जिसका नाम था जमीरन, उसके पिता इकबाल अहमद आगरा के प्रसिद्ध डॉक्टर थे।
प्रचलित प्रथा के अनुसार आठ- नोँ वर्ष की अवस्था में ही जमीरन का विवाह बेरिस्टर याकूब साहब के सुपुत्र से हो गया।
भगवान् की इच्छा से जमीरन ससुराल जा पाई ही नहीं, इसके पति पढ़ने के लिए आगरा से लखनऊ गए और इन्फ्लूएंजा के शिकार हो गये।
ठीक 14 वर्ष की अवस्था में जमीरन विधवा हो गई।
मुसलमानों में विधवा होने की क्या चिंता ? पिता और भाई पुनर्विवाह कर देना चाहते थे।
पता नहीं जमीरन को क्या धुन सवार हुई, उसने विवाह करने से स्पष्ट अस्वीकार कर दिया।
पिता ने बहुत समझाया, कि हम हिंदू थोड़ी ही हैं, हमारे कुरान शरीफ में तो यह जायज है। लोग पता नहीं क्या कहेंगे।
लड़का बहुत सुंदर और पढ़ा लिखा है। पास पड़ोस वालों ने भी आग्रह किया।
भाई ने डराने-धमकाने में कोई बात उठा ना रखी पर उस लड़की पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। वह अपनी बात पर अड़ी रही।
जब कोई बात कहता तो वह चुपचाप सिर नीचा कर रोने लगती। वैसे ही आज कल दिन भर इसी चिंता में रहती थी।
नमाज पढ़ने में मन नहीं लगता था। वह बहुत आग्रह करने पर तो मस्जिद में जाती और वहां भी बैठी बैठी आंसू बहाया करती।
शरीर दिन दिन सूखता जाता था। मुख पीला पड़ गया था।
डॉक्टर साहब के यह एक ही लड़की थी। वह इसे बहुत प्यार करते थे। लड़की की दशा से उन्हें बड़ी चिंता रहती थी। पर करते भी क्या, कोई उपाय चलता ना था।
वैद्य आए डॉक्टर आए हकीम आए। सब ने देखा और दवा भी दी परंतु रोग के मूल तक कोई पहुंच न सका। किसी की दवाई से कोई लाभ नहीं हुआ।
विवाह की चर्चा बंद हो गई। घरवालों ने देखा कि इस चर्चा से इस लड़की को बहुत कष्ट होता है, अतः उन्होंने आग्रह छोड़ दिया।
डॉक्टर साहब चाहते थे कि यदि वह शादी ना करने में ही खुश है तो वैसा ही सही, पर वह प्रसन्न रहें।
पता नहीं जमीरन क्या सोचा करती थी। वह एकांतप्रिय हो गई थी। किसी का भी समीप बैठना उसे पसंद ना था।
कोई कहता तो स्नान कर लेती और कोई कहता तो भोजन। स्वयं उसे अपने शरीर का रक्षण का भी ध्यान नहीं रहता था।
एकांत में बैठ कर सूने नेत्रों से कभी कभार कमरे की छत को कभी दीवारों को और कभी पृथ्वी को देखती रहती।
उसके आंसू सूखना जानते ही न थे। उसे कुछ अभाव था क्या ? यह तो भगवान् ही जाने।
आगरा में प्रसिद्ध रामायणी महात्मा जनक सुताशरण जी की कथा की धूम थी।
नित्य सहस्त्रों स्त्री पुरुषों की भीड़ कथा में होती थी। कथा के अतिरिक्त समय में भी महात्मा जी को दर्शनार्थी भक्तों का समूह घेरे ही रहता था।
नगर की गली गली में महात्मा जी की कथा की चर्चा थी। आज कल सभी लोग कथा की ही बातचीत करते रहते थे।
बच्चों ने तो कथा की चौपाइयां तक स्मरण कर ली थी और उन्हीं को दोहराया करते थे। जमीरन को भी कथा का समाचार मिल चुका था।
मुसलमान होने पर भी उसमें संप्रदायिक संकीर्णता ना थी।
जब सब लोग कथा की इतनी प्रशंसा करते हैं तो मैं भी एक दिन जाऊं। उसने किसी से भी बतलाया नहीं बुरखा डालकर अकेली ही घर से निकल पड़ी।
पड़ोसी के घर जाकर, जो जाति के वैश्य थे उसकी स्त्री के साथ कथा में चली गई और पीछे स्त्रियों के साथ बैठ गई।
कथा में किसे पता कि कौन आया कौन गया। सब लोग कथा सुधा के पान में तल्लीन थे। पूर्ण निस्तब्धता छाई हुई थी।
प्रसंग कथा श्री रघुनाथ जी के वनवास के समय केवट का वार्तालाप। महात्मा जी की वाणी ने प्रसंग में और भी आकर्षण भर दिया था।
श्रोताओं में ऐसा एक भी व्यक्ति ना था जिस के नेत्र सूखे हो। करुण रस की धारा चल रही थी।
महात्मा जी ने प्रसंगवश भक्त रसखान और सदना कसाई की भी कथा सुनाई और केवट की भक्ति तथा श्री रघुनाथ जी की उदारता एवं दया का स्पष्ट चित्र श्रोताओं के सम्मुख रख दिया।
वक्ता स्वयं कथामय हो रहे थे उनके नेत्रों से दो अविरल धाराएं निकलकर मानस के पृष्ठों को स्नान करा रही थी।
वह बार-बार गला भर जाने से बीच में रुक जाते और नेत्र पोछकर कर फिर बोलने लगते।
समय हो गया था और प्रसंग की गंभीरता से वक्ता का कंठ अवरुद्ध हो गया था। कोई नहीं चाहता था कि कथा बंद हो,
प्रवक्ता ने श्रोताओं के आग्रह पर भी शेष प्रसंग कल के लिए छोड़कर कथा का विश्राम किया। आरती हुई, प्रसाद वितरण हुआ। लोग अपने-अपने घरों को लौट गए।
वह वैश्य स्त्री उठी और जमीरन से चलने को कहने लगी। जमीरन ने उसे रोका। तनिक अवसर मिला,
वे दोनों महात्मा जी के चरणों में प्रणाम करके एक और खड़ी हो गई। महात्मा जी ने पूछा, क्या पूछना है ?
आप जिस पुस्तक से कथा कहते थे। उसे क्या मैं पढ़ सकती हूँ ? जमीरन वैसे हिंदी अच्छी प्रकार से पढ़ लेती थी।
क्यों इसमें क्या आपत्ति है ? महात्मा जी ने साश्चर्य से कहा। दूसरी स्त्री ने बताया कि यह मुसलमान है।
महात्मा जी बोले 'राम- नाम' के जप और रामायण जी के पाठ में सबका अधिकार है। रघुनाथ जी केवल हिंदुओं के ही थोड़ी हैं, वह तो सबके हैं।
महात्मा जी ने एक छोटी सी मानस की प्रति लाकर उसे दे दी। इसे नित्य प्रति पढ़ो, और राम-राम कहती रहो।
जमीरन ने सिर झुकाकर महात्मा जी के चरणों में मस्तक रखा। उसने मन ही मन महात्मा जी को अपना गुरु चुन लिया।
उसी दिन से जितने दिनों तक महात्मा जी आगरा में रहे, वह नित्य कथा में आती रही। कथा के आरंभ में आती और कथा समाप्त होने पर उठ कर चली जाती।
घर और मोहल्ले के मुसलमानों ने बड़ा हल्ला गुल्ला मचाया की जमीरन तो काफिर हो गई है।
बात कुछ नहीं थी, वह नमाज पढ़ने अब नहीं जाती थी और हिंदुओं की रामायण दिनभर पढ़ा करती थी। उसने माँस भक्षण भी छोड़ दिया था।
डॉक्टर साहब क्या करते ? लड़की का मोह छोड़ा नहीं जाता था। डर था कि अधिक कड़ाई करने पर वह रो-रोकर बीमार ना हो जावे और समाज के मुसलमान उसके पीछे पड़े हुए थे।
अंततः उन्होंने लोगों से स्पष्ट कह दिया कि लड़की की इच्छा में बाधा नहीं डालूंगा।
समाज तो ऐसा ही चलता है। लोगो ने तो कुछ दिन बहुत व्यंग कसे और फिर जैसे जैसे बात पुरानी पड़ती गई, उसे भूल गए।
उनके लिए विशेष से वह साधारण बात हो गई और सब तो शांत हो गए, पर जमीरन की भाभी और भाई शांत नहीं हुए।
वे बराबर उसके पीछे पड़े थे। भाई का कहना था कि वह शादी कर ले और काफिरों की इस पुस्तक को फेंक दें।
भाभी उसके माँस न खाने पर चिढ़ाती और उसे व्यंग में 'भगतनी' कह कर पुकारती थी।
पिता की उदारता और प्रेम ने जमीरन को सुविधा दे रखी थी। पिता के भय से भाई अधिक उद्दंडता नहीं कर पाता था। किसी प्रकार दिन कटते जाते थे।
जमीरन का मन इस परिवार से उबता ही गया, उसे ना तो परिवार वालों के साथ बोलना अच्छा लगता था और ना उसे उसमें उनके साथ रहना।
उसे यहां रह कर अपने जप और पाठ में भी कम अड़चन नहीं पड़ती थी ।
उसके लिए माँस को पकते और दूसरों को भक्षण करते देखना भी असहाय हो गया। वह घर में माँस आने पर कोठी बंद करके बैठी रहती।
वह दिन दूध और फलाहार कर काट देती। महीने के बीस दिन तो ऐसे ही बीतते।
धीरे-धीरे उसका अयोध्या की और आकर्षण हुआ। कई बार उसने अयोध्या जाने का विचार किया, पर पिता के प्रेम को तोड़ कर जाना भी उसके लिए शक्य न था।
आकर्षण बढ़ता गया और वह अयोध्या जाने के लिए व्याकुल रहने लगी। जिसे भगवान् स्वयं बुलाना चाहे, उसे कौन रोक सकता है !
आगरे में हैजा फैला और डॉक्टर साहब को ले लिया।
घर के सब लोग रो रहे थे, सब पिछाड़े खा रहे थे और जमीरन के नेत्रों में अश्रु भी ना थे। उन्मत्त दृष्टि से वह आकाश की ओर एक टक देख रही थी।
डॉक्टर साहब के इष्ट मित्र सभी आ गए थे। फूलों से सजा हुआ शव कब्रगाह के लिए उठाया गया।
जमीरन उठी और उस शव के साथ हो ली। लोगों ने बहुत लौटाने की चेष्टा की पर वह लौटी नहीं।
शव को कब्र दे दी गई। लोग ऊपर पुष्प चढ़ाकर लौटे। पता नहीं कब जमीरन वहाँ से चली गई थी।
सब ने समझा कि घर लौट गई होगी। पर वह घर नहीं आई थी।
संध्या को एक बार फिर एक मुसलमान ने कब्र के पास अकेली जमीरन को देखा...
और फिर किसी ने उसे आगरा में कभी नहीं देखा। भाई ने बहुत चेष्टा की, पर जमीरन का उन्हें पता ना लगा।
पाँच सौ रुपये की पुरुस्कारी घोषणा भी कोई फल नहीं दिखा सकी।
अयोध्या में एक वृद्ध मुसलमान स्त्री पगली माई करके प्रसिद्ध हो गई थी। वह कभी अयोध्या रहती और कभी लखनऊ आ जाती।
लोगों की उस पर बड़ी श्रद्धा थी। लोग उसे घेरे ही रहते थे। किसी ने बताया कि पगली माई आगरा की रहने वाली है।
वह किसी से कुछ बोलती नहीं थी। प्रातः नगर के बाहर से आती और आकर किसी पेड़ के नीचे बैठ जाती।
लोग आकर उसे घेर लेते, दर्शन करते, फल उसके सामने रख देते।
पगली माई सभी फलों को लोगों की और फेंक देती और कभी उन्हें वहीं छोड़कर किसी दूसरे पेड़ के नीचे जा बैठती।
किसी ने नहीं देखा कि वह भोजन क्या करती है।
जिस पर वह बहुत प्रसन्न हो जाती, उसकी ओर देखकर केवल हंस देती,
कोई सांसारिक वस्तुओं की कामना करता तो वह पृथ्वी पर थूंक देती। कोई बहुत तंग करता तो वह वहां से उठ कर चल देती।
पता नहीं लगा कि पगली माई रात्रि में कहां पर रहती है। संध्या होते ही वह नगर से बाहर की ओर चल देती।
कई बार लोगों ने पीछा किया पर उन्हें जब कई मील चलना पड़ा तो हार का लौट आए। अनुमान यह था कि वह कहीं सरयू किनारे रहती होगी।
माई दिन भर अस्पष्ट ध्वनि में सर्वदा कुछ कहा करती थी। उसके पास एक रामायण का गुटका भी रहा करता था।
पर उसे पाठ करते या पुस्तक खोलते किसी ने देखा नहीं। दिन में केवल एक बार वह कनक भवन जाती और भवन के सबसे बाहरी द्वार पर मस्तक टेक कर चुपचाप लौट आती। यही उसका नित्यक्रम था..
ठीक रामनवमी के उत्सव की भीड़ में जब पगली माई के मंदिर की देहरी पर मस्तक रखा तो वह फिर नहीं उठ सकी...
बहुत देर बाद लोगों का ध्यान उधर गया.. 'जय सीताराम सीताराम सीताराम' की ध्वनि के मध्य में बड़ी श्रद्धा से पागल माई की सजी हुई अर्थी वैष्णव ने कंधे पर रखी।
अब भी वह रामायण जी के गुटके के साथ थी। भक्तों ने उस साकेत की पगली के शरीर को सरयू जी की परम पावन गोद में समर्पित कर दिया।
आज तक वैष्णवों में पगली माई का बड़े आदर के साथ स्मरण किया जाता है। महात्मा लोग पगली माई का दृष्टांत श्रेष्ठ भक्तों की चर्चा चलने पर दिया करते हैं।
साभार :- श्री हरि शरणं
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(((( शिव-पार्वती पुत्र राक्षस अंधक ))))एक बार भगवान शिव और माता पार्वती घूमते हुए काशी पहुंच गए। वहां पर भगवान शिव अपना ...
14/03/2019

(((( शिव-पार्वती पुत्र राक्षस अंधक ))))
एक बार भगवान शिव और माता पार्वती घूमते हुए काशी पहुंच गए। वहां पर भगवान शिव अपना मुंह पूर्व दिशा की ओर करके बैठे थे।
उसी समय पार्वती ने पीछे से आकर अपने हाथों से भगवान शिव की आंखों को बंद कर दिया। ऐसा करने पर उस पल के लिए पूरे संसार में अंधेरा छा गया।
दुनिया को बचाने के लिए शिव ने अपनी तीसरी आँख खोल दी, जिससे संसार में पुनः रोशनी बहाल हो गई। लेकिन उसकी गर्मी से पार्वती को पसीना आ गया।
उन पसीने की बूंदों से एक बालक प्रकट हुआ। उस बालक का मुंह बहुत बड़ा था और भंयकर था।
उस बालक को देखकर माता पार्वती ने भगवान शिव से उसकी उत्पत्ति के बारे में पूछा। भगवान शिव ने पसीने से उत्पन्न होने के कारण उसे अपना पुत्र बताया। अंधकार में उत्पन्न होने की वजह से उसका नाम अंधक रखा गया।
कुछ समय बाद दैत्य हिरण्याक्ष के पुत्र प्राप्ति का वर मागंने पर भगवान शिव ने अंधक को उसे पुत्र रूप में प्रदान कर दिया। अंधक असुरों के बीच ही पला बढ़ा और आगे चलकर असुरों का राजा बना।
अंधक ने तपस्या करके ब्रह्मा जी से वरदान मांग लिया था की वो तभी मरे जब वो यौन लालसा से अपनी माँ की और देखे। अंधक ने सोचा था की ऐसा कभी नहीं होगा क्योकि उसकी कोई माँ नहीं है।
वरदान मिलने के बाद अंधक देवताओं को परास्त करके तीनो लोकों का राजा बन गया। फिर उसे लगा की अब उसके पास सब कुछ है इसलिए उसे शादी कर लेनी चाहिए। उसने तय किया की वो तीनो लोकों की सबसे सुन्दर स्त्री से शादी करेगा।
जब उसने पता किया तो उसे पता चला की तीनो लोकों में पर्वतों की राज कुमारी पार्वती से सुन्दर कोई नहीं है। जिसने अपने पिता का वैभव त्याग कर शिव से शादी कर ली है।
वो तुरंत पार्वती के पास गया और उसके सामने शादी का प्रस्ताव रखा। पार्वती के मना करने पर वो उसे जबरदस्ती ले जाने लगा तो पार्वती ने शिव का आह्वान किया।
पार्वती के आह्वान पर शिव वहां उपस्थित हुए और उसने अंधक को बताया की तुम पार्वती के ही पुत्र हो। ऐसा कहकर उन्होंने अंधक का वध कर दिया।
विशेष : वामन पुराण में अंधक को शिव-पार्वती का पुत्र बताया गया है जिसका वध शिव करते है जबकि एक अन्य मतानुसार अंधक, कश्यप ऋषि और दिति का पुत्र था जिसका वध भगवान् शिव ने किया था।
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(((( माया महा ठगिनी ))))भगवान् श्रीकृष्ण ने अपने मित्र सुदामा को बहुत सारी सम्पत्ति दी लेकिन सुदामा तो अब और अधिक भक्ति ...
27/02/2019

(((( माया महा ठगिनी ))))
भगवान् श्रीकृष्ण ने अपने मित्र सुदामा को बहुत सारी सम्पत्ति दी लेकिन सुदामा तो अब और अधिक भक्ति करने लगे। वे अब हर समय परमात्मा के ध्यान में ही निमग्न रहते।
आनन्दसिंधु प्रभु सखा रूप में,
मिल जाये तो क्या कहना ?
उसके आगे फिर शेष नहीं,
रह जाता है कुछ भी लहना।।
एक दिन सुदामा ने मन में सोचा, हर तरफ माया की बातें हो रही हैं पर माया मुझे क्यों नहीं दिखायी देती है।
यह माया पता नहीं कैसी होगी ? उन्होंने भगवान् श्रीकृष्ण से कहा—‘मुझे अपनी माया दिखाइए।
भगवान् श्रीकृष्ण ने कहा, तुम मुझे भूल जाओ तो तुम्हें माया दिखाई देगी।
ईश्वर ज्ञान और माया अज्ञान का प्रतीक है। जो परमात्मा के ध्यान में तल्लीन रहता है, उसे माया कैसे दिखाई देगी ?
माया महा ठगिनी हम जानी
भगवान् श्रीकृष्ण ने सुदामा को अपने मायाजाल में मोहित करने की ठानी।
श्रीकृष्ण और सुदामा गोमती नदी में स्नान करने गए। संध्योपासना का समय हो रहा था इसलिए जल्दी-जल्दी स्नान करने में सुदामा श्रीकृष्ण को भूल गए।
भगवान् श्रीकृष्ण ने अपनी माया दिखाई। जैसे ही सुदामा ने नदी में डुबकी लगाई कि गोमती नदी में बाढ़ आ गई और सुदामा बाढ़ के प्रवाह में खिंचते हुए चले गए।
पानी में डूबते-तैरते हुए वे एक घाट के पास पहुंचे और घाट पर चढ़ गए।
उसी समय एक हाथी ने आकर उनके गले में हार पहना दिया।
उस गांव के राजा की मृत्यु हो गयी थी और वहां ऐसा रिवाज था कि हाथी जिसके गले में हार पहना देता, उसे राजा बना दिया जाता था।
सुदामा को राजा बना दिया गया और राजकुमारी से उनका विवाह हो गया। भगवान् की माया से मोहित हुए सुदामा सब कुछ भूल गए।
पुरानी किसी चीज की उन्हें स्मृति नहीं रही। उनकी कई संतानें हुईं।
एक बार उनकी पत्नी रानी की मृत्यु हो गयी इससे दु:खी होकर सुदामा रोने लगे।
नगर के संभ्रान्त लोगों ने कहा, आप रोइये मत, रानी जहां गईं हैं, वहां आपको भी पहुंचा देंगे।
उस नगर में ऐसा रिवाज था कि स्त्री की मृत्यु होने पर पुरुष को भी उसके साथ चिता में चढ़ा दिया जाता था।
लोग सुदामा को श्मशान ले गए। यह सब देखकर सुदामा घबरा गए और भय और घबराहट में प्रभु का स्मरण करने लगे।
दुख में सुमिरन सब करें,
सुख में करें न कोय।
जो सुख में सुमिरन करै
तो दु:ख काहे को होय ।। (कबीर)
भगवान् का स्मरण करने ही उनके नेत्रों पर चढ़ा माया (अज्ञान) का परदा हट गया और उनको याद आया कि मैं तो सुदामा ब्राह्मण हूँ। मुझे संध्या करनी चाहिए।
संध्योपासना के लिए जैसे ही उन्होंने नदी में डुबकी लगायी वे गोमती नदी में उसी स्थान पर पहुंच गए।
श्रीकृष्ण स्नान करके पीताम्बर धारण भी नहीं कर पाये थे कि सुदामा रोते-रोते उनके पास आ पहुंचे।
श्रीकृष्ण ने पूछा, मित्र रोते क्यों हो ?
सुदामा कहने लगे, ये मेरी पत्नी, मेरा राज्य, सब कहां चला गया ? यह सब क्या है ?
भगवान् श्रीकृष्ण ने सुदामा को समझाते हुए कहा, मित्र ! यह सब मेरी माया है।
मेरे बिना जो कुछ भी दिखाई देता है, वह मेरी माया है। माया का आवरण चारों ओर फैला हुआ है। माया स्वयं नाचती है और मनुष्य को अपने वश में करके नचाती है।
इसीलिए संतों ने माया को ‘नर्तकी’ कहा है। इस नर्तकी माया के जाल से बचना है तो ‘नर्तकी’ का उल्टा कर दो।
जो शब्द बनेगा वह है ‘कीर्तन’ अर्थात् जो भगवान् का कीर्तन व नाम-स्मरण करता है, उसे माया रुलाती नहीं है।
साभार :- Archana Agarwal ( aaradhika )
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