01/09/2026
#ऋषिमार्कण्डेय जी के काशी (वाराणसी) आने का मुख्य कारण अपनी अल्पायु के संकट से मुक्ति पाना और भगवान शिव की आराधना करके अमरत्व प्राप्त करना था।
पौराणिक कथाओं के अनुसार इससे जुड़ी प्रमुख बातें इस प्रकार हैं:
अल्पायु का दोष: ऋषि मार्कण्डेय के पिता ऋषि मृकण्डु को पुत्र-प्राप्ति के लिए भगवान शिव से यह वरदान मिला था कि उन्हें एक सर्वगुण संपन्न लेकिन केवल 16 वर्ष की अल्पायु वाला पुत्र प्राप्त होगा।
काशी का चयन: जब मार्कण्डेय 16 वर्ष के होने वाले थे और उन्हें अपनी कम आयु के बारे में पता चला, तो उन्होंने काल और मृत्यु पर विजय पाने का संकल्प लिया। काशी को भगवान शिव की प्रिय नगरी (अविमुक्त क्षेत्र) और मोक्षदायिनी माना जाता है, इसलिए वे शिव साधना के लिए काशी आए।
गंगा-गोमती संगम (कैथी) पर तपस्या: काशी क्षेत्र में गंगा और गोमती नदी के पवित्र संगम (वर्तमान में वाराणसी का कैथी क्षेत्र) पर आकर उन्होंने पार्थिव (बालू) का शिवलिंग बनाया और कठोर तपस्या शुरू की। उन्होंने यहाँ 'महामृत्युंजय मंत्र' का जप करते हुए शिव आराधना में स्वयं को लीन कर लिया।
यमराज से रक्षा और अमरत्व: जब उनकी आयु के 16 वर्ष पूरे हुए, तब यमराज उनके प्राण हरने आए। बालक मार्कण्डेय ने डरकर शिवलिंग को गले लगा लिया। अपने भक्त की रक्षा के लिए भगवान शिव प्रकट हुए, यमराज को पीछे हटने पर विवश किया और मार्कण्डेय को 'चिंजीवी' (सदा 16 वर्ष का बने रहने और अमर रहने) का वरदान दिया।
इसी पावन घटना के कारण वाराणसी के कैथी में स्थित वह स्थान आज मार्कण्डेय महादेव मंदिर के नाम से प्रसिद्ध है।
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मार्कण्डेय महादेव मंदिर धाम कैथी वाराणसी मार्कण्डेय महादेव मंदिर धाम कैथी वाराणसी पुजारी नितेस गोस्वामी 9628225727