Thakur Manch

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Thakur Manch राजपूतो का इतिहास

08/09/2022

क्रमांक नाम गोत्र वंश स्थान और जिला
1. सूर्यवंशी भारद्वाज सूर्य बुलन्दशहर आगरा मेरठ अलीगढ
2. गहलोत वशिष्ट , कश्यप, बैजवापेड सूर्य मेवाड़ और पूर्वी जिले
3. सिसोदिया बैजवापेड गहलोत महाराणा उदयपुर स्टेट
4. कछवाहा गौतम,वशिष्ठ,मानव सूर्य महाराजा जयपुर
5. राठौड गौतम,कश्यप,भारद्वाज,शान्डिल्य गहरवार महाराजा राजस्थान, रोहिलखंड अनेक स्थानों पाए जाते हैं जोधपुर ,बीकानेर,किशनगढ़ और पूर्व और मालवा
6. रवानी अत्रि,भारद्वाज चन्द्रयान चंद्र राजगीर, औरंगाबाद(बिहार), रोहतास और इलाहाबाद
7. सोमवंशी अत्रय चन्द्र प्रतापगढ और जिला हरदोई
8. यदुवंशी अत्रय चन्द्र राजकरौली राजपूताने में
9. भाटी अत्रय जादौन महारजा जैसलमेर राजपूताना
10. जाडेचा अत्रय यदुवंशी महाराजा कच्छ भुज
11. जादवा अत्रय जादौन शाखा अवा. कोटला ऊमरगढ आगरा
12. तोमर अत्रय, व्याघ्र, गार्गेय चन्द्र पाटन के राव तंवरघार जिला ग्वालियर
13. कटियार व्याघ्र तोंवर धरमपुर का राज और हरदोई
14. पालीवार व्याघ्र चन्द्र गोरखपुर
15. सत्पोखरिया भारद्वाज राठौड(चाँपावत) मऊ जिला घोसी, इंदारा
16. परिहार, वरगाही कौशल्य, कश्यप अग्नि बांदा जिला, रीवा राज्य में बघेलखंड
17. तखी कौशल्य परिहार पंजाब कांगडा जालंधर जम्मू में
18. पवार वशिष्ठ अग्नि मालवा मेवाड धौलपुर पूर्व मे बलिया, आजमगढ़, जोधपुर।
19. सोलंकी भारद्वाज अग्नि राजपूताना मालवा सोरों जिला एटा
20. चौहान वत्स अग्नि राजपूताना पूर्व और सर्वत्र
21. हाडा वत्स चौहान कोटा बूंदी और हाडौती देश
22. खींची वत्स चौहान खींचीवाडा मालवा ग्वालियर
23. भदौरिया वत्स चौहान नौगंवां पारना आगरा इटावा गालियर
24. देवडा वत्स चौहान राजपूताना सिरोही राज
25. शम्भरी वत्स चौहान नीमराणा रानी का रायपुर पंजाब
26. बच्छगोत्री वत्स चौहान प्रतापगढ सुल्तानपुर
27. राजकुमार वत्स चौहान दियरा कुडवार फ़तेहपुर जिला
28. पवैया वत्स चौहान ग्वालियर
29. गौर,गौड भारद्वाज सूर्य शिवगढ रायबरेली कानपुर लखनऊ
30. वैस भारद्वाज सूर्य आजमगढ उन्नाव रायबरेली मैनपुरी पूर्व में
31. गहरवार कश्यप, भारद्वाज सूर्य माडा, हरदोई, वनारस, उन्नाव, बांदा पूर्व
32. सेंगर गौतम ब्रह्मक्षत्रिय जगम्बनपुर भरेह इटावा जालौन
33. कनपुरिया भारद्वाज ब्रह्मक्षत्रिय पूर्व में राजाअवध के जिलों में हैं
34. बिसेन अत्रय,वत्स,भारद्वाज,पाराशर,शान्डिल्य ब्रह्मक्षत्रिय गोरखपुर गोंडा प्रतापगढ महराजगंज (निचलौल के उत्तर क्षेत्र के समीप) हैं
35. निकुम्भ वशिष्ठ,भारद्वाज सूर्य वंशी कठेहर रोहिलखंड , मऊ गोरखपुर आजमगढ हरदोई जौनपुर
36. श्रीनेत भारद्वाज निकुम्भ गाजीपुर बस्ती गोरखपुर
37. कटहरिया , कठेरिया वशिष्ठ् भारद्वाज, सूर्य वंशी बरेली बंदायूं मुरादाबाद शहाजहांपुर ,रोहिलखंड
38. वाच्छिल अत्रयवच्छिल चन्द्र मथुरा बुलन्दशहर शाहजहांपुर,रोहिलखंड
39. बढगूजर वशिष्ठ सूर्य ,सिकरवार ,सीकरी अनूपशहर एटा अलीगढ मैनपुरी मुरादाबाद हिसार गुडगांव जयपुर
40. झाला मरीच, कश्यप, मार्कण्डे चन्द्र धागधरा मेवाड झालावाड कोटा
41. गौतम गौतम ब्रह्मक्षत्रिय राजा अर्गल फ़तेहपुर
42. रैकवार भारद्वाज सूर्य बहरायच सीतापुर बाराबंकी
43. करचुल हैहय कृष्णात्रेय चन्द्र बलिया फ़ैजाबाद अवध
44. चन्देल चान्द्रायन चन्द्रवंशी (रवानी) गिद्धौर ,कानपुर, फ़र्रुखाबाद, बुन्देलखंड, पंजाब, गुजरात
45. जनवार कौशल्य चन्द्रवंशी बलरामपुर अवध के जिलों में
46. बहेलिया भारद्वाज, वैस (उप जाति सिसोदिया )की गोद सिसोदिया रायबरेली बाराबंकी
47. दीत्तत कश्यप सूर्यवंश की शाखा उन्नाव, बस्ती, प्रतापगढ, जौनपुर, रायबरेली ,बांदा
48. सिलार शौनिक चन्द्र सूरत राजपूतानी
49. सिकरवार भारद्वाज, सांक्रित्यन बढगूजर ग्वालियर, आगरा, गाजीपुर और उत्तरप्रदेश में
50. सुरवार गर्ग सूर्य कठियावाड में
51. सुर्वैया वशिष्ठ यदुवंश काठियावाड
52. मोरी ब्रह्मगौतम सूर्य मथुरा ,आगरा ,धौलपुर
53. टांक (तत्तक) शौनिक नागवंश मैनपुरी और पंजाब
54. गुप्त गार्ग्य चन्द्र अब इस वंश का पता नही है
55. कौशिक कौशिक चन्द्र बलिया, आजमगढ, गोरखपुर
56. भृगुवंशी भार्गव ब्रह्मक्षत्रिय वनारस, बलिया, आजमगढ, गोरखपुर
57. गर्गवंशी गर्ग ब्रह्मक्षत्रिय आजमगढ, नरसिंहपुर सुल्तानपुर,अवध,बस्ती,फैजाबाद
58. पडियारिया, देवल,सांकृतसाम ब्रह्मक्षत्रिय राजपूताना
59. ननवग कौशिक चन्द्र जौनपुर जिला
60. वनाफ़र पाराशर,कश्यप चन्द्र बुन्देलखन्ड बांदा वनारस
61. जैसवार कश्यप यदुवंशी मिर्जापुर एटा मैनपुरी
62. चौलवंश भारद्वाज सूर्य दक्षिण मद्रास तमिलनाडु कर्नाटक में
63. निमवंशी कश्यप सूर्य संयुक्त प्रांत
64. वैनवंशी वैन्य सोमवंशी मिर्जापुर
65. दाहिमा गार्गेय ब्रह्मक्षत्रिय काठियावाड राजपूताना
66. पुण्डीर कपिल, पुलस्त्य भारद्वाज ब्रह्मक्षत्रिय पंजाब, गुजरात, रींवा, यू.पी.
67. तुलवा आत्रेय चन्द्र राजाविजयनगर
68. कटोच कश्यप चन्द्र राजानादौन कोटकांगडा,हिमाचल
69. चावडा,पंवार,चोहान,वर्तमान कुमावत वशिष्ठ पंवार की शाखा मलवा रतलाम उज्जैन गुजरात मेवाड
70. अहवन वशिष्ठ चावडा,कुमावत खेरी हरदोई सीतापुर बारांबंकी
71. डौडिया वशिष्ठ पंवार शाखा बुलंदशहर मुरादाबाद बांदा मेवाड गल्वा पंजाब
72. गोहिल बैजबापेण गहलोत शाखा काठियावाड
73. बुन्देला कश्यप गहरवारशाखा बुन्देलखंड के रजवाडे
74. काठी कश्यप गहरवारशाखा काठियावाड झांसी बांदा, कठेहर रोहिलखंड
75. जोहिया पाराशर चन्द्र पंजाब देश मे
76. गढावंशी कांवायन चन्द्र गढावाडी के लिंगपट्टम में
77. मौखरी अत्रय चन्द्र प्राचीन राजवंश था
78. लिच्छिवी कश्यप सूर्य प्राचीन राजवंश था
79. बाकाटक विष्णुवर्धन सूर्य अब पता नहीं चलता है
80. पाल कश्यप सूर्य यह वंश सम्पूर्ण भारत में बिखर गया है
81. सैन अत्रय ब्रह्मक्षत्रिय यह वंश भी भारत में बिखर गया है
82. कदम्ब मान्डग्य ब्रह्मक्षत्रिय दक्षिण महाराष्ट्र मे हैं
83. पोलच भारद्वाज ब्रह्मक्षत्रिय दक्षिण में मराठा के पास में है
84. बाणवंश कश्यप असुरवंश श्री लंका और दक्षिण भारत में,कैन्या जावा में
85. काकुतीय भारद्वाज चन्द्र,प्राचीन सूर्य था अब पता नही मिलता है
86. सुणग वंश भारद्वाज चन्द्र,पाचीन सूर्य था, अब पता नही मिलता है
87. दहिया गौतम ब्रह्मक्षत्रिय मारवाड में जोधपुर
88. जेठवा कश्यप हनुमानवंशी राजधूमली काठियावाड
89. मोहिल वत्स चौहान शाखा महाराष्ट्र मे है
90. बल्ला भारद्वाज,कश्यप सूर्य, काठी ,काठी दरबार काठियावाड मे मिलते हैं
91. डाबी वशिष्ठ यदुवंश राजस्थान
92. खरवड वशिष्ठ यदुवंश मेवाड उदयपुर
93. सुकेत भारद्वाज गौड की शाखा पंजाब में पहाडी राजा
94. पांड्य अत्रय चन्द अब इस वंश का पता नहीं
95. पठानिया पाराशर वनाफ़रशाखा पठानकोट राजा पंजाब
96. बमटेला शांडल्य विसेन शाखा हरदोई फ़र्रुखाबाद
97. बारहगैया वत्स चौहान गाजीपुर
98. भैंसोलिया वत्स चौहान भैंसोल गाग सुल्तानपुर
99. चन्दोसिया भारद्वाज वैस सुल्तानपुर
100. चौपटखम्ब कश्यप ब्रह्मक्षत्रिय जौनपुर
101. धाकरे भारद्वाज(भृगु) ब्रह्मक्षत्रिय आगरा मथुरा मैनपुरी इटावा हरदोई बुलन्दशहर
102. धन्वस्त यमदाग्नि ब्रह्मक्षत्रिय जौनपुर आजमगढ वनारस
103. धेकाहा कश्यप पंवार की शाखा भोजपुर शाहाबाद
104. दोबर(दोनवार) वत्स या कश्यप ब्रह्मक्षत्रिय गाजीपुर बलिया आजमगढ गोरखपुर
105. हरद्वार भार्गव चन्द्र शाखा आजमगढ
106. जायस कश्यप राठौड की शाखा रायबरेली मथुरा
107. जरोलिया व्याघ्रपद चन्द्र बुलन्दशहर
108. जसावत मानव्य कछवाह शाखा मथुरा आगरा
109. जोतियाना(भुटियाना) मानव्य कश्यप,कछवाह शाखा मुजफ़्फ़रनगर मेरठ
110. घोडेवाहा मानव्य कछवाह शाखा लुधियाना होशियारपुर जालन्धर
111. कछनिया शान्डिल्य ब्रह्मक्षत्रिय अवध के जिलों में
112. काकन भृगु ब्रह्मक्षत्रिय गाजीपुर आजमगढ
113. कासिब कश्यप कछवाह शाखा शाहजहांपुर,रोहिलखंड
114. किनवार कश्यप सेंगर की शाखा पूर्व बंगाल और बिहार में
115. बरहिया गौतम सेंगर की शाखा पूर्व बंगाल और बिहार
116. लौतमिया भारद्वाज बढगूजर शाखा बलिया गाजी पुर शाहाबाद
117. मौनस मौन कछवाह शाखा मिर्जापुर प्रयाग जौनपुर
118. नगबक मानव्य कछवाह शाखा जौनपुर आजमगढ मिर्जापुर
119. पलवार व्याघ्र सोमवंशी शाखा आजमगढ फ़ैजाबाद गोरखपुर
120. रायजादे पाराशर चन्द्र की शाखा पूर्व अवध में
121. सिंहेल कश्यप सूर्य आजमगढ परगना मोहम्दाबाद
122. तरकड कश्यप दिक्खित शाखा आगरा मथुरा
122. तिसहिया कौशल्य परिहार इलाहाबाद परगना हंडिया
124. तिरोता कश्यप तंवर की शाखा आरा शाहाबाद भोजपुर
125. उदमतिया वत्स ब्रह्मक्षत्रिय आजमगढ गोरखपुर
126. भाले वशिष्ठ पंवार अलीगढ
127. भालेसुल्तान भारद्वाज वैस की शाखा रायबरेली लखनऊ उन्नाव
128. जैवार व्याघ्र तंवर की शाखा दतिया झांसी बुन्देलखंड
129. सरगैयां व्याघ्र सोमवंश हमीरपुर बुन्देलखण्ड
130. किसनातिल अत्रय तोमरशाखा दतिया बुन्देलखंड
131. टडैया भारद्वाज सोलंकीशाखा झांसी ललितपुर बुन्देलखंड
132. खागर अत्रय यदुवंश शाखा जालौन हमीरपुर झांसीखंगार क्षत्रिय राठौड़ शाखा मध्य प्रदेश
133. पिपरिया भारद्वाज गौडों की शाखा बुन्देलखंड
134. सिरसवार अत्रय चन्द्र शाखा बुन्देलखंड
135. खींचर वत्स चौहान शाखा फ़तेहपुर में असौंथड राज्य
136. खाती कश्यप दिक्खित शाखा बुन्देलखंड,राजस्थान में कम संख्या होने के कारण इन्हे बढई गिना जाने लगा
137. आहडिया बैजवापेण गहलोत आजमगढ
138. उदावत गौतम राठौड पाली
139. उजैने श्रवण पंवार आरा डुमरिया
140. अमेठिया भारद्वाज गौड अमेठी लखनऊ सीतापुर
141. दुर्गवंशी कश्यप दिक्खित राजा जौनपुर राजाबाजार
142. बिलखरिया कश्यप दिक्खित प्रतापगढ उमरी राजा
143. डोगरा कश्यप सूर्य कश्मीर राज्य और बलिया
144. निर्वाण वत्स चौहान राजपूताना (राजस्थान)
145. जाटू व्याघ्र तोमर राजस्थान,हिसार पंजाब
146. नरौनी मानव्य कछवाहा बलिया आरा
147. भनवग भारद्वाज कनपुरिया जौनपुर
148. गिदवरिया वशिष्ठ पंवार बिहार मुंगेर भागलपुर
149. रक्षेल कश्यप सूर्य रीवा राज्य में बघेलखंड
150. कटारिया भारद्वाज सोलंकी झांसी मालवा बुन्देलखंड
151. रजवार वत्स चौहान पूर्व मे बुन्देलखंड
152. द्वार व्याघ्र तोमर जालौन झांसी हमीरपुर
153. इन्दौरिया व्याघ्र तोमर आगरा मथुरा बुलन्दशहर
154. छोकर अत्रय यदुवंश अलीगढ मथुरा बुलन्दशहर
155. जांगडा वत्स चौहान बुलन्दशहर पूर्व में झांसी
156. शौनक शौन भ्रृगुवंशी इलाहाबाद
157. बघेल कश्यप या भारद्वाज सोलंकी रीवा राज्य में बघेलखंड
158. दिक्खित कश्यप सूर्य बुन्देलखंड
159. बंधलगोती भारद्वाज ब्रह्मक्षत्रिय अमेठी,सुल्तानपुर
160. कलहंस अंगिरस परिहार प्रतापगढ,बहरायच,गोरखपुर,बस्ती
161. बेरुआर भारद्वाज तोमर बलिया,आजमगढ,मऊ
162.रोहिला(रोहिलखंड में शासन करने वाले सभी क्षत्रिय राजपूत जैसे_राठौड़,गोर,वाछिल्ल , वारेचा चौहान,चौहान,काठी,निकुंभ,परमार,बनाफरे आदि९०९ईस्वी से १७२०ईस्वी कठेहर रोहिलखंड,कुमायूं ,नेपाल,सौराष्ट्र,
आदि।
163.खागी राजपूत__सूर्य वंशी(खड्ग धारी योद्धा होने के कारण गुणधर्म के आधार पर इन्हे खड्ग वंशी राजपूत भी कहा जाता है,पश्चिमी उत्तर प्रदेश में खागी अथवा खड्ग वंशी क्षत्रिय/राजपूत अनेक क्षेत्रों में निवास कर रहे है जैसे गढ़ मुक्तेश्वर,अमरोहा,मुरादाबाद,रामपुर, बरेली,कासगंज,सिकंदराबाद अलीगढ़ ,संभाल,एरा,मैनपुरी आदि में भी खागी राजपूत निवास करते है।।

लगभग पांच हजार क्षत्रिय गोत्र शाखाएं ,प्रशाखाएं है देश के विभिन्न क्षेत्रों में ।
सूर्य और चंद्र ही प्राचीन वैदिक कालीन क्षत्रिय पूरा इतिहास काल से है बाद में अग्नि वंश और ऋषि वंश माने गए जिनसे छत्तीस राजवंश लिखे गए हैं,।
जिसके पास जो जानकारी मिले कॉपी पेस्ट करके इसमें एड करते जाए जिससे सभी तक जानकारी पहुंचे और जो लिस्टिड नही हुए वे सूची बद्ध किए जा सके ।
जय राजपूताना
जय भवानी
क्षत्रिय इतिहास की अनंत कहानी
क्रमशः====

23/07/2022

#गुर्जर_नहीं_क्षत्रिय_सम्राट
#सम्राट_मिहिरभोज_प्रतिहार

ीवन_परिचय_सनातन_धर्म_रक्षक________
्राट_मिहिरभोज_प्रतिहार_राजपूत________

(1) सम्राट मिहिरभोज का जन्म विक्रम संवत 873 (816 ईस्वी) को हुआ था आपको कई नाम से जाना जाता है जैसे भोजराज, भोजदेव , मिहिर , आदिवराह एवं प्रभास।

(2) आपका राज्याभिषेक विक्रम संवत 893 यानी 18 अक्टूबर दिन बुधवार 836 ईस्वी में 20 वर्ष की आयु में हुआ था और इसी दिन 18 अक्टूबर को ही हर वर्ष भारत में आपकी जयंती मनाई जाती है।

(3) इनके दादा का नाम नागभट्ट द्वितीय था उनका स्वर्गवास विक्रम संवत 890 (833 ईस्वी) भादो मास की शुक्ल पक्ष की पंचमी को हुआ इनके पिता का नाम रामभद्र और माता का नाम अप्पादेवी था। माता पिता ने सूर्य की उपासना की थी जिसके फलस्वरूप उन्हें मिहिरभोज के रुप मे पुत्र की प्राप्ति हुई थी।

(4) सम्राट मिहिरभोज की पत्नी का नाम चंद्रभट्टारिका देवी था जो भाटी राजपूत वंश की थी इनके पुत्र का नाम महेन्द्रपाल प्रतिहार था जो सम्राट मिहिरभोज के स्वर्गवास उपरांत कन्नौज की गद्दी पर बैठे।

(5) विक्रम संवत 945 (888 ईस्वी) 72 वर्ष की आयु में सम्राट मिहिरभोज प्रतिहार का स्वर्गवास हुआ।

ाम्राज्य________राजपूताना________

(1) सम्राट मिहिरभोज के साम्राज्य का विस्तार आज के मुल्तान से पश्चिम बंगाल और कश्मीर से उत्तर महाराष्ट्र तक था।

(2) सम्राट मिहिरभोज गुणी बलवान न्यायप्रिय सनातन धर्म रक्षक प्रजा हितैषी एवं राष्ट्र रक्षक थे।

(3) सम्राट मिहिरभोज प्रतिहार शिव शक्ति के उपासक थे और उन्होंने मलेच्छों (अरब, मुगल, कुषाण, हूण) से पृथ्वी की रक्षा की थी उन्हें वराह यानी भगवान विष्णु का अवतार भी बताया गया है। उनके द्वारा चलाये गये सिक्कों पर वराह की आकृति बनी हुई है।

(4) अरब यात्री सुलेमान ने अपनी पुस्तक सिलसिला - उत - तारिका 851 ईस्वी में लिखी वह लिखता है की सम्राट मिहिरभोज प्रतिहार (परिहार) के पास उंटो घोडों व हाथियों की बडी विशाल एवं सर्वश्रेष्ठ सेना है उनके राज्य में व्यापार सोने व चांदी के सिक्कों से होता है उनके राज्य में सोने व चांदी की खाने भी है इनके राज्य में चोरों डाकुओं का भय नही है भारत वर्ष में मिहिरभोज प्रतिहार से बडा इस्लाम का अन्य कोई शत्रु नहीं है मिहिरभोज के राज्य की सीमाएं दक्षिण के राष्ट्रकूटों के राज्य पूर्व में बंगाल के शासक पालवंश और पश्चिम में मुल्तान के मुस्लिम शासकों से मिली हुई है।

िहिरभोज_की_सेना_______

(1) सम्राट मिहिरभोज के पूर्वज नागभट्ट प्रथम (730 - 760 ईस्वी) ने स्थाई सेना संगठित कर उसको नगद वेतन देने की जो प्रथा जो सर्व प्रथम चलाई वो मिहिरभोज के समय और पक्की होई गई थी।

(2) विक्रम संवत 972 (915 ईस्वी) में भारत भ्रमण आये बगदाद के इतिहासकार अलमसूदी ने अपनी किताब मिराजुल - जहाब में इस महाशक्तिशाली महापराक्रमी सेना का विवरण किया है उसने इस सेना की संख्या लाखों में बताई है जो चारो दिशाओं में लाखो की संख्या में रहती है।

(3) प्रसिद्ध इतिहासकार के. एम. मुंशी ने सम्राट मिहिरभोज प्रतिहार की तुलना गुप्तवंशीय सम्राट समुद्रगुप्त और मौर्यवंशीय सम्राट चंद्रगुप्त से इस प्रकार की है वे लिखते हैं कि सम्राट मिहिरभोज प्रतिहार इन सभी से बहुत महान थे क्योंकि तत्कालीन भारतीय धर्म एवं संस्कृति के लिए जो चुनौती अरब के इस्लामिक विजेताओं की फौजों द्वारा प्रस्तुत की गई वह समुद्रगुप्त चंद्रगुप्त आदि के समय पेश नही हुई थी और न ही उनका मुकाबला अरबों जैसे अत्यंत प्रबल शत्रुओं से हुआ था।

(4) भारत के इतिहास में मिहिरभोज से बडा आज तक कोई भी सनातन धर्म रक्षक एवं राष्ट्र रक्षक नही हुआ।

एक ऐसा हिंदू क्षत्रिय योद्धा अरबों का सबसे बडा दुश्मन जिसने लगभग 40 युद्घ कर अरबों को भारत से पलायन करने पर मजबूर कर दिया एवं सनातन धर्म की रक्षा की ऐसे थे महान चक्रवर्ती सम्राट मिहिरभोज प्रतिहार जिसने भारत पर 50 वर्ष शासन किया।

ृहद_इतिहास_________

एक ऐसा राजा जिसने अरब तुर्क आक्रमणकारियों को भागने पर विवश कर दिया और जिसके युग में भारत सोने की चिड़िया कहलाया मित्रों परिहार क्षत्रिय वंश के नवमीं शताब्दी में सम्राट मिहिरभोज भारत का सबसे महान शासक था उसका साम्राज्य आकार व्यवस्था प्रशासन और नागरिको की धार्मिक स्वतंत्रता के लिए चक्रवर्ती गुप्त सम्राटो के समकक्ष सर्वोत्कृष्ट था।

भारतीय संस्कृति के शत्रु म्लेछो यानि मुस्लिम तुर्को -अरबो को पराजित ही नहीं किया अपितु उन्हें इतना भयाक्रांत कर दिया था की वे आगे आने वाली एक शताब्दी तक भारत की और आँख उठाकर देखने का भी साहस नहीं कर सके।

चुम्बकीय व्यक्तित्व संपन्न सम्राट मिहिर भोज की बड़ी बड़ी भुजाये एवं विशाल नेत्र लोगों में सहज ही प्रभाव एवं आकर्षण पैदा करते थे वह महान धार्मिक , प्रबल पराक्रमी , प्रतापी , राजनीति निपुण , महान कूटनीतिज्ञ , उच्च संगठक सुयोग्य प्रशासक , लोककल्याणरंजक तथा भारतीय संस्कृति का निष्ठावान शासक था।

ऐसा राजा जिसका साम्राज्य संसार में सबसे शक्तिशाली था इनके साम्राज्य में चोर डाकुओ का कोई भय नहीं था सुदृढ़ व्यवस्था व आर्थिक सम्पन्नता इतनी थी कि विदेशियो ने भारत को सोने की चिड़िया कहा।

यह जानकर अफ़सोस होता है की ऐसे अतुलित शक्ति शौर्य एवं समानता के धनी मिहिरभोज को भारतीय इतिहास की किताबो में स्थान नहीं मिला सम्राट मिहिरभोज प्रतिहार के शासनकाल में सर्वाधिक अरबी मुस्लिम लेखक भारत भ्रमण के लिए आये और लौटकर उन्होंने भारतीय संस्कृति सभ्यता आध्यात्मिक-दार्शनिक ज्ञान विज्ञानं आयुर्वेद सहिष्णु सार्वभौमिक समरस जीवन दर्शन को अरब जगत सहित यूनान और यूरोप तक प्रचारित किया।

क्या आप जानते हे की सम्राट मिहिरभोज ऐसा शासक था जिसने आधे से अधिक विश्व को अपनी तलवार के जोर पर अधिकृत कर लेने वाले ऐसे अरब तुर्क मुस्लिम आक्रमणकारियों को भारत की धरती पर पाँव नहीं रखने दिया उनके सम्मुख सुदृढ़ दीवार बनकर खड़े हो गए उसकी शक्ति और प्रतिरोध से इतने भयाक्रांत हो गए की उन्हें छिपाने के लिए जगह ढूंढना कठिन हो गया था ऐसा किसी भारतीय लेखक ने नहीं बल्कि मुस्लिम इतिहासकारो बिलादुरी सलमान एवं अलमसूदी ने लिखा है ऐसे महान सम्राट मिहिरभोज ने 836 ई से 885 ई तक लगभग 50 वर्षो के सुदीर्घ काल तक शासन किया।

सम्राट मिहिरभोज प्रतिहार जी का जन्म सूर्यवंशी क्षत्रिय कुल में रामभद्र प्रतिहार की महारानी अप्पा देवी के द्वारा सूर्यदेव की उपासना के प्रतिफल के रूप में हुआ माना जाता है मिहिरभोज के बारे में इतिहास की पुस्तकों के अलावा बहुत कम जानकारी उपलब्ध है इनके शासन काल की हमे जानकारी वराह ताम्रशासन पत्र से मालूम पडती है जिसकी तिथि (कार्तिक सुदि 5, वि.सं. 893 बुधवार) 18 अक्टूबर 836 ईस्वी है। इसी दिन इनका राजतिलक हुआ था।

मिहिरभोज के साम्राज्य का विस्तार आज के मुलतान से पश्चिम बंगाल तक ओर कश्मीर से कर्नाटक तक था सम्राट मिहिरभोज बलवान न्यायप्रिय और धर्म रक्षक थे मिहिरभोज शिव शक्ति एवं भगवती के उपासक थे स्कंध पुराण के प्रभास खंड में भगवान शिव के प्रभास क्षेत्र में स्थित शिवालयों व पीठों का उल्लेख है।

प्रतिहार साम्राज्य के काल में सोमनाथ को भारतवर्ष के प्रमुख तीर्थ स्थानों में माना जाता था प्रभास क्षेत्र की प्रतिष्ठा काशी विश्वनाथ के समान थी स्कंध पुराण के प्रभास खंड में सम्राट मिहिर भोज के जीवन के बारे में विवरण मिलता है मिहिर भोज के संबंध में कहा जाता है कि वे सोमनाथ के परम भक्त थे उनका विवाह भी सौराष्ट्र में ही हुआ था उन्होंने मलेच्छों से पृथ्वी की रक्षा की।

50 वर्ष तक राज्य करने के पश्चात वे अपने बेटे महेंद्रपाल प्रतिहार को राज सिंहासन सौंपकर सन्यासवृति के लिए वन में चले गए थे सम्राट मिहिरभोज का सिक्का जो की मुद्रा थी उसको सम्राट मिहिर भोज ने 836 ईस्वीं में कन्नौज को देश की राजधानी बनाने पर चलाया था सम्राट मिहिरभोज महान के सिक्के पर वाराह भगवान जिन्हें कि भगवान विष्णु के अवतार के तौर पर जाना जाता है वाराह भगवान ने हिरण्याक्ष राक्षस को मारकर पृथ्वी को पाताल से निकालकर उसकी रक्षा की थी।

सम्राट मिहिरभोज का नाम आदिवाराह भी है जिस प्रकार वाराह (विष्णु) भगवान ने पृथ्वी की रक्षा की थी और हिरण्याक्ष का वध किया था ठीक उसी प्रकार मिहिरभोज मलेच्छों(अरबों, हूणों, कुषाणों)को मारकर अपनी मातृभूमि की रक्षा की एवं सनातन धर्म के रक्षक बने।

सम्राट मिहिरभोज प्रतिहार की जयंती हर वर्ष 18 अक्टूबर को मनाई जाती है जिन स्थानों पर परिहारों, पडिहारों, इंदा, राघव, लूलावत, देवल, रामावत,
मडाडो अन्य शाखाओं को सम्राट मिहिरभोज के जन्मदिवस का पता है वे इस जयंती को बड़े धूमधाम से मनाते हैं जिन भाईयों को इसकी जानकारी नहीं है आप उन लोगों के इसकी जानकारी दें और सम्राट मिहिरभोज का जन्मदिन बड़े धूमधाम से मनाने की प्रथा चालू करें।

अरब यात्रियों ने किया सम्राट मिहिरभोज का यशोगान अरब यात्री सुलेमान ने अपनी पुस्तक सिलसिलीउत तुआरीख 851 ईस्वीं में लिखी जब वह भारत भ्रमण पर आया था सुलेमान सम्राट मिहिर भोज के बारे में लिखता है कि प्रतिहार सम्राट की बड़ी भारी सेना है उसके समान किसी राजा के पास उतनी बड़ी सेना नहीं है सुलेमान ने यह भी लिखा है कि भारत में सम्राट मिहिर भोज से बड़ा इस्लाम का कोई शत्रु नहीं है मिहिर भोज के पास ऊंटों हाथियों और घुडसवारों की सर्वश्रेष्ठ सेना है इसके राज्य में व्यापार सोना चांदी के सिक्कों से होता है यह भी कहा जाता है कि उसके राज्य में सोने और चांदी की खाने भी हैं यह राज्य भारतवर्ष का सबसे सुरक्षित क्षेत्र है इसमें डाकू और चोरों का भय नहीं है।

मिहिर भोज राज्य की सीमाएं दक्षिण में राष्ट्रकूटों के राज्य पूर्व में बंगाल के पाल शासक और पश्चिम में मुलतान के शासकों की सीमाओं को छूती है शत्रु उनकी क्रोध अग्नि में आने के उपरांत ठहर नहीं पाते थे धर्मात्मा साहित्यकार व विद्वान उनकी सभा में सम्मान पाते थे उनके दरबार में राजशेखर कवि ने कई प्रसिद्ध ग्रंथों की रचना की।

कश्मीर के राज्य कवि कल्हण ने अपनी पुस्तक राज तरंगणी में सम्राट मिहिरभोज का उल्लेख किया है उनका विशाल साम्राज्य बहुत से राज्य मंडलों आदि में विभक्त था उन पर अंकुश रखने के लिए दंडनायक स्वयं सम्राट द्वारा नियुक्त किए जाते थे योग्य सामंतों के सुशासन के कारण समस्त साम्राज्य में पूर्ण शांति व्याप्त थी सामंतों पर सम्राट का दंडनायकों द्वारा पूर्ण नियंत्रण था।

किसी की आज्ञा का उल्लंघन करने व सिर उठाने की हिम्मत नहीं होती थी उनके पूर्वज सम्राट नागभट्ट प्रतिहार ने स्थाई सेना संगठित कर उसको नगद वेतन देने की जो प्रथा चलाई वह इस समय में और भी पक्की हो गई और प्रतिहार राजपूत साम्राज्य की महान सेना खड़ी हो गई यह भारतीय इतिहास का पहला उदाहरण है जब किसी सेना को नगद वेतन दिया जाता था।

आइये जानते है हिन्दू क्षत्रिय शौर्य और बहादुरी से जुड़े सम्राट मिहिरभोज प्रतिहार" के रोचक पहलू।

काव्यों एवं इतिहास मे इन विशेषणो से वर्णित किया
क्षत्रिय सम्राट,भोजदेव, भोजराज, वाराहवतार, परमभट्टारक, महाराजाधिराज, परमेश्वर, महानतम भोज, मिहिर महान।

ासनकाल__________

सम्राट मिहिरभोज प्रतिहार ने 18 अक्टूबर 836 ईस्वीं से 885 ईस्वीं तक 50 साल तक राज किया मिहिर भोज के साम्राज्य का विस्तार आज के मुलतान से पश्चिम बंगाल तक और कश्मीर से कर्नाटक तक था।

ाम्राज्य____________

परिहार वंश ने अरबों से 300 वर्ष तक लगभग 200 से ज्यादा युद्ध किये जिसका परिणाम है कि हम आज यहां सुरक्षित है प्रतिहारों ने अपने वीरता शौर्य कला का प्रदर्शन कर सभी को आश्चर्यचकित किया है भारत देश हमेशा ही प्रतिहारो का रिणी रहेगा उनके अदभुत शौर्य और पराक्रम का जो उनहोंने अपनी मातृभूमि के लिए न्यौछावर किया है जिसे सभी विद्वानों ने भी माना है प्रतिहार साम्राज्य ने दस्युओं, डकैतों, अरबों, हूणों, से देश को बचाए रखा और देश की स्वतंत्रता पर आँच नहीं आई।

इनका राजशाही निशान वराह है ठीक उसी समय मुश्लिम धर्म का जन्म हुआ और इनके प्रतिरोध के कारण ही उन्हे हिंदुश्तान मे अपना राज कायम करने मे 300 साल लग गए और इनके राजशाही निशान वराह विष्णु का अवतार माना है प्रतिहार मुश्लमानो के कट्टर शत्रु थे इसलिए वो इनके राजशाही निशान बराह से आजतक नफरत करते है।

ासन_व्यवस्था__________

सम्राट मिहिरभोज प्रतिहार वीरता शौर्य और पराक्रम के प्रतीक हैं उन्होंने विदेशी साम्राज्यो के खिलाफ लड़ाई लड़ी और अपनी पूरी जिन्दगी अपनी मलेच्छो से पृथ्वी की रक्षा करने मे बिता दी सम्राट मिहिरभोज बलवान न्यायप्रिय और धर्म रक्षक सम्राट थे सिंहासन पर बैठते ही मिहिरभोज ने सर्वप्रथम कन्नौज राज्य की व्यवस्था को चुस्त-दुरूस्त किया प्रजा पर अत्याचार करने वाले सामंतों और रिश्वत खाने वाले कामचोर कर्मचारियों को कठोर रूप से दण्डित किया व्यापार और कृषि कार्य को इतनी सुविधाएं प्रदान की गई कि सारा साम्राज्य धनधान्य से लहलहा उठा मिहिरभोज ने प्रतिहार राजपूत साम्राज्य को धन वैभव से चरमोत्कर्ष पर पहुंचाया अपने उत्कर्ष काल में उसे सम्राट मिहिरभोज प्रतिहार की उपाधि मिली थी अनेक काव्यों एवं इतिहास में उसे कई महान विशेषणों से वर्णित किया गया है।

ाह_उपाधी__________

सम्राट मिहिर भोज के महान के सिक्के पर वाराह भगवान जिन्हें कि भगवान विष्णु के अवतार के तौर पर जाना जाता है वाराह भगवान ने हिरण्याक्ष राक्षस को मारकर पृथ्वी को पाताल से निकालकर उसकी रक्षा की थी सम्राट मिहिरभोज प्रतिहार का नाम आदिवाराह भी है ऐसा होने के पीछे यह मुख्य कारण हैं।

1. जिस प्रकार वाराह (विष्णु जी) भगवान ने पृथ्वी की रक्षा की थी और हिरण्याक्ष का वध किया था ठीक उसी प्रकार मिहिरभोज ने मलेच्छों को मारकर अपनी मातृभूमि की रक्षा की इसीलिए इनहे आदिवाराह की उपाधि दी गई है।

ासक___________

सम्राट मिहिरभोज प्रतिहार शिव शक्ति के उपासक थे स्कंध पुराण के प्रभास खंड में भगवान शिव के प्रभास क्षेत्र में स्थित शिवालयों व पीठों का उल्लेख है प्रतिहार साम्राज्य के काल में सोमनाथ को भारतवर्ष के प्रमुख तीर्थ स्थानों में माना जाता था प्रभास क्षेत्र की प्रतिष्ठा काशी विश्वनाथ के समान थी स्कंध पुराण के प्रभास खंड में सम्राट मिहिरभोज प्रतिहार के जीवन के बारे में विवरण मिलता है मिहिरभोज के संबंध में कहा जाता है कि वे सोमनाथ के परम भक्त थे उनका विवाह भी सौराष्ट्र में ही हुआ था उन्होंने मलेच्छों से पृथ्वी की रक्षा की 50 वर्ष तक राज करने के पश्चात वे अपने बेटे महेंद्रपाल प्रतिहार को राज सिंहासन सौंपकर सन्यासवृति के लिए वन में चले गए थे सम्राट मिहिरभोज का सिक्का जो कन्नौज की मुद्रा था उसको सम्राट मिहिरभोज ने 836 ईस्वीं में कन्नौज को देश की राजधानी बनाने पर चलाया था।

्यवस्था__________

सम्राट मिहिरभोज प्रतिहार महान के सिक्के पर वाराह भगवान जिन्हें कि भगवान विष्णु के अवतार के तौर पर जाना जाता है इनके पूर्वज सम्राट नागभट्ट प्रथम ने स्थाई सेना संगठित कर उसको नगद वेतन देने की जो प्रथा चलाई वह इस समय में और भी पक्की हो गई और प्रतिहार साम्राज्य की महान सेना खड़ी हो गई यह भारतीय इतिहास का पहला उदाहरण है जब किसी सेना को नगद वेतन दिया जाता हो।

मिहिर भोज के पास ऊंटों हाथियों और घुडसवारों की दूनिया कि सर्वश्रेष्ठ सेना थी इनके राज्य में व्यापार सोना चांदी के सिक्कों से होता है यइनके राज्य में सोने और चांदी की खाने भी थी भोज ने सर्वप्रथम कन्नौज राज्य की व्यवस्था को चुस्त-दुरूस्त किया प्रजा पर अत्याचार करने वाले सामंतों और रिश्वत खाने वाले कामचोर कर्मचारियों को कठोर रूप से दण्डित किया व्यापार और कृषि कार्य को इतनी सुविधाएं प्रदान की गई कि सारा साम्राज्य धनधान्य से लहलहा उठा मिहिरभोज ने प्रतिहार साम्राज्य को धन वैभव से चरमोत्कर्ष पर पहुंचाया।

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मिहिरभोज प्रतिहार की सैना में 8,00,000 से ज्यादा पैदल करीब 90,000 घुडसवार हजारों हाथी और हजारों रथ थे मिहिरभोज के राज्य में सोना और चांदी सड़कों पर विखरा था-किन्तु चोरी-डकैती का भय किसी को नहीं था जरा हर्षवर्धन बैस के राज्यकाल से तुलना करिए हर्षवर्धन के राज्य में लोग घरों में ताले नहीं लगाते थे पर मिहिरभोज के राज्य में खुली जगहों में भी चोरी की आशंका नहीं रहती थी।

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मिहिरभोज प्रतिहार बचपन से ही वीर बहादुर माने जाते थे।एक बालक होने के बावजूद देश के प्रति अपनी ज़िम्मेदारी को महसूस करते हुए उन्होंने युद्धकला और शस्त्रविधा में कठिन प्रशिक्षण लिया राजकुमारों में सबसे प्रतापी प्रतिभाशाली और मजबूत होने के कारण पूरा राजवंश और विदेशी आक्रमणो के समय देश के अन्य राजवंश भी उनसे बहुत उम्मीद रखते थे और देश के बाकी वंशवह उस भरोसे पर खरे उतरने वाले थे।

ैध_उत्तराधिकारी_साबित_हुए____

मिहिरभोज प्रतिहार राजपूत साम्राज्य के सबसे प्रतापी सम्राट हुए उनके राजगद्दी पर बैठते ही जैसे देश की हवा ही बदल गई मिहिरभोज की वीरता के किस्से पूरी दूनीया मे मशूहर हुए।विदेशी आक्रमणो के समय भी लोग अपने काम मे निडर लगे रहते है गद्दी पर बैठते ही उन्होने देश के लुटेरे शोषण करने वाले गरीबो को सताने वालो का चुन चुनकर सफाया कर दिया। उनके समय मे खुले घरो मे भी चोरी नही होती थी।

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अरब यात्री सुलेमान - पुस्तक सिलसिलीउत तुआरीख 851 ईस्वीं : जब वह भारत भ्रमण पर आया था सुलेमान सम्राट मिहिरभोज के बारे में लिखता है कि इस सम्राट की बड़ी भारी सेना है उसके समान किसी राजा के पास उतनी बड़ी सेना नहीं है सुलेमान ने यह भी लिखा है कि भारत में सम्राट मिहिरभोज से बड़ा इस्लाम का कोई शत्रु नहीं था मिहिरभोज के पास ऊंटों हाथियों और घुडसवारों की सर्वश्रेष्ठ सेना है इसके राज्य में व्यापार सोना चांदी के सिक्कों से होता है ये भी कहा जाता है कि उसके राज्य में सोने और चांदी की खाने भी थी।

बगदाद का निवासी अल मसूदी 915ई.-916ई वह कहता है कि (जुज्र) प्रतिहार साम्राज्य में 1,80,000 गांव नगर तथा ग्रामीण क्षेत्र थे तथा यह दो किलोमीटर लंबा और दो हजार किलोमीटर चौड़ा था राजा की सेना के चार अंग थे और प्रत्येक में सात लाख से नौ लाख सैनिक थे उत्तर की सेना लेकर वह मुलतान के बादशाह और दूसरे मुसलमानों के विरूद्घ युद्घ लड़ता है उसकी घुड़सवार सेना देश भर में प्रसिद्घ थी जिस समय अल मसूदी भारत आया था।

उस समय मिहिरभोज तो स्वर्ग सिधार चुके थे परंतु प्रतिहार शक्ति के विषय में अल मसूदी का उपरोक्त विवरण मिहिरभोज के प्रताप से खड़े साम्राज्य की ओर संकेत करते हुए अंतत: स्वतंत्रता संघर्ष के इसी स्मारक पर फूल चढ़ाता सा प्रतीत होता है समकालीन अरब यात्री सुलेमान ने सम्राट मिहिरभोज को भारत में इस्लाम का सबसे बड़ा दुश्मन करार दिया था क्योंकि प्रतिहार राजपूत राजाओं ने 11 वीं सदी तक इस्लाम को भारत में घुसने नहीं दिया था मिहिरभोज के पौत्र महिपाल को आर्यवर्त का महान सम्राट कहा जाता था।

जय राजपूताना जय मां भवानी धर्म क्षत्रिय युगे युगे।

25/01/2022

, चौहान" का बाहुबल हो ,
" राठौड़ " का जोश हो ,
"सिसोदिया" की सोच हो,
" चुण्डावत " का शौर्य हो ,
" तोमर " की आन हो ,
" भदौरिया " की शान हो ,
" राणावत " का मान हो ,
" सुरवार " का साहस हो ,
" शक्तावत " की शक्ति हो ,
" बैंस " की भक्ति हो ,
" भाटी " की बाजू हो ,
" जनवार " का जादू हो ,
" पंवार " का पानी हो ,
" झाला " का जुनून हो ,
" सोंलकी " की समझ हो ,
" सिकरवार " का संयम हो ,
" चावडा " की चतुराई हो ,
" सेंगर " की सरमाई हो ,
" परिहार " का प्रहार हो ,
" जादौन " की जांबाजी हो ,
" गौतम " की गोठ हो ,
" गौड़ " की गाज हो ,
" खींची " का बलिदान हो ,
" बाघेला " की बान हो ,
" देवडा " की दहाड़ हो ,
" राघव " की राड़ हो ,
" पुण्डीर " की पहचान हो ,
" दीखित " सी जान हो ,
" बिसेन " सी जबान हो ,
" परमार " जैसा महान हो ,
" बड़गुजर " का बडप्पन हो ,
" जमवाल " सा जहान हो ,
" शेखावत " का सहारा हो ,
" राजावत " की चाल हो ,
" डोडिया " की डांट हो ,
" हाडा " की हुंकार हो ,
" चंदेल " की ललकार हो ,
" बुंदेला " का वार हो ,
" डुलावत " की दाब हो ,
" सारंगदेवोत " की बात हो ,
" जडेजा " का जलवा हो ,
" सांखला " की सांख हो ,
" खंगारोत " की चाहत हो ,
" नाथावत " की अदावत हो ,
" गहरवार " की गरमाई हो ,
" कानावत " की नरमाई हो ,
" चन्द्रावत " की चमक हो ,
" नरूका " का प्यार हो ,
" सोढा " की पहल हो ,
" देवल " की महक हो ,
" बनाफर " सा वीर हो ,
" दहिया " सा धीर हो ,
" कछवाह " की राजनीति हो ।

तो कसम माँ भवानी की पूरे के पूरे संसार पर राजपूतोँ का राज हो।
ाजपूताना
1. सिकंदर को हराने वाला कौन.?
#राजपूत
2. गजनवी को औकात बताने वाला कौन?
#राजपूत
3.1191में मोहम्मद गौरी को 16 बार हराने वाला कौन ?? #राजपूत
4. 1320 में अलाउद्दीन को हराने वाला कौन?
#राजपूत
5. सिकंदर लोधी को हराने वाला कौन ?
#राजपूत
6. 50000 मुगलो को काटने वाला कौन?
#राजपूत
7. हिंदुत्व के लिये सर कटाने वाला कौन ?
#राजपूत

#राजपूतो को हराने वाला कौन ?
😡खुद राजपूत😡 इसलिए एक बनो नेक बनो

13/09/2021

कुचामन दुर्ग (नागौर)

12/09/2021

मेहरानगढ़ दुर्ग (जोधपुर)

05/08/2021

[05/08, 18:12] Sri Bhagwan Singh: 🚩 05 *प्रतिहार वंश*🚩 पृष्ठ क्र 35
- - - - - - - - - - गतांक से आगे
(2) *राजौरगढ़ राज्य* :-- राजस्थान के अलवर जिले में राजौरगढ़ क्षेत्र पर कन्नौज के प्रतिहारों के अधिनस्थ उनके भाई बंधु शासन करते थे। यह गुर्जर प्रतिहार अर्थात गुर्जर देश के प्रतिहार कहलाते थे। साधारण प्रतिहारों से ऊंचा रखने के लिए इन्होंने अपने को बड़गुर्जर प्रतिहार कहा बाद में यह नाम लंबा होने से ये *बडगूजर* कहे जाने लगे।
संभवतः नागभट्ट द्वितीय (805 से 833 ईस्वी) ने जब मत्स्य प्रदेश पर अधिकार किया तब से ही कन्नौज के प्रतिहारों के विशेष सामंत के रूप में यह शासन करते थे।
वि सं 1016 मे राजौरगढ़ में सावट के पुत्र मथनदेव शासन करते थे।
वि सं 1439 में माचेड़ी में आसलदेव के पुत्र गोगदेव शासन करते थे। गोगदेव फिरोजशाह तुगलक के सामंत थे।
वि सं 1515 में माचेड़ी में रामसी के पुत्र राजपालदेव शासन करते थे।
बड़गुजरों का राज दौसा पर भी था। दूल्हेराय कछवाह ने उनका राज्य छीन लिया और बाद में मांचेड़ी राजौरगढ़ आदि पर भी कछवाहों ने अधिकार कर लिया।
यहां से राज्य छूटने पर बडगूजर अलग-अलग भागों में चले गए। राजौरगढ़ से निकले एक बडगूजर मढाढ ने मेवाड़ में मढाढ गांव बसाया। रणथंबोर के हठी हमीर के सेनापति उज्जवल सिंह बडगूजर थे।
मांचेड़ी अलवर से निकले प्रतापसिंह बडगूजर ने मेरठ के आसपास राज्य स्थापित किया। इनके एक पुत्र अनूपसिंह ने अनूप शहर बसाया। दूसरे पुत्र बसंतपाल मंझोला के शासक बने। तीसरे पुत्र बदनसिंह संभल व बदायूं के और चौथे पुत्र हाथी सिंह नरौली के राजा बने।
*सिकरवार* :-- यह बड़गुजरों की शाखा है। सीकरी गांव से यह सिकरवार कहलाए।
(3) *मण्डोर राज्य* :-- मारवाड़ मैं नाहड़राव प्रतिहार की बड़ी प्रसिद्धि रही है। यह पृथ्वीराज चौहान का समकालीन था। इसने पुष्कर में वराह मंदिर बनवाया या जीर्णोद्धार करवाया था। यह पृथ्वीराज के गुजरात आक्रमण के समय सोजत के पास धवलहरा गांव में मारा गया। नाहड़राव का समय वि सं 1236 से 1244 तक का है।
नाहड़राव मंडोर का प्रसिद्ध शासक था। इसने परमारों से मंडोर जीता होगा। नाहड़राव का एक पुत्र आल्हा कन्नौज की लड़ाई में मारा गया।
नाहड़राव के पुत्र रूपसी की पांचवी पीढ़ी में अमायक हुआ। अमायक के पुत्र सोधक के पुत्र इंदा के वंशज *इंदा परिहार* कहलाए। इंदा के पुत्र गोपाल के नाम से गोपालसर गांव बसा है। इंदा के बाद बीजल महासिंह बूटा राणा भीमलिया व टोहा हुए।
यह टोहा मण्डौर का रावत था व वि सं 1451 मे चूण्डा राठौड़ का समकालीन था। इन्दा के पुत्र बीजल के भाई के वंशज उगमण के पुत्र सिखरा गूगोदे व रणधवल भी टोहा के समकालीन थे। टोहा के समय तुर्कों ने मंडोर पर अधिकार कर लिया परिहारों ने अपनी चतुराई से मंडोर जीता परंतु उन्हें फिर भी शत्रु का भय बराबर था। अतः चूण्डा राठौड़ को गूगोदे की पुत्री लीलाबाई ब्याही व मंडोर दाईजे में दिया।
*ईन्दा रो उपकार , कमधज कदे न बिसरे।*
*चूण्डो चंवरी चाढ , दी मण्डोवर दायजे।।*
सोधक के पुत्र बीजल के किसी भाई के वंशज तीन भाई हम्मीर गुजरमल व दीप सिंह थे।
ओझाजी ने हम्मीर को मण्डौर का स्वामी लिखा है परन्तु कोई आधार नही दिया है। गुजरमल ने मीणा जाति की स्त्री रखी जिसके वंशज मीणा परिहार हुए। दीपसिंह के वंशज मालवा मे सेंधिया परिहार हुए।

परिहारों के इसके अतिरिक्त अन्य राज्य :--
(4) ग्वालियर के परिहार(प्रतिहार)
(5) जुझोती के परिहार(प्रतिहार)
(6) उरई के परिहार(प्रतिहार)
(7) बुन्देलखण्ड के परिहार(प्रतिहार)
(8) अलीपुरा के परिहार(प्रतिहार)
(9) हिमाचल प्रदेश के परिहार (प्रतिहार)

*परिहारों(प्रतिहारों)की शाखाएँ*
(1) डाभी
(2) बड़गूजर
(3) लुल्लरा
(4) सूरा
(5) रामटा
(6) बुद्धखेलिया
(7) सोधिया
(8) खुखर
(9) ईन्दा
(10) चन्द्र परिहार
(11) माहप
(12) धांधिल
(13) सिन्धुका
(14) डोरणा
(15) सुवराण
(16) कलाहंस
(17) देवल
(18) खरल
(19) चौनिया
(20) बोथा
(21) चोहिल
(22) फलू
(23) धांधिया
(24) खरबड़
(25) सीधका आदि।




प्रतिहार सूर्यवंशी भगवान राम के छोटे भाई लक्षमण जी के वंशज है। वनवास काल मे लक्षमण जी राम व सीता के प्रतिहार (द्वारपाल) रहे अतः इनके वंशज प्रतिहार या परिहार कहलाये।

*स्वभ्राता राम भद्रस्य प्रतिहार्य कृतं सतः।*
*श्री प्रतिहारवड़ शोयमत श्रोन्नतिमाप्युयात।।*
- - - वाऊक का नौवी शताब्दी का शिलालेख

भगवान राम ने लक्षमण जी को कारापथ का राज्य दिया था। लक्षमण के दो पुत्र अंगद व चन्द्रकेतु थे।
*अंगद चन्द्रेतु च लक्ष्मणोप्यात्म सम्भावौ।*
*शासनादु रघुनाथस्य चक्रे कारापथश्वरी।।*
- - - रघुवंश 15/90

रामायण काल के बाद इस वंश का इतिहास पूर्ण रूप से नही मिलता है। महाभारत काल के बाद धन्व देश के राजा यज्ञपरिहार से इनका इतिहास मिला है।
यज्ञ के वंशज बैनदेव चक्रवर्ती राजा हुए है। मारवाड़ मे इन्हें आज भी श्रद्धा से चकवे बैन कहा जाता है। इनके वंशज ध्वजमहि ने विन्थल नगरी बसाकर नयी राजधानी बनायी। इनके वंशज धर्मपाल ने बदलगढ़ बनवाया। धर्मपाल के पुत्र चन्द्रपाल ने नर्मदा नदी के तट पर आजोरगढ़ राज्य स्थापित किया।
चन्द्रपाल के वंशज जयसिंह से परिहार राजाओं मे राणा की पदवी प्रारम्भ हुई। इनके वंशज अजराणा (नागार्जुन) हुए। इन्होने नर्मदा तट से आकर गुर्जरात्र व राजस्थान क्षैत्र मे राज्य स्थापित किया।
(1) *कन्नौज राज्य* :-- परिहारों का राज्य पहले नर्मदा नदी के किनारे मध्यप्रदेश मे था। नागभट्ट प्रथम मालवा का शासक था। इसका शासन काल ईस्वी सन् 730 से 756 तक का माना गया है। नागभट्ट ने अरबों को पराजित कर चावड़ों के राज्य भीनमाल पर अधिकार किया तब उसका स्थान भीनमाल हुआ।
नागभट्ट प्रथम का राज्य भीनमाल से भड़ौंच तक फैल कुका था। इसके बाद क्रमशः ककुस्थ देवशक्ति व पराक्रमी राजा वत्सराज हुए। इनका शासनकाल ईस्वी सन् 780 से 810 के लगभग था।
वत्सराज ने गौड़ व बंगाल के राजाओं को जीता किन्तु यह राष्ट्रकूट राजा ध्रुव से हार गया। इसकी राजधानी जालौर थी।
वत्सराज के बाद नागभट्ट द्वितीय
(850 से 833 ईस्वी) शासक हुआ। इसने शक्ति संचय की व कन्नौज के राजा चक्रायुद्ध को हराकर *कन्नौज सम्राट* बना। अब प्रतिहारों की राजधानी कन्नौज हुई। इस समय शेखावटी क्षैत्र भी परिहारों के राज्य मे था।
इसके पश्चात रामभद्र ने पालों को हराया। फिर मिहिरभोज (836 से 885 ईस्वी) शासक हुआ। इसका राज्य कांठियावाड़ तक फैल हुआ था। इसने अरबों को पराजित कर भारतीय संस्कृति व धर्म की रक्षा की। इसके बाद महेन्द्रपाल महीपाल भोज विनायकपाल महेन्द्रपाल2 देवपाल व विजयपाल राजा हुए। इसके विशाल राज्य मे अलवर भी सम्मिलित था।
विजयपाल के बाद उनके पुत्र राज्यपाल गद्दी पर बैठे। प्रतिहारों का विशाल राज्य धीरे-धीरे निर्बल हो रहा था। महमूद गजनवी ने 27 दिसम्बर 1018 में कन्नौज पर हमला किया। राजा राज्यपाल आक्रमण से घबराकर गंगा पार भाग गया। राज्यपाल के इस कायरतापूर्ण कार्य से भारतीय शासक बहुत नाराज हुए। चंदेल राजा घंघ ने विरोधी संघ बनाया दूबकुंड के कछवाह अर्जुन के पुत्र अभिमन्यु के तीर से राजा राज्यपाल मारे गये। इनके बाद क्रमशः त्रिलोचनपाल व यशपाल कन्नौज के राजा हुए। यशपाल से इस्वी सन् 1078 में चंद्रदेव गहड़वाल ने प्रतिहारों का राज्य छीनकर कन्नौज में गहढ़वाल वंश का राज्य स्थापित किया।

संकलन
दयाल सिंह सेदरा
9977800497
शेष अगले अंक मे - - - - - - - - - - - - - - - - - -

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