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 #खजुराहो_कन्दारिया_महादेव_मंदिरखजुराहो के मंदिरों में सबसे विशाल कंदरिया महादेव मंदिर मूलतः शिव मंदिर है। मंदिर का निर्...
01/07/2026

#खजुराहो_कन्दारिया_महादेव_मंदिर

खजुराहो के मंदिरों में सबसे विशाल कंदरिया महादेव मंदिर मूलतः शिव मंदिर है। मंदिर का निर्माणकाल 1025 -1050 सन् ई मे राजा विद्याधर चंदेल ने गजनवी से विजय के बाद करवाया था. है तथा इसकी लंबाई १०२', चौड़ाई ६६' और ऊँचाई १०१' है। स्थानीय मत के अनुसार इसका कंदरिया नामांकरण, भगवान शिव के एक नाम कंदर्पी के अनुसार हुआ है। इसी कंदर्पी से कंडर्पी शब्द का विकास हुआ, जो कालांतर में कंदरिया में परिवर्तित हो गया।

🚩स्थापत्य :

यह विशाल मंदिर खजुराहो की वास्तुकला का एक आदर्श नमूना है। यह अपने बाह्य आकार में ८४ समरस आकृति के छोटे- छोटे अंग तथा श्रंग शिखरों में जोड़कर बनाया, अनूठे उच्च शिखर से युक्त हे। मंदिर अपने अलंकरण एवं विशेष लय के कारण दर्शनीय है। मंदिर भव्य आकृति और अनुपातिक सुडौलता, उत्कृष्ट शिल्पसज्जा और वास्तु रचना के कारण मध्य भारतीय वास्तुकृतियों में श्रेष्ठ माना जाता है। मुख्य मंडप, मंडप और महामंडप के साथ साथ इसका आधार-योजना, रुप, ऊँचाई, उठाव, अलंकरण तथा आकार शास्रीय पद्धति का उत्तम उदाहरण प्रस्तुत करता है। इसकी विशिष्टता यह भी है कि इसकी ऊँचाई की ओर जाते हुए उत्थान श्रंग अत्यंत प्रभावशाली प्रतीत होता है। खजुराहो का यह एक मात्र मंदिर है, जिसकी जगती के दोनों पार्श्वों में और पीछे प्रक्षेपण है। इसकी जगती लगभग तीन मीटर ऊँची है। इसकी धराशिला ग्रेनाईट पत्थर की है तथा इस पर रेतीले पत्थर की खार-शिलाएँ बनी हुई हैं। मंदिर भित्ति कमल पुष्प की पत्तियों से सजे हैं तथा जालय, कुंभ और बाहर को निकली पट्टिकाएँ तमाल पत्रों से सजी हुई हैं। मंदिर ऊँचे अधिस्थान पर स्थापित है, जिसपर अनेक सुसज्जित मूर्तियाँ हैं।

इन मूर्तियों में दो पंक्तियाँ, हाथियों, घोड़ों, योद्धाओं, शिकारियों, मदारियों, संगीतज्ञों, नर्तकों और भक्तों की मूर्तियाँ आसीन है। मंदिर की तीन पट्टियों में देवी- देवताओं, सुर सुंदरियों, मिथुनों, व्यालों और नागिनों की मूर्तियाँ हैं। मंदिर के भीतर दो मकर-तोरण है। अप्सराओं की प्रतिमाएँ सुंदरता के साथ अंकित की गयी है। यहाँ की सभी मूर्तियाँ लंबी हैं तथा आकृति में संतुलित प्रतीत होती है। यहाँ नारी के कटावों का सौंदर्य स्पष्ट दिखता है।

तलच्छंद और ऊर्ध्वच्छंद के प्रत्येक अंगों की रचना और इसका अलंकरण अद्वितीय है। उर्ध्वच्छंद में सबसे अधिक लयबद्ध प्रक्षेपणों और रथिकाओं के सहित इसकी दांतेदार योजना उल्लेखनीय है।

🚩प्रवेशद्वार:
मंदिर का प्रवेश द्वार पंचायतन शैली का बना हुआ है। इस पर विषाणयुक्त और समुज्जवल देवताओं और संगीतज्ञों इत्यादि से अलंकृत तोरण तथा भव्य ज्यतोरण देखने योग्य हैं। अर्द्धमंडप और मंडप के उत्कीर्ण सघन हैं। परिक्रमा क्षेत्र में बाहरी भित्ती पर वृहदाकार मंच है। परिक्रमा के बाहर तथा मंदिर के बाहर का मंच बलिष्ट और गहन आकार में उठाया गया है। मंदिर का प्रत्येक भाग एक- दूसरे से जुड़ा हुआ है और पूर्व- पश्चिम दिशा की ओर इसका विस्तार है। छज्जों के रूप में वातायन बनाकर मंडप को महामंडप बनाया गया है। भीतर हवा जाने के लिए वातायन है और मंडप तीन ओर से खुले हैं। मंदिर की दीवारें पुख्ता हैं तथा छज्जायुक्त वातायन है, जो रोशनी जाने का साधन है। मूर्तियाँ छज्जे से ही शुरु हो जाती है। छज्जे और वातायन मूर्तियों पर रोशनी और परछाइयाँ पड़ती है। मंदिर का गर्भगृह सर्वोच्च स्थान पर है। वहाँ पहुँचने के लिए चंद्रशिलायुक्त सीढियों से ऊपर चढ़ना पड़ता है। सप्तरथ गर्भगृह के साथ ही शिखर के नीचे के वर्गाकार भाग को भी सात भाग दिये गए हैं।

🚩मंडप :
कंदिरिया मंदिर की जंघा पर मंडप और मुखमंडप के बाहरी भाग के कक्षासन्न पर राजसेना, वेदिका कलक, आसन्नपट्ट, कक्षासन्न है। मंदिर का छत कपोत भाग से शुरु होता है तथा व्रंदिका से छत को उठाता गया है। मंदिर के प्रत्येक मंडप की अलग- अलग छत है। सर्वाधिक ऊँचाईवाली छत गर्भगृह की है तथा इसका अंत सबसे ऊँचे शिखर पर हुआ है। यह शिखर चार उरु: शिखरों से सजाया गया है तथा असंख्य छोटे- छोटे श्रृंग भी बनाये गए हैं। इनमें कर्णश्रृंग तथा नष्टश्रृंग प्रकृति के श्रृंग हैं। मूलमंजरी के मुख्य आधार पर चतुरंग के रथ, नंदिका, प्रतिहार और कर्ण अंकित किये गए हैं। मंदिर के महामंडप की छत डोमाकार है, जिसे छोटे- छोटे तिलकों (पिरामिड छतों) से बनाया गया है। इससे ॠंग शैली स्पष्ट दिखाई देती है। प्रथम छत चार तिलकों से बनी है। साथ- ही तिलकों की चार अन्य पंक्तियाँ भी पिरामिड आकार में दिखाई देती हैं। उत्तर- दक्षिण की छत पर पाँच सिंहकरण, कुट- घंटा से उठ कर छत को सजाते हैं। यह छत पीठ और गृवा से युक्त है तथा इसको चंद्रिका, कलश और बीजपुंक से अलंकृत किया गया है।

🚩मुख्य मंडप :
मुख्यमंडप चार भद्रक- स्तंभों पर बनाया गया है। इसका ऊपरी आधा भाग आसन्न प के ऊपर है तथा नीचे का आधा भाग आसन्नप के नीचे स्थित है। इस भाग को कमलों से सजाया गया है। मंडप से मंडप तक आने के लिए मकरतोरण है। मुख्य मकरतोरण से शिल्पशैली पूर्णतया मिलती है। गर्भगृह के दरवाजे पर चंद्रशिला की चार सीढियाँ हैं। दरवाजे पर नौ शाख हैं। इसका विवरण निम्नलिखित है :-

🚩प्रथम शाखा पर साधारण उत्कीर्ण हैं।
🚩द्वितीय पर अप्सराएँ हैं।
🚩तृतीय पर व्याल है।
🚩चतुर्थ पर मिथुन है।
🚩पंचम पर व्याल आसीन है।
🚩छठी पर सुंदर अप्सराएँ अंकित हैं।
🚩सप्तम साधारण उत्कीर्ण है।
🚩अष्टम पर कमल पत्र का अंकन किया गया है।
🚩नवीं शाखा पर लहरदार लकीरें और नाग रुपांकिंत है।

सभी रथिकाएँ उद्गमों से सुसज्जित है। दाहिनी शाख पर कमल- पत्र और बायीं ओर यमुना अंकित किया गया है। द्वार शिला की एक रथिका सरस्वती को अभय के साथ प्रदर्शित करती है। यहाँ सरस्वती चक्रदार कमल दंड और कमंडल भी धारण किये हुए हैं। स्तंभ शाखा के नीचे रथिका में शिव- पार्वती को बैठे दिखाया गया है और नाग रथिका के नीचे की रथिका, चार व्यक्तियों को आसीन किया गया है। भीतरी वितान में कमल पुष्प और कोनों में कीर्कित्त मुख प्रतिमाएँ हैं। रेतीले पत्थर की एक पीठिका पत्थर के शिवलिंग को सहारा देती दिखाई गई है।

🚩गर्भ गृह :
मंदिर का गर्भगृह चतुरंग है तथा ऊँचे अधिस्थान पर टिका हुआ है। उत्तर प पर हाथी, घोड़े, आदमी और विविध दृश्य मिथुन सहित अंकित है। यहाँ वेदीवंघ पर जंघा है, जिसपर दो पंक्तियों में मूर्तियाँ हैं। यहाँ देवता, अप्सराएँ, व्याल और मिथुन- युग्म अंकन सुंदरता के साथ किया गया है।

कंदरिया महादेव मंदिर संधार प्रासाद में निर्मित है। इसमें एक शार्दूल सामने हैं और एक कोने में। इसकी पीठ की ऊँचाई काफी ज्यादा है। मंदिर का मुखपूर्व की ओर है। सीढियाँ चौड़ी हैं तथा मुखचतुष्कि तक जाती है। मुखचतुष्कि बंदनमालिका सुंदर है।

जय श्री राम

श्रेय - सुशील चौधरी

 ा_साँप_मंदिर......हिंदू धर्म, बौद्ध धर्म और जैन धर्म में, नागा या नागी दिव्य, अर्ध-दिव्य देवता हैं, या अर्ध-मानव अर्ध-स...
01/07/2026

ा_साँप_मंदिर......

हिंदू धर्म, बौद्ध धर्म और जैन धर्म में, नागा या नागी दिव्य, अर्ध-दिव्य देवता हैं, या अर्ध-मानव अर्ध-सर्प प्राणियों की एक अर्ध-दिव्य जाति है जो नेथवर्ल्ड (पटल) में रहते हैं और कभी-कभी मानव रूप ले सकते हैं।.

एक महिला नागा एक "नागी", "नागिन", या "नागिनी" है।. नागराजा को नगाओं और नागिनियों के राजा के रूप में देखा जाता है।. वे आम हैं और कई दक्षिण एशियाई और दक्षिण पूर्व एशियाई संस्कृतियों की पौराणिक परंपराओं में सांस्कृतिक महत्व रखते हैं।. वे ऋषि कश्यप और कद्रु के बच्चे हैं।....

माना जाता है कि नागा दोनों नागलोक पर रहते हैं, अन्य छोटे देवताओं के बीच, और मानव-आबाद पृथ्वी के विभिन्न हिस्सों में।. उनमें से कुछ जल-निवासी हैं, जो धाराओं या महासागर में रहते हैं; अन्य पृथ्वी-निवासी हैं, जो गुफाओं में रहते हैं।.....

उल्लेखनीय नाग

1।. आदिशेश, जिस पर विष्णु योग निद्र (अंता शायना)] में हैं।

2।. वसुकी, नगाओं के राजा और जो भगवान शिव की गर्दन पर कुंडलित हैं और अमृता को छोड़ने के लिए सामुद्रा मन्थन (दूध के महासागर का मंथन) में माउंट मंदरा को खींचने के लिए रस्सी के रूप में सेवा करने की पेशकश की।...

3।. कलिया, नागों की हिंदू देवी कृष्ण मानसा और साँप-काटने की बहन और वासुकी की बहन द्वारा जीता गया सांप।.

4।. नगाओं के आदिवासी राजा तक्षका।...

5।. महाभारत में अर्जुन की पत्नी उलुपी।...

6।. करकोटका, भारतीय पुराणों में एक नागा राजा, जो मौसम को नियंत्रित करता है, जो निशाड़ा साम्राज्य के पास एक जंगल में रहता था और इंद्र के अनुरोध पर थोड़ा नाला मौसम को नियंत्रित करता था।.

7।. मुकलिंडा, बौद्ध धर्म की एक नागा जिसने अपने ज्ञानोदय के बाद तत्वों से गौतम बुद्ध की रक्षा की।.

8।. पद्मवती, नगी रानी और धरानेंद्र के साथी।.

9।. अपाला, बौद्ध अनुदान में नागा...

10।. श्वे नबे (नागा मेदाव), एक देवी या बर्मी एनिमिस्टिक पुराणों में एक नट आत्मा, जिनके बारे में माना जाता है कि उन्होंने नागा से शादी की थी और उनके जाने के बाद दिल टूटने से उनकी मृत्यु हो गई थी।.

11।. परवतक्ष, उनकी तलवार भूकंप का कारण बनती है और उनकी दहाड़ के कारण गड़गड़ाहट होती है।.

12।. नागा सेरी गमम, जो मलेशिया के पहांग में मीठे पानी की झील तसिक चीनी में रहती है।.
#शेयर....

05/03/2026

Yatra naryastu pujyante ramante tatra devataḥ | Bowing to the Shakti. A moment that needs no words.

रामायण में प्रमुख पात्र और उनकी पत्नियाँ---रामायण भारतीय संस्कृति का महानतम महाकाव्य है, जिसमें धर्म, मर्यादा, प्रेम, त्...
20/10/2025

रामायण में प्रमुख पात्र और उनकी पत्नियाँ

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रामायण भारतीय संस्कृति का महानतम महाकाव्य है, जिसमें धर्म, मर्यादा, प्रेम, त्याग, कर्तव्य और आदर्शों का अद्भुत संगम देखने को मिलता है।
इस पवित्र ग्रंथ में अनेक दिव्य और मानवीय पात्रों ने अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
नीचे रामायण में प्रमुख रूप से वर्णित पात्रों और उनकी पत्नियों का संक्षिप्त विवरण प्रस्तुत है —

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🔱 1. श्रीराम — पत्नी: सीता

भगवान विष्णु के अवतार श्रीराम अयोध्या के राजा दशरथ के ज्येष्ठ पुत्र थे।
उनकी पत्नी सीता जी मिथिला के राजा जनक और रानी सुनयना की पुत्री थीं।
सीता त्याग, पवित्रता और मर्यादा की प्रतिमूर्ति मानी जाती हैं।

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⚔️ 2. लक्ष्मण — पत्नी: उर्मिला

लक्ष्मण, श्रीराम के छोटे भाई और सुमित्रा के पुत्र थे।
उनकी पत्नी उर्मिला, राजा जनक की दूसरी पुत्री और सीता की बहन थीं।
उर्मिला ने लक्ष्मण के वनवास काल में असीम धैर्य और तप का परिचय दिया।

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❤️ 3. भरत — पत्नी: मांडवी

भरत, राजा दशरथ और रानी कैकेयी के पुत्र थे।
उनकी पत्नी मांडवी, जनक के भाई कुशध्वज की पुत्री थीं।
भरत ने श्रीराम के प्रति आजीवन भक्ति और निष्ठा निभाई।

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💫 4. शत्रुघ्न — पत्नी: श्रुतकीर्ति

शत्रुघ्न, सुमित्रा के छोटे पुत्र और लक्ष्मण के सहोदर भाई थे।
उनकी पत्नी श्रुतकीर्ति भी कुशध्वज की पुत्री थीं।

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👑 5. राजा जनक — पत्नी: सुनयना

मिथिला के महान दार्शनिक और ज्ञानी राजा जनक की पत्नी सुनयना थीं।
उन्होंने सीता और उर्मिला का पालन अत्यंत स्नेह और संस्कारों के साथ किया।

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🕉️ 6. वशिष्ठ — पत्नी: अरुंधती

महर्षि वशिष्ठ, अयोध्या के कुलगुरु थे।
उनकी पत्नी अरुंधती ज्ञान, धर्म और पतिव्रता का आदर्श उदाहरण हैं।

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👑 7. राजा दशरथ — पत्नियाँ: कौशल्या, कैकेयी, सुमित्रा

अयोध्या के महाराज दशरथ की तीन पत्नियाँ थीं —
कौशल्या, कैकेयी और सुमित्रा।
इन्हीं से क्रमशः श्रीराम, भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न का जन्म हुआ।

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🔥 8. रावण — पत्नी: मंदोदरी

लंका के राजा रावण महान विद्वान और शिवभक्त थे।
उनकी पत्नी मंदोदरी असुर कुल की होते हुए भी अत्यंत धर्मनिष्ठ और बुद्धिमती थीं।

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🌺 9. विभीषण — पत्नी: सरमा

रावण के छोटे भाई विभीषण की पत्नी का नाम सरमा था।
विभीषण ने धर्म का साथ देते हुए श्रीराम की सेना में सम्मिलित होकर रावण का अंत कराया।

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⚡ 10. मेघनाद (इंद्रजीत) — पत्नी: सुलोचना

रावण के पुत्र मेघनाद, जिन्हें इंद्रजीत कहा गया, एक महान योद्धा थे।
उनकी पत्नी सुलोचना पतिव्रता और आदर्श स्त्री थीं।

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💪 11. कुम्भकर्ण — पत्नी: वज्रज्वाला

रावण के भाई कुम्भकर्ण अपनी विशाल काया और शक्ति के लिए प्रसिद्ध थे।
उनकी पत्नी का नाम वज्रज्वाला था।

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🦁 12. बाली — पत्नी: तारा

वानरराज बाली अपनी वीरता के लिए प्रसिद्ध थे।
उनकी पत्नी तारा बुद्धिमती और नीतिज्ञ थीं, जिन्होंने राम-सुग्रीव के संघर्ष में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

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🐒 13. सुग्रीव — पत्नी: रूमा

वानरराज सुग्रीव, बाली के छोटे भाई थे।
उनकी पत्नी रूमा थीं, जिनका अपहरण बाली ने किया था।
बाद में श्रीराम ने सुग्रीव को न्याय दिलाया।

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👶 14. लव — पत्नी: उर्वशी

श्रीराम और सीता के पुत्र लव की पत्नी का नाम उर्वशी बताया गया है।
वे अयोध्या के राज्य में अपने पिता की परंपरा को आगे बढ़ाने वाले थे।

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👦 15. कुश — पत्नी: नागकन्या कुमुदिनी

लव के जुड़वा भाई कुश की पत्नी नागकन्या कुमुदिनी थीं।
उन्होंने भी धर्म और मर्यादा का पालन करते हुए राज्य को आगे बढ़ाया।

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⚜️ 16. राजा अनरण्य (राम के पूर्वज) — पत्नी: शांता

राजा अनरण्य इक्ष्वाकु वंश के प्रसिद्ध राजा और श्रीराम के पूर्वज थे।
उनकी पत्नी का नाम शांता बताया गया है।
मृत्यु से पूर्व अनरण्य ने रावण को श्राप दिया था कि उनके वंश में जन्मा एक व्यक्ति रावण का अंत करेगा —
वही श्राप आगे चलकर भगवान श्रीराम के रूप में पूरा हुआ।

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🪶 17. ऋष्यश्रृंग — पत्नी: शांता

महर्षि ऋष्यश्रृंग की पत्नी भी शांता थीं, जो राजा दशरथ की पुत्री थीं।
इन्हीं के माध्यम से पुत्रकामेष्टि यज्ञ सम्पन्न हुआ, जिससे श्रीराम का जन्म हुआ।

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🌼 18. अत्रि ऋषि — पत्नी: अनसूया

महान तपस्वी अत्रि ऋषि की पत्नी अनसूया पतिव्रता और मातृत्व की मूर्ति थीं।
अनसूया माता ने सीता को वनवास काल में शिक्षा और आशीर्वाद दिया।

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🔮 19. विश्वा ऋषि — पत्नी: कैकसी

विश्वा ऋषि (विश्रवा) रावण, कुम्भकर्ण और विभीषण के पिता थे।
उनकी पत्नी कैकसी असुरकुल की कन्या थीं।

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🌑 20. सुमाली — पत्नी: केतुमती

सुमाली लंका का असुर राजा था और रावण का नाना था।
उसकी पत्नी का नाम केतुमती था।
इन्हीं के वंश में रावण, कुम्भकर्ण और विभीषण का जन्म हुआ।

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✨ निष्कर्ष

रामायण के इन सभी पात्रों ने अपने-अपने स्थान पर धर्म, कर्तव्य और आदर्शों की मर्यादा को निभाया।
उनकी पत्नियाँ भी समर्पण, सहनशीलता और त्याग की प्रतिमूर्ति रहीं।
इन्हीं के संयोजन से रामायण केवल एक कथा नहीं, बल्कि मानव जीवन का मार्गदर्शन बन गई है।

 #तेजोमहालयइतिहास में पढ़ाया जाता है कि ताजमहल का निर्माण कार्य 1632 में शुरू और लगभग 1653 में इसका निर्माण कार्य पूर्ण ...
26/09/2025

#तेजोमहालय
इतिहास में पढ़ाया जाता है कि ताजमहल का निर्माण कार्य 1632 में शुरू और लगभग 1653 में इसका निर्माण कार्य पूर्ण हुआ।

अब सोचिए कि जब मुमताज का इंतकाल 1631 में हुआ तो फिर कैसे उन्हें 1631 में ही ताजमहल में दफना दिया गया, जबकि ताजमहल तो 1632 में बनना शुरू हुआ था। यह सब मनगढ़ंत बातें हैं जो अंग्रेज और मुस्लिम इतिहासकारों ने 18वीं सदी में लिखी।

दरअसल 1632 में हिन्दू मंदिर को इस्लामिक लुक देने का कार्य शुरू हुआ। 1649 में इसका मुख्य द्वार बना जिस पर कुरान की आयतें तराशी गईं। इस मुख्य द्वार के ऊपर हिन्दू शैली का छोटे गुम्बद के आकार का मंडप है और अत्यंत भव्य प्रतीत होता है। आस पास मीनारें खड़ी की गई और फिर सामने स्थित फव्वारे को फिर से बनाया गया।

जे ए माॅण्डेलस्लो ने #मुमताज की मृत्यु के 7 वर्ष पश्चात Voyages and Travels into the East Indies नाम से निजी पर्यटन के संस्मरणों में आगरे का तो उल्लेख किया गया है किंतु ताजमहल के निर्माण का कोई उल्लेख नहीं किया।
टाॅम्हरनिए के कथन के अनुसार 20 हजार मजदूर यदि 22 वर्ष तक ताजमहल का निर्माण करते रहते तो माॅण्डेलस्लो भी उस विशाल निर्माण कार्य का उल्लेख अवश्य करता।

ताज के नदी के तरफ के दरवाजे के लकड़ी के एक टुकड़े की एक अमेरिकन प्रयोगशाला में की गई कार्बन जांच से पता चला है कि लकड़ी का वो टुकड़ा शाहजहां के काल से 300 वर्ष पहले का है, क्योंकि ताज के दरवाजों को 11वीं सदी से ही मुस्लिम आक्रामकों द्वारा कई बार तोड़कर खोला गया है और फिर से बंद करने के लिए दूसरे दरवाजे भी लगाए गए हैं।
ताज और भी पुराना हो सकता है। असल में ताज को सन् 1115 में अर्थात शाहजहां के समय से लगभग 500 वर्ष पूर्व बनवाया गया था।

ताजमहल के गुम्बद पर जो अष्टधातु का कलश खड़ा है वह त्रिशूल आकार का पूर्ण कुंभ है। उसके मध्य दंड के शिखर पर नारियल की आकृति बनी है। नारियल के तले दो झुके हुए आम के पत्ते और उसके नीचे कलश दर्शाया गया है। उस चंद्राकार के दो नोक और उनके बीचोबीच नारियल का शिखर मिलाकर त्रिशूल का आकार बना है।

हिन्दू और बौद्ध मंदिरों पर ऐसे ही कलश बने होते हैं। कब्र के ऊपर गुंबद के मध्य से अष्टधातु की एक जंजीर लटक रही है। शिवलिंग पर जल सिंचन करने वाला सुवर्ण कलश इसी जंजीर पर टंगा रहता था। उसे निकालकर जब शाहजहां के खजाने में जमा करा दिया गया तो वह जंजीर लटकी रह गई। उस पर लाॅर्ड कर्जन ने एक दीप लटकवा दिया, जो आज भी है।

कब्रगाह को महल क्यों कहा गया? मकबरे को महल क्यों कहा गया? क्या किसी ने इस पर कभी सोचा, क्योंकि पहले से ही निर्मित एक महल को कब्रगाह में बदल दिया गया। कब्रगाह में बदलते वक्त उसका नाम नहीं बदला गया। यहीं पर शाहजहां से गलती हो गई। उस काल के किसी भी सरकारी या शाही दस्तावेज एवं अखबार आदि में ‘ताजमहल’ शब्द का उल्लेख नहीं आया है। ताजमहल को ताज-ए-महल समझना हास्यास्पद है।

‘महल’ शब्द मुस्लिम शब्द नहीं है। अरब, ईरान, अफगानिस्तान आदि जगह पर एक भी ऐसी मस्जिद या कब्र नहीं है जिसके बाद महल लगाया गया हो।

यह भी गलत है कि मुमताज के कारण इसका नाम मुमताज महल पड़ा, क्योंकि उनकी बेगम का नाम था #मुमता -उल-जमानी। यदि मुमताज के नाम पर इसका नाम रखा होता तो ताजमहल के आगे से मुम को हटा देने का कोई औचित्य नजर नहीं आता।

विंसेंट स्मिथ अपनी पुस्तक 'Akbar the Great Moghul' में लिखते हैं, बाबर ने सन् 1530 में आगरा के वाटिका वाले महल में अपने उपद्रवी जीवन से मुक्ति पाई। वाटिका वाला वो महल यही ताजमहल था। यह इतना विशाल और भव्य था कि इसके जितना दूसरा कोई भारत में महल नहीं था। बाबर की पुत्री गुलबदन ‘ #हुमायूंनामा’ नामक अपने ऐतिहासिक वृत्तांत में ताज का संदर्भ ‘रहस्य महल’ (Mystic House) के नाम से देती है।

ताजमहल का निर्माण राजा परमर्दिदेव के शासनकाल में 1155 अश्विन शुक्ल पंचमी, रविवार को हुआ था। अतः बाद में मुहम्मद गौरी सहित कई मुस्लिम आक्रांताओं ने ताजमहल के द्वार आदि को तोड़कर उसको लूटा। यह महल आज के ताजमहल से कई गुना ज्यादा बड़ा था और इसके तीन गुम्बद हुआ करते थे। हिन्दुओं ने उसे फिर से मरम्मत करके बनवाया, लेकिन वे ज्यादा समय तक इस महल की रक्षा नहीं कर सके।

वास्तुकला के विश्वकर्मा वास्तुशास्त्र नामक प्रसिद्ध ग्रंथ में शिवलिंगों में ‘तेज-लिंग’ का वर्णन आता है। ताजमहल में ‘तेज-लिंग’ प्रतिष्ठित था इसीलिए उसका नाम ‘तेजोमहालय’ पड़ा था।

शाहजहां के समय यूरोपीय देशों से आने वाले कई लोगों ने भवन का उल्लेख ‘ताज-ए-महल’ के नाम से किया है, जो कि उसके शिव मंदिर वाले परंपरागत संस्कृत नाम ‘तेजोमहालय’ से मेल खाता है। इसके विरुद्ध शाहजहां और औरंगजेब ने बड़ी सावधानी के साथ संस्कृत से मेल खाते इस शब्द का कहीं पर भी प्रयोग न करते हुए उसके स्थान पर पवित्र मकबरा शब्द का ही प्रयोग किया है।

ओक के अनुसार अनुसार हुमायूं, अकबर, मुमताज, एतमातुद्दौला और सफदरजंग जैसे सारे शाही और दरबारी लोगों को हिन्दू महलों या मंदिरों में दफनाया गया है।

ताजमहल तेजोमहल शिव मंदिर है - इस बात को स्वीकारना ही होगा कि ताजमहल के पहले से बने ताज के भीतर मुमताज की लाश दफनाई गई न कि लाश दफनाने के बाद उसके ऊपर ताज का निर्माण किया गया। ‘ताजमहल’ शिव मंदिर को इंगित करने वाले शब्द ‘तेजोमहालय’ शब्द का अपभ्रंश है। तेजोमहालय मंदिर में अग्रेश्वरमहादेव प्रतिष्ठित थे। देखने वालों ने अवलोकन किया होगा कि तहखाने के अंदर कब्र वाले कमरे में केवल सफेद संगमरमर के पत्थर लगे हैं जबकि अटारी व कब्रों वाले कमरे में पुष्प लता आदि से चित्रित चित्रकारी की गई है।

इससे साफ जाहिर होता है कि मुमताज के मकबरे वाला कमरा ही शिव मंदिर का गर्भगृह है। संगमरमर की जाली में 108 कलश चित्रित उसके ऊपर 108 कलश आरूढ़ हैं, हिन्दू मंदिर परंपरा में 108 की संख्या को पवित्र माना जाता है।

तेजोमहालय उर्फ ताजमहल को नागनाथेश्वर के नाम से जाना जाता था, क्योंकि उसके जलहरी को नाग के द्वारा लपेटा हुआ जैसा बनाया गया था। यह मंदिर विशालकाय महल क्षेत्र में था। आगरा को प्राचीनकाल में अंगिरा कहते थे, क्योंकि यह ऋषि अंगिरा की तपोभूमि थी। अंगिरा ऋषि भगवान शिव के उपासक थे।

बहुत प्राचीन काल से ही आगरा में 5 शिव मंदिर बने थे। यहां के निवासी सदियों से इन 5 शिव मंदिरों में जाकर दर्शन व पूजन करते थे।

लेकिन अब कुछ सदियों से #बालकेश्वर, #पृथ्वीनाथ, #कैलाश और #राजराजेश्वर नामक केवल 4 ही शिव मंदिर शेष हैं। 5वें शिव मंदिर को सदियों पूर्व कब्र में बदल दिया गया। स्पष्टतः वह 5वां शिव मंदिर आगरा के इष्टदेव #नागराज_अग्रेश्वर_महादेव_नागनाथेश्वर ही हैं, जो कि तेजोमहालय मंदिर उर्फ ताजमहल में प्रतिष्ठित थे।

यह लेख #श्री_पुरुषोत्तम_नागेश_ओक के अनुसंधान पर आधारित है।

 #प्रकाश_की_गति*             बचपन से ही हमें स्कूलों में पढ़ाया गया है कि प्रकाश की गति खोज...... डेनमार्क के खगोलविद ओल...
25/09/2025

#प्रकाश_की_गति*

बचपन से ही हमें स्कूलों में पढ़ाया गया है कि प्रकाश की गति खोज...... डेनमार्क के खगोलविद ओले क्रिस्टेंसेन रोमर ने की थी.

साथ ही कहा जाता है कि... रोमर से पहले गैलीलियो और न्यूटन जैसे महान वैज्ञानिकों ने काफी प्रयास के बाद भी प्रकाश के वेग को नहीं जान पाए थे.

हालांकि, गैलीलियो इतना तो समझ गए थे कि ब्रह्मांड में प्रकाश की गति सबसे तेज है लेकिन वे ये कभी नहीं जान पाए कि वास्तव में प्रकाश की गति है कितनी ???

अंततः.... रोमर ने पहली बार 1676 में प्रकाश का वेग निर्धारित किया था.

जबकि, वास्तविकता काफी चौंकाने वाली है.

क्योंकि, आधुनिक समय में महर्षि सायण, जो वेदों के महान भाष्यकार थे , ने 14वीं सदी में प्रकाश की गति की गणना कर डाली थी...
जिसका आधार ऋग्वेद के प्रथम मंडल के 50 वें सूक्त का चौथा श्लोक था.

असल में ऋग्वेद के प्रथम मंडल के 50 वें सूक्त का चौथा श्लोक कहता है....

तरणिर्विश्वदर्शतो ज्योतिष्कृदसि सूर्य ।
विश्वमा भासि रोचनम् ॥
-ऋग्वेद 1. 50 .4

अर्थात... हे सूर्य...
तुम तीव्रगामी एवं सर्वसुन्दर तथा प्रकाश के दाता और जगत् को प्रकाशित करने वाले हो.

उपरोक्त श्लोक पर टिप्पणी करते हुए महर्षि सायण ने निम्न श्लोक प्रस्तुत किया था...

तथा च स्मर्यते योजनानां सहस्त्रं द्वे द्वे शते द्वे च योजने एकेन निमिषार्धेन क्रममाण नमोऽस्तुते॥
-सायण ऋग्वेद भाष्य 1. 50 .4

अर्थात, आधे निमेष में 2202 योजन का मार्गक्रमण करने वाले प्रकाश तुम्हें नमस्कार है.

इस उपरोक्त श्लोक से हमें प्रकाश के आधे निमिष में 2202 योजन चलने का पता चलता है.

अब हम समय की ईकाई निमिष तथा दूरी की ईकाई योजन को आधुनिक वर्तमान इकाईयों में परिवर्तित कर सकते है.

किन्तु, उससे पूर्व हम प्राचीन समय तथा दूरी की इन इकाईयों के मान को जान लेते हैं.

इस बारे में हमारी मनुस्मृति कहती है...

निमेषे दश चाष्टौ च काष्ठा त्रिंशत्तु ताः कलाः |
त्रिंशत्कला मुहूर्तः स्यात् अहोरात्रं तु तावतः || ........मनुस्मृति 1-64

इस तरह मनुस्मृति 1-64 के अनुसार
पलक झपकने के समय को 1 निमिष कहा जाता है !
18 निमीष = 1 काष्ठ;
30 काष्ठ = 1 कला;
30 कला = 1 मुहूर्त;
30 मुहूर्त = 1 दिन व् रात (लगभग 24 घंटे )

अतः एक दिन (24 घंटे) में निमिष हुए :
24 घंटे = 30x30x30x18= 4,86,000 निमिष

जबकि, आधुनिक गिनती की इकाई के हिसाब से 24 घंटे में सेकेंड हुए ...
24x60x60 = 86,400 सेकंड

इस तरह....

86,400 सेकंड =4,86,000 निमिष

अतः 1 सेकंड में निमिष हुए :

1 निमिष = 86400 /486000 = 0.17778 सेकंड

अंततः.... 1/2 निमिष = 0.17778/2 = 0.08889 सेकंड

* इसी तरह अगर हम योजन की बात करें तो....
श्री मद्भागवतम 3.30.24, 5.1.33, 5.20.43 आदि के अनुसार

1 योजन = 8 मील लगभग

तो, 2202 योजन = 8 x 2202 = 17,616 मील

अब हम अपने ऋग्वेद में उल्लेखित प्रकाश की गति को यदि आधुनिक गणना पद्धति में बिठाते हैं तो... हम पाते हैं कि....

सूर्य प्रकाश 1/2 (आधे) निमिष में 2202 योजन चलता है.... अर्थात,
0.08889 सेकंड में 17, 616 मील चलता है.

अर्थात, 0.08889 सेकंड में प्रकाश की गति = 17,616 मील

तो, 1 सेकेंड में = 17,616 / 0.08889 = 1,98,177 मील (3,18,934.966 किलोमीटर) लगभग

तथा, हैरानी की बात है कि आज की आधुनिकतम विज्ञान भी प्रकाश गति को.... 1,86,000 मील (3,18,934.966 किलोमीटर) प्रति सेकंड ही बताती है.

** कहने का मतलब है कि.... खगोल विज्ञान के जिस ज्ञान को आधुनिकतम विज्ञान ने 1676 में खोजा और बताया ...
वो ज्ञान तो हमारे ऋग्वेद में हजारों लाखों साल पहले से ही उल्लेखित है.

इसका मतलब हुआ कि.... जिस समय ये पश्चिमी सभ्यता के लोग जंगलों में नंग धड़ंग रहते थे....
और, चूहे बिल्ली आदि मार कर खाया करते थे....

उस समय हमारे विद्वान ऋषि-मुनि खगोलशास्त्र और विज्ञान में अंतरिक्ष की गहराइयाँ एवं प्रकाश की गति नाप रहे थे...!

क्योंकि, हमें ये नहीं भूलना चाहिए कि ऋग्वेद को निर्विवाद रूप से मानव सभ्यता का सबसे प्राचीन ग्रंथ माना जाता है.

तो, हमारी ऐसी अनमोल उपलब्धियों के कारण हमें अपने धर्मग्रंथों तथा अपने सनातन धर्म पर आखिर क्यों गर्व नहीं होना चाहिए ????

जय सनातन संस्कृति।

...... साभार..R.D. Amrute

जल जीवन है । सनातन धर्म में पुजनीय है।इसका संरक्षण आवश्यक है।🙏🙏🙏साभार 🙏 महेश कुमार मिश्र ‘मधुकर’‘जल’ की उत्पत्ति कैसे हु...
24/01/2025

जल जीवन है । सनातन धर्म में पुजनीय है।
इसका संरक्षण आवश्यक है।🙏🙏🙏

साभार 🙏 महेश कुमार मिश्र ‘मधुकर’

‘जल’ की उत्पत्ति कैसे हुई? इस प्रश्न के उत्तर के लिए हमें ‘पुराणों’ का मंथन करना पड़ेगा। पुराणों का इसलिए क्योंकि ‘पुराण’ ही वे ग्रन्थ हैं जिनमें जगत् की सृष्टि-विषयक प्रश्न पर विशद रूप से विचार किया गया है। लगभग सभी पुराण इस मत पर स्थिर हैं कि जगत् की सृष्टि इस क्रम में हुई है-

(1) प्रधान (प्रकृति) और पुरुष के संयोग के कारण सर्वप्रथम ‘महत्तत्त्व’ उत्पन्न हुआ।
(2) महत्तत्त्व सात्विक, राजस और तामस – तीन प्रकार का है। यह ‘प्रधान’ से आवृत्त (ढँका हुआ) रहता है।
(3) महत्तत्त्व से वैकारिक (सात्विक), तैजस (राजस) और भूतादि रूप (तामस) अहंकार उत्पन्न हुआ।
(4) यह अहंकार त्रिगुणात्मक (सात्विक, राजस और तामस) होने के कारण ‘भूत’ (पंचतत्व) और इन्द्रिय आदि का जनक है।
(5) यह अहंकार महत्तत्व से व्याप्त रहता है।
👉शब्द (6) तामस अहंकार के विकृत होने पर ‘शब्द-तन्मात्रा’ और ‘शब्द’ गुण वाले आकाश की उत्पत्ति हुई।
👉स्पर्श (7) यह शब्द तन्मात्रा वाला ‘आकाश’ तामस अहंकार से व्याप्त होने के कारण ‘स्पर्श तन्मात्रा’ की उत्पत्ति का कारण बना। अर्थात् स्पर्श गुण वाला ‘वायु’ उत्पन्न हुआ।
👉रुप(8) वायु आकाश से ‘आवृत्त’ रहता है। अतः इन दोनों (शब्द और स्पर्श तन्मात्राओं) के संयोग से ‘रूप तन्मात्रा’ तथा रूप गुण वाले ‘तेज’ की उत्पत्ति हुई।
👉 रस (9) ‘तेज’ स्पर्श तन्मात्रा से आवृत्त रहता है। अतः आकाश, वायु और तेज के संयोग से ‘रस तन्मात्रा’ तथा रस गुण वाले ‘जल’ की सृष्टि हुई।
👉गंध (10) रस तन्मात्रा तेज से आवृत्त रहती है। अतः उसमें जब विकार हुआ तो आकाश, वायु, तेज और जल के संयोग से ‘गन्ध तन्मात्रा’ तथा गन्ध गुण वाली पृथ्वी की उत्पत्ति हुई।

इसमे शब्द ''औम'' ही पंचभूत तथा सृष्टि को जन्म दिया।

विशेषः

इस सृष्टि क्रम में ध्यान देने योग्य बात यह है कि ये शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध नामक तन्मात्राएँ, आकाश, वायु, तेज, जल और पृथ्वी की क्रमशः ‘गुण’ मात्र हैं, इनमें कोई विशेष भाव नहीं है और इनका सुख-दुख तथा मोह रूप से अनुभव नहीं हो सकता और ये शान्त, घोर तथा गूढ़ नहीं हैं। अतः ये अविशेष हैं। उक्त पौराणिक सृष्टि क्रम, तुलना करने पर आधुनिक-विज्ञान की कसौटी पर पूर्ण रूप से ‘खरा’ उतरता है।

आधुनिक भौतिक-विज्ञान के अनुसार ‘जल’ की उत्पत्ति ‘हाईड्रोजन+ऑक्सीजन’ इन दो गैसों पर विद्युत की प्रक्रिया के कारण हुई है। पौराणिक सिद्धान्त के अनुसार ‘वायु’ और ‘तेज’ की प्रतिक्रिया के कारण ‘जल’ उत्पन्न हुआ है। यदि वायु को गैसों का समुच्चय एवं तेज को विद्युत माना जाये तो इन दोनों ही सिद्धांतों में कोई अन्तर नहीं है। अतः जल की उत्पत्ति का पौराणिक सिद्धांत पूर्णतया विज्ञान-सम्मत सिद्ध होता है।

आधुनिक वैज्ञानिक आकाश, वायु तेज, जल और पृथ्वी को तत्व नहीं मानते। न मानने का कारण ‘तत्व’ संबंधी अवधारणा है। तत्व के सम्बन्ध में पौराणिक अवधारणा यह है कि जिसमें ‘तत्’ (अर्थात् पुरुष/विष्णु/ब्रह्म) व्याप्त हो, वह ‘तत्व’ कहलाता है। आधुनिक विज्ञान के अनुसार ‘तत्व’ केवल मूल पदार्थ (Element) होता है। वस्तुतः ‘तत्त्व’ और ‘तत्व’ में बहुत अन्तर है। ‘तत्त्व’ वास्तविक रूप में एक ‘भूत’ है। किन्तु तत्व या Element एक पदार्थ मात्र है। अतः यह भेद मात्र अवधारणा के कारण उत्पन्न हुआ है।

इस सम्बन्ध में ‘विष्णु पुराण’ का निम्नलिखित श्लोक दृष्टव्य है-

‘पृथिव्यापस्तथा तेजो वायुराकाश एव च।
सर्वेन्द्रियान्तःकरणं पुरुषाख्यं हि यज् जगत्।।’
अर्थात्- पृथिवी, आपः (जल), तेज, वायु, आकाश, समस्त इन्द्रियाँ और अन्तःकरण इत्यादि जितना भी यह जगत् (गतिशील संसार है, सब ‘पुरुष रूप’ है।
-श्री विष्णु पुराण/प्रथम अंश/अ.-2/श्लोक -68

महर्षि पाराशर का कथन है कि सृष्टि की रचना में भगवान् तो केवल निमित्त-मात्र हैं (क्योंकि) उसका प्रधान कारण तो ‘सृज्य पदार्थों’ की शक्तियाँ ही हैं। वस्तुओं की रचना में निमित्त मात्र को छोड़कर और किसी बात की आवश्यकता भी नहीं है, क्योंकि वस्तु तो अपनी ही (परिणाम) शक्ति से ‘वस्तुता’ (स्थूलरूपता) को प्राप्त हो जाती है-

‘निमित्तमात्रमेवासौ सृ्ज्यानां सर्गकर्मणि।
प्रधान कारणीभूता यतो वै सृज्यशक्तयः।।
निमित्त मात्रं मुक्त्वैवं नान्यक्तिञ्चिदपेक्षते।
नीयते तपतां श्रेष्ठ स्वशक्त्या वस्तु वस्तुताम्।।’

‘जल’ की उत्पत्ति के संबंध में एक अन्य पुरातन- अवधारणा भी विचारणीय है। लगभग सभी पुराणों और स्मृतियों में यह श्लोक (थोड़े-बहुत पाठभेद से) दिया रहता है जो इस अर्थ का वाचक है कि जल की उत्पत्ति ‘नर’ (पुरुष = परब्रह्म) से हुई है अतः उसका (अपत्य रूप में) प्राचीन नाम ‘नार’ है, चूंकि वह (नर) ‘नार’ में ही निवास करता है, अत: उस नर को ‘नारायण’ कहते हैं-

आपो नारा इति प्रोक्ता, आपो वै नरसूनवः।
अयनं तस्य ताः पूर्वं तेन नारायणः स्मृतः।।

-ब्रह्मपुराण/अ-1/श्लोक-38

विष्णुपुराण के अनुसार इस समग्र संसार के सृष्टि कर्ता ‘ब्रह्मा’ का सबसे पहला नाम नारायण है। दूसरे शब्दों में में भगवान का ‘जलमय रूप’ ही इस संसार की उत्पत्ति का कारण है-

जल रूपेण हि हरिः सोमो वरूण उत्तमः।
अग्नीषोममयं विश्वं विष्णुरापस्तु कारणम्।।

-अग्निपुराण /अ.-64/श्लोक 1-2

‘हरिवंश पुराण’ भी इसकी पुष्टि करता है कि ‘आपः’ सृष्टिकर्ता ब्रह्मा हैं। ‘हरिवंश’ में कहा गया है कि स्वयंभू भगवान् नारायण ने नाना प्रकार की प्रजा उत्पन्न करने की इच्छा से सर्वप्रथम ‘जल’ की ही सृष्टि की। फिर उस जल में अपनी शक्ति का आधीन किया जिससे एक बहुत बड़ा ‘हिरण्यमय-अण्ड’ प्रकट हुआ। वह अण्ड दीर्घकाल तक जल में स्थित रहा। उसी में ब्रह्माजी प्रकट हुए-

ततः स्वयंभूर्भगवान् सिसृक्षुर्विविधाः प्रजाः।
अप एव ससर्जादौ तासु वीर्यमवासृजत्।।35।।
हिरण्य वर्णभभवत् तदण्डमुदकेशयम्।
तत्रजज्ञे स्वयं ब्रह्मा स्वयंभूरिति नः श्रुतम्।। 37।।

इस ‘हिरण्यमय अण्ड’ के दो खण्ड हो गये। ऊपर का खण्ड ‘द्युलोक’ कहलाया और नीचे का ‘भूलोक’। दोनों के बीच का खाली भाग ‘आकाश’ कहलाया। स्वयं ब्रह्माजी ‘आपव’ कहलाये-

‘उच्चावचानि भूतानि गात्रेभ्यस्तस्य ज्ञज्ञिरे।
आपवस्य प्रजासर्गें सृजतो ही प्रजापतेः।।49।।’

अर्थात्- इस प्रकार प्रजा की सृष्टि रचते हुए उन ‘आपव’ (अर्थात् जल में प्रकट हुए) प्रजापति ब्रह्मा के अंगों में से उच्च तथा साधारण श्रेणी के बहुत से प्राणी प्रकट हुए।

-हरिवंश/हरिवंश पर्व/प्रथम अध्याय

‘जल’ केवल ‘नारायण’ ही नहीं, ब्रह्मा विष्णु और महेश (रूद्र) तीनों है।

‘वायु पुराण’ के अनुसार जल शिव की अष्टमूर्तियों में से एक है। दूसरे शब्दों में ‘रूद्र’ की उपासना के लिए जो आठ प्रतीक निर्धारित हैं उनमें से एक जल है-

ततोSभिसृष्टास्तनव एषां नाम्ना स्वयंभुवा।
सूर्यो मही जलं वह्निर्वायुराकाशमेव च।।
दीक्षितो ब्राह्मणश्चन्द्र इत्येते ब्रह्मघातवः।
तेषु पूज्यश्च वन्द्यः स्याद् रुद्रस्तान्न हिनस्तिवै।।

ये आठ प्रतीक क्रमशः सूर्य, मही, जल, वह्नि(पशुपति), वायु, आकाश, दीक्षित ब्राह्मण तथा चन्द्र हैं। रूद्र की जो आठ मूर्तियाँ निश्चित हैं, उनकी पूजा (क्रमशः) सूर्य (रूद्र), मही (शर्व), जल (भव), वह्नि (पशुपति), वायु (ईशान), आकाश (भीम), दीक्षित ब्राह्मण (उग्र) तथा चन्द्र (महादेव) में करने से रूद्र कभी भी उपासक को हानि नहीं पहुँचाते।

इनमें शिव का जो ‘रसात्मक’ रूप है वह ‘भव’ कहलाता है और जल में निवास करता है। इसलिए ‘भव्’ और ‘जल’ से सम्पूर्ण भूत समूह (प्राणी) उत्पन्न होता है और वह सबको उत्पन्न करता है। अतः ‘भवन-भावन-सम्बंध’ होने के कारण ‘जल जीवों का संभव’ कहलाता है-

यस्माद्भवन्ति भूतानि ताम्यस्ता भावयन्ति च।
भवनाद्भवनाच्चैव भूतानां संभवः स्मृतः।।22।।

इसी कारण कहा गया है कि जल में मल-मूत्र नहीं त्यागना चाहिए। न थूकना चाहिए। नग्न होकर स्नान नहीं करना चाहिए। जल में मैथुन नहीं करना चाहिए। शिरः स्नान नहीं करना चाहिए। स्थिर या बहते हुए जल के प्रति कोई अप्रीतिजनक बात नहीं कहनी चाहिए। पवित्र या अपवित्र शरीर के स्पर्श से जल कभी-भी दूषित नहीं होता। किन्तु मटमैले, विरस, दुर्गन्धित और थोड़े जल का उपयोग नहीं करना चाहिए।

समुद्र जल का उत्पत्ति स्थान है। इसलिए जलराशि समुद्र की कामना करती है। जल समुद्र को पाकर पवित्र और अमृतमय हो जाता है। बहते हुए जल को रोकना नहीं चाहिए। क्योंकि वह समुद्र में जाना चाहता है। इस प्रकार ‘जल तत्त्व’ को जानकर जो जल में रहता है, उसकी ‘हिंसा’ भव-देवता नहीं करते हैं।

भगवान् महादेव ही अमृतात्मा जलमय चन्द्रमा कहे जाते हैं। (महादेवोSमृतात्माSसौ द्यृम्मयश्चन्द्रमाः स्मृतः)।

जलरूप भव की पत्नि ‘उषा’ और पुत्र ‘उशना’ माने गये हैं- भवस्य या द्वितीया तु तनुरापः स्मृता तु वै। तस्योषाSन्न स्मृता पत्नी पुत्रश्चाप्युशना स्मृतः।।

-वायुपुराण/अ.-27/श्लोक-50

पुराणों और स्मृतियों के अनुसार ‘जल’ आधिदैविक, आध्यात्मिक और आधिभौतिक तीनों रूपों में विद्यमान है।

वेदों में जल को ‘आपो देवता’ कहा गया है। ऋग्वेद, यजुर्वेद और अथर्ववेद – इन तीनों संहिताओं में, यद्यपि जल के लिए पूरे एक सौ पर्यायवाची शब्द प्रयुक्त हुए हैं, तथापि सर्वाधिक प्रयोग ‘आपः’ शब्द का हुआ है, इसका करण हैवस्तुत: आपः शब्द ‘आप्’ धातु का विकसित रूप है। आप् धातु का प्रयोग व्यापक होने, फैलने एवं सर्वत्र विद्यमान रहने के अर्थ में किया जाता है। दूसरे शब्दों में, जो सर्वव्यापी है, जो फैल सकता है और जो सर्वत्र विद्यमान है, वह ‘आपः’ कहलाता है। ये तीनों लक्षण क्रमशः ब्रह्मा, विष्णु और महेश के वाचक हैं। अतः वेदों में यदि जल को ‘आपो देवता’ कहा गया है तो ठीक ही है। वह पूर्ण उपयुक्त है। साथ ही उपवृंहण करने पर पुराणों की विचारधारा से भी मेल खाता है।

थोड़ा-सा हम ‘देवता’ शब्द पर भी विचार कर लें। क्योंकि पाश्चात्य भाष्यकारों ने वैदिक-देवताओं के प्रति अपने जो विचार व्यक्त किए हैं, उनके कारण वैदिक देवता बहुत ही हल्के होकर रह गये हैं। देवता ही क्यों, ‘वेद’ तक ‘सामान्य धर्मग्रन्थ’ बनकर रह गये हैं। आज के लोग जब ‘वेदों’ को पढ़ते हैं तो उन्हें वेदों में कोई खास बात नजर नहीं आती। पाश्चात्यों के अनुकरण पर (उन्हें भी) वेदों में केवल यज्ञ-उपासना, बलि और हिंसा ही अधिक दिखायी देती है. वेदों के मंत्र-ऋक्, यजुष्, साम और अथर्व की बजाय उन्हें घुमन्तू कबीले के प्राचीन-गीत अधिक मालूम पड़ते हैं। वेदों की ‘देवता’ पर उनका ध्यान ही नहीं जाता। और यह सब केवल ‘देवता’ शब्द के कारण हुआ है जिसे प्राचीन भारतवासियों के अलावा, अन्य कोई भी नहीं समझ पाया।

वस्तुतः ‘देवता’ शब्द उस ईश्वरीय शक्ति या रूप के लिए प्रयुक्त होता है, जिसका सृष्टि के विकास, उसकी स्थिरता तथा संहार पर प्रभाव पड़ता है और जिसका इन तीनों क्रियाओं में ‘सीधा दखल’ रहता है।

महर्षि वाल्मीकि ने अपनी ‘महारामायण’ (योग वासिष्ठ) में कहा है कि स्थावर (पर्वत आदि), जंगम (प्राणिवर्ग), आकाश, जल, अग्नि, वायु इत्यादि में ‘शुद्ध चेतन’ नित्य रूप से विद्यमान रहता है। वह न कभी उदित होता है और न अस्त।

शुद्धं हि चेतनं नित्यं नोदेति न च शाम्यति।
स्थावरे जंगमे व्योम्नि शैलेSर्ग्नो पवने स्थितम्।।

-योग वसिष्ठ/उत्पत्ति प्रकरण/सर्ग-55/3

पाणिनी के अष्टाध्यायी (3/3/121) के अनुसार ‘दिवु’ (दिवादिगण) धातु से ‘दीव्यति द्योतते इति देवः’ (इस अर्थ में) ‘हलश्च’ सूत्र से ‘घ’ प्रत्यय करके ‘देव’ शब्द बनता है। पुनः उसी अर्थ में ‘तल्’ प्रत्यय करके ‘देवता’ शब्द की सिद्धि होती है।
‘वेद’ के ‘निरुक्त’ नामक अंग के भाष्यकार महर्षि यास्क के अनुसार “यो देवः सा देवता” (7/4/2) अर्थात् जो दीप्तिमान (या प्रभावशाली) है वह देवता है। यास्क ने कहा है कि देवता शब्द ‘दा’‘दीप’ और ‘द्युत्’ धातुओं से बना है।

(देवो दानाद् वा दीपनाद वा द्योतनाद् वा निरुक्त, दैवत काण्ड 7/4/2)

अर्थात्- जो ऐश्वर्य प्रदान करता है (ददाति ह्यसौ ऐश्वर्याणि) जो स्वयं तेजोमय होने के कारण दूसरों के प्रकाशित करता है ( दीपयति ह्यसौ तेजोमयत्वात्) अथवा स्वयं प्रकाशमान होने के कारण दूसरों को प्रकाशित करता है (द्योतनाद वा)।

यहाँ ‘देवता’ शब्द की विस्तृत व्याख्या करना हमारा ‘अभीष्ट’ नहीं है। संक्षेप में यही समझ लेना चाहिए कि वैदिक ऋषियों ने जिस शक्ति या पदार्थ की ‘देवता’रूप में अनुभूति की है, उसे ही उन्होंने उस मंत्र (ऋचा, यजुष् या साम) का ‘देवता’ बताया है।

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