15/04/2022
#योगवाशिष्ठ_महारामायण- उत्पत्ति प्रकरण ( भाग 03)
// ज्ञान से ही परासिद्धि या परमात्मप्राप्ति का प्रतिपादन तथा ज्ञान के उपायों में सत्संग एवं सत्- शास्त्रों के स्वाध्याय की प्रशंसा //________________________
श्री वशिष्ठ जी कहते हैं- रघुनंदन! परब्रह्म परमात्मा देवताओं के भी देवता हैं। उनके ज्ञान से ही मोक्ष की प्राप्ति होती है, सकाम कर्मों के अनुष्ठान से नहीं। संसार- बंधन की निवृत्ति या मोक्ष की प्राप्ति के लिए ज्ञान ही साधन है, ज्ञान के अतिरिक्त सकाम कर्म आदि का इसमें कोई भी उपयोग नहीं है। क्योंकि मृगतृष्णा में होने वाले जल के भ्रम का निवारण करने के लिए ज्ञान का ही उपयोग देखा गया है- ज्ञान से ही उस भ्रम की निवृत्ति होती है, किसी कर्म से नहीं। सत्संग तथा सत्-शास्त्रों के स्वाध्याय में तत्पर होना ही ब्रह्म ज्ञान की प्राप्ति में हेतु है वह स्वाभाविक साधन ही मोह जाल का नासक होता है।यह परमात्मा सतस्वरुप ही है ऐसे ज्ञान मात्र से ही जीव के दुख का निवारण होता है तथा वह जीवन मुक्त अवस्था को प्राप्त होता है।
श्री रामचंद्र जी ने पूछा गुरुदेव सबके आत्मस्वरूप इन परमात्मा के ज्ञान मात्र से कष्टप्रद जन्म-मरण आदि फिर कभी बाधा नहीं देते अतः बताइए यह महान देवाधिदेव परब्रह्म परमात्मा किस उपाय से शीघ्र प्राप्त होते हैं? श्री वशिष्ठ! जी ने कहा श्री राम! अपने पौरुष जनित प्रयत्न से विकास को प्राप्त हुए विवेक के द्वारा उन परमात्मदेव का यथार्थ ज्ञान होता है। इसलिए पुरुषोचित प्रयत्न के द्वारा भव-रोग के निवारण के लिए मुख्य औषधियों का संग्रह करना चाहिए। सत शास्त्रों का अभ्यास और सत पुरुषों का संग यह दो प्रधान औषधियां संसार रूपी रोग का नाश करने वाली हैं। इस जगत में संपूर्ण दु:खों के विनाश की सिद्धि के लिए एकमात्र पुरुष प्रयत्न ही प्रधान साधन है, उसे छोड़कर दूसरी कोई गति या उपाय काम दे सके यह संभव नहीं।
रघुनंदन! आत्मज्ञान की प्राप्ति के लिए अपेक्षित उस पुरुष प्रयत्न का स्वरूप कैसा है, जिसका पूर्णतया पालन करने से राग-द्वेष महामारी शांत हो जाती है यह बताता हूं सुनो। मुमुक्षु पुरुष को चाहिए कि वह यथासंभव ऐसी वृत्ति के द्वारा जो लोक और शास्त्र के विरुद्ध ना हो निष्काम भाव से जीवन निर्वाह करता हुआ संतुष्ट चित हो भोग वासना का परित्याग करें। अपनी शांतवृति के द्वारा यथासंभव उद्योग करके सत्संग और सत् शास्त्रों का अभ्यास इन दो साधनों की सबसे पहले शरण लेनी चाहिए। जो पुरुष प्रारब्ध के अनुसार जो कुछ भी मिल जाए, उसी से संतुष्ट रहता है, सतपुरुषों अथवा शास्त्रों द्वारा निंदित वस्तु की ओर आंख उठा कर नहीं देखता और सत्संग एवं सत शास्त्रों के अभ्यास में तत्पर रहता है वह शीघ्र ही मुक्त हो जाता है।