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 #योगवाशिष्ठ_महारामायण- उत्पत्ति प्रकरण ( भाग 03)// ज्ञान से ही परासिद्धि या परमात्मप्राप्ति का प्रतिपादन तथा ज्ञान के उ...
15/04/2022

#योगवाशिष्ठ_महारामायण- उत्पत्ति प्रकरण ( भाग 03)
// ज्ञान से ही परासिद्धि या परमात्मप्राप्ति का प्रतिपादन तथा ज्ञान के उपायों में सत्संग एवं सत्- शास्त्रों के स्वाध्याय की प्रशंसा //________________________
श्री वशिष्ठ जी कहते हैं- रघुनंदन! परब्रह्म परमात्मा देवताओं के भी देवता हैं। उनके ज्ञान से ही मोक्ष की प्राप्ति होती है, सकाम कर्मों के अनुष्ठान से नहीं। संसार- बंधन की निवृत्ति या मोक्ष की प्राप्ति के लिए ज्ञान ही साधन है, ज्ञान के अतिरिक्त सकाम कर्म आदि का इसमें कोई भी उपयोग नहीं है। क्योंकि मृगतृष्णा में होने वाले जल के भ्रम का निवारण करने के लिए ज्ञान का ही उपयोग देखा गया है- ज्ञान से ही उस भ्रम की निवृत्ति होती है, किसी कर्म से नहीं। सत्संग तथा सत्-शास्त्रों के स्वाध्याय में तत्पर होना ही ब्रह्म ज्ञान की प्राप्ति में हेतु है वह स्वाभाविक साधन ही मोह जाल का नासक होता है।यह परमात्मा सतस्वरुप ही है ऐसे ज्ञान मात्र से ही जीव के दुख का निवारण होता है तथा वह जीवन मुक्त अवस्था को प्राप्त होता है।
श्री रामचंद्र जी ने पूछा गुरुदेव सबके आत्मस्वरूप इन परमात्मा के ज्ञान मात्र से कष्टप्रद जन्म-मरण आदि फिर कभी बाधा नहीं देते अतः बताइए यह महान देवाधिदेव परब्रह्म परमात्मा किस उपाय से शीघ्र प्राप्त होते हैं? श्री वशिष्ठ! जी ने कहा श्री राम! अपने पौरुष जनित प्रयत्न से विकास को प्राप्त हुए विवेक के द्वारा उन परमात्मदेव का यथार्थ ज्ञान होता है। इसलिए पुरुषोचित प्रयत्न के द्वारा भव-रोग के निवारण के लिए मुख्य औषधियों का संग्रह करना चाहिए। सत शास्त्रों का अभ्यास और सत पुरुषों का संग यह दो प्रधान औषधियां संसार रूपी रोग का नाश करने वाली हैं। इस जगत में संपूर्ण दु:खों के विनाश की सिद्धि के लिए एकमात्र पुरुष प्रयत्न ही प्रधान साधन है, उसे छोड़कर दूसरी कोई गति या उपाय काम दे सके यह संभव नहीं।
रघुनंदन! आत्मज्ञान की प्राप्ति के लिए अपेक्षित उस पुरुष प्रयत्न का स्वरूप कैसा है, जिसका पूर्णतया पालन करने से राग-द्वेष महामारी शांत हो जाती है यह बताता हूं सुनो। मुमुक्षु पुरुष को चाहिए कि वह यथासंभव ऐसी वृत्ति के द्वारा जो लोक और शास्त्र के विरुद्ध ना हो निष्काम भाव से जीवन निर्वाह करता हुआ संतुष्ट चित हो भोग वासना का परित्याग करें। अपनी शांतवृति के द्वारा यथासंभव उद्योग करके सत्संग और सत् शास्त्रों का अभ्यास इन दो साधनों की सबसे पहले शरण लेनी चाहिए। जो पुरुष प्रारब्ध के अनुसार जो कुछ भी मिल जाए, उसी से संतुष्ट रहता है, सतपुरुषों अथवा शास्त्रों द्वारा निंदित वस्तु की ओर आंख उठा कर नहीं देखता और सत्संग एवं सत शास्त्रों के अभ्यास में तत्पर रहता है वह शीघ्र ही मुक्त हो जाता है।

 #योगवाशिष्ठ_महारामायण-- उत्पत्ति प्रकरण (भाग ०२)// मन के स्वरूप का विवेचन, मन एवं मनःकल्पित दृश्य जगत की असत्ता का निरू...
05/04/2022

#योगवाशिष्ठ_महारामायण-- उत्पत्ति प्रकरण (भाग ०२)
// मन के स्वरूप का विवेचन, मन एवं मनःकल्पित दृश्य जगत की असत्ता का निरूपण तथा महाप्रलय काल में समस्त जगत को अपने में लीन करके एकमात्र परमात्मा ही शेष रहते हैं और वे ही सब के मूल हैं, इसका प्रतिपादन। //
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पिछली पोस्ट का शेष....
श्री वशिष्ठ जी ने कहा---
रघुनंदन! जिस वस्तु की सत्ता है, उसका कभी नाश नहीं होता। यह जो कुछ आकाश आदि भूत और अहंकार के रूप में लक्षित होता है, वह सब व्यवहार दशा में जगत है, किंतु परमार्थ- दशा में ब्रह्म है। ब्रह्म के सिवा ʼजगतʼ शब्द का दूसरा कोई वास्तविक अर्थ है ही नहीं। हमारे सामने यह जो कुछ दृश्य प्रपंच दृष्टिगोचर होता है, वह सब अजर, अमर एवं अव्यय परब्रह्म ही है। सर्वत्र पूर्ण का प्रसार हो रहा है। शांत परब्रह्म में शांत जगत स्थित है। आकाश में हीआकाश का उदय हुआ है तथा ब्रह्म में ही ब्रह्म प्रतिष्ठित है। वास्तव में न तो दृश्य सत-रूप है, न दृष्टा, न दर्शन, न शून्य, न जड और न चित् ही सदरूप है। केवल शांत स्वरूप ब्रह्म ही सदरूप है, जो सर्वत्र व्याप्त है।
यह जगत सृष्टि के आदि में उत्पन्न नहीं हुआ था, इसलिए इसका अस्तित्व सर्वथा नहीं है। जैसे स्वप्न आदि में मन से ही नगर की प्रतीति होती है, उसी प्रकार यह जगत भी मन से ही उत्पन्न होकर प्रतीति का विषय हो रहा है। स्वयं मन ही सृष्टि के आदि में उत्पन्न न होने के कारण असत- स्वरूप है, उस असत-रूप मनसे कल्पित होने के कारण भी यह जगह असत ही है। फिर जिस प्रकार इसका अनुभव होता है, वह बता रहा हूं, सुनो। मन निरंतर क्षीण होने वाले इस दृश्य रूपी दोष का विस्तार करता है। वह स्वयं असत रूप ही है, तो भी सत सा प्रतीत होने वाले जगत की सृष्टि करता है--- ठीक उसी तरह जैसे स्वप्न असत होता हुआ भी सत सा प्रतीत होने वाले जगत की सृष्टि करता है। मन ही अपनी इच्छा के अनुसार स्वयं शीघ्र ही शरीर की कल्पना कर लेता है। वहीं चिरकाल की भावना से विस्तार को प्राप्त होकर इस ऐंद्रजालिक वैभव रूप दृश्य- जगत का विस्तार करता है। चंचल शक्ति से युक्त होने के कारण केवल यह मन ही स्वयं स्फुरित होता, उछलता, कूदता ,आता, जाता, याचना करता, घूमता, गोते लगाता, संहार करता और अपकर्ष को प्राप्त होता है ।
श्री राम! महाप्रलय होने पर जब जगत अति सूक्ष्म रूप से स्थित होने के कारण अपने कार्य में असमर्थ हो जाता है, उस समय वह संपूर्ण भावी दृश्यवर्ग की सृष्टि से पहले विक्षेप रहित शांताअवस्था में ही शेष रहता है। उस प्रलय काल में केवल कभी अस्त ना होने वाले सूर्य देव-- स्वयंज्योति, अजन्मा, रोग- शोक से रहित, सदा सर्वशक्तिमान, सर्वस्वरूप, परमात्मा महेश्वर ही विराजमान होते हैं। जहां से वाणी उन्हें ना पाकर लौट आती है अर्थात जहां वाणी की पहुंच नहीं हो पाती, जो जीवन मुक्त महात्माओं के द्वारा जाने जाते हैं, सांख्य दर्शन के अनुयायी जिन्हें 'पुरुष' कहते हैं, वेदांत वादी 'ब्रह्म' नाम से जिनका चिंतन करते हैं, विज्ञान वेत्ताओं की दृष्टि में जो परम निर्मल विज्ञान मात्र है, जिन्हें शून्यवादी शून्य कहते हैं, जो सूर्य के प्रकाश के भी प्रकाशक हैं; जैसे नदी नाले आदि के जल अंततोगत्वा महासागर में ही गिरते हैं, उसी प्रकार संपूर्ण दृश्य समूह महाप्रलय काल में जिनमें ही विलीन होते हैं; जो आकाश में, विभिन्न शरीरों में, जल में, लताओं में, धूल कणों में, पर्वतों में, वायु में, और पाताल आदि सभी देश, काल एवं वस्तुओं में समान भाव से स्थित हैं जिन्होंने आकाश को शून्य पर्वतों को घनीभूत और जल को द्रवी भूत बनाया है, जगत को दीपक की भांति प्रकाशित करने वाले सूर्य जिनके अधीन है; जैसे मरुभूमि में सूर्य की तपती हुई किरण के भीतर जलराशि लहराती दिखाई देती है, उसी प्रकार जिन अत्यंत व्यापक परमात्मा रूपी महासागर में आविर्भाव और तिरोभाव से युक्त त्रिलोकरूपिणी तरंगे उठती रहती हैं, जो संपूर्ण व्यावहारिक सत्ताओं से ऊंचे उठे हुए -- सर्वविलक्षण पारमार्थिक सत्ता से संपन्न है, जिन से ही नियति, देश, काल, चलन, चेष्टा और क्रिया आदि समस्त भावों को कार्य- निर्वाह की क्षमता प्राप्त हुई है --वे एकमात्र परब्रह्म परमेश्वर ही उक्त महाप्रलय के समय शेष रहते हैं। वे परमात्मा उत्पत्ति -स्थिति आदि से रहित, कभी अस्त न होने वाले, नित्य प्रकाशमान ज्ञान से परिपूर्ण एवं विकार शून्य अपने स्वरूप में ही स्थित है। वे एकमात्र --अद्वितीय ही हैं ।अतएव वे माया से अनेक विशाल संसारो- अगणित ब्रह्मांडों की रचना करते हुए भी वास्तव में न कोई कार्य करते हैं और न उनसे कोई चेष्टाएँ ही बनती हैं।

01/03/2022
 #योगवाशिष्ठ_महारामायण-- उत्पत्ति प्रकरण (भाग ०२)// मन के स्वरूप का विवेचन, मन एवं मनःकल्पित दृश्य जगत की असत्ता का निरू...
29/12/2021

#योगवाशिष्ठ_महारामायण-- उत्पत्ति प्रकरण (भाग ०२)
// मन के स्वरूप का विवेचन, मन एवं मनःकल्पित दृश्य जगत की असत्ता का निरूपण तथा महाप्रलय काल में समस्त जगत को अपने में लीन करके एकमात्र परमात्मा ही शेष रहते हैं और वे ही सब के मूल हैं, इसका प्रतिपादन। //
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श्री रामचंद्र जी ने पूछा- भगवन् मन का स्वरूप कैसा है, यह मुझे स्पष्ट रूप से बताइये; क्योंकि मन ही इस संपूर्ण लोकमंञ्जरी का विस्तार करता है।
श्री वशिष्ठ जी ने कहा-- श्री राम! जैसे शून्य तथा जड आकारवाले आकाश का नाम मात्र के अतिरिक्त दूसरा कोई रूप दृष्टिगोचर नहीं होता, उसी प्रकार शून्य एवं जड रूप इस संकल्पात्मक मन का नाम के सिवा कोई भी वास्तविक रूप नहीं दिखाई देता। यह जगत् क्षणिक संकल्परूपी मन से उत्पन्न हुआ है। मृगतृष्णा में प्रतीत होने वाले जल तथा चंद्रमा में भ्रम से दिखने वाले द्वितीय चंद्रमा के समान ही इस मनःकल्पित जगत का स्वरूप है।
रघुनंदन! संकल्प को ही मन समझो। जैसे द्रवत्व (द्रवरूपता) से जल का भेद नहीं है और जैसे वायु से स्पंदन (गतिशीलता) भिन्न नहीं है, उसी प्रकार संकल्प से मन भिन्न नहीं है। प्रियवर श्री राम! जिस विषय के लिए संकल्प होता है, उसमें मन संकल्प रूप से स्थित रहता है। तात्पर्य यह है कि जो संकल्प है वही मन है। संकल्प और मन को कोई कभी पृथक नहीं कर पाया है मन को संकल्प मात्र समझो।
वह समष्टिगत मन ही पितामह ब्रह्मा है। आतिवाहिक देह (संकल्पमयशरीर) रूपी ब्रह्मा को लोक में समष्टिगत मन कहा गया है। अविद्या, संसार, चित्त, मन, बंधन, मल और तम इन्हें श्रेष्ठ विद्वानों ने दृश्य के पर्यायवाची नाम माना है। संकल्प रूप दृश्य से अतिरिक्त मन का कुछ भी स्वरूप नहीं है। यह दृश्य प्रपंञ्च वास्तव में उत्पन्न ही नहीं हुआ है, यह बात मै आगे चलकर फिर बताऊंगा। जैसे प्रकाश का आलोक स्वभाव है, जैसे चपलता वायु का स्वभाव है, और जिस प्रकार द्रवीभूत होना जल का स्वभाव है, उसी प्रकार दृष्टा में दृश्यत्व स्वभाव से ही विद्यमान है (अर्थात दृष्टा से दृश्य भिन्न नहीं है)। जैसे स्वर्ण में बाजूबंद और कटक कुंडल आदि की स्थिति है, जैसे मृगतृष्णा की नदी में जल की स्थिति है और जैसे सपने की नगरी में उठाई गई दीवार की स्थिति है, उसी प्रकार दृष्टा में दृश्य की स्थिति मानी गई है। अर्थात जैसे उपर्युक्त वस्तुएं अपने अधिष्ठान से भिन्न नहीं है, उसी प्रकार दृष्टा से दृश्य की पृथक सत्ता नहीं है।
दृष्टा से दृश्य की पृथक सत्ता ना होने के कारण दृश्य का अभाव हो जाने पर जो दृष्टा में बलात दृष्टापन का अभाव प्राप्त होता है, उसी को तुम असत् (मिथ्या दृश्य) के बाधित होने से सन्मात्र चिन्मय रूप में अवशिष्ट हुए आत्मा का केवली भाव (या कैवल्य) समझो। जब चित्त आत्मा के कैवल्य के बोध से तदाकार हो जाता है तब उसकी राग-द्वेष आदि वासनाऐं उसी तरह शांत हो जाती हैं, जैसे हवा के न चलने पर वृक्षों में कंपन और जलाशय आदि में लहरों का उठना बंद हो जाता है।
श्री राम जी ने पूछा‐- ब्रह्मन! यदि दृश्य सत् है, तब तो यह शांत या निवृत्त नहीं हो सकता; क्योंकि सत् का कभी अभाव नहीं होता और यदि यह दोष प्रदान करने वाला दृश्य असत् है, तब यह बात हमारी समझ में आती नहीं। इसलिए यह दृश्यरूपिणी विसूचिका (हैजा) जो मन से जन्म आदि के भ्रम को उत्पन्न करने वाली और दु:ख की परंपरा को देने वाली है , कैसे शांत होगी? क्रमशः

 #योगवाशिष्ठ_महारामायण- उत्पत्तिप्रकरण (भाग ०१)// दृश्य जगत के मिथ्यात्व का निरूपण, दृश्य ही बंधन है और उसका निवारण होने...
19/12/2021

#योगवाशिष्ठ_महारामायण- उत्पत्तिप्रकरण (भाग ०१)
// दृश्य जगत के मिथ्यात्व का निरूपण, दृश्य ही बंधन है और उसका निवारण होने से ही मोक्ष होता है, इसका प्रतिपादन तथा दृष्टा के हृदय में ही दृश्य की स्थिति का कथन। //
श्री वशिष्ठ जी कहते हैं श्री राम! जिसमें मुमुक्षुओं के व्यवहारों का ही प्रधान रूप से वर्णन है, उस प्रकरण के बाद अब मैं इस उत्पत्ति प्रकरण का वर्णन करता हूं। जब तक इस दृश्य जगत की सत्ता है, तभी तक यह जन्म-मृत्यु रूप संसार का बंधन है। दृश्य का अभाव हो जाने से बंधन कदापि नहीं रह सकता। यह दृश्य जगत जिस प्रकार उत्पन्न होता है, वह बता रहा हूं। तुम क्रमशः ध्यान देकर सुनो। संसार में जो उत्पन्न होता है, वही वृद्धि एवं क्षय को प्राप्त होता है। वही बंधता और मोक्ष को प्राप्त होता है तथा वही स्वर्ग या नरक में पड़ता है। अपने स्वरूप का बोध न होने से ही बंधन है। इसलिए स्वरूप के बोध के लिए ही मैं आगे की बात बता रहा हूं। उत्पत्ति आदि का संबंध इस दृश्य जगत से ही है (आत्मा से नहीं )। आत्मा तो दृश्य की उत्पत्ति से पहले जैसा रहा है, वैसा ही उत्पत्ति के बाद भी है (वह सदा ही एकरस रहता है )। जैसे सुषुप्ति में स्वप्न के संसार का अभाव हो जाता है, उसी तरह यह जो समस्त चराचर जगत दिखाई देता है, इसका कल्प के अंत में विनाश (अभाव) हो जाता है। तत्पश्चात निष्क्रिय गंभीर ( अपरिच्छिन्न )नाम-रूप से रहित और अव्यक्त कोई अनिर्वचनीय सद् वस्तु ही शेष रह जाती है। विद्वानों ने व्यवहार निर्वाह के लिए उस सत् स्वरूप परमात्मा के आत्मा, परब्रह्म तथा सत्य इत्यादि नाम रख छोड़े हैं।
सोने का बना हुआ कड़ा सोना ही है। उस सोने से 'कड़ा' जैसे पृथक नहीं किया जा सकता, उसी प्रकार 'जगत' शब्द का जो अर्थ है वह परब्रह्म पर ही आधारित है, अतः उस से पृथक नहीं है। जैसे कड़े का स्वरूप स्वर्ण के स्वभाव के अंतर्गत है कड़े के स्वभाव के अंतर्गत नहीं। उसी प्रकार यह दृश्य मान जगत भी अपने परिच्छिन्न स्वभाव को त्याग देने पर ब्रह्म भाव में ही प्रतिष्ठित है, 'जगत' शब्द के अर्थ में नहीं। (तात्पर्य यह है कि सोने में ही कड़े की कल्पना हुई है कड़े में नहीं। इसी तरह ब्रह्म में ही जगत की कल्पना हुई है, जगत में नहीं; अतः वह ब्रह्म से भिन्न नहीं है।) जैसे मरू मरीचिका में प्रतीत होने वाली नदी अपने भीतर न होने पर भी चंचल तरंगों का विस्तार करती है और वह तरंगे सच्ची सी जान पड़ती हैं, उसी प्रकार मन ही इस जगत रूपी इंद्रजाल की संपत्ति का विस्तार करता है और वह संपत्ति असत् होने पर भी सत्य सी प्रतीत होती है। जिसके कारण असत् वस्तु भी सत- सी प्रतीत होती है, वह माया है। सर्वज्ञ विद्वानों ने उसके अविद्या, संसृति, बन्ध, माया, मोह, महत् और तम आदि अनेक नामों की कल्पना की है।
प्रिय श्री राम! दृश्य प्रपंच का अस्तित्व ही दृष्टा का बंधन कहा गया है। दृश्य के बल से ही दृष्टा बंधन में पड़ा है। दृश्य का निवारण हो जाने पर वह उस बंधन से मुक्त हो जाता है। 'त्वम' (तू ) 'अहम्' (मैं )और 'इदम' (यह) इत्यादि रूपों में कल्पित जो मिथ्या जगत् है उसी को दृश्य कहते हैं। जब तक वह दृश्य बना रहता है, तब तक मोक्ष नहीं होता। यदि यह दृश्य जगत वास्तव में है, तब तो किसी के लिए उसका निवारण नहीं हो सकता; क्योंकि जो असत् वस्तु है उसका अस्तित्व नहीं है और जो सत् वस्तु है, उसका कभी अभाव नहीं होता। चित्- स्वरूप आत्मा का जिसे बोध नहीं है, वह दृष्टा जहां कहीं भी रहता है, वही उसकी दृष्टि के समक्ष इस दृश्य जगत का वैभव प्रकट हो जाता है। इस दृश्य प्रपंच के रहते हुए निर्विकल्प समाधि कैसे हो सकती है ? निर्विकल्प समाधि होने पर ही चेतनता और तुरीय पद की उत्पत्ति होती है।जैसे सुषुप्ति के पश्चात यह सारा सांसारिक दु:ख अनुभव में आने लगता है, उसी प्रकार समाधि से उठने पर संपूर्ण दु:ख मय जगत जैसे का तैसा प्रतीत होने लगता है| इस मनरूप दृश्य के रहते हुए कोई समाधि के लिए कितना ही प्रयत्नशील क्यों न हो, क्या उसे दृश्य प्राप्त नहीं होता?(अवश्य होता है) क्योंकि जहां-जहां इसकी चित्त वृति जाती है, वहां-वहां उस से संबंध रखने वाले जगत रूपी भ्रम का निवारण नहीं किया जा सकता। जैसे कमलगट्टे के भीतर कमलिनी का बीज विद्यमान है, जिसमें उसका मृणालमय रूप छुपा हुआ है, उसी प्रकार अज्ञानी दृष्टा में वह बुद्धि रहती है, जिसमें दृश्य जगत् अन्तर्हित होता है। जैसे तुम्हारे ह्रृदय में स्थित मनोराज्य -बुद्धि अपने अनुभव से ही देखी गई है और जैसे हृदय स्थित स्वप्न एवं संकल्प तुम्हारे द्वारा अनुभव से ही देखे जाते हैं, उसी प्रकार यह दृश्य जगत तुम्हारे ह्रदय में ही स्थित है और अपने अनुभव से ही दृष्टिगोचर होता है।

 #योगवाशिष्ठ_महारामायण- मुमुक्षु व्यवहार प्रकरण (भाग १०)// विचार, संतोष और सत्समागम का विशेष रूप से वर्णन तथा चारों गुणो...
02/12/2021

#योगवाशिष्ठ_महारामायण- मुमुक्षु व्यवहार प्रकरण (भाग १०)
// विचार, संतोष और सत्समागम का विशेष रूप से वर्णन तथा चारों गुणों में से एक ही गुण के सेवन से सद्गति का कथन। //
पिछली पोस्ट से आगे
श्री वशिष्ठ जी कहते हैं--- हे राघव! इस जगत में सत्य के ग्रहण और असत्य के त्याग की बुद्धि से संपन्न पुरुषों को विचार के बिना उत्तम तत्व का कुछ भी ज्ञान नहीं होता। विचार से ही तत्व का ज्ञान होता है, तत्वज्ञान से मन की निश्चलता प्राप्त होती है और मन के शांत हो जाने से संपूर्ण दु:खो का सर्वथा विनाश हो जाता है। भूतल पर सभी लोग स्पष्ट विचार दृष्टि से ही समस्त कर्मों की सफलता लाभ करते हैं तथा उत्तम परमात्म साक्षात्कारता भी विचार से ही उपलब्ध होती है, इसलिए श्री राम! शमादि साधन संपन्न तुम्हें उपर्युक्त विचारशीलता रुचिकर होनी चाहिए।
परंतप राम! संतोष ही परम श्रेय है और संतोष परमसुख भी कहा जाता है। संतोष युक्त पुरुष परम विश्राम को प्राप्त होता है। जो संतोष रूपी ऐश्वर्य के सुख से संपन्न है तथा जिन का चित्त निरंतर विश्राम पूर्ण रहता है, ऐसे शांत पुरुषों को विशाल साम्राज्य भी पुराने घास के टुकड़े के समान प्रतीत होता है। श्री राम! संतोष युक्त बुद्धि संसार की विषम परिस्थितियों में भी न तो उद्विग्न होती है और न कभी उसका विनाश ही होता है। जो शांत पुरुष संतोषामृत के पान से पूर्णतः तृप्त हो चुके हैं, उनके लिए यह अपरिमित भोग संपत्ति विष-सी जान पड़ती है। रागादि दोषों का विनाशक तथा अत्यंत मधुर आस्वाद से युक्त संतोष जैसा सुखद होता है, वैसा सुख यह अमृतरस की लहरियां नहीं दे सकती। जो अप्राप्त वस्तु की आकांक्षा का परित्याग करके प्राप्त हुई वस्तु में सम भाव रखने वाला है तथा जिसमें हर्ष शोक के विकार परिलक्षित नहीं होते, वह मनुष्य इस लोक में संतुष्ट कहा जाता है। जब तक मन आत्मा के द्वारा आत्मा में संतुष्ट नहीं हो जाता, तब तक उस मनरूपी गड्ढे से उसी प्रकार आपत्तियां उद्भूत होती रहती हैं, जैसे गड्ढे से लताएं। संतोष से शीतल हुआ मन विशुद्ध विज्ञान की दृष्टियों से अत्यंत विकास को प्राप्त होता है-- ठीक उसी तरह, जैसे सूर्य की किरणों के संपर्क से कमल विकसित हो जाता है। जैसे मलिन दर्पण में मुख की छाया नहीं दीखती, उसी प्रकार आशा की परवशता से व्याकुल एवं संतोष रहित चित्त में ज्ञान का प्रतिबिंब नहीं पड़ता। जिसका मन शारीरिक तथा मानसिक क्लेशों से मुक्त एवं संतुष्ट है, वह प्राणी दरिद्र होते हुए भी सच्चे साम्राज्य सुख का उपभोग करता है। चंद्रमा की भांति संतोषामृत से परिपूर्ण मनुष्य का मन शांत एवं शीतल बुद्धि द्वारा स्वयं ही शाश्वती स्थिरता को प्राप्त हो जाता है।
महा बुद्धिमान राम! इस संसार में श्रेष्ठ संत-समागम मनुष्यों का संसार-सागर से उबारने में सर्वत्र विशेष रुप से उपकार करता है। जो महात्मा पुरुष सत्संगति रूपी वृक्ष से उत्पन्न हुए विवेक नामक निर्मल पुष्प की रक्षा करते हैं, वे मोक्ष-फल रूपी संपत्ति के अधिकारी होते हैं। जो आपत्ति रूपी कमलिनी के लिए हिम और मोह रूपी कोहरे के लिए वायु के समान है, वह उत्तम संत समागम ही इस जगत में सर्वोत्कृष्ट है। श्री राम! तुम्हें ज्ञात होना चाहिए की संत समागम विशेष रुप से बुद्धिवर्धक, अज्ञान रूपी वृक्ष का उच्छेदक और मानसिक व्यथाओं को दूर भगाने वाला है। सत्संग से प्राप्त हुई दिव्य विभूतियां ऐसा परम उत्तम निर्वाण-सुख प्रदान करती हैं, जो सतत् वर्धनशील, अविनाशी और बाधारहित होता है। अतएव अत्यंत कष्ट दायिनी दशा में पड़कर विवशता को प्राप्त हुए मनुष्यों को भी थोड़े समय के लिए भी सत्संगति का परित्याग नहीं करना चाहिए; क्योंकि लोक में सत्संगति सन्मार्ग को प्रकाशित करने वाली और हृदयान्धकार को दूर करने वाली ज्ञान रूपी सूर्य की प्रभा है ।
संतोष, सत्संगति, विचार और शम यह चारों ही मनुष्यों के लिए भवसागर से तरने के साधन है। इनमें संतोष परम लाभ है। सत्संगति परम गति है। विचार उत्तम ज्ञान है और शम परमोत्कृष्ट सुख है। यह चारों भव सागर का समूल विनाश करने के लिए विशुद्ध उपाय हैं।जिन्होंने इसका भली-भांति सेवन किया वे मोह जल से परिपूर्ण भवसागर से पार हो गए। बुद्धिमानों में श्रेष्ठ राम! इन चारों साधनों में से विशुद्ध प्रकाश वाले एक ही साधन का अभ्यास हो जाने पर शेष तीनों भी अवश्य अभ्यस्त हो जाते हैं; क्योंकि इनमें से एक-एक भी क्रमशः इन चारों की जन्मभूमि है। अतः सब की सिद्धि के लिए यत्न पूर्वक एक का तो पूर्ण रूप से आश्रय लेना ही चाहिए। जो प्राणी विचार, संतोष, शम और सत्समागम से संपन्न है, उसे दिव्यज्ञान संपत्तियां उपलब्ध हो जाती हैं-- ठीक उसी तरह जैसे कल्प वृक्ष का आश्रय लेने वाले पुरुष को लौकिक संपत्तियां सुलभ होती हैं। इसलिए रघुनंदन! मनुष्य को चाहिए कि वह पुरुषार्थ से मन को वश में करके इनमें से एक गुण का नित्य यत्नपूर्वक उपार्जन करें; क्योंकि जब तक मनुष्य पुरुषार्थ के आश्रय से अपने चित्त रूपी गजराज को जीतकर हृदय में एक गुण भी धारण नहीं कर लेता, तब तक उत्तम गति की प्राप्ति नहीं हो सकती। जिसके चित्त में उत्तम फलदायक एक ही गुण सुदृढ़ हो गया है, उसके सारे दोष शीघ्र ही नष्ट हो जाते हैं; क्योंकि एक ही गुण की विशेष वृद्धि होने पर दोषों पर विजय प्रदान करने वाले अनेक गुणों की वृद्धि होती है और एक दोष के अधिक बढ़ जाने पर बहुत से गुण विनाशक दोष बढ़ जाते हैं।

 #योगवाशिष्ठ_महारामायण- मुमुक्षु व्यवहार प्रकरण (भाग १०)// विचार, संतोष और सत्समागम का विशेष रूप से वर्णन तथा चारों गुणो...
24/11/2021

#योगवाशिष्ठ_महारामायण- मुमुक्षु व्यवहार प्रकरण (भाग १०)
// विचार, संतोष और सत्समागम का विशेष रूप से वर्णन तथा चारों गुणों में से एक ही गुण के सेवन से सद्गति का कथन। //
श्री वशिष्ठ जी कहते हैं--- हे राघव! पुरुष को शास्त्र ज्ञान से निर्मल हुई परम पवित्र बुद्धि द्वारा निरंतर आत्म चिंतन करना चाहिए; क्योंकि आत्मविषयक विचार करने से बुद्धि तीव्र होकर परम पद का साक्षात्कार कर लेती है। संसाररूपी महारोग के लिए विचार ही महौषध है। लौकिक दु:ख से पार होने के लिए विद्वानों के पास विचार के अतिरिक्त दूसरा कोई उपाय नहीं है। सत्पुरुषों की बुद्धि विचार से अशुभ का परित्याग करके शुभ को प्राप्त होती है। बुद्धिमानों के बल, बुद्धि सामर्थ्य, कर्तव्य का ज्ञान, क्रिया और उसका फल-- ये सभी विचार से ही सफल होते हैं। अतः जो उचित अनुचित के रहस्योद्घाटन के लिए महान दीपक के समान है तथा अभीष्ट की सिद्धि करने वाला है, उस उत्कृष्ट विचार का आश्रय लेकर संसार सागर को पार करना चाहिए। क्योंकि विशुद्ध विचार रूपी सिंह हृदय स्थित विवेक रूपी कमलों को उखाड़ फेंकने वाले महा मोह रूपी गजराजों को विदीर्ण कर डालता है। जो लोग विचार का अभ्युदय करने वाली बुद्धि द्वारा सबके साथ व्यवहार करते हैं, वे निश्चय ही अत्यंत श्रेष्ठ फलों के भागी होते हैं। जितने क्रूर कर्म, निषिद्धाचरण और कुत्सित मानसिक कष्ट हैं, वे सभी विचार हीनता से ही आविर्भूत होते हैं। जिस अधिकारी पुरुष का मन आशा की परवशता से रहित और विचार युक्त है वह पूर्ण चंद्रमा की भांति अपने आत्मा में परमानंद का अनुभव करता है। जब मन में विवेक शीलता का उदय होता है, तब वह सारे विश्व को शीतल एवं सुशोभित करने वाली चंद्रमा की चांदनी की भाॅति सबको अत्यंत शीतल और अलंकृत कर देती है। जगत के सारे पदार्थ तभी तक सत्य की तरह रमणीय प्रतीत होते हैं, जब तक विचार नहीं किया जाता। वस्तुतः उनका कोई अस्तित्व नहीं है, अतः विचार करने पर वे नष्ट हो जाते हैं। विचारशील पुरुष गई हुई वस्तु की उपेक्षा कर देता है और प्राप्त वस्तु का शास्त्रानुसार उपयोग करता है। वह मन की प्रतिकूलता में ना तो क्षुब्ध होता है और न अनुकूलता में प्रसन्न ही। बुद्धिमान पुरुष को आपत्ति काल में भी 'मैं कौन हूं ? यह संसार किसका है ?' यों उसके प्रतिकार के लिए प्रयत्नपूर्वक विचार करना चाहिए। जैसे रात्रि में भूतल पर पदार्थों का ज्ञान दीपक से होता है, उसी प्रकार परमात्मस्वरुप में स्थिति प्राप्त करने के लिए वेद-वेदांत के सिद्धांतों की स्थितियों का निर्णय विचार द्वारा होता है।
जैसे पक जाने के कारण मधुर रस से पूर्ण आम का फल सबके लिए रुचिकर होता है, उसी तरह उत्तम विचार से युक्त पुरुष, सामान्य जनों की तो बात ही क्या, महापुरुषों के लिए भी आदरणीय हो जाता है। विचार द्वारा जिनकी बुद्धि विशुद्ध हो गई है और विचार से ही जिन्हें ज्ञान मार्ग में जाने की युक्ति ज्ञात है, वे मनुष्य नाना प्रकार के दु:ख रूप गड्ढों में बार-बार नहीं गिरते अर्थात आवागमन से मुक्त हो जाते हैं। क्रमश:

 #योगवाशिष्ठ_महारामायण-- मुमुक्षु व्यवहार प्रकरण  (भाग ०९)// संसार प्राप्ति की अनर्थरूपता, ज्ञान का उत्तम माहात्म्य, श्र...
13/11/2021

#योगवाशिष्ठ_महारामायण-- मुमुक्षु व्यवहार प्रकरण (भाग ०९)
// संसार प्राप्ति की अनर्थरूपता, ज्ञान का उत्तम माहात्म्य, श्रीराम में प्रश्नकर्ता के गुणों की अधिकता का वर्णन, जीवनमुक्ति रूप फल के हेतुभूत वैराग्य आदि गुणों का तथा शम का विशेष रूप से निरूपण //
पिछली पोस्ट का शेष-----
श्री वशिष्ठ जी कहते हैं-- राघव! अब मोक्ष द्वार पर स्थित रहने वाले इन द्वारपालों को क्रमशः सुनो, जिनमें से एक के प्रति भी प्रीति हो जाने से मोक्ष द्वार में प्रविष्ट होने का अधिकार प्राप्त हो जाता है। शम मंगलमय, शांति दायक तथा भ्रम का निराकरण करने वाला है। शम से परम कल्याण की प्राप्ति होती है और शम ही परम पद है। शम की प्राप्ति से पूर्णतया तृप्त हुए जिस पुरुष का चित्त शमविभूषित होने के कारण शीतल एवं निर्मल हो गया है, उसका शत्रु भी मित्र बन जाता है। इस जगत में जैसे अपनी माता पर सभी का विश्वास रहता है, उसी प्रकार शमयुक्त पुरुष पर दुरात्मा अथवा धर्मात्मा- सभी प्राणी विश्वास करते हैं। इसलिए रघुकुल भूषण राम! तुम भी अपने मन को, जो समस्त शारीरिक क्लेशों तथा मानसिक व्यथाओं से कम्पित और तृष्णा रूपी रस्सी से आबद्ध है, शमरूपी अमृत के अभिषेक से प्रकृतिस्थ करो; क्योंकि जो शमनिष्ठ हैं, उस पुरुष से पिशाच, राक्षस, दैत्य, शत्रु, व्याघ्र अथवा सर्प --कोई भी द्वेष नहीं करते।
शमयुक्त अंतःकरण वाले पुरुष का दर्शन करने से मनुष्य को जो शांति प्राप्त होती है वह प्राणों से भी अधिक प्रिय स्वजन के मिलने से भी नहीं उपलब्ध होती।
इस लोक में जो शम से सुशोभित तथा लोगों द्वारा प्रशंसित समवृत्ति से सबके साथ उत्तम बर्ताव करता है उसी का जीवन सार्थक है; इसके विपरीत का जीवन तो निरर्थक ही है। जिसका मन उदंडतारहित हो गया है, ऐसा शमपरायण श्रेष्ठ पुरुष जो कर्म करता है, उसके उस कर्म की ये समस्त प्राणी प्रशंसा करते हैं ।
जो पुरुष प्रिय और अप्रिय को सुनकर, स्पर्श कर, देखकर, खाकर और सूंघकर न तो हर्षित होता है और न खिन्न होता है वह 'शांत' कहा जाता है। जो प्रयत्न पूर्वक इंद्रियों को अपने वश में करके समस्त प्राणियों के साथ समता पूर्ण व्यवहार करता है तथा न तो भविष्य की आकांक्षा करता है और न प्राप्त का परित्याग करता है, वह 'शांत' कहलाता है। जिसका मन मरण, उत्सव और युद्ध के अवसर पर भी व्याकुल ना होकर चंद्र मंडल के समान निर्मल आभा से युक्त रहता है, वह 'शांत 'कहा जाता है। हर्ष और कोप का अवसर उपस्थित होने पर भी जो पुरुष वहां अनुपस्थित के समान ना तो हर्ष को प्राप्त होता है और ना क्रोध ही करता है, बल्कि उसका मन गाढ़ निद्रा में सोए हुए पुरुष के मन के समान निर्विकार रहता है, वह 'शांत' पद से सुशोभित होता है। जिसकी अमृत प्रवाह के सदृश सुखदायिनी तथा प्रेम पूर्ण दृष्टि सभी प्राणियों में समान रूप से पड़ती है, उसकी 'शांत' संज्ञा होती है। जिसका अंतःकरण शीतल हो गया है एवं जिसकी बुद्धि मोहाच्छन्न नहीं है तथा जो लौकिक विषयों के साथ व्यवहार करता हुआ भी उसमें आसक्त नहीं होता उसे लोग 'शांत' कहते हैं। सम्यक प्रकार से व्यवहार करते हुए भी जिस पुरुष की बुद्धि आकाश के समान निर्विकार रहती है राग-द्वेष रूप कलंक से लिप्त नहीं होती, उसे 'शांत 'कहा जाता है।
तपस्वियों, याजकों, नरेशों, विद्वानों और गुणियों के समुदाय में शमयुक्त पुरुष की ही विशेष शोभा रहती है। जिन गुणशाली महापुरुषों का मन शम में आसक्त हो गया है, उनके चित्त से निवृत्ति का उदय होता है, ठीक उसी तरह जैसे चंद्रमा से चांदनी प्रकट होती है।
रघुनंदन! जिसका अन्य पुरुष अपहरण नहीं कर सकते, जो पूज्य जनों द्वारा सावधानी के साथ सुरक्षित एवं अमृत स्वरूप हैं, उस शमरूप उत्कृष्ट साधन का आश्रय लेकर बहुत से महानुभाव जिस क्रम से परम पद को प्राप्त हो चुके हैं, तुम भी परम पुरुषार्थ की सिद्धि के लिए उसी क्रम का अनुसरण करो।

 #योगवाशिष्ठ_महारामायण-- मुमुक्षु व्यवहार प्रकरण  (भाग ०९)// संसार प्राप्ति की अनर्थरूपता, ज्ञान का उत्तम माहात्म्य, श्र...
10/11/2021

#योगवाशिष्ठ_महारामायण-- मुमुक्षु व्यवहार प्रकरण (भाग ०९)
// संसार प्राप्ति की अनर्थरूपता, ज्ञान का उत्तम माहात्म्य, श्रीराम में प्रश्नकर्ता के गुणों की अधिकता का वर्णन, जीवनमुक्ति रूप फल के हेतुभूत वैराग्य आदि गुणों का तथा शम का विशेष रूप से निरूपण //
श्री वशिष्ठ जी कहते हैं-- राघव! ज्ञानी पुरुष को चाहिए कि वह परम पुरुषार्थ की सिद्धि के लिए अनंत परम पद को प्रयत्न पूर्वक प्राप्त करें, क्योंकि जिनका मन संताप रहित होकर सर्वोत्कृष्ट परम पद रूप परमात्मा में लीन हो गया है, वे ही पुरुषों में श्रेष्ठ हैं और उन्हीं को परम पुरुषार्थ की प्राप्ति होती है। जो दुरात्मा पुरुष राज्य आदि जागतिक सुखों के उपलब्ध होने पर उनके उत्तम भोगों के आस्वादन मात्र से ही तृप्त बने रहते हैं, उन्हें तो तुम अंधे मेंढक समझो। जिनकी बुद्धि अज्ञान के कारण मंद पड़ गई है, वे मूर्ख वञ्चकों, प्रबल दुराचारियों, लौकिक भोगों में रचे-पचे रहने वाले और मित्र का-सा व्यवहार करने वाले शत्रुओं में आसक्ति करने लगते हैं, जिससे उन्हें एक संकट से दूसरे संकट की, एक दु:ख से दूसरे दु:ख की, एक भय से दूसरे भय की और एक नरक से दूसरे नर्क की प्राप्ति होती रहती है। इसलिए उत्तम विवेक का आश्रय लेकर अभ्यास और वैराग्य के सहयोग से दु:ख- स्वरूपिणी इस भयंकर संसार -नदी को पार करना चाहिए। जिसे प्राप्त कर लेने पर पुनर्जन्म नहीं होता और जहां पहुंच जाने पर शोक का अस्तित्व मिट जाता है, वह परम पद ज्ञान द्वारा ही प्राप्त किया जा सकता है --इसमें कुछ भी संदेह नहीं है। इस संसार में जब पुरुष की शीघ्र मोक्ष-प्राप्ति के उपाय के चिंतन में प्रवृत्ति होती है, तब वह मोक्ष प्राप्ति का पात्र कहा जाता है। उस प्रवृत्ति के प्राप्त हो जाने पर उत्तम कैवल्य पद की प्राप्ति में कष्ट नहीं उठाना पड़ता। उस केवल रूप परमात्मा की प्राप्ति में धन-संपत्ति, मित्र, भाई-बंधु, हाथ-पैर का संचालन, देशांतर गमन, शारीरिक कष्ट सहन और तीर्थ सेवन आदि उपकारी नहीं हो सकते। वह तो एकमात्र पुरुषार्थ से साध्य केवल परमात्मा की प्राप्ति की वासना रूप कर्म से एवं मनोजय से प्राप्त किया जा सकता है। सुख पूर्वक सेवन करने योग्य आसन पर बैठकर उस परब्रह्म का चिंतन करने वाले पुरुष को उपर्युक्त परम पद की प्राप्ति हो जाती है। फिर तो उसे ना शोक करना पड़ता है और न संसार में उसका पुनर्जन्म ही होता है। जैसे मृगतृष्णा में जलाभास दिखता है, वास्तव में वहां जल नहीं रहता, उसी तरह स्वर्गलोक और मनुष्य लोक के संपूर्ण भावों के विनाशी होने के कारण इन दोनों लोको में वास्तविक सुख नहीं है।
इसलिए जो शम और संतोष का साधन है, उस मनोजय की प्राप्ति के लिए उपाय सोचना चाहिए। उससे वह आनंद उपलब्ध होता है, जो परमात्मा के साथ ऐकात्म्य-संबंध से मिलता है। अतः देवता, दानव, राक्षस और मनुष्य को बैठते, चलते ,गिरते-पड़ते अथवा घूमते हुए सदा ही मनोजय -जनित उस परमसुख को अवश्य प्राप्त करना चाहिए; क्योंकि वह शांति रूप विकसित पुष्पों से लदे हुए विवेक रूप महान वृक्ष का फल है। पूर्ण रूप से शांत मन अत्यंत निर्मल और भ्रम रहित हो जाता है। उस विश्रांत मन में किसी प्रकार की स्पृहा नहीं रह जाती। उसके सभी मनोरथ पूर्ण हो जाते हैं। उस समय वह न तो किसी वस्तु की अभिलाषा करता है और न किसी का त्याग ही करता है ।
क्रमशः.........

 #योगवाशिष्ठ_महारामायण-- मुमुक्षु व्यवहार प्रकरण  (भाग ०९)// संसार प्राप्ति की अनर्थरूपता, ज्ञान का उत्तम माहात्म्य, श्र...
16/09/2021

#योगवाशिष्ठ_महारामायण-- मुमुक्षु व्यवहार प्रकरण (भाग ०९)
// संसार प्राप्ति की अनर्थरूपता, ज्ञान का उत्तम माहात्म्य, श्रीराम में प्रश्नकर्ता के गुणों की अधिकता का वर्णन, जीवनमुक्ति रूप फल के हेतुभूत वैराग्य आदि गुणों का तथा शम का विशेष रूप से निरूपण //
श्री वशिष्ठ जी कहते हैं-- राघव! तुम्हारा मन उत्तम गुणों से परिपूर्ण है। तुम हमारे योग्य शिष्य हो और प्रश्न करने का ढंग भी भली-भांति ज्ञात है। तुम कही हुई बात को विशेष रूप से समझ लेते हो, इसीलिए मैं आदर पूर्वक तुम्हें उपदेश देने को उद्यत हुआ हूं। अब तुम अपनी बुद्धि को, जो रजोगुण और तमोगुण से रहित और शुद्ध सत्वगुण का अनुसरण करने वाली है, आत्मा में स्थापित करके ज्ञानोपदेश श्रवण करने के लिए तैयार हो जाओ। प्रश्नकर्ता में जितने गुण होने चाहिए, वह सभी गुण तुममें वर्तमान हैं और जैसे समुद्र में रत्न आदि संपत्तियां भरी रहती हैं, उसी तरह वक्ता के सभी गुण मुझ में विद्यमान हैं। वत्स! जैसे चंद्रमा की किरणों के संपर्क से चंद्रकांत मणि में आर्द्रता आ जाती है, उसी तरह तुम भी ज्ञान के संसर्ग से उत्पन्न हुए वैराग्य को प्राप्त हुए हो। तुम तो सर्वथा शुद्ध हो। तुम्हारा बाल्यावस्था से ही शुद्ध विस्तृत तथा अविच्छिन्न सद्गुणों के द्वारा साथ संबंध चला आ रहा है-- ठीक उसी तरह जैसे कमल का अपने विस्तार वाले, निर्मल एवं दीर्घ तंतुओं से लगाव रहता है। इसलिए तुम्हीं इस कथा को सुनने के योग्य अधिकारी हो। अब मैं इस मोक्ष कथा का वर्णन करूंगा, तुम सावधान होकर इसे सुनो। यह कथा उस परम पद से संबंध रखने वाली है, जिसका साक्षात्कार हो जाने पर जितने लौकिक कार्य तथा जितनी लौकिक दृष्टियां हैं ,वे सब -के- सब पूर्णतया शांत हो जाती हैं। श्री राम ! संसार रूपी विष के आवेश से उत्पन्न हुई विषूचिका बड़ी दुस्सह होती है। विष निवारक गारुडमंत्र से ही उसका समूल नाश होता है। जीव और ब्रह्म का एकात्मबोध ही वह गारुड़ मंत्र है। वही परमार्थ ज्ञान का भी मूल मंत्र है। सत पुरुषों के साथ शास्त्रानुशीलन करने से निसंदेह उस योग की प्राप्ति होती है।
शास्त्र चिंतन करने पर इसी जन्म में अवश्य ही संपूर्ण दु:खो का समूल विनाश होता है-- ऐसा मानना चाहिए; इसलिए उन विवेकशील सत्पुरुषों को अवहेलना की दृष्टि से नहीं देखना चाहिए। जिस विवेकी पुरुष को सम्यग्दृष्टि की उपलब्धि हो चुकी है, वह पुरानी केंचुल का त्याग करके संताप रहित हुए सर्प की भांति मानसिक व्यथाओं से परिपूर्ण इस संसार के अनुराग का परित्याग करके संताप रहित हो जाता है। उसका अंतःकरण शीतल हो जाता है। वह संपूर्ण जगत को विनोद पूर्वक इंद्रजाल की तरह सुखरूप देखता है; परंतु जो उस सम्यग्दृष्टि से रहित है, उसके लिए यह संसार परम दु:खदायी ही है। यह संसारानुराग बड़ा ही कष्टदायक है। यह अनर्थ की आशंका किए बिना ही मोहवश विषयों में फंसे हुए पुरुषों को सर्प की तरह डॅस लेता है, खड़्ग की भांति काट डालता है, रस्सी की तरह आवेष्टित कर लेता है, आग के सदृश जला देता है, रात्रि की तरह अंधा बना देता है, सिर पर गिरे हुए पत्थर के समान मूर्छित कर देता है, विचार शक्ति को हर लेता है, मर्यादा का विनाश कर देता है और मोह रूपी अंधकूप में गिरा देता है। तृष्णा तुम्हें जर्जर कर देती है। अधिक क्या, संसार में ऐसा कोई दु:ख नहीं है जो संसारी मनुष्य को तृष्णा से ना प्राप्त होता हो। यह विषयभोग रूपिणी विषूचिका दुष्परिणाम वाली है। यह नरक- नगररूप शरीर-समुदाय के साथ अनुराग उत्पन्न करने वाली है। यदि इसकी चिकित्सा ना की जाए तो यह अवश्य ही उन-उन हजारों नारकीय दुर्गतियों को प्राप्ति कराती है। जहां नरकों में पाषाण भक्षण, खड़्ग द्वारा अंगों का छेदन, पर्वतशिखर से निपातन, पत्थर द्वारा उत्पीड़न , कीड़ों के द्वारा शरीर में छिद्र किए जाने और लोहे की गर्म जंजीरों द्वारा देह लपेटने को शरीर संस्कार के समान, युद्ध में काम आने वाले अग्नि बुझे बाणों की धारावाहिक वृष्टि को ग्रीष्म ऋतु में विनोद के लिए किए गए जल यंत्रों के फव्वारों की बूंद वर्षा के सदृश, सिर के काटे जाने को सुख निद्रा के तुल्य, मुख बंद करके बल पूर्वक किए गए मूकीभाव को स्वाभाविक मुख मुद्रा के समान हो सहन करना पड़ता है। राघव! इस प्रकार सहस्त्रों कष्टप्रद चेष्टाओं से परिपूर्ण इस दारुण संसार चक्र में उपर्युक्त उपदेश की अवहेलना नहीं करनी चाहिए; बल्कि ऐसा विचार और निश्चय अवश्य करना चाहिए कि शास्त्रानुशीलन से निश्चय ही कल्याण होता है। सत्पुरुषों के साथ शास्त्र चिंतन करने से जिसका देहाभिमान नष्ट हो गया है, उसे तत्व का ज्ञान हो जाने से सर्वव्यापक आत्मा का स्वरूप विदित हो जाता है। वह शुद्ध बुद्धि द्वारा परब्रह्म का साक्षात्कार कर लेता है और अज्ञान रूपी घने बादल के विलीन हो जाने पर उसके मोह का विनाश हो जाता है। फिर तो उसके लिए यह जगत में विचरण करना रमणीय हो जाता है। श्रीराम ! जिन्हें आत्म स्वरूप का ज्ञान हो गया है ऐसे उत्तम बुद्धि संपन्न महापुरुष इस पूर्वोक्त दृष्टि का अवलंबन करके इस संसार में विचरते हैं। उन्हें ना शोक होता है, ना कामना होती है और न ही वे शुभाशुभ की याचना ही करते हैं। वे इस संसार में सब कुछ करते हुए भी अकर्ता के समान रहते हैं। वे पवित्रता से रहते हैं और सत शास्त्रों में प्रतिपादित स्वच्छ कर्म करते हुए सन्मार्ग पर चलते हैं। अन्य लोगों की दृष्टि से वे आते हैं, जाते हैं, कर्म करते हैं और बोलते हैं; परंतु वास्तव में वे न आते हैं, न जाते हैं, न कर्म करते हैं और न बोलते ही हैं। क्योंकि परम आनंद स्वरूप परमात्मा को प्राप्त हुआ पुरुष न तो इंद्रजाल रूप मायिक कार्य करता है और न सांसारिक वासनाओं के पीछे ही दौड़ता है। वह बालकों की सी भ्रममूलक चपलता का परित्याग कर के पूर्व कथित परमात्मा के स्वरूप में ही सदा विराजमान रहता है।।इस प्रकार की स्थितियां आत्मतत्व के साक्षात्कार के अतिरिक्त अन्य उपाय से नहीं उपलब्ध होती। इसलिए पुरुष को चाहिए कि वह जीवन पर्यंत आत्मा की ही खोज करें, उसी की उपासना करें और उसी का यथार्थ ज्ञान प्राप्त करें। इसके अतिरिक्त उसके लिए और कोई कर्तव्य नहीं है ।
जिस पुरुष को अपने अनुभव, शास्त्र वचन और गुरु के उपदेश की एकवाक्यता का निश्चय हो गया है, वह निरंतर किए गए उपर्युक्त अभ्यास के द्वारा परमात्मा का साक्षात्कार कर लेता है। चाहे भारी से भारी आपत्ति क्यों ना आ पड़े, परंतु जो शास्त्र और उसके अर्थ की अवहेलना करने वाले तथा तत्वज्ञानी महापुरुषों की अवज्ञा करने वाले हैं, ऐसे मूर्खों का अनुकरण कभी नहीं करना चाहिए। क्योंकि भूतल पर मनुष्यों को जितना कष्ट अपने शरीर में स्थित अकेली मूर्खता से प्राप्त होता है, उतना दु:ख शारीरिक क्लेश, विष, आपत्ति और मानसिक व्यथाएं नहीं दे सकतीं। जिस संसारी पुरुष को मोक्ष के उपाय भूत इस शास्त्र रूप प्रकाश की प्राप्ति हो गई है, वह मोहान्धकार में भी पुनः अंधता को नहीं प्राप्त होता। तृष्णा मानव रूपी कमल को तभी तक संकुचित करती है जब तक विवेक रूपी सूर्य की निर्मल प्रभा का उदय नहीं होता। रघुनंदन! जैसे इस संसार में भगवान विष्णु एवं शंकर आदि तथा अन्य महर्षिगण जीवन मुक्त हो विचरते रहते हैं, उसी प्रकार तुम भी सांसारिक दु:ख से छुटकारा पाने के लिए मेरे जैसे आत्मीय जनों के साथ बैठकर गुरूपदेश एवं शास्त्रप्रमाण द्वारा अपने स्वरुप को जानकर जगत में विहार करो। इस जगत में सुख तो तुच्छ से तिनके के सदृश है परंतु दु:खों का तो अंत ही नहीं है; इसलिए जो दु:ख रूप परिणाम से परिपूर्ण है उन लौकिक सुखों में आस्था नहीं करनी चाहिए। क्रमशः......

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