माॅ मणिकर्णिका

माॅ मणिकर्णिका Contact information, map and directions, contact form, opening hours, services, ratings, photos, videos and announcements from माॅ मणिकर्णिका, Religious organisation, Manikarnika Ghat, Varanasi.

लोगों ने बलात्कारी, गंजेड़ी, भंगेड़ी, चोर, देश द्रोहियों को तांत्रिक बना दिया...  तुम जानते हो तांत्रिक किसे कहते है मूर्ख...
18/05/2026

लोगों ने बलात्कारी, गंजेड़ी, भंगेड़ी, चोर, देश द्रोहियों को तांत्रिक बना दिया...
तुम जानते हो तांत्रिक किसे कहते है

मूर्खों ने तंत्र की धज्जियाँ उड़ा दी !
छोटे - छोटे बच्चे और नगर वधु स्त्रियां ज्योतिष के नाम पर, तांत्रिक बन कर घूम रही है !
कांच की रंग विरंगी मालाएँ पहन कर या काले पीले कपड़े पहन कर, राख अपने शरीर पर लगा कर कोई भी स्त्री-पुरुष तांत्रिक सिद्धि पुरुष नही बन जाता !
मूर्खों वस्त्र हमारे प्रतीक चिंन्ह है, इनका मज़ाक 'हास्य' मत उड़ने दो,
आज के जिनको आप संत अखाड़े कहते हो ये लोग राजनैतिक नेता है, इन सब पर सैकड़ों पुलिस केश चल रहे है !
ये लोग गुरुओं के नाम पर घंटाल दास है !

जिनकी उम्र 15 से लेकर 40 वर्ष के बीच है ! तुम लोग येसे लोगों से प्रभावित हो जाते हो,
लेकिन तुम लोग तांत्रिक का मतलब ही नही जानते हो !
तांत्रिक का मलतब वर्षों तपश्या कर सिद्धि प्राप्त करना !
जैसे वशिष्ठ ऋषि, विस्मामित्र ऋषि, श्रृंगी ऋषि, भ्रंगु ऋषि, विशुद्धानंद, बामा खेपा, देवरहा बाबा, निखलेश्वरा नंद, नारायण दत्त श्रीमाली, पंडित गोपीनाथ कविराज जी और भी अनंत है !
तांत्रिक वही जिसने वर्षों तपश्या की हो , त्याग किया हो !
त्याग और तपश्या से ही सिद्धि प्राप्त होती है !
सोना जब तपता है तभी कुंदन बनता है !
लोहा पारस के संपर्क मैं आकर ही सोना बनता है !

तुम लोग तंत्र को बदनाम मत करो.. तंत्र तपश्या का मार्ग है, पण्डित्य या नेता नगरी, वेश्या वृति का मार्ग नही ..!!"

आप के पूर्वजों की धरोहर तंत्र, साधना तप मार्ग का सम्मान करो 💐💐💐

17/05/2026

जय माँ मणिकर्णिका
नमः पार्वती पतये हर हर महादेव

16/05/2026

जय माँ मणिकर्णिका

22/04/2026

अक्षय तृतीया पर मां मणिकर्णिका के पूजन के उपरांत गांडीव न्यूज को संबोधित करते हुए पीठाधीश्वर मणिकर्णिका चक्रपुष्करिणी पीठ श्री जयेंद्र नाथ दुबे बब्बू महाराज

जय माँ मणिकर्णिका
हर हर महादेव

19/04/2026
17/04/2026

अनादि तीर्थ चक्रपुष्करीणी की अधिष्ठात्री देवी माॅ मणिकर्णिका के चरण कमलों मे अपनी श्रद्धा के पुष्प निवेदित कर अक्षय लाभ प्राप्त करने तथा जीवन के समस्त कष्टो से मुक्ति पाने की अक्षय तिथी अक्षय तृतीया ( 20/04/2025 ) सोमवार को रात्रि मे मणिकर्णिका कुण्ड पर माॅ मणिकर्णिका के दर्शन कर अक्षय पुण्य के भागी बने ।

19/01/2026

धर्म पर सरकारी कब्जा : आस्था या सत्ता का व्यापार?
आज देश का हर सनातनी मन एक गंभीर प्रश्न पूछ रहा है – क्या अब हर धार्मिक स्थल पर सरकारी अधिग्रहण अनिवार्य हो गया है? क्या आस्था के केंद्र भी केवल प्रशासनिक प्रयोगशालाएँ बनकर रह जाएँगे?
जहाँ-जहाँ सरकार “डेवलपमेंट” के नाम पर धार्मिक स्थलों में घुस रही है, वहाँ की तस्वीर साफ दिख रही है। शासन–प्रशासन ऐसा व्यवहार कर रहा है मानो उस स्थान के मूल निवासी, पुजारी, महंत, संत–समाज, भक्त–परंपराएँ – सब कुछ अर्थहीन हों। सदियों से चली आ रही सनातनी व्यवस्थाएँ, पूजा पद्धतियाँ, धार्मिक रीति–रिवाज – सबको दरकिनार कर केवल एक ही आदेश चलता है – सरकार का आदेश!
आज स्थिति यह बन गई है कि मंदिर, तीर्थ, मठ और आश्रम श्रद्धा के केंद्र कम और सरकारी प्रोजेक्ट ज्यादा बनते जा रहे हैं। प्राचीन धरोहरों का मौलिक स्वरूप मिटाया जा रहा है। जिन स्थानों का महत्व उनकी आध्यात्मिक गरिमा से था, उन्हें चमकदार पत्थरों, कॉरिडोरों और व्यावसायिक दुकानों में बदला जा रहा है। आस्था को पर्यटन उद्योग में बदला जा रहा है।
सबसे दुखद बात यह है कि आम हिंदू को यह भ्रम दिया जा रहा है कि “हिंदुत्व बढ़ रहा है।” लेकिन सच यह है कि हिंदुत्व नहीं – हिंदुत्व के नाम पर नियंत्रण बढ़ रहा है। धर्म की स्वायत्तता खत्म हो रही है।
कुंभ, माघ मेला, बड़े-बड़े तीर्थ – ये सब कभी संतों, महात्माओं और धर्माचार्यों के नेतृत्व में चलते थे। वहाँ निर्णय धर्म परंपराओं के अनुसार होते थे। आज वहाँ वीआईपी संस्कृति हावी है। संतों की जगह अफसरशाही, राजनेताओं और उनके इशारों पर चलने वाले चाटुकारों का बोलबाला है।
मंदिरों की संपत्तियाँ सरकार के लिए कमाई का साधन बन गई हैं। चढ़ावा, दान, धर्मार्थ भूमि – सब पर नियंत्रण प्रशासन का। परंतु मस्जिद, चर्च, वक्फ बोर्ड जैसी संस्थाएँ आज भी स्वतंत्र हैं। आखिर निशाना केवल हिंदू मंदिर ही क्यों?
राजनीतिक संरक्षण में धर्म को भुनाया जा रहा है। आस्था के नाम पर आयोजन, उद्घाटन, शिलान्यास – सब कुछ राजनीतिक मंच बन गया है। असली भक्त, असली साधु–संत और मूल परंपराएँ हाशिये पर धकेली जा रही हैं।
यह लड़ाई किसी सरकार या पार्टी के खिलाफ नहीं – धर्म की स्वतंत्रता की लड़ाई है।
मंदिरों का संचालन भक्तों, संतों और धर्माचार्यों के हाथों में होना चाहिए – नौकरशाहों के नहीं।
अगर आज हिंदू समाज नहीं जागा, तो आने वाले समय में हमारे मंदिर केवल सरकारी दफ्तर बनकर रह जाएँगे – जहाँ पूजा कम और काउंटर ज्यादा होंगे।
अब समय आ गया है कि हर सनातनी आवाज उठाए और कहे –
“मंदिर सरकार के नहीं – धर्म और समाज के हैं!”

जय माँ मणिकर्णिका
जय श्री काशी विश्वनाथ
हर हर महादेव

🌹🎈🎯🎈🌹🎈🎯🎈🌹🎈🎯        श्री विद्या देवी ललिता त्रिपुरसुन्दरी से सम्बन्धित तन्त्र विद्या है।        ललितासहस्रनाम में इनके एक...
09/11/2024

🌹🎈🎯🎈🌹🎈🎯🎈🌹🎈🎯

श्री विद्या देवी ललिता त्रिपुरसुन्दरी से सम्बन्धित तन्त्र विद्या है।
ललितासहस्रनाम में इनके एक सहस्र (एक हजार) नामों का वर्णन है। ललितासहस्रनाम में श्रीविद्या के संकल्पनाओं का वर्णन है।
श्रीविद्या आत्मानुभूति के साथ-साथ भौतिक समृद्धि को भी जीवन के लक्ष्य के रूप में स्वीकार करता है।

श्री ललिता त्रिपुर सुन्दरी, जिनका वाम पाद , श्रीचक्र पर विराजित है। उनके चारों ओर ब्रह्मा, विष्णु, शिव, पराशिव और गणेश विद्यमान हैं। लक्ष्मी और सरस्वती उनको पंखे से हवा दे रहीं हैं।

श्रीविद्या का साहित्य विशाल है। ऋग्वेद मैं श्रीसूक्त मैं श्रीदेवी मतलब महालक्ष्मी जो परमेश्वरि के उपासना किया जाता हैं। ये ही वैदिक श्रीविद्या हैं।

श्रीविद्या के भैरव हैं- त्रिपुर भैरव (देव शक्ति संगमतंत्र)।
महाशक्ति के अनन्त नाम और अनन्त रूप हैं। इनका परमरूप एक तथा अभिन्न हैं।
त्रिपुरा उपासकों के मतानुसार ब्रह्म आदि देवगण त्रिपुरा के उपासक हैं। उनका परमरूप इंद्रियों तथा मन के अगोचर है।
एकमात्र मुक्त पुरूष ही इनका रहस्य समझ पाते हैं।
यह पूर्णाहंतारूप तथा तुरीय हैं।
देवी का परमरूप वासनात्मक है, सूक्ष्मरूप मंत्रात्मक है, स्थूलरूप कर-चरणादि-विशिष्ट है।

श्रीविद्या के उपासकों में प्रथम स्थान काम (मन्मथ) का है। यह देवी गुह्य विद्या प्रवर्तक होने के कारण विश्वेश्वरी नाम से प्रसिद्ध हैं।
देवी के बारह मुख और नाम प्रसिद्ध हैं, यथा- 🎌मनु,🎌 चंद्र, 🎌कुबेर, 🎌लोपामुद्रा,🎌 मन्मथ, 🎌अगस्त्य, 🎌अग्नि, 🎌सूर्य, 🎌इंद्र,🎌 स्कंद, 🎌शिव, 🎌क्रोध भट्टारक (या दुर्वासा)।
इन लोगों ने श्रीविद्या की साधना से अपने अधिकार के अनुसार पृथक् फल प्राप्त किया था।
श्री विद्या के जो प्रायः लुप्तप्राय मत है वो आज भी प्राचीनतम आगम मठ में पूर्णतः प्रचलित है
ऐसा भी कहा जाता है कि भारत के पाँच भागो में पाँच मठ:: पूर्व में असम और अरूणाचल , पश्चिम मे गुजरात , उत्तर मे हिमालय , दक्षिण मे कन्याकुमारी और मध्य मे मध्य प्रदेश में है

🙏💥🎌♦️🪷🔻✳️🎯🌹🪷

🕉️ श्रीविद्या 🕉️

🙏 🚩 ॐ ऐं ह्रीं श्रीं परापरातिरहस्य योगिनी
ह्रीं क ए ई ल ह्रीं ह स क ह ल ह्रीं स क ल ह्रीं
श्रीललिता महात्रिपुरसुन्दरी श्री राजराजेश्वरी षोड़शात्मिका श्रीविद्या चक्रेश्वरी शक्ति श्री पादुकां पूजयामि ।🚩

🚩 सम्यक शतं क्रतुन कृत्वा यत्फलं समवाप्नुयात ।
तत्फलं समवाप्नोति ललिता तव दर्शनात ॥🚩

🕉️ श्रीविद्या आत्म साधना है.
अपनी आत्मा को जानना और अपनी क्षमताओं का विकास करना ही श्री विद्या साधना का मूल है.
इस विद्या से हमें जो ज्ञान प्राप्त होता है उसके द्वारा हम अपने जीवन का उच्च स्तरीय विकास कर सुख दुःख से परे होकर सही मायनो में जीवन का आनंद प्राप्त कर सकते हैं।

ऐसे तो यह बहुत ही प्राचीन विद्या है जिसके विषय में विभिन्न ग्रंथों से हमें अलग अलग तरीके से जानकारी प्राप्त होती है।

श्रीविद्या को ही 🪔ललिता, 🪔राजराजेश्वरी, 🪔महात्रिपुरसुन्दरी, 🪔बाला, 🪔पंचदशी, 🪔षोडशी आदि नामों से भी जाना जाता है।
मूल तत्व में यह एक ही है मगर भाव और अवस्था के अनुसार इसमें भेद दिखाई देता है।

❤️‍🔥 दस महाविद्याओं में जो षोडशी विद्या है वह श्रीविद्या का ही रूप है .

इसे ब्रह्मविद्या भी कहते हैं .
🕉️ श्री शब्द से महालक्ष्मी का बोध होता है
🕉️ श्री शब्द से श्रेष्ठता का ज्ञान होता है
🕉️ श्री विद्या साधना में मात्र एक अक्षर के बीज मंत्र के रूप में अनंत गोपनीय रहस्य छुपे पड़े हैं जिसे हम सिर्फ साधना के माध्यम से ही जान सकते हैं .

❤️‍🔥 जहाँ भी श्री है वहां 📌सुख, 📌सम्पदा, 📌वैभव 📌शक्ति, 📌धन, 📌राज्य, 📌आत्मोत्थान आदि अनेक उपलब्धियां हैं।

❤️‍🔥 हम इस श्री विद्या के माध्यम से सभी उपलब्धियों को प्राप्त कर 🌡️धन, 🌡️धान्य, 🌡️समृद्धि, 🌡️सुख साधन, 🌡️आरोग्यता, 🌡️स्वास्थय, 🌡️धैर्य व सभी प्रकार के 🌡️ऐश्वर्य आदि दैवीय गुणों से परिपूर्ण हो जाते हैं .

❤️‍🔥 जीवन के सभी कष्टों से छूट कर सभी उत्तम भोगों को प्राप्त करके मोक्ष प्राप्त करते हैं , क्योंकि यह एकमात्र ऐसी विद्या है जिसे सात्विक राजसी या तामसी किसी भी साधना विधि द्वारा अत्यंत ही शीघ्र व सरलता से सिद्ध किया जा सकता है
❤️‍🔥 यह भोग और मोक्ष दोनों प्रदान करती हैं।

☸️ भगवती षोडशी शक्ति की सबसे मनोहर श्री विग्रह वाली देवी हैं ।
📌 उदय कालीन सूर्य के समान जिनकी कान्ति है, चतुर्भुजी, त्रिनेत्री, पाश, अंकुश, धनुष, बाण धारण किये हुए हैं।
📌 ये शांत मुद्रा में लेटे हुए सदाशिव पर स्थित कमल के आसन पर आसीन हैं।
📌 जो इनका आश्रय ग्रहण कर लेते हैं उनमें और ईश्वर में कोई भेद नहीं रह जाता ।

📌 इनके ललिता, राज-राजेश्वरी, महात्रिपुरसुंदरी, बाला, पञ्चदशी आदि अनेक नाम हैं, तथा इनके मंत्र के आदि अक्षर की भिन्नता से कादि, हादि, सादि आदि भेद है।
🔔 भगवती षोडशी श्यामा और अरूण वर्ण के भेद से दो कही गयी है
🎈प्रथम श्यामा रूप में दक्षिणकालिका, त्रिपुरभैरवी, सिद्ध भैरवी व कामेश्वरी कहलाती हैं तथा
🎈द्वितीय अरूण वर्णा श्री त्रिपुरसुन्दरी, राजराजेश्वरी, व ललिताम्बा कहलाती हैं।

⚱️ षोडशी को राजराजेश्वरी इसलिए भी कहा गया है क्योंकि यह अपनी कृपा से साधारण व्यक्ति को भी राजा बनाने में समर्थ हैं।
चारों दिशाओं में चार और एक ऊपर की ओर मुख होने से इन्हें पंचवक्रा कहा जाता है ।

⚱️ इनमें षोडश कलाएं पूर्ण रूप से विकसित हैं, इसलिए ये षोडशी कहलाती है।

⛳ अरुण वर्ण श्रीकुल से श्रीविद्या साधना में क्रमशः
1- षोडशी, 2- त्रिपुरसुन्दरी, 3- राजराजेश्वरी तथा 4- ललिताम्बा के रूप में सिद्ध की जाती हैं !

इनकी उपासना 🎌श्रीयंत्र या 🎌नवयोनी चक्र में की जाती है ।
ये अपने उपासक को भुक्ति और मुक्ति दोनों एक साथ प्रदान करती हैं।

📍📍📍📍📍📍📍📍📍📍📍📍📍$k$📍📍📍

💎 प्राणायाम आचमन आदि कर आसन पूजन करें :-

🚩 ॐ अस्य श्री आसन पूजन महामन्त्रस्य कूर्मो देवता मेरूपृष्ठ ऋषि पृथ्वी सुतलं छंद: आसन पूजने विनियोग: 🚩

विनियोग हेतु जल भूमि पर गिरा दें

पृथ्वी पर रोली से त्रिकोण का निर्माण कर इस मन्त्र से पंचोपचार पूजन करें:: -
🚩 ॐ पृथ्वी त्वया धृता लोका देवी त्वं विष्णुनां धृता त्वां च धारय मां देवी पवित्रां कुरू च आसनं 🚩
ॐ आधारशक्तये नम: । ॐ कूर्मासनायै नम: । ॐ पद्‌मासनायै नम: । ॐ सिद्धासनाय नम: । ॐ साध्य सिद्धसिद्धासनाय नम: 🚩

तदुपरांत गुरू गणपति गौरी पित्र व स्थान देवता आदि का स्मरण व पंचोपचार पूजन कर श्री चक्र के सम्मुख व अपने बाईं ओर वृत्त के मध्य त्रिकोण का निर्माण कर पंचोपचार पूजन करें व
मत्स्य मुद्रा का प्रदर्शन करें।

🚩ॐ फट्‌🚩 का उच्चारण कर शंख को धोकर पुष्प गन्ध डालकर षोड़शाक्षरी मन्त्र जपते हुए शंख को जल से पूर्ण कर उस मण्डल पर स्थापित करें व शंख के जल में.....
🚩।।ॐ गंगेश्च यमुनेश्चैव गोदावरी सरस्वती नर्मदे सिन्धु कावेरी जलेस्मिन सन्निधिं कुरू।।🚩 .....
.......से जल में तीर्थों का आवाहन इस प्रकार पूजन करें -

💎 शंख के आधार पर :-
🚩ॐ अं वह्नि मण्डलाय दशकलात्मने नम: ।
💎 शंख पर :-
🚩 ॐ उं सूर्य मण्डलाय द्वादशकलात्मने नम: ।
💎 शंख के जल में :-
🚩 ॐ मं सोम मण्डलाय षोड़शकलात्मने नम: ।

🚩 "हुं" 🚩का उच्चारण करते हुए शंख पर पंचोपचार पूजन कर धेनु मुद्रा का प्रदर्शन करते हुए📌 षोड़शाक्षरी मन्त्र का आठ बार जप करें व शंख में से थोड़ा जल प्रोक्षणी पात्र में गिरा दें ।

💎♦️ श्री चक्र के सम्मुख व अपने दाहिनी ओर पाद्य पात्र स्थापित करके श्री चक्र पर पीठ पूजन प्रारम्भ करें :-

🚩 ॐ पृथिव्यै नम: । ॐ आधारशक्तये नम: । ॐ कूर्मायै नमः । ॐ अनन्तायै नमः । ॐ रत्नद्वीपायै नमः । ॐ रत्न मण्डपायै नमः । ॐ रत्न वेदिकायै नमः । ॐ रत्न सिंहासनायै नमः ।
ॐ रत्न पीठायै नमः 🚩

💎 करन्यास :-
🚩ॐ ऐं ह्रीं श्रीं ऐं क ए ई ल ह्रीं अंगुष्ठाभ्याम नमः ।🚩
🚩ॐ ऐं ह्रीं श्रीं क्लीं ह स क ह ल ह्रीं तर्जनीभ्यां स्वाहा 🚩
🚩ॐ ऐं ह्रीं श्रीं सौं स क ल ह्रीं मध्यमाभ्यां वष्‌ट 🚩
🚩ॐ ऐं ह्रीं श्रीं ऐं क ए ई ल ह्रीं अनामिकाभ्यां हुम्‌ 🚩
🚩ॐ ऐं ह्रीं श्रीं क्लीं ह स क ह ल ह्रीं कनिष्ठिकाभ्यां वौषट 🚩
🚩 ॐ ऐं ह्रीं श्रीं सौं स क ल ह्रीं करतल करपृष्ठाभ्यां फट्‌ 🚩

💎 षड़ांग न्यास :-
🚩ॐ ऐं ह्रीं श्रीं ऐं क ए ई ल ह्रीं हृदयाय नमः 🚩
🚩 ॐ ऐं ह्रीं श्रीं क्लीं ह स क ह ल ह्रीं शिरसे स्वाहा 🚩
🚩 ॐ ऐं ह्रीं श्रीं सौं स क ल ह्रीं शिखायै वष्‌ट 🚩
🚩 ॐ ऐं ह्रीं श्रीं ऐं क ए ई ल ह्रीं कवचायै हुम्‌ 🚩
🚩 ॐ ऐं ह्रीं श्रीं क्लीं ह स क ह ल ह्रीं नेत्रत्रयाय वौषट 🚩
🚩ॐ ऐं ह्रीं श्रीं सौं स क ल ह्रीं अस्त्राय फट्‌ 🚩

""श्री पादुकां पूजयामि नमः"" बोलकर शंख के जल से अर्घ्य प्रदान करते रहें।

💎 श्री चक्र के बिन्दु चक्र में निम्न मन्त्रों से गुरू पूजन करें :-

🚩 ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री गुरू पादुकां पूजयामि नमः🚩
🚩 ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री परम गुरू पादुकां पूजयामि नमः 🚩
🚩 ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री परात्पर गुरू पादुकां पूजयामि नमः 🚩

💎 श्री चक्र के बिन्दु पीठ में भगवती शिवा महात्रिपुरसुन्दरी का ध्यान करके योनि मुद्रा का प्रदर्शन करते हुए पुन: इस मन्त्र से तीन बार पूजन करें :-
🚩 ॐ ऐं ह्रीं श्रीं ह्रीं क ए ई ल ह्रीं ह स क ह ल ह्रीं स क ल ह्रीं श्री ललिता महात्रिपुर सुन्दरी श्री विद्या राज राजेश्वरी श्री पादुकां पूजयामि नमः 🚩

💎 श्री चक्रराज निलयम का ध्यान करें :-

ॐ बालार्क मण्डलाभासां चतुर्बाहां त्रिलोचनां। पाशांकुश शरांश्चापं धारयन्तीं शिवां भजे ।।

🔻 आवरण पूजा :-
(१) 💥 त्रैलोक्यमोहन चक्रे ::-

🎯प्रथम रेखा :- ॐ ऐं ह्रीं श्रीं अणिमाद्यष्ट देवी श्री पादुकां पूजयामि नमः ।

🎯 द्वितीय रेखा :-
🚩 ॐ ऐं ह्रीं श्रीं ब्राह्म्याद्यष्ट देवी श्री पादुकां पूजयामि नम🚩

🎯 तृतीय रेखा :-
ॐ ऐं ह्रीं श्रीं सर्वसंक्षोभिण्यादि दश मुद्रा देवी श्री पादुकां पूजयामि नमः 🚩

🔻 चक्राग्रे :-
🚩ॐ ऐं ह्रीं श्रीं प्रकट योगिनी त्रिपुरा चक्रेश्वरी श्री पादुकां पूजयामि नमः 🚩

🎯 सर्वाशा परिपूरक चक्रे ::-

🚩ॐ ऐं ह्रीं श्रीं कामाकर्षण्यादि षोड़श नित्या कला देवी श्री पादुकां पूजयामि नमः 🚩

🎯 चक्राग्रे :-
🚩ॐ ऐं ह्रीं श्रीं गुप्त योगिनी त्रिपुरेशी चक्रेश्वरी श्री पादुकां पूजयामि नमः 🚩

(३) 🎯 सर्व संक्षोभण चक्रे ::-

🚩ॐ ऐं ह्रीं श्रीं अनंग कुसुमादि अष्ट देवी श्री पादुकां पूजयामि नमः 🚩

💙 चक्राग्रे :-
ॐ ऐं ह्रीं श्रीं गुप्ततर योगिनी त्रिपुरसुन्दरी चक्रेश्वरी श्री पादुकां पूजयामि नमः ।

(४) 🎯 सर्वसौभाग्य दायक चक्रे ।

🚩ॐ ऐं ह्रीं श्रीं सर्व संक्षोभिणि आदि चतुर्दश देवी श्री पादुकां पूजयामि नमः🚩

💙 चक्राग्रे :-
🚩ॐ ऐं ह्रीं श्रीं सम्प्रदाय योगिनी त्रिपुरवासिनी चक्रेश्वरी श्री पादुकां पूजयामि नमः 🚩

(५) 🎯 सर्वार्थसाधक चक्रे ::-

🚩ॐ ऐं ह्रीं श्रीं सर्व सिद्धि प्रदादि दश देवी श्री पादुकां पूजयामि नमः ।🚩

💙 चक्राग्रे :-
🚩ॐ ऐं ह्रीं श्रीं कुलोत्तीर्ण योगिनी त्रिपुरा श्री चक्रेश्वरी श्री पादुकां पूजयामि नमः 🚩

(६) 🎯 सर्व रक्षाकर चक्रे ::-

🚩ॐ ऐं ह्रीं श्रीं सर्व सर्वज्ञादि दश देवी श्री पादुकां पूजयामि नमः🚩

🎯 चक्राग्रे :-
ॐ ऐं ह्रीं श्रीं निगर्भ योगिनी त्रिपुरमालिनी चक्रेश्वरी श्री पादुकां पूजयामि नमः ।

(७) 💙 सर्व रोगहर चक्रे ::-

🚩ॐ ऐं ह्रीं श्रीं वशिन्यादि अष्ट देवी श्री पादुकां पूजयामि नमः🚩

🎯चक्राग्रे :-
🚩 ॐ ऐं ह्रीं श्रीं रहस्य योगिनी त्रिपुरासिद्धा चक्रेश्वरी श्री पादुकां पूजयामि नमः 🚩

(८) 💙 सर्वसिद्धि प्रद चक्रे ::--

🎯अग्रकोणे :-
🚩 ॐ ऐं ह्रीं श्रीं ऐं महाकामेश्वरी देव्या शक्ति श्री पादुकां पूजयामि नमः 🚩

🎯दक्षिणकोणे :-
🚩 ॐ ऐं ह्रीं श्रीं क्लीं महावज्रेश्वरी देव्या शक्ति श्री पादुकां पूजयामि नमः 🚩

🎯वामकोणे :-
🚩 ॐ ऐं ह्रीं श्रीं सौं महाभगमालिनी देव्या शक्ति श्री पादुकां पूजयामि नमः 🚩

🎯 चक्राग्रे :-
🚩ॐ ऐं ह्रीं श्रीं अतिरहस्य योगिनी त्रिपुराम्बा चक्रेश्वरी शक्ति श्री पादुकां पूजयामि नमः 🚩

(९) 💙 सर्वानन्द मये महाबिन्दु चक्रे ।

🚩ॐ ऐं ह्रीं श्रीं महात्रिपुरसुन्दरी श्रीविद्या शक्ति श्री पादुकां पूजयामि नमः 🚩
तीन बार पूजन करें ।

💎 महाबिन्दु चक्र के दाहिनी ओर :-
🚩ॐ ऐं ह्रीं श्रीं महालिंग मुद्रा शक्ति श्री पादुकां पूजयामि नमः🚩

💎 महाबिन्दु चक्र के बाईं ओर :-
🚩ॐ ऐं ह्रीं श्रीं महायोनि मुद्रा शक्ति श्री पादुकां पूजयामि नमः 🚩

💎 महाबिंदु पीठ पर :-
🚩ॐ ऐं ह्रीं श्रीं परापरातिरहस्य योगिनी ह्रीं क ए ई ल ह्रीं ह स क ह ल ह्रीं स क ल ह्रीं श्री ललिता महात्रिपुरसुन्दरी श्री राजराजेश्वरी षोड़शात्मिका श्रीविद्या चक्रेश्वरी शक्ति श्री पादुकां पूजयामि नमः 🚩

🙏 अब तीन बार अर्घ्य जल प्रदान करें :-
🚩ॐ ऐं ह्रीं श्रीं महाबैन्दव चक्रस्य अधिष्ठात्री परापरातिरहस्य योगिनी श्री ललिता महात्रिपुरसुन्दरी श्री राजराजेश्वरी षोड़शात्मिका श्रीविद्या चक्रेश्वरी शक्ति देव्यै समुद्रा: ससिद्धय: सायुधा: सशक्तय: सवाहना: सपरिवारा: सर्वोपचारै: सम्पूजिता: सन्तर्पिता: सन्तुष्टा: सन्तु नमः 🚩

🙏 महायोनि मुद्रा करके प्रणाम करें
तदुपरान्त अरती स्तोत्र आदि तथा शोडाक्षरी मूल मन्त्र जप आदि कर्म सम्पन्न कर हाथ में जल लेकर भगवती पराम्बा को अपना कर्म समर्पित कर आसन त्यागें ।

अदभूत और अनूभूत तंत्रसूत्र लेख -1 - भैरव - भ्रं या भ्रमकलियुग में शीघ्र फलदायी ऐक साधना भैरव की है परंतु हमारे अनुभव के ...
31/10/2024

अदभूत और अनूभूत तंत्रसूत्र लेख -1 - भैरव - भ्रं या भ्रम
कलियुग में शीघ्र फलदायी ऐक साधना भैरव की है परंतु हमारे अनुभव के अनुसार वतॅमान युग में भैरव का स्वरूप भेद ऐक बहुत ही बडा प्रश्न है और अधिकतर साधक भैरव उपासना करते तो है परंतु ईनके स्वरूप भेद का ज्ञान नही है कि वह जो मन्त्र करते है वह किस भैरव से संबंधित है । ईन सभी भैरव स्वरूप की साधना पद्धति भिन्न भिन्न है और उसके फल भी परंतु आज सब कुछ खीचडी सा हो गया है ईसी कारण यह लेख लिख रहा हूँ ताकि साधको को ज्ञानवद्धॅन हो सके औ उनकी साधना में पारदशिॅता आऐ और साधना संबंधी संशय और भ्रम दूर हो सके । यह गुरु परंपरागत और वषोॅ की साधना के अनुभव है । यह आजतक लेख या पुस्तक में अप्राप्य और अप्रकाशित है ।
1. भैरव प्रथम स्वरूप - यह अपदेवता का ऐक प्रकार है । निम्न कोटी के प्रेत शक्ति को कुछ क्षेत्र जैसे की राजस्थान, उत्तर प्रदेश ईत्यादि में भैरव कहा जाता है । अधिकतर शाबर मन्त्र निम्न कोटी के क्षेत्रिय प्रेत की ही उपासना होती ही है और ईसी कारण वह क्षेत्र विशेष में ही प्रभावशाली होते है । यह भैरव अथाॅत् प्रेत की शक्ति मयाॅदित होती है ईसी कारण ईनके साधक कुछ ही कायॅ कर सकते है । यह अधिकतर तामसिक होते है ।
2. भैरव द्वितिय स्वरूप - यह भी अपदेवता का ऐक प्रकार है परंतु यह शक्तिशाली प्रेत होता है और उसके अधिपत्य में कई प्रेत होते है । यह अपने अधिपत्य में रहे प्रेतो की संख्या बढाता रहता है और उनसे और अधिक शक्ति प्राप्त करता रहता है । चौराहे जहाँ पर अधिक अकस्मात होते रहते है वहाँ ऐसे भैरव की उपस्थिति होती है । ईनकी साधना करने से साधक प्रथम भैरव स्वरूप प्रेत से कुछ अधिक कायॅ कर सकता है और अन्य पशुयोनि से कायॅ भी ले सकता है । यह पूणॅरूपेण तामसिक ओर हानि पहुँचानेवाले होते है ।
3.भैरव तृतिय स्वरूप - कुल विशेष की रक्षा में विरगति को प्राप्त हुऐ व्यक्ति के प्रेत को भी भैरव या कुल भैरव कहते है । ईनकी साधना मात्र उस कुल विशेष के लिऐ फलदायी है और वह उस कुल की रक्षा करते है जब तक प्रसन्न हि, रुष्ट होने पर कुल पर उपाधि और कुलनाश तक हो सकता है । क्षत्रिय वणॅ के कुल में यह भैरव अधिकतर प्राप्त होते है । कई कुल में ईनकी स्थापना करके पूजा भी करते है और ईनके प्रदेश विशेष से नाम भी भिन्न होते है ।
4. भैरव चतुथॅ स्वरूप - किसी क्षेत्रविशेष की रक्षा के लिऐ वीरगति को प्राप्त हुऐ व्यक्ति का प्रेत को भी भैरव या क्षेत्र भैरव कहा जाता है । लोकदेवता, ग्रामदेवता क्षेत्रवीर के रूप में ईनकी ही पूजा होती है । ईनके स्थानविशेष और मंदिर भी लोगो द्वारा बनाऐ गऐ है । यह बलवान प्रेत होते है और अधिकतर सात्विक या राजसिक होते है ।
5.भैरव पंचम स्वरूप - तंत्र और कमॅकाण्ड में ईनकी स्थापना और पूजन किया जाता है । ईनकी संख्या बावन है और यह आदि वीर है जिनके लिऐ भी भैरव नाम प्रचलित है । यह उपरोक्त दोनो वीर से अधिक शक्तिशाली होते है और ईनमें से किसी ऐक विर की सिद्धि से भी मनुष्य आश्चयॅजनक कायॅ कर सकता है । बावन वीर की पूणॅ सिद्धि तंत्र की बहुत बडी उपलब्धि है । यह अघोर पंथ की ऐक गोपनिय साधना है । हर ऐक विर का भी कायॅविशेष, शक्ति और गुण भिन्न भिन्न है।
6.भैरव षष्ठ स्वरूप - तंत्र और कमॅकाण्ड में क्षेत्रपाल की स्थापना और पूजन किया जाता है । ईनका प्रचलित नाम भी भैरव, रक्षपाल या क्षेत्रपाल भैरव है । ईनकी संख्या ईक्यावन है । यह वीर से अधिक शक्तिशालि होते है और सिद्ध होने पर यह व्यक्ति या क्षेत्र की रक्षा करते है । यह ऐक रक्षक देव है । नरसिंघ की साधना में जिनकी रक्षपाल के नाम से स्थापना तथा पूजा होती है वह यही है ।
7. सप्तम स्वरूप- जब शिव ने सती के शव के टुकडे जहाँ जहाँ गिरे थे वहाँ वहाँ शक्तिपीठ होने का आशिवाॅद दिया और देवि के स्वरूप विशेष के वहाँ स्थापित किया तब उस शक्तिपीठ क्षेत्रविशेष की रक्षा के लिऐ वहाँ ऐक ऐक भैरव को भी नियुक्त और स्थापित किया । शक्तिपीठ की कुल संख्या बावन है और ईनकी भी संख्या बावन है । ईनका उल्लेख रुद्रयामल तंत्र में है । ईन्हे बावन भैरव के नाम से जाना जाता है । ईनके शक्तिपीठ के भैरवो के प्रचलित नाम और मूल नाम में थोडा अंतर पाया जाता है ।
8. भैरव अष्टम स्वरूप - सूयॅ(ग्रह नही अपितु पंचदेव स्वरूप सूयॅ) की तांत्रिक साधना में सूयॅ भगवान की मातॅण्ड भैरव या गभस्ति भैरव के रूप में साधना की जाती है । यह भी ऐक शक्तिशालि स्वरूप है भैरव का ।
9. नवम भैरव स्वरूप - मुख्य भैरव कुल आठ है । यह पूणॅ तांत्रिक स्वरूप है और यह आठ दिशा और आठो दिशा की सभी योनिओ के अधिपति है । ईन आठ भैरव की सिद्धि तंत्र की अतिउच्चकोटी की सिद्धि मानी गई है । ईन आठो भैरव की उपासना के प्रयोजन विशेष भी है परंतु ईनमें से किसी ऐक की सिद्धि भी असंभव से असंभव कायॅसिद्धि कर सकती है और उसका साधक षटकमॅ और रक्षा कमॅ में सिद्धहस्त होता है । ईनकी साधना और सिद्धि अतिशय तामसिक है । यह शिव की ही विभूतियाँ और उन्ही से उत्पन्न है । शिव ने ईनकी उत्पत्ति आठ दिशा में रहनेवाली भूत,प्रेत, यक्ष,गंधवॅ,नाग,किन्नर ईत्यादि योनि के संचालन हैतु की है । अष्ट मातृका ईन अष्टभैरव की शक्तियाँ है जिनसे यह कायॅ करते है । किसी भी देव या देवी की मंत्रतंत्रयंत्र की साधना ईनके बीना अपूणॅ है ।
10. भैरव दशम स्वरूप - जब शिव ने सृष्टि संचालन में अपदेवता की सृष्टि संचालन हैतु आठ भैरव की उत्पत्ति की तब ईन प्रत्येक आठ भैरव को सात सात भैरव पाषॅद के रूप में उनके कायॅ की सहायता हेतु प्रदान किये । ईन्ही आठ दिशा के अधिपति आठ भैरव और उनके सात सात पाषॅद भैरव के समुह को चौसठ भैरव के रूप पूजा जाता है । तांत्रिक और पौराणिक कमॅकाण्ड में ईनकी स्थापना पूजादि होती है । मुख्य आठ भैरव में से किसी ऐक भैरव की सिद्धि होने पर उनके सात भैरव की सिद्धि स्वतः ही हो जाती है ।
11. ऐकादश भैरव स्वरूप - ब्रह्मराक्षस, ब्रह्मप्रेत या ब्रह्मपिशाच जो की सबसे शक्तिशाली प्रेत है और ईनको वैताल भी कहा जाता है ईनको भी प्रचलित भाषा में भैरव कहते है । ईनकी सिद्धि अघोर संप्रदाय में की जाती है । राजा विक्रमादित्य को ईन्ही की सिद्धि प्राप्त थी । ईनकी अधिष्ठात्री उज्जेन की हरसिद्धि है । यह ऐक बहुत ही शक्तिशालि और विशिष्ट भैरव स्वरूप शक्ति है और बहुत से कायॅ कर सकते है । यही ऐक प्रेत शक्ति है जो किसी भी साधक के किसी भी देवी देवता के कवच को भेद सकते है और यह किसी भी मंदिर में भी जा सकते है । ईनकी न्यूनतम शक्ती भी ऐक हजार प्रेत के बराबर होती है ।
12. द्वादश भैरव स्वरूप - यह भैरव का बाल स्वरूप है और ईन्हे बटुक भैरव कहते है । ईनकी साधना का ऐक भिन्न संप्रदाय ही है । कोई कोई ईसे भगवति कालि का पुत्र, दुगाॅ भगवति के सहचर या शिव का बाल स्वरूप भी कहते है । ईनकी साधना सात्विक, राजसिक और तामसिक तीनो स्वरूप में होती है । ईनकी सिद्धि अतिकठिन है परंतु यह सिद्ध हो जाऐ तो षटकमॅ और कठिन कायोॅ की सिद्धि सहज ही हो जाती है । ईनकी सिद्धि से साधक स्वयं की या किसी और की या क्षेत्र विशेष या साधना विशेष में रक्षा भी कर सकता है ।
14. त्रयोदश भैरव स्वरूप - यह भैरव का युवा स्वरूप है और ईन्हे काल भैरव कहते है । ईनकी उत्पत्ति ब्रह्मा के अहंकार को समाप्त करने के लिऐ हुई थी । यह शिव से ही उत्पन्न है । काशी के कोतवाल के रूप में भी यह जाने जाते है । ईनकी सिद्धि से पापनाश, संचित कमॅ के कष्टो से मुक्ति, षटकमॅ ईत्यादि सिद्धियाँ प्राप्त होती है । ईनकी साधना का भी ऐक अलग संप्रदाय है । यह अघोर पंथ में भी उपास्य देवता है । यह अष्टभैरव के भी अधिपति है और सभी स्मशानिक शक्तियो के भी अधिपति है । यह काल और मृत्यु के अधिपति है और समय के संचालक है । ईन्हे ही महाभैरव भी कहते है । यह दशदिक्पाल के भी अधिपति है ।
14. चतुदॅश भैरव स्वरूप - यह शिव का ऐक अवतार है और ईनका यह अवतार नारायण के उग्र अवतार श्रीनरसिंह भगवान के स्वरूप के अहंकार के खण्डन करने का लिऐ हुआ था । शिव के ईस अवतार का मूल नाम शरभेश्वर है परंतु ईन्हे आकाश भैरव के स्वरूप में भी जाना जाता है । यह ऐक बहुत ही उग्र देवता है । ईनकी उपासना बहुत ही उच्च कोटी के साधक ही कर सकते है । ईनकी साधना पद्धति ही गारुडी विद्या के रूप में जानी जाती है जो तंत्र की अतीगोपनिय विद्या है । यह मारण के देवता है । ईनके अधिकतर प्रयोग मारण के ही है और ईनके मारण प्रयोग यदि किया जाऐ तो त्रिलोक में कोई रक्षा नही कर सकता ।
15. पंचदश भैरव स्वरूप - यह आदि भैरव है और सभी सृष्टि की सभी आदिअनादि शक्तियोँ के अधिपति है । यह स्वयं शिव का आदि तांत्रिक स्वरूप है और सभी अन्य भैरव ईन्ही के स्वरूप के विस्तार है । यह तंत्र के आदिसंप्रदाय में उपास्य है । यह है कापालिक संप्रदाय में उपास्य भगवान महाकाल भैरव और यही है भगवति आदिशक्ती महाकालि का पति, अधिपति और सहचर ।
ईनका स्वरूप और साधान आज प्रचलन में नही है और यह यह है भी अत्यंत गोपनिय । ईनका मूल साकार स्वरूप आज कहीँ भी दृष्टिगोचर नही होता । कापालिक संप्रदाय के दो ही ईष्ट है भगवान महाकाल भैरव और भगवति महाकालि । ईनकी साधना अनंत उजाॅ की धारा से जुडाव की साधना है । पीण्डी या निराकार स्वरूप में यही स्वयं महाकाल है । निराकार या पीण्डी स्वरूप में ईन्ही का साधना होती है । ईन्ही को वेद में महारुद्र, पुराणो में शिव और तंत्र में महाकाल भैरव कहते है । ईनका साधक स्वयं भैरव स्वरूप हो जाता है । ईनकी साधना पद्धति पूणतः तांत्रिक और अतितामसिक है । ईनकी साधना में पशुबलि और नरबलि का भी विधान प्रचलन में था । यह महाकाल = समय और भैरव = आकाश के अधिपति और संचालक है ईसी कारण ईन्हे महाकाल भैरव कहाजाता है । भगवान महाकाल भिरव और भगवति महाकालि की लिला स्वरूप ही ईस सृष्टि की उत्पत्ति, पालन और संहार होता है । सृष्टि की उत्पत्ति का पहले और सृष्टि के समापन का बाद ईन्ही की उपस्थिति और सत्ता रहती है । ईनकी उपासना अति से अति गोपनिय है । गुरु परंपरा में गुरु मात्र ऐक ही शिष्य को ईनकी साधना देते है और वह भी पूणॅ परिक्षण के बाद । ईनकी साधना से साधक स्वयं रुद्र या शिव या भैरव स्वरूप हो जाता है ।
उक्त सभी भैरव के स्वरूप, साधना पद्धति भिन्न भिन्न है ।

यह लेख हमारी साधनात्मक अनुभूति, प्रगट और गुप्त साधक से साथ संवाद और गुरु परंपरा पर आधारित है । आप इसे मानने के लिए बाध्य नहीं है । कृपया कुतर्क न करे । इस लेख को पर्सनल न ले और पर्सनल कमेंट न करे, यदि गलत या पर्सनल कमेंट करनी है तो मैसेंजर में करे, उचित सम्मान दिया जाएगा ।

जय श्री अघोरेश्वर
जय श्री अघोरेश्वरी

Address

Manikarnika Ghat
Varanasi
221001

Website

Alerts

Be the first to know and let us send you an email when माॅ मणिकर्णिका posts news and promotions. Your email address will not be used for any other purpose, and you can unsubscribe at any time.

Share