09/11/2024
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श्री विद्या देवी ललिता त्रिपुरसुन्दरी से सम्बन्धित तन्त्र विद्या है।
ललितासहस्रनाम में इनके एक सहस्र (एक हजार) नामों का वर्णन है। ललितासहस्रनाम में श्रीविद्या के संकल्पनाओं का वर्णन है।
श्रीविद्या आत्मानुभूति के साथ-साथ भौतिक समृद्धि को भी जीवन के लक्ष्य के रूप में स्वीकार करता है।
श्री ललिता त्रिपुर सुन्दरी, जिनका वाम पाद , श्रीचक्र पर विराजित है। उनके चारों ओर ब्रह्मा, विष्णु, शिव, पराशिव और गणेश विद्यमान हैं। लक्ष्मी और सरस्वती उनको पंखे से हवा दे रहीं हैं।
श्रीविद्या का साहित्य विशाल है। ऋग्वेद मैं श्रीसूक्त मैं श्रीदेवी मतलब महालक्ष्मी जो परमेश्वरि के उपासना किया जाता हैं। ये ही वैदिक श्रीविद्या हैं।
श्रीविद्या के भैरव हैं- त्रिपुर भैरव (देव शक्ति संगमतंत्र)।
महाशक्ति के अनन्त नाम और अनन्त रूप हैं। इनका परमरूप एक तथा अभिन्न हैं।
त्रिपुरा उपासकों के मतानुसार ब्रह्म आदि देवगण त्रिपुरा के उपासक हैं। उनका परमरूप इंद्रियों तथा मन के अगोचर है।
एकमात्र मुक्त पुरूष ही इनका रहस्य समझ पाते हैं।
यह पूर्णाहंतारूप तथा तुरीय हैं।
देवी का परमरूप वासनात्मक है, सूक्ष्मरूप मंत्रात्मक है, स्थूलरूप कर-चरणादि-विशिष्ट है।
श्रीविद्या के उपासकों में प्रथम स्थान काम (मन्मथ) का है। यह देवी गुह्य विद्या प्रवर्तक होने के कारण विश्वेश्वरी नाम से प्रसिद्ध हैं।
देवी के बारह मुख और नाम प्रसिद्ध हैं, यथा- 🎌मनु,🎌 चंद्र, 🎌कुबेर, 🎌लोपामुद्रा,🎌 मन्मथ, 🎌अगस्त्य, 🎌अग्नि, 🎌सूर्य, 🎌इंद्र,🎌 स्कंद, 🎌शिव, 🎌क्रोध भट्टारक (या दुर्वासा)।
इन लोगों ने श्रीविद्या की साधना से अपने अधिकार के अनुसार पृथक् फल प्राप्त किया था।
श्री विद्या के जो प्रायः लुप्तप्राय मत है वो आज भी प्राचीनतम आगम मठ में पूर्णतः प्रचलित है
ऐसा भी कहा जाता है कि भारत के पाँच भागो में पाँच मठ:: पूर्व में असम और अरूणाचल , पश्चिम मे गुजरात , उत्तर मे हिमालय , दक्षिण मे कन्याकुमारी और मध्य मे मध्य प्रदेश में है
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🕉️ श्रीविद्या 🕉️
🙏 🚩 ॐ ऐं ह्रीं श्रीं परापरातिरहस्य योगिनी
ह्रीं क ए ई ल ह्रीं ह स क ह ल ह्रीं स क ल ह्रीं
श्रीललिता महात्रिपुरसुन्दरी श्री राजराजेश्वरी षोड़शात्मिका श्रीविद्या चक्रेश्वरी शक्ति श्री पादुकां पूजयामि ।🚩
🚩 सम्यक शतं क्रतुन कृत्वा यत्फलं समवाप्नुयात ।
तत्फलं समवाप्नोति ललिता तव दर्शनात ॥🚩
🕉️ श्रीविद्या आत्म साधना है.
अपनी आत्मा को जानना और अपनी क्षमताओं का विकास करना ही श्री विद्या साधना का मूल है.
इस विद्या से हमें जो ज्ञान प्राप्त होता है उसके द्वारा हम अपने जीवन का उच्च स्तरीय विकास कर सुख दुःख से परे होकर सही मायनो में जीवन का आनंद प्राप्त कर सकते हैं।
ऐसे तो यह बहुत ही प्राचीन विद्या है जिसके विषय में विभिन्न ग्रंथों से हमें अलग अलग तरीके से जानकारी प्राप्त होती है।
श्रीविद्या को ही 🪔ललिता, 🪔राजराजेश्वरी, 🪔महात्रिपुरसुन्दरी, 🪔बाला, 🪔पंचदशी, 🪔षोडशी आदि नामों से भी जाना जाता है।
मूल तत्व में यह एक ही है मगर भाव और अवस्था के अनुसार इसमें भेद दिखाई देता है।
❤️🔥 दस महाविद्याओं में जो षोडशी विद्या है वह श्रीविद्या का ही रूप है .
इसे ब्रह्मविद्या भी कहते हैं .
🕉️ श्री शब्द से महालक्ष्मी का बोध होता है
🕉️ श्री शब्द से श्रेष्ठता का ज्ञान होता है
🕉️ श्री विद्या साधना में मात्र एक अक्षर के बीज मंत्र के रूप में अनंत गोपनीय रहस्य छुपे पड़े हैं जिसे हम सिर्फ साधना के माध्यम से ही जान सकते हैं .
❤️🔥 जहाँ भी श्री है वहां 📌सुख, 📌सम्पदा, 📌वैभव 📌शक्ति, 📌धन, 📌राज्य, 📌आत्मोत्थान आदि अनेक उपलब्धियां हैं।
❤️🔥 हम इस श्री विद्या के माध्यम से सभी उपलब्धियों को प्राप्त कर 🌡️धन, 🌡️धान्य, 🌡️समृद्धि, 🌡️सुख साधन, 🌡️आरोग्यता, 🌡️स्वास्थय, 🌡️धैर्य व सभी प्रकार के 🌡️ऐश्वर्य आदि दैवीय गुणों से परिपूर्ण हो जाते हैं .
❤️🔥 जीवन के सभी कष्टों से छूट कर सभी उत्तम भोगों को प्राप्त करके मोक्ष प्राप्त करते हैं , क्योंकि यह एकमात्र ऐसी विद्या है जिसे सात्विक राजसी या तामसी किसी भी साधना विधि द्वारा अत्यंत ही शीघ्र व सरलता से सिद्ध किया जा सकता है
❤️🔥 यह भोग और मोक्ष दोनों प्रदान करती हैं।
☸️ भगवती षोडशी शक्ति की सबसे मनोहर श्री विग्रह वाली देवी हैं ।
📌 उदय कालीन सूर्य के समान जिनकी कान्ति है, चतुर्भुजी, त्रिनेत्री, पाश, अंकुश, धनुष, बाण धारण किये हुए हैं।
📌 ये शांत मुद्रा में लेटे हुए सदाशिव पर स्थित कमल के आसन पर आसीन हैं।
📌 जो इनका आश्रय ग्रहण कर लेते हैं उनमें और ईश्वर में कोई भेद नहीं रह जाता ।
📌 इनके ललिता, राज-राजेश्वरी, महात्रिपुरसुंदरी, बाला, पञ्चदशी आदि अनेक नाम हैं, तथा इनके मंत्र के आदि अक्षर की भिन्नता से कादि, हादि, सादि आदि भेद है।
🔔 भगवती षोडशी श्यामा और अरूण वर्ण के भेद से दो कही गयी है
🎈प्रथम श्यामा रूप में दक्षिणकालिका, त्रिपुरभैरवी, सिद्ध भैरवी व कामेश्वरी कहलाती हैं तथा
🎈द्वितीय अरूण वर्णा श्री त्रिपुरसुन्दरी, राजराजेश्वरी, व ललिताम्बा कहलाती हैं।
⚱️ षोडशी को राजराजेश्वरी इसलिए भी कहा गया है क्योंकि यह अपनी कृपा से साधारण व्यक्ति को भी राजा बनाने में समर्थ हैं।
चारों दिशाओं में चार और एक ऊपर की ओर मुख होने से इन्हें पंचवक्रा कहा जाता है ।
⚱️ इनमें षोडश कलाएं पूर्ण रूप से विकसित हैं, इसलिए ये षोडशी कहलाती है।
⛳ अरुण वर्ण श्रीकुल से श्रीविद्या साधना में क्रमशः
1- षोडशी, 2- त्रिपुरसुन्दरी, 3- राजराजेश्वरी तथा 4- ललिताम्बा के रूप में सिद्ध की जाती हैं !
इनकी उपासना 🎌श्रीयंत्र या 🎌नवयोनी चक्र में की जाती है ।
ये अपने उपासक को भुक्ति और मुक्ति दोनों एक साथ प्रदान करती हैं।
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💎 प्राणायाम आचमन आदि कर आसन पूजन करें :-
🚩 ॐ अस्य श्री आसन पूजन महामन्त्रस्य कूर्मो देवता मेरूपृष्ठ ऋषि पृथ्वी सुतलं छंद: आसन पूजने विनियोग: 🚩
विनियोग हेतु जल भूमि पर गिरा दें
पृथ्वी पर रोली से त्रिकोण का निर्माण कर इस मन्त्र से पंचोपचार पूजन करें:: -
🚩 ॐ पृथ्वी त्वया धृता लोका देवी त्वं विष्णुनां धृता त्वां च धारय मां देवी पवित्रां कुरू च आसनं 🚩
ॐ आधारशक्तये नम: । ॐ कूर्मासनायै नम: । ॐ पद्मासनायै नम: । ॐ सिद्धासनाय नम: । ॐ साध्य सिद्धसिद्धासनाय नम: 🚩
तदुपरांत गुरू गणपति गौरी पित्र व स्थान देवता आदि का स्मरण व पंचोपचार पूजन कर श्री चक्र के सम्मुख व अपने बाईं ओर वृत्त के मध्य त्रिकोण का निर्माण कर पंचोपचार पूजन करें व
मत्स्य मुद्रा का प्रदर्शन करें।
🚩ॐ फट्🚩 का उच्चारण कर शंख को धोकर पुष्प गन्ध डालकर षोड़शाक्षरी मन्त्र जपते हुए शंख को जल से पूर्ण कर उस मण्डल पर स्थापित करें व शंख के जल में.....
🚩।।ॐ गंगेश्च यमुनेश्चैव गोदावरी सरस्वती नर्मदे सिन्धु कावेरी जलेस्मिन सन्निधिं कुरू।।🚩 .....
.......से जल में तीर्थों का आवाहन इस प्रकार पूजन करें -
💎 शंख के आधार पर :-
🚩ॐ अं वह्नि मण्डलाय दशकलात्मने नम: ।
💎 शंख पर :-
🚩 ॐ उं सूर्य मण्डलाय द्वादशकलात्मने नम: ।
💎 शंख के जल में :-
🚩 ॐ मं सोम मण्डलाय षोड़शकलात्मने नम: ।
🚩 "हुं" 🚩का उच्चारण करते हुए शंख पर पंचोपचार पूजन कर धेनु मुद्रा का प्रदर्शन करते हुए📌 षोड़शाक्षरी मन्त्र का आठ बार जप करें व शंख में से थोड़ा जल प्रोक्षणी पात्र में गिरा दें ।
💎♦️ श्री चक्र के सम्मुख व अपने दाहिनी ओर पाद्य पात्र स्थापित करके श्री चक्र पर पीठ पूजन प्रारम्भ करें :-
🚩 ॐ पृथिव्यै नम: । ॐ आधारशक्तये नम: । ॐ कूर्मायै नमः । ॐ अनन्तायै नमः । ॐ रत्नद्वीपायै नमः । ॐ रत्न मण्डपायै नमः । ॐ रत्न वेदिकायै नमः । ॐ रत्न सिंहासनायै नमः ।
ॐ रत्न पीठायै नमः 🚩
💎 करन्यास :-
🚩ॐ ऐं ह्रीं श्रीं ऐं क ए ई ल ह्रीं अंगुष्ठाभ्याम नमः ।🚩
🚩ॐ ऐं ह्रीं श्रीं क्लीं ह स क ह ल ह्रीं तर्जनीभ्यां स्वाहा 🚩
🚩ॐ ऐं ह्रीं श्रीं सौं स क ल ह्रीं मध्यमाभ्यां वष्ट 🚩
🚩ॐ ऐं ह्रीं श्रीं ऐं क ए ई ल ह्रीं अनामिकाभ्यां हुम् 🚩
🚩ॐ ऐं ह्रीं श्रीं क्लीं ह स क ह ल ह्रीं कनिष्ठिकाभ्यां वौषट 🚩
🚩 ॐ ऐं ह्रीं श्रीं सौं स क ल ह्रीं करतल करपृष्ठाभ्यां फट् 🚩
💎 षड़ांग न्यास :-
🚩ॐ ऐं ह्रीं श्रीं ऐं क ए ई ल ह्रीं हृदयाय नमः 🚩
🚩 ॐ ऐं ह्रीं श्रीं क्लीं ह स क ह ल ह्रीं शिरसे स्वाहा 🚩
🚩 ॐ ऐं ह्रीं श्रीं सौं स क ल ह्रीं शिखायै वष्ट 🚩
🚩 ॐ ऐं ह्रीं श्रीं ऐं क ए ई ल ह्रीं कवचायै हुम् 🚩
🚩 ॐ ऐं ह्रीं श्रीं क्लीं ह स क ह ल ह्रीं नेत्रत्रयाय वौषट 🚩
🚩ॐ ऐं ह्रीं श्रीं सौं स क ल ह्रीं अस्त्राय फट् 🚩
""श्री पादुकां पूजयामि नमः"" बोलकर शंख के जल से अर्घ्य प्रदान करते रहें।
💎 श्री चक्र के बिन्दु चक्र में निम्न मन्त्रों से गुरू पूजन करें :-
🚩 ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री गुरू पादुकां पूजयामि नमः🚩
🚩 ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री परम गुरू पादुकां पूजयामि नमः 🚩
🚩 ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री परात्पर गुरू पादुकां पूजयामि नमः 🚩
💎 श्री चक्र के बिन्दु पीठ में भगवती शिवा महात्रिपुरसुन्दरी का ध्यान करके योनि मुद्रा का प्रदर्शन करते हुए पुन: इस मन्त्र से तीन बार पूजन करें :-
🚩 ॐ ऐं ह्रीं श्रीं ह्रीं क ए ई ल ह्रीं ह स क ह ल ह्रीं स क ल ह्रीं श्री ललिता महात्रिपुर सुन्दरी श्री विद्या राज राजेश्वरी श्री पादुकां पूजयामि नमः 🚩
💎 श्री चक्रराज निलयम का ध्यान करें :-
ॐ बालार्क मण्डलाभासां चतुर्बाहां त्रिलोचनां। पाशांकुश शरांश्चापं धारयन्तीं शिवां भजे ।।
🔻 आवरण पूजा :-
(१) 💥 त्रैलोक्यमोहन चक्रे ::-
🎯प्रथम रेखा :- ॐ ऐं ह्रीं श्रीं अणिमाद्यष्ट देवी श्री पादुकां पूजयामि नमः ।
🎯 द्वितीय रेखा :-
🚩 ॐ ऐं ह्रीं श्रीं ब्राह्म्याद्यष्ट देवी श्री पादुकां पूजयामि नम🚩
🎯 तृतीय रेखा :-
ॐ ऐं ह्रीं श्रीं सर्वसंक्षोभिण्यादि दश मुद्रा देवी श्री पादुकां पूजयामि नमः 🚩
🔻 चक्राग्रे :-
🚩ॐ ऐं ह्रीं श्रीं प्रकट योगिनी त्रिपुरा चक्रेश्वरी श्री पादुकां पूजयामि नमः 🚩
🎯 सर्वाशा परिपूरक चक्रे ::-
🚩ॐ ऐं ह्रीं श्रीं कामाकर्षण्यादि षोड़श नित्या कला देवी श्री पादुकां पूजयामि नमः 🚩
🎯 चक्राग्रे :-
🚩ॐ ऐं ह्रीं श्रीं गुप्त योगिनी त्रिपुरेशी चक्रेश्वरी श्री पादुकां पूजयामि नमः 🚩
(३) 🎯 सर्व संक्षोभण चक्रे ::-
🚩ॐ ऐं ह्रीं श्रीं अनंग कुसुमादि अष्ट देवी श्री पादुकां पूजयामि नमः 🚩
💙 चक्राग्रे :-
ॐ ऐं ह्रीं श्रीं गुप्ततर योगिनी त्रिपुरसुन्दरी चक्रेश्वरी श्री पादुकां पूजयामि नमः ।
(४) 🎯 सर्वसौभाग्य दायक चक्रे ।
🚩ॐ ऐं ह्रीं श्रीं सर्व संक्षोभिणि आदि चतुर्दश देवी श्री पादुकां पूजयामि नमः🚩
💙 चक्राग्रे :-
🚩ॐ ऐं ह्रीं श्रीं सम्प्रदाय योगिनी त्रिपुरवासिनी चक्रेश्वरी श्री पादुकां पूजयामि नमः 🚩
(५) 🎯 सर्वार्थसाधक चक्रे ::-
🚩ॐ ऐं ह्रीं श्रीं सर्व सिद्धि प्रदादि दश देवी श्री पादुकां पूजयामि नमः ।🚩
💙 चक्राग्रे :-
🚩ॐ ऐं ह्रीं श्रीं कुलोत्तीर्ण योगिनी त्रिपुरा श्री चक्रेश्वरी श्री पादुकां पूजयामि नमः 🚩
(६) 🎯 सर्व रक्षाकर चक्रे ::-
🚩ॐ ऐं ह्रीं श्रीं सर्व सर्वज्ञादि दश देवी श्री पादुकां पूजयामि नमः🚩
🎯 चक्राग्रे :-
ॐ ऐं ह्रीं श्रीं निगर्भ योगिनी त्रिपुरमालिनी चक्रेश्वरी श्री पादुकां पूजयामि नमः ।
(७) 💙 सर्व रोगहर चक्रे ::-
🚩ॐ ऐं ह्रीं श्रीं वशिन्यादि अष्ट देवी श्री पादुकां पूजयामि नमः🚩
🎯चक्राग्रे :-
🚩 ॐ ऐं ह्रीं श्रीं रहस्य योगिनी त्रिपुरासिद्धा चक्रेश्वरी श्री पादुकां पूजयामि नमः 🚩
(८) 💙 सर्वसिद्धि प्रद चक्रे ::--
🎯अग्रकोणे :-
🚩 ॐ ऐं ह्रीं श्रीं ऐं महाकामेश्वरी देव्या शक्ति श्री पादुकां पूजयामि नमः 🚩
🎯दक्षिणकोणे :-
🚩 ॐ ऐं ह्रीं श्रीं क्लीं महावज्रेश्वरी देव्या शक्ति श्री पादुकां पूजयामि नमः 🚩
🎯वामकोणे :-
🚩 ॐ ऐं ह्रीं श्रीं सौं महाभगमालिनी देव्या शक्ति श्री पादुकां पूजयामि नमः 🚩
🎯 चक्राग्रे :-
🚩ॐ ऐं ह्रीं श्रीं अतिरहस्य योगिनी त्रिपुराम्बा चक्रेश्वरी शक्ति श्री पादुकां पूजयामि नमः 🚩
(९) 💙 सर्वानन्द मये महाबिन्दु चक्रे ।
🚩ॐ ऐं ह्रीं श्रीं महात्रिपुरसुन्दरी श्रीविद्या शक्ति श्री पादुकां पूजयामि नमः 🚩
तीन बार पूजन करें ।
💎 महाबिन्दु चक्र के दाहिनी ओर :-
🚩ॐ ऐं ह्रीं श्रीं महालिंग मुद्रा शक्ति श्री पादुकां पूजयामि नमः🚩
💎 महाबिन्दु चक्र के बाईं ओर :-
🚩ॐ ऐं ह्रीं श्रीं महायोनि मुद्रा शक्ति श्री पादुकां पूजयामि नमः 🚩
💎 महाबिंदु पीठ पर :-
🚩ॐ ऐं ह्रीं श्रीं परापरातिरहस्य योगिनी ह्रीं क ए ई ल ह्रीं ह स क ह ल ह्रीं स क ल ह्रीं श्री ललिता महात्रिपुरसुन्दरी श्री राजराजेश्वरी षोड़शात्मिका श्रीविद्या चक्रेश्वरी शक्ति श्री पादुकां पूजयामि नमः 🚩
🙏 अब तीन बार अर्घ्य जल प्रदान करें :-
🚩ॐ ऐं ह्रीं श्रीं महाबैन्दव चक्रस्य अधिष्ठात्री परापरातिरहस्य योगिनी श्री ललिता महात्रिपुरसुन्दरी श्री राजराजेश्वरी षोड़शात्मिका श्रीविद्या चक्रेश्वरी शक्ति देव्यै समुद्रा: ससिद्धय: सायुधा: सशक्तय: सवाहना: सपरिवारा: सर्वोपचारै: सम्पूजिता: सन्तर्पिता: सन्तुष्टा: सन्तु नमः 🚩
🙏 महायोनि मुद्रा करके प्रणाम करें
तदुपरान्त अरती स्तोत्र आदि तथा शोडाक्षरी मूल मन्त्र जप आदि कर्म सम्पन्न कर हाथ में जल लेकर भगवती पराम्बा को अपना कर्म समर्पित कर आसन त्यागें ।