Centre for Harmony and Peace

Centre for  Harmony and Peace Promoting culture of peace, love, diversity, harmony and justice.

14/04/2026
अल्लामा फज़ले हक खैराबादी प्रथम स्वतंत्रता-संग्राम 1857 की क्रांति के क्रांतिकारी एवं तर्कशास्त्री, उर्दू, अरबी व फारसी ...
23/11/2024

अल्लामा फज़ले हक खैराबादी प्रथम स्वतंत्रता-संग्राम 1857 की क्रांति के क्रांतिकारी एवं तर्कशास्त्री, उर्दू, अरबी व फारसी के प्रसिद्ध शायर थे। हक का जन्म 1797 ई• में उत्तर प्रदेश के ज़िला सीतापुर के खैराबाद में हुआ था। उन्होंने शिक्षा दीक्षा धार्मिक रीति रिवाज़ो से प्राप्त की।

शिक्षा समापन के बाद वह खैराबाद में अध्यापन कार्य करने लगे और फिर 1816 ई• में उन्नीस साल की उम्र में दिल्ली ब्रिटिश सरकार में नौकरी करने लगे।

लेकिन एक ऐसा समय आया जब उन्होंने अंग्रेजों की नौकरी नहीं करने का मन बना लिया और 1831 में सरकारी नौकरी छोड़ दी। नौकरी छोड़ना के बाद वह दिल्ली के मुगल दरबार में कामकाज देखने लगें और शायरों की महफिल से वाबस्ता होने लगे।

1857 के दौर में जब ईस्ट इंडिया कंपनी के ज़ुल्मों की हद हो गई और हिन्दुस्तान के राजा महाराजा तथा नवाबों की रियासतों को हड़पना चाहा तो सभी राजा महाराजाओं तथा नवाबों और मौलवियों द्वारा अंग्रेजों को देश से बाहर निकालने का प्रयास किया गया और ज़बरदस्त विद्रोह की योजना बनाई गई। जिसका नेतृत्व क्रांति के महानायक मुगल सम्राट बहादुर शाह ज़फर द्वारा किया गया और अल्लामा फज़ले हक़ खैराबादी ने उनके साथ मिलकर अहम भूमिका निभाई।

अल्लामा फज़ले हक द्वारा अंग्रेजों के खिलाफ जेहाद का फतवा देकर मुस्लिम समुदाय से अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह में शामिल होने की अपील की। जिसका लाभ मुगल सम्राट और अन्य विद्रोही नेताओं को मिला।

मौलाना द्वारा फतवा जारी करने के बाद से ही अंग्रेजी प्रशासन द्वारा उनकी तलाश शुरू कर दी गई। क्रांति असफल हो जाने के बाद मौलाना बचते बचाते दिल्ली से खैराबाद तशरीफ ले आये। खैराबाद में अंग्रेजों को भनक लग गई। 30 जनवरी 1859 को उन्हें खैराबाद से गिरफ्तार कर लिया गया।

खैराबाद से उन्हें लखनऊ सेशन कोर्ट लाया गया और वहां उन पर मुकदमा चलाया गया। इस मुकदमें की पैरवी के लिए उन्होंने कोई वकील नियुक्त नहीं किया बल्कि मुकदमे की पैरवी उन्होंने खुद की। मौलाना पर अंग्रेजों के खिलाफ जेहाद का फतवा देने और लोगों को विद्रोह के लिए उकसाने, भड़काने के संगीन आरोप लगाये गये।

मुकदमे की सुनवाई के दौरान उन्होंने अपने जुर्म को कुबूल किया पर झूठ नहीं बोला और कहा -- हॉ वह फतवा सही है, वह मेरा लिखा हुआ था और आज भी मैं इस फतवे पर कायम हूं।

आरोपो को कुबूल करने के बाद उन्हें काले पानी की सज़ा सुनाई गई और सारी ज़ायदाद ज़ब्त करने का आदेश दिया गया। अंडमान-निकोबार ( सेलूलर जेल ) में ही 20 अगस्त 1861 में उनका देहांत हो गया।

राजा साहब महमूदाबाद का खानसामा उत्तर प्रदेश में कई राजा, महाराजा और नवाब हुए .अवध की ऐसी ही एक रियासत रही महमूदाबाद .महम...
20/11/2024

राजा साहब महमूदाबाद का खानसामा
उत्तर प्रदेश में कई राजा, महाराजा और नवाब हुए .अवध की ऐसी ही एक रियासत रही महमूदाबाद .महमूदाबाद एस्टेट की स्थापना 1677 में इस्लाम के पहले ख़लीफ़ा के वंशज राजा महमूद ख़ान ने की थी.कोठी अवध महल वास्तुकला का एक प्रमुख उदाहरण है. मुगल काल में और बाद में ब्रिटिश औपनिवेशिक युग के दौरान महमूदाबाद के शासकों के लिए एक महत्वपूर्ण प्रशासनिक और आवासीय परिसर बना रहा .पर फिलहाल इस रियासत के खानपान पर कुछ जानकारी लेनी चाहिए .नवाब रामपुर की तरह कई रियासतों में खानपान पर बहुत ध्यान दिया जाता .लखनऊ हो या जौनपुर या फिर बलरामपुर .इन सभी के व्यंजन काफी मशहूर रहे हैं .इनमे महमूदाबाद की रियासत भी शामिल रही है .महमूदाबाद के खानसामा कभी आलू टमाटर का इस्तेमाल नहीं करते .एक तो यह बहुत बाद में भारत आया दूसरे इसे कुछ निम्न स्तर का भी माना गया .आलू की जगह शलजम का खूब इस्तेमाल किया गया .इनके खानसामा भी कई तरह के प्रयोग करते रहें है .जब शिकार का दौर था तो ये उसी तरह के व्यंजन भी बनाते .हिरन के कबाब से लेकर बटेर वाला मुर्गमुसल्लम तक .
राजा अब ये भले न रहे हों लेकिन सीतापुर में तो आज भी बहुत से लोग राजा साहब ही कहते मिलेंगे .खैर इनके एक खानसामा हैं अफजाल भाई .वे लखनऊ में खानपान के क्षेत्र फ्रीलांसिंग भी करते हैं .पर कुछ ख़ास लोगों के लिए ही .मै भी उनमे शामिल हो गया हूं .उनका नियम भी कुछ सख्त है .वे दो दिन पहले आर्डर लेते हैं .कम से कम दो किलो मटन /चिकन /फिश का आर्डर होना चाहिए क्योंकि वे खुद ये सब खरीदने जाते हैं .उनकी खुछ खास डिश है बिरयानी ,चिकन लगन (जो लगन में तैयार किया जाता है ),मटन स्टू ,मटन कोरमा और मटन रान .लखनऊ के जो खानसामा हैं वे वजन के हिसाब से मेहनताना लेते हैं .जैसे किसी दावत में आपको बिरयानी या कोरमा बनवाना है तो वे पांच सौ से हजार रूपये किलो के बीच कोई राशि तय करेंगे .यह व्यंजन पर निर्भर करता है .मान लीजिये किसी व्यंजन में दस किलो चिकन लगना है तो हजार रूपये के हिसाब से वह दस हजार रूपये लेगा .यह रेट भी कबाब का अलग होगा तो कोरमा का अलग .कभी मुगलाई व्यंजनों की दावत देनी हो तो इन खानसामों का हुनर भी देखना चाहिए .

Rajiv Hem Keshav, who was struggling for lifelong establishment of freedom, equality, fraternity and just society passed...
05/10/2024

Rajiv Hem Keshav, who was struggling for lifelong establishment of freedom, equality, fraternity and just society passed away in Lucknow. At a time when they were most needed, their departure is an irreparable loss to the democratic conflict.
Humble tribute

ये दोस्ती :: रामपुनियानी जी को जन्मदिन मुबारकआइये मिलते हैं IIT मुम्बई के पूर्व प्रो. राम पुनियानी जी से, जिन्होंने आज अ...
25/08/2024

ये दोस्ती :: रामपुनियानी जी को जन्मदिन मुबारक

आइये मिलते हैं IIT मुम्बई के पूर्व प्रो. राम पुनियानी जी से, जिन्होंने आज अपनी उतार-चढ़ाव भरी जिंदगी के 79 साल (जन्म 25 अगस्त 1945) पूरे किए।
90 के दशक में जब हिंदुस्तान की सियासत में संवैधानिक मूल्यों को लेकर बाधा उत्पन्न करने वाली ताकतें सत्ता में काबिज होने लगी और समाज को एकरंगी बनाने की कोशिश में जुटी थी तो इन सब पर प्रो. पुनियानी बहुत ही करीब से नजर रखे हुए थे. वो इस बात को लेकर परेशान या यूं कहूँ कि बेचैन थे कि हिन्दुस्तानी समाज की विविधता और बहुलतावाद को कैसे बचाया जाए. ये वो दौर था जब उनका गहरा सम्पर्क मरहूम असगर अली इंजीनियर से हुआ. वे उनसे प्रभावित हुए बिना नहीं रह सके। नतीजतन उन्हें अपने इस पुनीत काम में प्रोफेसरशिप बाधा बनती नज़र आने लगी. इसे पूरा करने के लिए उन्होंने ऐच्छिक अवकाश ले लिया और फिर अपना पूरा जीवन समतामूलक समाज,भाईचारा,बहुलतावाद, प्रजातांत्रिक मूल्यों की रक्षा और वंचित समुदायों के लिए संघर्ष में होम कर दिया.
अपनी चिर परिचित शैली में समाज के विभिन्न वर्गों को सम्बोधित करते हुए उन्होंने पूरी दुनियां में इस बात पर जोर दिया कि लोकतंत्र शासन करने की सबसे सर्वग्राह पद्धति है. यह हमारे मानव अधिकारों,धार्मिक-सामाजिक सद्भाव, बहुलतावाद और वंचित समुदायों के अधिकार की रक्षा करता है. विशेषकर भारत में इसे बचाये रखने के लिए हमें उन ताकतों के खिलाफ एकजुटता रखनी होगी जो संवैधानिक मूल्यों की विरोधी हैं.इसके अतिरिक्त फिरकापरस्त ताकतों के खिलाफ वे लगातार लेख,ऑडियो-वीडियो,किताबें और रिपोर्ट के माध्यम से समाज को सचेत करते रहते है।
फासिस्ट ताकतें उन्हें गाहे- ब- गाहे निशाना बनाती रहती पर बिना डरे शांति का यह दूत अबाध गति से अपनी मंजिल की ओर बढ़ रहा है. उनके सामाजिक योगदान को देखते हुए देश- विदेश की अनेक सामाजिक संस्थाओं सहित भारत सरकार की तरफ से भी उन्हें सम्मानित किया जा चुका है.आज वह अपने जीवन के 79 साल का सफर पूरा कर रहे हैं. हम उनके सेहत और लम्बी आयु की कामना करते है जिससे उन्होंने सामाजिक-ताने को बनाए और बचाए रखने का जो मिशन शुरू किया वह चलता रहे और देश-दुनिया सहित हम जैसे लोगों का मार्गदर्शन होता रहे.

डॉ मोहम्मद आरिफ

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