10/08/2025
श्री विश्वंभर नाथ जी इंजीनीयर थे | वे बाबा के बड़े भक्त थे | सन् १९७० में अपने कुछ मित्रों के साथ बाबा के दर्शनों में पहुँचे |
श्री बाबा बराबर कहते हैं- “यह जीव अनादि काल से अपने स्वरूप को भूला है. इसको भगवान के सन्मुख कर देना, यही महान उपकार है |”
मंच के निकट बुलाहट होने पर विश्वंभर नाथ ने अपने मित्रों को भी बुला लिया | उनके मन में इस बात का अभिमान हुआ कि आज उन्होंने अपने कई मित्रों को श्री बाबा के चरणों में समर्पित कर उन मित्रों का बड़ा उपकार किया है |
श्री बाबा तो लीलाधारी और अंतर्यामी ठहरे | उन्होंने उनके सभी मित्रों को चरण-स्पर्श का पुण्य दिया; किन्तु बेचारे विश्वंभर नाथ को इस पुण्य से वंचित कर दिया | कह नहीं सकते थे | मन बड़ा क्षुब्ध हुआ | उपकार करने के अभिमान ने आहत होकर मन को क्षुब्ध कर दिया |
इतने में बाबा ने उनसे सस्नेह कहा- “बच्चा ! सब में एक ही आत्मा है |”
- ‘जी बाबा !’
अब पूज्य बाबा मौन हो गए | श्री बाबा ब्रह्मस्वरूप हैं | उनका स्वभाव भी ब्रह्म के समान हैं | अपने भक्तों के मन का अभिमान ही तो ईश्वर-पथ का रोड़ा है | अतः नानाविध बाबा भी अपने भक्तों का अभिमान मिटाते रहते हैं |
अभिमान के कारण ही व्यक्ति प्रभु के सन्मुख नहीं हो पाता है | जब तक समर्पण नहीं होगा तब तक जीव कृपा का अनुभव नहीं कर सकता है | संतों के पास तो ममता और अहंता को छोड़कर ही जाना चाहिए | हर एक पग जो संतों की तरफ उठे, हर उस पग के साथ अहंता और ममता को त्यागते हुए चलना चाहिए | तभी हम वास्तव में संत तक पहुँच सकते हैं और उनके दर्शन का लाभ उठा सकते हैं | यदि हम ममता और अहंता को पकड़े हुए हैं तब तो संतों की तरफ हमारी गति हुई ही नहीं है भले ऊपर से कुछ भी लगे | संतों के निकट तो हम तभी पहुँचेंगे जब ममता और अहंता छूटेगी |
दूसरी बात यह है कि संतों का दर्शन तो तब ही हो पाता है जब वो कृपा करते हैं | जीव में इतनी सामर्थ्य ही नहीं है कि वो अपने किसी प्रयास से उन तक पहुँच सके | इसलिए जब संतों का दर्शन मिल जाए तब उस कृपा का अनुभव करना चाहिए, अपने अभिमान का नहीं | कृपा का अनुभव हम कृतग्य होकर ही प्राप्त कर सकते हैं | जितना ज्यादा हम कृतग्य होते हैं उतना ही ज्यादा कृपा का अनुभव कर पाते हैं |