Shri Kashi Khand - Online

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स्कंदपुराण खंडः 4 काशीखंड पौराणिक शोध के साथ पूर्णतः निःशुल्क ऑनलाइन पढ़ें।

16/03/2025

काशी का पौराणिक इतिहास
काशी का प्राचीन और सतत् अस्तित्व
प्राचीन काशी नगरी का इतिहास न केवल धार्मिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण है, बल्कि सांस्कृतिक और ऐतिहासिक दृष्टिकोण से भी अत्यधिक गौरवमयी है। काशी का पौराणिक संदर्भ हमें यह सिद्ध करता है कि यह नगरी सदियों से बसी हुई है और यहाँ की भूमि पर हमेशा से प्राचीन सभ्यता और समाज का अस्तित्व रहा है। यह नगर महादेव शिव की प्रिय भूमि होने के साथ-साथ आत्मकल्याण के मार्ग पर अग्रसर होने वाले साधकों का घर भी रहा है।
लक्ष्मीनारायणसंहिता के श्लोक का पौराणिक प्रमाण
श्रीनारायण उवाच:
"विद्वज्जनप्रलक्षैः सत्साधुलक्षैरधिष्ठिताम्।
तीर्थवासिजनव्रातकोटिमण्डलचञ्चलाम्॥
देवालयैस्त्रिकोटिभिर्गृहस्थालयकोटिभिः।
सहस्रोद्यानसत्क्षेत्रैः राजसौधसहस्रकैः॥"
इस श्लोक में श्री नारायण ने काशी नगरी की भव्यता और धार्मिक समृद्धि का उल्लेख किया है। काशी नगरी ज्ञानियों, साधुओं, महात्माओं और तीर्थयात्रियों से परिपूर्ण थी। इस नगरी में तीन करोड़ से अधिक देवालय थे, जो यह प्रमाणित करते हैं कि यहाँ की भूमि में पौराणिक काल से ही एक विशाल जनसंख्या का निवास था। इसके अतिरिक्त, असंख्य उद्यान, सुंदर क्षेत्र, और भव्य महल काशी की सम्पन्नता और वैभव को दर्शाते थे। यहाँ के संत, तपस्वी और योगी अपने जीवन को परमात्मा की प्राप्ति के लिए समर्पित करते थे।
प्राचीन काशी में निवासरत जनसंख्या का प्रमाण
इस पौराणिक श्लोक से यह स्पष्ट होता है कि काशी में प्राचीन काल में भी एक विशाल जनसंख्या का निवास था। काशी नगरी में जितने तीर्थ स्थल और देवालय थे, उतने ही यहाँ के निवासियों की आध्यात्मिक साधना और भक्ति का प्रमाण मिलता है। इन स्थानों पर तपस्वी, साधक, योगी, ब्रह्मचारी और गृहस्थ निवास करते थे, और उनका जीवन एकमात्र उद्देश्य - परमात्मा के समीप जाने के लिए समर्पित था। काशी नगरी का हर घर, हर गली और हर मार्ग भगवान के प्रति श्रद्धा और भक्ति से भरा हुआ था।
निवासियों की आस्था और संतों का प्रभाव
काशी में निवास करने वाले लोग हमेशा से अपने जीवन के सर्वोत्तम उद्देश्य की प्राप्ति के लिए समर्पित रहे हैं। यहाँ के निवासी भक्ति, ज्ञान और साधना में रत थे, और इस भूमि पर संतों, महात्माओं और तपस्वियों का सतत प्रभाव था। काशी में देवांगनाएँ, अप्सराएँ और ब्रह्मचारी भी जीवन की उच्चतम आध्यात्मिक अवस्था की ओर अग्रसर थे। यहाँ की भूमि पर भगवान शिव और अन्य देवताओं का विशेष प्रभाव था, और यह नगरी उनका प्रिय स्थान मानी जाती थी।
काशी का सजीव पौराणिक इतिहास
काशी का पौराणिक इतिहास इस बात का प्रमाण है कि यह नगरी प्राचीन काल से एक समृद्ध और पवित्र जनसंख्या का केंद्र रही है। काशी में निवास करने वाले लोग सदैव भक्ति, साधना और आत्मकल्याण के मार्ग पर अग्रसर रहे हैं। यहाँ का हर तीर्थ, हर देवालय और हर साधक इस बात का गवाह है कि काशी एक जीवन्त नगर है, जहाँ साक्षात भगवान शिव की उपस्थिति है और जिसकी भूमि पर ज्ञान, साधना और तपस्या का अस्तित्व अनंत काल से निरंतर चलता आ रहा है।
हरि ॐ तत्सत् श्री शिवार्पणमस्तु
श्री सुधांशु कुमार पांडेय - कामाख्या, काशी

Gabhastishwar*गभस्तीश्वर* - काशी में गंगा के आगमन से पूर्व भगवान्‌ सूर्य द्वारा पञ्चनद तीर्थ (काशीस्थ पंचगंगा) में गभस्त...
16/09/2024

Gabhastishwar
*गभस्तीश्वर* - काशी में गंगा के आगमन से पूर्व भगवान्‌ सूर्य द्वारा पञ्चनद तीर्थ (काशीस्थ पंचगंगा) में गभस्तीश्वर नामक शिवलिङ्ग तथा मंगलागौरी नामक सर्वाभीष्ठप्रदा सर्वमंगलप्रदा दुर्गामूर्त्ति प्रतिष्ठित कर देवमान से एक लाख (दिव्य वर्ष) तक उग्रतप करना तदन्तर तपस्याकाल में अत्यधिक श्रम होने के कारण उनकी किरणों से प्रबल स्वेद निकल वहीं पुण्य नदी रूपेण परिणत हो किरणा नाम से सुविख्यात होना। विश्व स्थित समस्त प्राणीगण का यह आक्षेप कि - वेदों ने सूर्य को जगदात्मा कहा है, वे आत्मा ही यदि देह को तापित करें, तब और कौन उसकी रक्षा कर सकेगा? यह सुनकर विश्वरूप भगवान विश्वनाथ का सूर्य को वर देने आना.....
*सम्पूर्ण पौराणिक विवरण :

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31/05/2024

*शिवपुराणम्/संहिता_१_(विश्वेश्वरसंहिता)/अध्यायः_२५*

मद्यं मांसं तु लशुनं पलाण्डुं शिग्रुमेव च ।
श्लेष्मांतकं विड्वराहं भक्षणे वर्जयेत्ततः ४३ ।
*रुद्राक्षधारी पुरुष अपने खान पानमें मंदिरा, मांस, लहसुन, प्याज, सहिजन, लिसोड़ा, विवराह आदिको त्याग दे।*

वलक्षं रुद्रा क्षं द्विजतनुभिरेवेह विहितं सुरक्तं क्षत्त्राणां प्रमुदितमुमे पीतमसकृत् ४४ ।
छिन्नं खंडितं भिन्नं विदीर्ण ।
ततो वैश्यैर्धार्यं प्रतिदिवसभावश्यकमहो तथा कृष्णं शूद्रै: श्रुतिगदितमार्गोयमगजे ४४ ।
*हे गिरिराजनन्दिनी उमे। श्वेत रुद्राक्ष केवल ब्राह्मणोंको ही धारण करना चाहिये। गहरे लाल रंगका रुद्राक्ष क्षत्रियोंके लिये हितकर बताया गया है। वैश्योंके लिये प्रतिदिन बार-बार पीले रुद्राक्षको धारण करना आवश्यक है और शूद्रोंको काले रंगका रुद्राक्ष धारण करना चाहिये यह वेदोक्त मार्ग है।*

विष्ण्वादिदेवभक्ताश्च धारयेयुर्न संशयः ।
रुद्र भक्तो विशेषेण रुद्रा क्षान्धारयेत्सदा ६२ ।
*विष्णु आदि देवताओंके भक्तोंको भी निस्सन्देह इसे धारण करना चाहिये। रुद्रभक्तोंके लिये तो विशेष रूपसे रुद्राक्ष धारण करना आवश्यक है।*

विना मंत्रेण हो धत्ते रुद्रा क्षं भुवि मानवः ।
स याति नरकं घोरं यावदिन्द्रा श्चतुर्दश ८३ ।
*इस पृथ्वीपर जो मनुष्य मन्त्रके द्वारा अभिमन्त्रित किये बिना ही रुद्राक्ष धारण करता है, वह क्रमशः चौदह इन्द्रोंके कालपर्यन्त घोर नरकको जाता है।*

रुद्रा क्षमालिनं दृष्ट्वा शिवो विष्णुः प्रसीदति ।
देवीगणपतिस्सूर्यः सुराश्चान्येपि पार्वति ८६ ।
*हे पार्वति! रुद्राक्षमालाधारी पुरुषको देखकर मैं शिव, भगवान् विष्णु, देवी दुर्गा, गणेश, सूर्य तथा अन्य देवता भी प्रसन्न हो जाते हैं।*

विना भस्मत्रिपुंड्रेण विना रुद्रा क्षमालया ।
पूजितोपि महादेवो नाभीष्टफलदायकः ९१ ।
*बिना भस्मका त्रिपुण्ड्र धारण किये और बिना रुद्राक्ष माला लिये जो महादेवकी पूजा करता है, उससे पूजित होनेपर भी महादेव अभीष्ट फल प्रदान नहीं करते हैं।*

31/05/2024

*शिवपुराणम्/संहिता_५_(उमासंहिता)/अध्यायः_०३*

श्रीमहादेव उवाच ।।
कृष्णं जानामि भक्तं त्वां मयि नित्यं दृढव्रतम् ।।
वृणीष्व त्वं वरान्मत्तः पुण्यांस्त्रैलोक्यदुर्लभान् ।।२० ।।
*श्रीमहादेव बोले- हे कृष्ण! मेरे प्रति दृढव्रतवाले आप भक्तको मैं जानता हूँ, अतः आप तीनों लोकोंमें दुर्लभ एवं पवित्र वरोंको मुझसे माँग लीजिये।*

।। सनत्कुमार उवाच ।।
तस्य तद्वचनं श्रुत्वा कृष्णः प्रांजलिरादरात् ।।
प्राह सर्वेश्वरं शम्भुं सुप्रणम्य पुनः पुनः ।। २१ ।।
*सनत्कुमार बोले- उनके उस वचनको सुनकर श्रीकृष्णने हाथ जोड़कर आदरसहित सर्वेश्वर शिवको बार-बार प्रणाम करके उनसे कहा-*

।। कृष्ण उवाच ।।
देवदेव महादेव याचेऽहं ह्युत्तमान्वरान् ।।
त्वत्तोऽष्टप्रमितान्नाथ त्वयोद्दिष्टान्महेश्वर ।। २२ ।।
तव धर्म्मे मतिर्नित्यं यशश्चाप्रचलं महत् ।।
त्वत्सामीप्यं स्थिरा भक्तिस्त्वयि नित्यं ममास्त्विति ।। २३ ।।
पुत्राणि च दशाद्यानां पुत्राणां मम संतु वै ।।
वध्याश्च रिपवस्सर्वे संग्रामे बलदर्पिताः ।। २४ ।।
अपमानो भवेन्नैव क्वचिन्मे शत्रुतः प्रभो ।।
योगिनामपि सर्वेषां भवेयमतिवल्लभः ।।२५।।
इत्यष्टौ सुवरान्देहि देवदेव नमोऽस्तु ते ।।
सर्वेश्वरस्त्वमेवासि मत्प्रभुश्च विशेषतः ।। २६ ।।
*श्रीकृष्ण बोले- हे देवदेव! हे महादेव! हे नाथ! हे महेश्वर मैं आपके द्वारा कहे गये अत्युत्तम आठ वरोंको आपसे माँगता हूँ। मेरी बुद्धि सदा शिवधर्ममें लगी रहे, मेरा यश सदा अधिक तथा अविचल रहे मुझे आपका सामीप्य सदा प्राप्त हो और निरन्तर आपमें मेरी भक्ति बनी रहे। हे शम्भो ! मेरी प्रमुख पत्नियों के दस दस पुत्र उत्पन्न हों और संग्राममें मैं समस्त बलाभिमानी शत्रुओंका वध करने में समर्थ होऊँ। हे प्रभो! शत्रुओंसे कभी मेरा अपमान न हो और मैं सभी योगियोंका भी अत्यन्त प्रिय होऊँ, हे देवाधिदेव! मुझे ये आठ उत्तम वर प्रदान कीजिये, आपको नमस्कार है। आप सर्वेश्वर हैं और विशेष रूपसे मेरे प्रभु हैं।*

सनत्कुमार उवाच ।।
तस्य तद्वचनं श्रुत्वा तमाह भगवान्भवः ।।
सर्वं भविष्यतीत्येवं पुनस्स प्राह शूलधृक् ।। २७ ।।
साम्बो नाम महावीर्यः पुत्रस्ते भविता बली।।
घोरसंवर्तकादित्यश्शप्तो मुनिभिरेव च ।।२८।।
मानुषो भवितासीति स ते पुत्रो भवि ष्यति ।।
यद्यच्च प्रार्थितं किंचित्तत्सर्वं च लभस्व वै ।। २९ ।।
*सनत्कुमार बोले- उनका यह वचन सुनकर भगवान् शिवने उनसे कहा-यह सब पूर्ण होगा शिवजीने उनसे पुनः कहा।आपका साम्ब नामक एक महाबलवान् पुत्र होगा। पूर्व समयमें मुनिलोगोंने घोर संवर्तकादित्यको शाप दिया था कि तुम मनुष्यरूप धारण करोगे, इस प्रकार वे ही संवर्तकादित्य आपके पुत्र होंगे। आपने जो कुछ भी माँगा है, वह सब आपको प्राप्त हो।*

31/05/2024

*गंगा जी में अस्थि/हड्डी विसर्जन का विरोध शास्त्र विरुद्ध...*

*पद्मपुराणम्/खण्डः_१_(सृष्टिखण्डम्)/अध्यायः_६२*
यावदस्थि मनुष्यस्य गंगातोये प्रतिष्ठति।
तावद्वर्षसहस्राणि स्वर्गलोके महीयते॥६६॥
पित्रोर्बंधुजनानां च अनाथानां गुरोरपि।
गंगायामस्थिपातेन नरः स्वर्गान्न हीयते॥६७॥
गंगां प्रतिवहेद्यस्तु पितॄणामस्थिखंडकम्।
पदेपदेश्वमेधस्य फलं प्राप्नोति मानवः॥६८॥
*मनुष्य की हड्डी जब तक गंगाजी के जल में पड़ी रहती है, उतने ही हजार वर्षों तक वह स्वर्गलोक में प्रतिष्ठित होता है। माता-पिता, बन्धु-बान्धव, अनाथ तथा गुरुजनों की हड्डी गंगाजी में गिराने से मनुष्य कभी स्वर्ग से भ्रष्ट नहीं होता। जो मानव अपने पितरों की हड्डियों के टुकड़े बटोरकर उन्हें गंगाजी में डालनेके लिये ले जाता है, वह पग-पगपर अश्वमेध यज्ञ का फल प्राप्त करता है।*

Gyaneshwarज्ञानेश्वरभगवान विश्वनाथ का ज्ञानमंडप एवं उसके अधिष्ठातृ देवता...
31/05/2024

Gyaneshwar
ज्ञानेश्वर

भगवान विश्वनाथ का ज्ञानमंडप एवं उसके अधिष्ठातृ देवता...

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*Parashurameshwar**परशुरामेश्वर*काशी में भगवान परशुराम द्वारा स्थापित शिवलिंग...
31/05/2024

*Parashurameshwar*
*परशुरामेश्वर*

काशी में भगवान परशुराम द्वारा स्थापित शिवलिंग...

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31/05/2024

पद्मपुराणम्/खण्डः_५_(पातालखण्डः)/अध्यायः_०८५
किंचिदेतन्मयाप्रोक्तं रहस्यं समयो हि मे । स्नातुं गंतुं च गंगायां न कथावसरोऽधिकः ४७।
प्राप्तोऽयं माधवो मासः पुण्यो माधववल्लभः । तस्यापि सप्तमी शुक्ला गंगायामतिदुर्ल्लभा ४८।
वैशाख शुक्ल सप्तम्यां जाह्नवी जह्नुना पुरा । क्रोधात्पीता पुनस्त्यक्ता कर्णरंध्रात्तु दक्षिणात् ४९।
तस्यां समर्चयेद्देवीं गंगां गगनमेखलाम् । स्नात्वा सम्यग्विधानेन स धन्यः सुकृती नरः ५०।
तस्यां यस्तर्पयेद्देवान्पितॄन्मर्त्यो यथाविधि । साक्षात्पश्यति तं गंगा स्नातकं गतपापकम् ५१।
न माधव समो मासो न गंगा सदृशी नदी । दुर्ल्लभः खलु योगोऽयं हरिभक्त्यैव लभ्यते ५२।
विष्णुपादोदकोद्भूता ब्रह्मलोकादुपागता । त्रिभिः स्रोतोभिरश्रांता या पुनाति जगत्त्रयम् ५३।
*यह वैशाख का महीना उपस्थित है, जो भगवान् लक्ष्मीपति को अत्यन्त प्रिय है। इसकी भी आज वैशाख शुक्ल सप्तमी है; इसमें गंगाका स्नान अत्यन्त दुर्लभ है। पूर्वकाल में जह्नु ने वैशाख शुक्ल सप्तमी को क्रोध में आकर गंगाजी को पी लिया था और फिर अपने दाहिने कान के छिद्र से उन्हें बाहर निकाला था अतः जह्नु की कन्या होने के कारण गंगा को 'जाहनवी' कहते हैं। इस तिथि को स्नान करके जो आकाश की मेखलाभूत गंगा देवी का उत्तम विधान के साथ पूजन करता है, वह मनुष्य धन्य एवं पुण्यात्मा है। जो वैशाख शुक्ल सप्तमी को विधिपूर्वक गंगा में देवताओं और पितरों का तर्पण करता है, उसे गंगादेवी कृपा दृष्टि से देखती हैं तथा वह स्नानके पश्चात् सब पापों से मुक्त हो जाता है। वैशाख के समान कोई मास नहीं है तथा गंगाके सदृश दूसरी कोई नदी नहीं है। इन दोनों का संयोग दुर्लभ है। भगवान्की भक्ति से ही ऐसा सुयोग प्राप्त होता है। गंगाजी का प्रादुर्भाव भगवान् श्रीविष्णु के चरणों से हुआ है। वे ब्रह्मलोक से आकर भगवान् शंकर के जटा जूट में निवास करती हैं। गंगा समस्त दुःखौ का नाश करने वाली हैं। वे अपने तीन स्रोतों से निरन्तर प्रवाहित होकर तीनों लोकों को पवित्र करती रहती हैं।*

31/05/2024

*महाभारत: अनुशासनपर्व: एकोनषष्ट्यधिकशततम अध्याय:*

*श्रीकृष्ण का प्रद्युम्न को ब्राह्मणों की महिमा बताते हुए दुर्वासा के चरित्र का वर्णन करना और यह सारा प्रसंग युधिष्ठिर को सुनाना*

युधिष्ठिर! ने पूछा- मधुसूदन! ब्राह्मण की पूजा करने से क्या फल मिलता है? इसका आप ही वर्णन कीजिये; क्योंकि आप इस विषय को अच्छी तरह जानते हैं और मेरे पितामह भी आपको इस विषय का ज्ञाता मानते हैं।

भगवान श्रीकृष्ण ने कहा- कुरुकुलतिलक भरतभूषण नरेश! मैं ब्राह्मणों के गुणों का यथार्थ रूप से वर्णन करता हूँ, आप ध्यान देकर सुनिये।

कुरुनन्दन! पहले की बात है, एक दिन ब्राह्मणों ने मेरे पुत्र प्रद्युम्न को कुपित कर दिया। उस समय मैं द्वारका में ही था। प्रद्युम्न ने मुझसे आकर पूछा- ‘मधुसूदन! ब्राह्मणों की पूजा करने से क्या फल होता है? इहलोक और परलोक में वे क्यों ईश्वर तुल्य माने जाते हैं? मानद! सदा ब्राह्मणों की पूजा करके मनुष्य क्या फल पाता है? यह सब मुझे स्पष्ट रूप से बताइये, क्योंकि इस विषय में मुझे महान संदेह है।'

महाराज! प्रद्युम्न के ऐसा कहने पर मैंने उसको उत्तर दिया। रुक्मिणीनन्दन! ब्राह्मणों की पूजा करने से क्‍या फल मिलता है, यह मैं बता रहा हूँ, तुम एकाग्रचित्त होकर सुनो। बेटा! ब्राह्मणों के राजा सोम (चन्‍द्रमा) हैं। अत: ये इस लोक और परलोक में भी सुख-दु:ख देने में समर्थ होते हैं। ब्राह्मणों में शान्‍त भाव की प्रधानता होती है। इस विषय में मुझे कोई विचार नहीं करना है। ब्राह्मणों की पूजा करने से आयु, कीर्ति, यश और बल की प्राप्ति होती है। समस्‍त लोक और लोकेश्‍वर ब्राह्मणों के पूजक हैं। धर्म, अर्थ और काम की सिद्धि के लिये, मोक्ष की प्राप्ति के लिये और यश, लक्ष्मी तथा आरोग्‍य की उपलब्धि के लिये एवं देवता और पितरों की पूजा के समय हमें ब्राह्मणों को पूर्ण संतुष्‍ट करना चाहिये। बेटा! ऐसी दशा में मैं ब्राह्मणों का आदर कैसे नहीं करूँ? महाबाहो! मैं ईश्वर (सब कुछ करने में समर्थ) हूँ- ऐसा मानकर तुम्‍हें ब्राह्मणों के प्रति क्रोध नहीं करना चाहिये। ब्राह्मण इस लोक और परलोक में भी महान माने गये हैं। वे सब कुछ प्रत्‍यक्ष देखते हैं और यदि क्रोध में भर जायें तो इस जगत को भस्‍म कर सकते हैं। दूसरे-दूसरे लोक और लोकपालों की वे सृष्टि कर सकते हैं। अत: तेजस्‍वी पुरुष ब्राह्मणों के महत्‍व को अच्‍छी तरह जानकर भी उनके साथ सद्वर्ताव क्‍यों न करेंगे?

तात! पहले की बात है, मेरे घर में एक हरित-पिंगल वर्ण वाले ब्राह्मण ने निवास किया था। वह चिथड़े पहिनता और बेल का डंडा हाथ में लिये रहता था। उसकी मूँछें और दाढ़ियाँ बढ़ी हुई थीं। वह देखने में दुबला-पतला और ऊँचे कद का था। इस भूतल पर जो बड़े-से-बड़े मनुष्‍य हैं, उन स‍बसे वह अधिक लंबा था और दिव्‍य तथा मानव लोकों में इच्‍छानुसार विचरण करता था। वे ब्राह्मण देवता जिस समय यहाँ पधारे थे, उस समय धर्मशालाओं में और चौराहों पर यह गाथा गाते फिरते थे कि ‘कौन मुझ दुर्वासा ब्राह्मण को अपने घर में सत्‍कारपूर्वक ठहरायेगा। यदि मेरा थोड़ा-सा भी अपराध बन जाये तो मैं समस्‍त प्राणियों पर अत्‍यन्‍त कुपित हो उठता हूँ। मेरे इस भाषण को सुनकर कौन मेरे लिये ठहरने का स्‍थान देगा? जो कोई मुझे अपने घर में ठहराये, वह मुझे क्रोध न दिलाए। इस बात के लिये उसे सतत सावधान रहना होगा।'

बेटा! जब कोई भी उनका आदर न कर सका, तब मैंने उन्‍हें अपने घर में ठहराया। वे कभी तो एक ही समय इतना अन्‍न भोजन कर लेते थे, जितने से कई हज़ार मनुष्‍य तृप्‍त हो सकते थे और कभी बहुत थोड़ा अन्‍न खाते तथा घर से निकल जाते थे। उस दिन फिर घर को नहीं लौटते थे। व़े अकस्‍मात जोर-जोर से हँसने लगते और अचानक फूट-फूटकर रो पड़ते थे। उस समय इस पृथ्‍वी पर उनका समवयस्क कोई नहीं था।

एक दिन अपने ठहरने के स्‍थान पर जाकर वहाँ बिछी हुई शय्‍याओं, बिछौनों और वस्‍त्राभूषणों से अलंकृत हुई कन्‍याओं को उन्‍होंने जलाकर भस्‍म कर दिया और स्‍वयं वहाँ से खिसक गये। फिर तुरंत ही मेरे पास आकर वे कठोर व्रत का पालन करने वाले मुनि मुझसे इस प्रकार बोले- ‘कृष्‍ण! मैं शीघ्र ही खीर खाना चाहता हूँ।' मैं उनके मन की बात जानता था, इसलिये घर के लोगों से पहले से ही आज्ञा दे दी थी कि ‘सब प्रकार के उत्तम मध्‍यम अन्‍नपान और भक्ष्‍य-भोज्‍य पदार्थ आदरपूर्वक तैयार किये जायें।’ मेरे कथनानुसार सभी चीजें तैयार थीं ही, अत: मैंने मुनि को गरमागरम खीर निवेदन किया। उसको थोड़ा-सा ही खाकर वे तुरंत मुझसे बोले- ‘कृष्‍ण! इस खीर को शीघ्र ही अपने सारे अंगों में पोत लो।' मैंने बिना विचारे ही उनकी इस आज्ञा का पालन किया। वही जूठी खीर मैंने अपने सिर पर तथा अन्‍य सारे अंगों में पोत ली।

इतने ही में उन्‍होंने देखा कि तुम्‍हारी सुमुखी माता पास ही खड़ी-खड़ी मुसकरा रही हैं। मुनि की आज्ञा पाकर मैंने मुसकराती हुई तुम्‍हारी माता के अंगों में भी खीर लपेट दी। जिसके सारे अंगों में खीर लिपटी हुई थी, उस महारानी रुक्मिणी को मुनि ने तुरंत रथ में जोत दिया और उसी रथ पर बैठकर वे मेरे घर से निकले। वे बुद्धिमान ब्राह्मण दुर्वासा अपने तेज से अग्नि के समान प्रकाशि हो रहे थे। उन्‍होंने मेरे देखते-देखते जैसे रथ के घोड़ों पर कोड़े चलाये जाते हैं, उसी प्रकार भोली-भाली रुक्मिणी को भी चाबुक से चोट पहुँचाना आरम्‍भ किया। उस समय मेरे मन में थोड़ा-सा भी ईर्ष्‍याजनित दु:ख नहीं हुआ। इसी अवस्‍था में वे महल से बाहर आकर विशाल राजमार्ग से चलने लगे। यह महान आश्‍चर्य की बात देखकर दशार्हवंशी यादवों को बड़ा क्रोध हुआ। उनमें से कुछ लोग वहाँ आपस में इस प्रकार बातें करने लगे- 'भाइयों! इस संसार में ब्राह्मण ही पैदा हों, दूसरा कोई वर्ण किसी तरह पैदा न हो। अन्‍यथा यहाँ इन बाबाजी के सिवा और कौन पुरुष इस रथ पर बैठ कर जीवित रह सकता था। कहते हैं- विषैले साँपों का विष बड़ा तीखा होता है, परंतु ब्राह्मण उससे भी अधिक तीक्ष्‍ण होता है। जो ब्राह्मणरूपी विषधर सर्प से जलाया गया हो, उसके लिये इस संसार में कोई चिकित्‍सक नहीं है।'

उन दुर्धर्ष दुर्वासा के इस प्रकार रथ से यात्रा करते समय बेचारी रुक्मिणी रास्‍ते में लड़खड़ाकर गिर पड़ीं, परंतु श्रीमान दुर्वासा मुनि इस बात को सहन न कर सके। उन्‍होंने तुरंत उसे चाबुक से हाँकना शुरू किया। जब वह बारंबार लड़खड़ाने लगीं, तब वे और भी कुपित हो उठे और रथ से कूदकर बिना रास्‍ते के ही दक्षिण दिशा की ओर पैदल ही भागने लगे।

इस प्रकार बिना रास्‍ते के ही दौड़ते हुए विप्रवर दुर्वासा के पीछे-पीछे मैं उसी तरह सारे शरीर में खीर लपेटे दौड़ने लगा और बोला- ‘भगवन! प्रसन्‍न होइये।'

तब वे तेजस्‍वी ब्राह्मण मेरी ओर देखकर बोले- ‘महाबाहु श्रीकृष्‍ण! तुमने स्‍वभाव से ही क्रोध को जीत लिया है। उत्तम व्रतधारी गोविन्‍द! मैंने यहाँ तुम्‍हारा कोई भी अपराध नहीं देखा है, अत: तुम पर प्रसन्‍न हूँ। तुम मुझसे मनोवांछित कामनाएँ माँग लो। तात! मेरे प्रसन्‍न होने का जो भावी फल है, उसे विधिपूर्वक सुनो। जब तक देवताओं और मनुष्‍यों का अन्‍न में प्रेम रहेगा, तब तक जैसा अन्‍न के प्रति उनका भाव या आकर्षण होगा, वैसा ही तुम्‍हारे प्रति भी बना रहेगा। तीनों लोकों में जब तक तुम्‍हारी पुण्‍य कीर्ति रहेगी, तब तक त्रिभुवन में तुम प्रधान बने रहोगे। जनार्दन! तुम सब लोगों के परम प्रिय होओगे। जनार्दन! तुम्‍हारी जो-जो वस्‍तु मैंने तोड़ी-फोड़ी, जलायी या नष्‍ट कर दी है, वह सब तुम्‍हें पूर्ववत या पहले से भी अच्‍छी अवस्‍था में सुरक्षित दिखायी देगी। मधुसूदन! तुमने अपने सारे अंगों में जहाँ तक खीर लगायी है, वहाँ तक के अंगों में चोट लगने से तुम्‍हें मृत्यु का भय नहीं रहेगा। अच्‍युत! तुम जब तक चाहोगे, यहाँ अमर बने रहोगे। परंतु यह खीर तुमने अपने पैरों के तलवों में नहीं लगायी है। बेटा! तुमने ऐसा क्‍यों किया? तुम्‍हारा यह कार्य मुझे प्रिय नहीं लगा।'

इस प्रकार जब उन्‍होंने मुझसे प्रसन्‍नतापूर्वक कहा, तब मैंने अपने शरीर को अद्भुत कान्ति से सम्‍पन्‍न देखा। फिर मुनि ने रुक्मिणी से भी प्रसन्‍नतापूर्वक कहा- ‘शोभने! तुम सम्‍पूर्ण स्त्रियों में उत्तम यश और लोक में सर्वोत्तम कीर्ति प्राप्‍त करोगी। भामिनि! तुम्‍हें बुढ़ापा या रोग अथवा कान्तिहीनता आदि दोष नहीं छू सकेंगे। तुम पवित्र सुगन्‍ध से सुवासित होकर श्रीकृष्‍ण की आराधना करोगी। श्रीकृष्‍ण की जो सोलह हज़ार रानियाँ हैं, उन सबमें तुम श्रेष्‍ठ और पति के सालोक्‍य की अधिकारिणी होओगी।

प्रद्युम्न! तुम्‍हारी माता से ऐसा कहकर वे अग्नि के समान प्रज्ज्वलित होने वाले महातेजस्‍वी दुर्वासा यहाँ से प्रस्थित होते समय फिर मुझसे बोले- ‘केशव! ब्राह्मणों के प्रति तुम्‍हारी सदा ऐसी ही बुद्धि बनी रहे। प्रभावशाली पुत्र! ऐसा कहकर वे वहीं अन्‍तर्धान हो गये। उनके अदृश्‍य हो जाने पर मैंने अस्‍पष्‍ट वाणी में धीरे से यह व्रत लिया कि ‘आज से कोई ब्राह्मण मुझसे जो कुछ कहेगा, वह सब मैं पूर्ण करूँगा।‘ बेटा! ऐसी प्रतिज्ञा करके परम प्रसन्‍नचित्त होकर मैंने तुम्‍हारी माता के साथ घर में प्रवेश किया।

पुत्र! घर में प्रवेश करके मैं देखता हूँ तो उन ब्राह्मण ने जो कुछ तोड़-फोड़ या जला दिया था, वह सब नूतन रूप से प्रस्‍तुत दिखायी दिया। रुक्मिणीनन्‍दन! वे सारी वस्‍तुएँ नूतन और सुदृढ़ रूप में उपलब्‍ध हैं, यह देखकर मुझे बड़ा आश्‍चर्य हुआ और मैंने मन-ही-मन द्विजों की सदा ही पूजा की। इस तरह मैंने उनसे विप्रवर दुर्वासा का सारा माहात्‍म्य कहा था। प्रभो! कुन्‍तीनन्‍दन! इसी प्रकार आप भी सदा मीठे वचन बोलकर और नाना प्रकार के दान देकर महाभाग ब्राह्मणों की सर्वदा पूजा करते रहें।

भरतश्रेष्‍ठ! इस प्रकार ब्राह्मण के प्रसाद से मुझे उत्तम फल प्राप्‍त हुआ। वे भीष्‍म जी मेरे विषय में जो कुछ कहते हैं, वह सब सत्य है।

इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासन पर्व के अन्‍तर्गत दानधर्म पर्व में दुर्वासा की भिक्षा नामक एक सौ उनसठवाँ अध्‍याय पूरा हुआ।

31/05/2024

पृथिव्यां यानी तीर्थानि तानी तीर्थानि सागरे ।
सागरे सर्वतीर्थानि पादे विप्रस्य दक्षिणे ।।
चैत्रमाहात्मये तीर्थानि दक्षिणे पादे वेदास्तन्मुखमाश्रिताः ।
सर्वांगेष्वाश्रिता देवाः पूजितास्ते तदर्चया ।।
अव्यक्त रूपिणो विष्णोः स्वरूपं ब्राह्मणा भुवि ।
नावमान्या नो विरोधा कदाचिच्छुभमिच्छता ।।
*पृथ्वी में जितने भी तीर्थ हैं वह सभी समुद्र में मिलते हैं और समुद्र में जितने भी तीर्थ हैं वह सभी ब्राह्मण के दक्षिण पैर में है। चार वेद उसके मुख में हैं। अंग में सभी देवता आश्रय करके रहते हैं। इसलिए ब्राह्मण की पूजा करने से सब देवों की पूजा होती है। पृथ्वी में ब्राह्मण विष्णु स्वरूप माने गए हैं इसलिए जिसको कल्याण की इच्छा हो उसे कभी ब्राह्मणों का अपमान तथा द्वेष नहीं करना चाहिए।*

देवाधीनाजगत्सर्वं मन्त्राधीनाश्च देवता:।
ते मन्त्रा: ब्राह्मणाधीना:तस्माद् ब्राह्मण देवता।
*सारा संसार देवताओं के अधीन है तथा देवता मंत्रों के अधीन हैं और मंत्र ब्राह्मण के अधीन हैं।*

ॐ जन्मना ब्राह्मणो, ज्ञेय:संस्कारैर्द्विज उच्चते।
विद्यया याति विप्रत्वं, त्रिभि:श्रोत्रिय लक्षणम्।।
*ब्राह्मण के बालक को जन्म से ही ब्राह्मण समझना चाहिए। संस्कारों से "द्विज" संज्ञा होती है तथा विद्याध्ययन से "विप्र" नाम धारण करता है। जो वेद, मंत्र तथा पुराणों से शुद्ध होकर तीर्थ स्नानादि के कारण और भी पवित्र हो गया है, वह ब्राह्मण परम पूजनीय माना गया है।*

ॐ पुराणकथको नित्यं, धर्माख्यानस्य सन्तति:।
अस्यैव दर्शनान्नित्यं ,अश्वमेधादिजं फलम्।।
*जिसके हृदय में गुरु,देवता,माता-पिता और अतिथि के प्रति भक्ति है। जो दूसरों को भी भक्तिमार्ग पर अग्रसर करता है,जो सदा पुराणों की कथा करता और धर्म का प्रचार करता है। शास्त्रों में ऐसे ब्राह्मण के दर्शन से अश्वमेध यज्ञों का फल प्राप्त होने की बात कही गई है।*

ॐ नमो ब्रम्हण्यदेवाय, गोब्राम्हणहिताय च।
जगद्धिताय कृष्णाय, गोविन्दाय नमोनमः।।
*जगत के पालनहार गौ, ब्राम्हणों के रक्षक भगवान श्रीकृष्ण जी कोटिशः वन्दना करते हैं। जिनके चरणारविन्दों को परमेश्वर अपने वक्षस्थल पर धारण करते हैं, उन ब्राम्हणों के पावन चरणों में हमारा कोटि-कोटि प्रणाम है। ब्राह्मण जप से पैदा हुई शक्ति का नाम है, ब्राह्मण त्याग से जन्मी भक्ति का धाम है।*

31/05/2024

यह जो काशी में सोता है। यह सब सामान्य सोता नहीं है। यह सब अनेक तीर्थ के जल हैं जो काशी आते हैं और गंगा जी में मिल जाते हैं...

सरस्वती नदी की एक धारा शीतला घाट की तरफ आती है..

इस प्रकार यमुना की एक एक धारा दशासुमेध घाट पर गंगा जी से मिलती है...यहां काशी का प्रयाग तीर्थ है.. यहीं पर सरस्वती की भी एक धारा है जो त्रिवेणी है...

गंगा जी के अतिरिक्त यमुना सरस्वती और नर्मदा की तीन धाराएं भगवान त्रिलोचन का अभिषेक करती हैं और गंगा जी में मिल जाती हैं...यहां काशी का चतुर्नद है...

काशी में यह पूरे विश्व का अद्भुत अकल्पनीय संगम है। जहां गंगा यमुना सरस्वती और नर्मदा का संगम होता है।

काशी वासियों को यह ध्यान में रखना चाहिए कि काशी में विश्व के अद्भुत एवं अकल्पनीय संगम है...जिनमें...

1- गंगा
2- गंगा असि नदी एवं गंगा वरुणा नदी
3- गंगा यमुना सरस्वती
4- गंगा यमुना सरस्वती नर्मदा
5- गंगा यमुना सरस्वती किरणा धूूतपापा

अर्थात एक नदी दो नदी तीन नदी चार नदी और पांच नदियों का संगम काशी में अद्भुत एवं अकल्पनीय है। पूरे विश्व के लोगों का ऐसा सौभाग्य नहीं है जो काशीवासियों का है। कहीं जाने की आवश्यकता नहीं सभी तीर्थ सभी नदियां सभी जल स्त्रोत सभी देवता यहां उपस्थित हैं।

यह सब पुराणोक्त एवं प्रमाणिक हैं।

सुधांशु कुमार पांडे
कामाख्या काशी

Pavaneshwarपवनेश्वर - काशी में पवन देव का शिवलिंग प्रतिष्ठा कर तपस्या करना तथा भगवान शिव द्वारा अष्टमूर्ति में स्थान पान...
31/05/2024

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पवनेश्वर - काशी में पवन देव का शिवलिंग प्रतिष्ठा कर तपस्या करना तथा भगवान शिव द्वारा अष्टमूर्ति में स्थान पाना एवं दिक्पाल के पद पर प्रतिष्ठित होना...

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