31/05/2024
*महाभारत: अनुशासनपर्व: एकोनषष्ट्यधिकशततम अध्याय:*
*श्रीकृष्ण का प्रद्युम्न को ब्राह्मणों की महिमा बताते हुए दुर्वासा के चरित्र का वर्णन करना और यह सारा प्रसंग युधिष्ठिर को सुनाना*
युधिष्ठिर! ने पूछा- मधुसूदन! ब्राह्मण की पूजा करने से क्या फल मिलता है? इसका आप ही वर्णन कीजिये; क्योंकि आप इस विषय को अच्छी तरह जानते हैं और मेरे पितामह भी आपको इस विषय का ज्ञाता मानते हैं।
भगवान श्रीकृष्ण ने कहा- कुरुकुलतिलक भरतभूषण नरेश! मैं ब्राह्मणों के गुणों का यथार्थ रूप से वर्णन करता हूँ, आप ध्यान देकर सुनिये।
कुरुनन्दन! पहले की बात है, एक दिन ब्राह्मणों ने मेरे पुत्र प्रद्युम्न को कुपित कर दिया। उस समय मैं द्वारका में ही था। प्रद्युम्न ने मुझसे आकर पूछा- ‘मधुसूदन! ब्राह्मणों की पूजा करने से क्या फल होता है? इहलोक और परलोक में वे क्यों ईश्वर तुल्य माने जाते हैं? मानद! सदा ब्राह्मणों की पूजा करके मनुष्य क्या फल पाता है? यह सब मुझे स्पष्ट रूप से बताइये, क्योंकि इस विषय में मुझे महान संदेह है।'
महाराज! प्रद्युम्न के ऐसा कहने पर मैंने उसको उत्तर दिया। रुक्मिणीनन्दन! ब्राह्मणों की पूजा करने से क्या फल मिलता है, यह मैं बता रहा हूँ, तुम एकाग्रचित्त होकर सुनो। बेटा! ब्राह्मणों के राजा सोम (चन्द्रमा) हैं। अत: ये इस लोक और परलोक में भी सुख-दु:ख देने में समर्थ होते हैं। ब्राह्मणों में शान्त भाव की प्रधानता होती है। इस विषय में मुझे कोई विचार नहीं करना है। ब्राह्मणों की पूजा करने से आयु, कीर्ति, यश और बल की प्राप्ति होती है। समस्त लोक और लोकेश्वर ब्राह्मणों के पूजक हैं। धर्म, अर्थ और काम की सिद्धि के लिये, मोक्ष की प्राप्ति के लिये और यश, लक्ष्मी तथा आरोग्य की उपलब्धि के लिये एवं देवता और पितरों की पूजा के समय हमें ब्राह्मणों को पूर्ण संतुष्ट करना चाहिये। बेटा! ऐसी दशा में मैं ब्राह्मणों का आदर कैसे नहीं करूँ? महाबाहो! मैं ईश्वर (सब कुछ करने में समर्थ) हूँ- ऐसा मानकर तुम्हें ब्राह्मणों के प्रति क्रोध नहीं करना चाहिये। ब्राह्मण इस लोक और परलोक में भी महान माने गये हैं। वे सब कुछ प्रत्यक्ष देखते हैं और यदि क्रोध में भर जायें तो इस जगत को भस्म कर सकते हैं। दूसरे-दूसरे लोक और लोकपालों की वे सृष्टि कर सकते हैं। अत: तेजस्वी पुरुष ब्राह्मणों के महत्व को अच्छी तरह जानकर भी उनके साथ सद्वर्ताव क्यों न करेंगे?
तात! पहले की बात है, मेरे घर में एक हरित-पिंगल वर्ण वाले ब्राह्मण ने निवास किया था। वह चिथड़े पहिनता और बेल का डंडा हाथ में लिये रहता था। उसकी मूँछें और दाढ़ियाँ बढ़ी हुई थीं। वह देखने में दुबला-पतला और ऊँचे कद का था। इस भूतल पर जो बड़े-से-बड़े मनुष्य हैं, उन सबसे वह अधिक लंबा था और दिव्य तथा मानव लोकों में इच्छानुसार विचरण करता था। वे ब्राह्मण देवता जिस समय यहाँ पधारे थे, उस समय धर्मशालाओं में और चौराहों पर यह गाथा गाते फिरते थे कि ‘कौन मुझ दुर्वासा ब्राह्मण को अपने घर में सत्कारपूर्वक ठहरायेगा। यदि मेरा थोड़ा-सा भी अपराध बन जाये तो मैं समस्त प्राणियों पर अत्यन्त कुपित हो उठता हूँ। मेरे इस भाषण को सुनकर कौन मेरे लिये ठहरने का स्थान देगा? जो कोई मुझे अपने घर में ठहराये, वह मुझे क्रोध न दिलाए। इस बात के लिये उसे सतत सावधान रहना होगा।'
बेटा! जब कोई भी उनका आदर न कर सका, तब मैंने उन्हें अपने घर में ठहराया। वे कभी तो एक ही समय इतना अन्न भोजन कर लेते थे, जितने से कई हज़ार मनुष्य तृप्त हो सकते थे और कभी बहुत थोड़ा अन्न खाते तथा घर से निकल जाते थे। उस दिन फिर घर को नहीं लौटते थे। व़े अकस्मात जोर-जोर से हँसने लगते और अचानक फूट-फूटकर रो पड़ते थे। उस समय इस पृथ्वी पर उनका समवयस्क कोई नहीं था।
एक दिन अपने ठहरने के स्थान पर जाकर वहाँ बिछी हुई शय्याओं, बिछौनों और वस्त्राभूषणों से अलंकृत हुई कन्याओं को उन्होंने जलाकर भस्म कर दिया और स्वयं वहाँ से खिसक गये। फिर तुरंत ही मेरे पास आकर वे कठोर व्रत का पालन करने वाले मुनि मुझसे इस प्रकार बोले- ‘कृष्ण! मैं शीघ्र ही खीर खाना चाहता हूँ।' मैं उनके मन की बात जानता था, इसलिये घर के लोगों से पहले से ही आज्ञा दे दी थी कि ‘सब प्रकार के उत्तम मध्यम अन्नपान और भक्ष्य-भोज्य पदार्थ आदरपूर्वक तैयार किये जायें।’ मेरे कथनानुसार सभी चीजें तैयार थीं ही, अत: मैंने मुनि को गरमागरम खीर निवेदन किया। उसको थोड़ा-सा ही खाकर वे तुरंत मुझसे बोले- ‘कृष्ण! इस खीर को शीघ्र ही अपने सारे अंगों में पोत लो।' मैंने बिना विचारे ही उनकी इस आज्ञा का पालन किया। वही जूठी खीर मैंने अपने सिर पर तथा अन्य सारे अंगों में पोत ली।
इतने ही में उन्होंने देखा कि तुम्हारी सुमुखी माता पास ही खड़ी-खड़ी मुसकरा रही हैं। मुनि की आज्ञा पाकर मैंने मुसकराती हुई तुम्हारी माता के अंगों में भी खीर लपेट दी। जिसके सारे अंगों में खीर लिपटी हुई थी, उस महारानी रुक्मिणी को मुनि ने तुरंत रथ में जोत दिया और उसी रथ पर बैठकर वे मेरे घर से निकले। वे बुद्धिमान ब्राह्मण दुर्वासा अपने तेज से अग्नि के समान प्रकाशि हो रहे थे। उन्होंने मेरे देखते-देखते जैसे रथ के घोड़ों पर कोड़े चलाये जाते हैं, उसी प्रकार भोली-भाली रुक्मिणी को भी चाबुक से चोट पहुँचाना आरम्भ किया। उस समय मेरे मन में थोड़ा-सा भी ईर्ष्याजनित दु:ख नहीं हुआ। इसी अवस्था में वे महल से बाहर आकर विशाल राजमार्ग से चलने लगे। यह महान आश्चर्य की बात देखकर दशार्हवंशी यादवों को बड़ा क्रोध हुआ। उनमें से कुछ लोग वहाँ आपस में इस प्रकार बातें करने लगे- 'भाइयों! इस संसार में ब्राह्मण ही पैदा हों, दूसरा कोई वर्ण किसी तरह पैदा न हो। अन्यथा यहाँ इन बाबाजी के सिवा और कौन पुरुष इस रथ पर बैठ कर जीवित रह सकता था। कहते हैं- विषैले साँपों का विष बड़ा तीखा होता है, परंतु ब्राह्मण उससे भी अधिक तीक्ष्ण होता है। जो ब्राह्मणरूपी विषधर सर्प से जलाया गया हो, उसके लिये इस संसार में कोई चिकित्सक नहीं है।'
उन दुर्धर्ष दुर्वासा के इस प्रकार रथ से यात्रा करते समय बेचारी रुक्मिणी रास्ते में लड़खड़ाकर गिर पड़ीं, परंतु श्रीमान दुर्वासा मुनि इस बात को सहन न कर सके। उन्होंने तुरंत उसे चाबुक से हाँकना शुरू किया। जब वह बारंबार लड़खड़ाने लगीं, तब वे और भी कुपित हो उठे और रथ से कूदकर बिना रास्ते के ही दक्षिण दिशा की ओर पैदल ही भागने लगे।
इस प्रकार बिना रास्ते के ही दौड़ते हुए विप्रवर दुर्वासा के पीछे-पीछे मैं उसी तरह सारे शरीर में खीर लपेटे दौड़ने लगा और बोला- ‘भगवन! प्रसन्न होइये।'
तब वे तेजस्वी ब्राह्मण मेरी ओर देखकर बोले- ‘महाबाहु श्रीकृष्ण! तुमने स्वभाव से ही क्रोध को जीत लिया है। उत्तम व्रतधारी गोविन्द! मैंने यहाँ तुम्हारा कोई भी अपराध नहीं देखा है, अत: तुम पर प्रसन्न हूँ। तुम मुझसे मनोवांछित कामनाएँ माँग लो। तात! मेरे प्रसन्न होने का जो भावी फल है, उसे विधिपूर्वक सुनो। जब तक देवताओं और मनुष्यों का अन्न में प्रेम रहेगा, तब तक जैसा अन्न के प्रति उनका भाव या आकर्षण होगा, वैसा ही तुम्हारे प्रति भी बना रहेगा। तीनों लोकों में जब तक तुम्हारी पुण्य कीर्ति रहेगी, तब तक त्रिभुवन में तुम प्रधान बने रहोगे। जनार्दन! तुम सब लोगों के परम प्रिय होओगे। जनार्दन! तुम्हारी जो-जो वस्तु मैंने तोड़ी-फोड़ी, जलायी या नष्ट कर दी है, वह सब तुम्हें पूर्ववत या पहले से भी अच्छी अवस्था में सुरक्षित दिखायी देगी। मधुसूदन! तुमने अपने सारे अंगों में जहाँ तक खीर लगायी है, वहाँ तक के अंगों में चोट लगने से तुम्हें मृत्यु का भय नहीं रहेगा। अच्युत! तुम जब तक चाहोगे, यहाँ अमर बने रहोगे। परंतु यह खीर तुमने अपने पैरों के तलवों में नहीं लगायी है। बेटा! तुमने ऐसा क्यों किया? तुम्हारा यह कार्य मुझे प्रिय नहीं लगा।'
इस प्रकार जब उन्होंने मुझसे प्रसन्नतापूर्वक कहा, तब मैंने अपने शरीर को अद्भुत कान्ति से सम्पन्न देखा। फिर मुनि ने रुक्मिणी से भी प्रसन्नतापूर्वक कहा- ‘शोभने! तुम सम्पूर्ण स्त्रियों में उत्तम यश और लोक में सर्वोत्तम कीर्ति प्राप्त करोगी। भामिनि! तुम्हें बुढ़ापा या रोग अथवा कान्तिहीनता आदि दोष नहीं छू सकेंगे। तुम पवित्र सुगन्ध से सुवासित होकर श्रीकृष्ण की आराधना करोगी। श्रीकृष्ण की जो सोलह हज़ार रानियाँ हैं, उन सबमें तुम श्रेष्ठ और पति के सालोक्य की अधिकारिणी होओगी।
प्रद्युम्न! तुम्हारी माता से ऐसा कहकर वे अग्नि के समान प्रज्ज्वलित होने वाले महातेजस्वी दुर्वासा यहाँ से प्रस्थित होते समय फिर मुझसे बोले- ‘केशव! ब्राह्मणों के प्रति तुम्हारी सदा ऐसी ही बुद्धि बनी रहे। प्रभावशाली पुत्र! ऐसा कहकर वे वहीं अन्तर्धान हो गये। उनके अदृश्य हो जाने पर मैंने अस्पष्ट वाणी में धीरे से यह व्रत लिया कि ‘आज से कोई ब्राह्मण मुझसे जो कुछ कहेगा, वह सब मैं पूर्ण करूँगा।‘ बेटा! ऐसी प्रतिज्ञा करके परम प्रसन्नचित्त होकर मैंने तुम्हारी माता के साथ घर में प्रवेश किया।
पुत्र! घर में प्रवेश करके मैं देखता हूँ तो उन ब्राह्मण ने जो कुछ तोड़-फोड़ या जला दिया था, वह सब नूतन रूप से प्रस्तुत दिखायी दिया। रुक्मिणीनन्दन! वे सारी वस्तुएँ नूतन और सुदृढ़ रूप में उपलब्ध हैं, यह देखकर मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ और मैंने मन-ही-मन द्विजों की सदा ही पूजा की। इस तरह मैंने उनसे विप्रवर दुर्वासा का सारा माहात्म्य कहा था। प्रभो! कुन्तीनन्दन! इसी प्रकार आप भी सदा मीठे वचन बोलकर और नाना प्रकार के दान देकर महाभाग ब्राह्मणों की सर्वदा पूजा करते रहें।
भरतश्रेष्ठ! इस प्रकार ब्राह्मण के प्रसाद से मुझे उत्तम फल प्राप्त हुआ। वे भीष्म जी मेरे विषय में जो कुछ कहते हैं, वह सब सत्य है।
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासन पर्व के अन्तर्गत दानधर्म पर्व में दुर्वासा की भिक्षा नामक एक सौ उनसठवाँ अध्याय पूरा हुआ।