Aum "ॐ" fellowship

Aum "ॐ" fellowship A Spiritual organization trust for Vedic sanatan tradion & culture. वैदिक सनातन संस्कृति को समर्पित।

 ंदीश्वर_काशीविश्वनाथ!* नंदी की गवाही -मैं शिलादिपुत्र नंदी हूँ l सैकड़ों वर्ष से शीत, आतप, बरखा सहने के बाद एक बार मैंने...
25/08/2026

ंदीश्वर_काशीविश्वनाथ!* नंदी की गवाही -
मैं शिलादिपुत्र नंदी हूँ l सैकड़ों वर्ष से शीत, आतप, बरखा सहने के बाद एक बार मैंने महादेव से पूछा कि आप अपना त्रिशूल क्यों नही चलाते ? उन्होंने मुझे श्री राम कथा सुनाई और कहा- राम और रावण की लड़ाई मात्र दो लोगों की लड़ाई नही थी बल्कि सामान्य जन मे मर्यादा की पुन:स्थापना और अन्याय के विरुद्ध उन्हें उठ खड़े होने का साहस देने को थी।' मैं जान गया कि मेरे यहाँ होने का उद्देश्य क्या है। मैं यहाँ पर हुए अत्याचार की गवाही देने के लिए हूँ। भारत भूमि मे निवास करने वाले लोगों में धर्म और सामर्थ्य के जागरण के लिए तप कर रहा हूँ। मैं यहाँ सदियों से पड़ा हूँ, काशी धाम आने वाले सभी जन मुझे देखते हैं l मैं गवाह हूँ कि मेरे भोलेनाथ ज्ञानव्यापी तीर्थ के अधिष्ठाता हैं। मैं हर घड़ी, हर पल महादेव की ओर मुँह करके बता रहा हूँ कि मेरे भोलेबाबा यहीं हैं... यहीं हैं। जम्बू द्वीप के प्रत्येक कोने से आने वाले सभी सनातनियों को बता रहा हूँ कि विश्वेश्वर यहीं हैं। मैंने सुना है कि नए भारत के राजा विधाता का पता लगाने निकले हैं l यह सोच कर मैं मन ही मन महादेव की माया पर मुस्कुराता हूँ। भोलेनाथ जानते थे कि मेरी गवाही ही विधि व्यवस्था की आखिरी बात होगी, इसलिए मैं सैकड़ों साल से यहीं हूँ। जिस दिन मेरी प्रतीक्षा और मेरी गवाही प्रत्येक सनातनी की प्रतीक्षा और गवाही हो जायेगी, उस दिन हर ज्ञानव्यापी को उसका देव मिल जाएगा।* मेरी तरफ देखो, मैं साक्ष्य हूँ, प्रमाण हूँ, साक्षी हूँ कि ज्ञानव्यापी तीर्थ समेत समस्त लोक के एकमेव स्वामी महादेव हैं। 🚩 हर हर महादेव 🚩

 ीतामृत_गीताज्ञान_ क्या हम अपने जन्म से भी बहुत पुराने हैं?हम सामान्यतः अपने जन्म को अपनी अस्तित्व-यात्रा का आरंभ मानते ...
25/08/2026

ीतामृत_गीताज्ञान_
क्या हम अपने जन्म से भी बहुत पुराने हैं?

हम सामान्यतः अपने जन्म को अपनी अस्तित्व-यात्रा का आरंभ मानते हैं। लेकिन क्या वास्तव में ऐसा है?

श्रीमद्भगवद्गीता में श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं—

“बहूनि मे व्यतीतानि जन्मानि तव चार्जुन।
तान्यहं वेद सर्वाणि न त्वं वेत्थ परन्तप॥”

अर्थात्, हे अर्जुन, मेरे और तुम्हारे बहुत से जन्म बीत चुके हैं; उन सबको मैं जानता हूँ, तुम नहीं जानते।

परंपरागत रूप से इस श्लोक को पुनर्जन्म के संदर्भ में समझा जाता है। लेकिन क्या इसके भीतर एक और व्यापक अर्थ पर विचार किया जा सकता है?

आज विज्ञान हमें बताता है कि हमारे शरीर में मौजूद अनेक तत्व पृथ्वी पर मूल रूप से नहीं बने। कार्बन, ऑक्सीजन, कैल्शियम, लौह जैसे तत्व तारों की पीढ़ियों में बने और तारों के जन्म-मृत्यु तथा विस्फोटों के बाद अंतरिक्ष में फैले। उन्हीं पदार्थों से आगे चलकर ग्रह बने और उन्हीं से हमारे शरीर का निर्माण हुआ।

अर्थात् मेरा वर्तमान शरीर भले ही कुछ दशक पुराना हो, लेकिन उसके भीतर का पदार्थ अरबों वर्षों की ब्रह्मांडीय यात्रा करके यहाँ पहुँचा है।

इस दृष्टि से देखें तो हम केवल अपने जन्म की तारीख से शुरू नहीं होते। हमारे शरीर के पदार्थ की कहानी हमसे अरबों वर्ष पुरानी है।

तारे बने, जले, बदले और नष्ट हुए। उनके पदार्थ अंतरिक्ष में फैले। उन्हीं पदार्थों से नए तारे और ग्रह बने। पृथ्वी बनी। पृथ्वी पर जीवन विकसित हुआ। जीवन की अनगिनत पीढ़ियाँ आईं और चली गईं। और उसी लंबी यात्रा का एक वर्तमान रूप है—हम।

तो क्या कृष्ण के “बहूनि जन्मानि” को केवल व्यक्तिगत पुनर्जन्म के रूप में ही समझना आवश्यक है?

मैं यह नहीं कह रहा कि गीता का पारंपरिक अर्थ गलत है। मैं केवल यह प्रश्न उठा रहा हूँ कि शायद उसके भीतर ब्रह्मांड को देखने की एक और खिड़की भी खुलती है।

हमारे शरीर के परमाणु हमसे पहले भी अस्तित्व में थे। वे अनेक रूपों में रहे होंगे। हो सकता है वे किसी तारे का हिस्सा रहे हों, किसी ग्रह का, किसी चट्टान का, किसी समुद्र का या किसी दूसरे जीव का।

रूप बदलते रहे, पदार्थ की यात्रा चलती रही।

यहाँ “जन्म” और “मृत्यु” की हमारी सामान्य धारणा भी छोटी लगने लगती है। एक तारा समाप्त होता है तो उसके तत्व किसी दूसरे निर्माण का हिस्सा बन सकते हैं। एक जीव मरता है तो उसके शरीर के तत्व प्रकृति में लौट जाते हैं। वही पदार्थ फिर किसी दूसरे रूप में संगठित हो सकता है।

अर्थात् रूप समाप्त होता है, लेकिन प्रकृति की यात्रा समाप्त नहीं होती।

यही विचार मुझे हमारी पहले की चर्चा की ओर भी ले जाता है—क्या जीवन और निर्जीवता के बीच की सीमा उतनी स्पष्ट है जितनी हम मानते हैं?

एक कोशिका जीवित है। शरीर करोड़ों-खरबों कोशिकाओं से मिलकर बना है। मनुष्य समाज बनाता है। मनुष्य मिलकर देश बनाते हैं। ग्रह सौरमंडल का हिस्सा हैं और सौरमंडल आकाशगंगा का। हर स्तर पर छोटी इकाइयाँ किसी बड़ी व्यवस्था का हिस्सा हैं।

हम किसी व्यवस्था को उसकी छोटी इकाइयों से अलग करके नहीं समझ सकते।

एक समय बिना सूक्ष्मदर्शी के मनुष्य को सूक्ष्मजीवों की दुनिया दिखाई नहीं देती थी। बिना दूरबीन के उसे ब्रह्मांड की विशालता दिखाई नहीं देती थी। इसका अर्थ यह नहीं था कि वे संसार उस समय मौजूद नहीं थे। हमारी दृष्टि सीमित थी।

तो क्या संभव है कि जीवन, चेतना और अस्तित्व के भी ऐसे स्तर हों जिन्हें हमारी वर्तमान दृष्टि अभी पहचान नहीं पाई है?

विज्ञान को यहाँ “मैं नहीं जानता” कहने का साहस रखना चाहिए। किसी संभावना का प्रमाण न मिलना और उसका असंभव सिद्ध हो जाना एक ही बात नहीं है।

इसी संदर्भ में रामकृष्ण परमहंस जैसे सिद्ध पुरुषों की अनुभूतियों को भी एक अलग दृष्टि से देखा जा सकता है। यदि किसी साधक को पत्थर, वृक्ष, मनुष्य और समस्त प्रकृति में एक ही सत्ता दिखाई देती है, तो संभव है कि वह हमारे सामान्य वर्गीकरण—“यह जीवित है, यह निर्जीव है”—से आगे किसी एकता का अनुभव कर रहा हो।

शायद उन्होंने पत्थर को मनुष्य की तरह “जीवित” नहीं देखा था; शायद उन्होंने अस्तित्व की उस निरंतरता को अनुभव किया जिसे हम अलग-अलग नामों और श्रेणियों में बाँट देते हैं।

और तब प्रेम की परिभाषा भी बदल जाती है।

जब सामने वाला केवल “दूसरा” नहीं रह जाता, बल्कि उसी व्यापक अस्तित्व का एक रूप दिखाई देता है, तब प्रेम केवल मनुष्य से मनुष्य तक सीमित नहीं रहता। वह प्रकृति और समस्त अस्तित्व तक फैल सकता है।

इसलिए गीता का अर्जुन से कहा गया वाक्य मेरे लिए केवल पुनर्जन्म का प्रश्न नहीं रह जाता।

“तुम्हारे भी अनेक जन्म हो चुके हैं।”

शायद इसका एक व्यापक ब्रह्मांडीय अर्थ यह भी हो सकता है कि तुम्हारा अस्तित्व केवल इस वर्तमान शरीर की सीमा से शुरू नहीं होता। तुम्हारे भीतर का पदार्थ, तुम्हारी जीवन-परंपरा और तुम्हारे अस्तित्व की कहानी उस ब्रह्मांड से जुड़ी है जो अरबों वर्षों से रूप बदलता आया है।

हम छोटे हैं, लेकिन हमारी कहानी छोटी नहीं है।

हमारी देह में तारों का इतिहास है।

हमारे शरीर के परमाणु हमसे बहुत पुराने हैं।

और संभव है कि अस्तित्व की हमारी समझ अभी उतनी ही अधूरी हो जितनी दूरबीन के आविष्कार से पहले मनुष्य की आकाश की समझ थी।

शायद हम ब्रह्मांड में पैदा हुए जीव मात्र नहीं हैं; हम स्वयं ब्रह्मांड की अरबों वर्षों की यात्रा का एक वर्तमान रूप हैं।

और शायद इसी को समझने के लिए गीता, विज्ञान और आध्यात्म—तीनों को एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि अलग-अलग दृष्टियों की तरह देखना चाहिए।
साभार,कल्याण गीताप्रेस।

 ाशी_कालभैरव_ब्रह्महत्या_कालभैरव को मिली थी, ब्रह्महत्या पाप से मुक्तिः महादेव के आदेश पर कालभैरव बन गए काशी के कोतवाल.....
23/08/2026

ाशी_कालभैरव_ब्रह्महत्या_कालभैरव को मिली थी, ब्रह्महत्या पाप से मुक्तिः महादेव के आदेश पर कालभैरव बन गए काशी के कोतवाल...

एक बार देवताओं ने ब्रह्मा और विष्णुजी से बारी-बारी से पूछा कि जगत में सबसे श्रेष्ठ कौन है? तो दोनों देवताओं ने कई तर्क देकर स्वयं को श्रेष्ठ बताने का स्वाभाविक आचरण किया।

जब कोई निर्णय नहीं हो पा रहा था तो देवताओं ने वेदों के सामने अपनी समस्या रखी। वेदों ने कहा, सर्वश्रेष्ठ वही हो सकता है जिसके भीतर चराचर जगत, भूत, भविष्य और वर्तमान समाया हुआ हो। जो अनादि, अनंत और अविनाशी हो।

यह सारे गुण तो भगवान रूद्र में ही समाहित हैं। इसलिए देवतागण आप लोगो शिव को ही सर्वश्रेष्ठ समझें। वेदशास्त्रों से शिव की इतनी प्रशंसा सुनकर ब्रह्मा के पांचवें मुख ने शिवनिंदा करनी शुरू कर दी।

इससे वेद काफी दुखी हुए। तभी रूद्र एक दिव्य ज्योतिपुंज के रूप में वहां प्रकट हो गए। ब्रह्मा ने कहा, हे रूद्र, तुम मेरे ही सिर से पैदा हुए हो और अधिक रुदन करने के कारण मैंने ही तुम्हारा नाम ‘रूद्र’ रखा है। अतः तुम मेरी सेवा में आ जाओ।

ब्रह्मा के इस अहंकार भरे आचरण पर शिव को भयानक क्रोध आया। क्रोध में भरकर उन्होंने भैरव को उत्पन्न किया। महादेव ने भैरव को आदेश दिया कि उनके मन पर पड़ा अज्ञान मिटाओ।

दिव्य शक्तियों से संपन्न भैरव ने उसे शिव का क्रोधपूर्ण आदेश समझ लिया और अपने बाएं हाथ की सबसे छोटी अंगुली के नाख़ून से ब्रह्मा के उसी पांचवें मुख पर प्रहार किया जिसने शिवनिंदा की थी।

ब्रह्मा का पांचवा सर कटकर वहीं गिर पड़ा। भैरव ने आवेश में भरकर ब्रह्महत्या का पाप कर दिया था। तत्काल उन्हें ब्रह्महत्या दोष ने आ घेरा और उन्हें पीड़ित करने लगी।

ब्रह्महत्या की अग्नि से पीड़ित भैरव वहां से चले। भैरव ब्रह्माजी के कटे कपाल को धारण कर तीनों लोकों में भागते रहे लेकिन वह जहां भी जाते ब्रह्महत्या उनका पीछा करती पहुंच जाती।

भैरव का मन संताप से भर गया। ब्रह्महत्या के ताप से भैरव काले पड़ गए। उन्होंने महादेव से मुक्ति का मार्ग पूछा। भगवान शिव ने कहा, भैरव, तुम काशी जाओ। काशी मेरे द्वारा रक्षित है। वहां ब्रह्महत्या नहीं घुस सकती।

जब कालभैरव काशी के समीप पहुंचे तो पीछे-पीछे ब्रह्महत्या भी आई लेकिन वह काशी की सीमा में प्रवेश नहीं कर पाई। काल भैरव को ब्रह्महत्या के पाप से मुक्ति मिल गई थी।
साभार,
कल्याण गीताप्रेस गोरखपुर।

22/08/2026
22/08/2026

ारदेश्वर_शिवशंकर_हरहर___महादेव!

 ्मीर_ग़ौरवम्_इतिहास_विहंगम__दृश्यभाग4A #भारत_का_सिकंदर_ललितादित्य_मुक्तपीड – --------------------------------‐---------...
22/08/2026

्मीर_ग़ौरवम्_इतिहास_विहंगम__दृश्यभाग4A

#भारत_का_सिकंदर_ललितादित्य_मुक्तपीड –

--------------------------------‐----------------
✍ जिन्होंने तुर्की और अरबी आक्रांताओं को उनके राज्य में घुसकर मारा!
-------------------------------------‐---------‐-

✍ भारत में इस्लाम का आगमन हुआ 712 AD में, जब अविभाजित भारतवर्ष के तत्कालीन मुल्तान पर मुहम्मद बिन क़ासिम ने आक्रमण किया था। इसके पश्चात हमें अवगत कराया गया है की कैसे 1020-1025 तक गज़नवी के सुल्तान महमूद के निरंतर आक्रमणों से भारत की अजेय छवि को गहरा आघात पहुंचा था। परंतु किसी ने इस बात पर ध्यान क्यों नहीं दिया कि महमूद जैसे विदेशी आक्रांता को भारत में अपने पैर रखने में 300 से अधिक वर्ष क्यों लग गए?

✍ ऐसा क्या कारण था की मुहम्मद बिन कासिम के आक्रमण के बावजूद भारत 300 से ज़्यादा वर्षों तक विदेशी आक्रमणों से पूर्णतया मुक्त रहा था? क्या इसका कारण केवल अरब क्षेत्र में उमय्यिद खलीफा का पतन था? या हमारे भारतवर्ष में कोई योद्धा ऐसा भी था, जिन्होंने न केवल इन आक्रांताओं को धूल चटाई, अपितु इनके मस्तिष्क में भय का ऐसा संचार किया की वे भारत भूमि की ओर देखने का कई शताब्दियों का दुस्साहस नहीं कर पाये?

✍ वो वीर योद्धा जिनके कारण भारतभूमि विदेशी आक्रांताओं के अत्याचार से तीन शताब्दियों से भी अधिक समय तक मुक्त रही थी। ये कथा है उस सम्राट के शौर्य की, जिसकी कीर्ति केवल अखंड भारत में ही नहीं, अपितु मध्य एशिया तक गूँजती थी। ये कथा है कश्मीर के कार्कोटा वंश के महान सम्राट ललितादित्य मुक्तपीड़ की, जिन्होंने न सिर्फ भारतवर्ष को विदेशी आक्रमणों से मुक्त रखा, अपितु अरबी एवं तुर्की आक्रांताओं को उनके साम्राज्य में घुस के पछाड़ा।

✍ ललितादित्य के बारे में प्रसिद्ध कवि कल्हण की पुस्तक राजतरंगिणी में वर्णन किया गया है, इसके अलावा ‘फतेहनामा सिंध’, एवं अल बेरुनी की ‘तारीख ए हिन्द’ में भी वीर ललितदित्य के अदम्य शौर्य का उल्लेख किया गया है। ललितादित्य की ख्याति चीन तक व्याप्त थी, क्योंकि चीन के टेंग वंश का उल्लेख करती पुस्तक ‘जिंग टेंग शु’ में भी इनका उल्लेख किया गया है।

✍ ललितादित्य की कथा प्रारम्भ होती है कार्कोट राजवंश की स्थापना से, जिसके संस्थापक इनके पिता दुर्लभवर्धन थे। इनके पिता गोन्दडिया वंश के अंतिम शासक बालादित्य के यहाँ एक अधिकारी थे। इनकी कर्तव्यनिष्ठ सेवा से प्रसन्न होकर बालादित्य ने अपनी पुत्री अनंगलेखा का विवाह इनके साथ किया।

राजशाही से कोई संबंध न रखने के बावजूद दुर्लभवर्धन को अपने दामाद के तौर पर स्वीकारने में बालादित्य को कोई आपत्ति नहीं हुई। इन्ही दुर्लभवर्धन के वंशजों में से एक प्रतापादित्य तथा उनकी धर्मपत्नी नरेंद्रप्रभा के कनिष्ठ सुपुत्र थे ललितादित्य, जिन्हें मुक्तपीड़ के नाम से भी जाना जाता था। इनके दो ज्येष्ठ भ्राता भी थे, जिनका नाम था चंद्रपीड़ अथवा वज्रादित्य एवं तारापीड़ अथवा उदयादित्य, जो ललितादित्य से पहले कश्मीर प्रांत के शासक हुआ करते थे।

✍ प्रारम्भ से ही ललितादित्य साहस एवं पराक्रम की प्रतिमूर्ति थे। उनका केवल एक ध्येय था : अपने राज्य का विश्व भर में विस्तार करना। वर्षों के अथक परिश्रम और अनुशासित प्रशिक्षण से ललितादित्य इतने पराक्रमी हो गए कि ये महीनों और वर्षों तक किसी भी युद्ध में बिना थके व्यस्त रह सकते थे। यह अरबी आक्रमणकारियों के स्वभाव से अनभिज्ञ नहीं थे, और उन्हे अच्छी तरह से ज्ञात था कि यदि उन्होंने अपनी आत्मरक्षा में एक सशक्त सेना नहीं बनाई, तो शत्रुओं को उनके भारतभूमि को क्षत-विक्षत करने में तनिक भी समय नहीं लगेगा।

✍ उन्होंने कम्बोज, तुखारस (तुर्कमेनिस्तान में तुर्क और बदख्शां में तोचरान), भूटा (बाल्टिस्तान और तिब्बत में तिब्बत) और दारदास (डारस) के आक्रांताओं को सीधी युद्ध में परास्त किया था।

प्रसिद्ध इतिहासकार रमेश चन्द्र मजूमदार की ऐतिहासिक पुस्तक ‘प्राचीन भारत’ [Ancient India] के अनुसार ललितादित्य के समक्ष सर्वप्रथम चुनौती आई यशोवर्मन से, जो पुष्यभूति वंश के प्रसिद्ध शासक हर्षवर्धन के उत्तराधिकारी माने जाते थे। ललितादित्य ने यशोवर्मन के राज्य अंतर्वेदी पर आक्रमण किया, और एक भीषण युद्ध के पश्चात यशोवर्मन को शांतिवार्ता के लिए विवश भी किया। इसी अंतर्वेदी राज्य की राजधानी कान्यकुब्ज हुआ करती थी, जिसे आज हम कन्नौज के नाम से भी जानते हैं।

✍ ललितादित्य यशोवर्मन से संधि करने के पश्चात विंध्याचल की तरफ निकल पड़े, जहां उन्हें कर्णात वंश की महारानी रत्ता मिली। रत्ता की समस्या को समझते हुये कर्णात वंश की ललितादित्य ने न केवल विदेशी आक्रमणकारियों से रक्षा की, अपितु उनके समक्ष मित्रता का हाथ भी बढ़ाया। कई लोगों के अनुसार रत्ता कोई और नहीं वरन राष्ट्रकूट वंश की रानी भवांगना ही थी। कई लोक कथाओं के अनुसार मेवाड़ के वीर योद्धा बप्पा रावल ललितादित्य के परम-मित्र हुआ करते थे और दोनों ने साथ मिलकर दोनों ने कई विदेशी आक्रांताओं को धूल भी चटाई थी।

✍ विंध्याचल की रक्षा करने के उपरांत पश्चात ललितादित्य ने अपना ध्यान उत्तर की ओर केन्द्रित किया। ललितादित्य ने लद्दाख और कुछ पश्चिमी प्रांत, जो तब तिब्बतियों के अधीन थे उन पर भी आक्रमण कर तिब्बतियों को पूरी तरह से अपने अधीन कर लिया था। यही वो समय था जब मुहम्मद बिन कासिम ने मुल्तान पर आक्रमण किया था, अरब आक्रांताओं का एकमात्र ध्येय भारत राज्य को इस्लाम के अधीन करना था।

✍ अल-बरूनी अपनी किताब में लिखते हैं कि बुखारा के संचालक मोमिन को कश्मीरी राजा मुथाई ने हराया था। मुथाई की पहचान मुक्तपीड़ के रूप में की जाती है, जो ललितादित्य का ही दूसरा नाम था। संभवतः पामीर क्षेत्र पर उनका अभियान विजयी रहा था। यहाँ विजयोपरांत वे बाद अगले गंतव्य के लिए कूच कर गए। और इस बार आक्रमण सीधा अरबों के मर्मस्थान पर था।

अरबों पर विजय उतनी सरल नहीं थी। ललितादित्य ने वीरता के साथ साथ कूटनीति का भी प्रयोग किया। उन्होंने चीन के तांग राजवंश से संपर्क किया था जो 7 वीं शताब्दी के दौरान सत्ता के शीर्ष पर था। ललितादित्य अरबों और तिब्बतियों के खिलाफ लड़ाई में उन्हें अपनी ओर करने में कामयाब रहे। दोनों ने मिल कर तिब्बतियों को हराया साथ ही तत्कालीन बांग्लादेश और अन्य पूर्वी क्षेत्रों पर नियंत्रण कर लिया था।

✍ उन्होंने तुर्केस्तानंद ट्रान्सोक्सियाना पर भी विजय प्राप्त की, जो मध्य एशिया यानि आधुनिक उज्बेकिस्तान, ताजिकिस्तान, दक्षिणी किर्गिस्तान और दक्षिण-पश्चिम कजाकिस्तान था। इसके बाद ललितादित्य ने काबुल के रास्ते तुर्केस्तान पर आक्रमण किया। चार भीषण युद्ध हुए और चारों ही युद्धों में ललितादित्य का विजयश्री ने वरन किया। मोमिन बुखारा परास्त हुआ। मोमिन को परास्त कर ललितादित्य ने अपने राज्य की सीमाएं कैस्पियन सागर तक विस्तृत कर दी जो कालांतर में काराकोरम पर्वत श्रृंखला के सूदूरवर्ती कोने तक जा पहुँचा। अरबों के प्रति उनका रोष ऐसा था कि उन्हे परास्त करने के बाद वह उनके आधे सिर मुंडवाने देते थे।

उत्तर में तिब्बत से लेकर दक्षिण में द्वारका पूर्व में उड़ीसा के सागर तट तक, बंगाल इत्यादि, पश्चिम में विदिशा और मध्य एशिया तक ललितादित्य ने कश्मीर राज्य का विस्तार कर लिया था। उन्होंने प्रकरसेन नगर को राजधानी बनाई थी। ललितादित्य की सेना की पर्शिया तक पहुँच चुकी थी, जो आज ईरान के नाम से जानी जाती है।

✍ परंतु ललितादित्य केवल दिग्विजयी ही नहीं थे बल्कि वे कुशल योद्धा के साथ साथ एक भव्य निर्माण कर्ता भी थे। उनके सबसे भव्य निर्माणों में से एक था मार्तंड सूर्य मंदिर, जिसे आगे चल कर क्रूर आक्रांता और शाह मिरी वंश के सुल्तान सिकंदर बुतशिकन ने क्षत विक्षत कर दिया। अपने खंडित स्थिति में भी भव्यता परिपूर्ण यह मार्तंड सूर्य मंदिर के बारे में सोचकर हम चकित होते हैं की वास्तव में ये मंदिर कितना भव्य रही होगी। फिल्म हैदर का गीत ‘बिस्मिल बिस्मिल’ अगर आपने देखा है तो आपने कश्मीर के मार्तंड सूर्य मंदिर के खंडहर को अवश्य देखा होगा।

ये हमारा दुर्भाग्य है कि जिस योद्धा ने भारतभूमि को विदेशी आक्रांताओं के आक्रमणों से मुक्त रखा, जिस योद्धा ने कश्मीर और भारत के गौरव को विश्व भर में प्रचारित किया, उसके बारे में हम आज भी अनभिज्ञ हैं। इससे बड़ी विडम्बना क्या होगी कि हमें आज भी हेर्मन गोएट्ज जैसे विदेशी इतिहासकारों से अपने इतिहास की पुष्टि करानी पड़ती है, जिन्होंने कल्हण की राजतरंगिनी के लोकरीतियों की पुष्टि भी की थी।

✍ ये कथा थी शौर्य और साहस की, सम्मान और संस्कार की, रण-कौशल और कूटनीति की और कथा वीर ललितादित्य मुक्तपीड की । ऐसी ही और कथाएँ लेकर मैं आता रहूँगा

#कश्मीर_के_इतिहास_पर_विहंगम__दृश्य_

साभार,

 ्रावणमासीय_पारदेश्वर__रूद्रार्चन_रूद्राभिषेक
21/08/2026

्रावणमासीय_पारदेश्वर__रूद्रार्चन_रूद्राभिषेक

🙏🏼 ्वंदन_शुभमंगलमय_कवि_संतशिरोमणि_गोस्वामीतुलसीदास_________पुण्यआविर्भाव_जन्मोत्सव !
19/08/2026

🙏🏼 ्वंदन_शुभमंगलमय_कवि_संतशिरोमणि_गोस्वामीतुलसीदास_________पुण्यआविर्भाव_जन्मोत्सव !

18/08/2026

िल्या_स्पर्श_

 ुरुष_प्रकति_सृष्टि के प्रारंभ में जब चारों ओर केवल जल ही जल था, तब भगवान विष्णु की नाभि से एक दिव्य कमल प्रकट हुआ। उस क...
18/08/2026

ुरुष_प्रकति_सृष्टि के प्रारंभ में जब चारों ओर केवल जल ही जल था, तब भगवान विष्णु की नाभि से एक दिव्य कमल प्रकट हुआ। उस कमल के ऊपर ब्रह्मा जी प्रकट हुए। ब्रह्मा जी ने चारों ओर देखा, लेकिन उन्हें कोई दिखाई नहीं दिया।

ब्रह्मा जी असमंजस में पड़ गए कि 'मैं कौन हूँ? मैं कहाँ से आया हूँ? और मेरे जन्म का कारण क्या है?' वे कमल की नाल (डंडी) के सहारे समुद्र की गहराइयों में नीचे उतरने लगे। वे हजारों वर्षों तक नीचे चलते रहे, लेकिन उन्हें उस कमल का अंत या अपने जन्म का आधार कहीं नहीं मिला।

हारकर ब्रह्मा जी वापस अपने कमल के आसन पर बैठ गए। तभी जल के भीतर से उन्हें दो अक्षर सुनाई दिए—
'त-प' (तपस्या करो)।
ब्रह्मा जी ने आँखें बंद कर लीं और बारह दिव्य वर्षों तक घोर ध्यान लगाया।

जब ब्रह्मा जी का ध्यान पूरी तरह गहरा हो गया, तब उनके आंतरिक हृदय में साक्षात नारायण ने दर्शन दिए। उन्होंने देखा कि एक परम दिव्य महाशक्ति पूरे क्षीर सागर में व्याप्त है और साथ ही उनके खुद के हृदय के भीतर भी बैठी है।

भगवान पुरुषः को देखकर ब्रह्मा जी का सारा अज्ञान दूर हो गया। भगवान ने उन्हें सृष्टि की रचना करने की शक्ति और वेदों का ज्ञान दिया। ब्रह्मा जी समझ गए कि वे जिस आधार को बाहर ढूंढ रहे थे, वह परम 'पुरुष' तो स्वयं उनके भीतर ही विरा

अर्थात— "वह परमेश्वर जो इस ब्रह्मांड में सबसे पहले मौजूद थे, और जो संसार के हर छोटे-बड़े जीव के शरीर के भीतर मुख्य प्राण बनकर निवास करते हैं, वही 'पुरुषः' हैं।"

वेदों (पुरुष सूक्त) और विष्णु सहस्त्रनाम के अनुसार, इस नाम के दो बहुत गहरे अर्थ हैं:

'पुरि शेते इति पुरुषः' = 'पुर' यानी नगर या शरीर। 'शेते' यानी निवास करना। जो हर जीव के शरीर रूपी नगर के भीतर आत्मा बनकर सो रहा है या निवास कर रहा है।

'पुरुषाः' = जो सबसे प्राचीन है, जो प्रकृति और समय से भी पहले मौजूद था।

इसीलिए प्रभु को पुरुष: भी कहते है

जय श्रीहरि🙏

Address

Manikarnika Ghat
Varanasi

Alerts

Be the first to know and let us send you an email when Aum "ॐ" fellowship posts news and promotions. Your email address will not be used for any other purpose, and you can unsubscribe at any time.

Shortcuts

Share