Jamiat Ulama-i-Banaras

Jamiat Ulama-i-Banaras یہ پیج ملت اسلامیہ ہند کی نمائندہ اور سرمایہ ملت کی نگہبان جماعت جمعیۃ علماء ہند کی ذیلی شاخ جمعیۃ عل

*مذہبی آزادی کے نام پر مہاراشٹر کا قانون خود مذہبی آزادی کا دشمن**عدالتوں کو قانونی ڈھانچے، پس پشت اکثریتی سوچ کے حامل...
21/08/2026

*مذہبی آزادی کے نام پر مہاراشٹر کا قانون خود مذہبی آزادی کا دشمن*

*عدالتوں کو قانونی ڈھانچے، پس پشت اکثریتی سوچ کے حامل مقاصد اور غلط استعمال کا جلد جائزہ لینا چاہیے۔ مولانا محمود اسعد مدنی*

نئی دہلی 21 اگست :جمعیۃ علماء ہند کے صدر مولانا محمود اسعد مدنی نے مہاراشٹر فریڈم آف ریلیجن ایکٹ 2026 کے نافذ ہونے پر گہری تشویش کا اظہار کرتے ہوئے کہا ہے کہ اس قانون کی متعدد دفعات شہریوں کی آزادیِ ضمیر، مذہبی آزادی، پرائیویسی اور شخصی خود اختیاری کے آئینی تحفظات سے متصادم ہیں۔مولانا مدنی نے کہا کہ بھارت کی طاقت اس کی گوناگوں مذہبی اور تہذیبی شناخت میں ہے۔ آئین میں دی گئی مذہبی آزادی ہر شہری کے لیے ہے۔ اگر کوئی شہری اپنے مذہب کا آزادانہ انتخاب نہیں کر سکتا تو آئین کی دفعہ ۲۵ بے معنی ہوجاتی ہے۔

مولانا مدنی نے کہا کہ مہاراشٹر نے اس قانون کے ذریعے اتر پردیش، گجرات اور مدھیہ پردیش ماڈل کو اختیار کیا ہے جنہیں جمعیۃ علماءہندپہلے ہی سپریم کورٹ آف انڈیا میں چیلنج کر چکی ہے۔ ہمارا بنیادی موقف یہ ہے کہ (Allurement) اور (Fraudulent) جیسی مبہم اصطلاحات کو قانون کا حصہ بنانے کے نتیجے میں مذہب کی پُرامن تبلیغ کو بھی جرم کے دائرے میں لایا جا رہا ہے۔ اسی طرح اہل ایمان کےلیے اخروی فلاح و نجات کی تعلیم کو بھی ’لالچ ‘کے زمرے میں رکھا گیا ہے جوآئین ہند کی دفعہ ۲۵ میں حاصل ’حق تبلیغ ‘ کو برا ہ راست کالعدم کردیتا ہے۔ نیز تجربے سے یہ ثابت ہے کہ اس قانون کی آڑ میں اندھا دھند لوگوں کو جیلوں میں بند جارہا ہے۔ ہم یہ سمجھتے ہیں کہ ریاست کو یہ آئینی اختیار حاصل نہیں ہو سکتا کہ وہ کسی شہری کے نجی ضمیر اور مذہبی انتخاب کی نگراں اور محتسب بن جائے۔

گزشتہ سال سپریم کورٹ نے پہلے بھی اس امر پر تشویش کا اظہار کیا تھا کہ مذہب کی تبدیلی سے قبل لازمی اعلان، پولیس انکوائری اور ذاتی معلومات کو منظرِ عام پر لانے کے جیسی شرائط فرد کی شخصی آزادی پر غیر ضروری اور غیر معمولی بوجھ عائد کرتی ہے ۔مولانا مدنی نے کہا کہ مختلف ریاستوں میں تبدیلیٔ مذہب مخالف قوانین کے تجربے کی روشنی میں عدالتوں اور جمہوری اداروں کو صرف ان قوانین کے بیان کردہ مقاصد ہی نہیں بلکہ ان کے قانونی ڈھانچے، پسِ پشت اکثریتی سوچ کے حامل مقاصد اور ہورہے غلط استعمال کا بھی جائزہ لینا چاہیے۔

مولانا مدنی نے واضح کیا کہ جمعیۃ علماء ہند کسی بھی ایسی حقیقی کوشش کی مخالف نہیں ہے جس کا مقصد جبر، دھوکہ دہی یا جبری تبدیلیٔ مذہب کو روکنا ہو، لیکن مذہبی آزادی کے تحفظ کے نام پر بنایا گیا کوئی قانون خود اسی آزادی کو محدود کرنے کا ذریعہ نہیں بن سکتا،نیز اسے ایک مخصوص کمیونٹی کے خلاف سزا کا بھی ہتھیار نہیں بنایا جاسکتا۔

عظیم اللہ صدیقی
ناظم نشر و اشاعت جمعیت علماء ہند
7874012584

 #धार्मिक_स्वतंत्रता के नाम पर  #महाराष्ट्र का कानून स्वयं धार्मिक आजादी का दुश्मन- अदालतों को कानूनी ढांचे, इसके पीछे छ...
21/08/2026

#धार्मिक_स्वतंत्रता के नाम पर #महाराष्ट्र का कानून स्वयं धार्मिक आजादी का दुश्मन
- अदालतों को कानूनी ढांचे, इसके पीछे छिपी बहुसंख्यकवादी सोच से प्रेरित उद्देश्यों और इसके दुरुपयोग की जल्द समीक्षा की जानी चाहिए: मौलाना महमूद असद मदनी*
नई दिल्ली, 21 अगस्त: जमीअत उलमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना महमूद असद मदनी ने महाराष्ट्र फ्रीडम ऑफ रिलीजन एक्ट 2026 के लागू होने पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए कहा है कि इस कानून के कई प्रावधान नागरिकों की अंतरात्मा की स्वतंत्रता, धार्मिक आजादी, निजता और व्यक्तिगत स्वायत्तता के संवैधानिक संरक्षण के विपरीत हैं। मौलाना मदनी ने कहा कि भारत की शक्ति उसकी विविध धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान में निहित है। संविधान में प्रदत्त धार्मिक स्वतंत्रता हर नागरिक के लिए है। अगर कोई नागरिक अपने धर्म का स्वतंत्र रूप से चुनाव नहीं कर सकता, तो संविधान का अनुच्छेद 25 निरर्थक हो जाता है।
मौलाना मदनी ने कहा कि महाराष्ट्र ने इस कानून के माध्यम से उत्तर प्रदेश, गुजरात और मध्य प्रदेश के मॉडल को अपनाया है, जिन्हें जमीअत उलमा-ए-हिंद पहले ही भारत के उच्चतम न्यायालय में चुनौती दे चुकी है। हमारा मूल मत यह है कि ‘Allurement’ (प्रलोभन) और ‘Fraudulent’ (धोखाधड़ीपूर्ण) जैसी अस्पष्ट शब्दावली को कानून का हिस्सा बनाने के परिणामस्वरूप धर्म के शांतिपूर्ण प्रचार को भी अपराध के दायरे में लाया जा रहा है। इसी प्रकार, एकेश्वरवाद पर आस्था रखने वालों के लिए आख़िरत (परलोक) में इसका फल मिलने और मोक्ष की शिक्षा को भी ‘लालच’ की श्रेणी में रखा गया है, जो भारत के संविधान के अनुच्छेद 25 मंं प्रदत्त धर्म के प्रचार के अधिकार को सीधे तौर पर निष्प्रभावी करता है। इसके अलावा अनुभव से पता चलता है कि ऐसे कानून की आड़ में बड़ी संख्या में लोगों को जेल में बंद किया जा रहा है। हम मानते हैं कि राज्य को यह संवैधानिक अधिकार प्राप्त नहीं हो सकता कि वह किसी नागरिक की निजी अंतरात्मा और धार्मिक पसंद का संरक्षक और जवाबदही तय करने वाला बन जाए।
गत वर्ष सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व में भी इस बात पर चिंता व्यक्त की थी कि धर्म परिवर्तन से पहले अनिवार्य घोषणा, पुलिस जांच और व्यक्तिगत जानकारी को सार्वजनिक करने जैसी शर्तें किसी व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर अनावश्यक और असाधारण बोझ डालती हैं। मौलाना मदनी ने कहा कि विभिन्न राज्यों में धर्मांतरण-विरोधी कानूनों के अनुभव को देखते हुए अदालतों और लोकतांत्रिक संस्थाओं को केवल इन कानूनों में बताए गए उद्देश्यों पर ही नहीं, बल्कि उनके कानूनी ढांचे, उनके पीछे छिपे बहुसंख्यकवादी सोच से प्रेरित उद्देश्यों और उनके दुरुपयोग पर भी विचार करना चाहिए।
पिछले साल, सर्वोच्च न्यायालय ने पहले ही चिंता व्यक्त की थी कि धर्मांतरण से पहले अनिवार्य घोषणा, पुलिस जांच और व्यक्तिगत जानकारी का खुलासा जैसी शर्तें किसी व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर अनावश्यक और अनुचित बोझ डालती हैं। मौलाना मदानी ने कहा कि विभिन्न राज्यों में धर्मांतरण विरोधी कानूनों के अनुभव को देखते हुए, अदालतों और लोकतांत्रिक संस्थानों को न केवल इन कानूनों के घोषित उद्देश्यों की जांच करनी चाहिए, बल्कि उनकी कानूनी संरचना, उनके पीछे के बहुसंख्यकवादी उद्देश्यों और हो रहे दुरुपयोग की भी जांच करनी चाहिए।
मौलाना मदनी ने स्पष्ट किया कि जमीअत उलमा-ए-हिंद किसी भी ऐसी वास्तविक कोशिश के विरोध में नहीं है जिसका उद्देश्य जबरदस्ती, धोखाधड़ी या बलपूर्वक धर्म परिवर्तन को रोकना हो। लेकिन धार्मिक स्वतंत्रता की रक्षा के नाम पर बनाया गया कोई कानून स्वयं उसी स्वतंत्रता को सीमित करने का माध्यम नहीं बन सकता और न ही इसे किसी विशेष समुदाय के खिलाफ दंड का हथियार बनाया जा सकता है।

Jamiat Ulama-i-Hind - A Century of Faith, Service & Nation Building  🇮🇳 स्वतंत्रता दिवस की 80वीं वर्षगांठ की हार्दिक शुभ...
14/08/2026

Jamiat Ulama-i-Hind - A Century of Faith, Service & Nation Building
🇮🇳 स्वतंत्रता दिवस की 80वीं वर्षगांठ की हार्दिक शुभकामनाएँ! 🇮🇳

*जमीयत उलमा-ए-हिंद: संक्षिप्त परिचय और इतिहास* 🇮🇳🇮🇳♥️
14/08/2026

*जमीयत उलमा-ए-हिंद: संक्षिप्त परिचय और इतिहास*
🇮🇳🇮🇳♥️

 #इजरायल को  #हथियारों की आपूर्ति मानवता और भारतीय मूल्यों पर कलंक: मौलाना महमूद मदनीनई दिल्ली, 2 अगस्त: भारत से इजरायल ...
02/08/2026

#इजरायल को #हथियारों की आपूर्ति मानवता और भारतीय मूल्यों पर कलंक: मौलाना महमूद मदनी

नई दिल्ली, 2 अगस्त: भारत से इजरायल को हथियारों की कथित आपूर्ति को लेकर जमीयत उलेमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना महमूद असद मदनी ने कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। एमनेस्टी इंटरनेशनल की उस हालिया रिपोर्ट पर गहरा दुख और आक्रोश जताते हुए उन्होंने इसे 'मानवता और भारतीयता के दामन पर दाग' करार दिया है, जिसमें दावा किया गया है कि अक्तूबर 2023 से नवंबर 2025 के बीच भारत से लाखों सैन्य हथियार और तोप के गोले इजरायल भेजे गए हैं।
इस बेहद संवेदनशील मामले पर विदेश मंत्रालय की प्रतिक्रिया को अस्पष्ट बताते हुए मौलाना मदनी ने कहा कि सरकार का यह टालमटोल वाला रवैया देश की नैतिक बुनियाद और वैश्विक साख के लिए बेहद नुकसानदेह है।
मीडिया को जारी अपने आधिकारिक बयान में जमीयत प्रमुख ने अंतरराष्ट्रीय न्यायालय (ICJ) के 2024 के उस निर्देश का हवाला दिया, जिसमें इजरायल के अवैध कब्जे और नरसंहार को देखते हुए सभी देशों को हथियारों की आपूर्ति रोकने की चेतावनी दी गई थी। उन्होंने स्पष्ट किया कि 1949 के जिनेवा कन्वेंशन और 1948 के नरसंहार रोकथाम समझौते के तहत भी युद्ध अपराधों में इस्तेमाल होने वाले हथियारों की आपूर्ति पर पूर्ण रूप से पाबंदी है।
मौलाना मदनी ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा, "यह जानते हुए भी कि इन हथियारों का इस्तेमाल मासूम बच्चों, महिलाओं और आम नागरिकों के अंधाधुंध कत्लेआम में हो रहा है, हथियारों की सप्लाई करना एक आपराधिक कृत्य है जो नरसंहार (Genocide) में हिस्सेदारी के समान है। यह केवल अंतरराष्ट्रीय कानूनों का खुला उल्लंघन नहीं है, बल्कि इंसानियत और भारतीय मूल्यों के साथ भी बहुत बड़ा धोखा है।"
भारत की ऐतिहासिक विदेश नीति का जिक्र करते हुए उन्होंने याद दिलाया कि महात्मा गांधी के दौर से ही भारत का स्वर्णिम इतिहास हमेशा पीड़ित फिलिस्तीनी अवाम के साथ खड़े रहने का रहा है। उन्होंने आरोप लगाया कि मौजूदा सरकार ने तटस्थता (Neutrality) का हवाला देकर इस नीति को बदल दिया है। उन्होंने कहा, "अगर इस तटस्थता को मान भी लिया जाए, तो एक तरफ गुटनिरपेक्ष होने का दावा करना और दूसरी तरफ हमलावर को हथियार देना हमारे राष्ट्रीय सिद्धांतों और ऐतिहासिक वादों के साथ बहुत बड़ा विश्वासघात है। देश का कोई भी जमीर वाला नागरिक इसे बर्दाश्त नहीं कर सकता।"
जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने भारत सरकार से पुरजोर मांग की है कि वह सरकारी और निजी दोनों रक्षा कंपनियों द्वारा इजरायल को की जाने वाली हथियारों और सैन्य उपकरणों की आपूर्ति पर तुरंत रोक लगाए। संगठन ने यह भी मांग की कि सरकार अपनी पारदर्शी तरीके से सच्चाई सामने लाए और मानवता की खातिर इजरायल के साथ अपने सभी सैन्य संबंध खत्म करे।
बयान के अंत में कहा गया, "भारत की वैश्विक प्रतिष्ठा उसकी नैतिक ताकत और सच्चाई के साथ खड़े होने की हिम्मत पर टिकी है। देश की नैतिक साख को बचाने के लिए इजरायल से सैन्य संबंध तोड़ना नितांत आवश्यक है।"
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मोहम्मद अज़ीमुल्लाह सिद्दीकी

सचिव, जमीयत उलेमा-ए-हिंद

 ाढ़_पीड़ितों की दिल खोलकर सहायता करेंअसम इस समय भीषण बाढ़ की त्रासदी से जूझ रहा है। लोगों पर मानो कहर टूट पड़ा है। हजार...
31/07/2026

ाढ़_पीड़ितों की दिल खोलकर सहायता करें
असम इस समय भीषण बाढ़ की त्रासदी से जूझ रहा है। लोगों पर मानो कहर टूट पड़ा है। हजारों परिवार बेघर हो चुके हैं, सैकड़ों गाँव जलमग्न हैं और अनेक लोग अब भी लापता हैं—यह तक पता नहीं कि वे जीवित हैं या नहीं। लाखों लोग भोजन, स्वच्छ पेयजल, आश्रय तथा अन्य बुनियादी आवश्यकताओं से वंचित होकर खुले आसमान के नीचे जीवन बिताने को मजबूर हैं।

इस्लाम ने मुसीबत में घिरे इंसानों की सहायता को महान इबादत बताया है।
ऐसे कठिन समय में जमीयत उलेमा असम की इकाइयाँ, प्रभावित क्षेत्रों में युद्धस्तर पर राहत कार्यों में जुटी हुई हैं। राहत टीमें हजारों बाढ़ पीड़ित परिवारों तक राशन, स्वच्छ पेयजल, तिरपाल, कंबल तथा अन्य आवश्यक राहत सामग्री पहुँचा रही हैं।
हम सभी अहल-ए-ख़ैर और सक्षम लोगों से दिली अपील करते हैं कि इस नाज़ुक घड़ी में उदारतापूर्वक सहयोग करें। आपका सहयोग किसी भूखे को भोजन, किसी बेघर परिवार को सहारा और किसी निराश व्यक्ति के लिए नई उम्मीद बन सकता है।

महमूद असद मदनी
अध्यक्ष, जमीयत उलेमा-ए-हिन्द

मोहम्मद हकीमुद्दीन क़ासमी
महासचिव, जमीयत उलेमा-ए-हिन्द

 #वक्फ की हिफाज़त साझा ज़िम्मेदारी: मौलाना  #महमूद मदनीऑल इंडिया  #मुतवल्लियान कॉन्फ्रेंस में वक्फ के खिलाफ  #साज़िशों क...
24/07/2026

#वक्फ की हिफाज़त साझा ज़िम्मेदारी: मौलाना #महमूद मदनी
ऑल इंडिया #मुतवल्लियान कॉन्फ्रेंस में वक्फ के खिलाफ #साज़िशों को नाकाम बनाने के लिए पारदर्शी प्रबंधन और कानूनी तैयारी पर ज़ोर
नई दिल्ली, 24 जुलाई: वक्फ (संशोधन) अधिनियम, 2025 के खिलाफ जारी सामाजिक और कानूनी संघर्ष के बीच आज जमीयत उलेमा-ए-हिंद के तत्वावधान में ऐवान-ए-ग़ालिब, नई दिल्ली में ऑल इंडिया मुतवल्लियान कॉन्फ्रेंस आयोजित की गई। सम्मेलन की अध्यक्षता सैयद शाह हाफ़िज़ मोहम्मद अली अल-हुसैनी, सज्जादानशीन दरगाह हज़रत ख़्वाजा बंदा नवाज़ गेसूदराज (रह.), गुलबर्गा शरीफ ने की। स्वागत भाषण जमीयत उलेमा-ए-हिंद के महासचिव मौलाना मोहम्मद हकीमुद्दीन क़ासमी ने दिया, जबकि संचालन मौलाना मुफ़्ती हस्सान क़ासमी ने किया।
सम्मेलन को संबोधित करते हुए जमीयत उलेमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना महमूद मदनी ने कहा कि वक्फ केवल संपत्ति नहीं, बल्कि अल्लाह की अमानत और इस्लामी सभ्यता का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है। इसलिए इसकी सुरक्षा, अभिलेखों का संरक्षण और आवश्यकता पड़ने पर कानूनी लड़ाई लड़ना भी इबादत का हिस्सा है।
उन्होंने कहा कि वक्फ की सुरक्षा केवल मुतवल्लियों का मामला नहीं, बल्कि पूरी उम्मत की सामूहिक ज़िम्मेदारी है। उन्होंने कहा, "जिस क़ौम ने अपनी अमानतों की हिफाज़त छोड़ दी, इतिहास ने भी उसकी हिफाज़त छोड़ दी।"
मौलाना मदनी ने कहा कि वक्फ संस्थानों को जिन चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है, उनमें बाहरी ख़तरों के साथ-साथ हमारी अपनी लापरवाही, कमजोर प्रशासन और दस्तावेज़ों की उपेक्षा भी शामिल है। वक्फ (संशोधन) अधिनियम, 2025 का उल्लेख करते हुए उन्होंने सरकार से अपील की कि हर परिस्थिति में न्याय और संवैधानिक मूल्यों को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाए।उन्होंने कहा, "न्याय किसी एक समुदाय पर किया जाने वाला एहसान नहीं है, बल्कि राज्य की सबसे बड़ी शक्ति है। कानून का सम्मान तभी कायम रहता है, जब वह सभी नागरिकों पर समान रूप से लागू हो।"

मौलाना मदनी ने मुतवल्लियों से अपील की कि वे वक्फ संपत्तियों का पूरा रिकॉर्ड सुरक्षित रखें, उसे डिजिटल स्वरूप में तैयार करें, वित्तीय पारदर्शिता सुनिश्चित करें, नियमित ऑडिट कराएं तथा अवैध कब्जों के विरुद्ध प्रभावी कानूनी कार्रवाई करें। उन्होंने वंशानुगत प्रबंधन की उस प्रवृत्ति से बचने की भी सलाह दी जो संस्थाओं की विश्वसनीयता और मूल भावना को प्रभावित करती है।
उन्होंने कहा कि वर्तमान परिस्थितियों में वक्फ की सुरक्षा के लिए आंशिक नहीं बल्कि पूर्णकालिक प्रयासों की आवश्यकता है। "यदि हम ईमानदारी, योजनाबद्ध ढंग और निरंतर परिश्रम के साथ काम करें, योग्य लोगों को तैयार करें और पूरी उम्मत को इस मिशन से जोड़ें, तो अल्लाह हमारी कोशिशों को स्वीकार करेगा और वक्फ के खिलाफ होने वाली हर साज़िश को नाकाम बनाएगा।"
पटना उच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति इक़बाल अंसारी ने कहा कि जहां मुतवल्ली मौजूद हैं, वहीं वक्फ संपत्तियों के पंजीकरण और कानूनी मामलों में सबसे अधिक कठिनाइयाँ सामने आती हैं। इसलिए मुतवल्लियों को अपनी ज़िम्मेदारियों का विशेष रूप से एहसास होना चाहिए। उन्होंने कहा कि सरकार और जनता के बीच उत्पन्न विवादों का निर्णय अदालतों को संविधान की सीमाओं के भीतर रहकर करना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि वर्तमान समय में यह कहना कठिन होता जा रहा है कि न्यायालय पूरी तरह न्यायोचित ढंग से कार्य कर रहे हैं।
मरकज़ी जमीयत अहले हदीस हिंद के अमीर मौलाना असगर अली इमाम महदी सलफ़ी ने कहा कि वक्फ की जिम्मेदारी केवल मुतवल्लियों या सरकार पर नहीं डाली जा सकती, बल्कि पूरी उम्मत और समाज को इसमें अपनी भूमिका निभानी होगी।
जमाअत-ए-इस्लामी हिंद के उपाध्यक्ष मलिक मोतासिम ख़ाँ ने कहा कि वक्फ संस्थाओं को अधिक प्रभावी और जनहितकारी बनाना समय की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि वक्फ संपत्तियों पर अवैध कब्ज़ों और विवादों का एक बड़ा कारण कुछ मुतवल्लियों की लापरवाही तथा वक्फ संपत्तियों को निजी संपत्ति समझने की प्रवृत्ति है, जिससे वक्फ को गंभीर नुकसान पहुँचा है।
अपने अध्यक्षीय भाषण में सैयद शाह मोहम्मद अली अल-हुसैनी ने कहा कि पिछले दो वर्षों में वक्फ संरक्षण आंदोलनों के कारण समाज में वक्फ के प्रति उल्लेखनीय जागरूकता आई है, जिसे और अधिक संगठित करने की आवश्यकता है। उन्होंने वक्फ संपत्तियों की सुरक्षा, अवैध कब्ज़ों के विरुद्ध समयबद्ध कानूनी कार्रवाई तथा वक्फ कानूनों की व्यापक जानकारी को समय की आवश्यकता बताया। उन्होंने संपन्न लोगों से नए वक्फ स्थापित करने की अपील करते हुए कहा कि शिक्षा, स्वास्थ्य और जनकल्याण के क्षेत्रों में वक्फ की भूमिका को और मजबूत बनाया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि मुतवल्ली की पहली जिम्मेदारी वाकिफ़ (दानकर्ता) की मंशा का पूरी निष्ठा से पालन करना है।
शाह सैयद यादुल्लाह हुसैनी, उप सज्जादानशीन, रौज़ा ख़ुर्द, गुलबर्गा शरीफ ने वक्फ की सुरक्षा के लिए एक प्रभावी समिति गठित करने का सुझाव दिया, जो वक्फ संपत्तियों की निगरानी, सुरक्षा और कानूनी संरक्षण के लिए ठोस कार्ययोजना तैयार करे।
साउथ एशियन माइनॉरिटीज़ लॉयर्स एसोसिएशन (SAMLA) के अध्यक्ष एडवोकेट नासिर अज़ीज़ ने प्रत्येक क्षेत्र में वक्फ संरक्षण समितियाँ और कानूनी प्रकोष्ठ स्थापित करने, अवैध कब्ज़ों के विरुद्ध त्वरित कानूनी कार्रवाई तथा मुतवल्लियों द्वारा पारदर्शी प्रशासनिक एवं वित्तीय व्यवस्था अपनाने पर बल दिया। उन्होंने कहा कि वक्फ की सुरक्षा पूरी उम्मत की सामूहिक जिम्मेदारी है और इसके लिए जनजागरण, युवाओं की भागीदारी तथा वक्फ की आय का उसके मूल धार्मिक, शैक्षणिक और सामाजिक उद्देश्यों के लिए उपयोग सुनिश्चित किया जाना चाहिए।
सांसद हरेंद्र मलिक ने कुछ स्थानों पर वक्फ संपत्तियों में कुप्रबंधन और अपारदर्शिता पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि वक्फ की आय का उपयोग गरीबों और जरूरतमंदों के कल्याण के लिए होना चाहिए। उन्होंने वक्फ संरक्षण के इस अभियान में हरसंभव सहयोग का आश्वासन दिया।
सांसद मौलाना मोहिबुल्लाह नदवी ने जमीयत उलेमा-ए-हिंद की सेवाओं की सराहना करते हुए वक्फ संरक्षण के लिए संगठित और साझा प्रयासों की आवश्यकता पर बल दिया।
सांसद इमरान मसूद ने वक्फ के संबंध में सरकार की नीतियों की आलोचना करते हुए कहा कि धार्मिक संपत्तियों की सुरक्षा का प्रश्न केवल मुसलमानों तक सीमित नहीं है। उन्होंने कहा कि देश के अन्य धार्मिक स्थलों को भी विभिन्न प्रकार के विवादों का सामना करना पड़ रहा है, इसलिए सभी धार्मिक संस्थाओं और उनकी संपत्तियों की सुरक्षा के लिए हिंदुओं और मुसलमानों को मिलकर संघर्ष करना होगा।
अब्दुल वाहिद हुसैन अंगारा (दरगाह अजमेर शरीफ) ने कहा कि केवल कानूनों पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं है, बल्कि जनजागरूकता, विश्वास और सामूहिक सहयोग ही वक्फ की प्रभावी सुरक्षा की वास्तविक गारंटी हैं।
मौलाना सिद्दीक़ुल्लाह चौधरी, अध्यक्ष, जमीयत उलेमा पश्चिम बंगाल ने देश को पाँच प्रशासनिक क्षेत्रों में विभाजित कर वक्फ प्रबंधन को अधिक प्रभावी बनाने का सुझाव दिया।
इसके अतिरिक्त आईआरएस अकरमुल जब्बार ख़ाँ, एडवोकेट हाजी मोहम्मद हारून (अध्यक्ष, जमीयत उलेमा मध्य प्रदेश), एडवोकेट इक़बाल शेख (पूर्व सदस्य, केंद्रीय वक्फ परिषद), आईआरएस सैयद महमूद अख्तर, एडवोकेट ताहिर मोहम्मद हकीम, सांसद अब्दुल वहाब (केरल) तथा पूर्व सांसद हारिस बीरन ने भी अपने विचार व्यक्त किए।
सम्मेलन में नवाब अहमद हमीद (बागपत), एडवोकेट फिरोज़ ग़ाज़ी (महासचिव, SAMLA), मरज़िया ख़ाँ (मुंबई), प्रो. निसार अहमद अंसारी (महासचिव, जमीयत उलेमा गुजरात), मौलाना याह्या करीमी (महासचिव, जमीयत उलेमा हरियाणा, हिमाचल प्रदेश एवं पंजाब), मास्टर मोहम्मद क़ासिम महू, मौलाना मोहम्मद क़ासिम नूरी (अध्यक्ष, जमीयत उलेमा दिल्ली), मौलाना आफ़ताब आलम सिद्दीकी, मौलाना क़ारी अब्दुल समीअ, ओवैस सुल्तान ख़ाँ सहित जमीयत उलेमा-ए-हिंद, जमीयत उलेमा दिल्ली, हरियाणा, मेवात और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के बड़ी संख्या में पदाधिकारी तथा देशभर से आए 500 से अधिक मुतवल्ली उपस्थित रहे। इस अवसर पर विशिष्ट अतिथियों का शॉल ओढ़ाकर सम्मान भी किया गया।

23/07/2026
*राजस्थान के सीमावर्ती जिलों में बुलडोज़र कार्रवाई पर सुप्रीम कोर्ट की अंतरिम रोक**जोधपुर हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच में जा...
17/07/2026

*राजस्थान के सीमावर्ती जिलों में बुलडोज़र कार्रवाई पर सुप्रीम कोर्ट की अंतरिम रोक*
*जोधपुर हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच में जाने का निर्देश; संवैधानिक अधिकारों की रक्षा की लड़ाई जारी रहेगी: मौलाना महमूद मदनी*

नई दिल्ली, 17 जुलाई 2026: राजस्थान के सीमावर्ती जिलों में मस्जिदों, मदरसों, दरगाहों, मकानों तथा अन्य निर्माणों के विरुद्ध जारी ध्वस्तीकरण (बुलडोज़र) कार्रवाई के मामले में आज सुप्रीम कोर्ट ने जमीयत उलेमा-ए-हिंद की ओर से दायर विशेष याचिका पर सुनवाई करते हुए प्रभावित लोगों को महत्वपूर्ण अंतरिम राहत प्रदान की है। न्यायालय ने संबंधित संपत्तियों के विरुद्ध दो सप्ताह तक सभी ध्वस्तीकरण कार्रवाइयों पर रोक लगाते हुए निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता अपने संवैधानिक एवं कानूनी तर्कों के साथ राजस्थान हाईकोर्ट, जोधपुर की डिवीजन बेंच का रुख करें।
जमीयत उलेमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना महमूद असद मदनी के निर्देश पर लगभग 40 प्रभावित व्यक्तियों की ओर से दायर इस याचिका की सुनवाई के दौरान जमीयत की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने विस्तृत एवं प्रभावशाली दलीलें पेश कीं। उनके साथ वरिष्ठ अधिवक्ता हुज़ैफ़ा अहमदी, निज़ाम पाशा, ताहिर हकीम तथा एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड मंसूर अली खान ने भी पैरवी की। मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति पी.एस. नरसिम्हा और न्यायमूर्ति आलोक अराधे की पीठ ने की।
गौरतलब है कि 20 जून 2026 को जमीयत उलेमा-ए-हिंद का एक उच्चस्तरीय प्रतिनिधिमंडल राजस्थान के प्रभावित सीमावर्ती जिलों में पहुँचा था। प्रतिनिधिमंडल ने मौके पर जाकर स्थिति का जायज़ा लिया, प्रभावित परिवारों से मुलाकात की तथा ध्वस्तीकरण की कार्रवाई से संबंधित तथ्यों और दस्तावेज़ों का संकलन किया। इसी रिपोर्ट के आधार पर प्रभावित लोगों की ओर से लगभग 40 याचिकाएँ राजस्थान हाईकोर्ट, जोधपुर में दायर की गईं, जबकि अन्य प्रभावित व्यक्तियों ने भी अलग-अलग याचिकाएँ दाखिल कीं। इस प्रकार कुल मिलाकर लगभग 60 मामले हाईकोर्ट के समक्ष पहुँचे। 7 जुलाई को बहस पूरी होने के बाद हाईकोर्ट ने 13 जुलाई को अपना निर्णय सुनाया। अपेक्षित राहत न मिलने पर जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने तत्काल सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया।
इस पूरी अवधि में जमीयत उलेमा-ए-हिंद के महासचिव मौलाना मोहम्मद हकीमुद्दीन क़ासमी, उपाध्यक्ष मौलाना कारी मोहम्मद अमीन, जमीयत उलेमा राजस्थान के अध्यक्ष मौलाना हबीबुल्लाह क़ासमी, महासचिव मौलाना अब्दुल वाहिद खत्री सहित अन्य पदाधिकारी लगातार प्रभावित परिवारों और अधिवक्ताओं के संपर्क में रहे। एडवोकेट ताहिर हकीम ने राजस्थान हाईकोर्ट में भी जमीयत की ओर से प्रभावी पैरवी की।
आज सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने अदालत को बताया कि मकानों, मस्जिदों, मदरसों और अन्य संपत्तियों के विरुद्ध लगातार ध्वस्तीकरण की कार्रवाई की जा रही है तथा सैकड़ों धार्मिक एवं आवासीय संपत्तियों को नोटिस जारी किए गए हैं। उन्होंने कहा कि किसी भी धार्मिक स्थल या नागरिक की संपत्ति के विरुद्ध कार्रवाई केवल संविधान, कानून और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के अनुरूप ही की जा सकती है, न कि प्रशासनिक अधिकारों के एकतरफा प्रयोग के आधार पर। उन्होंने यह भी कहा कि यदि तत्काल अंतरिम संरक्षण नहीं दिया गया तो अपूरणीय क्षति होगी।
इस बीच जमीयत उलेमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना महमूद मदनी ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देशानुसार अब तत्काल राजस्थान हाईकोर्ट, जोधपुर की डिवीजन बेंच में याचिका दायर की जाएगी। उन्होंने कहा कि जमीयत उलेमा-ए-हिंद प्रभावित नागरिकों, मस्जिदों, मदरसों तथा अन्य धार्मिक स्थलों के संवैधानिक और कानूनी अधिकारों की रक्षा के लिए हर कानूनी मंच पर पूरी मजबूती के साथ संघर्ष जारी रखेगी। हमें पूरा विश्वास है कि अंततः संविधान और कानून का शासन ही विजयी होगा।
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भवदीय

अज़ीमुल्लाह सिद्दीकी
सचिव, जमीअत उलमा-ए-हिंद

*راجستھان کے سرحدی اضلاع میںبلڈوزر ایکشن پر سپریم کورٹ کی عبوری روک**جودھپور ہائی کورٹ کی ڈویژن بنچ سے رجوع کرنے کی ہدای...
17/07/2026

*راجستھان کے سرحدی اضلاع میںبلڈوزر ایکشن پر سپریم کورٹ کی عبوری روک*

*جودھپور ہائی کورٹ کی ڈویژن بنچ سے رجوع کرنے کی ہدایت ۔ آئینی حقوق کے تحفظ کی جدوجہد جاری رہےگی: صدر جمعیۃ علماءہند مولانا محمود اسعد مدنی*

نئی دہلی، 17 جولائی 2026: راجستھان کے سرحدی اضلاع میں مساجد، مدارس، درگاہوں، مکانات اور دیگر تعمیرات کے خلاف جاری انہدامی کارروائیوں کے معاملے میں سپریم کورٹ آف انڈیا نے آج جمعیۃ علماء ہند کی جانب سے دائر خصوصی عرضی پر سماعت کرتے ہوئے متاثرہ افراد کو اہم عبوری راحت فراہم کی ہے۔ عدالت نے متعلقہ املاک کے خلاف دو ہفتوں تک تمام انہدامی کارروائیوں پر روک عائد کرتے ہوئے ہدایت دی کہ درخواست گزار اپنے قانونی اور آئینی نکات کے ساتھ راجستھان ہائی کورٹ، جودھپور کی ڈویژن بنچ سے رجوع کریں۔
صدر جمعیۃ علماء ہند حضرت مولانا محمود اسعد مدنی کی ہدایت پر 40 متاثرین کی جانب سے دائر اس عرضی کی سماعت کے دوران جمعیۃ کی طرف سے سینئر ایڈوکیٹ کپل سبل نے تفصیلی اور مؤثر دلائل پیش کیے، جبکہ سینئر وکلاء حذیفہ احمدی، نظام پاشا، طاہر حکیم اور ایڈوکیٹ آن ریکارڈ منصور علی خاں نے بھی مقدمے کی پیروی کی۔اس کی سماعت جسٹس پی ایس نرسمبھا اور جسٹس الو ک ارادھے کی بنچ کے سامنے ہوئی۔
واضح رہے کہ 20 جون 2026کوجمعیۃ علماء ہند کا ایک اعلیٰ سطحی وفد راجستھان کے متاثرہ سرحدی اضلاع پہنچاتھا جس نے زمینی صورتحال کا جائزہ لیا، متاثرہ خاندانوں سے ملاقات کی اور انہدامی کارروائیوں کی تفصیلات جمع کیں۔ وفد کی رپورٹ کی بنیاد پر متاثرین کی جانب سے تقریباً 40 عرضیاں راجستھان ہائی کورٹ، جودھپور میں دائر کی گئیں ، جب کہ دیگر متاثرین نے بھی انفرادی طور پر عدالت سے رجوع کیاجس کے نتیجے میں مجموعی طور پر تقریباً 60 مقدمات عدالت کے سامنے آئے۔7 جولائی کو دلائل مکمل ہونے کے بعد راجستھان ہائی کورٹ نے 13 جولائی کو اپنا فیصلہ سنایا، تاہم مطلوبہ قانونی راحت نہ ملنے پر جمعیۃ علماء ہند نے فوری طور پر سپریم کورٹ سے رجوع کیا۔ اس درمیان جمعیۃ علما ء ہند کے جنرل سکریٹری مولانا محمد حکیم الدین قاسمی ، نائب صدر جمعیۃ علماء ہند مولانا قاری محمد امین ، صدر جمعیۃ علماء راجستھان مولانا حبیب اللہ قاسمی ، ناظم اعلی ٰمولانا عبد الواحد کھتری وغیرہ لگاتا ر متاثرین اور وکلاء سےر ابطے میں رہے ۔ ایڈوکیٹ طاہر حکیم نے ہائی کورٹ میں بھی جمعیۃ علماء ہند کی نمائندگی کی ۔

آج سماعت کے دوران سینئر ایڈوکیٹ کپل سبل نے عدالت کو بتایا کہ مکانات، مساجد، مدارس اور دیگر املاک کے خلاف مسلسل انہدامی کارروائیاں جاری ہیں، جبکہ سیکڑوں مذہبی و رہائشی املاک کو نوٹس جاری کیے گئے ہیں۔ کسی بھی مذہبی مقام یا شہری کی ملکیت کے خلاف کارروائی صرف آئین، قانون اور فطری انصاف کے اصولوں کے مطابق ہی کی جا سکتی ہے، نہ کہ انتظامی اختیارات کے یکطرفہ استعمال کے ذریعے۔ اس لیے اگر فوری عبوری تحفظ نہ دیا گیا تو ناقابلِ تلافی نقصان ہوگا۔ دلائل سننے کے بعد سپریم کورٹ نے دو ہفتوں تک انہدامی کارروائی پر عبوری روک لگاتے ہوئے واضح کیا کہ اس نوعیت کے معاملات میں متنازع حقائق کا تفصیلی جائزہ متعلقہ ہائی کورٹ ہی لے سکتی ہے۔ اسی لیے عدالت نے عرضی گزاروں کو راجستھان ہائی کورٹ، جودھپور کی ڈویژن بنچ سے رجوع کرنے کی ہدایت دی ۔

عدالت آج ایک بار پھر اپنے 13 نومبر 2024 کے تاریخی فیصلے میں طے کردہ اصولوں کا بھی حوالہ دیا اور واضح کیا کہ کسی بھی انہدامی کارروائی میں قانونی طریقۂ کار، قدرتی انصاف اور آئینی ضمانتوں کی مکمل پابندی ضروری ہے۔ عدالت نے یہ بھی کہا کہ جہاں عوامی اراضی پر غیر مجاز تجاوزات ثابت ہوں وہاں قانون کے مطابق کارروائی کی جا سکتی ہے، تاہم ہر مقدمہ اپنے حقائق کے مطابق پرکھا جائے گا اور سپریم کورٹ کے رہنما اصولوں کی روشنی میں متعلقہ ہائی کورٹ مناسب فیصلہ کرے گی۔
دریں اثنا جمعیۃ علماء ہند کے صدر مولانا محمود اسعد مدنی نے کہا کہ عدالت کی ہدایت کے مطابق راجستھان ہائی کورٹ، جودھپور کی ڈویژن بنچ سے فوری رجوع کریں گے۔ جمعیۃ علماء ہند متاثرہ شہریوں، مساجد، مدارس اور دیگر مذہبی مقامات کے آئینی و قانونی حقوق کے تحفظ کے لیے ہر قانونی فورم پر پوری قوت کے ساتھ مقدمہ لڑتی رہے گی۔ ہمیں یقین ہے کہ قانون اور انصاف کی بالادستی قائم ہوگی۔

محمد عظیم اللہ صدیقی
ناظم نشرو اشاعت جمعیۃ علماء ہند

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