ॐ नमः शिवाय Om namah shivay bank

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हर हर महादेव

मां वाराही का मंदिर जहां दिन भर भूत प्रेत और जिन्नात लगाते हैं हाज़िरी...ऊं नमः शिवाय जंप यज्ञ समिति के अत्यन्त समिप है ...
29/08/2024

मां वाराही का मंदिर जहां दिन भर भूत प्रेत और जिन्नात लगाते हैं हाज़िरी...
ऊं नमः शिवाय जंप यज्ञ समिति के अत्यन्त समिप है मां वाराही माता का मंदिर ऊं नमः शिवाय
अद्भुत शहर है काशी। यहां जो चाहो वो मिलता है। बस आपको समझना ये है कि आपको जो चाहिए वो मिलेगा कहां। मान, मर्यादा और रौब दाब वाली प्रतिष्ठा किसको नहीं चाहिए। सबके अंदर इसे पाने की जिजिविषा होती है। अगर आपके मन में भी इन सबको पाने की इच्छा बलवती है तो काशी आ जाइए। और लगाइए मां वाराही देवी के दरबार में हाजिरी और पाइए वो सब जिसे पाने की आस में आप अब तक यहां वहां भटकते रहे हैं। अगर आप तमाम तरह की मुसीबतों से जूझ रहे हैं, बीमारियों से ग्रस्त हैं और कोई रास्ता नहीं सूझ रहा है तो फिर मां वाराही देवी की चौखट पर माथा टेकिये और फिर देखिए अपनी जिंदगी में होने वाले चमत्कार। अगर आप किसी कम्पनी, शहर, सूबे या मुल्क के प्रशासनिक अफसर हैं तो फिर आपकी हाजिरी तो यहां लगनी ही चाहिए क्योंकि माता वाराही देवलोक की प्रशासनिक देवी हैं। माता के दरबार में आपकी हाजिरी सब कुछ आपके कंट्रोल में कर देंगी।
काशी में उनका मंदिर गंगा किनारे मान मंदिर घाट के पास डी 16/84 में स्थित है। कहते हैं कि मां वाराही इतनी उग्र हैं कि वो अपने दरबार में किसी दर्शनार्थी को बहुत देर तक टिकने नहीं देतीं। माता का ताप वहां किसी को रूकने की इजाजत नहीं देता। या यूं कहिए कि इस ताप की वजह से वहां कोई रूक नहीं पाता। मां वाराही का मंदिर हर रोज अल सुबह चार बजे खुलता है और सुबह ही साढे़ नौ बजे बंद हो जाता है। उसके बाद पूरे दिन उसका पट बंद रहता है। यहां आप विग्रह का सामने से दर्शन नहीं कर सकते। माता मंदिर के नीचे तलघर में बने गर्भगृह में विराजती हैं। वहां पुजारी के अलावा किसी और को जाने की अनुमति नहीं है। ऊपर बने एक मोखे से आप सिर्फ उनके चरण और एक तरफ के मुख का ही दर्शन कर सकते हैं। मां के उग्र रूप का दर्शन कर पाना किसी के लिए भी असंभव है। इसकी वजह उनके मुख से निकलने वाली तीव्र आभा है।
मां वाराही देवी मंदिर के महंत श्री कृष्णकांत दुबे बताते हैं कि माता का विग्रह अत्यंत प्राचीन और स्वयंभू है। मंदिर कब और कैसे बना या इसे किसने बनवाया इसका कोई लेखा जोखा नहीं है। कहते हैं कि माता सती का जब दांत काशी में गिरा तो उससे माता वाराही उत्पन्न हुईं। इसलिए इन्हें शक्तिपीठ की मान्यता भी है। दैवीय व्यवस्था में मां वाराही क्षेत्रपालिका के रूप काशी की रक्षा करती हैं। इस शहर को आफत बलाओं और पैशाचिक बाधाओं से बचाती हैं। कहते हैं कि जब मां दुर्गा का असुरों से युध्द चल रहा था तब मां वाराही ही उनकी सेनापति थीं।
एक कथा ये भी है कि जब देवाधिदेव महादेव काशीराज दिवोदास से इस नगरी को पाने के लिए तमाम कोशिशें कर रहे थे तब एक बार उन्होंने चौंसठ योगिनियों को भी काशी भेजा था लेकिन वो सबकी सब काशी के सौन्दर्य को देख इतनी सम्मोहित हुईं कि वो फिर यहीं की हो कर रह गयीं। कहते हैं कि मां वाराही भी उनमें से ही एक थीं। काशी खंड में इस कथा का उल्लेख है। बहरहाल मत्स्य पुराण में भी मां वाराही की दैवीय शक्ति का उल्लेख है। माघ मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को माता वाराही का विशेष श्रृंगार किया जाता है। उस दिन रात में एक बजे ही मंदिर का पट खुल जाता है। नवरात्र में भी सप्तमी के दिन भी इनके दर्शन की मान्यता है।
महंत दुबे जी बताते हैं कि माता वाराही से जो भी भक्त दिल से जुड़ेगा वो तमाम तरह की आध्याात्मिक शक्तियों और विद्याओं से हमेशा पूर्ण रहेगा। लेकिन मां से इन सबको पाने की एक शर्त है कि आप शिद्दत से मां को पुकारें और यहां नियमित रूप दर्शन के लिए आते रहें। उनका कहना है कि मां को एकाध दिन या कभी कभी आने वाले भक्त प्रिय नहीं हैं। वो अपने नेमी भक्तों को बहुत चाहती हैं। यदि कभी किसी नेमी ने दर्शन करना छोड़ दिया तो फिर मां उसे ऐसा खींचती हैं कि उसे सिर के बल चल कर यहां आना ही पड़ता है। इस संदर्भ में श्री दुबे जी ने हमें एक रहस्यमय कथा सुनायी। एक बार किसी एक भक्त ने यहां यह कह कर आना छोड़ दिया कि, जा मैय्या अब इहां ई जीवन में कभ्भो न आइब। मां का क्रोध जाग्रत हो गया। अचानक एक रात उस व्यक्ति के दोनों पैरों का पंजा पलट गया। उसे ख्वाब में मां का आदेश हुआ कि अब उल्टे पैर चल कर यहां आ। सुबह उसे अपनी गल्ती का अहसास हुआ। वो उल्टे पंजे से ही चल कर किसी तरह रेंगते हुए आने लगा और फिर छह महीने तक लगातार दर्शन करने और रो रो कर प्रायश्चित करने के बाद धीरे धीरे उसके पैर अपने आप सीधे हो गये।
कहते हैं कि ब्रह्म मुहूर्त में महंथ द्वारा पूजा अर्चना कर मंदिर का पट बंद कर दिये जाने के बाद इस मंदिर में तमाम ग्रह नक्षत्र मां की पूजा अर्चना के लिए यहां आते हैं। इसी तरह संध्याकाल में भूत, प्रेत, पिशाच, जिन्नात, यक्ष और यक्षिणी यहां हाजिरी लगाते हैं। उस वक्त अगर किसी ने मंदिर में गल्ती से भी प्रवेश कर लिया तो फिर वो यहां से जिंदा बच कर नहीं जा सकता। इस संदर्भ में महंत श्री कृष्णकांत दुबे बताते हैं कि एक बार उनका बेटा कैसे यहां आ कर फंस गया और फिर बाद में मां ने ही भूत, प्रेत, पिशाच, जिन्नात, यक्ष और यक्षिणियों से उसकी रक्षा की। उनका कहना था कि मंदिर में हाजिरी लगाने वाले तमाम भूत, प्रेत, पिशाच, जिन्नात, यक्ष और यक्षिणियों को अपनी पूजा अर्चना में खलल बर्दाश्त नहीं है। वो फिर उस बाधक शख्स को जान से मार देते हैं। वो यहां किसी और को नहीं जानते। वो सिर्फ मां वाराही के पुजारी और महंत को पहचानते हैं। इसके अलावा वो किसी भी दूसरे शख्स को भले ही वो महंत का पुत्र, पुत्री या पत्नी ही क्यों न हो उसे फिर नहीं बख्शते। लेकिन पिता के निधन के बाद जब यही पुत्र महंत की गद्दी पर बैठेगा और वो पूजा अर्चना के विधि विधान को पूरा करेगा तभी उसे वो सारे आध्यात्मिक अधिकार हासिल हो जाएंगे जो उसके पिता को प्राप्त था।
इस मंदिर में सुबह होने वाली आरती और पुष्पाजंलि एकदम सम्मोहित करने वाली होती है। मां की आरती अथर्ववेद में होती है। पुष्पाजंलि सामवेद और यजुर्वेद में होती है। मां की स्तुति राग भैरवी और सामवेद में गाकर की जाती है। मां की पूजा में पढ़े जाने वाले मंत्रों में चारों वेदों का समावेश है। एक तरह से यहां घनपाठ के जरिए ही पूजा अर्चना की जाती है। कहते हैं कि यहां के पुजारी न तो किसी से राग रागिनियां सीखते हैं और न ही उन्हें इसकी कोई शिक्षा दी जाती है लेकिन एक बार पूजा शुरू होने के बाद चमत्कारिक रूप से उनके कंठ से सारे श्लोक राग में ही उतरने लगते हैं।
महंत श्री दुबे बताते हैं कि वाराही देवी का दर्शन करने के लिए सूदूर दक्षिण भारत के तमाम प्रशासनिक अधिकारी यहां आते हैं। वो अपने ऑफिस का चार्ज लेने के पहले वहां से काशी आते हैं और माता वाराही के दरबार में हाजिरी लगाते हैं। वो कहते हैं कि पिछले दिनों टीवी पर धारावाहिक गणेश पुराण में माता वाराही के महात्म्य को दिखाये जाने के बाद से उत्तर भारत के अफसर भी हाजिरी देने लगे हैं।
वैसे वाराही माता भारत में पूजित अष्ट मातृका में से एक हैं। अष्ट मातृका आठ देवियों का एक मंडल है। इस सृष्टि में हर वस्तु, पदार्थ और जीव को क्रियाशील करने के लिए ऊर्जा की आवश्यकता होती है। सब जानते हैं कि ब्रह्माण्ड की धुरी बने शिव को भी क्रियाशील होने के लिए आदिशक्ति की आवश्यकता पड़ी थी। शिव की ऊर्जा आदिशक्ति ही हैं। इसी तरह मां वाराही भी भगवान विष्णु के वाराह अवतार की शक्ति हैं। वाराह अवतार को क्रियाशील करने वाली ऊर्जा या शक्ति मां वाराही ही हैं। वाराही माता की पूजा अर्चना सनातन धर्म के तीनों मतों के लोग करते हैं। इनकी पूजा मुख्यतः रात्रि में तान्त्रिक क्रियाओं के साथ की जाती है। बौद्ध धर्म में पूजित मरीची तथा वज्रवराही भी वस्तुतः माता वाराही ही हैं। वाराही देवी मां दुर्गा का तामसी और सात्विक गुणधारी रूप हैं। इनका शीश जंगली शूकर का है।
काशी में वाराही देवी का मंदिर कैंट रेलवे स्टेशन से करीब नौ किलोमीटर दूर मानमंदिर घाट के पास है। मंदिर के संकरी गली में और गंगा घाट के किनारे होने के कारण वहां गोदौलिया से पैदल ही जाना पड़ता है। ऊं नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय

देश ही नहीं, काशी में भी हैं  ्‍योतिर्लिंग कर लीजिए दर्शन🙏 इसके अलावा एक और काशी खंडोंकत लिंग है मीर घाट स्थित मनकामेश्व...
30/04/2024

देश ही नहीं, काशी में भी हैं ्‍योतिर्लिंग कर लीजिए दर्शन🙏 इसके अलावा एक और काशी खंडोंकत लिंग है मीर घाट स्थित मनकामेश्वर महादेव जिनके दर्शन से मन में रहने वाली सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं ऊं नमः शिवाय

उन 12 ज्‍योतिर्लिंग के बारे में बता रहा है, जो देश के अलग-अलग हिस्‍सों में नहीं, बल्कि काशी में ही स्‍थापित हैं । काशी भगवान महादेव की प्रिय नगरी है. बनारस में द्वादश ज्योतिर्लिंगों में प्रमुख श्री बाबा विश्वनाथ जी यहां विराजमान हैं. शिव के इस प्रिय शहर में आदि विशेश्वर के साथ ही 12 अन्य ज्योतिर्लिंग भी विराजमान हैं,
जिनके दर्शन के लिए भक्‍तों का तांता लगा रहता है. बहुत से भोले भक्त चाह कर भी बारहों ज्योतिर्लिंग के दर्शन नहीं कर पाते हैं। बारह ज्योतिर्लिंगों में छटवें विशेवश्वर हैं जो कि बाबा विश्वनाथ के नाम से विश्वनाथ गली में स्थित है। काशी के अलग- अलग क्षेत्रों में द्वादश ज्योतिर्लिंग विराजमान है जिसका दर्शन पूजन कर शिव भक्त अपना जीवन सार्थक और पुण्य अर्जित कर सकते हैं।

1- सोमनाथ , यह मन्दिर (मकान न., डी16/34 मान मन्दिर घाट पर स्थित है)
2- मल्लिकार्जुन, यह मन्दिर (मकान न., सी59/65 सिगरा पर स्थित है)
3- महाकालेश्वर - यह मन्दिर (मकान न., 52/3 दारानगर में स्थित है)
4- केदारेश्वर- यह मन्दिर (केदार घाट पर स्थित है)
5- भीमा शंकर- यह मन्दिर ( मकान न., सीके 32/12 नेपाली खपड़ा चौक पर स्थित है)
6- विशेश्वर- यह मन्दिर (रेड जोन विश्वनाथ गली में स्थित है)
7- त्रयम्बकेश्वर- यह मन्दिर (बांस फाटक (हौज कटोरा) स्थित है)
8- बैधनाथ धाम- यह मन्दिर ( मकान न., 37/1 बैजनत्था में स्थित है)
9- नागेश्वर- यह मन्दिर ( पठानी टोला में स्थित है)
10- रामेश्वरम्- यह मन्दिर (रामकुण्ड के तट पर स्थित है)
11- घुश्मेश्वर- यह मन्दिर (मकान न., बी31/126 कामख्या देवी मन्दिर में कमच्छा स्थित है)
12- ओमकारेश्वर - यह मन्दिर ( मकान न., सीके 1/21 पठानी टोला में स्थित है) ऊं नमः शिवाय ऊं नमः शिवाय ऊं नमः शिवाय ऊं नमः शिवाय ऊं नमः शिवाय

देवी की  पूजा में नैवेद्य विधान - ( कब कब क्या क्या अर्पण करें ) नारदजी बोले- हे तात ! किस प्रकारसे उपासना करनेपर वे देव...
25/04/2024

देवी की पूजा में नैवेद्य विधान -
( कब कब क्या क्या अर्पण करें )
नारदजी बोले- हे तात ! किस प्रकारसे उपासना करनेपर वे देवी परम पद प्रदान करती हैं?
उनकी आराधनाकी विधि क्या है?
कैसे, कब और किस स्तोत्रसे आराधना करनेपर वे भगवती दुर्गा कष्टप्रद नरकरूपी दुर्गसे उद्धार करके त्राणदायिनी होती हैं ? ॥ १-२ ॥

श्रीनारायण बोले- हे विद्वद्वर ! हे देवर्षे ! तुम धन्य हो जो पराशक्ति को प्रसन्न करने विषयक यथार्थ व सम्यक् ज्ञान का श्रवण करना चाहते हो।
जिस प्रकार धर्मपूर्वक आराधना करनेसे देवी स्वयं प्रसन्न हो जाती हैं, उसे अब आप एकाग्रचित्त होकर मुझसे सुनिये। हे नारद ! जैसा स्वधर्मका स्वरूप बताया गया है, उसे भी आप मुझसे सुनिये ॥ ३३ ॥

हे मुने ! इस अनादि संसारमें सम्यरूपसे पूजित होनेपर वे देवी घोर संकटोंमें स्वयं रक्षा करती हैं। वे भगवती जिस प्रकार लोकमें पूजी जाती हैं, वह विधि सुनिये ॥ ४-५ ॥
( प्रतिपदा से पूर्णिमा और अमावस्या तक तथा नक्षत्र आदि पर जो सेवा की जाना चाहिए वह अब तुम सुनों )
1. रोग नष्ट-
शुक्लपक्षकी प्रतिपदा तिथिमें घृतसे देवीकी पूजा करनी चाहिये और उस प्रसाद को जितेन्द्रिय व संध्यापूत
ब्राह्मण ( अथवा ऐसा न मिले तो धर्मात्मा ब्राह्मण या देवी के परम संयमी भक्त ) को घृतका दान करना चाहिये; ऐसा करनेवाला सदा निरोग रहता है ॥ ६ ॥
2. आयुवर्धन-
द्वितीया तिथिको शर्करासे जगदम्बाका पूजन करना चाहिये और वेदपाठी व धर्मपरायण विप्र को शर्कराका ही दान करना चाहिये; ऐसा करनेवाला मनुष्य दीर्घजीवी होता है ॥ ७ ॥
3. दुखों का नाश -
तृतीया तिथिको भगवतीके पूजनकर्ममें उन्हें दुग्ध अर्पण करना चाहिये और श्रेष्ठ ब्राह्मणको दुग्धका दान करना चाहिये; ऐसा करनेसे मनुष्य सभी प्रकारके दुःखोंसे मुक्त हो जाता है ॥ ८ ॥
4. विघ्न दूर -
चतुर्थीके दिन पूआ अर्पण करके देवीका पूजन करना चाहिये और ब्राह्मणको पूआ ही दान करना चाहिये; ऐसा करनेसे मनुष्य विघ्न-बाधाओंसे आक्रान्त नहीं होता ॥ ९
5. बुद्धिमान-
पंचमी तिथिको भगवतीका पूजन करके उन्हें केला अर्पण करे और ब्राह्मणको केलेका ही दान करे ऐसा करनेसे मनुष्य बुद्धिमान् होता है॥ १०॥

6. कान्ति-
षष्ठी तिथिको भगवतीके पूजनकर्ममें मधुको प्रधान बताया गया है। ब्राह्मणको मधु ही देना चाहिये; ऐसा करनेसे मनुष्य दिव्य कान्तिवाला हो जाता है ॥ ११ ॥
7. शोक नष्ट-
हे मुनिश्रेष्ठ ! सप्तमी तिथिको भगवतीको गुढ़‌का नैवेद्य अर्पण करके ब्राह्मणको गुड़का दान करनेसे मनुष्य सभी प्रकारके शोकोंसे मुक्त हो जाता है॥ १२॥
8. सन्ताप दूर -
अष्टमीको भगवती को नारियल का नैवेद्य ( नारिकेलमथाष्टम्यां देव्यै नैवेद्यम्- अर्पयेत्)
अर्पित करना चाहिये और ब्राह्मणको भी नारियलका दान करना चाहिये; ऐसा करनेवाला मनुष्य सभी सन्तापोंसे रहित हो जाता है ॥ १३ ॥
( ब्रह्म वैवर्त पुराण में अष्टमी को नारियल न खाने का विधान है पर यह प्रसाद रूप है और उसी पुराण में लिखा है कि प्रसाद में अन्न बुद्धि या दोष बुद्धि नहीं करना चाहिए अति विचार करो तो नारियल का बूरा अर्पण करें जिससे अष्टमी को नारियल की बलि का विचार नहीं पनपेगा)
9. सुख-
नवमीके दिन भगवती को लावा( लाजा) अर्पण करनेके बाद ब्राह्मणको भी लावाका दान करनेसे मनुष्य इस लोकमें तथा परलोकमें परम सुखी रहता है॥ १४॥
10. यम का भय खत्म -
नवदुर्गा पूर्ण होने पर दशमी को या किसी भी माह की अन्य दशमी तिथिको भगवतीको काले तिल अर्पित करने और ब्राह्मणको उसी तिलका दान करनेसे मनुष्यको यमलोकका भय नहीं रह जाता ॥ १५॥
( मनुष्य यदि हर दशमी को काले तिल का देवी को भोग लगाये तथा उसे धर्मपरायण विप्र को दे तो वह किसी भी परिस्थिति में नरक नहीं जा सकता)
11. प्रसन्नता के लिए-
जो मनुष्य एकादशी तिथिको भगवतीको दधि अर्पित करता है और वही दही ब्राह्मण को भी प्रदान करता है, वह देवीका परम प्रिय( पुत्र समान लाड-प्यार पाने का अधिकारी )हो जाता है ॥ १६ ॥
पूजन के पश्चात देवी को पुष्पों की सुगन्धित माला तदोपरान्त नमः पुष्करनेत्रायै का पाठ करने से वह ब्रह्मा , विष्णु रुद्र पद तक पा सकता है।
12. प्रसन्नता हेतु -
हे मुनिश्रेष्ठ !
जो द्वादशीके दिन भगवतीको चिउड़ेका भोग लगाकर आचार्यको भी चिउड़ेका दान करता है, वह भगवतीका प्रियपात्र बन जाता है॥ १७॥
13. प्रजा का प्रेम मिले व पुत्र लाभ -
जो त्रयोदशीको भगवतीको चना अर्पित करता है और ब्राह्मणको चनेका दान करता है, वह प्रजाओं तथा सन्तानोंसे सदा सम्पन्न रहता है ॥ १८ ॥
14.
हे देवर्षे ! जो मनुष्य चतुर्दशीके दिन भगवतीको सत्तू अर्पण करता है और ब्राह्मणको भी सत्तू प्रदान करता है, वह शिवा व शिव दोनों का परम प्रिय कार्तिकेय के समान हो जाता है ॥ १९ ॥
15.
जो पूर्णिमा (तथा अमावस्या) तिथिको भगवती शिवा दुर्गा और अपर्णा गौरी को खीरका भोग लगाता है और श्रेष्ठ ब्राह्मणको खीर प्रदान करता है, वह अपने सभी पितरोंका उद्धार कर देता है ॥ २० ॥
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हवन -
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हे महामुने। देवीकी प्रसन्नताके लिये उसी तिथिको हवन भी बताया गया है। जिस तिथिमें नैवेद्यके लिये जो वस्तु ऊपर बतायी गयी है, उसी वस्तुसे उन-उन तिथियोंमें हवन करनेसे सभी विपत्तियोंका नाश हो जाता है ॥ २१ ॥
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वार के अनुसार नैवेद्य-
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1. रविवार को खीर ( गौदुग्ध पायस ) का नैवेद्य अर्पण करना चाहिये।
2.सोमवार को गौ दूध
3. मंगलवारको केले का भोग लगाना बताया गया है ॥
( हर मंगलवार को केले का नियम ग्रहणकर मनुष्य शोक से मुक्त हो जाता है अतः अक्षयरुद्र तो यह कहता है कि देवी मंगल चण्डिका रूपी दुर्गा को हर मंगलवार को लाल रंग की मिठाई और केला अर्पण करके नमः पुष्करनेत्रायै का एक पाठ तदोपरान्त
मंगलचण्डिका जी के 21 पाठ करे तो वह परम सौभाग्य प्राप्त कर लेता है ।
4.
बुधको ताजा मक्खन भोगके लिये कहा गया है।
5. गुरुवारको रक्त शर्करा,
6.शुक्रवारको श्वेत शर्करा
और
7. शनिवारको गाय का घृत नैवेद्यके रूपमें बताया गया है ( हर शनिवार को देवी के निमित्त गाय के गोबर के कंडे पर गोघृत से होम का नियम बनाने वाला शनि को भी अनुकूल कर लेता है अथवा कंडे की समस्या हो तो मात्र घी को अर्पण कर सकते हैं )॥ २३३ ॥
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नक्षत्र पर पूजा
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हे मुने ! अब सत्ताईस नक्षत्रोंमें दिये जानेवाले नैवेद्यके विषयमें सुनिये। अश्विनी भरणी से लेकर रेवती तक सुनें ।

1. घी ( अश्विनी नक्षत्र पर नैवेद्य)
2.तिल ( भरणी नक्षत्र पर नैवेद्य)
3.शकर ( कृतिका)
4. दही ( रोहिणी)
5. दूध ( मृगशिरा नक्षत्र पर देवी को गाय का दूध ; पर एक बात सुनें इस अक्षयरुद्र की वह यह कि एक दिन पहले ही गोप या ग्वाले या दूध दोहन करने वाले को कह दें कि कल मृगशिरा नक्षत्र है अतः नहाकर ही मेरे लिए 500 ग्राम या 250ग्राम गाय का दूध दोह कर लाने की कृपा करे और वह दूध रजोवति नारी न निकाले )
6. मलाई ( आर्द्रा नक्षत्र पर दूध की मलाई )
7.लस्सी ( पुनर्वसु पर)
8.लड्डू ( पुष्य नक्षत्र पर परंतु घर पर लड्डू बनायें बाजार में 90 प्रतिशत लोग बिना नहाये ही बनाते हैं जो अशुद्ध माना जाता है )
9. फेणिका ( आश्लेषा)
10.घृतमण्ड (शक्करपारा),
11.कसार (गेहूँके आटे तथा गुड़से निर्मित पदार्थ विशेष)-
(यह पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्र पर करें।)
12.वटपत्र (पापड़) -(यह उत्तरा फाल्गुनी नक्षत्र को नैवेद्य अर्पण करें ।)
13.घेवर ( हस्त नक्षत्र)
14.वटक (बड़ा) - चित्रा नक्षत्र पर नैवेद्य
15. कोकरस (खजूरका रस)- स्वाती नक्षत्र पर
16. घृतमिश्रित चनेका चूर्ण ( बेसन में घी मिलाकर सेककर)
17.मधु ( अनुराधा)
18.सूरन ( ज्येष्ठा)
19. गुड़ ( मूल नक्षत्र में )
20. चिउड़ा ( पूर्वाषाढ़ा)
21.दाख ( उत्तराषाढ़ा में )
22. खजूर ( श्रावण नक्षत्र पर )
23.चारक ( धनिष्ठा)
24. पूआ ( शतभिषा नक्षत्रपर)
25. मक्खन ( पूर्वा भाद्रपद)
26.मूँगका लड्डू ( उत्तराभाद्रपद)
27. विजौरा नींबू ( यह पराशक्ति के एक हाथ की शोभा भी होता है चतुर्भुजी महा लक्ष्मी जो 18 भुजाओं से युक्त अथवा सहस्र भुजाओं वाली महिषासुर मर्दिनी बनी उनको यह प्रिय है यह रेवती नक्षत्र पर अर्पण मात्र करें इसे काटे नहीं ।
हे नारद ! ये सत्ताईस नक्षत्रोंके नैवेद्य बताये गये हैं॥ २४-२७३ ॥
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योग -
अब विष्कम्भ आदि योगोंमें नैवेद्य अर्पणके विषयमें कहूँगा।
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योगों पर इन पदार्थोंको अर्पित करनेसे जगदम्बिका प्रसन्न होती हैं।
1-7
गुड़, मधु, घी, दूध, दही, मट्ठा, पूआ,
8-14
मक्खन, ककड़ी, कॉहड़ा, लड्डू, कटहल, केला, जामुन,
15-21
आम, तिल, संतरा, अनार, बेरका फल, आमला, खीर,
22-27
चिउड़ा, चना, नारियल, जम्भफल (जम्भीरा), कसेरू और सूरन-

हे विप्र ! ये शुभ नैवेद्य क्रमशः विष्कम्भ आदि योगोंमें [ भगवतीको] अर्पण करनेके लिये विद्वानोंके द्वारा निश्चित किये गये हैं॥ २८-३२३ ॥

हे मुने ! इसके बाद अब मैं भिन्न-भिन्न करणोंके नैवेद्यके बारेमें बताऊँगा।
कंसार, मण्डक, फेनी,
मोदक, वटपत्र, लड्डू,
घृतपूर, तिल, दही,
घी और मधु-
ये करणोंके नैवेद्य बताये गये हैं, जिन्हें आदरपूर्वक भगवतीको अर्पण करना चाहिये ॥ ३३-३४३ ॥
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हे नारदमुने! अब मैं देवीको प्रसन्न करनेवाले दूसरे श्रेष्ठ विधानका वर्णन करूँगा, उस सम्पूर्ण विधानको आदरपूर्वक सुनिये।
तृतीया भोग -
● चैत्रमासके शुक्ल- पक्षमें तृतीया तिथिको महुएके वृक्षमें भगवतीको भावना करके उनका पूजन करे और नैवेद्यमें पाँच प्रकारके भोज्य पदार्थ अर्पित करे। इसी प्रकार बारहों महीनोंके शुक्लपक्षकी तृतीया तिथिको पूजन-विधानके साथ क्रमशः नैवेद्य अर्पित करे।
( अतः चैत्र में महुए के पास जाकर पंचोपचार से पूजा करें )
● वैशाख- मासमें गुड़मिश्रित पदार्थ निवेदित करना चाहिये।
●ज्येष्ठ महीनेमें भगवतीकी प्रसन्नताके लिये मधु अर्पित करना चाहिये।
●आषाढ़ महीनेमें नवनीत और महुएके रससे बना हुआ पदार्थ अर्पित करना चाहिये ॥ ३५-३९ ॥
● श्रावण-मासमें दही,
●भाद्रपद-मासमें शर्करा,
● आश्विन-मासमें खीर
●तथा कार्तिक-मासमें दूधका नैवेद्य उत्तम कहा गया है। ●मार्गशीर्ष-महीनेमें फेनी
एवं
●पौष माहमें दधिकूर्चिका (लस्सी) का नैवेद्य उत्तम कहा गया है।
●माघके महीनेमें गायके घीका नैवेद्य अर्पण करना चाहिये;
●फाल्गुनके महीनेमें नारियलका नैवेद्य बताया गया है। इस प्रकार बारह महीनोंमें बारह नैवेद्योंसे क्रमशः भगवतीकी पूजा करनी चाहिये ॥ ४०-४२ ॥
1. मंगला,
2.वैष्णवी,
3.माया,
4. कालरात्रि,
5.दुरत्यया,
6. महामाया,
7.मतंगी,
8.काली,
9.कमलवासिनी,
10.शिवा,
11.सहस्त्रचरणा और
12 .सर्वमंगलरूपिणी-इन 12 नामौंका उच्चारण करते हुए महुएके वृक्षमें भगवतीकी पुजा करनी चाहिये।
तत्पश्चात् सभी कामनाओंकी सिद्धि तथा व्रतकी पूर्णताके लिये महुएके वृक्षमें स्थित देवेशी महेश्वरीकी इस प्रकार स्तुति करनी चाहिये ॥ ४३-४५ ॥
स्तोत्र-
कमलके समान नेत्रोंवाली आप जगद्धात्रीको नमस्कार है। आप महामंगलमूर्तिस्वरूपा महेश्वरी महादेवीको नमस्कार है। [हे देवि !] परमा, पापहन्त्री, परमार्गप्रदायिनी, परमेश्वरी, प्रजोत्पत्ति, परब्रह्मस्वरूपिणी, मददात्री, मदोन्मत्ता, मानगम्या, महोन्नता, मनस्विनी, मुनिध्येया, मार्तण्डसहचारिणी-ये आपके नाम हैं। हे लोकेश्वरि। हे प्राज्ञे। आपकी जय हो। हे प्रलयकालीन मेघके समान प्रतीत होनेवाली! देवता और दानव महामोहके विनाशके लिये आपकी उपासना करते हैं ॥ ४६-४९ ॥
आप यमलोक मिटानेवाली, यमराजपूज्या, यमकी अग्रजा और यमनिग्रहस्वरूपिणी हैं। हे परमाराध्ये ! आपको बार-बार नमस्कार है। आप समस्वभावा, सर्वेशी, सर्वसंगविवर्जिता, संगनाशकरी, काम्यरूपा, कारुण्यविग्रहा, कंकालक्रूरा, कामाक्षी, मीनाक्षी, मर्मभेदिनी, माधुर्यरूपशीला, मधुरस्वरपूजिता, महामन्त्रवती, मन्त्रगम्या, मन्त्रप्रियंकरी, मनुष्य- मानसगमा और मन्मथारिप्रियंकरी- इन नामोंसे विख्यात हैं ॥ ५०-५३ ॥ पीपल, वट, नीम, आम, कैथ एवं बेरमें निवास करनेवाली आप कटहल, मदार, करील, जामुन आदि क्षीरवृक्षस्वरूपिणी हैं। दुग्धवल्लीमें निवास करनेवाली, दयनीय, महान् दयालु, कृपालुता एवं करुणाकी साक्षात् मूर्तिस्वरूपा एवं सर्वज्ञजनोंकी प्रियस्वरूपिणि ! आपकी जय हो ॥ ५४-५५ ॥
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इस प्रकार पूजनके पश्चात् इस स्तोत्रसे उन देवेश्वरीकी स्तुति करनी चाहिये। ऐसा करनेवाला मनुष्य व्रतका सम्पूर्ण पुण्य प्राप्त कर लेता है ॥ ५६ ॥
जो मनुष्य भगवतीको प्रसन्न करनेवाले इस स्तोत्रका नित्य पाठ करता है,
1. उसे किसी प्रकारके शारीरिक या मानसिक रोगका भय नहीं होता
2. और उसे शत्रुओंका भी कोई भय नहीं रहता।
3. इस स्तोत्रके प्रभावसे अर्थ चाहनेवाला अर्थ प्राप्त कर लेता है,
4.धर्मके अभिलाषीको धर्मकी प्राप्ति हो जाती है, 5.कामीको काम सुलभ हो जाते हैं
6.और मोक्षकी इच्छा रखनेवालेको मोक्ष प्राप्त हो जाता है।
7. इस स्तोत्रके पाठसे ब्राह्मण वेदसम्पन्न, क्षत्रिय विजयी, वैश्य धनधान्यसे परिपूर्ण और शूद्र परम सुखी हो जाता है।
8.जो मनुष्य श्राद्धके समय मनको एकाग्र करके इस स्तोत्रका पाठ करता है, उसके पितरोंकी एक कल्पतक स्थायी रहनेवाली अक्षय तृप्ति ही जाती है ॥ ५७-६०
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[हे नारद !] इस प्रकार मैंने देवताओंके द्वारा देवीकी की गयी आराधना तथा पूजाके विषयों आपको भलीभाँति बता दिया। जो मनुष्य भक्तिपूर्वक भगवतीकी उपासना करता है, वह देवीलोकका अधिकारी हो जाता है ॥ ६१ ॥

हे विप्र । भगवतीके पूजनसे मनुष्यकी सभी कामनाएँ सिद्ध हो जाती हैं और अन्तमें उसकी बुद्धि सभी पापोंसे रहित होकर निर्मल हो जाती है॥ ६२॥

हे ब्रह्मपुत्र ! भगवतीके अनुग्रहसे मनुष्य जहाँ-तहाँ पूजित होता है और मानको ही धन माननेवाले पुरुषोंमें सम्माननीय हो जाता है। उसे स्वप्नमें भी नरकोंका भय नहीं रहता। महामाया भगवतीकी कृपासे देवीका भक्त पुत्र तथा पौत्रोंसे सदा सम्पन्न रहता है, इसमें कुछ भी सन्देह नहीं करना चाहिये ॥ ६३-६४३ ॥

[हे नारद !] यह जो मैंने आपसे महादेवीके पूजनका वर्णन किया है, वह नरकसे उद्धार करनेवाला तथा सम्पूर्ण रूपसे मंगलकारी है। हे मुने ! चैत्र आदि महीनोंमें क्रमसे महुएके वृक्षमें भगवतीकी पूजा करनी चाहिये। हे अनघ ! जो मनुष्य मधूक नामक वृक्षमें सम्यरूपसे पूजन करता है; उसे रोग, बाधा आदिका कोई भय उत्पन्न नहीं होता ॥ ६५-६७॥

🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻 ऊं नमः शिवाय ऊं नमः शिवाय ऊं नमः शिवाय ऊं नमः शिवाय ऊं नमः शिवाय

आज़ गौरी दर्शन में महालक्ष्मी गौरी का दर्शन किया जाता है इनके दर्शन से घर में धन धान्य समृद्धि प्राप्त होती है          ...
17/04/2024

आज़ गौरी दर्शन में महालक्ष्मी गौरी का दर्शन किया जाता है इनके दर्शन से घर में धन धान्य समृद्धि प्राप्त होती है


🌹 *मां सिद्धिदात्री* 🌹
🙏👉आज नवरात्र के आखिरी दिन आदिशक्ति मां दुर्गा के नौवे रूप मां सिद्धिदात्री का पूजन, अर्चन और स्तवन किया जाएगा। पौराणिक कथाओं के अनुसार, अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व और वशित्व ये आठ सिद्धियां हैं। अपने उपासक को ये सभी सिद्धियां देने के कारण ही इन्हें सिद्धिदात्री कहा जाता है।

🌹🕉️ *नवरात्र का अंतिम दिन है विशेष-:
🌷👉 नवरात्र के प्रमुख आकर्षण में से एक कन्यापूजन भी है। ऐसी मान्यता है कि मां दुर्गा के सिद्धिदात्री रूप की उपासना करने से मनोकामनाएं पूरी होती हैं। जो भक्त नौ दिन का व्रत रखते हैं, उनका नवरात्र व्रत नौ कन्याओं को नौ देवियों के रूप में पूजने के बाद ही पूरा होता है।
उन्हें अपने सामर्थ्य के अनुसार भोग लगाकर दक्षिणा देने से ही मां दुर्गा प्रसन्न हो जाती हैं। इसके बाद ही प्रसाद ग्रहण करके व्रत खोलना चाहिए। शक्ति पूजन का अंतिम दिन होने से ये दिन काफी विशेष होता है।

🌹🕉️ *ऐसे करें कन्या पूजन--:
🌷👉कन्याओं को माता रानी का रूप माना जाता है। कन्याओं के घर आने पर माता रानी के जयकारे भी लगाने चाहिए। इसके बाद कन्याओं के पैर धोने चाहिए।
सभी कन्याओं को आसन बिछाकर बैठाना चाहिए, फिर रोली और कुमकुम का टीका लगाने के बाद उनके हाथ में मौली बांधनी चाहिए। अब सभी कन्याओं और बालक की आरती उतारनी चाहिए। इसके बाद माता रानी को भोग लगाया हुआ भोजन कन्याओं को दें।

🌹🕉️ *देवी का भोग प्रसाद--:
🌷👉मां भगवती को खीर, मिठाई, फल, हलवा, चना, मालपुआ प्रिय है इसलिए कन्या पूजन के दिन कन्याओं को खाने के लिए पूरी, चना और हलवा दिया जाता है। कन्याओं को केसर युक्त खीर, हलवा, पूड़ी खिलाना चाहिए।
कन्याओं के साथ एक बालक को भी भोजन कराना चाहिए। बालक को बटुक भैरव और लंगूरा के रूप में पूजा जाता है। देवी की सेवा के लिए भगवान शिव ने हर शक्तिपीठ के साथ एक-एक भैरव को रखा हुआ है, इसलिए देवी के साथ इनकी पूजा भी जरूरी है।

🌹🕉️ *ऐसा है मां का स्वरूप---:
🌷👉मां दुर्गा इस रूप में श्वेत वस्त्र धारण की है। मां सिद्धिदात्री चार भुजाओं से युक्त हैं। इनका वाहन सिंह है। यह कमल पुष्प पर भी आसीन होती हैं। इनकी दाहिनी तरफ के नीचे वाले हाथ में कमल पुष्प है।

🌹🕉️ *मां सिद्धिदात्री की स्तुति:--:
🌷या देवी सर्वभू‍तेषु माँ
सिद्धिदात्री रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै
नमस्तस्यै नमो नमः।।🌷

🌹🕉️ *मां सिद्धिदात्री की प्रार्थना--:
🌷सिद्ध गन्धर्व
यक्षाद्यैरसुरैरमरैरपि।
सेव्यमाना सदा भूयात्
सिद्धिदा सिद्धिदायिनी।🌷

🌹🕉️ *मां सिद्धिदात्री के मंत्र--:

🌷"ऊं देवी सिद्धिदात्र्यै नमः।।"🌷

🙏🙏मां जगत जननी सब पर अपना आशीर्वाद बनाए रखें और सभी का कल्याण करें🙏

🌹🌹*जय माता दी*🌹🌹
🙏💐🌷🌻🌹🌻🌷💐🙏

🌹🕉️ श्री राम नवमी 🕉️ 🌹

🌷*17 अप्रैल 2024 बुधवार*🌷

💐👏प्रभु श्रीराम साक्षात धर्म की प्रतिमूर्ति हैं। आदिकवि वाल्मीकि ने रामायण में इस बात को उल्लेखित करते हुए कहा है कि

🌷'रामो विग्रहवान धर्म:।🌷'

अर्थात राम ही धर्म के विग्रह हैं।
और सनातन संस्कृति में प्रभु श्रीराम जी को बहुत ही महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त हैं. उनके प्राकट्य उत्सव को देश-दुनिया में हर्ष और उल्लास के साथ श्रीरामनवमी महापर्व के रूप में मनाया जाता है।
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को श्रीराम का जन्म हुआ था. इस वर्ष श्रीराम नवमी पर्व17 अप्रैल बुधवार के दिन मनाया जाएगा।

🌹✡️ *शुभ मुहूर्त-:
🌷👉श्री राम नवमी के दिन संपूर्ण दिन रात सर्वार्थ सिद्धि योग रहेगा और रात के समय अमृत सिद्धि, गुरु पुष्य योग जैसे अत्यंत शुभ योग विद्यमान रहेंगे।



🌷👉इस वर्ष श्रीराम नवमी पर शुभ वार के दिन सर्वार्थ सिद्धि योग जैसा श्रेष्ठ योग रहेगा, यदि आप सोना चांदी, मकान, दुकान,वाहन इत्यादि खरीदना चाहते हैं तो इस दिन आप खरीद सकते हैं।


🌹⚛️श्रीराम जन्मोत्सव-:
🌷👉चैत्र शुक्ल की नवमी के दिन देश-विदेश व अयोध्या में धूम-धाम से श्रीराम जन्मोत्सव मनाया जाता है. इस पर्व पर श्रीराम के संग उनके सभी छोटे भाई भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न का भी जन्मोत्सव बड़े धूमधाम से मनाया जाता है।

🌷🚩श्रद्धालु इस दिन श्री राम जी का भजन पूजन करते है, श्रीराम के मंत्रों का जप व हवन यज्ञ दान इत्यादि कियें जाते है और श्री रामचरितमानस के पाठ किये जाते हैं।

🌷🚩यदि आप घर पर श्रीराम के जन्मोत्सव मनाने का विचार कर रहे हैं तो उनके पालने को फूल, मालाओं से सजाएं. उनके लिए नए वस्त्र, मुकुट आदि सामग्रियों की व्यवस्था कर लें व शुभ अभिजीत मुहूर्त में श्रीरामलला का जन्मदिन मनाएं और आसपास लोगों में प्रसाद के रूप में मिठाई अवश्य बांटें।

🌷🚩आप कल श्री राम नवमी के दिन अपने आसपास के श्री राम मंदिरों में जाकर पूजा अर्चना व दर्शन करें।गौशालाओं में दान दें, इससे आप पर श्रीराम जी की कृपा अवश्य बनेंगी।

ऊं नमः शिवाय ऊं नमः शिवाय ऊं नमः शिवाय ऊं नमः शिवाय ऊं नमः शिवाय

माँ मंगला गौरी का दर्शन नवरात्र में अष्टमी को होता है दुर्गा दर्शन में मां अन्नपूर्णा देवी का मंदिर कारीडोर के बाहर है म...
16/04/2024

माँ मंगला गौरी का दर्शन नवरात्र में अष्टमी को होता है दुर्गा दर्शन में मां अन्नपूर्णा देवी का मंदिर कारीडोर के बाहर है मां आनंद वन देवी का मंदिर मीरघाट में है

जय माँ मंगला गौरी ❤️🙏🏼ऊँ नमः शिवाय ऊँ नमः शिवाय ऊँ नमः शिवाय ऊँ नमः शिवाय ऊँ नमः शिवाय🙏🙏

निःसंतान दम्पत्तियों को बच्चे का सुख देने वाली और अविवाहित कन्याओं को सर्वगुण सम्पन्न वर प्रदान करने वाली मां मंगला गौरी के प्रति भक्तों की असीम आस्था रहती है। मां की अनुकम्पा से भक्तों की सारी मनोकामनायें पूरी हो जाती है। मान्यता के अनुसार एक बार सूर्य पंचगंगा घाट ;पंचनंदा तीर्थद्ध पर शिवलिंग स्थापित करके घोर तपस्या करने लगे। उनके तप से उनकी किरणें आग के समान गर्म होने लगीं। अन्ततः उनके तप के प्रभाव से किरणें इतनी तीक्ष्ण हो गयीं कि मानव सहित सभी प्राणी जहां के तहां बुत बन गये। चारो ओर हाहाकार मच गया। अचानक हुई इस अप्राकृतिक स्थिति को जानने के लिए भगवान शिव मां पार्वती के साथ तपस्या में लीन सूर्यदेव के सामने प्रकट हुए। महादेव और मां पार्वती को अपने सम्मुख पाकर सूर्यदेव भावविह्वल हो गये और उनकी स्तुति करने लगे।

सूर्य देव की इस असीम भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें वरदान स्वरूप दैव शक्तियां प्रदान की। साथ ही कहा कि यहां स्थापित देवी जिन्हें कालांतर में मंगला गौरी के नाम से जाना जायेगा। इनके दर्शन.पूजन करने वाले आस्थावान भक्तों को सभी प्रकार के दुखों से दूर कर मां सुख सम्पत्ति प्रदान करेंगी। वहींए अविवाहित कन्याएं यदि मां का दर्शन करेंगी तो उन्हें सर्वगुण सम्पन्न वर और निःसंतान दम्पत्ति को दर्शन करने से बच्चे की प्राप्ति होगी। धीर.धीरे इस मंदिर की ख्याति बढ़ती गयी। बाद में मां के इस मंदिर का निर्माण किसी भक्त ने करवाया।


इस मंदिर को पंचायतन मंदिर भी कहा जाता है। मंदिर के मध्य में गौरीगौश्तीश्वर शिवलिंग स्थापित हैं। मंदिर में एक कोने में मां की दिव्य प्रतिमा स्थापित है। वहींए मंदिर में आदि केशव और हनुमान जी की मूर्ति को रामदास जी ने स्थापित किया है। मंदिर में मर्तंड भैरव की भी मूर्ति है। जिनके दर्शन.पूजन करने लोग आते हैं। मंदिर में बड़ा कार्यक्रम पूष महीने की शुक्लपक्ष चतुर्दशी को मां का अन्नकूट महोत्सव होता है। इस दौरान कई प्रकार के व्यंजन बनाकर मां को अर्पित किया जाता है। वहीं चैत्र नवरात्र में अष्टमी के दिन इन्हें गौरी के रूप में पूजा जाता है। प्रत्येक मंगलवार को इस मंदिर में काफी संख्या में श्रद्धालु मां के दर्शन.पूजन के लिए पहुंचते हैं। यह मंदिर प्रातःकाल 4 से दोपहर 12 बजे तक खुला रहता है। फिर पुनः शाम को 4 बजे से खुलता है जो रात 9 बजे तक खुला रहता है। मां की आरती दो बार होती है। सुबह की आरती 5 बजे एवं रात की शयन आरती 9 बजे होती है। यह मंदिर पंचगंगा घाट पर स्थित है। कैन्ट स्टेशन से करीब 8 किलोमीटर दूर स्थित इस मंदिर तक पहुंचने के लिए ऑटो द्वारा मैदागिन चौराहे पर पहुंचकर पैदल भैरवनाथ होते हुए सकरी गलियों द्वारा पहुंचा जा सकता है। ऊं नमः शिवाय ऊं नमः शिवाय ऊं नमः शिवाय ऊं नमः शिवाय ऊं नमः शिवाय

महा-काली दस महाविद्या      नवरात्र में सप्तमी तिथि को  गौरी दर्शन में भवानी गौरी का दर्शन किया जाता हैजिनका मंदिर अन्नपू...
16/04/2024

महा-काली दस महाविद्या नवरात्र में सप्तमी तिथि को गौरी दर्शन में भवानी गौरी का दर्शन किया जाता हैजिनका मंदिर अन्नपूर्णा मंदिर के अंदर राम मंदिर में हें दुर्गा दर्शन में मां काली इनका मंदिर कालिका गली में मां आनंद वन देवी का मंदिर मीरघाट में है और वाराही माता का मंदिर मानमंदिर में है ऊं नमः शिवाय ऊं नमः शिवाय ऊं नमः शिवाय ऊं नमः शिवाय ऊं नमः शिवाय 🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏महा-काली से सम्बंधित अन्य महत्त्वपूर्ण तथ्य
देवी काली की आराधना, पूजा इत्यादि भारत के पूर्वी प्रांत में अधिकतर लोकप्रिय हैं, देवी वहां समाज के प्रत्येक वर्ग द्वारा पूजिता हैं, विशेषतः जनजातीय, निम्न जाति तथा युद्ध कौशल से सम्बंधित समाज की देवी अधिष्ठात्री हैं। जहां-तहा देवी काली के मंदिर देखे जा सकते हैं, प्रत्येक श्मशान में देवी काली का मंदिर विद्यमान हैं तथा विशेष तिथियों में पूजा, अर्चना होती हैं। चांडाल जो की हिन्दू धर्म के अनुसार, श्मशान में शव के दाह का कार्य करते हैं एवं अन्य शूद्र जातियों की देवी अधिष्ठात्री हैं। डकैती जैसे अमानवीय कृत्य करने वाले भी देवी की विशेष पूजा करते हैं, सामान्यतः डकैत, डकैती करने हेतु प्रस्थान से पहले देवी काली की विशेष पूजा आराधना करते थे। देवी का सम्बन्ध क्रूर कृत्यों से भी हैं, परन्तु यह क्रूर कृत्य पूर्व तथा वर्तमान जन्म में अर्जित के दुष्ट कर्म के जातकों हेतु ही हैं। हिन्दू धर्म पुनर्जन्म के सिद्धांतों पर आधारित हैं, केवल मानव देह धरी या जातक को अपने नाना जन्मो के कुकर्मों के कारण कष्ट-दुःख तथा सुकर्मों के कारण सुख भोगना ही पड़ता हैं।

पूर्वकाल में डकैत, देवी के निमित्त भव्य मंदिरों का निर्माण करवाते थे तथा विधिवत पूजा आराधना की संपूर्ण व्यवस्था करते थे। आज भी भारत वर्ष के विभिन्न प्रांतों में ऐसे मंदिर विद्यमान हैं, जहां डकैत देवी काली की आराधना, पूजा इत्यादि करते थे। हुगली जिले में डकैत काली-बाड़ी, जलपाईगुड़ी जिले की देवी चौधरानी (डकैत) काली बाड़ी इत्यादि, प्रमुख डकैत देवी मंदिर हैं।

स्कन्द (कार्तिक) पुराण, के अनुसार 'देवी आद्या शक्ति काली' की उत्पत्ति आश्विन मास की कृष्णा चतुर्दशी तिथि मध्य रात्रि के घोर में अंधकार से हुई थीं। परिणामस्वरूप अगले दिन कार्तिक अमावस्या को उन की पूजा-आराधना तीनों लोकों में की जाती हैं, यह पर्व दीपावली या दीवाली नाम से विख्यात हैं तथा समस्त हिन्दू समाजों द्वारा मनाई जाती हैं। शक्ति तथा शैव समुदाय का अनुसरण करने वाले इस दिन देवी काली की पूजा करते हैं तथा वैष्णव समुदाय महा लक्ष्मी जी की, वास्तव में महा काली तथा महा लक्ष्मी दोनों एक ही हैं। भगवान विष्णु के अन्तः कारण की शक्ति या संहारक शक्ति 'मायामय या आदि शक्ति' ही हैं, महालक्ष्मी रूप में देवी उनकी पत्नी हैं तथा धन-सुख-वैभव की अधिष्ठात्री देवी हैं।

अग्नि तथा गरुड़ पुराण के अनुसार महा-काली की साधना-आराधना, युद्ध में सफलता और शत्रुों पर विजय प्राप्त करने के हेतु की जाती हैं।

दस महा-विद्याओं में देवी काली, उग्र तथा सौम्य रूप में विद्यमान हैं, देवी काली अपने अनेक अन्य नमो से प्रसिद्ध हैं, जो भिन्न-भिन्न स्वरूप तथा गुणों वाली हैं।
देवी काली मुख्यतः आठ नमो से जानी जाती हैं और 'अष्ट काली', समूह का निर्माण करती हैं।
१. चिंता मणि काली
२. स्पर्श मणि काली
३. संतति प्रदा काली
४. सिद्धि काली
५. दक्षिणा काली
६. कामकला काली
७. हंस काली
८. गुह्य काली--------------------------------------देवी काली 'दक्षिणा काली' नाम तथा स्वरूप से सर्व सदाहरण में सर्वाधिक पूजिता हैं
देवी काली के दक्षिणा काली नाम पड़ने के विभिन्न कारण।

· सर्वप्रथम 'दक्षिणा मूर्ति भैरव' ने इन की उपासना की, परिणामस्वरूप देवी, दक्षिणा काली के नाम से विख्यात हुई।
· दक्षिण दिशा की ओर रहने वाले 'यम या धर्म राज, देवी का नाम सुनते ही भाग जाते है परिणामस्वरूप देवी, दक्षिणा काली के नाम से जानी जाती हैं। तात्पर्य है, मृत्यु के देवता यम-राज जिनका राज्य या यम लोक दक्षिण दिशा में विद्यमान है, मृत्यु पश्चात जीव-आत्मा यम दूतों द्वारा इन्हीं के लोक में लाई जाती हैं जहाँ जीव के कर्म-अनुसार उसे दण्डित किया जाता हैं तथा अगले जन्म का निर्धारण होता हैं। यम राज तथा उनके दूत, देवी काली के भक्तों से दूर रहते है, मृत्यु पश्चात यम दूत उन्हें यम लोक नहीं ले जाते हैं।
· समस्त प्रकार के साधनाओं का सम्पूर्ण फल 'दक्षिणा' से ही प्राप्त होता हैं, जैसे गुरु दीक्षा तभी सफल हैं जब गुरु दक्षिणा दी गई हो। देवी काली, मनुष्य को अपने समस्त कर्मों का फल प्रदान करती हैं या सिद्धि प्रदान करती हैं, तभी देवी को दक्षिणा काली के नाम से भी जाना जाता हैं।
· देवी काली वार प्रदान करने में अत्यंत चतुर हैं, यहाँ भी एक कारण हैं की उन्हें दक्षिणा काली कहा जाता हैं।
· हिन्दू शास्त्रों के अनुसार, पुरुष को ‘दक्षिण’ तथा स्त्री को ‘बामा’ कहा जाता हैं। वही बामा दक्षिण पर विजय पाकर मोक्ष प्रदान करने वाली होती हैं, कारणवश देवी अपने भैरव के ऊपर खड़ी हैं।
·
देवी काली दो कुल, जो 'रक्त तथा कृष्ण' वर्ण में अधिष्ठित हैं, कृष्ण या काले स्वरूप वाली 'दक्षिणा' कुल से तथा रक्त या लाल वर्ण वाली 'सुंदरी' कुल से सम्बंधित हैं। मुख्यतः विध्वंसक प्रवृत्ति धारण करने वाले समस्त देवियाँ 'कृष्ण या दक्षिणा कुल' से सम्बंधित हैं। देवी काली का घनिष्ठ सम्बन्ध विध्वंसक प्रवृत्ति तथा तत्वों से हैं, जैसे देवी श्मशान वासी हैं, मानव शव-हड्डी इत्यादि मृत देह से सम्बंधित तत्त्वों से सम्बद्ध हैं। भूत-प्रेत इत्यादि प्रेत योनि को प्राप्त जीवों या विध्वंसक सूक्ष्म परा जीव, देवी के संगी साथी तथा सहचरी हैं। यहाँ देवी नियंत्रक भी हैं तथा स्वामी भी, समस्त भूत-प्रेत इत्यादि, इनकी आज्ञा का उलंघन कभी नहीं कर सकते। समस्त वेद इन्हीं देवी की भद्र काली रूप में स्तुति करते हैं, निष्काम या निःस्वार्थ भक्तों के माया रूपी पाश को ज्ञान रूपी तलवार से काट कर मुक्त करती हैं।-------------

देवी काली को सम्बोधित करने वाली नाना शब्दों का तात्पर्य (अर्थ)
श्मशान वासिनी: तामसिक, विध्वंसक प्रवृत्ति से सम्बंधित रखने वाले देवी-देवता, मुख्यतः श्मशान भूमि में वास करते हैं। व्यवहारिक दृष्टि से श्मशान वह स्थान हैं, जहाँ शव के दाह का कार्य होता हैं। परन्तु आध्यात्मिक या दार्शनिक दृष्टि से श्मशान का अभिप्राय कुछ और ही हैं, यह वह स्थान हैं, जहाँ पांच या पञ्च महा-भूत, चिद-ब्रह्म में विलीन होते हैं। आकाश, पृथ्वी, जल, वायु तथा अग्नि इन महा भूतों से, संसार के समस्त जीवों के देह का निर्माण होता हैं या देह इन्हीं पांच महाभूतों का मिश्रण हैं। श्मशान वह स्थान हैं जहाँ, इन पांचो भूतों के मिश्रण से निर्मित देह अपने-अपने तत्व में विलीन हो जाते हैं। देवी काली, तारा, भैरवी इत्यादि देवियाँ श्मशान भूमि को अपना निवास स्थान बनती हैं, इसका एक महत्त्वपूर्ण कारण यह हैं कि! आध्यात्मिक दृष्टि से श्मशान विकार रहित हृदय या मन का प्रतिनिधित्व करता हैं। मानव देह कई प्रकार के विकारों या पाशों का स्थान हैं, काम, क्रोध, लोभ, मोह, ईर्ष्या, स्वार्थ इत्यादि, अतः देवी उसी स्थान को अपना निवास स्थान बनती हैं जहाँ इन विकारों या व्यर्थ के आचरणों का दाह होता हैं। मन या हृदय वह स्थान हैं जहाँ इन समस्त विकारों का दाह होता हैं अतः देवी काली अपने उपासकों के विकार शून्य हृदय पर ही वास करती हैं।

चिता : मृत देह के दाह संस्कार हेतु, लकड़ियों के ढेर के ऊपर शव को रख कर शव दाह करना, चिता कहलाता हैं। साधक को अपने श्मशान रूपी हृदय में सर्वदा ज्ञान रूपी अग्नि जलाये रखना चाहिए, ताकि अज्ञान रूपी अंधकार को दूर किया जा सके।

देवी का आसन : देवी शव रूपी शिव पर विराजमान हैं या कहे तो शव को अपना आसन बनाती हैं, जिसके कारण ही शव में चैतन्य का संचार होता हैं। बिना शक्ति के शिव, शव के ही सामान हैं, चैतन्य हीन हैं, देवी की कृपा लाभ से ही देह पर प्राण रहते हैं।

करालवदना या घोररूपा : देवी काली का वर्ण घोर या अत्यंत श्याम वर्ण (काला) हैं तथा स्वरूप से भयंकर तथा डरावनी हैं। परन्तु देवी के साधक या देवी जिन के हृदय में स्थित हैं, उन्हें डरने की आवश्यकता नहीं हैं, स्वयं काल, यमराज देवी से भयभीत रहते हैं।

पीनपयोधरा : देवी काली के स्तन बड़े तथा उन्नत हैं, यहाँ तात्पर्य हैं कि देवी प्रत्यक्ष तथा अप्रत्यक्ष रूप से तीनों लोकों का पालन करती हैं। अपने अमृतमय दुग्ध को आहार रूप में दे कर देवी अपने साधक को कृतार्थ करती हैं।

प्रकटितरदना : देवी काली की विकराल दन्त पंक्ति मुंह के बहार दिखाई देती हैं, उन दाँतो से उन्होंने अपने जिह्वा को दबा रखा हैं। यहाँ देवी रजो तथा तमो गुण रूपी जिह्वा को, सत्व गुण के प्रतीक उज्ज्वल दाँतो से दबाये हुए हैं।

बालावतंसा : देवी काली अपने कानों में बालक के शव रूपी अलंकार धारण करती हैं या कहे तो बच्चों के शव को देवी कानों के अलंकार रूप में धारण करती हैं। यहाँ देवी बालक स्वरूपी साधक को सर्वदा अपने समीप रखती हैं, बाल्य भाव देवी को प्राप्त करने का सर्व शक्तिशाली साधन हैं।

मुक्तकेशी : देवी के बाल, घनघोर काले बादलों की तरह बिखरे हुए हैं और ऐसे प्रतीत होते हैं जैसे कोई भयंकर आंधी आने वाली हो, जो प्रलय से सम्बंधित हैं। ऊं नमः शिवाय ऊं नमः शिवाय ऊं नमः शिवाय ऊं नमः शिवाय ऊं नमः शिवाय

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