29/08/2024
मां वाराही का मंदिर जहां दिन भर भूत प्रेत और जिन्नात लगाते हैं हाज़िरी...
ऊं नमः शिवाय जंप यज्ञ समिति के अत्यन्त समिप है मां वाराही माता का मंदिर ऊं नमः शिवाय
अद्भुत शहर है काशी। यहां जो चाहो वो मिलता है। बस आपको समझना ये है कि आपको जो चाहिए वो मिलेगा कहां। मान, मर्यादा और रौब दाब वाली प्रतिष्ठा किसको नहीं चाहिए। सबके अंदर इसे पाने की जिजिविषा होती है। अगर आपके मन में भी इन सबको पाने की इच्छा बलवती है तो काशी आ जाइए। और लगाइए मां वाराही देवी के दरबार में हाजिरी और पाइए वो सब जिसे पाने की आस में आप अब तक यहां वहां भटकते रहे हैं। अगर आप तमाम तरह की मुसीबतों से जूझ रहे हैं, बीमारियों से ग्रस्त हैं और कोई रास्ता नहीं सूझ रहा है तो फिर मां वाराही देवी की चौखट पर माथा टेकिये और फिर देखिए अपनी जिंदगी में होने वाले चमत्कार। अगर आप किसी कम्पनी, शहर, सूबे या मुल्क के प्रशासनिक अफसर हैं तो फिर आपकी हाजिरी तो यहां लगनी ही चाहिए क्योंकि माता वाराही देवलोक की प्रशासनिक देवी हैं। माता के दरबार में आपकी हाजिरी सब कुछ आपके कंट्रोल में कर देंगी।
काशी में उनका मंदिर गंगा किनारे मान मंदिर घाट के पास डी 16/84 में स्थित है। कहते हैं कि मां वाराही इतनी उग्र हैं कि वो अपने दरबार में किसी दर्शनार्थी को बहुत देर तक टिकने नहीं देतीं। माता का ताप वहां किसी को रूकने की इजाजत नहीं देता। या यूं कहिए कि इस ताप की वजह से वहां कोई रूक नहीं पाता। मां वाराही का मंदिर हर रोज अल सुबह चार बजे खुलता है और सुबह ही साढे़ नौ बजे बंद हो जाता है। उसके बाद पूरे दिन उसका पट बंद रहता है। यहां आप विग्रह का सामने से दर्शन नहीं कर सकते। माता मंदिर के नीचे तलघर में बने गर्भगृह में विराजती हैं। वहां पुजारी के अलावा किसी और को जाने की अनुमति नहीं है। ऊपर बने एक मोखे से आप सिर्फ उनके चरण और एक तरफ के मुख का ही दर्शन कर सकते हैं। मां के उग्र रूप का दर्शन कर पाना किसी के लिए भी असंभव है। इसकी वजह उनके मुख से निकलने वाली तीव्र आभा है।
मां वाराही देवी मंदिर के महंत श्री कृष्णकांत दुबे बताते हैं कि माता का विग्रह अत्यंत प्राचीन और स्वयंभू है। मंदिर कब और कैसे बना या इसे किसने बनवाया इसका कोई लेखा जोखा नहीं है। कहते हैं कि माता सती का जब दांत काशी में गिरा तो उससे माता वाराही उत्पन्न हुईं। इसलिए इन्हें शक्तिपीठ की मान्यता भी है। दैवीय व्यवस्था में मां वाराही क्षेत्रपालिका के रूप काशी की रक्षा करती हैं। इस शहर को आफत बलाओं और पैशाचिक बाधाओं से बचाती हैं। कहते हैं कि जब मां दुर्गा का असुरों से युध्द चल रहा था तब मां वाराही ही उनकी सेनापति थीं।
एक कथा ये भी है कि जब देवाधिदेव महादेव काशीराज दिवोदास से इस नगरी को पाने के लिए तमाम कोशिशें कर रहे थे तब एक बार उन्होंने चौंसठ योगिनियों को भी काशी भेजा था लेकिन वो सबकी सब काशी के सौन्दर्य को देख इतनी सम्मोहित हुईं कि वो फिर यहीं की हो कर रह गयीं। कहते हैं कि मां वाराही भी उनमें से ही एक थीं। काशी खंड में इस कथा का उल्लेख है। बहरहाल मत्स्य पुराण में भी मां वाराही की दैवीय शक्ति का उल्लेख है। माघ मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को माता वाराही का विशेष श्रृंगार किया जाता है। उस दिन रात में एक बजे ही मंदिर का पट खुल जाता है। नवरात्र में भी सप्तमी के दिन भी इनके दर्शन की मान्यता है।
महंत दुबे जी बताते हैं कि माता वाराही से जो भी भक्त दिल से जुड़ेगा वो तमाम तरह की आध्याात्मिक शक्तियों और विद्याओं से हमेशा पूर्ण रहेगा। लेकिन मां से इन सबको पाने की एक शर्त है कि आप शिद्दत से मां को पुकारें और यहां नियमित रूप दर्शन के लिए आते रहें। उनका कहना है कि मां को एकाध दिन या कभी कभी आने वाले भक्त प्रिय नहीं हैं। वो अपने नेमी भक्तों को बहुत चाहती हैं। यदि कभी किसी नेमी ने दर्शन करना छोड़ दिया तो फिर मां उसे ऐसा खींचती हैं कि उसे सिर के बल चल कर यहां आना ही पड़ता है। इस संदर्भ में श्री दुबे जी ने हमें एक रहस्यमय कथा सुनायी। एक बार किसी एक भक्त ने यहां यह कह कर आना छोड़ दिया कि, जा मैय्या अब इहां ई जीवन में कभ्भो न आइब। मां का क्रोध जाग्रत हो गया। अचानक एक रात उस व्यक्ति के दोनों पैरों का पंजा पलट गया। उसे ख्वाब में मां का आदेश हुआ कि अब उल्टे पैर चल कर यहां आ। सुबह उसे अपनी गल्ती का अहसास हुआ। वो उल्टे पंजे से ही चल कर किसी तरह रेंगते हुए आने लगा और फिर छह महीने तक लगातार दर्शन करने और रो रो कर प्रायश्चित करने के बाद धीरे धीरे उसके पैर अपने आप सीधे हो गये।
कहते हैं कि ब्रह्म मुहूर्त में महंथ द्वारा पूजा अर्चना कर मंदिर का पट बंद कर दिये जाने के बाद इस मंदिर में तमाम ग्रह नक्षत्र मां की पूजा अर्चना के लिए यहां आते हैं। इसी तरह संध्याकाल में भूत, प्रेत, पिशाच, जिन्नात, यक्ष और यक्षिणी यहां हाजिरी लगाते हैं। उस वक्त अगर किसी ने मंदिर में गल्ती से भी प्रवेश कर लिया तो फिर वो यहां से जिंदा बच कर नहीं जा सकता। इस संदर्भ में महंत श्री कृष्णकांत दुबे बताते हैं कि एक बार उनका बेटा कैसे यहां आ कर फंस गया और फिर बाद में मां ने ही भूत, प्रेत, पिशाच, जिन्नात, यक्ष और यक्षिणियों से उसकी रक्षा की। उनका कहना था कि मंदिर में हाजिरी लगाने वाले तमाम भूत, प्रेत, पिशाच, जिन्नात, यक्ष और यक्षिणियों को अपनी पूजा अर्चना में खलल बर्दाश्त नहीं है। वो फिर उस बाधक शख्स को जान से मार देते हैं। वो यहां किसी और को नहीं जानते। वो सिर्फ मां वाराही के पुजारी और महंत को पहचानते हैं। इसके अलावा वो किसी भी दूसरे शख्स को भले ही वो महंत का पुत्र, पुत्री या पत्नी ही क्यों न हो उसे फिर नहीं बख्शते। लेकिन पिता के निधन के बाद जब यही पुत्र महंत की गद्दी पर बैठेगा और वो पूजा अर्चना के विधि विधान को पूरा करेगा तभी उसे वो सारे आध्यात्मिक अधिकार हासिल हो जाएंगे जो उसके पिता को प्राप्त था।
इस मंदिर में सुबह होने वाली आरती और पुष्पाजंलि एकदम सम्मोहित करने वाली होती है। मां की आरती अथर्ववेद में होती है। पुष्पाजंलि सामवेद और यजुर्वेद में होती है। मां की स्तुति राग भैरवी और सामवेद में गाकर की जाती है। मां की पूजा में पढ़े जाने वाले मंत्रों में चारों वेदों का समावेश है। एक तरह से यहां घनपाठ के जरिए ही पूजा अर्चना की जाती है। कहते हैं कि यहां के पुजारी न तो किसी से राग रागिनियां सीखते हैं और न ही उन्हें इसकी कोई शिक्षा दी जाती है लेकिन एक बार पूजा शुरू होने के बाद चमत्कारिक रूप से उनके कंठ से सारे श्लोक राग में ही उतरने लगते हैं।
महंत श्री दुबे बताते हैं कि वाराही देवी का दर्शन करने के लिए सूदूर दक्षिण भारत के तमाम प्रशासनिक अधिकारी यहां आते हैं। वो अपने ऑफिस का चार्ज लेने के पहले वहां से काशी आते हैं और माता वाराही के दरबार में हाजिरी लगाते हैं। वो कहते हैं कि पिछले दिनों टीवी पर धारावाहिक गणेश पुराण में माता वाराही के महात्म्य को दिखाये जाने के बाद से उत्तर भारत के अफसर भी हाजिरी देने लगे हैं।
वैसे वाराही माता भारत में पूजित अष्ट मातृका में से एक हैं। अष्ट मातृका आठ देवियों का एक मंडल है। इस सृष्टि में हर वस्तु, पदार्थ और जीव को क्रियाशील करने के लिए ऊर्जा की आवश्यकता होती है। सब जानते हैं कि ब्रह्माण्ड की धुरी बने शिव को भी क्रियाशील होने के लिए आदिशक्ति की आवश्यकता पड़ी थी। शिव की ऊर्जा आदिशक्ति ही हैं। इसी तरह मां वाराही भी भगवान विष्णु के वाराह अवतार की शक्ति हैं। वाराह अवतार को क्रियाशील करने वाली ऊर्जा या शक्ति मां वाराही ही हैं। वाराही माता की पूजा अर्चना सनातन धर्म के तीनों मतों के लोग करते हैं। इनकी पूजा मुख्यतः रात्रि में तान्त्रिक क्रियाओं के साथ की जाती है। बौद्ध धर्म में पूजित मरीची तथा वज्रवराही भी वस्तुतः माता वाराही ही हैं। वाराही देवी मां दुर्गा का तामसी और सात्विक गुणधारी रूप हैं। इनका शीश जंगली शूकर का है।
काशी में वाराही देवी का मंदिर कैंट रेलवे स्टेशन से करीब नौ किलोमीटर दूर मानमंदिर घाट के पास है। मंदिर के संकरी गली में और गंगा घाट के किनारे होने के कारण वहां गोदौलिया से पैदल ही जाना पड़ता है। ऊं नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय