15/01/2026
देश के जाने-माने पत्रकार और मूलतः काशी के बड़ी पियरी निवासी श्री हेमंत शर्मा जी ( संप्रति- डायरेक्टर- टीवी9 भारतवर्ष टीवी चैनल ) ने आज मकर संक्रांति के दिन एक बड़ा लेख लिखा है, जिसमें सूर्य की गति, संक्रांति की महिमा से लेकर उनके बचपन के प्रसंग भी है। इसी लेख के बीच उन्होंने अपने बाल्य काल में पतंग उड़ाने के किस्सों का उल्लेख करते हुए पूज्य गुरुदेव महाराज के विद्यार्थी काल के दिनों की चर्चा की है। स्वामीजी के बड़े होने, जगदगुरु रामानंदाचार्य बनने और लगभग 20 साल बाद हुई अपनी दोबारा भेंट का भी रोचक ढंग से विवरण दिया है। पूरा लेख उनके फेसबुक पेज पर है, महाराजश्री से जुड़ा प्रसंग यहां शेयर कर रहा हूं-
सादर🙏🏻
पुखराज
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श्री हेमंत शर्मा जी के लेख का अंश-
मुझे आज तक यह नहीं समझ आया की मकर संक्रांति का पतंग बाजी से क्या सम्बन्ध हैं. मेरी जान मकर संक्रांति पर पतंग में लटकी रहती थी. मुझे पतंग उड़ाना नहीं आता था. मैं दूसरों की उड़ायी पतंग पर ही हाथ आज़माता था. पतंग की बात आते ही मुझे एक ऐसे व्यक्ति की याद आती है जो आज बहुत बड़े आध्यात्मिक व्यक्ति हैं. ये व्यक्ति हमारे लिए पतंग लूटते थे. जीवन में कुछ ऐसे लोग होते हैं जो आप के जीवन में गहरे धँसे होते है. कहानी दिलचस्प और रोमांचक है. देश में रामजन्मभूमि आन्दोलन चरम पर था. विश्व हिन्दू परिषद और साधु संतों ने प्रधानमंत्री नरसिंह राव को चारों तरफ़ से घेर लिया था. नरसिंह राव मंदिर को लेकर नरम थे. वे मंदिर बनवाना तो चाहते थे मगर विश्व हिन्दू परिषद को अलग थलग करके. इसके लिए नरसिंह राव ने चन्द्रास्वामी से मिलकर एक सरकारी न्यास बनवाने का फ़ैसला लिया. इस न्यास में ऐसे संत रखे जाने थे जो विश्व हिन्दू परिषद के मुख़ालफ़ी थे.
इस योजना में सरकार समर्थित नया ट्रस्ट बना. उसका नाम रामालय ट्रस्ट रखा गया. और उसके अध्यक्ष बने जगतगुरू रामानन्दाचार्य रामनरेशाचार्य. रामनरेशाचार्य रामानन्दी पीठ के सर्वोच्च गुरू थे. इनका मुख्यालय बनारस के पंचगंगा घाट का श्रीमठ था. चौदहवीं शताब्दी में इसी मठ में संत रामानन्द रहते थे. जब उन्होंने कबीर को शिष्य बनाने से मना कर दिया था तो कबीर इन्हीं घाट की सीढ़ियों पर लेट गए थे. रात के अँधेरे में, रामानन्द के पॉंव कबीर की छाती पर पड़ा और उनके मुँह से निकला राम राम. बस कबीर ने इसी को गुरू मंत्र मान लिया.
रामनरेशाचार्य उन्हीं रामानंद की पीठ पर आसीन है. रामनरे़शाचार्य के रामालय ट्रस्ट का अध्यक्ष बनते ही लगा कि सरकार मंदिर बनवा देगी. और आन्दोलन विहिप और संघ के हाथ से चला जाएगा. रामानन्दाचार्य की पीठ सगुण राम भक्ति शाखा की सर्वोच्च पीठ है. देशभर में सबसे ज़्यादा साधु इसी सम्प्रदाय के हैं. इनके साधु को बैरागी कहते है. रामानन्द ही रामभक्ति धारा को समाज के निचले हिस्से तक ले गए. यह उन्हीं की घोषणा थी कि “जात पात पूछे नही कोई, हरि का भजे से हरि का होई“. उन्हीं के १२ प्रमुख शिष्यों ने उनका सम्प्रदाय चलाया जिसमें सभी जाति वर्ग के लोग थे. इनमें योगानन्द (ब्राह्मण ) पीपा (क्षत्रिय) कबीर (जुलाहा), रैदास(चमार), सेना(नाई), और धन्ना(धोबी) थे. रामानन्दाचार्य ने सामाजिक तौर पर ये क्रांतिकारी व्यवस्था 14वीं शताब्दी में ही दे दी थी.
केन्द्र सरकार इस ट्रस्ट को ज़मीन सौंपने के लिए अध्यादेश की तैयारी करने लगी. यह नरसिंह राव का मास्टर स्ट्रोक था. लगा अब यह आन्दोलन संघ परिवार के हाथों से गया. मैं रामजन्मभूमि आन्दोलन कवर करने वाला अगली पंक्ति का रिपोर्टर था. इस दौरान रामनरेशाचार्य से कई दफ़ा फ़ोन से तो बात हुई पर मैं इससे पहले उनसे मिला नही था. जनसत्ता के लिए उनका एक इंटरव्यु लेना था. फ़ोन पर तय हुआ की बनारस के पंचगंगा घाट पर श्रीमठ में हम मिलेंगे.
मैं लखनऊ से बनारस पहुँचा. पंचगंगा घाट के मठ में वे थे नहीं. मुझसे कहा गया बैठ जाइए वे आने वाले हैं. तब तक शिष्यों ने मुझे बाबा जी की गद्दी, चारपाई, कमरे, खड़ाऊँ सब जगह सिर नवा दिया था. तभी एक शिष्य ने कहा महाराज जी आ रहै हैं. मैने देखा गंगा में दो स्टीमर आ रहे है. महाराज उस पर लाव लश्कर के साथ सवार हैं. मैं नीचे घाट पर आ गया. महाराज मोटरवोट से उतरे. किसी ने उनके कान मे धीरे से कहा दिल्ली से आए हैं शर्मा जी. स्वामी रामनरेशाचार्य ने मुझे कहा आइए. वे आगे बढ़े ही थे कि फिर मुड़े और मेरी आँख मे झॉंक कर देखा. मेरे भीतर बिजली सी कौंधी. उन्होने बड़े धीरे से कहा ‘छोटू जी’. मैं आश्चर्यचकित. मैंने कहा ‘छोटा बाबा’. वो मेरे गले लग गए. शिष्यगण अचरज में भरत मिलाप सा दृश्य देख रहे थे. ये हुआ क्या? मुझे बीस बरस बाद छोटा बाबा मिले थे. बचपन में हम साथी थे. वे मेरे लिए पतंग लूटते थे. सलीम जावेद की किसी फ़िल्म के दृश्य की तरह वे मेरा हाथ तेज़ी से पकड़े सीढ़ियाँ चढ़ रहे थे. लग रहा था कहीं मैं फिर से न बिछड़ जाऊँ.
ऊपर पहुँचते ही हम दोनों एक कमरे में. बाहर से किसी के आने पर पाबन्दी. हम दोनों एक दूसरे को अपनी अपनी जीवन यात्रा सुना रहे थे. छोटा बाबा ने बताया कैसे न्याय दर्शन में एमए करने के बाद वे इस सम्प्रदाय के गुरू के शिष्य बने. और मठ के गुरू ने उन्हें अपनी गद्दी सौंपी. उन्होंने कहा, एमए करते वक्त मैं आपकी माता से मिलने कभी कभी पियरी जाता था. एकदम से पूछा माता जी कैसी है? मैने कहा अब वो नही हैं. चार महीने पहले ही गयीं. वे रोने लगे. मैने किसी साधु को पहली बार रोते देखा. छोटाबाबा ने कहा घर चलूंगा. मैंने कहा पहले इण्टरव्यु हो जाए. उन्होंने कहा नहीं पहले घर चलेंगे.
रास्ते में छोटाबाबा और मेरे रिश्तों की फ़िल्म चलने लगी. मैं चौथी पाँचवीं में पढ़ता था. मेरे घर के सामने ही रामानन्द सम्प्रदाय का एक मठ था. वहां संस्कृत के कुछ विद्यार्थी रहते थे. उनकी छत बड़ी थी. उस पर आने वाली सारी पतंगें मेरी होती थी क्योंकि मठ के बड़े बाबा जी मुझे बहुत स्नेह करते. बाबाजी मुझे ढेर सारा प्रसाद, चूड़ा दही खिलाते, पतंग देते और हम उन्हें अपनी छत से उड़ाते. मुझे तो उड़ाने आता नहीं था. उड़ाते मेरे बड़े भाई थे. मैं तो केवल ‘भक्काटा’ कह माहौल बनाता था. अद्धा, बद्धा, कंठा, छड़ीला, चांदतारा, करियवा, पोछिल्ला, ये पंतग के सम्प्रदाय थे और माँझा, बध्दी, नख डोर की प्रजाती. हो-हल्ला कर माहौल बनाना मेरा काम था. मठ में सारे बड़े बाबाजी थे. केवल एक बालक था जो मुझसे दो चार साल बड़ा होगा. उसे मैं छोटाबाबा कहता था. छोटा बाबा ठीक सामने वाले कमरे में रहते थे. सिर घुटा हुआ. एक वस्त्र पहनते थे. एक ओढ़ते थे. देखने मे बड़ा रोचक सा ‘स्माल’ बाबा. मुझे उन्हे देखकर ही रोमांच पैदा होता था.
अकसर जब छोटाबाबा तल्लीनता से पढ़ रहे होते तो मेरी बात नहीं सुनते थे.फिर मै उसके कमरे में ढेला फेंकता. कई बार उन्हें लगा भी. उन्होंने माता जी से शिकायत की. मैंने कहा पतंग नहीं देते. अम्माँ डाँटती थी- "तुम सोचो अपना घर द्वार छोड़कर अकेले रह रहा है. बच्चा है. तुम उसको परेशान करते हो. छोटाबाबा मेरी मॉं का बड़ा प्रिय था. वह अकसर उन्हें भोजन कराती. दान पुण्य के सामान देती. और वस्त्रों का इन्तजाम भी करती. पूर्णिमा और अमावस्या के दिन तो छोटा बाबा के लिए विशेष भोजन बनता था. मुझे लगता है माता कभी कभी उन्हें कुछ पैसे भी देती थी. बस अम्मा का एक ही आग्रह होता बेटा पढ़ के घर लौट जाना. बाबा मत बनना. अभी बच्चे हो, अपना घर बसाना. इन बाबाओं के चक्कर में मत पड़ना. ये तुम्हें साधु बना देंगे. तुम सिर्फ़ इस मठ का पढ़ाई के लिए इस्तेमाल करो. यह सोचते सोचते हम घर आ गए थे.
बाबा जी घर में दाख़िल. पिता जी को देखते ही उन्होंने प्रणाम किया. मैंने उन्हें बताया- ये छोटाबाबा हैं. पापा भी आश्चर्य से उन्हें देख रहे थे. अम्मा के कमरे में पहुँचते ही वे फूट फूटकर रोने लगे. कहा, मैं तो अपनी मॉं का प्यार जानता नहीं था. यही मेरी माँ थी. छोटू जी आपको पता नहीं होगा, मुझे वो पैसे भी देती थीं. आज मैं जो भी हूँ उन्हीं की वजह से हूँ. नहीं तो मैं पढ़ नहीं पाता. वापस लौट जाता अपने गांव. मैंने कहा, महाराज छोड़िए. हर संत का अतीत होता है. इसलिए मैं यह क़िस्सा भी न सुनाता.
पर पिताश्री की किताबों के एक कार्यक्रम में उन्होंने यह क़िस्सा स्वयं सुनाया. पिताजी की तीन किताबों का लोकार्पण बनारस में था. राजनाथ सिंह, मुरली मनोहर जोशी केन्द्रीय मंत्री थे. मुलायम सिंह मुख्यमंत्री थे. ये सब मंच पर मौजूद थे. मंच पर कांग्रेस नेता देवेन्द्र द्विवेदी जी और विद्यानिवास मिश्र भी थे. रामनरेशाचार्य जी समारोह की अध्यक्षता कर रहे थे. उसी समारोह में उन्होंने ख़ुलासा किया. “आज हेमन्त जी राजनीति में बड़े बड़ों की पतंग उड़ाते हैं. बचपन में मैं इनकी पतंग लूटा करता था. यह बात किसी को पता नहीं है.” फिर उन्होंने पूरी कहानी सुनाई. लोग हतप्रभ थे. इस घटना के बाद छोटाबाबा पिताजी से नियमित मिलते. पिताजी की ख़ातिर उन्होंने सामने वाले मठ को फिर से तुड़वाकर बनवाया. मेरे छोटाबाबा आज परमआदरणीय जगतगुरू रामानन्दाचार्य रामनरेशाचार्य हैं. देश के सबसे ज़्यादा साधू वाले सम्प्रदाय जिसके तहत निर्मोही अखाड़े के सर्वोच्च गुरू.
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