Temples of kashi

Temples of kashi काशी के मंदिरों की विवेचना विशेषतया काशी खण्डोक्त मंदिरो की 🙏🏻

 #त्रिसंध्येश्वर_महादेव         #काशी_खंडोक्त  त्रिसन्ध्यं        वै   तीर्थं    त्रिसंध्येश्वरपूर्वतः  ।तत्र तिर्थे नरः...
04/06/2026

#त्रिसंध्येश्वर_महादेव #काशी_खंडोक्त

त्रिसन्ध्यं वै तीर्थं त्रिसंध्येश्वरपूर्वतः ।
तत्र तिर्थे नरः स्नात्वा कृत्वा संध्या विद्यानतः।।
त्रिसन्धेश्वरमालोक्य कृतसंध्यास्त्रिकालतः ।
त्रिवेदावर्तजं पुण्यं प्राप्नुयाच्छ्रद्ध्या द्विजः।।
( #काशीखण्ड)

काशी मे त्रिसंध्येश्वर महादेव के पूर्व की ओर त्रिसंध्यतीर्थ है। यहां स्नान कर के विधानपूर्वक जो भी मनुष्य संध्यावन्दन करता है, वह संध्योपासन कर्म के काललोप होने के पापों से छूटा रहता है।
द्विज(ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य)त्रिकाल मे संध्योपासन करके श्रद्धापूर्वक त्रिसंध्येश्वर के दर्शन करने से तीनों वेदों के अध्यन करने का पुण्य प्राप्त करता है।
त्रिसंध्यतीर्थ कुंड का अस्तित्व अब पता नही लगता पर उपरोक्त प्रमाण के अनुसार द्विज (अर्थात तीनों वर्ण ब्राह्मण, क्षत्रिय एवं वैश्य) को नित्य संध्या वंदन करना आवश्यक है। (लोकमत के अनुसार त्रिसंध्येश्वर का नित्य दर्शन करने से नित्य संध्या करने का फल मिलता है)

पता- श्री काशी विश्वनाथ मंदिर कोरिडोर मे त्रयम्बक हाल के पास। वाराणसी।

 #विमलेश्वर_महादेव      #काशी_खंडोक्त 68 अड़सठ शैव आयतन के शिव लिंग विश्वस्थानादिहायातं लिङ्ग वै विमलेश्वरं  ।स्वर्लीनात्...
03/06/2026

#विमलेश्वर_महादेव #काशी_खंडोक्त

68 अड़सठ शैव आयतन के शिव लिंग

विश्वस्थानादिहायातं लिङ्ग वै विमलेश्वरं ।
स्वर्लीनात्पश्चिमे भागे दृष्ट विमलसिद्धिदम् ।।
विमलेशश्च कुण्डं च ब विमलोदकम् ।
तत्र स्नात्वा कुण्डे नरः स्नातो भुवनेशोभवेन्नरः।।
तत्र स्नात्वा विलोक्येशं विमलो जायते नरः।
तत्र पशुपतः सिद्धः त्रयम्बको नाम नामतः ।।
( #काशीखण्ड)

विश्वस्थान से विमलेश्वर नामक शिव लिंग नंदी जी के आग्रह पर काशी मे आये हुवे है, इनका स्थान स्वरलीनेश्वर शिव लिंग के पश्चिम भाग मे है और यह विमल सिद्धि को देने वाले हैं।
विमलेश्वर शिव लिंग के पास विमलोदक कुंड भी है उसमे स्नान करके विमलेश्वर का दर्शन करने से भी मनुष्य विमल हो जाता है। इसी स्थान पर त्रयम्बक नामक एक शैव(शिव भक्त) सिद्ध हो गए थे (अर्थात इसी शरीर से उन्होंने रूद्र लोक को प्राप्त किया था )
सभी लोगों को मानसिक मल के शांति के लिए एवं विमलता के लिए यहां दर्शन पूजन अवश्य करना चाहिए।
विमलोदक कुंड सम्भवतः लुप्त है और यह थोड़ा दूर ओम्कारेश्वर महादेव के पास था और नौगुटूरी गढ़ही नाम से लोग इसको जानते थे पर अब तत्काल मे इसका भी पता नही चलता।

पता -(प्रचलित नाम नीलकंठ महादेव )नया महादेव मोहल्ला a10/47 प्रह्लाद घाट के पास वाराणसी।

 #किरातेश्वर_महादेव        #काशी_खंडोक्त  #शिव_गण किरात द्वारा स्थापित लिंग किरातेन किरातेशं लिङ्गं काश्यां प्रतिष्ठितम्...
01/06/2026

#किरातेश्वर_महादेव #काशी_खंडोक्त

#शिव_गण किरात द्वारा स्थापित लिंग

किरातेन किरातेशं लिङ्गं काश्यां प्रतिष्ठितम्।
केदारादक्षिणे भागे भक्तानामभयप्रदम्॥
( #काशीखंड)

किरात नामक गण ने काशी में #गौरीकेदारेश्वर महादेव के दक्षिण भाग में भक्तों को अभय देने वाले किरातेश्वर नामक लिंग को प्रतिष्ठित किया है।
इस लिंग की पूजा से व्यक्ति भय रहित, निडर एवं निर्भीक होजाता है।

#शिव जी के आज्ञावस काशी मे दिवोदास के राज्य में खोट निकालने हेतु जब शिव गण किरात जी काशी आए तो वह भी शिवकार्य में असफल होकर काशी की महिमा को देख वह शिव आराधना में लीन होकर काशी के केदार घाट (श्री विद्यामठ के नीचे) पर एक शिवलिंग स्थापित कर शिव तपस्या में लीन हो गए और अभी तक काशी मे ही रह कर यहां शिव पूजा मे संलग्न हैं।

काशी मे किरात नाम से दो लिंग है काशी खंडोक्त तोह हैं पर दोनों लिंगों का इतिहास अलग अलग है।

पता - केदार घाट के बगल मे श्री विद्यामठ के निचे घाट पर गंगा तट पर मढी मे यह विशाल लिंग स्थापित है।

 #कालंजरेश्वर_महादेव       #काशी_खंडोक्त #शिवउवाचनरो    दृष्ट्वा   लिङ्गं        कालंजरेश्वरम् ।जरां कालं विनिर्जित्य मम...
30/05/2026

#कालंजरेश्वर_महादेव #काशी_खंडोक्त

#शिवउवाच
नरो दृष्ट्वा लिङ्गं कालंजरेश्वरम् ।
जरां कालं विनिर्जित्य मम लोके वसेच्चिरम्।।
( #काशीखण्ड्)

शिव जी माता पार्वती से कहते हैं कि
काशी मे कालंजरेश्वर नामक लिंग का दर्शन करने से मनुष्य #जरा (बीमारी अथवा बुढ़ापा)और #काल (मृत्यु अथवा समय) को जीत कर मेरे लोक (शिवलोक) मे बहुत दिनों तक वास करता है।
काशी खण्ड के अनुसार यह लिंग शिवलोक मे वास देने वाला बताया गया है और काशी के केदारखण्ड के अंतर्गृह के अंतर्गत मे यह लिंग आता है।

पता-13/98 इंद्रद्युमेश्वर महादेव के बगल मे , नमक विक्रेता गुप्ता जी के घर मे, कूच बिहार,काली बाड़ी के पीछे, मदनपुरा, वाराणसी।

 #काशी_महिमा एकां गां यत्र दत्वा वै विधिवद् ब्राह्मणाय वै।लभेदयुतगोपुण्यं कस्तां काशीं त्यजेत्सुधीः।।                   ...
28/05/2026

#काशी_महिमा

एकां गां यत्र दत्वा वै विधिवद् ब्राह्मणाय वै।
लभेदयुतगोपुण्यं कस्तां काशीं त्यजेत्सुधीः।।
( #काशीखण्ड्)

जिस स्थान (काशी) मे विधि पूर्वक ब्राह्मण को एक भी गोदान करने से दश सहस्त्र(10000) गोदान का पुण्यलाभ होता है, उस काशी का कौन बुद्धिमान त्याग करेगा? अर्थात ऐसी पुण्य एवं मुक्ति मयी काशी का कभी भी त्याग नही करना चाहिए।

 #शंकुकर्णेश्वर_महादेव    #काशीखण्डोक्त शिवगण द्वारा स्थापित लिङ्ग शङ्कुकर्णेश्वरम्  लिङ्गं शङ्कुकर्णगणर्चितं ।दृष्ट्वा ...
28/05/2026

#शंकुकर्णेश्वर_महादेव #काशीखण्डोक्त

शिवगण द्वारा स्थापित लिङ्ग

शङ्कुकर्णेश्वरम् लिङ्गं शङ्कुकर्णगणर्चितं ।
दृष्ट्वा न जायते जन्तुर्जातु मातुमर्होदरे ।।
संपूज्य न विशेदत्र घोरे संसार सागरे ।
संसेव्यं परमं ज्ञानं लभेदद्याऽपि साधकः ।।
( #काशीखण्ड)

शंकुकर्ण गण के द्वारा स्थापित एवं पुजित शंकुकर्णेश्वर शिवलिंग के दर्शन करने से कोई भी जन्तु कभी माता के जठर (पेट अथवा गर्भ) मे नही जाता। कोई भी व्यक्ति यदि शंकुकर्णेश्वर महादेव का पूजन करता है तोह वह मनुष्य इस घोर संसार सागर मे नही पड़ता।
शंकुकर्णेश्वर लिङ्ग की आराधना करने से आज भी साधक परम ज्ञान को प्राप्त करता है।
(परम ज्ञान प्राप्त करना ही मुक्ति का साधन बताया गया है)काशी खण्ड के अनुसार आज भी शंकुकर्ण गण काशी को बिना छोड़े अपने द्वारा स्थापित लिंग की पूजा करते हैं।

काशीखण्ड के अध्याय 53 के प्रमाण से शंकुकर्ण गण को महादेव गणेश एवं कार्तिक जैसा पुत्रवत मानते हैं। और योगिनीगण, सूर्य और ब्रह्मा के बाद सबसे पहले शंकुकर्ण गण एवं अन्य गणों को भी काशी भेजते हैं। जिसमे की सभी गण काशी की महिमा को देख कर अपने नाम से शिवलिंग स्थापित करने के बाद काशी मे ही रुक जाते हैं।

पता - b22/120 शंखुधारा पोखरा,, खोजवा, (कमच्छा से विनायका) के पास वाराणसी।

Mahadev

 #नैऋतेश्वर_महादेव      #काशीखण्डोक्त (दूसरा नाम   #मरूकेश्वर_महादेव)नंदी जी के आग्रह पर अड़सठ (68)शैव आयतन के अंतर्गत आन...
27/05/2026

#नैऋतेश्वर_महादेव #काशीखण्डोक्त

(दूसरा नाम #मरूकेश्वर_महादेव)
नंदी जी के आग्रह पर अड़सठ (68)शैव आयतन के अंतर्गत आने वाला लिंग।

लङ्कापुर्याः समागच्छन् मरुकेश्वर संज्ञकम् ।
लिङ्गं यदचर्नात्पुंसां न भयं रक्षसां भवेत् ।।
नैऋत्यां दिशि तल्लिङ्ग्गं नैऋतेश्वर संज्ञकम् ।
( #काशीखण्ड्)

लंकापूरी से मरूकेश्वर नामक लिंग अपने स्थान से, यहां नंदी जी के आग्रह पर काशी आये हैं।
इनके पूजन से लोगो को राक्षसादि का भय नही होने पाता।
नैऋत्य दिशा मे रहने से वह लिंग नैऋतेश्वर नाम से पुजित होने से सब दुष्टों के संहारक प्रसिद्ध है।

काशी खण्ड के बारहवे अध्याय के अनुसार परद्रोह से पराङ्गमुख राक्षस लोग ही नैऋत्य लोक मे निवास करते है। यहां के निवासी जाति मात्र से तोह राक्षस होते है पर सदाचार द्वारा धार्मिक होते हैं।
पूर्व काल मे पिंगाक्ष नामक राक्षस कुल का मुखिया जो विन्ध्याचल मे रह कर सदा ही काशी जाने वाले एवं अन्य तीर्थयात्रियों की दुसरो राक्षसो से रक्षा करता था। रक्षा करते समय युद्ध मे प्राण जाने के कारण से पिंगाक्ष को शिव कृपा से अगले जन्म मे नैऋत्य(दक्षिण) दिशा का दिक्पाल बना दिया गया।
इससे तोह यही पता लगता है कि परोपकार (दुसरो की भलाई करना)हमेशा ही फलित होता हैं।

पता = D32/107 पुष्पदंतेश्वर मंदिर के पीछे के ओर बंगाली टोला के पास मदनपूरा रोड वाराणसी।

 #शिव_लिंग_तथा_मूर्ति_का_तात्पर्यशास्त्रीय प्रमाणों के अनुसार शिव लिंग सर्वव्यापी ब्रह्म का ही स्वरुप है।  #भक्तेच्छोपात...
13/04/2026

#शिव_लिंग_तथा_मूर्ति_का_तात्पर्य

शास्त्रीय प्रमाणों के अनुसार शिव लिंग सर्वव्यापी ब्रह्म का ही स्वरुप है।
#भक्तेच्छोपात्तविग्रहः एस शास्त्रीय वचन के अनुसार भक्तो के कल्याण के लिये तथा भक्तो के हृदय मे संतोष देने के लिये निर्गुण(निराकार-बिना रूप वाले ) ब्रह्म(शिव) सगुण(साकार-रूप वाले )होकर डमरु त्रिशूल आदि धारण करके साकार मूर्तिमान रूप मे प्रकट होते है, और भक्तों के कष्टों को दूर करते है।
लेकिन शिव जी के इनदोनो स्वरुपों मे शिव जी की मूर्ति की अपेक्षा शिव लिंग के पूजन का महत्व अधिक है। क्युकी शिव लिंग व्यापक ब्रह्म का और समस्त ब्रह्माण्ड का स्वरुप है, तथा मूर्ति परिछिन्न(एक स्थान एक देशीय) मे रहने वाले शिव जी का स्वरुप है। इसका प्रमाण शिवपुराण, स्कन्दपुराण, महाभारत आदि ग्रंथो मे मौजूद है।

#लिङ्गं वेरं चमे तुल्यं भजतां लिङ्गमुत्तमम् ।
तस्मालिङ्ग परं पूज्यं वेरादपि मुमुक्षुभिः ।।
( #शिवपुराण)

शिव जी स्वयं कहते है कि मेरी मूर्ति और शिव लिंग दोनों बराबर हैं, फिर भी भक्तों के लिए शिवमूर्ति की अपेक्षा शिवलिंग उत्तम है। क्युकी शिवलिंग पूजन से मूर्ति पूजने की अपेक्षा ज्यादा पुण्य होता है।

प्रतिमायां प्रयत्नेन कतया साङ्गपूजया ।
यत्फ़लम् तत्फ़लम् प्राप्य व्यंगया लिङ्ग पूजया।।
( #शिवरहस्य)

विधिपूर्वक प्रयत्न से शिव जी की मूर्ति की पूजा करने से जो फल होता है वही फल शिवलिंग पूजा से साधारण रूप से अथवा कुछ कमी के साथ पूजा करने से प्राप्त होता है।

#लिङ्गं देवि महा देवि लिङ्गं साक्षान्महेश्वरः

शिव लिङ्ग मे देवि अर्थात पार्वति माता आदि समस्त देवियां और महादेवी अर्थात आदि शक्ति महामाया का भी स्वरुप है, एवं महेश्वर शिव का भी स्वरुप है और लिंग के मूल मे ब्रह्मा, मध्य मे विष्णु और अग्रभाग मे प्रणव स्वरुप सदाशिव स्थित हैं।

हे प्रभु! ज़ब समुद्र मंथन हुआ तब अन्य मूल्यवान रत्नो के साथ महाभयानक कालकुट विष निकला, जिससे समग्र सृष्टि का विनाश हो सकत...
11/04/2026

हे प्रभु! ज़ब समुद्र मंथन हुआ तब अन्य मूल्यवान रत्नो के साथ महाभयानक कालकुट विष निकला, जिससे समग्र सृष्टि का विनाश हो सकता था। पर आपने सबपर बड़ी कृपा करने के लिए सबके हितार्थ उस विष का पान(पी लिया)किया।
उसी विष पान के कारण आपके कंठ मे नीला चिन्ह हो गया जिससे आप नीलकंठ कहलाये।
क्या इस चिन्ह से आपके स्वरुप मे कोई कमी आई.... बिलकुल भी नही.. इस चिन्ह से आपकी सुंदरता (आपके कंठ की सोभा)और बढ़ ही गयी 🙏🏻
वास्तव मे जो दूसरों के दुख को दूर करता है उसमे कोई विकार भी हो तोह वह उसकी सुंदरता बन जाता है एवं वह पूजा का पात्र बन जाता है।
सबकी रक्षा करने वाले सदाशिव की जय हो 🙏🏻🙏🏻
नमः पार्वती पतये हर हर महादेव 🌹🌹

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