05/05/2023
कहते हैं - उस समय कोई दूसरा नहीं था I बस वही था- ऊपर-नीचे , आगे-पीछे , दायें-बाएं I ऐसा भी कह सकते हैं की ऊपर-नीचे नाम की कोई चीज़ हीं नहीं थी I अभी दिशाएं और काल का निर्माण नहीं हुआ था I केवल वही परमात्मा था ठसाठस I
उस निर्गुण-निराकार को इच्छा हुई की मैं एक हूँ I बहुत हो जाऊं I उसने फिर अपने आप को शिव-शक्ति के रूप में लाया I पर वह प्रकट ना हुआ I प्रकट होने के लिए, कोई जानने वाला भी तो चाहिए I अकेले - अकेले कौन किसको जानेगा I वह परमात्मा सगुण तो हुआ,इच्छा आदि गुण तो उसमें आया, पर अभी आकार नहीं था , क्योंकि आकार को जानने वाला कोई नहीं था I
उस अप्रकट - निराकार शिव-शक्ति ने दो चेतन तत्व –प्रकृति-पुरुष, स्त्री -पुरुष के एक जोड़े को प्रकट किया I अब इस रूप में वह परमात्मा निराकार से साकार हो गया I जो अप्रकट था वह प्रकट तो हुआ पर “बहु” न हुआ , अनेक न हुआ I उस सृष्टि में इन्द्रधनुष न था, विभिन्न रंग न थे I उसमें अनेकों ध्वनियाँ न थी, राग न थे I स्वाद की विविधता नहीं था I और तो और प्रकाश भी नहीं था I गरमाहट नहीं थी I
उन स्त्री -पुरुष के जोड़े को शिव ने तपस्या करने को कहा ताकि सृष्टि का विस्तार कर सके I सृष्टि में कुछ प्रकाश हो, उसमें कुछ राग-रंग-स्वाद हो I
प्रकृति-पुरुष को तपस्या करना था I परन्तु तपस्या करें तो कहाँ करें I पृथ्वी तो दूर आकाश भी नहीं था I ठोस तो क्या कोई तरल भी नहीं था I जब कुछ भी नहीं था तो आधार कहाँ ? कहाँ बैठे? कहाँ स्थित होकर तपस्या करें?
इस समस्या को देखते हुए उस शिव का प्रकाश पांच कोस में प्रकाशित हुआ I जब दूसरा कुछ था हीं नहीं तो बनाये किस चीज़ से ? जैसे मकड़ी अपने हीं शरीर के लार से अपना जाल बनाती है उसी तरह परम शिव ने अपने हीं से पांच कोस लम्बा -चौड़ा नगर बनाया I उस नगर में तेज था , प्रकाश था, चमक थी, इसीलिए उसे “काशी” कहा गया I “काश्” मतलब चमकना I काशी चमकने वाली I प्रकाश वाली I
काशी उस अप्रकट शिव का मानो शरीर हीं है I जो सगुण -निराकार था, गुण तो था -आकार नहीं था उसने आकार धर लिया I उसका आकार था -काशी नगरी I
“शिवः काशी, शिवः काशी , काशी काशी, शिवः शिवः” - शिव और काशी दोनों में एक हीं विभक्ति है I दोनों में अभेद हैI जो शिव है वही काशी है, जो काशी है वही शिव है I शिव का वपु -शरीर है काशी I शरीर और शरीरी-शरीरवाले में कोई भेद नहीं I दोनों एक है