Varanasi-Kashi Swaprakashika

Varanasi-Kashi Swaprakashika ॥ काशी - काश् - प्रकाश - चमकनेवाली- ज्ञान ॥
॥ शिवः काशी शिवः काशी काशी काशी शिवः शिवः ॥
॥ शिव हीं काशी और काशी शिव हीं हैं॥

यत्र मुक्तिरखिलैस्तु जन्तुभिः लभ्यते मरण मात्रतः शुभा ।  साऽखिलामरगणस्पृहणी विश्वनाथनगरी गरीयसी ॥जहाँ मरने मात्र से हीं ...
15/07/2024

यत्र मुक्तिरखिलैस्तु जन्तुभिः लभ्यते मरण मात्रतः शुभा । साऽखिलामरगणस्पृहणी विश्वनाथनगरी गरीयसी ॥

जहाँ मरने मात्र से हीं सभी जंतुओं को शुभ मुक्ति मिल जाती है , वह देवताओं के लिए भी अत्यंत स्पृहणीय, विश्वनाथ की नगरी महान है ।

By Mere Death Where Every Creature Ultimately Attains Moksh, This Land Of Vishwanath 'Kashi Is Extremely Excellent & Is Very Dear To (even) All Gods

Photo Credit :- Panchakot Raj Palace

16/05/2023

सानन्दमानन्दवने वसन्तमानन्दकन्दं हतपापवृन्दम् I
वाराणसीनाथमनाथनाथं श्रीविश्वनाथं शरणं प्रपद्ये II
"जो आनन्द-सहित आनन्दवन (काशी) में वास करते हैं, जो आनन्द के कंद (घनीभूत आनन्द अथवा आनन्द के मूल) हैं, जो पापों के समूह को समाप्त करने वाले हैं, जो वाराणसी के नाथ हैं , जो अनाथों के नाथ हैं , ऐसे श्रीविश्वनाथ जी का मैं शरण मैं जाता हूँ II
🙏

मानव शरीर का प्रारूप पृथ्वी और  ब्रह्माण्ड जैसा है I  मानव शरीर में  तत्वों का समीकरण जैसा है वैसा हीं पृथ्वी में भी है ...
07/05/2023

मानव शरीर का प्रारूप पृथ्वी और ब्रह्माण्ड जैसा है I मानव शरीर में तत्वों का समीकरण जैसा है वैसा हीं पृथ्वी में भी है और वैसा हीं ब्रह्माण्ड में भी है I जैसे ठोस-जल अग्नि -वायु - आकाश जिस आपस में जिस मात्रा में , जिस अनुपात में पुरे ब्रह्माण्ड में हैं, उसी तरह पृथ्वी में भी है और उसी तरह मानव शरीर में भी है I ब्रह्माण्ड में जो कुछ भी है उसका तत्स्थानी वस्तु पृथ्वी पर भी है और मानव शरीर में भी I

जैसे :- ब्रह्माण्ड में गंगा , आकाशगंगा नाम से दिव्य जल रूप है I पृथ्वी पर गंगा गंगोत्री से गंगासागर तक प्रवाहित जल का नाम है I मानव शरीर में गंगा इडा नामक नाड़ी है I जो आकाश में स्थित गंगाजी हैं वह देवताओं के लिए हैं I पृथ्वी पर वाली गंगाजी में हम तीर्थ यात्रा-स्नान आदि करते हैं I मानव शरीर में जो इड़ा नाड़ी नामक गंगाजी हैं उसका योग-अभ्यास से ज्ञान होता है I

जितने भी हमारे तीर्थ स्थान हैं जैसे वृन्दावन, कैलाश , बद्री-वन आदि सभी अपने दिव्य स्वरुप में ब्रह्माण्ड में हैं, भौतिक स्वरुप में पृथ्वी पर हैं और सूक्ष्म स्वरुप में हमारे शरीर में हैं I

वाराणसी भी दिव्य स्वरुप में ब्रह्माण्ड में है, भौतिक स्वरुप में पृथ्वी पर है और सूक्ष्म स्वरुप में मानव शरीर में है I

वाराणसी किस रूप में हमारे शरीर में हैं ?

भौतिक रूप से पृथ्वी पर स्थित वाराणसी के दक्षिण सीमा पर असी नदी बहती है और उत्तर सीमा पर वरुणा नदी है I वाराणसी के पूर्व दिशा में गंगाजी हैं I इस तरह तीन ओर नदियों से घिरा हुआ मध्य का यह क्षेत्र वाराणसी है -वरुणा और असी के मध्य का क्षेत्र - वरुणा + असी = वाराणसी I

इसमें असी नदी इड़ा नाड़ी है I वरुणा नदी पिंगला नाड़ी है I इस दोनों के बीच में स्थित जो सुषुम्ना नाड़ी है वह चमकता हुआ प्रकाशमान काशी-वाराणसी है I
योग द्वारा इड़ा-पिंगला के मध्य सुषुम्ना नाड़ी में स्थित होकरजो प्राण त्याग करता है वह मुक्त है I जो यह योग करने में असमर्थ है वह भी, यदि इसी भौतिक काशी में भी प्राण त्याग करता है तो उसका पुनर्जन्म नहीं है I दोनों में कोई भेद नहीं I

पुरे विश्व में जब कोई भी हिन्दू पूजा-पाठ  करता है तो सबसे पहले वह संकल्प करता है I संकल्प में वह अपने पूजा करने के  पीछे...
05/05/2023

पुरे विश्व में जब कोई भी हिन्दू पूजा-पाठ करता है तो सबसे पहले वह संकल्प करता है I संकल्प में वह अपने पूजा करने के पीछे जो इच्छा है वह व्यक्त करता है I वह किस निमित्त से पूजन कर रहा है, उसका उद्देश्य क्या है यह घोषित करता है I परन्तु यह संकल्प केवल इतने से पूरा नहीं होता की वह किस लिए पूजन कर रहा है- धन के लिए, पुत्र के लिए, सुख के लिए या ईश्वर की प्रसन्नता के लिए I

उसे यह भी बताना पड़ता है है की वह इस संकल्प को किस समय में कर रहा है I इस समय की गणना केवल दिन मास और सालों में नहीं होतीI इस समय की गणना तो सृष्टि के शुरुआत के अरबों वर्षों पूर्व से होती है जिसमें परार्ध-कल्प-मन्वन्तर-चतुर्युग-युग-सम्वत जैसे समय के माप की इकाई होती है जो सूक्ष्म होते होते योग-करण तक चला आता है जिसमें एक-एक पल का हिसाब होता है I यानि पुरे काल-प्रवाह (समय-Time) में वह किस जगह पर खड़ा है उसे यह बताना पड़ता है I

उसी तरह वह देश -स्थान या Space में किस जगह पर खड़ा है उसे यह भी बताना पड़ता है I इसमें भी उसे ब्रह्माण्ड के तमाम बड़ी दूरियों का नाम लेते हुए अंत में अपनी वर्त्तमान स्थिति (Location) बतानी होती है I

इस तरह से वह अनन्त देश और काल(Time and Space ) में अपनी वर्त्तमान स्थिति बताता है I

इसमें एक विचित्र बात यह है की अगर वह संकल्प वाराणसी में हो तो वह अपने स्थान की स्थिति बताते हुए बोलता है :- —-----अविमुक्त-वाराणसी-क्षेत्रे आनन्द-वने महाश्मशाने गौरिमुखे त्रिकंटक-विरजिते —----आदि आदि I

इसमें महाश्मशान शब्द भी आता है I भले हीं वह पूजन विवाह के लिए हो या अन्य कोई मांगलिक कार्य के लिए I यह महाश्मशान शब्द पुरे वाराणसी में कहीं पर पर भी हो- जरुर आता है I यह जरुरी नहीं की वाराणसी में जो श्मशान के लिए निर्धारित स्थान हैं वहीँ पर या उसके आसपास के स्थान पर होने वाले पूजन आदि के लिए यह शब्द आये Iयह महाश्मशान शब्द पुरे वाराणसी में कहीं पर पर भी हो- जरुर आता है I

यानि पूरा वाराणसी हीं महाश्मशान है I

सामान्यतः हम श्मशान वैसे जगह को कहते हैं जहाँ पर “श्मन्” यानि शव- “शान” शयन करता है I यानि शवों के सोने का स्थान I

तो क्या पूरा वाराणसी हीं शवों के रहने का स्थान है ? श्मशान तो अपवित्र माना जाता है I तो क्या वाराणसी भी ?

पर नहीं , यह श्मशान नहीं -” महा-श्मशान” है I

मनुष्यों या जोवों के शव को शयन करने के करण इसे “महा -श्मशान” नहीं कहा गया है I

वरन् प्रलय काल में जब सम्पूर्ण सृष्टि का हीं प्रलय हो जाता है तो सभी तत्व - पृथ्वी,जल,अग्नि,वायु और आकाश आदि महातत्व जिस आधार में शयन करते हैं, अपने लय को प्राप्त करते हैं वह महाश्मशान है यह काशी - वाराणसी I

कहते हैं -  उस समय कोई दूसरा नहीं था I बस वही था- ऊपर-नीचे , आगे-पीछे , दायें-बाएं  I  ऐसा भी कह सकते हैं की ऊपर-नीचे ना...
05/05/2023

कहते हैं - उस समय कोई दूसरा नहीं था I बस वही था- ऊपर-नीचे , आगे-पीछे , दायें-बाएं I ऐसा भी कह सकते हैं की ऊपर-नीचे नाम की कोई चीज़ हीं नहीं थी I अभी दिशाएं और काल का निर्माण नहीं हुआ था I केवल वही परमात्मा था ठसाठस I
उस निर्गुण-निराकार को इच्छा हुई की मैं एक हूँ I बहुत हो जाऊं I उसने फिर अपने आप को शिव-शक्ति के रूप में लाया I पर वह प्रकट ना हुआ I प्रकट होने के लिए, कोई जानने वाला भी तो चाहिए I अकेले - अकेले कौन किसको जानेगा I वह परमात्मा सगुण तो हुआ,इच्छा आदि गुण तो उसमें आया, पर अभी आकार नहीं था , क्योंकि आकार को जानने वाला कोई नहीं था I
उस अप्रकट - निराकार शिव-शक्ति ने दो चेतन तत्व –प्रकृति-पुरुष, स्त्री -पुरुष के एक जोड़े को प्रकट किया I अब इस रूप में वह परमात्मा निराकार से साकार हो गया I जो अप्रकट था वह प्रकट तो हुआ पर “बहु” न हुआ , अनेक न हुआ I उस सृष्टि में इन्द्रधनुष न था, विभिन्न रंग न थे I उसमें अनेकों ध्वनियाँ न थी, राग न थे I स्वाद की विविधता नहीं था I और तो और प्रकाश भी नहीं था I गरमाहट नहीं थी I

उन स्त्री -पुरुष के जोड़े को शिव ने तपस्या करने को कहा ताकि सृष्टि का विस्तार कर सके I सृष्टि में कुछ प्रकाश हो, उसमें कुछ राग-रंग-स्वाद हो I

प्रकृति-पुरुष को तपस्या करना था I परन्तु तपस्या करें तो कहाँ करें I पृथ्वी तो दूर आकाश भी नहीं था I ठोस तो क्या कोई तरल भी नहीं था I जब कुछ भी नहीं था तो आधार कहाँ ? कहाँ बैठे? कहाँ स्थित होकर तपस्या करें?

इस समस्या को देखते हुए उस शिव का प्रकाश पांच कोस में प्रकाशित हुआ I जब दूसरा कुछ था हीं नहीं तो बनाये किस चीज़ से ? जैसे मकड़ी अपने हीं शरीर के लार से अपना जाल बनाती है उसी तरह परम शिव ने अपने हीं से पांच कोस लम्बा -चौड़ा नगर बनाया I उस नगर में तेज था , प्रकाश था, चमक थी, इसीलिए उसे “काशी” कहा गया I “काश्” मतलब चमकना I काशी चमकने वाली I प्रकाश वाली I

काशी उस अप्रकट शिव का मानो शरीर हीं है I जो सगुण -निराकार था, गुण तो था -आकार नहीं था उसने आकार धर लिया I उसका आकार था -काशी नगरी I

“शिवः काशी, शिवः काशी , काशी काशी, शिवः शिवः” - शिव और काशी दोनों में एक हीं विभक्ति है I दोनों में अभेद हैI जो शिव है वही काशी है, जो काशी है वही शिव है I शिव का वपु -शरीर है काशी I शरीर और शरीरी-शरीरवाले में कोई भेद नहीं I दोनों एक है

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