संकल्प रामराज्य सेवा ट्रस्ट

  • Home
  • India
  • Varanasi
  • संकल्प रामराज्य सेवा ट्रस्ट

संकल्प रामराज्य सेवा ट्रस्ट धर्म की जय हो, अधर्म का नाश हो। प्राणियों में सद्भावना हो, विश्व का कल्याण हो। गौ माता की जय हो, गौ हत्या बंद हो, भारत अखण्ड हो....नमः पार्वतीपतये हर हर महादेव
(5)

🔸 बलात्कार-पीड़िता नारी और सनातन धर्म 🔸(एक शास्त्रीय दृष्टिकोण)यदि किसी नारी के साथ बलात्कार या शीलभंग जैसी कुत्सित एवं ...
10/06/2026

🔸 बलात्कार-पीड़िता नारी और सनातन धर्म 🔸
(एक शास्त्रीय दृष्टिकोण)

यदि किसी नारी के साथ बलात्कार या शीलभंग जैसी कुत्सित एवं दुर्भाग्यपूर्ण घटना घटित हो जाए (ईश्वर न करे), तो प्रायः समाज उसकी स्थिति को दयनीय मान लेता है।

सिनेमा और टेलीविजन में पीड़िता को ऐसा दिखाया जाता है मानो वह स्वयं कह रही हो —
"मैं अब तुम्हारे योग्य नहीं रही..."
या फिर समाज और परिवार उसका परित्याग कर देते हैं। फिर एक करुण संगीत बजता है और 'दयनीयता' का प्रदर्शन होता है।

मीडिया भी, प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से, नारी को "अबला" और "दूषित" के रूप में चित्रित करता है।
मानो उसकी पवित्रता सदा के लिए समाप्त हो गई हो।

❗ परंतु...

यह दृष्टिकोण "विधर्मी संस्कृति" का है — सनातन संस्कृति का नहीं।

🔹 सनातन धर्म की दृष्टि में नारी कभी दूषित नहीं होती।
किसी भी परिस्थिति में, वह पूज्या, आदरणीया और पूर्णतः पवित्र मानी जाती है।

🔖 धर्मशास्त्रों में स्पष्ट विधान है —

"बलात्कारोपभुक्ता वा चौरहस्तगतापि वा।
न त्याज्या दयिता नारी नास्यास्त्यागो विधीयते॥"
— स्कन्दपुराण, काशीखंड ४०/४७

"यदि कोई स्त्री बलात्कृत हो जाए या शत्रुओं के हाथ पड़ जाए, तो भी वह त्याज्य नहीं है। उसका परित्याग कदापि नहीं किया जाना चाहिए।"

"स्वयं शुद्ध्यति..."
— वसिष्ठ स्मृति (२८/२-३), अत्रि संहिता (१९५-१९७)

"ऋतुकाल आने पर स्त्री स्वयं शुद्ध हो जाती है।"
— अर्थात् वह शरीर से नहीं, मन और आत्मा से परिभाषित होती है।

🔸 अब कुछ प्रश्न उठते हैं.........
क्या टेलीविजन, सिनेमा, मीडिया आदि ने कभी यह जानने का प्रयास किया कि बलात्कार-पीड़िता के विषय में भारतीय संस्कृति की क्या दृष्टि है?

क्या उन्हें ज्ञात है कि सनातन धर्म नारी के साथ कैसी द्रष्टि रखता है?

उत्तर मिलेगा — ❌ "नहीं!"

वे केवल टीआरपी के भूखे हैं।
वे पीड़िता को “निर्भया”, “दामिनी” जैसे काल्पनिक नाम देकर उसके घाव को बार-बार कुरेदते हैं।
वास्तव में, पीड़िता को ऐसा अहसास कराया जाता है मानो वह स्वयं ही कलंकित हो।

👉 परंतु सत्य यह है —
"पीड़िता निर्दोष है, निष्कलंक है, और पूर्णतः शुद्ध है।"

🔹️ क्या होना चाहिए?
✔️ मीडिया, समाज और सरकार — तीनों को मिलकर पीड़िता को "अबला" नहीं, संघर्षशील देवी मानना चाहिए।
✔️ शास्त्रसम्मत विचारों को सामने लाकर पीड़िता और उसके परिवार को मानसिक बल देना चाहिए।
✔️ समाज को चाहिए कि धर्मशास्त्रों के अनुसार पीड़िता का पूर्ववत् सम्मान और व्यवहार करे।
✔️ और सरकार को चाहिए कि अपराधियों को शीघ्रातिशीघ्र कठोर दंड दे।

▪️"सनातन धर्म में नारी भोग्या नहीं, भगवती है।
▪️ वह परिस्थिति नहीं, परम श्रद्धा की पात्र है।
▪️ वह केवल शरीर नहीं, संस्कार है।
▪️ और संस्कार कभी अपवित्र नहीं होते।"

चराचर जगत की 'मूलशक्ति' — नारी — शुद्ध है, चिर पावन है।
[ सनातन संस्कृति की यह घोषणा है। ]

🔹 "अध्यात्म" — आत्मा में स्थित होने की विद्या 🔹"अक्षरं ब्रह्म परमं स्वभावोऽध्यात्ममुच्यते।— भगवद्गीता ८/३'अध्यात्म' का व...
10/06/2026

🔹 "अध्यात्म" — आत्मा में स्थित होने की विद्या 🔹

"अक्षरं ब्रह्म परमं स्वभावोऽध्यात्ममुच्यते।
— भगवद्गीता ८/३

'अध्यात्म' का वास्तविक आशय है — आत्मा में स्थिर होना।

जब जीव राग-द्वेष, काल, कर्म, गुण-दोष और स्वाभाविक चित्तवृत्तियों के आधिपत्य से मुक्त होकर अपने स्व-स्वरूप में स्थित होता है, तभी वह 'अध्यात्म' को स्पर्श करता है।

यह आत्मा का राज्य है — जहाँ बाहर की कोई सत्ता शासन नहीं करती।

"अध्यात्मविद्या विद्यानां वादः प्रवदतामहम्।"
— भगवद्गीता १०/३२

भगवान श्रीकृष्ण स्वयं कहते हैं —
"विद्याओं में मैं 'अध्यात्मविद्या' हूँ।"

यह केवल शास्त्रीय ज्ञान नहीं, आत्म-साक्षात्कार का विज्ञान है।
जो इसे जान लेते हैं, वे जरा-मरण, सुख-दुःख जैसे द्वन्द्वों से परे हो जाते हैं।

"जानत तुम्हहि तुम्हहि होइ जाइ।"
— रामचरितमानस

"ब्रह्मविद् ब्रह्मैव भवति।"
— उपनिषद्

जो ब्रह्म को जानता है, वह स्वयं ब्रह्मस्वरूप हो जाता है।
– यही है अध्यात्म की चरम उपलब्धि।

🔸 चलते रहो — चरैवेति! 🔸【१】राजा हरिश्चन्द्र के पुत्र रोहित से देवराज इन्द्र का वचन —"नानाश्रान्ताय श्रीरस्तीति रोहित शुश्...
10/06/2026

🔸 चलते रहो — चरैवेति! 🔸

【१】
राजा हरिश्चन्द्र के पुत्र रोहित से देवराज इन्द्र का वचन —
"नानाश्रान्ताय श्रीरस्तीति रोहित शुश्रुम।
पापो नृषद्वरो जन इन्द्र इच्चरतः सखा चरैवेति।।"

"रोहित! हमने विद्वानों से सुना है — जो श्रमपूर्वक थककर चूर हुए बिना है, उसे कोई सम्पदा नहीं प्राप्त होती।
जो व्यक्ति बैठे रहता है, पाप उसी को दबोचता है।
इन्द्र उसी का मित्र है जो सतत चलता है —
थककर, निराश होकर भी बैठता नहीं।
अतः — चलते रहो!

【२】
"पुष्पिण्यौ चरतो जङ्घे भूष्णुरात्मा फलग्रहि:।
शेरेऽस्य सर्वे पाप्मान: श्रमेण प्रपथे हताश्चरेवैति।।"

"जो व्यक्ति निरन्तर गतिमान रहता है — उसकी जाँघें पुष्पित होती हैं (सम्मानित होती हैं), आत्मा समृद्ध होती है, और वह उत्तम फलों का भागी बनता है।
उसके समस्त पाप और दोष, मार्ग की थकावट में नष्ट हो जाते हैं।
अतः — चलते रहो!

【३】
"आस्ते भग आसीनस्योर्ध्वस्तिष्ठति तिष्ठतः।
शेते निपद्यमानस्य चरति चरतो भगश्चरैवेति।।"

"जो बैठ जाता है, उसका भाग्य भी बैठ जाता है;
जो खड़ा होता है, उसका भाग्य उठने लगता है;
जो गिरकर पड़ा रहता है, उसका भाग्य भी सो जाता है;
परंतु जो चल पड़ता है — उसका भाग्य भी चल पड़ता है।
अतः — चलते रहो!

【४】
"कलिः शयानो भवति संजिहानस्तु द्वापरः।
उत्तिष्ठंस्त्रेता भवति कृतं सम्पद्यते चरंश्चरैवेति।।"

"जो पुरुष सोया रहता है, वह मानो कलियुग है;
जो अंगड़ाई लेकर उठने का प्रयास करता है, वह द्वापर में पहुँचता है;
जो खड़ा हो जाता है, वह त्रेता है;
और जो उत्साहपूर्वक अपने पथ पर चल पड़ता है — उसके सामने सतयुग प्रकट हो जाता है।
अतः — चलते रहो!

【५】
"उठकर, कमर कसकर चल देने वाले को ही मधु मिलता है।
निरन्तर चलते रहने वाला ही जीवन के मीठे फलों का रसास्वादन करता है।
सूर्यदेव को देखो — वे क्षणभर भी नहीं रुकते, निरंतर गतिशील रहते हैं।
इसी प्रकार, जीवन में चाहे वह लौकिक हो या पारमार्थिक —
पथिक को निरंतर चलते रहना चाहिए, बाधाओं से संघर्ष करते हुए आगे बढ़ते रहना चाहिए।

चरैवेति! चरैवेति!

एक बार भगवान् विष्णु क्षीर सागर में सोये थे।  स्वप्न में उन्होंने करोडों चन्द्रमा के तेज से युक्त, त्रिशूल हाथ में लेकर ...
10/06/2026

एक बार भगवान् विष्णु क्षीर सागर में सोये थे। स्वप्न में उन्होंने करोडों चन्द्रमा के तेज से युक्त, त्रिशूल हाथ में लेकर भगवान् शंकर को अपने आगे नाचते देखा।

उनको देखकर भगवान् विष्णु उठ गये तथा शिव का ध्यान करने लगे।

उन्हें ध्यान में देखकर भगवती लक्ष्मी ने पूछा --- "हे प्रभु ! आप इस प्रकार कैसे बैठे हो ?"

भगवान् ने थोड़ी देर उत्तर नहीं दिया, बाद में बोले---

"देवी ! मैंने स्वप्न में शिव दर्शन किया है। ऐसा प्रतीत होता है कि शिव ने मेरा स्मरण किया है। चलो --- कैलाश में चलकर हम दोनों उनका दर्शन करें।"

तब दोनों शंकर जी से मिलने के लिए चल पड़े।

उधर शिवलोक में शंकरजी ने भी भगवान् विष्णु का दर्शन किया। माता पार्वती के पूछने पर भगवान् शिव ने विष्णु दर्शन की बात कही। शिव-पार्वती भी विष्णु दर्शन के लिए चले।

आधी दूरी पर विष्णु भगवान् ने देखा कि भगवान् शिव गौरी सहित आ रहे हैं। दोनों को अपार प्रसन्नता हुई।

दोनों परस्पर ऐसे मिले जैसे दो प्रेम के सागर मिलते हैं, एक दूसरे को देखकर दोनों के नेत्रों से आनन्द के आँसू बहने लगे, शरीर पुलकित हो गया, दोनों मूकवत् खड़े रहे।

दोनों ने ही एक-दूसरे को अपने-अपने लोक में ले जाने का हठ किया। इतना अपूर्व प्रेम था कि निर्णय करना कठिन था।

इतने में नारद जी वीणा बजाते हुए, हरिहर गुणगान करते आ पहुँचे। नारद जी ने चारों को प्रणाम किया। विष्णु तथा शिवजी ने नारद जी से निर्णय करने को कहा।

इनके लोकोत्तर झगड़े का निर्णय करने में असमर्थ हुये नारद जी कुछ नहीं बोल पाये।

निर्णय कौन करे ? अन्त में सबने उमा से कहा ----
"आप जो निर्णय देंगी, हम दोनों को स्वीकार है।"

🔹️उमा पहले मौन रही, फिर बोली :---
"यादृशी दर्शिता प्रीतिर्युवाभ्यां नाथ केशव।
मन्ये तया प्रमाणेन न भिन्नबसती युवाम्।।

यादृशी दर्शिता प्रीतिर्युवाभ्यां नाथ केशव।
मन्ये तया प्रमाणेन आत्मैकोऽन्यतनुर्मिथ।।

यादृशी दर्शिता प्रीतिर्युवाभ्यां नाथ केशव।
मन्ये तया प्रमाणेन भार्ये आवां पृथङ्वाम्।।

यादृशी दर्शिता प्रीतिर्युवाभ्यां नाथ केशव।
मन्ये तया प्रमाणेन वेश एकस्य सद्वयो:।।

यादृशी दर्शिता प्रीतिर्युवाभ्यां नाथ केशव।
मन्ये तया प्रमाणेन अपूज्यैकस्य च द्वयो:।।"
--- वृहद्धर्मपुराण पूर्वखण्ड

अर्थ--- हे नाथ ! हे केशव ! आप दोनों में जैसी प्रीति है, इस प्रमाण से मैं मानती हूं कि आप दोनों का निवास वैकुण्ठ तथा कैलाश ---- ये दोनों भिन्न नहीं है।

हे नाथ ! हे केशव ! आप दोनों में जैसी प्रीति देखी है, इस प्रमाण से आप दोनों की आत्मा एक शरीर दो हैं।

इतना ही नहीं ! आप दोनों की पत्नियां भी एक है, दो नहीं।
आप दोनों की प्रीति से ऐसा लगता है कि जो एक से द्वेष करता है, वह दोनों से द्वेष करता है।

एक की जो पूजा करता है, वह दोनों की ही पूजा करता है।
एक को जो पूज्य मानता है, वह दोनों को ही पूज्य मानता है।
आपमें जो भेदबुद्धि करता है, वह नरक प्राप्त करता है।

मैं समझती हूं कि आप दोनों मुझे मध्यस्थ बनाकर ठग रहें हैं। अब मैं आप दोनों से प्रार्थना करती हूं कि आप दोनों ही अपने-अपने लोक में चले जाएं।

विष्णु यह समझें कि मैं शिव रूप से वैकुण्ठ जा रहा हूँ, महेश्वर यह समझें कि मैं विष्णु रूप से कैलाश जा रहा हूँ।

पद्मपुराण में भी इससे मिलती-जुलती कथा आई है।

उसमें पार्वती के निर्णयानुसार भगवान् विष्णु शिव रूप धारण करके , लक्ष्मी उमा का रूप धारण कर कैलाश चली गई तथा भगवान् शंकर विष्णु रूप से, गौरी लक्ष्मी रूप से वैकुण्ठ में प्राप्त हुये।

इस निर्णय को सुनकर दोनों प्रसन्न चित्त से पार्वती की प्रशंसा करते हुए एक दूसरे का आलिंगन करके, अपने-अपने लोक में चले गये।

जब भगवान् विष्णु लक्ष्मी सहित वैकुण्ठ पधारे तब लक्ष्मी जी ने भगवान् के चरण दबाते हुये पूछा --- "प्रभो ! आपको सबसे अधिक प्रिय कौन है ?"

तब भगवान् विष्णु ने कहा :---
"न मे प्रियतमा: सन्ति शिव एक: प्रियो मम।
अहेतुक: प्रियोऽसौ मे स्वकाय: प्राणिनामिव।।

स एवाहं महादेव: स एवाहं जनार्दन:।
उभयोरन्तरं नास्ति घटस्थ जलयोरिव।।

शिवादन्य: प्रियो मेऽस्ति भक्तो य: शिवपूजक:।
शिवास्यापूजको लक्ष्मी न कदापि प्रियो मम।।"

अर्थ ----
हे देवी ! जैसे देहधारियों को देह प्रिय है, इसी प्रकार भगवान् शंकर मुझे प्रिय हैं।

मैं ही विष्णु, मैं ही शिव हूँ। दोनों में दो घड़ों में स्थित जल के समान भेद नहीं है।

शिव के अतिरिक्त शिवभक्त मुझे प्रिय है। शिव की पूजा न करने वाला मेरा भक्त भी मुझे प्रिय नहीं है।

इन कथाओं से शिवद्रोही वैष्णवों और विष्णुद्रोही शैवों को शिक्षा ग्रहण करनी चाहिए।

जिस स्थान पर हरिहर का मिलन हुआ था, वह आजकल सरयू तट पर दोहरी घाट के नाम से विख्यात है।

वहां के लोग कहते हैं कि भगवान् यहां दो रूपों में आकर मिले थे। वे दो रूप शिव-विष्णु के ही होंगे।

यह स्थान उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ जनपद में, जिसका प्राचीन नाम अजमीढ़गढ़ था, वहीं पर दोहरी घाट नाम का कस्बा है।

सरयू के उस पार गोरखपुर की सीमा आरम्भ होती है, जिसका प्राचीन नाम गोरक्षपुर था। यह नगर गुरु गोरखनाथ का बसाया हुआ है।

🔜 ब्राह्मण कौन ⁉️🔻रिजुः तपस्वी सन्तोषी क्षमाशीलो जितेन्द्रियः।दाता शूरो दयालुश्च ब्राह्मणो नवभिर्गुणैः।।👉 रिजुः = सरल हो...
10/06/2026

🔜 ब्राह्मण कौन ⁉️

🔻
रिजुः तपस्वी सन्तोषी क्षमाशीलो जितेन्द्रियः।
दाता शूरो दयालुश्च ब्राह्मणो नवभिर्गुणैः।।

👉 रिजुः = सरल हो
👉 तपस्वी = तप करनेवाला हो
👉 संतोषी= मेहनत की कमाई पर सन्तुष्ट रहनेवाला हो
👉 क्षमाशीलो = क्षमा करनेवाला हो
👉 जितेन्द्रियः = इन्द्रियों को वश में रखनेवाला हो
👉 दाता = दान करनेवाला हो
👉 शूर = बहादुर हो
👉 दयालुश्च = सब पर दया करनेवाला हो ब्रह्मज्ञानी

🔺 ️इन नौ गुणों से सम्पन्न व्यक्ति ही ब्राह्मण होता है।

भगवान श्री राम जी ने श्री परशुराम जी से कहा भी है→
"देव एक गुन धनुष हमारे, नौ गुन परम पुनीत तुम्हारे।।"

🍁“कहाँ गये हमारे संस्कार❓️” — एक आत्ममंथन 🍁✍️ प्रस्तुत: संकल्प रामराज्य सेवा ट्रस्ट ----------▪︎  बौद्धों ने अपने मुण्डन...
10/06/2026

🍁“कहाँ गये हमारे संस्कार❓️” — एक आत्ममंथन 🍁
✍️ प्रस्तुत: संकल्प रामराज्य सेवा ट्रस्ट
----------

▪︎ बौद्धों ने अपने मुण्डन, काषाय वस्त्र, और पिण्डपात्र परम्परा को युगों से निभाया।
▪︎ सिक्खों ने पाँच ककार — केश, कड़ा, कृपाण, कंघा, और कच्छा — को कभी नहीं त्यागा।
▪︎. मुसलमान आज भी पाँच वक़्त की नमाज़ के लिए ज़मीन-आसमान नहीं देखते — चाहे रेल हो या सड़क, मस्जिद हो या मैदान।
▪︎ ईसाई आज भी हर रविवार को चर्च जाते हैं, अपने रीति-रिवाजों को नित निभाते हैं।

तो फिर केवल हिन्दू ही क्यों अपने मूल से कटता गया?

कहाँ लुप्त हो गईं वे जटाएं, वे जनेऊ, वह यज्ञोपवीत संस्कार?
कहाँ विलीन हो गये यज्ञ, हवन, वेदमंत्र, स्वस्तिक, रुद्राभिषेक?
कहाँ खो गईं खडाऊँ की आहटें, ऋषियों की वाणी, गुरुकुलों की तपःसंस्कृति?

क्यों भूल गये हम गौ, गङ्गा, गीता, गायत्री और गुरु?
क्या आधुनिकता के मोह में हमारी आत्मा का संस्कृतिक स्वर लुप्त हो गया?

पगड़ी छोड़ कर टोपी पहन ली,
हवन छोड़ कर होली बार में बैठ गये,
ध्यान-समाधि छोड़ कर फ़ोन स्क्रीन में रम गये,
संस्कार छोड़ कर "संवेदनहीनता" को फैशन बना लिया।

क्या औरंगज़ेब आज तुम पर न हंसता होगा...?
क्या अपने पितृ, अपने ऋषि, अपने पूर्वज — तुम पर धिक्कार न करते होंगे...?

यह समय है पुनः स्मरण का — जागरण का।
धर्म केवल कर्मकाण्ड नहीं — वह आत्मा का तेज है।
संस्कार केवल परंपरा नहीं — वह जीवन की धुरी है।
और संस्कृति केवल प्रदर्शन नहीं — वह हमारी पहचान है।

विचार कीजिए...
क्या हम वाकई “स्वतंत्र” हैं यदि हमने अपनी आत्मा के मूल को ही खो दिया?

अनेकों पुराणों में, विशेषकर काशी-केदार-महात्म्य में, जो कि ब्रह्मवैवर्त पुराण का परिशिष्ट है,  उसमें कथा आती है कि इस ब्...
10/06/2026

अनेकों पुराणों में, विशेषकर काशी-केदार-महात्म्य में, जो कि ब्रह्मवैवर्त पुराण का परिशिष्ट है, उसमें कथा आती है कि इस ब्रह्माण्ड के ब्रह्मा, विष्णु अपने कर्म से ऊबकर अपना त्यागपत्र लेकर महाकैलाश को गये।

मार्ग में सातों ग्रहों-ब्रह्मलोक, सप्तर्षिमण्डल, ध्रुवमण्डल को पार करके ब्रह्मवन को प्राप्त किया।

उस वन में अनेकों महाकल्पों के ब्रह्मा, जिनमें चारमुखी, अष्टमुखी, सोलहमुखी, बीसमुखी, सौ तथा सहस्त्रमुखी सेवा से निवृत्त होकर मुक्ति प्राप्त करने के लिए ज्ञानरूपी तप कर रहे थे।

उस वन को पार करके दोनों विष्णुवन को प्राप्त हुये। वहां पर भी सेवा निवृत्त अनेक विष्णुओं को देखा जो मुक्ति के लिए ज्ञानमय तप कर रहे थे।

उसको पार करके रुद्रवन देखा, जिसमें अनेकों रुद्र भी तपस्या कर रहे थे। वहां से एक रुद्र भी इनको रास्ता बताने के लिए इनके साथ हो लिये।

इन सब को पार करके महाकैलाश के अनेकों स्थलों का दर्शन करते हुए ; अनेकों द्वारों को पार करते हुए ; शिव दरबार में पहुँचे।

दोनों ने प्रणाम करके स्तुति की, शंकर जी ने संकेत में आशीर्वाद देकर परिचय पूछा।
विष्णु जी ने अपने वैकुण्ठ का नाम बताकर अपना नाम बताया।

ब्रह्मा-विष्णु-रुद्र-इंद्र-मनु-व्यास आदि पद हैं, जैसे राष्ट्रपति-प्रधानमंत्री-गवर्नर आदि पद है, उस पद पर विराजित व्यक्तियों के नाम विशेष होते हैं, व्यक्ति बदलते हैं, पद स्थायी होता है।

जब ब्रह्माजी से नाम पूछा तो उन्होंने "विरञ्चि" नाम बताया।

शंकर जी ने पूछा -- "किस ब्रह्माण्ड के ब्रह्मा हो ?"

ब्रह्मा जी को सुनकर परमाश्चर्य हुआ। वे समझते थे कि एक ही ब्रह्माण्ड है। अपने ब्रह्माण्ड का नाम नहीं बता पाये।
तब उन्होंने विष्णु भगवान् की ओर देखा।

मुस्कराते हुये भगवान् विष्णु ने कहा ---

" हे महेश्वर ! यह रोदसी ब्रह्माण्ड के ब्रह्मा हैं। इसके अतिरिक्त क्रन्दसी, संहती नाम के ब्रह्माण्ड हैं। जिस ब्रह्माण्ड में मैंने वामन रूप से त्रिविक्रम रूप धारण करके महाराज बलि से तीन पैर पृथ्वी के बहाने त्रिलोकी को नाप लिया था, यह उसी ब्रह्माण्ड के ब्रह्मा हैं।"

तब परम शिव ने पूछा -- "तुम तीनों किस लिये आये हो ?" (क्योंकि मार्ग में इस ब्रह्माण्ड के रुद्र भी साथ आये थे, दोनों को रास्ता बताने के लिये)

ब्रह्मा जी ने कहा -- "मैं सृष्टि रचते हुये ऊब गया हूँ।"

विष्णु भगवान् बोले --- "मैं भी सृष्टि की रक्षा के लिए अवतार लेते-लेते ऊब गया हूँ।
हम दोनों सेवा से निवृत्त होकर आपका भजन करके परम पद प्राप्त करेंगे। आप हम दोनों का त्यागपत्र स्वीकार करें।"

परम शिव ने पार्वती की ओर संकेत किया। पार्वती जी ने अपने गणों को सामने रखे दो पेटियों को उठाकर लाने के लिए कहा।
गणों ने दोनों पेटियां आगे रख दी।

उसमें से दो कीट निकले, एक पर जल छिड़कते हुये कहा "ब्रह्मा भव" वह ब्रह्मा हुआ।
दूसरे पर जल छोड़कर कहा "विष्णु भव" वह विष्णु हो गया।

यह लीला देखकर दोनों भय से कांपने लगे।
उन्होंने हाथ जोड़कर भगवती से क्षमा मांगी, कहा ---- "कहीं हमें "कीटो भव" कहकर कीड़ा बनाकर इस पेटी में न रख देना।
न जानें कितने महाकल्पों तक इसमें पड़े रहेंगे।"

तब भगवान् शिव ने उनकी प्रार्थना सुनकर अपने रोमकूप से एक अलग ब्रह्माण्ड की रचना करके इन नये ब्रह्मा-विष्णु जी को उनमें नियुक्त किया।

इस कथा का तात्पर्य ब्रह्मा एवं विष्णु जी की निंदा में नहीं है, अपितु कारण ब्रह्म की प्रशंसा में है।

10/06/2026
कामाख्या माँ का जब हुआ चमत्कार।।उड़िया बाबाजी महाराज ने कामाख्या में मां जगदंबा की आराधना की तो मां साक्षात प्रकट हुईं औ...
09/06/2026

कामाख्या माँ का जब हुआ चमत्कार।।

उड़िया बाबाजी महाराज ने कामाख्या में मां जगदंबा की आराधना की तो मां साक्षात प्रकट हुईं और उनको एकाकार कर लिया।
परम पूज्यपाद श्री उड़िया बाबाजी महाराज भारत के सिद्ध संतों में एक थे। उनका अद्भुत जीवन संपूर्ण समाज के लिए एक आदर्श रूप था। उनकी कृपा से असंख्य लोगों में भक्ति और ज्ञान की जागृति हुई। आज भी उनकी परंपरा में परमपूज्य स्वामी श्री अखंडानंद सरस्वती एवं उनके कृपा पात्र जगदगुरु शंकराचार्य ब्रह्मलीन स्वामी श्री स्वरूपानंद सरस्वती के आशीर्वाद से वर्तमान में श्री उड़िया बाबा आश्रम वृंदावन धाम में सुचारू रूप से चल रहा है।

उनके समकालीन संतों में पूज्य स्वामी श्री करपात्री जी महाराज, श्री हरि बाबा जी, श्रीश्री मां आनंदमई, स्वामी श्री गंगेश्वरानंद जी महाराज, स्वामी श्री शरणानंद जी व अन्यान्य महान संत उनके साथ वेदांत सत्संग करते रहे। श्री उड़िया बाबा जी के अनन्य भक्तों में जगदगुरु शंकराचार्य श्री शांतानंद सरस्वती, स्वामी श्री प्रबोधानंद सरस्वती, महर्षि कार्तिकेय जी, श्री पलटू बाबा जी, गोवर्धन के सिद्ध संत पंडित गया प्रसाद जी, स्वामी सिद्धेश्वराश्रम जी व अन्य संतों के नाम उल्लेखनीय हैं।

परम पूज्यपाद श्री उड़िया बाबा जी महाराज को बाल्यकाल से ही अनंत सिद्धियां प्राप्त थीं। मां अन्नपूर्णा उनको सिद्ध थीं। कैसा भी बीहड़ जंगल हो, सभी लोगों के भोजन की व्यवस्था वह अपनी सिद्धि से कर दिया करते थे। जहां कहीं भी वे रहते बराबर भंडारों का तांता लगा रहता था। उन्होंने अनेक भक्तों को प्राण दान दिया। रोग मुक्त किया। आर्थिक संकटों से उवारा एवं अन्य आपत्तियों से रक्षा की। भक्त उनका भगवान शिव के भाव से रुद्राभिषेक करते तो कभी कृष्ण रूप में उनकी झांकियां सजाते। कई उत्सवों पर भक्त इष्ट रूप में उनका पूजन- अर्चन करते थे। वह भक्तों के लिए सबकुछ करते हुए भी इस भाव से रहते थे कि जैसे उन्होंने कुछ नहीं किया।

उड़िया बाबाजी महाराज ने कामाख्या में मां जगदंबा की आराधना की तो मां साक्षात प्रकट हुईं और उनको एकाकार कर लिया। कालांतर में वह नित्य निरंतर समाधि में लीन रहते थे। परमपूज्य स्वामी श्री अखंडानंद जी महाराज के कथनानुसार उड़िया बाबाजी का स्वरूप अलौकिक था। बाबा के विचार का उत्कर्ष, चित्त की समाधि, जीवन की प्रेममयता और रहने की सादगी पास रहकर देखने योग्य थी। भक्त लोग उनको सर्वज्ञ एवं सर्वशक्तिमान मानते थे। बहुतों के तो वह महज़ सद्गुरु ही नहीं बल्कि इष्टदेव भी थे। उन्होंने अपने निजी संस्मरण में एक अद्भुत प्रसंग का उल्लेख किया है।

एक दिन की बात है कि जब वह संन्यासी भी नहीं हुये थे, रात्रि के समय आश्रम की छत पर लेटे हुए थे। पास ही संन्यासी मित्र स्वामी निर्मल दासजी थे। दोनों ने निश्चय किया कि कहीं एकांत में चलकर साथ-साथ रहा जाए। प्रातः काल 4 बजे दोनों वेदांत के सत्संग में श्री उड़िया बाबाजी महाराज के पास गए तो वो बोले, तुम दोनों का एक साथ रहना ठीक नहीं है। उन्होंने (अखंडानंदजी) ने सोचा कि क्या महाराज जी ने मन की बात जान ली है ?

यदि यह सही है तो इस समय ही वो मुझे खाने के लिए कोई चीज दें। तब मैं समझूंगा कि वह मेरे मन की बात जान गए हैं। इतने में तुरंत उड़िया बाबाजी ने एक सेवक को पुकार कर कहा, भइया इनको इस समय भूख लगी है। कुछ लाओ तो। सेवक कुछ खाद्य सामग्री ले आया और प्रसाद में बहुत से केले और पेड़े दिये। स्वामीजी कहते हैं कि वह लज्जा और संकोच से दब गये। श्री महाराज जी के विषय में ऐसी एक नहीं, अनेक घटनाएं जीवन में देखने में आयी।

साधन काल में बाबा कभी लेट कर नहीं सोते थे। 10 वर्ष तक वो लेटे नहीं थे। बैठे रहते थे या चलते थे। कभी उनको दो-तीन घंटे से अधिक सोते हुए किसी ने नहीं देखा। जीवन पर्यंत उन्होंने कठोर साधना की। उनका रहन सहन आश्चर्यमय था।

श्री उड़िया बाबाजी महाराज भक्तों और जिज्ञासुओं के साथ परमार्थ चर्चा करते थे। उनके श्रीमुख से जो वचानामृत निकलते थे, उनसे सभी को बहुत शांति का अनुभव होता था। उनके जीवन काल में ही गीता प्रेस गोरखपुर से उनके उपदेशों का एक संग्रह प्रकाशित हुआ था। बाद में उनके आश्रम से श्री उड़िया बाबाजी के उपदेश प्रकाशित हुए।

श्री उड़िया बाबा जी महाराज बोलते थे कि दुर्गा पाठ में अलौकिक व असीम शक्ति है। दुर्गा पाठ से असंभव भी संभव हो जाता है। श्री दुर्गा सप्तशती के अर्गला, कीलक और कवच पाठ से सारे कार्य सिद्ध हो जाते हैं। नाम जप पर उनका बहुत जोर रहता था। बाबा ने बताया था कि जप सबसे कठिन चीज है। ज्ञान और ध्यान से जप को वह कठिन समझते थे। वह कहते थे कि सब प्रकार की बातें छोड़कर निरंतर एक ही मंत्र का जप करते रहना साधारण बात नहीं है।

जप में विलक्षण शक्ति होती है। मंत्र से भी बड़ा नाम होता है क्योंकि मंत्र जप में विधि का बंधन है जबकि नाम जप में विधि विधान की कोई आवश्यकता नहीं है। जिनकी राम नाम में निष्ठा हो गई उसके लिए संसार में क्या काम बाकी रहा ? जब कृष्ण का नाम लो तो स्वयं को गोलोक में समझो। नाम जप से नित्य-निरंतर चमत्कार होते रहते हैं।

वृंदावन में श्री उड़िया बाबाजी महाराज के श्रीकृष्ण आश्रम की बड़ी ख्याति थी। भक्तों, साधकों, संतों का वहां तांता लगा रहता था।

जीवन में शुद्धि, वैराग्य और अभ्यास पर बाबा का बहुत जोर रहता था। उत्सवों में जब भीड़ होती थी तब बाबा को इस बात की बड़ी चिंता रहती थी कि‌ कोई भूखा न रह जाए। वह कहते थे खाने का आनंद जीव का है और खिलाने का आनंद ईश्वर का है। ध्यान का मर्म बताते हुए बाबा कहते थे कि ध्यान के समय मुख्य रूप से अपने ईष्ट के स्वरूप का ही चिंतन करना चाहिए। यदि स्वरूप में चित्त स्थिर न हो तो ईश्वर की लीलाओं का गायन करना चाहिए। रोना हो तो इष्ट देव की किसी लीला का चिंतन करते हुए रोया करें। हंसना हो तो भी उसकी लीला का ही आश्रय लेकर हंसें। इस तरह ईष्टदेव का चिंतन करना ही ध्यान है।

परम पूज्य श्री उड़िया जी महाराज के निर्वाण के बाद उनके श्रीकृष्ण आश्रम में भक्तों ने उनका भव्य मंदिर बनाया। उसमें उनके अर्चा विग्रह की प्राण प्रतिष्ठा हुई। उनकी प्रतिमा की प्राण प्रतिष्ठा होने पर लोगों ने तरह-तरह की अनुभव महसूस किये। किसी को उनके नेत्र हिलते दिखाई दिए तो किसी को उनके हृदय में धड़कन का अहसास हुआ। इससे भक्तों को ऐसा लगा कि बाबाजी जो हमें छोड़कर चले गए थे, वह वापस आ गए हैं। आज भी मंदिर में उनके दर्शन कर असीम कृपा की अनुभूति होती है। उनकी समाधि पर रोमांच का वातावरण रहता है और भक्तों को विलक्षण अनुभव होते हैं।

श्री उड़िया बाबा के आश्रम के सामने उनके अभिन्न रूप स्वामी अखंडानंदजी महाराज के आश्रम में भी नित्य कृपा बरसती रहती है और नित्य वेदांत, सत्संग, कथा, संतों की सेवा से भक्तों को परमाश्रय प्राप्त होता है।

Address

अस्सी घाट
Varanasi

Alerts

Be the first to know and let us send you an email when संकल्प रामराज्य सेवा ट्रस्ट posts news and promotions. Your email address will not be used for any other purpose, and you can unsubscribe at any time.

Share