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संकल्प रामराज्य सेवा ट्रस्ट धर्म की जय हो, अधर्म का नाश हो। प्राणियों में सद्भावना हो, विश्व का कल्याण हो। गौ माता की जय हो, गौ हत्या बंद हो, भारत अखण्ड हो....नमः पार्वतीपतये हर हर महादेव
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सभी भारतवासियों को हिंदी दिवस- २०२६ की               हार्दिक शुभकामनाएं..!भारत में तमाम भाषाएं बोली जाती हैं और हर भाषा ...
14/09/2026

सभी भारतवासियों को हिंदी दिवस- २०२६ की
हार्दिक शुभकामनाएं..!

भारत में तमाम भाषाएं बोली जाती हैं और हर भाषा की अपनी एक खूबी है। किसी भाषा का महत्व दूसरी भाषा से कम नहीं है लेकिन हिंदी भाषा शुरू से भारत की पहचान रही है और ये हमारी राष्ट्रभाषा भी है। यही वजह है कि हिंदी के महत्व और उपयोगिता को दर्शाने के उद्देश्य से हर साल १४ सितंबर को हिंदी दिवस मनाया जाता है।

साल में ०२ बार हिंदी दिवस मनाया जाता है-
कुछ लोग हिंदी दिवस को लेकर कंफ्यूज भी हो जाते हैं और कहते हैं कि हिंदी दिवस तो जनवरी में मनाते हैं, फिर ये सितंबर में कैसे आ गया। ऐसे में उनकी जानकारी के लिए बता दें कि १० जनवरी को विश्व हिंदी दिवस मनाया जाता है और १४ सितंबर को केवल हिंदी दिवस मनाया जाता है। ऐसे में साल में ०२ मौके ऐसे आते हैं, जब हिंदी दिवस मनाया जाता है।

१४ सितंबर हिंदी दिवस मनाए जाने का कारण-
१४ सितंबर १९४९ को संविधान सभा ने हिंदी को देवनागरी लिपि के साथ भारत की राजभाषा के रूप में स्वीकार किया था। इसके बाद १९५३ से इस दिन को औपचारिक रूप से राष्ट्रीय हिंदी दिवस के रूप में मनाया जाने लगा। ये दिन हिंदी के महत्व, उपयोगिता और हिंदीभाषी होने के गर्व को बढ़ाता है। ये हमारी मातृभाषा के प्रति हमारे आदर को दर्शाने का दिन है।

१० जनवरी को विश्व हिंदी दिवस मनाए जाने का कारण-
हिंदी दिवस को वैश्विक स्तर पर पहचान और सम्मान मिले, इसलिए १० जनवरी को विश्व हिंदी दिवस मनाते हैं। ये तारीख इसलिए अहमियत रखती है क्योंकि साल १९७५ में इसी दिन नागपुर में पहला विश्व हिंदी सम्मेलन आयोजित हुआ था। इसके बाद साल २००६ से हर साल १० जनवरी को विश्व हिंदी दिवस के रूप में मनाया जाने लगा। हिंदी विदेशों में भी काफी लोकप्रिय हो रही है क्योंकि पीएम मोदी जब भी विदेश जाते हैं तो हिंदी में भाषण जरूर देते हैं। उन्होंने हिंदी भाषा को काफी बढ़ावा दिया है।

।। हिंदी हैं हम वतन है हिन्दोस्तां हमारा ।।

🍁श्रीमद्भागवत ग्रहण करने का अधिकारी कौन हैं❓️✍️ संकल्प रामराज्य सेवा ट्रस्ट द्वारा प्रस्तुत.....❗️श्रीमद्भागवत महापुराण ...
14/09/2026

🍁श्रीमद्भागवत ग्रहण करने का अधिकारी कौन हैं❓️
✍️ संकल्प रामराज्य सेवा ट्रस्ट द्वारा प्रस्तुत.....❗️

श्रीमद्भागवत महापुराण की रचना के बाद व्यास मुनि सोचने लगे की इसका सबसे योग्य अधिकारी कौन है? क्योंकि इसमें सबसे ऊँचा रस भरा हुआ है। तब उनकी दृष्टि अपने बेटे पर पड़ी। बस! यही सबसे योग्य है। इसलिए नहीं कि मेरा बेटा है, यह वास्तव में योग्य है। बोले, जिसमें किसी भी प्रकार का स्वार्थ नहीं, अहम् भाव या मम् भाव नहीं कोई अन्य विकार भी नहीं, वही इस रस को पूरी तरह से चख सकता है। और तब उन्होंने शुकदेवजी को यह कथा सुनाई।

तब शौनकजी ने कहा- महाराज वे तो ब्रह्म में रमे हुए हैं, स्वयं ब्रह्म ही हैं। तब उन्होंने यह कथा क्यों सुनी? भगवान की सगुण लीला क्यों सुनी?

🔸️ सूतजी कहते हैं, (यह बड़ा प्रसिद्ध श्लोक है)

आत्मारामाश्च मुनयो निर्ग्रन्था अप्युरूक्रमे।
कुर्वन्त्यहैतुकीं भक्तिमित्थम्भूतगुणो हरिः।।
----- श्रीमद्भागवत महापुराण १.७.१०

"क्या करें? भगवान के गुण ही ऐसे हैं। यह तो भगवान के गुणों का ही दोष है कि ब्रह्म ज्ञानी महापुरुष भी उनकी ओर खिंचे जाते हैं।

जो आत्माराम हैं, 'निर्ग्रन्था' - जिन्हें ग्रन्थ की कोई जरूरत नहीं है, जिनकी अविद्या ग्रन्थी खुल गयी है, वे लोग भी बिना किसी कारण के भगवान की भक्ति करते रहते हैं। क्यों? क्योंकि भगवान का स्वभाव ही ऐसा है। भगवान के गुण ही ऐसे हैं, वे बलात् हमें अपनी ओर खींच लेते हैं।"

🔸️ दूवहूति हाथ जोड़कर अपने पुत्र साक्षात् भगवान कपिल से कहती हैं!👉  संकल्प रामराज्य सेवा ट्रस्ट  द्वारा प्रस्तुत ❗️निर्व...
14/09/2026

🔸️ दूवहूति हाथ जोड़कर अपने पुत्र साक्षात् भगवान कपिल से कहती हैं!👉 संकल्प रामराज्य सेवा ट्रस्ट द्वारा प्रस्तुत ❗️

निर्विण्णा नितरां भूमन्नसदिन्द्रियतर्षणात्।
येन सम्भाव्यमानेन प्रपन्नान्धं तमः प्रभो।।
----- श्रीमद्भागवत महापुराण ३.२५.७

मैं इन झूठी इन्द्रियों को खुश करने में लगी रही। मैंने बड़ा धोखा खाया। लेकिन अब मुझे उनसे वैराग्य हो गया है। आज मुझे आपके आशीर्वाद के रूप में नयी दृष्टि प्राप्त हो गयी है। आप मेरे मोह को दूर कीजिए। मैं बहुत समय तक इस अज्ञान अंधकार में पड़ी रही।

▪️इस प्रकार यहाँ बहुत ही सुन्दर वर्णन किया गया है।

तं त्वा गताहं शरणं शरण्यं स्वभृत्यसंसारतरोः कुठारम्।
----- श्रीमद्भागवत महापुराण ३.२५.११

आज मैं आपकी शरण में आयी हूँ। अपने भृत्य के संसार रूपी पेड़ के लिए आप कुठार रूप, कुल्हाड़ी रूप हैं। इस संसार वृक्ष को आप काट डालेंगे।

यह सुनकर भगवान तो बड़े ही प्रसन्न हुए। अपनी माता को ज्ञान देने के लिए तत्पर होकर वे कहते हैं, "तुमको मै अध्यात्म योग का उपदेश करूँगा।"

🔹️️अब देखो, यह अध्यात्म योग क्या है ❓️

🔸️भगवान कहते हैं 👉
हम सब जो बन्धन-बन्धन करते रहते हैं वह सब वास्तव में हमारे मन के कारण ही हैं।

'मन एवं मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः।'
चेतः खल्वस्य बन्धाय मुक्तये चात्मनो मतम्।
----- श्रीमद्भागवत महापुराण ३.२५.१५

मन ही बन्धन और मोक्ष दोनों का कारण है। कैसे? 'गुणेषु सक्तं बन्धाय' हमारा मन ही जब प्रकृति के पदार्थों में आसक्त होता है, तो वही बन्धन का कारण बन जाता है। 'रतं वा पुंसि मुक्तये' और जब मन भगवान में रमता है , तो वही मुक्ति का कारण भी बन जाता है बस इतनी बात है यही अध्यात्म योग है और दूसरा कुछ नहीं अभी हमारा मन विषयों में, भौतिक पदार्थों में आसक्त हो गया है। उसको वहाँ से हटाकर, आत्म स्वरूप में स्थिर कर देने का जो अभ्यास है, उसी को अध्यात्मयोग कहते हैं। अहंता-ममता को छोड़ना है, धीरे-धीरे विषयासक्ति को छोड़ना है।

🔸️ यह कैसे हो❓️
यहाँ पर उसी का उत्तर बताया गया है कि सत्संग ही उसके लिए सर्वश्रेष्ठ साधन है।

सत्संगत्वे निस्संगत्वं निस्संगत्वे निर्मोहत्वम्।
निर्मोहत्वे निश्चलतत्त्वं निष्चलतत्त्वे जीवन्मुक्ति।।

सत्संग करेंगे तो धीरे-धीरे विषयों का संग छूट जायेगा। मन शुद्ध होगा तब विवेक प्रकट हो जायेगा। जब विवेक प्रकट हो जायेगा तो बन्धन भी कट जायेगा। क्योंकि अविवेक से ही सारा-का-सारा बन्धन मालूम पड़ता रहता है। वैसे, जो भी संग है वह बन्धन में डालने वाला है, लेकिन असंग पुरुष के साथ जो संग होता है, वह मोक्ष देने वाला होता है। संगस्तेष्वथ ते प्रार्थ्य संगदोषहरा हि ते ।
-----श्रीमद्भागवत महापुराण ३.२५.२४

'स्थिति' शब्द में हमको लगता है जैसे सब कुछ स्थिर हो जाता है। इसीलिये बहुत से लोगों को ऐसा लगता है कि समाधि में मन ऐसा हो जाएगा, फिर क्या होगा? लेकिन भक्ति शास्त्र में कहते हैं, हमारा जो मन है उसे विषयों से हटा कर भगवान में लगाओ। भक्ति से मन भगवान में रम जाता है।

मधुसूदन सरस्वती जी ने भक्ति रसायन में 'स्थिति' और 'रति' का सुन्दर विवेचन किया है। केवल परमात्मा में स्थिति को भक्ति नहीं कहते। परमात्म स्वरूप में जो रति है उसको भक्ति कहते हैं। वह तो रस का स्वाद है। तो एक ओर भगवद्भक्ति और दूसरी ओर विषयों से विरक्ति होनी चाहिए।

🔸️ दुःख किसे कहते हैं❓️🔸️ दुःख की परिभाषा क्या है❓️✍️ संकल्प रामराज्य सेवा ट्रस्ट  द्वारा प्रस्तुत❗️🔹️भगवान कहते है 👉'दु...
14/09/2026

🔸️ दुःख किसे कहते हैं❓️
🔸️ दुःख की परिभाषा क्या है❓️
✍️ संकल्प रामराज्य सेवा ट्रस्ट द्वारा प्रस्तुत❗️

🔹️भगवान कहते है 👉
'दुःखं कामसुखापेक्षा पण्डितो बन्धमोक्षवित्।।'

विषयों से सुख की अपेक्षा करते रहना ही दुःख है। भोग से, खाने पीने से हम सुखी हो जाएँगे, ऐसा सोचना ही दुःख है।

फिर कहा - दरिद्र कौन है? गरीब कौन है? हम सोचते हैं, जिसके पास धन नहीं वह दरिद्र है। लेकिन यहाँ दरिद्र की सुन्दर परिभाषा दी गई है।

'दरिद्रो यस्त्वसन्तुष्टः।'

दरिद्र व्यक्ति वह है जो हमेशा असंतुष्ट रहता है। असंतुष्ट व्यक्ति गरीब है या नहीं? बहुत कुछ मिल जाने पर भी, यह नहीं है, वह नहीं है - ऐसा लगना ही दारिद्रय है। बचपन में जब हम बोलते थे कि यह नहीं है, वह नहीं है, तो पिताजी हमें डाँट देते थे। कहते थे - नहीं है, नहीं है क्यों कहते रहते हो, यही दरिद्रता का, असंतुष्टि का लक्षण है।
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🔸️कृपण अथवा दया का पात्र कौन है❓️

'कृपणो योऽजितेन्द्रियः।'

दया का पात्र वह है जिसका अपनी इन्द्रियों पर संयम नहीं। अजितेन्द्रिय तो वस्त्रविहीन से भी बढ़कर दया का पात्र है। वास्तव में वही कृपण है।
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🔸️ईश्वर कौन है❓️
🔸️ ईश्वर की परिभाषा क्या है❓️

'गुणेष्वसक्तधीरीशो।'

जो प्रकृति के गुणों से नितान्त अनासक्त रहता है, वही समर्थ होता है, शक्तिशाली पुरुष होता है, ईश्वर हो जाता है। दूसरे अर्थ में वैराग्यवान पुरुष ही ईश्वर कहलाता है और जो गुणों में आसक्त हो जाता है उसे जीव कहते हैं।

अब भगवान एक सुन्दर तथा ऊँचे स्तर की बात कहते हैं। कहते हैं - गुण-दोष की बात मैं कहाँ तक बताता रहूँ? किसी में गुण-दोष देखना ही दोष है और गुण-दोष दोनों नहीं देखना ही सबसे बड़ा गुण है। क्या अच्छा है, क्या बुरा है यह कब तक देखते रहोगे? जरा इन भावों से ऊँचे उठ जाओ।

14/09/2026
🍁 मासा मानात् …......❗️✍️ संकल्प रामराज्य सेवा ट्रस्ट द्वारा प्रस्तुत. ...❗️निरुक्त (५.२१) में वेदमन्त्र की व्याख्या में...
14/09/2026

🍁 मासा मानात् …......❗️
✍️ संकल्प रामराज्य सेवा ट्रस्ट द्वारा प्रस्तुत. ...❗️

निरुक्त (५.२१) में वेदमन्त्र की व्याख्या में कहा गया है :—

“अरुणः आरोचनो मासकृत् मासानां चार्द्धमासानां च कर्ता भवति, चन्द्रमा वृकः।” अर्थात् : – चन्द्रमा ही मास और अर्धमासों का कर्ता है।

☞ “चन्द्रमस्” शब्द के अन्त में “मस्” प्रत्यय से ही “मास” शब्द की उत्पत्ति हुई है।

तिथि का महत्व :---
☞ आज तीज है — हरितालिका तीज।

“हरितालिका” का अर्थ है हड़ताल, क्योंकि इस दिन स्त्रियाँ अन्न-जल ग्रहण नहीं करतीं और रात्रि जागरण करती हैं।

☞ आज उपाकर्म का दिन है।
☞ आज मन्वादि तिथि भी है।
☞ इस तिथि का सम्बन्ध गौरी-वाराह से भी माना गया है।
☞ हस्त नक्षत्रयुक्त शुक्ल तृतीया सौभाग्य तृतीया के नाम से प्रसिद्ध है।

🌿 हरिताल का प्रयोग सौभाग्य-चिह्नों में किया जाता है।

॥ ️व्रत-विधान ॥
☞ इस व्रत को केवल स्त्रियाँ ही नहीं, बल्कि पुरुष भी कर सकते हैं। अतः – आज व्रत-पालन के लिए अत्यन्त शुभ दिन है।

काशी भाग — ६🔸️ अर्वाचीन सन्त श्रीरामकृष्ण परमहंस जी को भी काशी का दिव्य स्वरूप दिखाई दिया था।रोमाँ रोलाँ ने श्रीरामकृष्ण...
14/09/2026

काशी भाग — ६

🔸️ अर्वाचीन सन्त श्रीरामकृष्ण परमहंस जी को भी काशी का दिव्य स्वरूप दिखाई दिया था।

रोमाँ रोलाँ ने श्रीरामकृष्ण परमहंस जी के जीवन-चरित्र में उनके काशी-अनुभव का उल्लेख करते हुए लिखा है—

«“He visited Banaras, saw it built on stones, but a condensed mass of spirituality. This has also been the experience of other yogis who have visited grand Kashi.”
— Life of Ramakrishna Paramhansa, by Romain Rolland»

▪️ इसका भावार्थ है—

जब श्रीरामकृष्ण परमहंस जी ने काशी में प्रवेश किया, तब उन्होंने केवल पत्थरों से बनी हुई भौतिक काशी का दर्शन नहीं किया, बल्कि अध्यात्ममयी काशी का साक्षात्कार किया।

ऐसा ही अनुभव उन अन्य योगियों को भी हुआ, जिन्होंने काशी में प्रवेश किया और उसकी आध्यात्मिक सत्ता का अनुभव किया।

अर्थात् सामान्य दृष्टि से काशी हमें भवनों, गलियों, घाटों और पत्थरों के रूप में दिखाई देती है; परंतु अन्तर्मुखी एवं योगदृष्टि से वही काशी एक सघन आध्यात्मिक सत्ता के रूप में प्रकाशित होती है।

🔸️ आद्य जगद्गुरु भगवान् शंकराचार्य जी ने ‘काशी पञ्चकम्’ में कहा है—

काश्यां हि काशते काशी काशी सर्वप्रकाशिका।
सा काशी विदिता येन तेन प्राप्ता हि काशिका।।

अर्थात्—

काशी में जो स्वयं प्रकाशित है और जो सबको प्रकाशित करती है, वही काशी है। जिस व्यक्ति ने उस आध्यात्मिक काशी को जान लिया, उसने वास्तव में काशी को प्राप्त कर लिया।

यहाँ काशी का अर्थ केवल बाहर दिखाई देने वाली नगरी से नहीं, बल्कि उस अन्तरस्थित आत्म-प्रकाश से है, जिसके कारण शरीर, मन और समस्त जगत् प्रकाशित होते हैं।

इस दृष्टि से काशी केवल एक स्थान नहीं रह जाती; वह आत्मप्रकाश और ब्रह्मज्ञान का प्रतीक बन जाती है।

बाहर की काशी तक पहुँचना सरल हो सकता है, परंतु अन्तर की काशी को जानना ही वास्तविक काशी-प्राप्ति है।

यही कारण है कि ऋषियों, योगियों और सिद्ध पुरुषों के लिए काशी की महिमा केवल उसके घाटों और मंदिरों तक सीमित नहीं रही; उन्होंने उसके भीतर स्थित उस चिन्मय प्रकाश का अनुभव किया, जिसे शास्त्रों ने काशी कहा है।

हर हर महादेव।
हर हर शंकर, जय जय शंकर।

क्रमशः.........

॥ श्री शेषजी ॥संकल्प रामराज्य सेवा ट्रस्ट द्वारा प्रस्तुत ❗️माता कद्रू ने अपने पुत्रों को आज्ञा दी कि "तुम सब कल प्रातः ...
14/09/2026

॥ श्री शेषजी ॥
संकल्प रामराज्य सेवा ट्रस्ट द्वारा प्रस्तुत ❗️

माता कद्रू ने अपने पुत्रों को आज्ञा दी कि "तुम सब कल प्रातः काले रंग के बाल बनकर भगवान् भास्कर के रथ पर लगे अश्व के पूंछ में निबद्ध हो जाओ, जिससे कल प्रातः मुझे शर्त हारना न पड़े, दासी न बनना पड़े ।"

कुछ सर्पों ने मातृ-आज्ञा को शिरोधार्य किया और कुछ ने इस अधर्ममय आज्ञा का विरोध किया । विरोध करने वाले सर्पों में शेषजी भी थे । अपने ही पुत्रों द्वारा अपनी आज्ञा का तिरस्कार होता देख माता कद्रू कुपित होकर श्राप देने लगी - "जाओ ! पाण्डववंशी महाराज जनमेजय के सर्पयज्ञ की अग्नि तुम्हें जलाकर भस्म कर देगी !"

यह बात ब्रह्माजी तक भी पहुँची । उन्हें यह जानकर आश्चर्य तो हुआ कि पृथ्वी पर एक मां ने अपने पुत्रों को इतना दुष्कर श्राप दिया है । किन्तु पूरी पृथ्वी पर जिस तरह सर्पों की संख्या बढ़ रही थी, उसे देखते हुए ब्रह्माजी ने भी कद्रू के श्राप का अनुमोदन ही किया ।

ब्रह्माजी ने कहा -- "ये प्रचण्ड विषैले सर्प दूसरों को जीने नहीं देंगें । इसीलिए अगर सभी प्राणियों के हित की दृष्टि से विचार करें तो कद्रू ने ठीक ही किया । जो हमेशा दूसरें प्राणियों को हानि पहुँचाते रहते हैं , दूसरा कोई प्राणी यदि उनका प्रतिकार करने में समर्थ नहीं है तो फिर दैव के द्वारा ही हानि पहुँचाने वालों को प्राणान्तक दण्ड मिलता है ।"

'तेषां प्राणान्तको दण्डो दैवेन विनिपात्यते ।"
(महा, आदि, अ ३६, १३)

एक तो माँ का श्राप, दूसरा देवताओं सहित ब्रह्माजी द्वारा भी उस श्राप का अनुमोदन ! कर्कोटक आदि सर्पों ने तुरन्त कहा -- मां ! आप चिन्ता न करो । हम काले रङ्ग के बाल बनकर कल अरुणोदय के समय उस अश्व के पूंछ पर लिपटेंगे । उसके श्वेत पूंछ को कृष्णवर्ण का कर देंगें ।"

इधर शेषजी ने माता कद्रू का साथ छोड़ दिया और गन्धमादन पर्वत पर बद्रिकाश्रम तीर्थक्षेत्र में चले गये । उन्होंने कठोर तपस्या करना प्रारम्भ कर दिया । वे केवल वायु पीकर रहते और विविध व्रतानुष्ठानों का संयम पूर्वक पालन करते ।

ब्रह्माजी ने देखा कि शेषजी घोर तप कर रहे हैं । उनके शरीर का मांस, त्वचा आदि सब सूख गया है । सर्पों में वैसे तो जातीय स्वभाव से ही धैर्य नहीं होता , किन्तु शेषजी में परम् धैर्य है । यह सब देखकर ब्रह्माजी शेषजी के पास आये और कहने लगे -- "शेष ! तुम यह क्या कर रहे हो ? तुम्हारी तपस्या से तुम्हारा शरीर को कृशकाय हुआ ही है , सम्पूर्ण प्रजावर्ग को भी सन्तप्त कर रहे हो । तुम्हारे हृदय में जो भी कामना हो, वह मुझसे कहो ।"

शेषजी बोले -- "क्या कहें महाराज ! हृदय में बड़ा क्षोभ है । मेरे सहोदर भाई बड़े ही मन्दबुद्धि हैं । अतः मैं उनके साथ नहीं रहना चाहता । वे सदा आपस में ही शत्रु की भाँति एक-दूसरे का दोष निकाला करते हैं । इन सबसे ऊबकर मैं तपस्या में लग गया हूँ । जिससे मुझे उनके साथ साथ न रहना पड़े । किम्वा उन्हें देखना भी न पड़े । एक तो वे हमेशा हमारी विमाता विनता और उसके पुत्रों से डाह करते हैं । इसीलिए उनकी सुख-सुविधा सहन नहीं कर पाते । आकाश में उड़ने वाले गरुड़ जी भी तो हमारे भाई भाई ही हैं न ! किन्तु वे नाग सदा उनसे भी द्वेष रखते हैं । इन सब कारणों से मैंने निश्चय किया है कि तपस्या करके मैं इस शरीर को त्याग दूंगा । जिससे मरने के बाद उन दुष्टों से मेरा सभी प्रकार का सम्बन्ध टूट जाये ।"

शेषजी की बातें सुनकर ब्रह्माजी बोले -- "मैं तुम्हारे सब भाइयों की कुचेष्टाओं को जानता हूँ । उनके द्वारा किया जाने वाला अपराध और उसके प्रतिफल में मिलने वाला महान भय की भी व्यवस्था मैंने पहले से ही कर रखा है । अतः अपने भाइयों के लिए तुम्हें शोक नहीं करना चाहिए । आपको जो भी अभीष्ट हो, आप वह वरदान मुझसे माँग लो ।"

शेषजी बोले ---

"एष एव वरो देवो कांक्षितो मे पितामह ।
धर्मो मे रमतां बुद्धि: शमे तपसि चेश्वर ।।"

देव ! मेरे लिए तो अभीष्ट वरदान यही है कि मेरी बुद्धि सदा-सर्वदा धर्म , मनोनिग्रह और तपस्या में लगी रहे । "

ब्रह्माजी बोले -- शेष ! मैं आपके तपस्या और इन्द्रिय-निग्रह से बहुत प्रसन्न हूँ । इसीलिए आज आपको वरदान के साथ-साथ कुछ जिम्मेदारी भी देता हूँ । सुनो -- पर्वत, वन , सागर, ग्राम आदि सहित यह पृथ्वी प्रायः हिलती-डुलती ही रहती है । आप इसे अपने सिर पर धारण करो, जिससे यह पूर्णतः अचल हो जाये । अब आप पृथ्वी के नीचे चले जाओ । पृथ्वी स्वयं ही तुम्हें वहां जाने का मार्ग दे देगी । इस पृथ्वी को धारण करने से तुम्हारे द्वारा मेरा एक बहुत ही विशिष्ट कार्य सम्पन्न हो जायेगा ।"

शेषजी ने ब्रह्मा जी की आज्ञा मानकर वसुधा देवी को सब ओर से पकड़ कर अपने सिर पर धारण कर लिया । तभी से यह पृथ्वी स्थिर हो गई ।

॥ नाग-महिमा (महाभारत आदिपर्व, आस्तीकोपपर्व से) ॥संकल्प रामराज्य सेवा ट्रस्ट  द्वारा प्रस्तुत.....❗️---------------------...
14/09/2026

॥ नाग-महिमा (महाभारत आदिपर्व, आस्तीकोपपर्व से) ॥
संकल्प रामराज्य सेवा ट्रस्ट द्वारा प्रस्तुत.....❗️
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प्रथम स्मरण-श्लोक :---
अनन्तं वासुकिं शेषं पद्मनाभं च कंबलम् ।
शङ्खपालं धार्तराष्ट्रं तक्षकं कालियं तथा ॥
एतानि नव नामानि नागानां च महात्मनाम् ।
सायंकाले पठेन्नित्यं प्रातः काले विशेषतः ॥
तस्मै विषभयं नास्ति सर्वत्र विजयी भवेत् ॥

अर्थ :—
अनन्त, वासुकि, शेष, पद्मनाभ, कंबल, शङ्खपाल, धार्तराष्ट्र, तक्षक तथा कालिय — इन नौ महात्मा नागों के नामों का जो पुरुष प्रतिदिन प्रातः एवं सायं समय स्मरण करता है, उसे कहीं भी विषभय नहीं रहता और वह सर्वत्र विजयी होता है।
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नागों की उत्पत्ति एवं प्राधान्य :---
महाभारत के अनुसार नागों में सर्वप्रथम शेषनाग प्रकट हुए। तत्पश्चात् वासुकि, ऐरावत, तक्षक, कर्कोटक, धनञ्जय, कालिय, मणिनाग, अपूरण, पिंजरक, एलापत्र, वामन, नील, अनील, कल्माष, शबल, आर्यक, उग्रक, कलशपोतक, सुमनाख्य, दधिमुख, विमलपिण्डक, आप्त, शङ्ख, वालिशिख, निष्टानक, हेमगुह, नहुष, पिङ्गल, बाह्यकर्ण, हस्तिपद, मुद्गरपिण्डक, कम्बल, अश्वतर, कालीयक, वृत, संवर्तक, पद्म (द्वौ), शङ्खमुख, कूष्माण्ड, क्षेमक, पिण्डारक, करवीर, पुष्पदंष्ट्र, बिल्वक, बिल्वपाण्डुर, मूषकाद, शङ्खशिरा, पूर्णभद्र, हरिद्रक, अपराजित, ज्योतिक, श्रीवह, कौरव्य, धृतराष्ट्र, शङ्खपिण्ड, विरजा, सुबाहु, शालिपिण्ड, हस्तिपिण्ड, पिठरक, सुमुख, कौणपाशन, कुठर, कुञ्जर, प्रभाकर, कुमुद, कुमुदाक्ष, तित्तिरि, हलिक, कर्दम, बहुमूलक, कर्कर, अकर्कर, कुंडोदर, महोदर आदि अनेकों नाग उत्पन्न हुए।

शास्त्रीय प्रमाण
महाभारत कहता है :—

एते प्राधान्यतो नागाः कीर्तिता द्विजसत्तम ।
बहुत्वान्नामधेयानामितरे नानुकीर्तिताः ॥

हे द्विजश्रेष्ठ ! ये नाग प्रमुख माने गये हैं। इनके अतिरिक्त अन्य अनेक नाग हैं, परंतु उनकी संख्या अत्यधिक होने से यहाँ उनका उल्लेख नहीं किया गया।

एतेषां प्रसवो यश्च प्रसवस्य च सन्ततिः ।
असंख्येयेति मत्वा तान्न ब्रवीमि तपोधन ॥

इन नागों की सन्तान और उनकी भी आगे की सन्तति असंख्य है, अतः उनका नामोल्लेख करना सम्भव नहीं।

बहूनि इह सहस्राणि प्रयुतान्यर्बुदानि च ।
अशक्यान्येव संख्यातुं पन्नगानां तपोधन ॥

सर्पों की संख्या हजारों, लाखों और करोड़ों तक पहुँचती है। इसलिए उनकी गणना कर पाना असम्भव है।

《 महाभारत के इस प्रसंग से यह स्पष्ट होता है कि नाग-वंश अत्यन्त विशाल और विविधतापूर्ण है। इनमें अनन्त, शेष, वासुकि आदि सर्वाधिक पूज्य और स्मरणीय हैं। इनका स्मरण करने से विषभय दूर होता है और मनुष्य सर्वत्र विजयी बनता है। 》

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