22/10/2020
संघ प्रमुख के भ्रांतिपूर्ण वचन:- 1:- लोग कहते हैं कि हम पुस्तकों को मानने वाला समाज हैं,लेकिन यदि ऐसा होता तो सन्त एकनाथ जी गधे को पानी क्यों पिलाते।
2:- वेदों में कोई मिलावट नहीं,गीता में कोई मिलावट नहीं, उपनिषदो में कोई मिलावट नहीं बाकी महाभारत के पहले ही अध्याय में लिखा है कि 8800 श्लोक थे अब यह 1 लाख हो चुके हैं
3:- हमारे लोग भी जानते हैं कि देश काल परिस्थितियों के अनुसार पुस्तक के शब्द पीछे छूट जाते हैं अतः काल बाह्य चीज़ों को निकालना और नई चीज़ों को जोड़ना यह सब करना चाहिए।
4:- यह कार्य धर्माचार्यों का है हमारा नहीं वह भी इस बात को जानते हैं
निराकरण:- सन्त एकनाथ का उदाहरण देकर बताना चाह रहे हैं कि हम पुस्तकों को मानने वाले व्यक्ति नहीं सर्वप्रथम आपको शास्त्र और पुस्तकों में अंतर ही ज्ञात नहीं। इतिहास में वह व्यक्ति भी तो हुए हैं जिन्होंने कठिन से कठिन परिस्थिति में भी "तस्मात शास्र° प्रमाणम्" कहा,शास्त्रों की रक्षा के लिए नाव से कूद गए। यदि इतिहास ही प्रमाण मानना है तो कौन सा मानेंगे? दूसरे कोटि के व्यक्तियों में अधिक प्रमाणिक व्यक्ति आते हैं।
फिर इतिहास भी तो एक पुस्तक ही है, यदि कोई पूछे कि एकनाथ जी वाली बात का क्या प्रमाण? तो सुनी सुनाई बातें प्रमाण हो नहीं सकती ,आप किसी ऐतिहासिक लेख या पुस्तक से ही प्रमाण दिखाएंगे। जब एक व्यक्ति की प्रमाणिकता को सिद्ध करने के लिए ही कठोर प्रमाणों की आवश्यकता हो तो फिर क्या एक पूरी सभ्यता भेड बकरियों के आदर्श पर प्रमाणित होगी???
कोई पूछे कि आपकी सभ्यता का क्या आधार है? आप क्या उत्तर देंगे भावनाएं?? आत्मज्ञान? यदि मूर्खता में भावना उत्तर दिया भी जाए तो 20 लोगों में 40 भावनाएं होती है? ऐसे भेड़ बकरियों के आदर्श पर विश्व की श्रेष्ठतम सभ्यता चलेगी? भावना,आत्मज्ञान इन शब्दों का आधार क्या है।
आप कहते हैं कि वेदों में गीता में उपनिषदों में कोई मिलावट नहीं हुई। फिर भी आपको वेदों के उपदेश "यद् वै किञ्च मनुर्वदत् तद भेषजम्" (जैसा मनु ने कहा वह आचरण में लाओ) कहाँ मान्य है? अन्तर्जातीय विवाह से उतपन्न कुछ वर्णसंकरों को श्रुति स्पष्ट अधम योनि कहती है "योनिमापद्येरनश्वयोनिं वा शूकर योनिं वा चाण्डालयोनिं वा" आपको यह भी कहाँ मान्य है?,आप तो बेरोकटोक अन्तर्जातीय विवाह का समर्थन करने में लगे हैं?
ऐसे में इनके मिलावटी होने न होने से आपको क्या अंतर? वेदविरोधी नास्तिक धर्मद्रोहियों और आप में क्या अंतर है? "वेद मार्ग का अनुसरण न करने के कारण भगवान बुद्ध पूज्य नहीं हुए ,यह है हमारा समाज"। अधर्मियों और आपमे अंतर इतना है कि वह आपकी भांति इस आभास में नहीं जीते कि वह धर्म का भला कर रहे हैं।
महाभारत में मात्र 8800 श्लोक होने की बात आपने कही है
,पहले अध्याय में यह आया है:-
अष्टौ श्लोकसहस्त्राणि अष्टौ श्लोकशतानि च।
अहं वेद्मि शुको वेत्ति संजयो वेत्ति वा न वा। (1/1/81)
अर्थात महाभारत में "8800 श्लोक इतने गूढ़ हैं " कि जिनका अर्थ मैं संजय ,शुकदेव जानते है या नहीं? यह नहीं कहा जा सकता।
कुल श्लोकों की संख्या के लिए आया है:-
एकं शतसहस्रं तु मानुषेषु प्रतिष्ठितम्।(1/1/107)
यह " 1 लाख " श्लोकीं महाभारत मनुष्य लोक के लिए है।
स्थिति यह है कि जीवन के 70 वर्षों में आपने महाभारत का पहला अध्याय भी नहीं पढ़ा तो फिर विशाल शास्त्रों के विषय में आप सही बातें कहेंगे यह कैसे अपेक्षा की जा सकती है?
नियमों से भागने का ,अपनी अधार्मिकता छिपाने का सबसे अच्छा उपाय है यह शब्द "देश काल परिस्थिति।
"शायद आपको ज्ञात नही कि जो व्यक्ति देश काल परिस्थिति से परे न हो वह नियम सनातन धर्मियों को स्वीकार्य नहीं है। वेदों के आधार पर ही सभी स्मृतियां लिखी गईं हैं,जैसे आजकल संकट असंकट देखते हुए नियम बनाये जाते हैं वैसे ही सर्वज्ञ ईश्वर के वेद से ही सभी देश काल परिस्थिति का ध्यान रखा गया है।
"वेद विरुद्ध स्मृति वचन किसी भी काल में मान्य नहीं और वेद संगत वचन हर काल में मान्य है"।लौकिक विधान का निर्माता अल्पज्ञ होता है। उदाहरण :- संविधान में 70 वर्षों में 129 परिवर्तन। फिर भी इतनी दुर्दशा। ईश्वर सर्वज्ञ है।ऋषियों के शरीर और अंत करण पर देश,काल,प्रकृति,परिस्थितियों का कोई प्रभाव नहीं उनके नियम काल से परे हैं। देश काल से स्वतंत्र ईश्वर ने वेदों में जो सूक्ष्म धर्म कहें हैं उनके अनुसार ही स्मृतिकारों ने स्मृतियां बनाई हैं। ऐसे हर दिन परिवर्तन हो जाए तो धर्म सनातन कहां रहा?
● मनुष्य की कम क्षमताओं को देखते हुए इन्ही त्रिकालदर्शी ऋषियों ने बिना किसी नियम में परिवर्तन किए ,पहले ही कलियुग के अनुसार नियम बता दिए हैं। अतः आपको देश काल परिस्थिति कहने की आवश्यकता ही नहीं।चिंतित होने की कोई बात ही नहीं है, मनुस्मृति जिसकी इतनी आलोचना की जाती थी धीरे धीरे अब मनु दंड विधान की प्रसंशा होने लगी है। ऐसे ही निकट भविष्य में मूर्खों को भी क्या क्या उपयोगिता समझ में आने लगे अनुमान नहीं लगाया जा सकता। कर्मों का फल देने वाला ही नियम बदल सकता है; आपको विश्वास नहीं कि आपका ईश्वर अपने नियमों से धर्म की रक्षा कर सकता है तो फिर ऐसे धर्म का क्या लाभ? क्या इस हीन भावना से इस्लाम-ईसाइयत श्रेष्ठ नहीं?"
सत्य यह है कि आपको एक नहीं अनेकों धर्मग्रन्थ मान्य हैं। लेकिन जो बातें आपके मत के अनुसार हों सिर्फ वे। अन्य के लिए आप ऐसे ही धर्म तोड़ मरोड़ कर "देश काल परिस्थिति" कह निकलते बनते हैं20 मंचो पर आप गीता का उपदेश देते देखे जाएंगे किन्तु गीता के वचन "तस्मात् शास्त्र° प्रमाणं " पर आप निकलते बनेंगे। ईश्वर की आज्ञा "श्रुतिस्मृति ममैवाज्ञे" पर भी कुछ यही करना पड़ेगा
अंत में आपने कहा कि यह काम धर्माचार्यों का है हमारा नहीं।यहाँ पर ध्यान देने योग्य बात है कि धर्माचार्य भी दो प्रकार के हैं बचपन से ही कठोर श्रम से अध्यन्न तप किये वास्तविक धर्माचार्य जिनको आपको B टीम अपमानित करने के सभी प्रयास कर चुकी।
और दूसरे प्रकार के बने बनाये धर्माचार्य वे जिन्हें आप लोगों ने अपने मत के अनुसार चलने के लिए भगवा वस्त्र पहना दिया है।
जिस समय आप पर प्रतिबंध लगा था उस समय आपकी आवश्यकता को पहचानते हुए आपके लिए आंदोलन करने वाले स्वामी करपात्री जी के शिष्य पूरी शंकराचार्य जी के पास आप जाते रहते हैं।क्यों आप मौलिक प्रश्न नहीं करते कि धर्मशास्त्रों में परिवर्तन होना चाहिए या नहीं और क्यों?आपसे पहले दलित नैता सूरजभान जी यह प्रस्ताव लेकर आ चुके ;उनका समाधान भी किया गया जो बाद में एक पुस्तक "विचित्र संवाद" के रूप में प्रकाशित किया गया। ऐसे ही आप क्यों मौलिक प्रश्नों से भागते हैं?