19/05/2026
यह कथा दर्शाती है कि भगवान शिव की नगरी काशी में भगवान विष्णु का यह 'गोविंद' स्वरूप आखिर कैसे प्रतिष्ठित हुआ।
यह पौराणिक कथा इस प्रकार है:
1. कथा की पृष्ठभूमि (जब शिव ने काशी छोड़ी)सतयुग के समय, ब्रह्मा जी के मानस पुत्र राजा दिवोदास को काशी का राजा बनाया गया था। राजा दिवोदास ने ब्रह्मा जी के सामने एक शर्त रखी थी कि वे काशी के राजा तभी बनेंगे जब सभी देवी-देवता (यहाँ तक कि स्वयं भगवान शिव भी) काशी छोड़कर चले जाएं, ताकि वे बिना किसी दैवीय हस्तक्षेप के न्यायपूर्वक शासन कर सकें। प्रजा की भलाई के लिए भगवान शिव मंदराचल पर्वत पर चले गए, लेकिन उनका मन हमेशा काशी में ही अटका रहता था।
2. शिव की व्याकुलता और देवताओं की असफलता - अपनी प्रिय काशी वापस लौटने के लिए भगवान शिव व्याकुल थे। उन्होंने काशी की स्थिति जानने और राजा दिवोदास में कोई कमी ढूंढने के लिए कई देवताओं, योगिनियों और साक्षात ब्रह्मा जी को भेजा। लेकिन राजा दिवोदास इतने धर्मपरायण और सदाचारी शासक थे कि जो भी देवता वहाँ जाता, वह राजा के राज्य की सुंदरता देखकर वहीं का होकर रह जाता और शिव जी के पास वापस नहीं लौटता।
3. भगवान विष्णु का 'गोविंद' रूप में काशी आगमन - अंत में, भगवान शिव ने अपने सबसे प्रिय भगवान विष्णु (नारायण) से सहायता मांगी। शिव जी के कष्ट को दूर करने के लिए भगवान विष्णु ने एक अद्भुत योजना बनाई।नारायण ने अपनी माया से एक संन्यासी (पुण्यकीर्ति) का रूप धारण किया और अपने गरुड़ को अपना शिष्य बनाया।इसके साथ ही, माता लक्ष्मी ने भी एक तपस्विनी (नारायणी) का रूप लिया। ये सभी राजा दिवोदास के राज्य में पहुंचे और उत्तर दिशा में गंगा तट के पास गोप्रेक्ष तीर्थ (वर्तमान में गाय घाट और लाल घाट के पास का क्षेत्र) पर अपना डेरा जमाया।
4. राजा दिवोदास को मोक्ष और 'गोपीगोविंद' का प्राकट्य - भगवान विष्णु ने अपने शांत और ज्ञानमयी उपदेशों से पूरे काशी राज्य में धर्म और वैराग्य का प्रचार किया। जब राजा दिवोदास स्वयं इस सन्यासी (भगवान विष्णु) के संपर्क में आए, तो नारायण ने उन्हें संसार की नश्वरता का बोध कराया और उन्हें राजपाठ का त्याग कर मोक्ष प्राप्त करने की प्रेरणा दी।राजा दिवोदास सन्यासी के ज्ञान से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने स्वेच्छा से काशी का राज्य छोड़ दिया और तपस्या करने चले गए, जिससे भगवान शिव के वापस काशी आने का मार्ग साफ हो गया। राजा के जाने के बाद, भगवान विष्णु ने अपने सन्यासी रूप को त्याग कर अपने मूल चतुर्भुज दिव्य रूप में दर्शन दिए।चूंकि भगवान विष्णु ने गोप्रेक्ष (गायों की रक्षा वाले क्षेत्र) में रहकर अपनी लीला रची थी और वहाँ की गोपियों व ऋषियों को आनंदित किया था, इसलिए वे उसी स्थान पर सदैव के लिए 'गोपीगोविंद' के रूप में स्थापित हो गए।
🌸 कथा का निष्कर्ष और वरदान - जब भगवान शिव वापस काशी लौटे, तो वे अपने परम सखा विष्णु के इस उपकार से अत्यंत प्रसन्न हुए। तब भगवान विष्णु (माधव) ने स्वयं घोषणा की थी कि जो भी मनुष्य इस गोप्रेक्ष तीर्थ (गोपीगोविंद घाट) पर आकर गोपीगोविंद रूप के दर्शन करेगा, उसे जीवन-मरण के चक्र और भगवान की महामाया के बंधन से मुक्ति मिल जाएगी।