21/06/2026
सोहम् ओंकार निर्विकार अनादि अखण्ड ध्यान सरूप।
अजर अमर आदि करता पुरुष अचल अनुप।।
कृपा करते दयालु जी काटे बंधन कुरूप।
साहिब बख्शीश सत् सुन दास कर निज रूप।।
सतिनाम को सिमर कर जीव भये तत् रूप।
रविदास कहि भजन को पावे शुद्ध स्वरूप।।