18/06/2026
दादा-दादी और नाना-नानी के नाम एक पत्र
प्रिय दादा-दादी और नाना-नानी,
अक्सर युवाओं पर यह आरोप लगाया जाता है कि वे बड़ों की बात नहीं सुनते। लेकिन शायद असली प्रश्न यह नहीं है कि युवा सुनने को तैयार हैं या नहीं; बल्कि यह है कि क्या हम उन्हें उसी तरह मार्गदर्शन देने के लिए तैयार हैं, जैसे रामफल ग्रेवाल ने अपनी पोती निशा का किया।
हरियाणा के बामला गाँव की एक युवा लड़की, निशा ग्रेवाल ने वह उपलब्धि हासिल की, जिसका सपना लाखों अभ्यर्थी देखते हैं। मात्र 23 वर्ष की आयु में उन्होंने अपने पहले ही प्रयास में यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा 2020 में ऑल इंडिया रैंक 51 प्राप्त की।
उनकी कहानी को असाधारण बनाने वाली बात केवल उनकी रैंक नहीं है। इसके पीछे छिपा रिश्ता उससे भी अधिक प्रेरणादायक है।
उनके दादा, रामफल ग्रेवाल, जो गणित के सेवानिवृत्त शिक्षक हैं, उन्होंने अपना समय नई पीढ़ी की आलोचना करने में नहीं बिताया। उन्होंने उसके साथ कदम से कदम मिलाकर चलना चुना। वे निशा के मार्गदर्शक, अध्ययन-सहयोगी, प्रेरक और सलाहकार बने। गाँव के एक साधारण घर में, महंगे कोचिंग संस्थानों से दूर बैठकर, दोनों ने मिलकर लगभग 200 प्रीलिम्स मॉक पेपर और 40 मेन्स पेपर हल किए।
ज़रा उस दृश्य की कल्पना कीजिए। एक दादा और उनकी पोती एक ही मेज़ पर बैठकर पढ़ रहे हैं, प्रश्नों पर चर्चा कर रहे हैं, विचार साझा कर रहे हैं और एक-दूसरे से सीख रहे हैं। एक ने अनुभव और बुद्धिमत्ता दी, तो दूसरी ने ऊर्जा और दृढ़ संकल्प।
परिणाम केवल एक यूपीएससी रैंक नहीं था। वह समाज के लिए एक सशक्त संदेश था।
प्रिय दादा-दादी और नाना-नानी, आज के युवा सलाह के विरोधी नहीं हैं। वे सीखना नहीं चाहते, ऐसा भी नहीं है। वे सुझाव, मार्गदर्शन और मूल्यों को अपनाने के लिए तैयार हैं। लेकिन वे तब सबसे बेहतर प्रतिक्रिया देते हैं जब बड़े निगरानी करने वालों के बजाय मार्गदर्शक बनते हैं, आदेश देने वालों के बजाय साथी बनते हैं, और आलोचक बनने के बजाय प्रेरक बनते हैं।
रामफल ग्रेवाल ने केवल निशा से यह नहीं कहा कि मेहनत से पढ़ो। उन्होंने स्वयं उसके साथ बैठकर पढ़ाई की।
यही अंतर है।
यदि अधिक दादा-दादी और नाना-नानी उपदेश देने के बजाय सहभागिता को चुनें, आलोचना के बजाय प्रोत्साहन दें, और नियंत्रण के बजाय साथ निभाएँ, तो वे पाएँगे कि आज के युवा सुनने और सीखने के लिए पूरी तरह तैयार हैं।
आख़िरकार, हर निशा को एक रामफल की आवश्यकता होती है।
सादर एवं कृतज्ञता सहित,
डॉ. पवन द्विवेदी
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