18/06/2026
शिवे रुष्टे गुरुस्त्राता गुरौ रुष्टे न कश्चन ।
लब्ध्वा कुलगुरुं सम्यग्गुरुमेव समाश्रयेत् ।।
- श्री गुरु गीता (अध्याय प्रथम, श्लोक ४४)
अर्थात्,
अगर शिव महाप्रभु एक बार रूष्ट हो जाए तो गुरु आपको उनके कोप से बचा सकते है लेकिन अगर गुरु रूष्ट हो जाए तो स्वयं शिव भी आपकी सहाय नहीं करेंगे । अतः गुरुदेव की प्राप्ति होने के पश्चात उनके सानिध्य संग में रहना चाहिए ।
गुरुमंत्रो मुखे यस्य तस्य सिध्यन्ति नान्यथा।
गुरुलाभात् सर्व लाभो गुरुहीनस्तु बालिशः॥
- श्री गुरु गीता (अध्याय द्वितीय, श्लोक १३१)
अर्थात्,
जिसके मुख या हृदय में गुरुमंत्र स्थापित है, उसके सारे कार्य सिद्ध (सफल) हो जाते हैं, अन्यथा नही । गुरु की प्राप्ति ही सबसे बड़ा लाभ है । गुरु के बिना मनुष्य अज्ञानी या नादान (बालिश) ही रहता है ।
संसार के सभी शास्त्रों, पुराणों उपनिषद एवं तंत्र ग्रंथों में गुरु को प्रधानता दी गई है । जिसे गुरु मिला है वह भाग्यशाली है और ऐसे व्यक्ति को निश्चय ही अपने गुरु के शब्दों का अक्षरशः पालन करना चाहिए ।
तुलजापुर में मेरे एक गुरुभाई है, जिन्हें कुछ समय पहले गुरुदेव से दीक्षा प्राप्त हुई । मुश्किल से संध्या सीखना संभव हुआ और प्रथम अनुष्ठान लेने ही वाले थे कि कार्यक्षेत्र में नुकसान हुआ । यही महीने पीठ पर आनेवाले थे, जिससे गुरुदेव से संकल्प लेकर अनुष्ठान ले सके लेकिन स्वास्थ्य में गिरावट आई और अचानक से ऑपरेशन करना पड़ा । अब हालत ऐसी है कि एक महीने तक घर से बाहर नहीं निकल सकते । आज उनसे बात हुई तो उनका दर्द जानकर दुःख हुआ लेकिन उनकी समझदारी देखकर आनंद भी हुआ । उन्होंने यह स्वीकार कर लिया था कि जो हुआ है वो अच्छा हुआ है, भगवती और गुरुमंडल की इच्छा से ही हुआ है । वे पिछले सात महीने से पीठ पर आने की योजना बनाते लेकिन संभव ही नहीं हो पाता लेकिन आज तक उन्हें निराश नहीं देखा । वे हमेशा कहते है कि गुरुदेव ने कहा है कि ये होगा तो होगा ही और नहीं होगा तो नहीं ही होगा । वर्तमान समय में वह अपने कार्मिक बंधनों की वजह से आर्थिक एवं शारीरिक समस्याओं से झुझ रहे है लेकिन गुरु के प्रति इनकी आस्था वैसे की वैसी ही है । यही आस्था में विश्व के हर शिष्य में अपने गुरु के लिए देखना चाहता हूं ।
दीक्षा के पश्चात इन तीन वर्षों में महत्तम ऐसी ही घटना घटी है मेरे जीवन में जिससे कि मेरा ईश्वर पर से विश्वास टूट जाए लेकिन मेरे गुरुमंडल पर के अटूट विश्वास ने मुझे मेरे ईश्वर से जोड़े रखा । इन तीन वर्षों में अच्छी नौकरी से निकलना, विवाह का तय होकर टूट जाना, जो घर पसंद था वो छोड़ना और आर्थिक संकट जैसी स्थितियों के बाद भी जब भी गुरुबा से मिलता तो यही कहता कि गुरुदेव आपकी कृपा से सब सही है और यकीनन इसके बाद मुझे और अच्छी नौकरी मिली, और अच्छा घर मिला और अगर विवाह भाग्य में होगा तो वो भी अच्छी जगह पर अच्छी व्यक्ति के साथ होगा । जब विवाह टूटा था तो मै भी टूटा था लेकिन गुरुदेव की एक ही आज्ञा थी, "अनुष्ठान करते जाओ बस" और वह करता गया । जैसे जैसे अनुष्ठान आगे बढ़ते है, वैसे वैसे अपेक्षा से अधिक प्राप्त होता है । विलंब होता है पर अपेक्षा से कई गुना अधिक प्राप्त हुआ है । संभावना है कि हमारे कार्मिक बंधनों की वजह से वर्तमान में हम जो चाहते है कि समस्या आंशिक स्तर पर भी समाप्त हो, वो ना हो पाए लेकिन फिर इस वजह से गुरु आज्ञा को छोड़कर या गुरु प्रदत्त मार्ग को छोड़कर कही और भटकना या चले जाना, परंपरा और गुरु का द्रोह ही है । अगर गुरु आज्ञा का पालन करते हुए भी अगर किसी और मार्ग पर चलोगे तो भी वह दो नाव में पैर रखकर यात्रा करने समान होगा, जिसमें अंततः आपको डूबना ही है।
कई बार ऐसा होता है कि जब हम किसी और की सहायता या मार्गदर्शन करते है, तब उनका कार्य होने लगता है, और हमें लगता है कि भगवती या ईश्वर हमे उस कार्य का माध्यम बना रहे है, किंतु वास्तव में वो हमारी ऊर्जा का ही अंश है, जो इस्तेमाल हो रहा है और हम उस व्यक्ति के कार्मिक बंधनों में बंधे जाते है । जब मैं किसी को सहाय करने या मार्गदर्शन करने हेतु गुरुदेव से अनुमति मांगता हूं तो बा हमेशा कहती है कि सामाजिक सद्भावना अच्छी बात है, लेकिन उसमें इतना भी नहीं उतरना चाहिए कि स्वयं या तो मार्ग से भटक जाए या फिर स्वयं का ही पतन हो जाए । तंत्र मार्ग में आनेवाले साधक कई लाखों करोड़ों मंत्र का जप करते है तब जा कुछ इतनी ऊर्जा मिलती है कि वो किसी की सहायता का माध्यम बन सके और तुम अभी से इस कार्य में लगोगे तो स्वयं की ऊर्जा को कैसे संभालोगे । पहले आत्मकल्याण कर लो, फिर लोक कल्याण करना । इसी वजह से दो बार पूछने पर भी गुरुदेव ने मुझे ना ही ज्योतिष का अभ्यास करने की अनुमति दी, और न ही उस कार्यक्षेत्र में आगे बढ़ने की । उनका अभी भी मेरे लिए एक ही आदेश है : "अनुष्ठान करते जाओ", और उसी का पालन हो रहा है ।
वरिष्ठ साधक हमेशा कहते है कि नूतन साधक, खासकर ऐसे जो प्रारंभिक और प्रथम स्तर के मध्य में होते है, उनके साधना काल में ऐसी घटनाएं स्वाभाविक रूप से होती है, जिसमें वो किसी की सहायता का माध्यम बनते है, उन्हें कुछ स्तर पर आर्थिक सहाय, यश एवं कीर्ति प्राप्त होती है, चाहे वो उनके लिए इच्छनीय हो या नहीं, लेकिन ये साधना से भटकनेवाला मार्ग है, इस लिए नूतन साधकों को चाहिए कि वो गुरु आज्ञा के अनुसार ही आगे बढ़े । भगवती जिसे सहाय करना चाहती है, उसे स्वयं कर ही लेती है । अगर कोई व्यक्ति किसी पीड़ा में या अवस्था में है तो वो अपने कार्मिक बंधनों की और भगवती की इच्छा की वजह से ही है, तो भगवती के कार्यक्षेत्र में हस्तक्षेप न करना ही उचित रहता है, अन्यथा एक समय बाद वो स्थिति आ सकती है कि गुरु चाहते हुए भी सहाय न करे ।
हर हर महादेव नमश्चण्डिकायै श्रीमन्नारायण।