16/01/2023
कबीर, कह मेरे हंस को दुःख ना दीजे कोय। संत दुःखाए मैं दुःखी, मेरा आपा भी दुःखी होय ।।
पहुँचुँगा छन एक मैं जन अपने के हेत ।
तेतीस कोटि की बध छुटाई, रावण मारा खेत ।।
जो मेरे संत को दुःखी करें, वाका खोॐ वश ।
शब्दार्थ :- संत गरीबदास जी ने बताया है कि श्री रामचन्द्र जी व श्री कृष्ण जी की सहायता उनके शुभ कर्मों के परिणामस्वरूप कबीर जी ने की थी क्योंकि श्री राम तथा श्री कृष्ण जी भी तो उसी सम्राट कबीर के शहजादे यानि राजकुमार है अर्थात् परमात्मा कबीर जी के सब जीव हैं और राम-कृष्ण यानि विष्णु तो अच्छी आत्मा है। उनकी भी रक्षा वही परमेश्वर कबीर जी करते हैं। वे जनता को सावधान करते हैं कि मेरे साधक को कोई कष्ट न देना। भक्त के कष्ट से मैं दुःखी होता हूँ। मैं अपने भक्त की रक्षा करने के लिए एक क्षण यानि सैकिण्ड में पहुँच जाऊँगा। इसी कारण जब श्री रामचन्द्र से रावण नहीं मर रहा था तो गुप्त रूप में मैंने राम का हाथ पकड़कर रावण की नाभि में तीर मारा था जिससे रावण की मृत्यु हुई। राम की सेना को बल दिया, हौसला दिया। इसी प्रकार कृष्ण की सहायता करके कंस को मैंने ही मारा था। जो मेरे भक्तों को सताएगा, उसका कुल नाश कर दूँगा यानि उसके खानदान को समाप्त कर दूँगा।
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