27/12/2020
वाणी _ श्री गुरू आदि प्रगाश ग्रंथ साहिब जी _ अंग _ 57
शब्द पीलो _ 13
जी सुन मन मुख में चोग रही | भूम जाल तिस चोगी पसरिया , खग के उर पई |1| गन बिहंगम चोग को आनी , बधक जाल आई |2| इक खिन माहें गल को कटिया, आह ले सखणे रही |3| रविदास भने तिऊं तूं नर जानी , मीच फास सही |4|
भावार्थ
गुरू रूप गुरू प्यारी साध संगत सतगुरू रविदास महाराज जी फ़रमान करते हैं कि हे मन ध्यान से सुन शिकारी धरती पर जाल लगा कर दाना डाल देता है | दाने की चोग को खाते ही शिकारी पंछियो को मार देता है | और चोग मुँह में ही रह जाती है | हे प्राणी तूं मन के पीछे लग कर संसारिक काल के बनाए स्वाद में फंसा है जब काल रूपी शिकारी मौत रूपी बाण मारेगा तो मुँह का ग्रास मुंह में ही रह जाएगा | समूह पंछी चोग के लालच में शिकारी के जाल में आ जाते हैं | और शिकारी एक छिन में गर्दन काट देता है तो वो हर तरफ से खाली रह जाते हैं | उन का सब कुछ खत्म हो जाता है | सतगुरू रविदास महाराज जी कहते हैं कि हे प्राणी इसी तरह तूं भी जान ले मौत की फांसी सत्य है | काल के संसारिक स्वाद को छोड़ दे | पांच विकार में फंस कर तूं सब कुछ भूल गया | ये सब काल का पसारा है |जब काल रूपी शिकारी मौत देगा तो तेरा सब कुछ खत्म हो जाएगा | काल रूपी शिकारी से बचने के लिए संत महापुरुषों की शरण के अलावा और कोई जगह नहीं है | तो साध संगत जी समय निकलता जा रहा है | देर किए बिना गुरू धारणा कर ईश्वर नाम से जुड़ो जी | फिर काल शैतान शिकारी से बच जाएंगे और यम का डर नहीं रहेगा | गुरू ईश्वर सिमरन करो जी | समूह साध संगत जी को जय गुरू देव जी |
दास राम मूर्ति