श्री महाकालेश्वर भक्त समिति

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श्री महाकालेश्वर भक्त समिति आकाशे तारकं लिंगं पाताले हाटकेश्वरम् ।
भूलोके च महाकालो लिंड्गत्रय नमोस्तु ते ॥

भारत के हृदयस्थल मध्यप्रदेश के उज्जैन में पुण्य सलिला शिप्रा के तट के निकट भगवान शिव 'महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग' के रूप में विराजमान हैं।
भारत के द्वादश ज्योतिर्लिंगों में से स्वयंभू दक्षिणमुखी ज्योतिर्लिंग महाकालेश्वर का स्थान प्रमुख है। तांत्रिक परम्परा में मात्र महाकाल को ही दक्षिण मूर्ति पूजा का महत्व प्राप्त है। इसका वर्णन महाभारत, स्कन्दपुराण, वराहपुराण, नृसिंह पुराण, शिवपुराण, भागवत, शिवलीला

मृत आदि ग्रन्थों में आता है। वर्तमान मंदिर तीन भाग में सबसे नीचे श्री महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग’ उसके ऊपर ’श्री ओंकारेश्वर’ एवं सबसे ऊपर श्री नागचंद्रेश्वर है। श्री महाकालेश्वर मंदिर के दक्षिण दिशा में श्री वृद्धमहाकालेश्वर एवं श्री सप्तऋषि के मंदिर हैं।

इस मंदिर का वर्णन महाभारत, स्कन्द पुराण, वराहपुराण, नृसिंहपुराण, शिवपुराण, भागवत्, शिवलीलामृत आदि ग्रन्थों में तथा कथासरित्सागर, राजतरंगिणी, कादम्बरी, मेघदूत, रघुवंश आदि काव्यों में इस देवालय का अत्यन्त सुन्दर वर्णन दिया गया है। अलबरूनी व फरिश्ता ने भी इस देवालय का सुन्दर वर्णन किया है। पुराणकारों के कथनानुसार विश्वकर्मा ने श्री महाकालेश्वर के निवासार्थ एक भव्य मन्दिर का निर्माण किया, चारों ओर एक परकोटा खिंचवाया। उस मन्दिर के महाद्वार पर एक बड़ा भारी घण्टा स्वर्ण श्रृंखला से लटकता था, और मन्दिर में सर्वत्र रत्नखचित दीपस्तम्भ थे जिन पर रत्नजड़ित दीप प्रकाशित होते थे।

कहा जाता है कि जो महाकाल का भक्त है उसका काल भी कुछ नहीं बिगाड़ सकता। महाकाल के बारे में तो यह भी कहा जाता है कि यह पृथ्वी का एक मात्र मान्य शिवलिंग है। महाकाल की महिमा का वर्णन इस प्रकार से भी किया गया है।

उज्जैन का प्राचीन नाम उज्जयिनी है। उज्जयिनी भारत के मध्य में स्थित उसकी परम्परागत सांस्कृतिक राजधानी रही। यह चिरकाल तक भारत की राजनीतिक धुरी भी रही। इस नगरी कापौराणिक और धार्मिक महत्व सर्वज्ञात है। भगवान् श्रीकृष्ण की यह शिक्षास्थली रही, तो ज्योतिर्लिंग महाकाल इसकी गरिमा बढ़ाते हैं।

जहाँ श्री महाकाल स्थित है वही पृथ्वी का नाभि स्थान है । बताया जाता है, वही धरा का केन्द्र है -
''नाभिदेशे महाकालोस्तन्नाम्ना तत्र वै हर:''

परमार नरेशों के अभिलेखो का प्रारम्भ ही शिव स्तुति से होता है। परमार शासकों का व्यक्तिगत धर्म शैव धर्म होने के कारण जनता में शैव धर्म का प्रचार प्रसार अधिक हुआ। परमार नरेश वाक्पति राज द्वितीय की उज्जयिनी ताम्र पट्टिका से ज्ञात होता है कि उन्होंने भवानीपति की आराधना की व उज्जयिनी में शिवकुण्ड का निर्माण करवाया। परमार नरेश उदयादित्य ने महाकाल मन्दिर का जीर्णोद्धार करवाकर मन्दिर में नाग बंध अभिलेख उत्कीर्ण करवाया। परमार नरेश नरवर्मन के महाकाल अभिलेख से ज्ञात होता है कि उसने उज्जयिनी में शिव मन्दिर का निर्माण करवाया था।

श्री महाकालेश्वर मंदिर के नीचे सभा मण्डप से लगा हुआ एक कुण्ड है जो ’कोटितीर्थ’ के नाम से प्रसिद्ध है। सभा मण्डप मे एक राम मंदिर है। जिसके पीछे ’अवंतिका देवी’ की प्रतिमा है। श्री महाकालेश्वर मंदिर में प्रातः 4 बजे होने वाली भस्मारती विशेष दर्शनीय है। भस्मारती में सम्पूर्ण जीवन के जन्म से लेकर मोक्ष तक के दर्शन की कल्पना की जा सकती है। यह भस्म निरन्तर प्रज्वलित धूनी से तैयार होती है। मंदिर खुलने का समय प्रातः 4 बजे से रात्रि 11 बजे तक है।

त्रिलोकी तीन अवतारों में मृत्युलोक में श्री महाकालेश्वर का अद्वितीय अवतार हैं।
''आकाशे तारकं लिंग, पाताले हाटकेश्वरम्।
मृत्युलोके महाकालं, त्रयलिंग नमोस्तुते''॥
अर्थात; आकाश में तारक लिंग, पाताल में हाटकेश्वर लिंग तथा पृथ्वी पर महाकालेश्वर ही मान्य शिवलिंग है।
आकाश में तारक शिवलिंग हैं जिनकी पूजा देवता आदि करते हैं । आकाश में तारक शिवलिंग है, पाताल में हाटकेश्वर शिवलिंग है और पृथ्वी पर महाकालेश्वर ही मान्य शिवलिंग है। जिनकी पूजा से मनुष्य अपने सारे संकट से मुक्ति पा लेता है और सुख चैन का जीवन व्यतीत करता है। हम इन तीनों दिव्यलिंगो को नमन करते हैं।।

मालववंशीय विक्रमादित्य के विषय में जो आख्यान से प्रतीत होता है इस राजा ने महाकालेश्वर का स्वर्ण शिखर-सुशोभित बड़ा मन्दिर बनवाया। उसके लिए अनेक अलंकार तथा चँवर, वितानादि राजचिन्ह समर्पित किए। इसके बाद ई. सं. ग्वारहवीं शताब्दी में इस मन्दिर का जीर्णोद्धार परमार वंश के भोजराजा ने करवाया था। ई. सं.1265 में दिल्ली के सुलतान शमसुद्दीन इल्तुतमिश ने इस मन्दिर को तुड़वाकर महाकाल का लिंग कोटितीर्थ में फिकवा दिया।

इस घटना के 500 वर्षां पश्चात् जब उज्जैन पर राणोजीराव शिन्दे का अधिकार हुआ उस समय उनके दीवान रामचन्द्रबाबा ने उसी स्थान पर महाकालेश्वर का मन्दिर फिर से बनवाया जो आज भी स्थित है। मन्दिर के अन्दर श्री महाकालेश्वर के पश्चिम, उत्तर और पूर्व की ओर क्रमशः गणेश, गिरिजा और षडानन की मूर्तियाँ स्थापित हैं। दक्षिण की ओर गर्भगृह के बाहर नन्दीकेश्वर विराजमान हैं। लिंग विशाल है और सुन्दर नागवेष्टित रजत जलाधारी में विराजमान हैं। बारह ज्योतिर्लिंगों में महाकालेश्वर ही दक्षिणमुखी मन्दिर है। महाकालेश्वर के गर्भगृह के ऊपर के मंजिल पर ओंकारेश्वर विराजमान हैं। श्री महाकालेश्वर के मन्दिर के दक्षिण दिशा में वृद्धकालेश्वर महाकाल और सप्तऋषि का मन्दिर है। महाकालेश्वर के ऊपर जो ओंकारेश्वर जी का मन्दिर है उसके समीप आसपास षटांगण मे स्वप्नेश्वर महादेव, बद्रीनारायण जी, नृसिंह जी, साक्षी गोपाल तथा अनादि कालेश्वर के भी मन्दिर हैं।

महाकालेश्वर के सभामण्डप में ही एक राम मन्दिर है। राम मन्दिर के पीछे अवन्तिका देवी की प्रतिमा है जो इस अवन्तिका की अधिष्ठात्री देवी हैं। नागपंचमी पर महाकाल मन्दिर के ऊपर विराजित नागचन्द्रेश्वर के दर्शन के लिए हज़ारों श्रद्धालु यहाँ आते हैं। भगवान महाकालेश्वर की आरती दिन में पाँच बार होती है-1. पट खुलने – बंद होने का समय। 2. आरती समय। 3. विशिष्ट कार्यक्रम श्रावणमास के चारों सोमवारों के दिन नगर में महाकालेश्वर की भव्य रजत प्रतिमा की सवारी निकाली जाती है जिसमें नगर के हर धर्म के लोग अपना सहयोग देते हैं। सवारी मन्दिर से निकलकर पहले क्षिप्रा तट पर जाती है। वहाँ पूजन के पश्चात नगर के प्रमुख मार्गों से होते हुए यथा स्थान पहुँच जाती है। पाँचवीं शाही एवं अंतिम सवारी मार्गों में निकाली जाती है। श्रावण मास में काँवड़ यात्रियों की सुविधा के कारण विशेष व्यवस्था होती है।

महाकालेश्वर मंदिर मे अभिषेक एवं पूजन व्यवस्था महाकाल मन्दिर मे प्रबन्ध समिति द्वारा विशेष दर्शन व्यवस्था की सुविधा शुल्क निर्धारित है।

''महाकालेश्वर की सवारियाँ '':-

श्रीमहाकालेश्वर क्षेत्र में ठहरने की व्यवस्था -

धर्मशाला
विश्रामधाम
प्रवचन सभागार

श्री महाकालेश्वर प्रसादी व्यवस्था- महाकालेश्वर सेवा समिति द्वारा तीन प्रकार के प्रसाद तैयार कराकर विक्रय किया जाता है-सूखे मेवा, बेसन लड्डू, चिरौंजी।

अमानती सामान पट-निःशुल्क।

भूतभावन भगवान महाकाल की वर्षभर मे निम्नांकित-सवारियाँ निकाली जाती हैं- सभी सवारियों में प्रशासन की ओर से पुलिस व्यवस्था, प्राचीन राज्य के प्रतीक चोपदार, पुरोहित एवं श्रद्धालुजन सम्मिलित रहते हैं- ये सवारियाँ निश्चित् समय शाम चार बजे निकलती हैं। ये सवारियाँ हैं-

सावन-भादों की 6 सवारियाँ कभी 7 जिसमें एक शाही सवारी (अंतिम सवारी जो भाद्रपद, कृष्ण के अन्तिम सोमवार को निकलती है।)
कार्तिक माह की सवारी (कार्तिक शुक्ल से मार्ग कृष्ण के प्रत्येक सोमवार को)
दशहरा मैदान तक दशहरा के दिन सभी पूजन के लिए बैकुण्ठ चौदस (कार्तिक शुक्ल चतुर्दशी) को रात्रि 11 बजे गोपाल मन्दिर तक ( यह एक मात्र सवारी रात्रि को निकलती है)

''उमा साँझी सवारी''

ज्योतिर्लिंग महाकालेश्वर का विभिन्न अवसरों पर आकर्षक श्रृंगार किया जाता है। यह श्रृंगार दर्शनीय होता है।

श्रामण माह में
शिवरात्रि को
नागपंचमी
भाग पूजा
भात-पूजा

भस्मार्ती शिवरात्रि के दूसरे दिवस दोपहर 12 बजे कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी रूप चौदस के दिन महाकालेश्वर में विशेष अन्नकूट एवं इसके अलावा महाकालेश्वर मन्दिर में अनेक विभिन्न उल्लेखनीय गतिविधियाँ आयोजित होती हैं जो निम्नानुसार है-

हरिहर मिलाप-हरि (विष्णु) और हर (शिव) का मिलाप
श्रावण महोत्सव- महाकाल मंदिर समिति द्वारा श्रावण भाद्रपद के सोमवार से पहले अर्थात् रविवार की शाम को सांस्कृतिक आयोजन करवाया जाता है। जिसमें देश के ख्यातिनाम शास्त्रीय गायक, वादक भागीदारी करते हैं एवं शास्त्रीय नृत्य का आयोजन भी होता है।

शिवरात्रि को दिन में भस्मारती का आयोजन होता है। इस दिन भस्मारती पूजन एवं दर्शन का विशेष महत्व होता है।

''उमा-महेश्वर व्रत''

साँझी उत्सव- मालवा की परम्परानुसार यह उत्सव आयोजित होता है।

नाग पंचमी: वर्ष में 1 बार खुलने वाले नागचंद्रेश्वर मन्दिर में दर्शन के लिए भारी संख्या में श्रद्धालुओं की कतार लगती है।

महाकालेश्वर मंदिर में भूतभावन ज्योर्तिलिंग की पूजा अर्चन के लिए 16 पुजारी प्रशासन द्वारा नियुक्त हैं। भस्मारती के नेम्नूकदार 4 परिवार 8 पुजारी हें, इसके अतिरिक्त ब्राह्मण पुरोहित जो सभा मण्डप में विराजित होते हैं, पूजन अर्चन करवाने के लिए अधिकृत हैं। 16 पुजारी में एक पुजारी मुख्य पुजारी होता है।

पुजारियों को महाकालेश्वर मन्दिर संस्थान द्वारा वेतन दिया जाता है। जबकि पुरोहितों को पूजन-अर्चन करवाने की रसीद का 75 प्रतिशत मिलता है। शेष 25 प्रतिशत मन्दिर के विकास में खर्च किया जाता है। मन्दिर प्रवेश द्वार से पूजन की रसीद कटवाने पर ज्योतिर्लिंग महाकालेश्वर के विविध पूजन निम्नानुसार करवाया जा सकता है-

पूजन

सामान्य पूजा
अभिषेक महिम्न स्रोत
रुद्राभिषेक वैदिक पूजा
रुद्राभिषेक ग्यारह दर्शना वैदिक पूजा
लघु रूद्र
महारूद्र रूद्राभिषेक 11 एक दर्शना वैदिक पूजा

इसके अतिरिक्त एवं भाँग पूजा, भण्डारा, अन्नकूट भी करवाया जा सकता है।

उज्जयिनी में महाकाल की प्रतिष्ठा अनजाने काल से है। शिवपुराण अनुसार नन्द से आठ पीढ़ी पूर्व एक गोप बालक द्वारा महाकाल की प्रतिष्ठा हुई । महाकाल शिवलिंग के रुप में पूजे जाते हैं। महाकाल की निष्काल या निराकार रुप में पूजा होती है। सकल अथवा साकार रुप में उनकी नगर में सवारी निकलती है।

महाकाल वन में अधिष्ठित होने से उज्जैन का ज्योतिर्लिंग भी महाकाल कहलाया अथवा महाकाल जिस वन में सुप्रतिष्ठ है, यह वन महाकाल के नाम से विख्यात हुआ।

काल के ईश्वर शिव के स्वरुप महाकालेश्वर को माना गया है तथा काल की शक्ति देवी महाकाली को कहा गया हैं। तंत्र शास्त्रों में 'महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग' और दश महाविद्या कालिका का सर्वोच्च स्थान है। कहा जाता है कि जो महाकाल का भक्त है उसका काल भी कुछ नहीं बिगाड़ सकता।

अवन्तिकायां विहितावतारं, मुक्ति प्रदानाय च सज्जनानाम्‌।
अकालमृत्योः परिरक्षणार्थं, वन्दे महाकाल महासुरेशम॥
अर्थात; जिन्होंने अवन्तिका नगरी (उज्जैन) में संतजनों को मोक्ष प्रदान करने के लिए अवतार धारण किया है, अकाल मृत्यु से बचने हेतु; मैं उन ‘महाकाल’ नाम से सुप्रतिष्ठित भगवान आशुतोष शंकर की आराधना, अर्चना, उपासना, वंदना करता हूं।
इस दिव्य पवित्र मंत्र से निःसृत अर्थध्वनि भगवान शिव के सहस्र रूपों में सर्वाधिक तेजस्वी, जागृत एवं ज्योतिर्मय स्वरूप सुपूजित श्री महाकालेश्वर की असीम, अपार महत्ता को दर्शाती है।

महाकालेश्वरो नाम शिवः ख्यातश्च भूतले।
तं दुष्ट्वा न भवेत् स्वप्ने किंचिददुःखमपि द्विजाः।।
यं यं काममपेदयैव तल्लिगं भजते तु यः।
तं तं काममवाप्नेति लभेन्मोक्षं परत्र च।।
अर्थात; महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग का दर्शन करने से स्वप्न में भी किसी प्रकार का दुःख अथवा संकट नहीं आता है। जो कोई भी मनुष्य सच्चे मन से महाकालेश्वर लिंग की उपासना करता है, उसकी सारी मनोकामनाएँ पूर्ण हो जाती हैं और वह परलोक में मोक्षपद को प्राप्त करता है।

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Mahakaleshwar Jyotirlinga
Ujjain
456006

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