Suman Bhai Ji Ram Katha

Suman Bhai Ji Ram Katha Sant Shri Dr. Suman Bhaiji Manas Bhushan Parentage: Born into a staunchly religious family of Pt. Kantidevi. He came out with invaluable gems of ramkhata.

Date of birth and place: 13th April 1958 at kankhal (Haridwar) A famous mythological historical and legendry place at the bank of the ganga. Mamraj Sharma, a devotee of lord Shiva and the affectionate mother Smt. The family background held sumanbhaiji developed a faculty for ShriRam in early religiously brought up boyhood. Formal Education: At Kankhal having acquired visharad and sahityaratna degr

ee and passed M.A. Suman Bhai was genuinely observed in studies of the Holy Scripture ramcharitmanas

Spiritual Enlightenment: discovering a growing sapling of spirituality in the mind of Suman Bhai a learned and devoted disciple and genuine spiritual aspirant in him. The great guru Mauni Baba made up his mind to import his spiritual power to him. The guru showered his blessings to Suman Bhai, a deserving disciple who left awakened to divine power and spiritually enlightened. Spritual Prectices: in close proximity and under the begins care of param pujya Mauni Baba Suman Bhai was led into the fathomless ocean of ramcharitmanas. He then thoroughly studied Manas and took to reciting its couplets bringing home its narrative to the people at large by means of Ramkatha. Man who influenced Sant Shri Suman Bhai: Beside param pujya Shree shri Mauni Baba’s blessings, Suman Bhai ji deserved inspiration from great scholars and personalities like acharya Pt. kishoridas vajpaye, the modern panini, Pt. Bhagwan vallabh Pandey, Pt. Atma Chandra shastri, respected govind das ji Maharaj and Shree madhavacharya ji Maharaj. Yet others who had inshipping Sant Shree Suman Bhai’s career are shri rambhuwan das ji’s Manas bhramar of kashi, Swami akilesh ji of bhojpur, Baba shyamcharandas ji Maharaj of gangotri tirth, Dr. Jitendra Bhartiya of lucknow, the author of famous work of saraswat kundalini mahayoga, Dr. Gaurinath sashtri of kolkata, a great spiritual teacher and paramvibhuti shri shri anandmayi maa of Haridwar. Degrees and Awards:

“Sant Shree” by Jagatguru shankaracharya Swami divyananand ji tritha on the occasion of the release of the audio cassette of Ramkatha.
“Manas Marmagya” By Shree badri kedarnaath sameeti, Kedarnath tirth.
“Manas Suman” By varanaseya vidwat parishad sameeti varanashi.
“Manas Rajhans” By Sanskrit sahitya parishad vaijnath dham Jharkhand.
“Manas Bhushan” by Kashi Hindu University. For his convincing.
“Manas Maral”, “Manas Sindhu”, “Manas vid” and “Manas Murthi” by various organizations in Indonesia, Singapore, Pakistan and Afrika. Admiration at Katha Vyas: Sant Shree Suman Bhai Ji’s extra ordinary story telling style and elocution has widely being admired by Jagatguru Swami swarupanadji Maharaj of dwarikapeeth, Swami madhavashram ji Maharaj, Jagatguru badrikashram, Sant shri Murari bapu, Vitrag Swami kalyandevji Maharaj, Swami Shree vishnuashram ji, Shankaracharya Shree Divyanand ji tirth and mahamandleshwar Swami vivekanand ji Maharaj and a large no of other distinguish personalities. His Devotion to World Peace:Under the divine inspiration of Shree Shree Mauni Baba Sant Shree Suman Bhai Ji successfully organized “Antarrashtriya vishwa Shanti Sammelan" in ujjain in 2008 and 2009 conveying the message of World Peace to the World through the great authors and scholars and World renown. Revolutionary Services to Society culture and literature: Sant Shree Suman Bhai Ji has started revolutionary services to the society culture and literature through the following awards. Rashtravibhuti Jatayu Samman: To one who fight against social evils. Sandipani Shree Krishna samman: To meritorious Students. Mountirth kala Sadhak Samman: To a maestro in the field of music. Gauraksha Samman: To one who serves and preserves cows. Sudama Nidhi Yojna: To resourceless Students. Shreeman Smriti Seva Samman: To devoted Social service
Vidushi Vidyottama Samman: Started in 2001 on the National level award to literary personality who written on vidushi viyottma. His works: Besides being an eloquent speaker of Ramkatha, Sant Shree Suman Bhai Ji is an author of great fame publishes by Shree ram naam seva ashram ujjain. His famous works available at Mountirth are:

Shanty Rev Shanti. Ek sool Mohi bisra na kahu. Mangalacharan. Maun Anujbhootiyan. Shanti… Shanti… Shanti...
Voice of Silence. I can never forget a colic pain. His contribution to journalism:

Manas vandan: A maun tirth magazine is being brought out under the guidance of Sant Shree Suman Bhai for 13 years. Manas Stambh: A fortnightly publication for over a decade.

10/11/2012
09/11/2012

'जेहि तन दियो ताहि बिसरायो, ऐसा नमक हरामी।

भाजपा के राज्यसभा सांसद और वरिष्ठ वकील राम जेठमलानी के भगवान् राम को बुरा पति कहने तथा उन्हें पसंद नहीं करने और मछुआरों के कहने पर बेचारी महिला सीता को वनवास भेज दिए जाने संबंधी विवादास्पद बयान पर प्रतिक्रिया करते हुए सुप्रसिद्ध रामकथावाचक संतश्री डॉ. सुमनभाई 'मानस भूषणÓ ने कहा है कि राम जेठमलानी कोई धर्मगुरु नहीं है। अत: उन्हें इस प्रकार के वक्तव्य देने का कोई अधिकार भी नहीं है।
संतश्री डॉ.सुमनभाई ने कहा कि रामकाल में जो न्याय प्रक्रिया थी तथा उस समय जो संविधान था वह वर्त्तमान परंपराओं एवं संविधान से अलग था। ऐसी स्थिति में वर्त्तमान से उस काल की तुलना करना न सिर्फ हास्यास्पद है अपितु मूर्खतापूर्ण भी है। वाल्मीकि रामायण में यह कहीं नहीं कहा गया कि मछुआरों के कहने से राम ने सीता का परित्याग कर दिया, ऐसा उल्लेख नहीं है। कुछ किंवंदंतियों में रजक (धोबी) की चर्चा जरूर आती है। लेकिन वाल्मीकि रामायण में पूरी प्रजा सीता पर आक्षेप लगा रही थी, ऐसी चर्चा आती है। जब प्रजा ने यह आक्षेप लगाया तो राम ने यह विवेकपूर्ण निर्णय लिया कि जानकी का त्याग कर देना चाहिए, यह उस समय का राजधर्म था। वर्त्तमान काल के राजधर्म का एक दृष्टांत मुझे स्मरण हो रहा है— 'वर्त्तमान का राजधर्म यह है कि एक मंत्री की बेटी का अपहरण आतंकवादियों ने कर लिया तो बेटी को आतंकवादियों से छुड़ाने के लिए मंत्रीजी के अनुरोध पर पाँच आतंकवादियों को छोड़ दिया गया। एक अन्य दृष्टान्त में आतंकवादियों ने नेपाल से उड़ने वाले जहाज का अपहरण कर लिया था तो सत्ताधीशों ने आतंकवादियों की मांगे मंजूर करते हुए उनके सामने समर्पण कर दिया। रामराज्य में बहुमत के आधार पर निर्णय नहीं होता था। निर्णय का आधार सर्वमत होता था। सर्वमत यह था कि रावण की लंका में जानकी रही थी तो राम ने उसे अपने पास रख लिया यह उचित नहीं किया। यह प्रजा का मत था इसलिए राम को यह निर्णय लेना पड़ा। एक तरफ प्रजा कह रही थी कि राम को राजा बनाओ, लेकिन फिर भी कुछ लोगों का मत ऐसा था कि भरत का राज्याभिषेक कर दो और राम को वनवास भेज दो। मन्थरा, कैकेयी और अन्य का मत अलग था। इसीलिए राम को भी वन जाना पड़ा था।
राम अच्छे पति थे या नहीं थे, इसका निर्णय राम जेठमलानी नहीं कर सकते। हमारी ऋषि परंपरा या हमारे धर्माचार्य ही इस पर निर्णय दे सकते हैं। वाल्मीकि ने कह दिया कि राम मर्यादा पुरुषोत्तम हैं अर्थात् राम राष्ट्र के आदर है। ऋषि की मांग यही थी कि हमारे यहां के प्रत्येक व्यक्ति को राम जैसा होना चाहिए। प्रत्येक व्यक्ति राम जैसा अच्छा पुत्र, अच्छा पति, अच्छा भाई व अच्छा पिता हो, अच्छा मित्र हो— ये सारे गुण राम में मिलते हैं। इसलिए शताब्दियों और युगों-युगों से हमारे यहाँ सीताराम, राधाकृष्ण या गौरीशंकर संबोधन करने की प्रथा है तथा यही आदर्श है इस राष्ट्र का। श्री मोहनदास करमचंद गाँधी ने राम को आदर्श माना तो वे महात्मा गाँधी हो गए। यह राम के चरित्र का गुण है कि राष्ट्रप्रेमी व्यक्ति महात्मा के नाम से विश्व में जाना जाने लगा और प्रसिद्ध भी हुआ। यह रामनाम की महिमा का ही पुण्य प्रताप है। भारत के सपूतों में महात्मा गाँधी की गिनती इसीलिए होने लगी कि उन्होंने राम को आदर्श माना था।
राम जेठमलानी कहते हैं कि मैं राम को नहीं मानता, किसी भी तरह पसंद नहीं करता। मजे की बात यह है कि उनका स्वयं का नाम 'रामÓ ही है। उनके जन्म के समय उनके पिता ने अपने आदर्श महानायक और इष्ट भगवान राम का नाम उन्हें दिया। शायद उन्होंने सोचा होगा कि इस बालक में सभी रामोचित गुण विद्यमान रहेंगे। किन्तु उन्हें क्या पता था कि राम के नाम से जाना जाने वाला मेरा पुत्र रामनाम को आधार बनाकर चलने वाली भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) का राज्यसभा सदस्य होकर भी अपनी पार्टी की विचारधारा व अपने पिता द्वारा दिए गए नाम के विरोध में एक दिन खड़ा हो जाएगा और अपने स्वयं के नाम को धिक्कारेगा। आज अखबारों में प्रकाशित राम जेठमलानी के वक्तव्य को पढ़कर मेरी व समूचे हिन्दू जनमानस के हृदय को तो ठेस पहुँची ही है, किंतु मुझे बरबस ही एक भक्तकवि की यह पंक्ति स्मरण हो आई— 'जेहि तन दियो ताहि बिसरायो, ऐसा नमक हरामी।Ó
मेरे मत में राम जेठमलानी का यह वक्तव्य बुद्धि का दिवालियापन है। —

28/09/2012

पांँच हजार वर्ष पुरानी गीता

यह पांँच हजार वर्ष पुराना ज्ञान
किसी युग में चाहे कितना भी उपयोगी
रहा हो, आज के त्वरित ब्रह्माण्ड में, जो
स्वयं तेजी से बदल रहा है, और जब
हमारा ज्ञान दिन दूना रात चौगुना बढ़
रहा है, तब इसका ऐतिहासिक महव
हो सकता है, कितु आज के जीवन के
लिए यह अधिक प्रासंगिक नहीं हो
सकता। आज तो हमें अंग्रेजी में लिखी
पुस्तक ‘अरबपति कैसे बने?Ó अवश्य
ही पढऩा चाहिए।
आज के जमाने में विज्ञान और
प्रौद्योगिकी जो परिवर्तन ला रही है,
उसमें वस्तुओं में परिवर्तन बहुत तीव्र
है, यथा कारें, फोन, टी.वी. कह्रश्वयूटर,
चिकित्सा विज्ञान, जैव प्रौद्योगिकी, नैनो
प्रौद्योगिकी तथा अन्य बहुत उत्पादन की
मशीनें, बहुल विनाश के आयुध आदि
में तेजी से नए मॉडल आ रहे हैं। किंतु जो सोच में परिवर्तन है वह और भी
अधिक महवपूर्ण है।
मात्र लाभ के लिए बढ़ाए गए बहुत उत्पादन से असंय भोग की वस्तुओं
का विक्रय उद्योगपति के लाभ के लिए आवश्यक हो गया है। इसलिए सभी
मनुष्यों को रंगीन माध्यम तथा सैसी मॉडलों की मदद से अनावश्यक वस्तुओं
का आवश्यक सिद्ध कर खूब बेचा जा रहा है, सुख का सपना दिखाकर
भोगवादी बनाया जा रहा है, जो दु:स्वप्र बन रहे हैं। प्रसिद्ध अमेरिकी
मनोवैज्ञानिक डैनी कानमैन ने अनुसंधान के बाद घोषित किया है— पिछले
50 वर्षों में सुविधाएं तथा समृद्धि तो बहुत बढ़ी हैं, किंतु सुख नहीं के बराबर
बढ़े हैं, अपराध और उनकी नृशंसता बढ़ रही है। कमजोरों का, महिला हो
या पुरुष, बालक हो या वृद्ध, शोषण बढ़ा है। मिट्टी, जल और वायु का प्रदूषण,
पर्यावरण का विनाश, जलवायु का विचलन और वैश्विक तापन आदि दु:खद
रूप से बढ़ रहे हैं। किंतु टीवी और रंगीन माध्यम ने जैसे हमारी सोच पर
कजा कर लिया है, और हम महत्वपूर्ण विषयों की चिंता न कर क्षुद्र विषयों
की चिंता करते हैं कि किसने कितने छक्के मारे या किस एटर या ऐट्रेस का
किससे या चल रहा है। आज स्थिति बद से बदतर होती जा रही है। समस्या
के मूल में मनुष्य और प्रकृति का अंधाधुंध शोषण है। और इसके मूल में
भोगवाद अर्थात् अपने लिए अधिक से अधिक भोग करने की होड़ है। आश्चर्य
कि इन समस्याओं के हल हमें इन हजारों वर्ष पुराने ग्रंथों, उपनिषदों, रामायण
तथा श्रीमद्भगवत गीता में मिलते हैं।
श्रीकृष्ण के उपदेश से युद्ध से विमुख हो रहे अर्जुन युद्ध के लिए तैयार
हो जाते हैं। और अलीपुर जेल में श्री अरबिंद श्रीकृष्ण की प्रेरणा से सशस्त्र
क्रान्ति के क्षेत्र को छोड़कर योग क्षेत्र में आ जाते हैं। एक ही गीता से दो उल्टे
परिणाम। यह कैसे।
अर्जुन अपने श्रद्धेय पितामह, गुरु आदि की हत्या नहीं करना चाहता। वह
लाखों हत्याएं आदि से उत्पन्न विभीषिका के दुष्परिणाम नहीं चाहता। श्रीकृष्ण
ने अर्जुन को पहले उसके क्षत्रिय धर्म का स्मरण कराया कि अन्याय के विरुद्ध
लडऩा उसका कर्ाव्य है, योंकि सभी शांतिपूर्ण विधियां असफल हो चुकी
थीं। उसे मानसिक दु:ख तथा हत्या के अपराध से बचने के लिए वे उसे
समझा चुके हैं (20.2) कि आत्मा तो अमर है, यह शरीर ही जन्ममरणशील
है। फिर वे (32,2) उसे स्वर्ग का लाभ दिखलाते हैं। फिर वे उसे युद्ध न
करने से उत्पन्न पाप का ही डर दिखलाते हैं (33,2)। फिर वे उसके पाप के
डर का निवारण करते हैं, सुख और दु:ख, लाभ और हानि तथा जय और
पराजय को समान मानकर युद्ध करो, तब तुहें पाप नहीं पड़ेगा (38,2)।
फिर वे बुद्धियोग के द्वारा स्पष्ट करते हैं कि सुख दु:ख, लाभ-हानि और
जय-अजय इन सभी को एक कैसे समझें। इसके लिए (42-45,2) वेदों
की लुभावनी वाणी के द्वारा भोगों की अनुशंसा का विरोध करते हैं योंकि
भोग से तो मनुष्य की बुद्धि ठीक से कार्य नहीं करती। आगे (47,2) वे
कहते हैं मनुष्य का अधिकार केवल कर्म करने तक ही है, कर्म के फल में
नहीं है। अत: उसे, इन सभी फलों की चिंता किए बगैर, कर्म तो करना ही
है। और उसे समत्व योग में स्थित रहते हुए कर्म करना है अर्थात् सिद्धि और
असिद्धि को समान समझते हुए ही कर्म करना है जिससे वह कर्म एक योग
बन जाता है। समत्व योग। इसी समत्व योग में स्थित होकर और बिना आसक्त
हुए कर्म करना है योंकि यह बुद्धियोग कर्म बंधनों से अर्थात् पाप से मुक्त
करता है (48,2)। इसके बाद वे अर्जुन से युद्ध करने के लिए गीता के अंत
में ही कहते हैं, जब उसके सारे संशय और मोह नष्ट हो जाते हैं।
यह बुद्धियोग या समत्व योग में स्थित होना कैसे होता है? इसमें स्थित
होकर अर्थात् सुख और दु:ख, लाभ और हानि तथा जय और पराजय को
समान मानकर कर्म करने से पाप नहीं पड़ता (38,2)। यह जादू कैसे?
पाप के अनेक अर्थ हंै, यहाँं, जो कर्म सच्चे सुख से दूर ले जाए वह
पापकर्म है। कर्म कैसे दु:ख देता है? हम जब कर्म करते हैें तब लाभ, जय
या सुख आदि की प्राप्ति के लिए करते हैं। जब हमें कर्म करते समय कर्मफल

प्रेरित करते हैं तब वे प्रेरणा तो देते हैं किंतु साथ ही चिंता और तनाव ाी देते
हैं। कोई विद्यार्थी स्वर्ण पदक के लिए अच्छी मेहनत तो कर सकता है किंतु
इसकी कोई गारंटी नहीं कि उसे स्वर्ण पदक मिल ही जाएगा। इस कारण से
वह अनावश्यक तनाव में आ सकता है। गारंटी न होने के अनेक कारण हो
सकते हैं। एक कारण तो यह कि अनेक विद्यार्थी उस पदक के लिए परिश्रम
करते हैें। दूसरा परीक्षक की जांच भी पूरी तरह वस्तुपरक न होकर मूड पर
निर्भर करती है। किंतु उन स्वर्णपदक प्रतियोगियों के मन में तो परिणाम के
आने तक तनाव बना रहता है। दृष्टव्य है कि इसके पहले भी, कर्म के पूरे
समय यह तनाव बना रहता है कि प्रश्रपत्र कैसा आएगा, अनेक विद्यार्थियों
को परीक्षा बुखार हो जाता है, लिखते समय तनाव बना रहता है इत्यादि। और
जब नहीं मिला तब दु:ख होगा। फिर स्वर्ण पदक न मिलने के तरह-तरह के
कारण खोजे जाएंगे और व्यर्थ की बातों में, अशांति में, समय बीतेगा और
यदि स्वर्ण पदक मिल गया तब तो लंबे समय तक उसका अर्थात् उसकी
विजय की खुशी का तनाव बना रहता है, दुंदुभी पीटी जाती है, जो व्यर्थ का
अहंकार पैदा करती है। वैसे भी, स्वर्ण पदक का यह अर्थ तो नहीं कि जीवन
के अन्य कार्यों में भी उस व्यक्ति का कौशल सर्वश्रेष्ठ हो। पढ़ाई का उद्देश्य
स्वर्ण पदक नहीं वरन् ज्ञान प्राप्त करना होना चाहिए और सारे प्रयत्न उसी
दिशा में होना चाहिए,इसमें किसी से प्रतियोगिता नहीं, वरन् ज्ञान का आनंद
ही आनंद है। क्रिकेट खेलने का उद्देश्य अच्छी क्रिकेट खेलना होना चाहिए,
पैसा कमाना नहीं। यदि पैसा ध्येय हो गया तब फििसंग तो होगी ही।
दृष्टव्य यह है कि कर्मफल की चिंता किए बिना, उस कर्म में आसक्ति के
बिना कार्य पूरी क्षमता तथा योग्यता से करना है। इसके भी बाद यदि असफल
हो गए तो कोई दु:ख नहीं योंकि जितना भी अच्छा किया जा सकता था वह
कर्म किया गया था, उससे अधिक तो नहीं किया जा सकता था तब अफसोस
किस बात का। अब उस असफलता से सीख लेकर आगे बढऩा है और उसे
भूल जाना है। कर्मफलों के लिए काम करना और उन्हें याद रखना यही तो
कर्म बंधन है। स्वर्ण पदक मिल गया तो उससे बंँध गए और नहीं मिला तो
भी बंध गए, यही एक अर्थ में पाप हैं योंकि वह दु:ख देगा ही। सुख भी
बंधन है। बंधन ही तो पाप है। यदि किसी ने एक वर्ष में एक करोड़ रुपया
कमाया और बहुत खुश हुआ, अब वह दूसरे वर्ष दो करोड़ चाहेगा, और इस
तरह वह उस के चक्कर में और तद्जनित तनावों में फँस जाएगा, यही सुख
का बंधन है और इसलिए पाप है।
यह कहकर कि चूंकि प्रत्येक कर्म के साथ सुख या दु:ख लगा है, कर्म
ही नहीं करना है, गलत होगा योंकि बिना कर्म किए तो व्यक्ति जीवित ही
नहीं रह सकता। कर्म तभी करिए कि जब आपको लगे कि वे आपके कर्ाव्य
हैं, जैसे कि गरीबों की सेवा इसलिए नहीं करना है कि पुण्य या यश मिलेगा,
वरन् इसलिए कि एक मानव होने के नाते वह
आपका कर्ाव्य है। सुख या दु:ख वास्तव में कर्म
के साथ नहीं जुड़ा है, वरन् कर्मफल की इच्छा या
आसक्ति के साथ जुड़ा है। यह कर्मफल की
आसक्ति छोडऩा है। कर्मफल के लिए कर्म न कर
अपने कर्ाव्यों के लिए कर्म करना है। विद्यार्थी का
कर्ाव्य है कि वह ज्ञानार्जन कर, गृहस्थ का कर्ाव्य
है कि वह परिवार का पालन पोषण करे नैतिक
आधार पर, यथा संभव यथा योग्य। इसके लिए
परिवार की आवश्यकताओं, अपनी योग्यताओं
और समाज में उपलध संभावनाओं को समझना
आवश्यक है। जिसके लिए बुद्धि के विकास की
आवश्यकता है। उसी कार्य के लिए विद्यार्थी जीवन
है, इसे व्यर्थ के आकर्षण में फंँसकर नहीं गवां देना है। गृहस्थ जीवन में भी
बुद्धि लाभ करते रहना है, टीवी आदि जैसे हानिकारक कर्म में समय नहीं
गंवाना है। टीवी मुयतया आपके समय पर कजा कर आपकी जेब खाली
करता है, आपको सोचने और ज्ञान प्राप्त करने के लिए समय नहीं देता है,
आपको व्यर्थ की जानकारियों में फँसाता है कि आप भ्रम में रहे कि आपको,
आपके बच्चों को, बहुत ज्ञान है। टीवी आपको निष्क्रिय बनाकर अपना गुलाम
बनाता है, आपको बीमारियां तो बोनस में मिलेंगी, आपके घर में फूट डालता
है। गीता या ऐसे उदाा ग्रंथों के पारायण द्वारा आपकी बुद्धि का विकास होगा,
तनाव से मुक्ति होगी और शांति रहेगी। निरासक्ति को समझाने के लिए गीता
बार-बार उसकी चर्चा करती है (10, 5)।
जो व्यक्ति आसक्ति को त्याग कर कर्म करता है वह जल में स्थित कमलपत्र
की तरह पाप से लिप्त नहीं होता। आप कर्म कर रहे हैं, पूरी क्षमता तथा योग्यता
से किंतु वह कर्म पर सवार नहीं है, जैसे कमलपत्र के ऊपर स्थित बिन्दु पूरी
तरह से उस पर रहते हुए भी पूर्ण स्वतंत्र रहता है, वैसे ही आप भी कर्मबंधन
अर्थात् कर्मफल के बंधन से अर्थात् पाप से मुक्त है!! इसमें जो शांति है,
यद्यपि उसकी भी कामना नहीं की गई थी, वह कामनापूर्ति पर होने वाला
अर्थात् बाँधने वाला सुख नहीं है वरन् मुक्ति की शांति है, आपके हृदयाकाश
के निर्मल होने की शांति है। सच्चिदानंद की दिशा में ले जाने वाली शांति है।
अब दूसरी तरफ देखें, श्री अरविन्द जो क्रांतिकारी के समान सशस्त्र
स्वतंत्रता युद्ध में रत थे, कृष्ण ने उनके कारावास के समय उनके सारे संशय
दूरकर उन्हें क्रांतिकारी क्षेत्र से हटाकर योग में प्रवृा कर दिया। यह या रहस्य
है? यही तो गीता की महिमा है कि वह प्रत्येक समस्या के अनुकूल व्यक्ति
को सही हल की प्रेरणा देती है। श्री अरबिन्द समझ गए थे कि बिना आत्मज्ञान
हुए भारत को जो स्वतंत्रता मिलेगी वह अपूर्ण होगी योंकि उसमें भारतीय
संस्कृति का प्रभाव भी अधूरा होगा, और वह अस्थाई भी हो सकती है। सच्ची
स्वतंत्रता तो तभी होगी जब हम स्वयं अपने शरीर के बंधनों से अर्थात् भोगवाद
से मुक्त होंगे और त्यागमय भोग पर आधारित जीवन जीएंगे। उस स्थिति में
व्यक्ति केवल भला करता है, जैसा श्री अरबिन्द ने किया। वे जानते थे कि
भारत की सच्ची स्वतंत्रता का अर्थ है मानव की स्वतंत्रता जिसमें दु:खों से
मुक्ति भी सिमलित है। लोग कहते हैं कि गीता युद्ध की अनुशंसा करती है,
जी हाँं, किंतु तभी कि जब वह अनिवार्य हो जाए। श्रीमद्भगवद्गीता के संदेश
पर यदि कार्य किया जाए तो विश्व में युद्ध ही न हों और शांति का साम्राज्य
छा जाए।

20/09/2012

विचारों से तय होता है इंसान का भविष्य

प्रत्येक मनुष्य के उत्थान पतन में विचारों का
बड़ा भारी प्रभाव पड़ता है। मनुष्य की सफलता में
उसकी सकारात्मक सोच, लक्ष्य तय करना व उस
पर दृढ़ रहकर मनोयोग से काम करना, यही संसार
में सफलता के कारक माने जाते है। बहुत से लोग
भाग्य, अनुकूल परिस्थितियों, विरासत में मिले धन
को ग्रह देवी-देवताओं के सहयोग को ाी उन्नति
का कारक मानते हैं परंतु परिस्थितियाँ सदा अनुकूल
नहीं रहती, बिना किए भाग्य एक कदम भी आगे
नहीं बढऩे देता।
विरासत में मिला धन बिना विवेक व सही
विचार के भोग विलास व दूसरे कार्यों में खर्च हो
जाता है योंकि बिना स्वयं की मेहनत के मिला
धन ज्यादा देर नहीं टिकता। रही ग्रह नक्षत्रों की तो
ये हस्तरेखा विशेषज्ञों की रोजी रोटी के काम आते
हैं। मनुष्य के उत्थान पतन में ग्रह नक्षत्रों का कोई
रोल नहीं है ऐसा मेरा मानना है। अगर होता होगा
तो मैं नकारता भी नहीं। अपनी-अपनी सोच है
परन्तु इतिहास उठाकर देखो जिन-जिन लोगों ने
भी सफलताओं की ऊँचाइयों को छुआ है वे गरीब
घरों में पैदा हुए लोग ही हैं आसमान से पैसा लेकर
नहीं टपके।
स्वयं ही लोगों ने अपने जीवन के लिए गंभीरता
से सोच कर लक्ष्य बनाए हैं और एक बार लक्ष्य
बनाने के बाद पूरे मनोयोग से उस पर श्रम किया
है निराशा को पास फटकने नहीं दिया। असफल
होने पर भी उसी लक्ष्य पर काम किया है और
मंजिल छूकर ही दम लिया है।
याद रखो मंजिल कभी नहीं खिसकती है, राही
ही थक कर बैठता है व तकदीर व अन्य बहाने
बनाकर बीच में ही काम को छोड़ बैठता है।
उदाहरण के तौर पर आपकी मंजिल या किसी शहर
में जाना है वह आपसे 100 किलोमीटर दूर है तो
वे शहर तो वहीं का वहीं रहेगा थककर आप 10
मील, कोई 20 मील कोई 40 मील कोई 50 मील
चलकर कहेगा कहां है मंजिल हमें तो कोई मंजिल
नजर नहीं आ रही। इसी भावना व मन को
समझाकर उल्टे पैर वहीं पहुंँच जाता है जहां से
चालू हुआ था। अगर मन में पूरा आत्म विश्वास
होता आशा होती आत्मबल होता तो वह लौटकर
नहीं आता चलता रहता। आखिर मंजिल पर पहँुंच
ही जाता।
यह उदाहरण है जार्ज वांशिगटन पूर्व राष्ट्रपति
का। धंधा किया असफल हुआ, अन्य काम भी
किया असफल हुआ, चुनाव लड़ा 10 बार हारा
पर हिमत नहीं हारी। अंत में चुनाव जीता। राष्ट्रपति
बना व सबसे लोकप्रिय राष्ट्रपति बना। अल्वा
रेडसन जब बल्ब का 10 हजार बार हारा फिर नई
ऊर्जा से फिर शुरु हुआ और बल्ब के आविष्कार
में सफल हुआ। यह कहानी करीब सभी वैज्ञानिकों
की है। अगर एक बार में कम मेहनत में आदमी
सफल होगा तो उस सफलता का कोई मूल्य नहीं
जितनी बड़ी सफलता उतनी ही बड़ी मेहनत।
पहले गरीब था, फुटबाल के पैसे भी नहीं थे।
पर लगा रहा कपड़े की गेंद बनाकर और पेले महान्
के नाम से फुटबाल मैच जीते और विश्वास सितारा
बन गया। जितने भी लेखक, आविष्कारक, व्यापारी
उद्योगपति सफलता के चरम पर हैं सबने कठोर
श्रम किया। श्रम का सहारा लिया और सफलता का
कोई रास्ता नहीं। निराशा
को फटकने मत दो तुहें
सफलता से कोई नहीं रोक
सकता। गीता में कहा है
जैसा तुम अपने बारे में
सोचोगे वैसे ही बनोगे
इसमें तनिक भी संदेह नहीं
है।

ॐ अथ श्रीराम सहस्रनाम स्तोत्रम्।। नामैवैकं कलौ युगे।।हमारे प्राचीन साहित्य में स्तोत्र साहित्य का महवपूर्ण स्थान है, वै...
18/09/2012

ॐ अथ श्रीराम सहस्रनाम स्तोत्रम्

।। नामैवैकं कलौ युगे।।
हमारे प्राचीन साहित्य में स्तोत्र साहित्य का महवपूर्ण स्थान है, वैदिक साहित्य तो समग्रत: परब्रह्म की स्तुति
गाता ही है, लौकिक साहित्य में भी स्थान-स्थान पर देवस्तुतियां मिलती हैं। महर्षि वाल्मीकि के आदि महाकाव्य
रामायण में भी सूर्य आदि देवताओं की स्तुति अनेकत्र मिलती हैं। पुराणों में तथा श्री महाभारत एवं श्रीमद्भागवत
में अनेक दिव्य स्तुतियां उपलध होती हैं। आदि शंकराचार्य तक यह स्तोत्र परपरा की धारा अविच्छिन्न रूप से
बहती रही है। सहस्रनाम स्तोत्र परपरा भी स्तोत्र-साहित्य की एक विधा है जिस में अपने इष्टदेव की उसके
दिव्य चरित के आधार पर सहस्रनामों से स्तुति की गई है। सहस्रनाम-परपरा में सर्वप्रथम महाभारत के अनुशासन
पर्व में भीष्म-युधिष्ठिर संवाद में 'श्री विष्णुसहस्रनामÓ का वर्णन हुआ है। इसी प्रकार शिव-पार्वती संवाद में समोहन
तंत्र के रूप में श्री गोपाल सहस्रनाम स्तोत्र भगवान् शिव द्वारा वर्णित है। ये दोनों सहस्रनाम अत्यधिक प्रचलित
एवं लोकप्रिय हुए। महाकाली, शिव, महालक्ष्मी, गणेश आदि के नामों से आगे चल
कर सहस्रनाम स्तोत्र लिखे गए प्राचीन साहित्य में कुल मिलाकर दस-बारह सहस्रनाम
स्तोत्र मिलते हैं परंतु रामायण, महाभारत, अठारह पुराण अथवा उारवर्ती स्तोत्र साहित्य
में कहीं भी भगवती सीता एवं श्रीराम के पावन नामों के सहस्रनाम स्तोत्र प्राप्त नहीं
होते, जबकि भारतभूमि पर राम-नाम सर्वाधिक इष्ट एवं जनमानस में रचा बसा है।
इसी विचार ने मुझे श्रीसीता सहस्रनाम स्तोत्र तथा श्रीराम सहस्रनाम स्तोत्र लिखने की
प्रेरणा दी। सभवत: इससे पूर्व भी किसी विद्वान भक्त द्वारा इस दिशा में प्रयास किया
गया हो जो मेरी जानकारी में न हो परन्तु मेरे लिखे इन सहस्रनाम स्तोत्रों की विशेषता
यह है कि ये चरितानुसरण क्रम से लिखे गए हैं। इस रचना के महव और माहात्य
के विषय में मेरा इतना ही कहना है कि भगवान् का एक ही नाम परम-पावन है फिर
सहस्रनाम के महव का वर्णन कैसे किया जा सकता है। जप-तप, यज्ञ-योग, तीर्थ-सत्संग आदि विवाद का विषय
हो सकते हैं परंतु राम नाम तो निर्विवाद है 'नामैवैकं कलौयुगेÓ अर्थात् 'कलियुग केवल नाम अधारा सुमिरिसुमिरि
भव उतरेहुं पाराÓ सहस्रनामों की काव्यशैली में छन्दोबद्ध रचना संस्कृत भाषा की ही विशेषता है अन्य
भाषाओं में यह शदशक्ति नहीं। आशा है मेरा यह प्रयास राम-प्रिय भगवद् भक्तों की प्रसन्नता के लिए होगा।

17/09/2012

स्वयंसिद्ध श्वेतार्• गणेश •े पूजन •ा माहात्म्य

मदार •ो 'आ•Ó अथवा 'अर्•Ó भी •हते हैं। इस•ी शाखाएं लम्बी व पतली होती हैं। उत्पत्ति-स्थान से ही यह अने• शाखाएं ले•र बढ़ता है। इसमें •ोई ए• तना न हो•र, सभी शाखाएं स्वतंत्र रूप में तने •ी तरह पतली-लम्बी हो•र बढ़ती जाती हैं। यों पुराना हो जाने पर यह पौधा •भी-•भी १०-१२ फीट ऊँचा हो जाता है और तब मुख्य तने •ी मोटाई १८-२० इंच त• हो जाती है।परंतु ऐसे पौधे अपवाद-स्वरूप ही •हीं मिलते हैं, अन्यथा यह पौधा •ब्रिस्तानों, खण्डहरों, रेलवे लाइन •े •िनारे वाली प्रा•ृति• जगहों पर अपने आप उग•र हरियाली •ी सृष्टि •रता रहता है। इस•े पत्ते हरे रंग •े होते हैं, जिन पर सफेद धूल जैसी भूरी पत्र्त पड़ी रहती है।आ•ार में ये पत्ते बरगद •े पत्तों से मिलते-जुलते होते हैं। •िंतु बरगद •ा पत्ता लाली या •ालिमायुक्त हरा होता है,जब•ि मदार •ा पत्ता शुद्ध हरे रंग •ा होता है।
मदार •े पौधे में •हीं भी ए• खरोंच लगा दें तो तत्•ाल दूध नि•ल पड़ेगा। यह पौधा सर्वांग में दूध से भरा होता है। पत्ते तोडिय़े, तुरंत उस जगह से दूध टप•ने लगेगा। यह दूध विषाक्त होता हैऔर प्रयोग-भेद से •ईदवाओं •े निर्माण में प्रमुख घट• बनता है। आँख में पड़ जाने पर यह आँख•ी पुतली •ो भारी हानि पहुँचाता है, अत: इसे तोड़ते समय लोग दूध •े छींटों से बहुत सावधान रहते हैं।
शिवजी •ी पूजा में मदार •े पुष्प चढ़ाये जाते हैं। यह शिवजी •ी अनुपम महानता है •ि वे देवाधिदेव हो•र भी स्वयं •े प्रति सर्वथा उदासीन हैं।भक्तों •ो विश्व •ा वैभव देने वाले शिवजी •ा अपना रहन-सहन निवास और आहार-विहार •ितना त्यागमय है, यह उन•े वस्त्राभूषणों और खाद्य-पदार्थों से स्पष्ट हो जाता है। •ोई देवता उन•े (खीर) प्रेमी है, •ोई छप्पन भोग •ा आहारी है, •ोईनाना प्र•ार •े फलों, मिष्ठानों से तृप्त होता है, परंतु शिवजी ने उसे आहार बनाया है, जिसे पशु भी नहीं खाते--धतूरा, मदार, भाँग और अहिफेन। ऐसे निस्पृह, त्यागी, उदार और भक्तवत्सल देवता •ो इसीलिए विश्व में सर्वाधि• मान्यता प्राप्त है। आज भी रूस, यूरोप और सुदूर अमेरि•ा •े देशों में उत्खनन •े दौरान •हीं-•हीं मूर्ति सहित शिव मंदिर प्राप्त होते हैं। अस्तु: मदार •ा पुष्प शिवजी •ो अर्पित •िया जाता है और उन•े पुत्र गणेशजी •ी पूजा में भी वह बड़ी श्रद्धा •े साथ प्रयोग •िया जाता है। गोस्वामी तुलसीदासजी ने रामचरितमानस में वर्षा ऋतु वर्णन •े अंतर्गत लिखा है--
अर्•जवास पात बिनु भयऊ। जिमि सुराज खल उद्यान गयऊ॥
यहाँ विवेच्य-विषय श्यामार्• नहीं, श्वेतार्• है। यह भी वही मदार है, परंतु इस•े फू ल बैगनी रंग •े न हो•र बिल्•ुल सफेद होते हैं। इस•े पत्ते अपेक्षा•ृत अधि• ऊँचे होते हैं और फूल भी इसमें पर्याप्त मात्रा में गुच्छों में लगते हैं। परंतु फलों •ी संख्या इसमें •म होती है। इस•ी शाखाएँ लम्बी, पतली और सीधी होती हंै। पूर्णतया श्वेत पुष्पों •े •ारण ही यह श्वेतार्• अथवा सफेद मदार •हा जाता हैं।
तांत्रि• दृष्टि से श्वेतार्• •ा महत्त्व अधि• है। इसे गणेशजी •ा आवास, प्रिय और प्रतिरूप माना जाता है। इस•े विभिन्न गुणों और चमत्•ारी-प्रभाव ने सुदूर अतीत में ही, प्राचीन ऋषि-मुनियों •ो चमत्•ृत •र दिया था। यही •ारण है•ि विभिन्न तंत्र-गं्रथों में इस•ा विस्तृत उल्लेख प्राप्त होता है। परंतु इतना प्रभावशाली, पूज्य और चमत्•ारी होने पर भी यह पौधा बहुत •म दीख पड़ता है। •ृष्ण-मदार •े पौधे जहाँ शत्-प्रतिशत होते हैं, वहाँ इस•े पौधे 1-2 प्रतिशत से भी •म पाये जाते हैं। हाँ, यह बात अलग है •ि •िसी-•िसी क्षेत्र में आसानी से मिल जाते हैं।
गणेशजी •ी पूजा में 'श्वेतार्•Ó •ा विशेष महत्त्व है। वैसे, शिवजी पर भी इस•े पुष्प अर्पित •िए जाते हैं। परंतु जिस आधार पर इसे तांत्रि•-जगत् में महत्त्व प्राप्त है, वह है-- इस•ी अद्भुत जड़! इसे 'श्वेतार्• मूलÓ (सफेद मदार •ी जड़) •हते हैं। मान्यता है •ि श्वेतार्• मूल में गणेशजी •ा वास होता है और यदि तांत्रि•-विधि से वह मूल प्राप्त •र•े घर में स्थापित •ी जाये तथा उस•ा दैनि•-पूजन हो तो वह गणेशजी •ी भांति उस घर-परिवार •ो श्री समृद्धि से सम्पन्न •र•े साध• •ी समस्त भौति•-बाधाओं •ा शमन •र देती है। परंतु प्रतिबंध यह है •ि 'श्वेतार्•-मूलÓ पूर्णतया शास्त्रीय-तांत्रि• ढंग से प्राप्त •ी जाए और तदनुसार ही उस•ा पूजन हो।

12/09/2012

नीम : जिसके रेशे-रेशे में जीवन का अमृत है

अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर अपनी जड़ें मजबूत करने वाला वृक्ष नीम शतािदयों
से सबसे चर्चित वृक्ष है। भारत की भूमि और जनमानस में नीम की
जड़ें सदियों से हरी भरी हैं। आज जिस तरह अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर
इसकी महाा उजागर हो रही है उससे लगता है कि जो आज
तक इसकी छत्र-छाया में पले-बढ़े हैं उस समाज व जनमानस
के लिए नीम शीघ्र ही अब पराया हो जायेगा, योंकि अमेरिकी
वैज्ञानिक नीम को सार्वभौमिक समस्या निवारक के रूप में
प्रस्तुत कर रहे हैं। अब तक नीम की जड़, छाल, शाखा,
पिायां, फल-फूल लगभग सभी अंगों के भिन्न-भिन्न सार्थक
उपयोगों की जानकारी तथा विवरण प्रसारित हो चुके हैं। यहाँ
तक कि कुछ वैज्ञानिक और संस्थान नीम का पेटेन्ट कर रहे
हैं। इतना ही नहीं शोधकर्ताओं ने 'एड्सÓ जैसे असाध्य रोग
को ठीक करने का दावा भी किया है। प्रकृति ने नीम के रूप में
प्राकृतिक 'डायलासिसÓ मशीन दी है तो 'मीठेÓ की बीमारी मधुमेह
के लिए कड़वा नीम वरदान है। चिकित्सा क्षेत्र में नीम अमृत तुल्य है।
अनेक गुणों से परिपूर्ण नीम सभी जीवों के लिए उपयोगी है। चरक, सुश्रुत
तथा निघंटु जैसे चिकित्सा ग्रंथों में विस्तार से नीम का विवरण मिलता है।
इसकी छाया, पो, फूल, फल, डंठल, छाल, छिलका आदि प्रत्येक रेशे-रेशे
में जीवन का अमृत है। इसके कड़वेपन के पीछे जुड़ा है इसका विशाल मीठा
संसार। हमारी अमूल्य वानस्पतिक धरोहर में से एक है नीम।
भारत और बर्मा में बहुतायत से पाये जाना वाला नीम प्राकृतिक वृक्ष है।
इसका वास्तविक नाम 'एजेडीरेटा इंडिकाÓ है। 'मिलिएसीÓ कुल का नीम
का वृक्ष सदाबहार होता है तथा प्राय: तीस मीटर ऊँचा व 2.5 मीटर तक मोटा
तना होता है। यह संसार के 30 से भी अधिक देशों में पाया जाता है। इसकी
उत्पिा आसाम से बताई जाती है। संसार के भिन्न-भिन्न भागों में नीम के भिन्नभिन्न
नाम हैं। अंग्रेजी व हिन्दी में 'नीमÓ, फ्रेंच में 'एजाडीराÓ, जर्मन में 'निमबागÓ,
बर्मा में 'लमारÓ तथा श्रीलंका में 'खोबाÓ, संस्कृत में 'निबाÓ, मराठी व
गुजराती में 'लिबाÓ, तेलगू, तमिल व मलयालम में 'वेपाÓ, कन्नड़ में 'बेवूÓ
तथा अंग्रेजी में 'मारगोसाÓ कहा जाता है। इसके पो लहरियादार ढंग से कटे
होते हैं।
वर्षा ऋतु में बोये जाने वाले नीम को इसके बीज अथवा कलम/ पौध से
उगाया जाता है। विशिष्टता यह है कि यह शुष्क एवं बंजर भूमि पर भी उग
जाता है। 5-7 वर्ष पुराना नीम काट देने के बाद भी भूमि की सतह से नई
पौध फूट जाती है। इसमें कम से कम 9 प्रकार के लियोनाइड निकाले जा
सकते हैं। इनमें से 'एजेडिरेिटनÓ, 'मेलियनट्रिआलÓ, 'सैलेनिनÓ, 'निबीनÓ
एवं 'निबोडिनÓ मुय हैं। इनसे फसलों में लगने वाली बीमारियों के नियंत्रण
में नीम बहुत लाभदायक सिद्ध हुआ है। मलेरिया की रोकथाम में नीम उपयोगी
सिद्ध हुआ है। इसके कीटाणुनाशक प्रयोग से जहाँ नीम के विभिन्न पदार्थ रोगों
को नियंत्रित करते हैं, वहीं दूसरी और मनुष्य के लिए उपयोगी जन्तुओं, जैसे-
केंचुओं, तितलियों व मधुमिखयों आदि को कोई नुकसान नहीं पहुँचता।
आयुर्वेद संहिताओं में नीम के बीज, बेल, पाी, जड़ तथा छाल के भिन्न-भिन्न
उपयोग का उल्लेख मिलता है। मनुष्य के बाल, त्वचा, आँत, नाखून, फेफड़े,
हाथ व मुँह आदि की विभिन्न फफूंदीजनित बीमारियों को रोकने में नीम के
लाभदायक प्रयोग सिद्ध हुए हैं। दाँत के लिए नीम सोप एवं गर्भ निरोधक आदि
ऐसी निरापद औषधियाँ हैं कि जिन्हें भारत के डिफेंस इंस्टिट्यूट ऑफ
फिजियोलॉजी एण्ड एलाइड साइंसेज के वैज्ञानिकों ने पेटेंट प्राप्त करने का
आवेदन किया है। नीम, तैल निकालने के बाद बची हुई खली एक
अच्छा खाद सिद्ध हुई है। इस चमत्कारिक वृक्ष में अनन्य गुण
भरे हैं। अन्तर्राष्ट्रीय गोष्ठियों में नीम पर अनेक शोधात्मक पत्र
पढ़े जाते हैं। सन् 1988 में लोरिडा में नीम पर पूरा ग्रंथ
ही प्रकाशित हो गया है जिसमें नीम का रासायनिक और
कीट वैज्ञानिक पहलुओं के संदर्भ में किये गये काम का
विवरण है।
सदियों से प्रचलित नीम को आयुर्वेद में सर्व रोग
निवारिणी कहा गया है। सन् 1959 में किये गये एक
सर्वेक्षण के अनुसार भारत में लगभग डेढ़ करोड़ नीम के
वृक्ष हैं जिनमें आधे से अधिक उारप्रदेश व शेष तमिलनाडू,
कर्नाटक, आन्ध्रप्रदेश, महाराष्ट्र व गुजरात में हैं। नीम के विविध
औषधीय गुणों के कारण अन्य वृक्षों की अपेक्षा नीम पर सर्वाधिक
विश्वव्यापी परीक्षण किए गये हैं। इसे एक बहुमूल्य राष्ट्रीय संसाधन
माना जाना चाहिये, ऐसी धारणा है।
कहा जाता है कि मुगल जब भारत आये तो इसके बहुपयोगी वृक्ष की तरह
इस तरफ आकर्षित हुए कि इसका नाम 'आजाद दरत-ए-हिन्दीÓ रख दिया
जो कि उनकी भूमि में पाये जाने वाले 'बकायनÓ (मेलिया एजाडिरेक) से
मिलता-जुलता है। एक अन्य प्रकार का नीम 'मीठाÓ भी होता है अर्थात् यह
कड़वा नहीं होता व इसकी पिायों का उपयोग भोज्य पदार्थों में होता है। मीठे
नीम की सुगंध ही इसकी विशिष्टता है। लगभग पूरे भारत में मीठा नीम प्रचुर
मात्रा में मिलता है। उाराखंड के अनेक भागों में मीठे नीम के सुगंधयुक्त पौधे
सड़कों के किनारे उगे हुए पाए जाते हैं। दक्षिण व महाराष्ट्र एवं गुजरात में बहुतायत
से इसके पाों को काम में लिया जाता है। इसके बिना रसोई सूनी मानते हैं।
चिर-परिचित कड़वे नीम ने अपने चमत्कारिक गुणों से साहित्यकारों,
कवियों, चिकित्सकों तथा वैज्ञानिकों को आकृष्ट किया है। नीम की महाा की
दृष्टि से यह प्रात: स्मरणीय है। भारतीय संस्कृति के देव वृक्षों की पंक्ति में से
एक नीम भी है, योंकि यह लोक कल्याणकारी है। नीम को निर्धन का वैद्य
बताया गया है—
''वेद रहीज राज, घर पावे कैव गरीब।
हेली दूध धपाड़ओं हाने नीम तबीब।।Ó
नीम हमारी लोककथाओं एवं लोकगीतों में भी रचा बसा है। नीम में निबोली
आते ही नवयुवतियाँ नीम के वृक्ष पर झूले डालती हैं और झूले की हर पेंग के
साथ ही उनमें निबोली तोड़ लेने की होड़ मची होती है। आदिवासी अंचल
की एक बाला अपने मामा से ''निबोली तोड़कर खिलाने की गुहार करती
है।ÓÓ ''परदेशी मामा निबोली खिला दो रेÓÓ। गाँवों में नीम का वृक्ष मंदिरों व
पवित्र स्थानों पर अवश्य मिलता है। ग्रामीण मान्यतानुसार उनके देवी-देवता
अधिकतर नीम के वृक्ष के तले स्थित होते हैं। नीम की पवित्रता की दृष्टि से
छोटी-बड़ी बोदी, माता, टायफाइड आदि रोग में रोगी को नीम की टहनियों से
झाड़ा दिया जाता है योंकि यह कीटाणुनाशक होता है। रोचक तथ्यानुसार जिस
प्रकार जीव-जन्तुओं की गतिविधियों से भूकप के बारे में अनुमान लगाते हैं
उसी प्रकार कुछ विशेष पेड़-पौधे भी आगामी मौसम की जानकारी देते हैं।
नीम की निबोलियों के आधार पर जनपदों में भविष्यवाणियाँ की जाती हैं,
जैसे''नी
बी सूखे नीम एक कण, पेड़ न नीचे जाय।
अनाज निपजे एक कण, काल पड़ेला आए।।Ó
अर्थात् नीम की निबोली पेड़ पर ही सूख जाती है तथा पेड़ से नीचे नहीं
गिरती तो उस वर्ष एक दाना भी अन्न पैदा नहीं होगा जिससे अकाल निश्चित
है। जब निबोली शाखा से गिर जाती है तो मानसून के आगमन की द्योतक
होती है। जिस वर्ष निबोली अधिक मात्रा में आती है तो अधिक वर्षा तथा
कम मात्रा में आने पर कपास की फसल अच्छी होने का अनुमान लगाया जाता
है। यदि निबोलियां पककर साधारण से ज्यादा मोटी हो जो उस वर्ष अकाल
पडऩे का अंदेशा होता है। लोक चिकित्सा में तो नीम से बढ़कर अन्य कोई
चिकित्सक ही नहीं है। मुय बात यह है कि नीम एक ऐसा चमत्कारिक वृक्ष
है कि इस वृक्ष का हर हिस्सा और उत्पाद काम में आता है। भारत देश की
विविध संस्कृतियों में नीम को भाँति-भाँति से काम में लिया जाता है, विशेषकर
के लोक चिकित्सा में। आदिवासी नीम की गहन और विस्तृत जानकारी रखते
हैं। नीम की पिायाँ, डंठल, छाल, जड़ें, फूल व फलों द्वारा तेल, अर्क, लेपन,
मरहम, गोलियाँ, काढ़ा, चूर्ण रस तथा गोंद आदि से
भिन्न-भिन्न असाध्य रोग भी ठीक हो जाते हैं। जैसे क्षय
रोग, मलेरिया, त्वचा रोग, कृमि व पेट के रोग, छाले,
मसूढ़े व दन्त रोग, नेत्र रोग, दमा, सर्दी, जुकाम, गर्भ
निरोधक, मूत्र रोग एवं सर्पदंश आदि के लिए नीम का
भिन्न-भिन्न रूप में सेवन किया जाता है। जहाँ वैज्ञानिक
दृष्टि से नीम की महवपूर्ण भूमिका की जानकारी
मिलती है, वहीं भारतीय संस्कृति में रचा बसा नीम
लोकजीवन में भी उतना ही उपयोगी है।

11/09/2012

बरगद : जो स्वयं वैद्यराज है

पौराणिक दृष्टि से वटवृक्ष (बरगद) के मूल में ब्रह्म, मध्य में जनार्दन विष्णु तथा अग्रभाग
में देवाधिदेव शिव स्थित रहते हैं। देवी सावित्री भी वटवृक्ष में प्रतिष्ठित है। महाप्रलय के उपरांत
केवल चार (परम) तव की विद्यमानता रही—1. बालरूप श्रीकृष्ण, 2. वटवृक्ष, 3. अपार
जलराशि और 4. ऋषि मार्कण्डेय। 'अमरस्तवं सदा कल्पे हरेश्चायतनं वट।Ó के अनुसार प्रत्येक
कल्प में अमर अव्यक्तस्वरूप महाप्रलयकारी एवं महान् रस से युक्त वटवृक्ष में श्रीहरि का
वास होने से वह कल्पवृक्ष तुल्य ही है। इसका दर्शन व पूजन करने से राजसूय और अश्वमेध
यज्ञ से भी अधिक फल मिलता है। भारत में चार वटवृक्ष परम पूजनीय हैं—1. वृन्दावन का
वंशीवट, 2. बोध गया का बोधि वट, 3. प्रयागराज का अक्षयवट और 4. उज्जैन का सिद्धवट।
स्कन्दपुराण में उल्लेख है कि उज्जैन में कार्तिकेय ने दैत्य तारकासुर का वध किया था, तब
माता पार्वती ने सिद्धवट की छाया में कार्तिक स्वामी को अपने हाथों से भोजन कराया था।
मुगल शासकों ने सिद्धवट को समूल कटवाकर इस पर लोहे के तवे मढ़वा दिऐ थे, किन्तु
वृक्ष की शाखाएं फिर फूट आईं और अब यह हरा-भरा है। बरगद
की पवित्रता, उपयोगिता और चमत्कारी औषधीय गुणवाा की
विशद व्याया करने वाला राजस्थान लेखिका महासंघ की पूर्व
सचिव श्रीमती कमलेश माथुर (जयपुर) का यह आलेख सर्वथा
पठनीय है। - रमेश दीक्षित (संपादक)
वेदों में वृक्ष को संतान का दर्जा दिया गया है।
भारतीय संस्कृति में प्राकृतिक सपदा के अन्तर्गत
वटवृक्ष से लेकर हिमालय के शिखर तक पूजे जाने
की प्राचीन परपरा रही है। बड़ा अंगद का अपभ्रंश
बरगद वनस्पतिशास्त्र विशेषज्ञों द्वारा विश्व में सर्वाधिक
पुरातन एवं दीर्घजीवी वृक्ष माना जाता है। संस्कृत के
श्रृंगी, बहुपाद, न्यग्रोध तथा वटवृक्ष के नाम से प्रसिद्ध इसी वृक्ष की हवादार
जटाओं (जड़ों) की कुटी में बैठकर भक्त धु्रव ने भगवान् विष्णु की आराधना
के द्वारा दिव्य दर्शन प्राप्त किए थे। महर्षि च्यवन ने भी वट की जटाओं की
कुटिया में निवास बनाकर साधना की थी। इसे अक्षय वट भी कहते हैं।
राजकुमार सिद्धार्थ ने वट वृक्ष तले बोधित्व प्राप्त किया था। जैन मुनि व अनेकों
तीर्थंकर अधिकांश वटवृक्ष के नीचे बैठे चित्रित किये गये हैं। वृक्ष महज पेड़
नहीं होते अपितु संस्कृति का एक अहम् हिस्सा होते हैं। वृक्ष अर्थात् हर वृक्ष
मानव जीवन की पाठशाला का जीवन्त पाठ होता है।
वृक्षों का महव केवल फल व छाया तक ही सीमित नहीं है। हमारे प्राचीन
ऋषि मुनियों ने इनके विषय में प्रचुर मात्रा में लिखा-सुना और कहा है।
दुर्भाग्यवश आधुनिक युग में ऐसे अमूल्य गुणकारी वृक्षों की गहन जानकारी
केवल धार्मिक संदर्भ में ही उपलध है। वनस्पतिशास्त्रों में इनके वास्तविक
या मौलिक उपयोग का विवरण भी न्यूनतम है। धार्मिक संदर्भ में भी पूजापा�
तथा लोक-कथाओं तक ही इनकी जानकारी सीमित है। कोई चिंतन नहीं
करता कि हवन-यज्ञ में केवल आम की लकडिय़ाँ ही यों प्रयोग में लाई जाती
है? आम पाों की बन्दनवार ही यों बनायी जाती है अथवा द्वार-सज्जा के
लिये केले के स्तभ ही यों लगाए जाते हैं? भारतीय संस्कृति में आज भी
ऐसे विविध अनुष्ठान हैं जिनमें उक्त व्यवस्था विद्यमान है योंकि प्रत्येक अनुष्ठान
और उसके अनुकूल व्यवस्था की पृष्ठभूमि में कोई न कोई गंभीर वैज्ञानिक
रहस्य छुपा है। केवल लीक-लकीर पीटने वाली परपरा कहकर इनकी अनदेखी
का कारण है पश्चिमी अंधानुकरण। जबकि तथ्यात्मक जानकारी के द्वारा विदेशी,
भारतीय संस्कृति के कायल हंै। वृक्ष और वनों में छिपे स्वास्थ्य व समृद्धि के
भण्डार का रहस्य और उसका लाभ लेना प्रत्येक मनुष्य का धर्म है। वृक्षारोपण
जैसे पुण्य कार्य का उद्देश्य ही यही है, इसे केवल धार्मिक कृत्य मान लेना
उचित नहीं है।
बरगद स्वयमेव वैद्यराज है। इस संत के पास प्रत्येक रोग का उपचार मौजूद
है। स्वास्थ्य जगत् में यदि इसे वरदान कहा जाए तो अतिशयोक्ति नहीं है।
असंय रोगों का शमन करता है इसका रेशा-रेशा। ठीक वैसे ही जैसे दधीचि
ने अपनी हड्डियाँ तक दान में दे दी थी। इसकी जड़-जटा, छाल, पो, टहनी,
फूल-फल, दूध और दाढ़ी यहाँ तक कि वट वृक्ष की छाया भी मानव मन और
तन को स्वस्थ व दीर्घायु वाला बनाती है। प्रमुखतम विशाल और अजर-अमर
वट-वृक्ष बरगद की छाया और तना सैकड़ों को एक साथ ठण्डी छाया और
विश्राम देता है। विशाल वृक्ष मानव-जीवन के लिये कितना उपयोगी है पाठक
स्वयं अनुमान लगा लें। वृक्षों में वटवृक्ष मानव का सबसे बड़ा मित्र है। वृक्षों
के समान संसार में अन्य हितैषी नहीं। यही कारण है कि
वृक्षों की सुरक्षा व संरक्षण के पक्ष में इन्हें पूजा-पाठ और
धार्मिक अनुष्ठानों से सबद्ध किया गया। घर आँगन और
चौक-चौबारे में तुलसी रोपना मात्र पूजा-पाठ तक ही
उपयोगी नहीं है, तुलसी के प्रत्येक लाभ की जानकारी
भी, जो कि इस पुस्तक में दी गई है, आवश्यक है। पीपल,
बड़ अमावस या वट सावित्री व्रत पूजा आदि ढकोसला
नहीं है। प्राचीन ज्ञानियों ने वृक्षों को धर्म का माध्यम
बनाकर वृक्ष को मनुष्य के समीप पहुँचाया ताकि मानव
इस अकूत खजाने का जी भरकर लाभ ले सके। कहने
को वृक्ष को निर्जीव कहा जाता है परन्तु जगदीशचन्द्र बसु
जैसे वैज्ञानिक प्रमाणित कर चुके हैं कि वृक्षों, पौधों, फूलों
में जीवन है, वे भी हंँसते-रोते हैं, परस्पर बतियाते हैं। इन निर्जीव समझे जाने
वाले पेड़-पौधों की यही जीवन्तता मनुष्य के लिए आरोग्यवद्र्धक ऊष्मा व
ऊर्जा है। इन वृक्षों-फूल-पौधों ने अपने आँंचल में सपूर्ण प्रकृति को समेट
रखा है परन्तु अज्ञानतावश मानव स्वयं अपने इन हितैषियों, मित्रों का सर्वनाश
कर रहा है। इसके दुष्परिणाम हैं प्रकृति का असंतुलित होना, मानव का रोगग्रस्त
होना एवं 'एड्सÓ आदि भयंकर रोगों से अभिशप्त होना। वृक्षों में मानव का
सबसे बड़ा सेवक बरगद है अत: बड़ा अंकद इसी का अपभ्रंश बन गया।
अपना सब कुछ उत्सर्ग कर देने वाले ऐसे वृक्षों की पूजा का विधान भारतीय
संस्कृति का सर्वोत्कृष्ट वरदान है सपूर्ण मानवता के लिए, योंकि प्रत्येक
धार्मिक अनुष्ठान, पूजा-पाठ, धूप-दीप, अर्चना के पीछे गंभीर वैज्ञानिक रहस्य
मौजूद है। वाराणसी के दशाश्वमेध घाट पर एक अक्षय वट है जो कि पुरातन
काल से स्थित है गंगा की बाढ़ का पानी जब इस अक्षय वट का स्पर्श कर
लेता है तब इसे 'इन्द्रदमनÓ कहा जाता है और मान्यतानुसार इसी स्थिति में
यह बाढ़ विनाशकारी सिद्ध होती है। इलाहाबाद में यमुना तट किले के भीतर
स्थित वटवृक्ष हजारों वर्ष पुरातन है, इस अक्षय वट को श्रद्धालु प्रतिदिन पूजते
हैं।
ईश्वर की साा में विश्वास करते हुए आदिकाल से संजोये प्रकृति के इस
समृद्ध भण्डार से जीवन की कुंजी हासिल करना मानव का धर्म है। वृक्षारोपण
और वन संरक्षण द्वारा इसे सुरक्षित रखना चाहिये। फिर चाहे आँंवला नवमी
हो या कोई भी पर्व के माध्यम से जोड़ी गई आस्था, पूजा अर्चना हो। वृक्ष
संरक्षण की यह पारपरिक प्राचीन वृक्ष संरक्षण-पद्धति युग-युगीन संस्कृति है,
योंकि वृक्ष को वेदों में संतान का दर्जा दिया गया है इसलिये हमारे यहाँ शायद
ही कोई वृक्ष ऐसा हो जिसकी पूजा नहीं की जाती हो। हर्ष का विषय है कि
आज 'प्रति व्यक्ति प्रति पेड़Ó लगाए जाने के संकल्पित अभियान द्वारा वृक्षों
को संरक्षित व सुरक्षित रखने में जन-चेतना दिखाई देती है।

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