श्री अक्रूरेश्वर महादेव उज्जैन

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श्री अक्रूरेश्वर महादेव उज्जैन भगवान ब्रह्मा एवम् श्री कृष्ण तथा शिवगण भृगिरिटी द्वारा पूजित अर्धनारीश्वर दिव्य लिंग।

बुद्धि प्रदाता हैं अक्रूरेश्वर महादेव
बुद्धि को सौम्यता प्रदान करने वाले श्री अक्रूरेश्वर महादेव


अंकपादाग्रतो लिंगम सप्त कल्पानुगं महत ।
यस्य दर्शनमात्रेण शुभाम् बुद्धिः प्रजायते । ।


पौराणिक कथाओं के अनुसार एक बार माता पार्वती ने शक्ति रूप धारण किया था और वे अत्याधिक क्रोधित हो गईं थी। उस समय चर, अचर, देवता, किन्नर, समस्त गणों, इत्यादि ने उनकी प्रदक्षिणा एवं स्तुति की थी। केवल एक भृंगिरीट गण ने उन्हें नमस्कार नहीं किया था, ना ही स्तुति की थी। भृंगिरीट का कथन था कि वे शिवजी के पुत्र हैं और उनकी ही शरण में हैं, माँ पार्वती की नहीं। पार्वती के कई बार समझाने पर कि वह उनका पुत्र है ओर केवल शिव स्तुति से उसका कल्याण नहीं हो सकता है, परंतु वह पार्वती की बात नहीं माना ओर योग विद्या के बल पर उसने संपूर्ण मांस पार्वती को अर्पित कर दिया ओर शिवजी के पास पहुंच गया। इस पर माता पार्वती ने क्रोधित हो भृंगिरीट को पृथ्वी लोक में दंड भुगतने का शाप दे दिया।
माता के शाप से तुरंत ही भृंगिरीट पृथ्वी लोक पर गिर पड़ा। शाप से व्यथित हो भृंगिरीट पुष्कर द्वीप में जा तपस्या करने लगा। उसके कठिन तप से ब्रह्मा, विष्णु, इंद्र, आदि उसके पास गए और उसके शाप के बारे में जानकर भगवान शंकर के पास पहुंचे और उन्हें सारा वृतांत कह सुनाया। तब भगवान शंकर ने भृंगिरीट से कहा कि तुम प्रजा को दुःख देने वाले तप को बंद करो। शापमुक्त होने के लिए तुम पार्वती जी की प्रार्थना करो, उनकी प्रसन्नता से ही तुम शाप मुक्त हो सकते हो ।
शिवजी की बात सुन उसने श्रद्धापूर्वक माँ पार्वती की स्तुति की जिसके फलस्वरूप माता ने प्रसन्न हो कहा कि तुम महाकाल वन जाओ। वहाँ अंकपात क्षेत्र के आगे एक दिव्य लिंग है, उसके पूजन अर्चन करो। उस लिंग के दर्शन से तुम्हारी क्रूरता दूर होगी एवं बुद्धि निर्मल होगी। इससे तुम्हें पृथ्वी लोक से मुक्ति मिलेगी और पुनः कैलाश वास प्राप्त होगा। बलराम और कृष्ण ने भी क्रूर होकर कंस और केशी राक्षस का वध किया था। उसके पश्चात वे भी मथुरा से महाकाल वन आये थे और दिव्य लिंग का पूजन कर अक्रूर (सौम्य स्वभाव) हुए। तब माता की बात सुन भृंगिरीट महाकाल वन पहुंचा और बताये हुए दिव्य लिंग की आराधना की। उसके पूजन के फलस्वरूप लिंग में से अर्धनारीश्वर के रूप में शिव पार्वती प्रकट हुए। तब भृंगिरीट को ज्ञात हुआ कि शिव और पार्वती का सनातन देह एक ही है । शिव और शक्ति एक-दूसरे से उसी प्रकार अभिन्न हैं, जिस प्रकार सूर्य और उसका प्रकाश, अग्नि और उसका ताप तथा दूध और उसकी सफेदी। शिव में ‘इ’कार ही शक्ति है। ‘शिव’ से ‘इ’कार निकल जाने पर ‘शव’ ही रह जाता है। शास्त्रों के अनुसार बिना शक्ति की सहायता के शिव का साक्षात्कार नहीं होता। अत: आदिकाल से ही शिव-शक्ति की संयुक्त उपासना होती रही है ।
इस तरह भृंगिरीट की बुद्धि निर्मल हुई और तभी से यह दिव्य लिंग अक्रूरेश्वर (अक्रूरेश्वर यानी बुद्धि को सौम्य करने वाले) कहलाया। भृंगिरिट ने वरदान मांगा की जिस शिवलिंग के दर्शन से उसकी सुबुद्धि हो गई। वह शिवलिंग अक्रूरेश्वर के नाम से विख्यात होगा। मान्यता है कि जो भी मनुष्य शिवलिंग के दर्शन कर पूजन करेगा वह स्वर्ग को प्राप्त होगा। उसके सभी पाप नष्ट हो जाएंगे । इनके दर्शन पूजन से बुद्धि, सुख-समृद्धि और अंत में शिव लोक प्राप्त होता है । प्रस्तुत कहानी शिव पार्वती की एकरूपता को वर्णित करती है । भगवान शिव का अर्धनारीश्वररूप जगत्पिता और जगन्माता के सम्बन्ध को दर्शाता है। सत्-चित् और आनन्द–ईश्वर के तीन रूप हैं। इनमें सत्स्वरूप उनका मातृस्वरूप है, चित्स्वरूप उनका पितृस्वरूप है और उनके आनन्दस्वरूप के दर्शन अर्धनारीश्वररूप में ही होते हैं, जब शिव और शक्ति दोनों मिलकर पूर्णतया एक हो जाते हैं। सृष्टि के समय परम पुरुष अपने ही वामांग से प्रकृति को निकालकर उसमें समस्त सृष्टि की उत्पत्ति करते हैं। शिव गृहस्थों के ईश्वर और विवाहित दम्पत्तियों के उपास्य देव हैं क्योंकि अर्धनारीश्वर शिव स्त्री और पुरुष की पूर्ण एकता की अभिव्यक्ति हैं। संसार की सारी विषमताओं से घिरे रहने पर भी अपने मन को शान्त व स्थिर बनाये रखना ही योग है। भगवान शिव अपने पारिवारिक सम्बन्धों से हमें इसी योग की शिक्षा देते हैं। अपनी आत्मा में मिलकर ही मनुष्य आनन्दरूप शिव को प्राप्त कर सकता है।

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Ankpad Tirth, In Front Of Ram Janardan Temple
Ujjain
456001

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