महाकलेश्वर मंदिर भारत के बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक है। [1] यह मध्यप्रदेश राज्य के अंज नगर में स्थित है, महाकलेश्वर भगवान का प्रमुख मंदिर है।महाभारत और कालिदास जैसे महाकवियों की रचनाओं में इस मंदिर का मनोहर वर्णन मिलता है। स्वयंभू, भव्य और दक्षिणमुखी होने के कारण महाकालेश्वर महादेव की अत्यन्त पुण्यदायी महत्ता है। इसके दर्शन मात्र से ही मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है, ऐसी मान्यता है। महाकवि कालिदा
स ने मेघदूत में उज्जयिनी की चर्चा करते हुए इस मंदिर की प्रशंसा की है। [क] १२३५ ई. में इल्तुत्मिश के द्वारा इस प्राचीन मंदिर का विध्वंस किए जाने के बाद से यहां जो भी शासक रहे, उन्होंने इस मंदिर के जीर्णोद्धार और सौन्दर्यीकरण की ओर विशेष ध्यान दिया, इसीलिए मंदिर अपने वर्तमान स्वरूप को प्राप्त कर सका है। प्रतिवर्ष और सिंहस्थ के पूर्व इस मंदिर को सुसज्जित किया जाता है।
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इतिहास से पता चलता है कि उज्जैन में सन् ११०७ से १८२। ई। तक यवनों का शासन था। उनके शासनकाल में अवंति की लगभग ४५०० वर्षों में स्थापित हिन्दुओं की प्राचीन धार्मिक परंपराओं को नष्ट कर दिया गया था। लेकिन १६ ९ ० ई। में मराठों ने मालवा क्षेत्र में आक्रमण कर दिया और २ ९ नवंबर १८२ मरा को मराठा शासकों ने मालवा क्षेत्र में अपना अधिपत्य स्थापित कर लिया। इसके बाद उज्जैन का खोया हुआ गौरव पुनः लौटा और सन ११३१ से १ ९० ९ तक यह नगरी मालवा की राजधानी बनी रही। मराठों के शासनकाल में यहाँ दो महत्त्वपूर्ण घटनाएँ घटीं - प्रथम, महाकलेश्वर मंदिर का पुनिर्नर्माण और ज्योतिर्लिंग की नियंत्रकतिष्ठा और सिंहस्थ पर्व स्नान की स्थापना, जो एक बहुत बड़ी उपलब्धि थी। आगे चलकर राजा भोज ने इस मंदिर का विस्तार कराया।
वर्णन��______
मंदिर एक परकोटे के भीतर स्थित है। गर्भगृह तक पहुँचने के लिए एक सीढ़ीदार रास्ता है। इसके ठीक उपर एक दूसरा कक्ष है जिसमें ओंकारेश्वर शिवलिंग स्थापित है। मंदिर का क्षेत्र १०.७७ x १०. क्षेत्रफल वर्गमीटर और ऊंचाई २७.७१ मीटर है। महाशिवरात्रि और श्रावण मास में हर सोमवार को इस मंदिर में अपार भीड़ होती है। मंदिर से लगा एक छोटा-सा जलस्रोत है जिसे कोटितीर्थ कहा जाता है। ऐसी मान्यता है कि इल्तुमिश ने जब मंदिर को तुड़वाया तो शिवलिंग को इसी कोटिती में फिक दिया गया था। बाद में इसकी नियंत्रकतिष्ठा करायी गयी। सन १ ९ ६ १ के सिंहस्थ महापर्व के पूर्व मुख्य द्वार का विस्तार कर सुसज्जित कर लिया गया था। इसके अलावा निष्कर्षण के लिए एक अन्य द्वार का निर्माण भी बनाया गया था। लेकिन दर्शनार्थियों की अपार भीड़ को दृष्टिगत रखते हुए बिड़ला उद्योग समूह के द्वारा १ ९ के० के सिंहस्थ के पूर्व एक विशाल सभा मंडप का निर्माण कराया गया। महाकलेश्वर मंदिर की व्यवस्था के लिए एक प्रशासनिक समिति का गठन किया गया है जिसके निर्देशन में यहां की व्यवस्था सुचारु रूप से दूर हो रही है। हाल ही में इसके ११८ शिखरों पर १६ की स्वर्ण की परत चढ़ गई है। [२] [३] अब मंदिर में दान के लिए इंटरनेट सुविधा भी चालू की गई है। [४] [५]