Veer Savarkar Smriti Vyakhyanmala, ujjain

Veer Savarkar Smriti Vyakhyanmala, ujjain स्वातंत्र्य वीर विनायक दामोदर सावरकर जी के विचार द्वारा हिन्दु समाज का जागरण

।। साइकिल से चांद तक का सफर  ।।हार्दिक शुभकामनाए बधाई
24/08/2023

।। साइकिल से चांद तक का सफर ।।
हार्दिक शुभकामनाए बधाई

 #स्वातंत्र्य_वीर_सावरकर_की_ऐतिहासिक_छलांग  इतिहास स्मृति - 8 जुलाईअंग्रेजों के विरुद्ध लड़े गये भारत के स्वाधीनता संग्र...
08/07/2023

#स्वातंत्र्य_वीर_सावरकर_की_ऐतिहासिक_छलांग इतिहास स्मृति - 8 जुलाई

अंग्रेजों के विरुद्ध लड़े गये भारत के स्वाधीनता संग्राम में वीर विनायक दामोदर सावरकर का अद्वितीय योगदान है। उन्होंने अपनी जान जोखिम में डालकर देश ही नहीं, तो विदेश में भी क्रांतिकारियों को तैयार किया। इससे अंग्रेजों की नाक में दम हो गया। अतः ब्रिटिश शासन ने उन्हें लंदन में गिरफ्तार कर मोरिया नामक पानी के जहाज से मुंबई भेजा, जिससे उन पर भारत में मुकदमा चलाकर दंड दिया जा सके।

पर सावरकर बहुत जीवट के व्यक्ति थे। उन्होंने ब्रिटेन में ही अंतरराष्ट्रीय कानूनों का अध्ययन किया था। 8 जुलाई, 1910 को जब वह जहाज फ्रांस के मार्सेलिस बंदरगाह के पास लंगर डाले खड़ा था, तो उन्होंने एक साहसिक निर्णय लेकर जहाज के सुरक्षाकर्मी से शौच जाने की अनुमति मांगी।

अनुमति पाकर वे शौचालय में घुस गये तथा अपने कपड़ों से दरवाजे के शीशे को ढककर दरवाजा अंदर से अच्छी तरह बंद कर लिया। शौचालय से एक रोशनदान खुले समुद्र की ओर खुलता था। सावरकर ने रोशनदान और अपने शरीर के आकार का सटीक अनुमान किया और समुद्र में छलांग लगा दी।

बहुत देर होने पर सुरक्षाकर्मी ने दरवाजा पीटा और कुछ उत्तर न आने पर दरवाजा तोड़ दिया; पर तब तक तो पंछी उड़ चुका था। सुरक्षाकर्मी ने समुद्र की ओर देखा, तो पाया कि सावरकर तैरते हुए फ्रांस के तट की ओर बढ़ रहे हैं। उसने शोर मचाकर अपने साथियों को बुलाया और गोलियां चलानी शुरू कर दीं।

कुछ सैनिक एक छोटी नौका लेकर उनका पीछा करने लगे; पर सावरकर उनकी चिन्ता न करते हुए तेजी से तैरते हुए उस बंदरगाह पर पहुंच गये। उन्होंने स्वयं को फ्रांसीसी पुलिस के हवाले कर वहां राजनीतिक शरण मांगी। अंतरराष्ट्रीय कानून का जानकार होने के कारण उन्हें मालूम था कि उन्होंने फ्रांस में कोई अपराध नहीं किया है, इसलिए फ्रांस की पुलिस उन्हें गिरफ्तार तो कर सकती है; पर किसी अन्य देश की पुलिस को नहीं सौंप सकती। इसलिए उन्होंने यह साहसी पग उठाया था। उन्होंने फ्रांस के तट पर पहुंच कर स्वयं को स्वतंत्र घोषित कर दिया। तब तक ब्रिटिश पुलिसकर्मी भी वहां पहुंच गये और उन्होंने अपना बंदी वापस मांगा।

सावरकर ने अंतरराष्ट्रीय कानून की जानकारी फ्रांसीसी पुलिस को दी। बिना अनुमति किसी दूसरे देश के नागरिकों का फ्रांस की धरती पर उतरना भी अपराध था; पर दुर्भाग्य से फ्रांस की पुलिस दबाव में आ गयी। ब्रिटिश पुलिस वालों ने उन्हें कुछ घूस भी खिला दी। अतः उन्होंने सावरकर को ब्रिटिश पुलिस को सौंप दिया। उन्हें कठोर पहरे में वापस जहाज पर ले जाकर हथकड़ी और बेड़ियों में कस दिया गया। मुंबई पहुंचकर उन पर मुकदमा चलाया गया, जिसमें उन्हें 50 वर्ष कालेपानी की सजा दी गयी।

अपने प्रयास में असफल होने पर भी वीर सावरकर की इस छलांग का ऐतिहासिक महत्व है। इससे भारत की गुलामी वैश्विक चर्चा का विषय बन गयी। फ्रांस की इस कार्यवाही की उनकी संसद के साथ ही विश्व भर में निंदा हुई और फ्रांस के राष्ट्रपति को त्यागपत्र देना पड़ा। हेग स्थित अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में भी इसकी चर्चा हुई और ब्रिटिश कार्यवाही की निंदा की गयी; पर सावरकर तो तब तक मुंबई पहुंच चुके थे, इसलिए अब कुछ नहीं हो सकता था।

स्वाधीन भारत में सावरकर के प्रेमियों ने फ्रांस शासन से इस ऐतिहासिक घटना की स्मृति में बंदरगाह के पास एक स्मारक बनाने का आग्रह किया। फ्रांस का शासन तथा मार्सेलिस के महापौर इसके लिए तैयार हैं;पर उनका कहना है कि इसके लिए प्रस्ताव भारत सरकार की ओर से आना चाहिए। दुर्भाग्य की बात यह है कि अब तक शासन ने यह प्रस्ताव नहीं भेजा है।

वंदेमातरम्

01/06/2023

!! सावरकर याने तेज !!

28/05/2023

28 मई/जन्म-दिवस

क्रान्तिकारियों के सिरमौर वीर सावरकर

विनायक दामोदर सावरकर का जन्म ग्राम भगूर (जिला नासिक, महाराष्ट्र) में 28 मई, 1883 को हुआ था। छात्र जीवन में इन पर लोकमान्य तिलक के समाचार पत्र ‘केसरी’ का बहुत प्रभाव पड़ा। इन्होंने भी अपने जीवन का लक्ष्य देश की स्वतन्त्रता को बना लिया। 1905 में उन्होंने विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार का आन्दोलन चलाया। जब तीनों चाफेकर बन्धुओं को फाँसी हुई, तो इन्होंने एक मार्मिक कविता लिखी। फिर रात में उसे पढ़कर ये स्वयं ही हिचकियाँ लेकर रोने लगे। इस पर इनके पिताजी ने उठकर इन्हें चुप कराया।

सावरकर जी सशस्त्र क्रान्ति के पक्षधर थे। उनकी इच्छा विदेश जाकर वहाँ से शस्त्र भारत भेजने की थी। अतः वे श्यामजी कृष्ण वर्मा द्वारा दी जाने वाली छात्रवृत्ति लेकर ब्रिटेन चले गये। लन्दन का ‘इंडिया हाउस’ उनकी गतिविधियों का केन्द्र था। वहाँ रहने वाले अनेक छात्रों को उन्होंने क्रान्ति के लिए प्रेरित किया। कर्जन वायली को मारने वाले मदनलाल धींगरा उनमें से एक थे।

उनकी गतिविधियाँ देखकर ब्रिटिश पुलिस ने उन्हें 13 मार्च, 1910 को पकड़ लिया। उन पर भारत में भी अनेक मुकदमे चल रहे थे, अतः उन्हें मोरिया नामक जलयान से भारत लाया जाने लगा। 10 जुलाई, 1910 को जब वह फ्रान्स के मोर्सेल्स बन्दरगाह पर खड़ा था, तो वे शौच के बहाने शौचालय में गये और वहां से समुद्र में कूदकर तैरते हुए तट पर पहुँच गये।

तट पर उन्होंने स्वयं को फ्रान्सीसी पुलिसकर्मी के हवाले कर दिया। उनका पीछा कर रहे अंग्रेज सैनिकों ने उन्हें फ्रान्सीसी पुलिस से ले लिया। यह अन्तरराष्ट्रीय विधि के विपरीत था। इसलिए यह मुकदमा हेग के अन्तरराष्ट्रीय न्यायालय तक पहुँचा; जहाँ उन्हें अंग्रेज शासन के विरुद्ध षड्यन्त्र रचने तथा शस्त्र भारत भेजने के अपराध में आजन्म कारावास की सजा सुनाई गयी। उनकी सारी सम्पत्ति भी जब्त कर ली गयी।

सावरकर जी ने ब्रिटिश अभिलेखागारों का गहन अध्ययन कर ‘1857 का स्वाधीनता संग्राम’ नामक महत्वपूर्ण ग्रन्थ लिखा। फिर इसे गुप्त रूप से छपने के लिए भारत भेजा गया। ब्रिटिश शासन इस ग्रन्थ के लेखन एवं प्रकाशन की सूचना से ही थर्रा गया। विश्व इतिहास में यह एकमात्र ग्रन्थ था, जिसे प्रकाशन से पहले ही प्रतिबन्धित कर दिया गया।

प्रकाशक ने इसे गुप्त रूप से पेरिस भेजा। वहाँ भी ब्रिटिश गुप्तचर विभाग ने इसे छपने नहीं दिया। अन्ततः 1909 में हालैण्ड से यह प्रकाशित हुआ। यह आज भी 1857 के स्वाधीनता समर का सर्वाधिक विश्वसनीय ग्रन्थ है।

1911 में उन्हें एक और आजन्म कारावास की सजा सुनाकर कालेपानी भेज दिया गया। इस प्रकार उन्हें दो जन्मों का कारावास मिला। वहाँ इनके बड़े भाई गणेश सावरकर भी बन्द थे। जेल में इन पर घोर अत्याचार किये गये। कोल्हू में जुतकर तेल निकालना, नारियल कूटना, कोड़ों की मार, भूखे-प्यासे रखना, कई दिन तक लगातार खड़े रखना, हथकड़ी और बेड़ी में जकड़ना जैसी यातनाएँ इन्हें हर दिन ही झेलनी पड़ती थीं।

1921 में उन्हें अन्दमान से रत्नागिरी भेजा गया। 1937 में वे वहाँ से भी मुक्त कर दिये गये; पर सुभाषचन्द्र बोस के साथ मिलकर वे क्रान्ति की योजना में लगे रहे। 1947 में स्वतन्त्रता के बाद उन्हें गांधी हत्या के झूठे मुकदमे में फँसाया गया; पर वे निर्दोष सिद्ध हुए। वे राजनीति के हिन्दूकरण तथा हिन्दुओं के सैनिकीकरण के प्रबल पक्षधर थे। स्वास्थ्य बहुत बिगड़ जाने पर वीर सावरकर ने प्रायोपवेशन द्वारा 26 फरवरी, 1966 को देह त्याग दी।...................................

19/12/2022

वीर सावरकर का जीवन वृत्त

'काल स्वयं मुझसे डरा है, मैं काल सें नहीं। अनेक बार फाँसी के फन्दे को चूमकर उसके कराल स्तंभको झकझोर कर मैं लौट आया हूँ। मैं इतने पर भी जीवित रहा, यह मृत्यु की भूल थी।” (पुणे, १९४२)

स्वातंत्र्यवीर वि. दा. सावरकर का जन्म २८ मई १८८३ को रात्रि में १० बजे सोमवार के दिन महाराष्ट्र के नासिक जिलेमें स्थित भगूर नामक ग्राम में हुआ था ।

वे भारतीय स्वातन्त्र्यसंग्राम के एक अप्रतिम योद्धा ही नहीं, अपितु उनके रग-रग में प्रखर हिन्दुत्व का भाव भी समाया हुआ था। साहस, निर्भीकता, दूरदर्शिता, प्रचण्ड आत्मविश्वास, अनुशासन, सिद्धान्त- प्रियता, उदात्त-ध्येयवाद, कष्ट, सहिष्णुता, त्याग, ओजस्वी वक्तृत्व, संगठन-कौशल्य, हृदय के तार-तार को झंकृत करने वाली लेखन कला और विचार प्रवणता आदि अनेकों गुणों के योग के वे अद्भुत संगम थे।

वीर सावरकरजी ने बाल्यावस्था में ही "मित्रमेला" का गठन किया। "मित्रमेला" के कार्यक्रम थे - व्यायामशाला चलाना, सार्वजनिक गणेशोत्सव तथा शिवाजी जयन्ती का आयोजन करना।

इन्हीं दिनों एक घटना घटित हुई और अत्याचारी विदेशी सत्ता के प्रतिनिधि रैण्ड और आर्मस्ट का वध करने के आरोप में चापेकर बंधूओंको फाँसी के फन्दे पर लटका दिया गया।

वीर सावरकर उन दिनों १६ वर्ष के ही थे । किन्तु उसी दिन अपनी कुलदेवी भगवती दुर्गा के समक्ष रक्तसे तर्पण कर उन्होंने यह प्रतिज्ञा ग्रहण की "हे माँ! देश की स्वतन्त्रता की प्राप्ति हेतु सशस्त्र क्रान्ति की पताका फहराकर शत्रुओं का सहार करते-करते जीवन की अन्तिम घडी तक संघर्ष करते रहने की शक्ति मुझे प्रदान करो।"

बालक सावरकर ने चापेकर बन्धुओं के साहस और हौतात्म्यपर स्फूर्तिदायक काव्य लिखा। उनकी अन्तिम पंक्ति का आशय इस प्रकार हैं।

"आपके द्वारा प्रारम्भ किया कार्य बीच में ही बन्द होगा। ऐसी शंका मत रखो। उसे आगे चलाने के लिए हम हैं, आप निश्चिन्त रहे।"

इन्हीं विचारों को हृदयंगम किए नासिकमें राष्ट्रभक्ति का बीजारोपण कर स्वातन्त्र्यवीर सावरकर उच्च शिक्षा प्राप्ति के लिए पूना चले आए। यहाँ क्रांति का यह पौधा वटवृक्ष का रूप धारण करने लगा। तीन शक्तियाँ पूना को प्रभावित करने लगी। उन्होंने अपने महाविद्यालयीन जीवन में विदेशी वस्त्रों की होली जलाकर अनेक वर्ष पूर्व ही स्वदेशी आंदोलन का सूत्रपात्र कर दिया।

सावरकर जी ने 'अभिनव भारत' नामक एक संस्था की स्थापना की। उन्हीं दिनो वीर विनायक के सिर से पिता की मृदुल छाया भी उठ गई, किन्तु उनकी स्वातंत्र्य आराधना में कोई कमी नही आई।

१९०६ मे सावरकर उच्च शिक्षा के लिए इंग्लैण्ड गए। जाने से पहले उन्होंने एक गुप्त सभा में घोषणा की "अभी तक मैं पूना के फर्ग्यूसन कॉलेज में महाराष्ट्र के चुने हुए युवकों में अपना विचार फैलाता रहा हूँ, परन्तु अब मैं विदेश जाकर भारत के धनी तथा योग्य विद्यार्थियों में प्रचार करूँगा, वे लोग जब बैरिस्टर आदि बनकर भारत लौटेंगे तो देशभर में क्रान्ति मचा देंगे। मैं शत्रु के घर जाकर भारतीयों की शक्ति का प्रदर्शन करूँगा। मैं रुसी आतंकवादियों से बम और पिस्तौल बनाना सीखूंगा।

लन्दन में सावरकर श्यामजी कृष्ण वर्मा के अतिथि बने और उनके द्वारा स्थापित इण्डिया हाउस में रहने लगे। इस होस्टलमें रहने वाले भारतीय शीघ्र ही उनके प्रभाव में आ गए और लन्दनस्थित इण्डिया हाउस भारतीय क्रान्ति का गढ़ बन गया। १९०७ में अंग्रेज लोग १८५७ की क्रान्तिको दबाने की प्रसन्नता में अर्द्धशताब्दी मना रहे थे। सावरकर ने इसका विरोध किया और १० मई १९०८ को इण्डिया हाउस में १८५७ का स्वतन्त्रता दिवस समारोह बड़ी धूमधाम से मनाने का निश्चय किया। उन्होंने यह सिद्ध करने का प्रयास किया कि १८५७ की क्रान्ति सिपाही गदर नहीं बल्की हिन्दूस्थान का प्रथम स्वातंत्र्यसंग्राम था।

इस आधार पर उन्होंने मराठी में एक पुस्तक की रचना भी की। बाद में अंग्रेजी भाषा में इसका अनुवाद (Indian War of Independence, 1857) भी हुआ। ब्रिटिश सरकारने इस पुस्तकपर पाबंदी लगा दी।

#गणेशपंत_सावरकर : विनायकराव सावरकरजीके बड़े भाई गणेशपंत (बाबाराव) सावरकर महाराष्ट्र में 'अभिनव 'भारत' के जरिए क्रान्तिकारी विचारधारा का प्रचार कर रहे थे। देश-भक्तिसे सम्बन्धित उन्होंने कुछ कविताएँ लिखी। इसी कारण नासिक के कलेक्टर जैक्सनने उन पर अंग्रेजों के विरुद्ध विरोध भड़काने का आरोप लगाया और सेशन जजने उन्हें १९०६ में देश निर्वासन का दण्ड दिया।

इतनी छोटीसी बात पर आजन्म देश निर्वासन का दण्ड देना बहुत अनुचित था।परन्तु इसमें जैक्सन तथा कर्जन वायली का हाथ था। जब विनायक सावरकरजी को लन्दन में इस बात की खबर पहुँची, तो उन्होने कहा कि, इसका बदला लिया जाएगा। 'अभिनव भारत' ने यह निर्णय लिया कि, जैक्सन तथा कर्जन वायली की हत्या की जाए।

#मदनलाल_ढींगरा - कर्जन वायली भारत सचिव के मुख्य परामर्शदाता थे। वे ही सब बातों में भारत सचिव की नीतियों को तय करते थे। भारत सचिव और भारत सरकार पर उनका ही नियन्त्रण था। वे इंग्लैंड में आए हुए भारतीय विद्यार्थियों पर कड़ी निगरानी रखते थे। उन्होंने अपने गुप्तचरों का जाल बिछा रखा था और वे क्रान्तिकारियों को बहुत तंग करते थे। गणेशपंत सावरकरजी के देश निर्वासन में भी उनका हाथ था। इसलिए वीर सावरकरजी की प्रेरणा से एक सभा में कर्जन वायली को १ जुलाई १९०६ को गोली से उड़ा दिया गया।

इस महत्वपूर्ण अंग्रेजी सरकारी अधिकारी को गोली से उड़ानेवाला क्रान्तिवीर व्यक्ति मदनलाल ढींगरा थे जिन्होने सावरकरजी की प्रेरणासे कर्जन वायली की हत्या की थी। मदनलाल ढींगरा को वही गिरफ्तार कर लिया गया था। ढींगरा की जेब से एक कागज प्राप्त हुआ जिसमें उन्होने कर्जन वायली की हत्या के कारण पर प्रकाश डालते हुए लिखा था - "मैंने एक अंग्रेज का खून भारतीय नवयुवकों को फाँसी और देश निर्वासनके दण्ड देनेके विरुद्ध कड़ा विरोध प्रकट करने के लिए जान बूझकर बहाया है।” मदनलाल ढींगरा १६ अगस्त १९०९ को फाँसी का फन्दा हँसते-हँसते चूम गए। किन्तु उनकी अमर कीर्तिसे लन्दन ही नहीं सम्पूर्ण विश्व चकित हो उठा।

केक्सटन हॉलमें सर आगाखाँ की अध्यक्षता में मदनलाल ढींगरा की निन्दा करने के लिए एक सार्वजनिक सभा आयोजित की गई। जब ढींगरा की निन्दा का प्रस्ताव सर्वसम्मति से स्वीकृत घोषित किया जाने लगा तो हॉल में एक गम्भीर स्वर गूँज उठा, 'नहीं, नहीं, सर्वसम्मति से नहीं, मैं इसका विरोध करता हूँ।" सभा में सन्नाटा छा गया। अध्यक्ष ने पूछा कौन है, "प्रस्ताव विरोधी ? उत्तर मिला- "सावरकर"। जिसके नाम को सुनकर ही अंग्रेज काॅंपते थे उसे सम्मुख खड़ा देखकर सभा में भगदड़ मंच गई। उसी समय एक अंग्रेज ने वीर सावरकर की आॅंख पर घूँसा मार दिया। किन्तु सहसा ही एक लाठी उसकी खोपड़ी पर आकर पड़ी। घूँसे के बदले में हिन्दुस्तान की लाठीकी चर्चा तथा वीर सावरकरजी का नाम सम्पूर्ण लन्दन में जन-चर्चा का विषय बन गया ।

वीर सावरकर इंग्लैंड में बन्दी बनाए गए। अंग्रेजों ने मुकद्दमा चलाने के लिए ७ जुलाई १९१० को मोरिया जहाज में संगीनों के पहरे में उन्हें भारत भेजा। फ्रांस के तट मार्सेलीस बन्दरगाह के समीप जहाज के शौचालय के केबिन के दरवाजे पर पतलून टाँगकर शौच के बहाने संडास के छेदसें समुद्र में कूद गए। पाईप से बाहर निकलने से शरीर पर जगह जगह खरोचें आ गयी थी और उनसे रक्त निकल रहा था। समुद्र के नमकीन पानी के कारण जलन हो रही थी। फिर भी वे तैरकर फ्रांस के भू-भाग पर पहुँच गए। बन्दरगाह की दीवार चढ़कर वे प्रवेश कर ही रहे थे कि दूसरी ओर से गश्ती नांव किनारे आ पहुँची। ब्रिटिश जहाजी नाविक चोर-चोर चिल्ला रहे थे और फ्रांसीसी पहरेदार को धमकी देकर वापस पकड़ कर ले गए।

फ्रांस की भूमि में मुझे गिरफ्तार करने का अधिकार आपको नहीं। सावरकर गरजने लगे। परन्तु सिपाही सुनने के लिए तैयार नहीं थे। उन्हें पकड़कर वापस जहाज पर ले गए। पहरे को अधिक मजबूत कर उन्हें भारत ले आए।

अंग्रेज पहरेदारों द्वारा सावरकर को पुनः पकड़ने के बाद भी सावरकर का यह अदभुत साहस दुनिया के इतिहास में एक रोमांचकारी कृत्य बन गया।

#दो_आजन्म_कारावास सावरकर पर भारत में मुकदमा चलाया गया। उन पर आरोप था क्रान्ति के द्वारा राजसत्ता को उखाड़ फेंकना तथा अंग्रेज अधिकारियों की हत्या के लिए लोगों को प्रेरित करना। इन दो आरोपों पर अलग-अलग दो आजन्म कारावास की सजाएँ सुनाई गई।

अंग्रेज अधिकारी द्वारा दो आजन्म कारावास की सजा सुनाने के बाद सावरकरजी ने कहा "ओह ! अंग्रेज को भी हिन्दुओं की पुनर्जन्म की कल्पना मान्य है। दो आजन्म कारावास की सजा सुनाना ही इनका निदेशक है। सावरकर की सभी जायदाद सरकार ने जब्त कर ली। दो जन्मों का आजन्म कारावास और कालापानी का दण्ड । १९१० में अंदमानके सेल्युलर जेलमें आयरिश जेलरने कहा "मिस्टर सावरकर, ५० वर्षों तक कैसे जिन्दा रहोगे" । सावरकर ने कहा "मैं तो जिन्दा रहूँगा, किन्तु तब तक हिन्दुस्तान से ब्रिटिश साम्राज्य का खात्मा हो चुका होगा।"

काले पानी की सजा से दण्डित अपराधियों से कई प्रकार के कठिन कार्य वहाँ लिए जाते थे। सावरकर को तेल के कोल्हू में बैल के समान जोता जाता था। सुबह से शाम तक कोल्हू चलाते-चलाते तात्याराव थककर चूर हो जाते थे । उन्हें नारियल की रस्सी भी तैयार करनी पड़ती थी। हथेली का चमड़ा छिलकर रक्त बहने पर भी निर्दिष्ट प्रमाण में काम करना ही पड़ता था। वरना, बेतों की मार सहनी पडती थी।

खाने के लिए अन्न भी बहुत कम मिलता था। सब्जी में नमक नहीं, तेल नहीं और किसी प्रकार का मसाला नहीं। शाक भाजी में कीड़े-मकोड़े मिले हुए कई बार दिखाई पड़ते।

रात के समय कोठरी में बन्द कर दिया आता था। रात में जब कभी प्यास लगती तो पानी नहीं मिलता था। मलमूत्र विसर्जन के लिए अवसर नहीं मिलता था। भीतर ही कैदी लघुशंका कर देते। इस प्रकार की यमपुरी में जीवन बिताने का कठिन समय सावरकरजी के सामने उपस्थित हुआ।

वीर सावरकरजीने कारावासमें शुद्धि का कार्य प्रारम्भ किया। उन्होने कारावासमें प्रौढ शिक्षाका कार्य चलाया। इस कार्य से सब प्रकार के उनके मित्र बन गए।

१९२४ से लेकर १९३७ तक सावरकर रत्नागिरी जिले में बन्दी रहे। एक बार सरकारसे अनुमति पाकर सावरकरजी अपने बाल्यकालके कार्यक्षेत्र नासिक गए। वहाँ की जनताने उनका नागरिक सम्मान किया। एक लाख रुपयों की थैली उन्हें अर्पित की। सावरकरने उस निधिको समाजसेवा के लिए सुरक्षित रखा और खुद को भी समाजकी सेवाके लिए अर्पित किया।

#कवि_सावरकर - सावरकरजी जन्मजात कवि थे। कारावासमें अत्यन्त स्फूर्तिदायक काव्यों की रचना दीवारपर लोहे की कीलसे की। "कमला, "गोमातक", "महासागर" काव्योंकी रचना अंदमान में की थी।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का विस्तार आज भारत के सभी प्रदेशों में हुआ है। इस कार्य की नीव रखते समय राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघके आद्य संस्थापक डॉ. हेडगेवारजी वीर सावरकरजी के पास रत्नागिरी आकर मिले थे। क्रान्तिवीर बाबाराव सावरकरजी तो संघ स्थापना के दिन नागपूर में उपस्थित थे अभिनव भारत के पुराने सदस्यों संघ को प्रारम्भिक अवस्था में बहुत बल पहुँचाया। रत्नागिरी के वास्तव्य में संघ कार्य के प्रति वीर सावरकरजी का पूरा ध्यान था। उस कार्य के प्रति उनकी सहानुभूति थी।

१९३७ में सावरकरजी पर लगाये दोनों बन्धन हटा दिए गए। बादमें सावरकरजी सक्रिय राजनीतिमें कूद पड़े। हिन्दू महासभा के अध्यक्ष चुने गए। हैदराबाद के निजाम के राज्यमें हिन्दुओंपर अत्याचार हो रहा था। अत्याचारोंके विरोधमें सावरकरजी ने संघर्ष किया। हिन्दू युवकों को भारी संख्यामें सेनामें भर्ती होना चाहिए, ऐसा प्रचार किया। पाकिस्तानकी माँग सामने आते ही उन्होंने उसका तीव्र विरोध किया। १९४७ में भारत स्वतन्त्र हुआ। परन्तु पाकिस्तान के निर्माणसें करोड़ों हिन्दुओंको शरणार्थी बनकर भारत आना पड़ा। हजारों वर्षोंसे जिस भूमिमें वे रहते थे वहीं पर वे विदेशी बन गये, वहाँ से बाहर खदेड़ दिए गए। ऐसा कोई हिन्दू न होगा जो इन लोगों के रुदन को देखकर व्यथित न हुआ हो, जिनका मन करुणासे द्रवित न हुआ हो। सावरकरजी का मन इस विषम परिस्थितिमें अस्वस्थ होना स्वाभाविक ही था। १९४८ में म. गांधी की हत्या हुई । उस समय भारत सरकारने उन्हें बन्दी बनाया। परन्तु मुकदमे का सिलसिला पूरा होने पर वे निर्दोष, निष्कलंक सिद्ध हुए ।

#बुद्ध_या_युद्ध - सावरकरजी १० मई १९५७ को रामलीला मैदानके दिल्लीमें स्वाधीनता संग्रामके शताब्दी समारोहमें आए। इस अवसर पर उन्होंने चेतावनी दी कि, "इस देश के सामने दो ही मार्ग है बुद्ध या युद्ध। हमारा राष्ट्र यदि बुद्ध की पूजा करना चाहता है तो उसे युद्ध की भी सिद्धता रखनी होगी।

२६ फरवरी, १९६६ को प्रातः ११ बजकर ५८ मिनट पर जीवन के ८३ वर्ष पूर्ण कर उन्होनें "आत्म समर्पण" किया।

आइए हम सभी उन परमध्येयवादी एवं हिन्दुत्व के परमोपासक के प्रति श्रद्धांजलि अर्पित कर हिन्दुत्व को जागृत करने की प्रतिज्ञा लें।

शत शत नमन है वीर सावरकर

@ प्रो० ए०के० मल्होत्रा

*विवेकानन्द केन्द्र कन्याकुमारी शाखा उज्जैन द्वारा प्रस्तुत है आज का पुण्य स्मरण* 17 दिसम्बर/बलिदान-दिवसक्रान्तिवीर राजे...
17/12/2022

*विवेकानन्द केन्द्र कन्याकुमारी शाखा उज्जैन द्वारा प्रस्तुत है आज का पुण्य स्मरण*

17 दिसम्बर/बलिदान-दिवस

क्रान्तिवीर राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी

भारतीय स्वाधीनता संग्राम में काकोरी कांड का बड़ा महत्त्व है। यह पहला अवसर था, जब स्वाधीनता सेनानियों ने सरकारी खजाना लूटकर जनता में यह विचार फैलाने में सफलता पाई कि क्रान्तिकारी आम जनता के नहीं, अपितु शासन के विरोधी है। साथ ही जनता के मन में यह विश्वास भी जाग गया कि अंग्रेज शासन इतना नाकारा है कि वह अपने खजाने की रक्षा भी नहीं कर सकता, तो फिर वह जनता की रक्षा क्या करेगा ?

इस कांड में चार क्रान्तिवीरों को मृत्युदंड दिया गया। इनमें से एक राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी को 17 दिसम्बर, 1927 को उत्तर प्रदेश की गोंडा जेल में फाँसी पर लटका दिया। वीर राजेन्द्र लाहिड़ी ने फाँसी चढ़ने से पूर्व वन्दे मातरम् की हुंकार भरी और कहा कि मैं मर नहीं रहा हूँ, बल्कि अंग्रेजों के साम्राज्य की नींव हिलाने के लिए स्वतन्त्र भारत में पुनर्जन्म लेने जा रहा हूँ।

यह हुंकार सुनकर अंग्रेज समझ गये कि वीर प्रसूता भारत माँ के सपूत उन्हें अब चैन से नहीं जीने देंगे। काकोरी कांड में मृत्युदंड पाये चारों वीरों को अलग-अलग स्थानों पर फाँसी दी गयी। राजेन्द्र लाहिड़ी की जेल के निकट परेड सरकार के पास टेढ़ी नदी के तट पर अन्त्येष्टि की गयी। वहाँ उपस्थित उनके साथियों, सम्बन्धियों और स्थानीय समाजसेवी संस्थाओं के कार्यकर्ताओं मन्मथनाथ गुप्त, लाल बिहारी टंडन एवं ईश्वर शरण आदि ने वहाँ एक बोतल जमीन में गाड़ दी थी; परन्तु बाद में उस स्थान की ठीक से पहचान नहीं हो पायी।

राजेन्द्र लाहिड़ी का जन्म 23 जून, 1901 को ग्राम मोहनापुर (जिला पावना, वर्तमान बांग्लादेश) में माता बसन्त कुमारी के गर्भ से हुआ था। जन्म के समय उनके पिता क्रान्तिकारी क्षितिमोहन लाहिड़ी और बडे़ भाई बंग-भंग आन्दोलन में कारावास का दंड भोग रहे थे। मात्र नौ वर्ष की अल्पावस्था में वे अपने मामा के पास काशी आ गये।

काशी में उनका सम्पर्क प्रख्यात क्रान्तिकारी शचीन्द्रनाथ सान्याल से हुआ। लाहिड़ी की फौलादी दृढ़ता, देशप्रेम, तथा निश्चय की अडिगता को पहचान कर उन्हें क्रांतिकारियों ने अपनी अग्रिम टोली में भर्ती कर ‘हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिवोल्यूशन आर्मी पार्टी’ का बनारस का प्रभारी बना दिया। वह बलिदानी जत्थों की गुप्त बैठकों में बुलाये जाने लगे।

उस समय क्रान्तिकारियों के चल रहे आन्दोलन को गति देने के लिए तत्काल धन की आवश्यकता थी। इसके लिए अंग्रेजी सरकार का खजाना लूटने की योजना बनाई। योजना के अनुसार नौ अगस्त, 1925 को सायंकाल छह बजे लखनऊ के पास काकोरी से छूटी आठ डाउन गाड़ी में जा रहे सरकारी खजाने को लूट लिया गया। काम पूरा कर सब तितर-बितर हो गये।

इसमें रामप्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्लाह, ठाकुर रोशनसिंह सहित 19 अन्य क्रान्तिकारियों ने भाग लिया था। पकड़े गये सभी क्रांतिवीरों पर शासन के विरुद्ध सशस्त्र युद्ध छेड़ने एवं खजाना लूटने का अभियोग लगाया गया।

इस कांड में लखनऊ की विशेष अदालत ने छह अप्रैल 1927 को निर्णय सुनाया, जिसके अन्तर्गत राजेन्द्र लाहिड़ी, रामप्रसाद बिस्मिल, रोशन सिंह तथा अशफाक उल्लाह को मृत्यु दंड दिया गया। शेष तीनों को 19 दिसम्बर को फाँसी दी गयी; लेकिन भयवश अंग्रेजी शासन ने राजेन्द्र लाहिड़ी को गोंडा कारागार में 17 दिसम्बर, 1927 को ही फाँसी दे दी।

मनीष खंडेलवाल उज्जैन महानगर प्रमुख

कर्नाटक से रुझान !मैं व्यक्तिगत रूप से मांसाहार का प्रचारक नहीं हूँ पर बहुत बड़ी संख्या जो हमारे हिंदु भाई है वह सेवन  कर...
11/12/2022

कर्नाटक से रुझान !
मैं व्यक्तिगत रूप से मांसाहार का प्रचारक नहीं हूँ पर बहुत बड़ी संख्या जो हमारे हिंदु भाई है वह सेवन करते है मांसाहार का, इस दृष्टि से इसका व्यापार भी हम ही लोगो के आधीन होना चाहिए ।

…We want strength, strength, and every time strength. And the Upanishads are the great mine of strength. Therein lies st...
11/12/2022

…We want strength, strength, and every time strength. And the Upanishads are the great mine of strength. Therein lies strength enough to invigorate the whole world; the whole world can be vivified, made strong, energised through them.

-- Swami Vivekananda
{CWSV-3 : Lectures From Colombo to Almora : Vedanta in its Application to Indian Life}



"महान क्रांतिकारी टंट्या मामा भील का नाम सुन कर कांप जाते थे अंग्रेज"अंग्रेज गरीबों पर जुल्म ढाते, अत्याचार करते, महीनों...
09/12/2022

"महान क्रांतिकारी टंट्या मामा भील का नाम सुन कर कांप जाते थे अंग्रेज"

अंग्रेज गरीबों पर जुल्म ढाते, अत्याचार करते, महीनों की मजदूरी के बदले कौड़ो से पीटते. उनकी हैवानियत यही नहीं रुकती.. वो मजदूरों को रोटी जगह उनके जख़्मों पर नमक रगड़ते। कुछ काले अंग्रेज (भारतीय) भी उनका इस कुकृत्य में साथ दे रहे थे. ये अन्याय टंट्या मामा को मंजूर नहीं था. ये एक अकेला क्रांतिकारी ब्रिटिशों की नींद उड़ाने के लिए काफी था.
टंट्या मामा की दांस्ता आत्मप्रेरणा से प्रेरित महान क्रान्तिकारी की गौरव गाथा है उस समय हिंदुस्तानियों के खून पसीने की कमाई को अंग्रेज रेलगाड़ियों में भर कर इंगलिस्तान ले जाते थे, लेकिन ट्रेन पातालपानी (महू) के जंगलों को पार नहीं कर पाती.
टंट्या मामा बिजली की तरह प्रकट होते और लूट का सारा पैसा लेकर अंतर्ध्यान हो जाते. ये पैसा जरूरतमन्दों और गरीबों में बांट दिया जाता.

स्थानीय लोकभाषा में आज भी गीतों में उल्लेख आता है कि कैसे टंट्या मामा बेटियों की शादी के लिए, बीमारों को उपचार हेतु भोजन,कपड़े और मकान हेतु वो सारा पैसा भेंट कर देते थे। अपनी जान दाँव पे लगा कर, अपनोंं की सेवा करने का इससे बेहतरीन उदाहरण दूसरा नहीं मिलता.
4 दिसम्बर 1889 को जबलपुर सेंट्रल जेल में टंट्या मामा को फांसी दे दी थी. लेकिन टंट्या मामा को मार पाए वो फांसी का तख्ता आज तक बना नहीं, आज भी टंट्या मामा हमारे दिलों में जिंदा है.

मोहनदास करमचंद को पुणे के आगा खां पैलेस में कठोर कारावास (?) की सजा दी गई थी । सजा इतनी कठोर थी की बापू को स्नान करने के...
29/11/2022

मोहनदास करमचंद को पुणे के आगा खां पैलेस में कठोर कारावास (?) की सजा दी गई थी । सजा इतनी कठोर थी की बापू को स्नान करने के लिए दस बाय दस फिट का संगमरमर लगा बाथरूम में नहाना पड़ता था ।
सजा इतनी कठोर थी की बापू को आठ बाय आठ फीट के नर्म, मुलायम मखमली बिस्तर में सोने के लिए मजबूर किया जाता था ।
सजा इतनी कठोर थी की 20 एकड़ में फैले आगा खां पैलेस के हरी हरी मुलायम घास में घूमने के लिए मजबूर किया जाता था ।
सजा इतनी कठोर थी की बारह बाय बारह फिट के स्टडी रूम में आलीशान टेबल कुर्सी में बेहतरीन इंग्लैंड के कागज में लेखन के लिए मजबूर किया गया ।
और हां, सजा इतनी कठोर थी की बापू की पत्नी भी साथ में रहती थी ।
सजा इतनी कठोर थी की आने जाने के लिए मर्सडीज कार में बैठने को मजबूर किया जाता था ।
और उधर वीर सावरकर जी को इतनी आसान सजा मिली थी,हाथ पांव लोहे की जंजीरों से बंधे थे और दो जन्म की कालापानी की और उसमे भी रोज कोल्हू से तेल निकालना पड़ता था ।।
गांधी देश के बापू बन गए और सावरकर जी अंग्रेजो से माफी मानने वाला ।।
नोट: जिसे विश्वास नही है वे पुणे में स्थित आगा खां पैलेस घूम आए, जो आज भी गांधी संग्रहालय के रूप में सुरक्षित है और हां, बापू जिस रस्सी से बकरी बांधते थे वह रस्सी भी दिख जायेगी।

16 नवम्बर/बलिदान-दिवसभगतसिंह के प्रेरणास्रोत करतार सिंह सराबाअमर बलिदानी करतार सिंह सराबा को भगतसिंह अपना अग्रज, गुरु, स...
16/11/2022

16 नवम्बर/बलिदान-दिवस

भगतसिंह के प्रेरणास्रोत करतार सिंह सराबा

अमर बलिदानी करतार सिंह सराबा को भगतसिंह अपना अग्रज, गुरु, साथी तथा प्रेरणास्रोत मानते थे। वे भगतसिंह से 11 वर्ष बड़े थे और उनसे 11 वर्ष पूर्व केवल 19 वर्ष की तरुणावस्था में ही भारतमाता के पावन चरणों में उन्होंने हंसते हुए अपना शीश अर्पित कर दिया।

करतार सिंह का जन्म 1896 ई. में लुधियाना जिले के सराबा गाँव में हुआ था। इनके पिता श्री मंगल सिंह का देहान्त जल्दी ही हो गया था। प्रारम्भिक शिक्षा खालसा स्कूल, लुधियाना में पूरी कर चाचा जी की अनुमति से केवल 14 वर्ष की अवस्था में पढ़ाई के लिए सान फ्रान्सिस्को चले गये।

उन दिनों वहाँ भारतीयों में देशप्रेम की आग सुलग रही थी। करतार सिंह भी उनमें शामिल हो गये। उन्होंने थोड़े समय में ही यह देख लिया कि गोरे लोग भारतीयों से घृणा करते हैं और उन्हें कुली समझते हैं। करतार सिंह का मत था कि इसे बदलने का एकमात्र मार्ग यही है कि भारत स्वतन्त्र हो। इसके लिए उन्होंने स्वयं की आहुति देने का निश्चय कर लिया।

शीघ्र ही उनका सम्पर्क लाला हरदयाल से हो गया। फिर तो वे ही करतार के मार्गदर्शक बन गये। ‘गदर पार्टी’ की स्थापना के बाद करतार उसके प्रमुख कार्यकर्ता बने। पोर्टलैण्ड में हुए उसके सम्मेलन में भी वे शामिल हुए। करतार के प्रयास से वहाँ ‘युगान्तर आश्रम’ की स्थापना हुई और पार्टी का साप्ताहिक मुखपत्र ‘गदर’ कई भाषाओं में छपने लगा। उन्होंने घर से पढ़ाई के लिए मिले 200 पौंड भी लाला जी को समाचार पत्र के लिए दे दिये। इस पत्र में 1857 के स्वतन्त्रता संग्राम की कुछ प्रेरक सामग्री अवश्य होती थी।

प्रथम विश्व युद्ध छिड़ने पर वे भारत आये। उनका विचार था कि यह अंग्रेजों को बाहर निकालने का सर्वश्रेष्ठ समय है। उन्होंने रासबिहारी बोस तथा शचीन्द्रनाथ सान्याल जैसे क्रान्तिकारियों से भी भेंट की। 21 फरवरी, 1915 को पूरे देश में एक साथ क्रान्ति की योजना बनी।

करतार सिंह पर पंजाब की जिम्मेदारी थी। उन्होंने कई धार्मिक स्थानों की यात्रा कर युवकों तथा सेना से सम्पर्क किया। रेल तथा डाक व्यवस्था को भंग करने की योजना बन गयी। इन सबका केन्द्र लाहौर था। वहाँ छावनी में शस्त्रागार के चौकीदार से भी बात हो गयी। धन के लिए कई डाके भी डाले गये।

पर दुर्भाग्य ने उनका पीछा नहीं छोड़ा। कृपाल सिंह नामक एक पुलिस वाले ने मुखबिरी की और धरपकड़ होने लगी। करतार अपने कुछ साथियों के साथ भारत की उत्तर पश्चिम सीमा की ओर चले गये; पर उन्हें सरगोधा के पास पकड़ लिया गया और लाहौर के केन्द्रीय कारागार में बन्द कर दिया। इनके साथ 60 अन्य लोगों पर पहला लाहौर षड्यन्त्र केस चलाया गया।

करतार ने अपने साथियों को बचाने के लिए सारी जिम्मेदारी स्वयं पर ले ली। न्यायाधीश ने इन्हें अपना बयान बदलने को कहा; पर इस बार करतार ने और कठोर बयान दिया। अतः उन्हें फाँसी की सजा सुना दी गयी। एक बार उन्होंने जेल से भागने का भी प्रयास किया; पर वह योजना विफल हो गयी। करतार का उत्साह इतना था कि फाँसी से पूर्व इनका वजन बढ़ गया।

16 नवम्बर, 1915 को करतार सिंह सराबा और उनके छह साथियों ने लाहौर केन्द्रीय जेल में फाँसी का फन्दा चूम लिया। इनके नाम थे - विष्णु गणेश पिंगले, हरनाम सिंह, बख्शीश सिंह, जगतसिंह, सुरेन सिंह एवं सुरेन्द्र सिंह।

28/05/2022

सावरकर याने हिन्दुत्व

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