19/12/2022
वीर सावरकर का जीवन वृत्त
'काल स्वयं मुझसे डरा है, मैं काल सें नहीं। अनेक बार फाँसी के फन्दे को चूमकर उसके कराल स्तंभको झकझोर कर मैं लौट आया हूँ। मैं इतने पर भी जीवित रहा, यह मृत्यु की भूल थी।” (पुणे, १९४२)
स्वातंत्र्यवीर वि. दा. सावरकर का जन्म २८ मई १८८३ को रात्रि में १० बजे सोमवार के दिन महाराष्ट्र के नासिक जिलेमें स्थित भगूर नामक ग्राम में हुआ था ।
वे भारतीय स्वातन्त्र्यसंग्राम के एक अप्रतिम योद्धा ही नहीं, अपितु उनके रग-रग में प्रखर हिन्दुत्व का भाव भी समाया हुआ था। साहस, निर्भीकता, दूरदर्शिता, प्रचण्ड आत्मविश्वास, अनुशासन, सिद्धान्त- प्रियता, उदात्त-ध्येयवाद, कष्ट, सहिष्णुता, त्याग, ओजस्वी वक्तृत्व, संगठन-कौशल्य, हृदय के तार-तार को झंकृत करने वाली लेखन कला और विचार प्रवणता आदि अनेकों गुणों के योग के वे अद्भुत संगम थे।
वीर सावरकरजी ने बाल्यावस्था में ही "मित्रमेला" का गठन किया। "मित्रमेला" के कार्यक्रम थे - व्यायामशाला चलाना, सार्वजनिक गणेशोत्सव तथा शिवाजी जयन्ती का आयोजन करना।
इन्हीं दिनों एक घटना घटित हुई और अत्याचारी विदेशी सत्ता के प्रतिनिधि रैण्ड और आर्मस्ट का वध करने के आरोप में चापेकर बंधूओंको फाँसी के फन्दे पर लटका दिया गया।
वीर सावरकर उन दिनों १६ वर्ष के ही थे । किन्तु उसी दिन अपनी कुलदेवी भगवती दुर्गा के समक्ष रक्तसे तर्पण कर उन्होंने यह प्रतिज्ञा ग्रहण की "हे माँ! देश की स्वतन्त्रता की प्राप्ति हेतु सशस्त्र क्रान्ति की पताका फहराकर शत्रुओं का सहार करते-करते जीवन की अन्तिम घडी तक संघर्ष करते रहने की शक्ति मुझे प्रदान करो।"
बालक सावरकर ने चापेकर बन्धुओं के साहस और हौतात्म्यपर स्फूर्तिदायक काव्य लिखा। उनकी अन्तिम पंक्ति का आशय इस प्रकार हैं।
"आपके द्वारा प्रारम्भ किया कार्य बीच में ही बन्द होगा। ऐसी शंका मत रखो। उसे आगे चलाने के लिए हम हैं, आप निश्चिन्त रहे।"
इन्हीं विचारों को हृदयंगम किए नासिकमें राष्ट्रभक्ति का बीजारोपण कर स्वातन्त्र्यवीर सावरकर उच्च शिक्षा प्राप्ति के लिए पूना चले आए। यहाँ क्रांति का यह पौधा वटवृक्ष का रूप धारण करने लगा। तीन शक्तियाँ पूना को प्रभावित करने लगी। उन्होंने अपने महाविद्यालयीन जीवन में विदेशी वस्त्रों की होली जलाकर अनेक वर्ष पूर्व ही स्वदेशी आंदोलन का सूत्रपात्र कर दिया।
सावरकर जी ने 'अभिनव भारत' नामक एक संस्था की स्थापना की। उन्हीं दिनो वीर विनायक के सिर से पिता की मृदुल छाया भी उठ गई, किन्तु उनकी स्वातंत्र्य आराधना में कोई कमी नही आई।
१९०६ मे सावरकर उच्च शिक्षा के लिए इंग्लैण्ड गए। जाने से पहले उन्होंने एक गुप्त सभा में घोषणा की "अभी तक मैं पूना के फर्ग्यूसन कॉलेज में महाराष्ट्र के चुने हुए युवकों में अपना विचार फैलाता रहा हूँ, परन्तु अब मैं विदेश जाकर भारत के धनी तथा योग्य विद्यार्थियों में प्रचार करूँगा, वे लोग जब बैरिस्टर आदि बनकर भारत लौटेंगे तो देशभर में क्रान्ति मचा देंगे। मैं शत्रु के घर जाकर भारतीयों की शक्ति का प्रदर्शन करूँगा। मैं रुसी आतंकवादियों से बम और पिस्तौल बनाना सीखूंगा।
लन्दन में सावरकर श्यामजी कृष्ण वर्मा के अतिथि बने और उनके द्वारा स्थापित इण्डिया हाउस में रहने लगे। इस होस्टलमें रहने वाले भारतीय शीघ्र ही उनके प्रभाव में आ गए और लन्दनस्थित इण्डिया हाउस भारतीय क्रान्ति का गढ़ बन गया। १९०७ में अंग्रेज लोग १८५७ की क्रान्तिको दबाने की प्रसन्नता में अर्द्धशताब्दी मना रहे थे। सावरकर ने इसका विरोध किया और १० मई १९०८ को इण्डिया हाउस में १८५७ का स्वतन्त्रता दिवस समारोह बड़ी धूमधाम से मनाने का निश्चय किया। उन्होंने यह सिद्ध करने का प्रयास किया कि १८५७ की क्रान्ति सिपाही गदर नहीं बल्की हिन्दूस्थान का प्रथम स्वातंत्र्यसंग्राम था।
इस आधार पर उन्होंने मराठी में एक पुस्तक की रचना भी की। बाद में अंग्रेजी भाषा में इसका अनुवाद (Indian War of Independence, 1857) भी हुआ। ब्रिटिश सरकारने इस पुस्तकपर पाबंदी लगा दी।
#गणेशपंत_सावरकर : विनायकराव सावरकरजीके बड़े भाई गणेशपंत (बाबाराव) सावरकर महाराष्ट्र में 'अभिनव 'भारत' के जरिए क्रान्तिकारी विचारधारा का प्रचार कर रहे थे। देश-भक्तिसे सम्बन्धित उन्होंने कुछ कविताएँ लिखी। इसी कारण नासिक के कलेक्टर जैक्सनने उन पर अंग्रेजों के विरुद्ध विरोध भड़काने का आरोप लगाया और सेशन जजने उन्हें १९०६ में देश निर्वासन का दण्ड दिया।
इतनी छोटीसी बात पर आजन्म देश निर्वासन का दण्ड देना बहुत अनुचित था।परन्तु इसमें जैक्सन तथा कर्जन वायली का हाथ था। जब विनायक सावरकरजी को लन्दन में इस बात की खबर पहुँची, तो उन्होने कहा कि, इसका बदला लिया जाएगा। 'अभिनव भारत' ने यह निर्णय लिया कि, जैक्सन तथा कर्जन वायली की हत्या की जाए।
#मदनलाल_ढींगरा - कर्जन वायली भारत सचिव के मुख्य परामर्शदाता थे। वे ही सब बातों में भारत सचिव की नीतियों को तय करते थे। भारत सचिव और भारत सरकार पर उनका ही नियन्त्रण था। वे इंग्लैंड में आए हुए भारतीय विद्यार्थियों पर कड़ी निगरानी रखते थे। उन्होंने अपने गुप्तचरों का जाल बिछा रखा था और वे क्रान्तिकारियों को बहुत तंग करते थे। गणेशपंत सावरकरजी के देश निर्वासन में भी उनका हाथ था। इसलिए वीर सावरकरजी की प्रेरणा से एक सभा में कर्जन वायली को १ जुलाई १९०६ को गोली से उड़ा दिया गया।
इस महत्वपूर्ण अंग्रेजी सरकारी अधिकारी को गोली से उड़ानेवाला क्रान्तिवीर व्यक्ति मदनलाल ढींगरा थे जिन्होने सावरकरजी की प्रेरणासे कर्जन वायली की हत्या की थी। मदनलाल ढींगरा को वही गिरफ्तार कर लिया गया था। ढींगरा की जेब से एक कागज प्राप्त हुआ जिसमें उन्होने कर्जन वायली की हत्या के कारण पर प्रकाश डालते हुए लिखा था - "मैंने एक अंग्रेज का खून भारतीय नवयुवकों को फाँसी और देश निर्वासनके दण्ड देनेके विरुद्ध कड़ा विरोध प्रकट करने के लिए जान बूझकर बहाया है।” मदनलाल ढींगरा १६ अगस्त १९०९ को फाँसी का फन्दा हँसते-हँसते चूम गए। किन्तु उनकी अमर कीर्तिसे लन्दन ही नहीं सम्पूर्ण विश्व चकित हो उठा।
केक्सटन हॉलमें सर आगाखाँ की अध्यक्षता में मदनलाल ढींगरा की निन्दा करने के लिए एक सार्वजनिक सभा आयोजित की गई। जब ढींगरा की निन्दा का प्रस्ताव सर्वसम्मति से स्वीकृत घोषित किया जाने लगा तो हॉल में एक गम्भीर स्वर गूँज उठा, 'नहीं, नहीं, सर्वसम्मति से नहीं, मैं इसका विरोध करता हूँ।" सभा में सन्नाटा छा गया। अध्यक्ष ने पूछा कौन है, "प्रस्ताव विरोधी ? उत्तर मिला- "सावरकर"। जिसके नाम को सुनकर ही अंग्रेज काॅंपते थे उसे सम्मुख खड़ा देखकर सभा में भगदड़ मंच गई। उसी समय एक अंग्रेज ने वीर सावरकर की आॅंख पर घूँसा मार दिया। किन्तु सहसा ही एक लाठी उसकी खोपड़ी पर आकर पड़ी। घूँसे के बदले में हिन्दुस्तान की लाठीकी चर्चा तथा वीर सावरकरजी का नाम सम्पूर्ण लन्दन में जन-चर्चा का विषय बन गया ।
वीर सावरकर इंग्लैंड में बन्दी बनाए गए। अंग्रेजों ने मुकद्दमा चलाने के लिए ७ जुलाई १९१० को मोरिया जहाज में संगीनों के पहरे में उन्हें भारत भेजा। फ्रांस के तट मार्सेलीस बन्दरगाह के समीप जहाज के शौचालय के केबिन के दरवाजे पर पतलून टाँगकर शौच के बहाने संडास के छेदसें समुद्र में कूद गए। पाईप से बाहर निकलने से शरीर पर जगह जगह खरोचें आ गयी थी और उनसे रक्त निकल रहा था। समुद्र के नमकीन पानी के कारण जलन हो रही थी। फिर भी वे तैरकर फ्रांस के भू-भाग पर पहुँच गए। बन्दरगाह की दीवार चढ़कर वे प्रवेश कर ही रहे थे कि दूसरी ओर से गश्ती नांव किनारे आ पहुँची। ब्रिटिश जहाजी नाविक चोर-चोर चिल्ला रहे थे और फ्रांसीसी पहरेदार को धमकी देकर वापस पकड़ कर ले गए।
फ्रांस की भूमि में मुझे गिरफ्तार करने का अधिकार आपको नहीं। सावरकर गरजने लगे। परन्तु सिपाही सुनने के लिए तैयार नहीं थे। उन्हें पकड़कर वापस जहाज पर ले गए। पहरे को अधिक मजबूत कर उन्हें भारत ले आए।
अंग्रेज पहरेदारों द्वारा सावरकर को पुनः पकड़ने के बाद भी सावरकर का यह अदभुत साहस दुनिया के इतिहास में एक रोमांचकारी कृत्य बन गया।
#दो_आजन्म_कारावास सावरकर पर भारत में मुकदमा चलाया गया। उन पर आरोप था क्रान्ति के द्वारा राजसत्ता को उखाड़ फेंकना तथा अंग्रेज अधिकारियों की हत्या के लिए लोगों को प्रेरित करना। इन दो आरोपों पर अलग-अलग दो आजन्म कारावास की सजाएँ सुनाई गई।
अंग्रेज अधिकारी द्वारा दो आजन्म कारावास की सजा सुनाने के बाद सावरकरजी ने कहा "ओह ! अंग्रेज को भी हिन्दुओं की पुनर्जन्म की कल्पना मान्य है। दो आजन्म कारावास की सजा सुनाना ही इनका निदेशक है। सावरकर की सभी जायदाद सरकार ने जब्त कर ली। दो जन्मों का आजन्म कारावास और कालापानी का दण्ड । १९१० में अंदमानके सेल्युलर जेलमें आयरिश जेलरने कहा "मिस्टर सावरकर, ५० वर्षों तक कैसे जिन्दा रहोगे" । सावरकर ने कहा "मैं तो जिन्दा रहूँगा, किन्तु तब तक हिन्दुस्तान से ब्रिटिश साम्राज्य का खात्मा हो चुका होगा।"
काले पानी की सजा से दण्डित अपराधियों से कई प्रकार के कठिन कार्य वहाँ लिए जाते थे। सावरकर को तेल के कोल्हू में बैल के समान जोता जाता था। सुबह से शाम तक कोल्हू चलाते-चलाते तात्याराव थककर चूर हो जाते थे । उन्हें नारियल की रस्सी भी तैयार करनी पड़ती थी। हथेली का चमड़ा छिलकर रक्त बहने पर भी निर्दिष्ट प्रमाण में काम करना ही पड़ता था। वरना, बेतों की मार सहनी पडती थी।
खाने के लिए अन्न भी बहुत कम मिलता था। सब्जी में नमक नहीं, तेल नहीं और किसी प्रकार का मसाला नहीं। शाक भाजी में कीड़े-मकोड़े मिले हुए कई बार दिखाई पड़ते।
रात के समय कोठरी में बन्द कर दिया आता था। रात में जब कभी प्यास लगती तो पानी नहीं मिलता था। मलमूत्र विसर्जन के लिए अवसर नहीं मिलता था। भीतर ही कैदी लघुशंका कर देते। इस प्रकार की यमपुरी में जीवन बिताने का कठिन समय सावरकरजी के सामने उपस्थित हुआ।
वीर सावरकरजीने कारावासमें शुद्धि का कार्य प्रारम्भ किया। उन्होने कारावासमें प्रौढ शिक्षाका कार्य चलाया। इस कार्य से सब प्रकार के उनके मित्र बन गए।
१९२४ से लेकर १९३७ तक सावरकर रत्नागिरी जिले में बन्दी रहे। एक बार सरकारसे अनुमति पाकर सावरकरजी अपने बाल्यकालके कार्यक्षेत्र नासिक गए। वहाँ की जनताने उनका नागरिक सम्मान किया। एक लाख रुपयों की थैली उन्हें अर्पित की। सावरकरने उस निधिको समाजसेवा के लिए सुरक्षित रखा और खुद को भी समाजकी सेवाके लिए अर्पित किया।
#कवि_सावरकर - सावरकरजी जन्मजात कवि थे। कारावासमें अत्यन्त स्फूर्तिदायक काव्यों की रचना दीवारपर लोहे की कीलसे की। "कमला, "गोमातक", "महासागर" काव्योंकी रचना अंदमान में की थी।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का विस्तार आज भारत के सभी प्रदेशों में हुआ है। इस कार्य की नीव रखते समय राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघके आद्य संस्थापक डॉ. हेडगेवारजी वीर सावरकरजी के पास रत्नागिरी आकर मिले थे। क्रान्तिवीर बाबाराव सावरकरजी तो संघ स्थापना के दिन नागपूर में उपस्थित थे अभिनव भारत के पुराने सदस्यों संघ को प्रारम्भिक अवस्था में बहुत बल पहुँचाया। रत्नागिरी के वास्तव्य में संघ कार्य के प्रति वीर सावरकरजी का पूरा ध्यान था। उस कार्य के प्रति उनकी सहानुभूति थी।
१९३७ में सावरकरजी पर लगाये दोनों बन्धन हटा दिए गए। बादमें सावरकरजी सक्रिय राजनीतिमें कूद पड़े। हिन्दू महासभा के अध्यक्ष चुने गए। हैदराबाद के निजाम के राज्यमें हिन्दुओंपर अत्याचार हो रहा था। अत्याचारोंके विरोधमें सावरकरजी ने संघर्ष किया। हिन्दू युवकों को भारी संख्यामें सेनामें भर्ती होना चाहिए, ऐसा प्रचार किया। पाकिस्तानकी माँग सामने आते ही उन्होंने उसका तीव्र विरोध किया। १९४७ में भारत स्वतन्त्र हुआ। परन्तु पाकिस्तान के निर्माणसें करोड़ों हिन्दुओंको शरणार्थी बनकर भारत आना पड़ा। हजारों वर्षोंसे जिस भूमिमें वे रहते थे वहीं पर वे विदेशी बन गये, वहाँ से बाहर खदेड़ दिए गए। ऐसा कोई हिन्दू न होगा जो इन लोगों के रुदन को देखकर व्यथित न हुआ हो, जिनका मन करुणासे द्रवित न हुआ हो। सावरकरजी का मन इस विषम परिस्थितिमें अस्वस्थ होना स्वाभाविक ही था। १९४८ में म. गांधी की हत्या हुई । उस समय भारत सरकारने उन्हें बन्दी बनाया। परन्तु मुकदमे का सिलसिला पूरा होने पर वे निर्दोष, निष्कलंक सिद्ध हुए ।
#बुद्ध_या_युद्ध - सावरकरजी १० मई १९५७ को रामलीला मैदानके दिल्लीमें स्वाधीनता संग्रामके शताब्दी समारोहमें आए। इस अवसर पर उन्होंने चेतावनी दी कि, "इस देश के सामने दो ही मार्ग है बुद्ध या युद्ध। हमारा राष्ट्र यदि बुद्ध की पूजा करना चाहता है तो उसे युद्ध की भी सिद्धता रखनी होगी।
२६ फरवरी, १९६६ को प्रातः ११ बजकर ५८ मिनट पर जीवन के ८३ वर्ष पूर्ण कर उन्होनें "आत्म समर्पण" किया।
आइए हम सभी उन परमध्येयवादी एवं हिन्दुत्व के परमोपासक के प्रति श्रद्धांजलि अर्पित कर हिन्दुत्व को जागृत करने की प्रतिज्ञा लें।
शत शत नमन है वीर सावरकर
@ प्रो० ए०के० मल्होत्रा