Jai Mahakaal

Jai Mahakaal Mahakaleshwar Jyotirlinga (महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग) is one of the most famous Hindu temples dedicated to Lord Shiva and is one of the twelve Jyotirlingam

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13/12/2020

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26/10/2018

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पंडित योगेश व्यास जी का परिवार 50 वर्षों से उज्जैन में रहता है।पीढ़ियोंसे यह परिवार पूजा की सेवा प्रदान करते आया है ......

07/10/2018

🙏जय श्री राम🙏💐शुभम करोति कल्याणम, अरोग्यम धन संपदा, शत्रु-बुद्धि विनाशायः, दीपःज्योति नमोस्तुते !💐 आप और आप के पुरे परिव...
18/10/2017

🙏जय श्री राम🙏
💐शुभम करोति कल्याणम,
अरोग्यम धन संपदा,
शत्रु-बुद्धि विनाशायः,
दीपःज्योति नमोस्तुते !💐

आप और आप के पुरे परिवार को व्यास परिवार कि और से दिपावली की मंगलकामनाए यह दिपावली आप को सुख एवं वेभव प्रदान करे...
पं योगेश व्यास उज्जैन

Mangal Dosha is associated with the planet Mars. Mars represents self-esteem, temperament, ego, and strife. It is an aggressive planet. If placed in specific areas of the birth chart (kundali), you could be aggressive and violent and that could possibly lead to marital discord. Those who are affecte...

12/10/2017

शास्त्रों के अनुसार इन नक्षत्रों में जन्मे बच्चे, स्वयं के साथ-साथ संबंधियों को भी देते हैं कष्ट


शास्त्रों की मान्यता है कि संधि क्षेत्र हमेशा नाजुक और अशुभ होते हैं। जैसे मार्ग संधि (चौराहे-तिराहे), दिन-रात का संधि काल, ऋतु, लग्र और ग्रह के संधि स्थल आदि को शुभ नहीं मानते हैं। इसी प्रकार गंड-मूल नक्षत्र भी संधि क्षेत्र में आने से नाजुक और दुष्परिणाम देने वाले होते हैं। शास्त्रों के अनुसार इन नक्षत्रों में जन्म लेने वाले बच्चों के सुखमय भविष्य के लिए इन नक्षत्रों की शांति जरूरी है। मूल शांति कराने से इनके कारण लगने वाले दोष शांत हो जाते हैं।

क्या हैं गंड मूल नक्षत्र
राशि चक्र में ऐसी तीन स्थितियां होती हैं जब राशि और नक्षत्र दोनों एक साथ समाप्त होते हैं। यह स्थिति ‘गंड नक्षत्र’ कहलाती है। इन्हीं समाप्ति स्थल से नई राशि और नक्षत्र की शुरूआत होती है। लिहाजा इन्हें ‘मूल नक्षत्र’ कहते हैं। इस तरह तीन नक्षत्र गंड और तीन नक्षत्र मूल कहलाते हैं। गंड और मूल नक्षत्रों को इस प्रकार देखा जा सकता है।

कर्क राशि व अश्लेषा नक्षत्र एक साथ समाप्त होते हैं। यहीं से मघा नक्षत्र और सिंह राशि का उद्गम होता है। लिहाजा अश्लेषा गंड और मघा मूल नक्षत्र है।



वृश्चिक राशि में ज्येष्ठा नक्षत्र एक साथ समाप्त होते हैं, यहीं से मूल नक्षत्र और धनु राशि की शुरूआत होने के कारण ज्येष्ठा ‘गंड’ और ‘मूल’ का नक्षत्र होगा।

मीन राशि और रेवती नक्षत्र का एक साथ समाप्त होकर यहीं से मेष राशि व अश्विनी नक्षत्र की शुरूआत होने से रेवती, गंड तथा अश्विनी मूल नक्षत्र कहलाते हैं।



उक्त तीन गंड नक्षत्र अश्लेषा, ज्येष्ठा और रेवती का स्वामी ग्रह बुध है तथा तीन मूल नक्षत्र मघा, मूल व अश्विनी का स्वामी ग्रह केतु है। 27 या 10वें दिन जब गंडमूल नक्षत्र दोबारा आए उस दिन संबंधित नक्षत्र और नक्षत्र स्वामी के मंत्र जप, पूजा व शांति करा लेनी चाहिए। इनमें से जिस नक्षत्र में शिशु का जन्म हुआ उस नक्षत्र के निर्धारित संख्या में जप-हवन करवाने चाहिएं।

गंड मूल नक्षत्र शांति मंत्र
अश्विनी नक्षत्र (स्वामित्व अश्विनी कुमार): ॐ अश्विनातेजसाचक्षु: प्राणेन सरस्वतीवीर्यम। वाचेन्द्रोबलेनेंद्राय दधुरिन्द्रियम्। ॐ अश्विनी कुमाराभ्यां नम: ।। (जप संख्या 5,000)।

अश्लेषा (स्वामित्व सर्प) : ॐ नमोस्तु सप्र्पेभ्यो ये के च पृथिवी मनु: ये अंतरिक्षे ये दिवितेभ्य: सप्र्पेभ्यो नम:।। ॐ सप्र्पेभ्यो नम:।। (जप संख्या 10,000)।



मघा (स्वामित्व पितर): ॐ पितृभ्य: स्वधायिभ्य : स्वधानम: पितामहेभ्य स्वधायिभ्य: स्वधा नम:। प्रपितामहेभ्य स्वधापिभ्य : स्वधा नम:
अभन्नापित्रो भी मदन्त पितरोऽतीतृपन्तपितर: पितर: शुन्धध्वम्।। ॐ पितृभ्यो नम: पितराय नम:।। (जप संख्या 10,000)।

ज्येष्ठा (इंद्र) : ॐ त्रातारमिन्द्रमवितारमिन्द्र हवे हवे सुह्न शूरमिन्द्रम हृयामि शक्रं पुरुहूंतमिन्द्र स्वस्तिनो मधवा धात्विंद्र:।। ॐ शक्राय नम:।। (जप संख्या 5,000)।
मूल (राक्षस): ॐ मातेव पुत्र पृथ्वी पुरीष्यमणि स्वेयोनावभारुषा। तां विश्वेदेवर्ऋतुभि:
संवदान: प्रजापतिविश्वकर्मा विमुच्चतु।। ॐ निर्ऋतये नम:।। (जप संख्या 5,000)।
रेवती (पूषा): ॐ पूषन् तवव्रते वयं नरिष्येम कदाचन स्तोतारस्त इहस्मसि।। ॐ पूष्णे नम:। (जप संख्या 5,000)।

गंड नक्षत्र स्वामी बुध के मंत्र
ॐ उदबुध्यवाग्ने प्रति जागृहि त्वमिष्ठापूर्ते संसृजेथामयं च अस्मिन्त्सधस्थे अध्युत्तरस्मिन् विश्वेदेवा यजमानश्च सीदत।।’ के नौ हजार जप कराएं। दशमांश संख्या में हवन कराएं। हवन में अपामार्ग (ओंगा) और पीपल की समिधा काम में लें।

मूल नक्षत्र स्वामी केतु के मंत्र
ॐ केतुं कृण्वन्न केतवे पेशो मय्र्याअपेश’ से समुषभ्दिजायथा:।। ‘के सत्रह हजार जप कराएं और इसके दशमांश मंत्रों के साथ दूब और पीपल की समिधा काम में लें।

गंड मूल नक्षत्रों में जन्म का फल
मूल नक्षत्र के प्रथम चरण में उत्पन्न होने वाले शिशु (पुलिंग) के पिता को कष्ट, द्वितीय चरण में माता को कष्ट और तृतीय चरण में धन ऐश्वर्य हानि होती है। चतुर्थ चरण में जन्म हो तो शुभ होता है। जन्म लेने वाला शिशु स्त्रीलिंग हो तो प्रथम चरण में श्वसुर को, द्वितीय में सास को और तीसरे चरण में दोनों कुल के लिए नेष्ट होती है। चतुर्थ चरण में जन्म हो तो शुभ होता है।

अश्लेषा के प्रथम चरण में जन्मे जातक के लिए शुभ, द्वितीय चरण में धन ऐश्वर्य हानि और तृतीय चरण में माता को कष्ट होता है। चतुर्थ चरण में जन्म हो तो पिता को कष्ट होता है। जन्म लेने वाला शिशु स्त्रीलिंग हो तो प्रथम चरण में सुख-समृद्धि और अन्य चरणों में सास को कष्ट कारक होती है।

मघा के प्रथम चरण में जन्मे जातक/ जातिका की माता को कष्ट, द्वितीय चरण में पिता को कष्टकारक, तृतीय चरण में सुख समृद्धि और चतुर्थ चरण में जन्म हो तो धन लाभ।

ज्येष्ठा के प्रथम चरण में बड़े भाई का नेष्ट, द्वितीय चरण में छोटे भाई को कष्ट, तीसरे में माता को तथा चतुर्थ चरण में जन्म होने पर स्वयं के लिए कष्टकारक होता है। स्त्री जातक का जन्म हो तो प्रथम चरण में जेठ को, द्वितीय में छोटी बहन/देवर को तथा तृतीय में सास/माता के लिए कष्ट। चतुर्थ चरण में जन्म हो तो देवर के लिए श्रेष्ठ। रेवती के प्रथम तीन चरणों में स्त्री/पुरुष जातक का जन्म हो तो अत्यंत शुभ, राज कार्य से लाभ तथा धन ऐश्वर्य में वृद्धि होती है लेकिन चतुर्थ चरण में जन्म हो तो स्वयं के लिए कष्टकारक होता है। अश्विनी के प्रथम चरण में पिता को कष्ट शेष तीन चरणों में धन-ऐश्वर्य वृद्धि, राज से लाभ तथा मान-सम्मान मिलता है

06/09/2017

श्राद्ध के नियम :-

1. श्राद्ध पिता तथा माता की तरफ की तीन-तीन पीढ़ियों का किया जा सकता है, जैसे माता-पिता, दादा- दादी, परदादा-परदादा इसी प्रकार से नाना-नानी, परनाना-परनानी का भी श्राद्ध किया जा सकता है ।

2. श्राद्ध करने के अधिकारी क्रमशः यदि कई पुत्र हो तो बडा बेटा, या सबसे छोटा बेटा, विशेष परिस्थितियों मे बड़े भाई की आज्ञा से छोटा भाई, यदि संयुक्त परिवार हो तो तो ज्येष्ठ पुत्र के द्वारा एक ही जगह सम्पन्न हो सकता है । यदि पुत्र अलग-अलग रहते हो तो उन्हें वार्षिक श्राद्ध अलग-अलग ही करना चाहिए।

यदि पुत्र न हो तो शास्त्रों मे श्राद्ध करने का क्रम इस प्रकार से निर्धारित है:- पुत्र, पौत्र, प्रपौत्र, दौहित्र, पत्नी, भाई, भतीजा, पिता, माता, पुत्रवधु, बहन, भांजा, सपिण्ड़ ( अपने से लेकर सात पीढी तक का परिवार ), सोदक ( आठवी से लेकर चौदह पीढी के परिवार) ।

3.श्राद्ध दिवंगत पूर्वजों की मृत्यु तिथि के अनुसार सुयोग्य ब्राह्मण को घर बुलाकर कालेतिल, गंगाजल, सफेद फूलो से पूजा करवाकर नाम, गोत्र उच्चारण, संकल्प आदि करवाकर ही करे ।
इसके उपरांत ब्राह्मण को वस्त्र, जनेऊ, फल, मिठाई दक्षिणा सहित संतुष्ट करवाकर ही विदा करे, ब्राह्मण की संतुष्टि तथा प्रसन्नता से ही पितर संतुष्ट होते है, तथा वंशजो को आशीर्वाद देकर अपने लोक को विदा होते है ।

4. श्राद्ध सदा मध्याह्न काल यानि (10:48 बजे से 1:12 बजे दोपहर ) को ही किया जाना चाहिये ।

5. प्रातःकाल, सायंकाल तथा रात्रि मे श्राद्ध न करे ।

6. श्राद्ध मे तुलसी, जौ, काले तिल, पुष्प, चावल, भृंगराज, तथा गंगाजल का प्रयोग अवश्य करे तथा पिण्डदान व तर्पण अवश्य करे ।

7. भोजन मे उडद की दाल के भल्ले, चटपटा भोजन,
गाय के दूध एवं उससे बनी हुई वस्तुएँ, लौंग डाली हुई खीर अवश्य रखे ये पदार्थ आत्माओं को प्रसन्न, प्रेरित तथा आकर्षित करते है ।
जौ, धान, तिल, गेहूं, मूंग, इन्द्रजौ,परवल, आंवला, खीर, नारियल,बेल, अनार, आम,अमड़ा, बिजौरा, फालसा, नारंगी, खजूर, अंगूर, चिरौंजी, बेर, इन्द्रजौ, मटर, कचनार, सरसों, सरसों का तेल, तिल्ली का तेल आदि का प्रयोग करना चाहिए ।

8. श्राद्ध कर्म मे गुड से बना अन्न, काले तिल तथा शहद का दान अवश्य करे ।

9. श्राद्ध केवल मृत्यु तिथि वाले दिन ही करे, यदि भूलवश तिथि निकल जाये तो अंतिम दिन यानि अमावस्या के दिन श्राद्ध करे ।
पं. योगेश व्यास उज्जैन (9617380490)

🙏🏻🌹बाबा महाकाल नगर भृमण पर निकले पालकी में विराजमान हो कर आज के सवारी दर्शन 🙏पं योगेश व्यास उज्जैनwww.mangalpoojaujjain....
31/07/2017

🙏🏻🌹बाबा महाकाल नगर भृमण पर निकले पालकी में विराजमान हो कर आज के सवारी दर्शन 🙏
पं योगेश व्यास उज्जैन
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*_🙏🏻जय श्री  महाँकाल🙏🏻_**_ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम् ।_**_उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात् ...
26/07/2017

*_🙏🏻जय श्री महाँकाल🙏🏻_*

*_ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम् ।_*
*_उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात् ||_*
*_जय श्री महाकालेश्वर ज्योतिर्लिन्गं नमो नम:||_*

*_संपूर्ण ब्रह्मांड के राजा भस्माङ्गधारी द्वादश ज्योतिर्लिङ्ग में तृतीय श्री महाकालेश्वर महाँकाल का आज का भस्मारती श्रृंगार दर्शन_*
*_26 / 07 / 2017 ( बुधवार )_*
पं योगेश व्यास उज्जैन
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उज्जैन का नागचंद्रेश्वर मंदिर : क्यों खुलता है सिर्फ साल में एक दिन   हिंदू धर्म में सदियों से नागों की पूजा करने की परं...
21/07/2017

उज्जैन का नागचंद्रेश्वर मंदिर : क्यों खुलता है सिर्फ साल में एक दिन

हिंदू धर्म में सदियों से नागों की पूजा करने की परंपरा रही है। हिंदू परंपरा में नागों को भगवान का आभूषण भी माना गया है। भारत में नागों के अनेक मंदिर हैं, इन्हीं में से एक मंदिर है उज्जैन स्थित नागचंद्रेश्वर का,जो की उज्जैन के प्रसिद्ध महाकाल मंदिर की तीसरी मंजिल पर स्थित है।

इसकी खास बात यह है कि यह मंदिर साल में सिर्फ एक दिन नागपंचमी (श्रावण शुक्ल पंचमी) पर ही दर्शनों के लिए खोला जाता है। ऐसी मान्यता है कि नागराज तक्षक स्वयं मंदिर में रहते हैं।

नागचंद्रेश्वर मंदिर में 11वीं शताब्दी की एक अद्भुत प्रतिमा है, इसमें फन फैलाए नाग के आसन पर शिव-पार्वती बैठे हैं। कहते हैं यह प्रतिमा नेपाल से यहां लाई गई थी। उज्जैन के अलावा दुनिया में कहीं भी ऐसी प्रतिमा नहीं है।

पूरी दुनिया में यह एकमात्र ऐसा मंदिर है, जिसमें विष्णु भगवान की जगह भगवान भोलेनाथ सर्प शय्या पर विराजमान हैं। मंदिर में स्थापित प्राचीन मूर्ति में शिवजी, गणेशजी और मां पार्वती के साथ दशमुखी सर्प शय्या पर विराजित हैं। शिवशंभु के गले और भुजाओं में भुजंग लिपटे हुए हैं।

सर्पराज तक्षक ने शिवशंकर को मनाने के लिए घोर तपस्या की थी। तपस्या से भोलेनाथ प्रसन्न हुए और उन्होंने सर्पों के राजा तक्षक नाग को अमरत्व का वरदान दिया। मान्यता है कि उसके बाद से तक्षक राजा ने प्रभु के सा‍‍‍न्निध्य में ही वास करना शुरू कर दिया।

लेकिन महाकाल वन में वास करने से पूर्व उनकी यही मंशा थी कि उनके एकांत में विघ्न ना हो अत: वर्षों से यही प्रथा है कि मात्र नागपंचमी के दिन ही वे दर्शन को उपलब्ध होते हैं। शेष समय उनके सम्मान में परंपरा के अनुसार मंदिर बंद रहता है। इस मंदिर में दर्शन करने के बाद व्यक्ति किसी भी तरह के सर्पदोष से मुक्त हो जाता है, इसलिए नागपंचमी के दिन खुलने वाले इस मंदिर के बाहर भक्तों की लंबी कतार लगी रहती है।

यह मंदिर काफी प्राचीन है। माना जाता है कि परमार राजा भोज ने 1050 ईस्वी के लगभग इस मंदिर का निर्माण करवाया था। इसके बाद सिं‍धिया घराने के महाराज राणोजी सिंधिया ने 1732 में महाकाल मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया था। उस समय इस मंदिर का भी जीर्णोद्धार हुआ था। सभी की यही मनोकामना रहती है कि नागराज पर विराजे शिवशंभु की उन्हें एक झलक मिल जाए। लगभग दो लाख से ज्यादा भक्त एक ही दिन में नागदेव के दर्शन करते हैं।

नागपंचमी पर वर्ष में एक बार होने वाले भगवान नागचंद्रेश्वर के दर्शन के लिए शनिवार रात 12 बजे मंदिर के पट खुलेंगे। रविवार नागपंचमी को रात 12 बजे मंदिर में फिर आरती होगी व मंदिर के पट पुनः बंद कर दिए जाएंगे।

नागचंद्रेश्वर मंदिर की पूजा और व्यवस्था महानिर्वाणी अखाड़े के संन्यासियों द्वारा की जाती है।

नागपंचमी पर्व पर बाबा महाकाल और भगवान नागचंद्रेश्वर के दर्शन करने वाले श्रद्धालुओं के लिए अलग-अलग प्रवेश की व्यवस्था की गई है। इनकी कतारें भी अलग होंगी। रात में भगवान नागचंद्रेश्वर मंदिर के पट खुलते ही श्रद्धालुओं की दर्शन की आस पूरी होगी।

नागपंचमी को दोपहर 12 बजे कलेक्टर पूजन करेंगे। यह सरकारी पूजा होगी। यह परंपरा रियासतकाल से चली आ रही है। रात 8 बजे श्री महाकालेश्वर प्रबंध समिति द्वारा पूजन होगा

कालसर्प दोष के निवारण हेतु सम्पर्क करे।
पं योगेश व्यास उज्जैन
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🙏🏻🌹बाबा महाकाल आज प्रजा का हाल जानने नगर भृमण पर निकले पालकी में विराजमान हो कर सावन का दूसरा सोमवार 🙏पं योगेश व्यास उज्...
18/07/2017

🙏🏻🌹बाबा महाकाल आज प्रजा का हाल जानने नगर भृमण पर निकले पालकी में विराजमान हो कर सावन का दूसरा सोमवार 🙏

पं योगेश व्यास उज्जैन
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07/05/2017

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