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पण्डित लेखराम आर्यपंडित लेखराम आर्य (१८५८-१८९७), आर्य समाज के प्रमुख कार्यकर्ता एवं प्रचारक थे। उन्होने अपना सारा जीवन आ...
05/03/2022

पण्डित लेखराम आर्य

पंडित लेखराम आर्य (१८५८-१८९७), आर्य समाज के प्रमुख कार्यकर्ता एवं प्रचारक थे। उन्होने अपना सारा जीवन आर्य समाज के प्रचार प्रसार में लगा दिया। वे अहमदिया मुस्लिम समुदाय के नेता मिर्जा गुलाम अहमद से शास्त्रार्थ एवं उसके दुस्प्रचारों के खण्डन के लिए विशेष रूप से प्रसिद्ध हैं। उनका संदेश था कि तहरीर (लेखन) और तकरीर (शास्त्रार्थ) का काम बंद नहीं होना चाहिए। पंडित लेखराम इतिहास की उन महान हस्तियों में शामिल हैं जिन्होंने धर्म की बलिवेदी पर प्राण न्योछावर कर दिए। जीवन के अंतिम क्षण तक आप वैदिक धर्म की रक्षा में लगे रहे। पंडित लेखराम ने अपने प्राणों की परवाह न करते हुए हिंदुओं को धर्म परिवर्तन से रोका व शुद्धि अभियान के प्रणेता बने।

लेखराम का जन्म 8 चैत्र, संवत् १९१५ (१८५८ ई.) को झेलम जिला के तहसील चकवाल के सैदपुर गाँव (अब पाकिस्तान में) में हुआ था। उनके पूर्वज महाराजा रणजीत सिंह की फौज में थें। उनके पिता का नाम तारा सिंह एवं माता का नाम भाग भरी था।

उन्होंने आरंभ में उर्दू-फारसी पढ़ी। बचपन से ही स्वाभिमानी और दृढ विचारो के थे। एक बार उनको पाठशाला में प्यास लगी, मौलवी से घर जाकर पानी पीने की इजाजत मांगी। मौलवी ने जूठे मटके से पानी पीने को कहाँ। उसने न दोबारा मौलवी से घर जाने की इजाजत मांगी और न ही जूठा पानी पिया। सारा दिन प्यासा ही बिता दिया। पढने का उनको बहुत शोक था। मुंशी कन्हयालाल अलाख्धारी की पुस्तकों से उनको स्वामी दयानंद सरस्वती का पता चला। लेखराम जी ने ऋषि दयानंद के सभी ग्रंथो का स्वाध्याय आरंभ कर दिया।

सत्रह वर्ष की उम्र में वे सन् १८७५ ईसवी में पेशावर पुलिस में भरती हुए और उन्नति करके सारजेंट बन गए। इन दिनों इनपर 'गीता' का बड़ा प्रभाव था। दयानंद सरस्वती से प्रभावित होकर उन्होंने संवत् १९३७ विक्रमी में पेशावर में आर्यसमाज की स्थापना की। १७ मई सन् १८८० को उन्होंने अजमेर में स्वामी जी से भेंट की। शंकासमाधान के परिणामस्वरूप वे उनके अनन्य भक्त बन गए।

लेखराम जी ने सन् १८८४ में पुलिस की नौकरी से त्यागपत्र दे दिया। अब उनका सारा समय वैदिक धर्मप्रचार में लगने लगा। कादियाँ के अहमदियों ने हिंदू धर्म के विरुद्ध कई पुस्तकें लिखी थीं। लेखराम जी ने उनका जोरदार खंडन किया।

स्वामी दयानंद का जीवनचरित् लिखने के उद्देश्य से उनके जीवन संबंधी घटनाएँ इकट्ठी करने के सिलसिले में उन्हें भारत के बहुसंख्यक स्थानों का दौरा करना पड़ा। इस कारण उनका नाम 'आर्य मुसाफिर' पड़ गया। पं॰ लेखराम हिंदुओं को मुसलमान होने से बचाते थे। एक कट्टर मुसलमान ने ३ मार्च सन् १८९७ को ईद के दिन, 'शुद्धि' कराने के बहाने, धोखे से लाहौर में उनकी हत्या कर डाली।

शुद्धि के रण में

कोट छुट्टा डेरा गाजी खान (अब पाकिस्तान) में कुछ हिन्दू युवक मुस्लमान बनने जा रहे थे। पंडित जी के व्याखान सुनने पर ऐसा रंग चड़ा की आर्य बन गए और इस्लाम को तिलांजलि दे दी.इनके नाम थे महाशय चोखानंद, श्री छबीलदास व महाशय खूबचंद जी, जब तीनो आर्य बन गए तो हिन्दुओं ने उनका सामाजिक बहिष्कार कर दिया.कुछ समय के बाद महाशय छबीलदास की माता का देहांत हो गया। उनकी अर्थी को उठाने वाले केवल ये तीन ही थे। महाशय खूबचंद की माता उन्हें वापस ले गयी। आप कमरे का ताला तोड़ कर वापिस संस्कार में आ मिले. तीनो युवको ने वैदिक संस्कार से दाह कर्म किया। पौराणिको ने एक चल चली यह प्रसिद्ध कर दिया की आर्यों ने माता के शव को भुन कर खा लिया हैं। यह तीनो युवक मुसलमान बन जाये तो हिन्दुओं को कोई फरक नहीं पड़ता था परन्तु पंडित लेखराम की कृपा से वैदिक धर्मी बन गए तो दुश्मन बन गए। इस प्रकार की मानसिकता के कारण तो हिन्दू आज भी गुलामी की मानसिकता में जी रहे हैं।

जम्मू के श्री ठाकुरदास मुस्लमान होने जा रहे थे। पंडित जी उनसे जम्मू जाकर मिले और उन्हें मुसलमान होने से बचा लिया।

१८९१ में हैदराबाद सिंध के श्रीमंत सूर्यमल की संतान ने इस्लाम मत स्वीकार करने का मन बना लिया। पंडित पूर्णानंद जी को लेकर आप हैदराबाद पहुंचे। उस धनी परिवार के लड़के पंडित जी से मिलने के लिए तैयार नहीं थे। पर आप कहाँ मानने वाले थे। चार बार सेठ जी के पुत्र मेवाराम जी से मिलकर यह आग्रह किया की मौल्वियो से उनका शास्त्राथ करवा दे. मौलवी सय्यद मुहम्मद अली शाह को तो प्रथम बार में ही निरुत्तर कर दिया.उसके बाद चार और मौल्वियो से पत्रों से विचार किया। आपने उनके सम्मूख मुस्लमान मौल्वियो को हराकर उनकी धर्म रक्षा की.

वही सिंध में पंडित जी को पता चला की कुछ युवक ईसाई बनने वाले हैं। आप वहा पहुच गए और अपने भाषण से वैदिक धर्म के विषय में प्रकाश डाला. एक पुस्तक आदम और इव पर लिख कर बांटी जिससे कई युवक ईसाई होने से बच गए।

गंगोह जिला सहारनपुर की आर्यसमाज की स्थापना
पंडित जी से दीक्षा लेकर कुछ आर्यों ने १८८५ में करी थी। कुछ वर्ष पहले तीन अग्रवाल भाई पतित होकर मुस्लमान बन गए थे। आर्य समाज ने १८९४ में उन्हें शुद्ध करके वापिस वैदिक धर्मी बना दिया. आर्य समाज के विरुद्ध गंगोह में तूफान ही आ गया। श्री रेह्तूलाल जी भी आर्यसमाज के सदस्य थे। उनके पिता ने उनके शुद्धि में शामिल होने से मन किया पर वे नहीं माने. पिता ने बिरादरी का साथ दिया. उनकी पुत्र से बातचीत बंद हो गयी। पर रेह्तुलाल जी कहाँ मानने वाले थे उनका कहना था गृह त्याग कर सकता हु पर आर्यसमाज नहीं छोड़ सकता हूँ. इस प्रकार पंडित लेखराम के तप का प्रभाव था की उनके शिष्यों में भी वैदिक सिद्धांत की रक्षा हेतु भावना कूट-कूट कर भरी थी।

घासीपुर जिला मुज्जफरनगर में कुछ चौधरी मुस्लमान बनने जा रहे थे। पंडित जी वह एक तय की गयी तिथि को पहुँच गए। उनकी दाड़ी बढ़ी हुई थी और साथ में मुछे भी थी। एक मौलाना ने उन्हें मुस्लमान समझा और पूछा क्यों जी यह दाढ़ी तो ठीक हैं पर इन मुछो का क्या राज हैं। पंडित जी बोले दाढ़ी तो बकरे की होती हैं मुछे तो शेर की होती हैं। मौलाना समाज गया की यह व्यक्ति मुस्लमान नहीं हैं। तब पंडित जी ने अपना परिचय देकर शास्त्रार्थ के लिए ललकारा. सभी मौलानाओ को परास्त करने के बाद पंडित जी ने वैदिक धर्म पर भाषण देकर सभी चौधरियो को मुस्लमान बन्ने से बचा लिया।

१८९६ की एक घटना पंडित लेखराम के जीवन से हमें सर्वदा प्रेरणा देने वाली बनी रहेगी. पंडित जी प्रचार से वापिस आये तो उन्हें पता चला की उनका पुत्र बीमार हैं। तभी उन्हें पता चला की मुस्तफाबाद में पांच हिन्दू मुस्लमान होने वाले हैं। आप घर जाकर दो घंटे में वापिस आ गए और मुस्तफाबाद के लिए निकल गए। अपने कहाँ की मुझे अपने एक पुत्र से जाति के पांच पुत्र अधिक प्यारे हैं। पीछे से आपका सवा साल का इकलोता पुत्र चल बसा. पंडित जी के पास शोक करने का समय कहाँ था। आप वापिस आकार वेद प्रचार के लिए वजीराबाद चले गए।

हिन्दू इतनी बड़ी संख्या में मुस्लमान कैसे हो गए

पंडित जी की तर्क शक्ति गज़ब थी। आपसे एक बार किसी ने प्रश्न किया की हिन्दू इतनी बड़ी संख्या में मुस्लमान कैसे हो गए। अपने सात कारण बताये.

१. मुस्लमान आक्रमण में बलातपूर्वक मुसलमान बनाया गया

२. मुसलमानी राज में जर, जोरू व जमीन देकर कई प्रतिष्ठित हिन्दुओ को मुस्लमान बनाया गया

३. इस्लामी काल में उर्दू, फारसी की शिक्षा एवं संस्कृत की दुर्गति के कारण बने

४. हिन्दुओं में पुनर्विवाह न होने के कारण व सती प्रथा पर रोक लगने के बाद हिन्दू औरतो ने मुस्लमान के घर की शोभा बढाई तथा अगर किसी हिन्दू युवक का मुस्लमान स्त्री से सम्बन्ध हुआ तो उसे जाति से निकल कर मुस्लमान बना दिया गया। ५. मूर्तिपूजा की कुरीति के कारण कई हिन्दू विधर्मी बने

६. मुसलमानी वेशयायो ने कई हिन्दुओं को फंसा कर मुस्लमान बना दिया

७. वैदिक धर्म का प्रचार न होने के कारण मुस्लमान बने.

अगर गहराई से सोचा जाये तो पंडित जी ने हिन्दुओं को जाति रक्षा के लिए उपाय बता दिए हैं, अगर अब भी नहीं सुधरे तो हिन्दू कब सुधरेगे.

पंडित जी और गुलाम मिर्जा अहमद

पंडित जी के काल में कादियान, जिला गुरुदासपुर पंजाब में इस्लाम के एक नए मत की वृद्धि हुई जिसकी स्थापना मिर्जा गुलाम अहमद ने करी थी। इस्लाम के मानने वाले मुहम्मद साहिब को आखिरी पैगम्बर मानते हैं, मिर्जा ने अपने आपको कभी कृष्ण, कभी नानक, कभी ईसा मसीह कभी इस्लाम का आखिरी पैगम्बर घोषित कर दिया तथा अपने नवीन मत को चलने के लिए नई नई भविष्यवानिया और इल्हामो का ढोल पीटने लगा.

एक उदहारण मिर्जा द्वारा लिखित पुस्तक “वही हमारा कृष्ण ” से लेते हैं इस पुस्तक में लिखा हैं – उसने (ईश्वर ने) हिन्दुओं की उन्नति और सुधर के लिए निश्कलंकी अवतार को भेज दिया हैं जो ठीक उस युग में आया हैं जिस युग की कृष्ण जी ने पाहिले से सूचना दे रखी हैं। उस निष्कलंक अवतार का नाम मिर्जा गुलाम अहमद हैं जो कादियान जिला गुरुदासपुर में प्रकट हुए हैं। खुदा ने उनके हाथ पर सहस्त्रो निशान दिखये हैं। जो लोग उन पर इमान लेट हैं उनको खुदा ताला बड़ा नूर बख्शता हैं। उनकी प्रार्थनाए सुनता हैं और उनकी सिफारिश पर लोगो के कास्ट दूर करता हैं। प्रतिष्ठा देता हैं। आपको चाहिए की उनकी शिक्षाओ को पढ़ कर नूर प्राप्त करे. यदि कोई संदेह हो तो परमात्मा से प्रार्थना करे की हे परमेश्वर? यदि यह व्यक्ति जो तेरी और से होने की घोषणा करता हैं और अपने आपको निष्कलंक अवतार कहता हैं। अपनी घोषणा में सच्चा हैं तो उसके मानने की हमे शक्ति प्रदान कर और हमारे मन को इस पर इमान लेन को खोल दे. पुन आप देखेगे की परमात्मा अवश्य आपको परोक्ष निशानों से उसकी सत्यता पर निश्चय दिलवाएगा. तो आप सत्य हृदय से मेरी और प्रेरित हो और अपनी कठिनाइयों के लिए प्रार्थना करावे अल्लाह ताला आपकी कठिनाइयों को दूर करेगा और मुराद पूरी करेगा. अल्लाह आपके साथ हो. पृष्ठ ६,७.८ वही हमारा कृष्ण.

पाठकगन स्वयं समझ गए होंगे की किस प्रकार मिर्जा अपनी कुटिल नीतिओ से मासूम हिन्दुओं को बेवकूफ बनाने की चेष्ठा कर रहा था पर पंडित लेखराम जैसे रणवीर के रहते उसकी दाल नहीं गली.

पंडित जी सत्य असत्य का निर्णय करने के लिए मिर्जा के आगे तीन प्रश्न रखे.

१. पहले मिर्जा जी अपने इल्हामी खुदा से धारावाही संस्कृत बोलना सीख कर आर्यसमाज के दो सुयोग्य विद्वानों पंडित देवदत शास्त्री व पंडित श्याम जी कृष्ण वर्मा का संस्कृत वार्तालाप में नाक में दम कर दे.

२. ६ दर्शनों में से सिर्फ तीन के आर्ष भाष्य मिलते हैं। शेष तीन के अनुवाद मिर्जा जी अपने खुदा से मंगवा ले तो मैं मिर्जा के मत को स्वीकार कर लूँगा.

३. मुझे २० वर्ष से बवासीर का रोग हैं . यदि तीन मास में मिर्जा अपनी प्रार्थना शक्ति से उन्हें ठीक कर दे तो में मिर्जा के पक्ष को स्वीकार कर लूँगा.

पंडित जी ने उससे पत्र लिखना जारी रखा. तंग आकर मिर्जा ने लिखा की यहीं कादियान आकार क्यों नहीं चमत्कार देख लेते. सोचा था की न पंडित जी का कादियान आना होगा और बला भी टल जाएगी.पर पंडित जी अपनी धुन के पक्के थे मिर्जा गुलाम अहमद की कोठी पर कादियान पहुँच गए। दो मास तक पंडित जी क़दियन में रहे पर मिर्जा गुलाम अहमद कोई भी चमत्कार नहीं दिखा सका.

इस खीज से आर्यसमाज और पंडित लेखराम को अपना कट्टर दुश्मन मानकर मिर्जा ने आर्यसमाज के विरुद्ध दुष्प्रचार आरंभ कर दिया.

मिर्जा ने ब्राहिने अहमदिया नामक पुस्तक चंदा मांग कर छपवाई. पंडित जी ने उसका उत्तर तकज़ीब ब्राहिने अहमदिया लिखकर दिया.

मिर्जा ने सुरमाये चश्मे आर्या (आर्यों की आंख का सुरमा) लिखा जिसका पंडित जी ने उत्तर नुस्खाये खब्ते अहमदिया (अहमदी खब्त का ईलाज) लिख कर दिया. मिर्जा ने सुरमाये चश्मे आर्या में यह भविष्यवाणी करी की एक वर्ष के भीतर पंडित जी की मौत हो जाएगी. मिर्जा की यह भविष्यवाणी गलत निकली और पंडित इस बात के ११ वर्ष बाद तक जीवित रहे.

पंडित जी की तपस्या से लाखों हिन्दू युवक मुस्लमान होने से बच गए।

रचनाएँ

पण्डित लेखराम ने ३३ पुस्तकों की रचना की। उनकी सभी कृतियों को एकीकृत रूप में कुलयात-ए-आर्य मुसाफिर नाम से प्रकाशित किया गया है।

तारीखे दुनिया
श्रीकृष्ण का जीवन चरित्र
नमस्ते की तहकीकात
देवी भगत परीक्षा
पुराण किसने बनायी
धरम परचार
मुर्दा जरूर जलना चाहिए
मूर्ति प्रकाश
साँच को आँच नहीं
राम चन्दर जी सच्चा दर्शन
क्रिस्चियन मत दर्पण
सदाकत ए ऋग्वेद
निजात की असली तारीफ
सच्चे धरम की शहादत
सदाकत ए इल्हाम
सदाकत ए उसूल व तालीम आर्य समाज
तकजीब ए बरहीन अहमदिया, भाग-१
तकजीब ए बरहीन अहमदिया, भाग-२
रिसाला जिहाद
इजहार ए हक
हुज्जत उल इस्लाम
राह ए निजात
सदाकत धरम आर्य

पंडित जी का अमर बलिदान

मार्च १८९७ में एक व्यक्ति पंडित लेखराम के पास आया। उसका कहना था की वो पहले हिन्दू था बाद में मुस्लमान हो गया अब फिर से शुद्ध होकर हिन्दू बनना चाहता हैं। वह पंडित जी के घर में ही रहने लगा और वही भोजन करने लगा. 6 मार्च 1897 (१८९७) को पंडित जी घर में स्वामी दयानंद के जीवन चरित्र पर कार्य कर रहे थे। तभी उन्होंने एक अंगड़ाई ली कि उस दुष्ट ने पंडित जी को छुरा मर दिया और भाग गया। पंडित जी को हस्पताल लेकर जाया गया जहाँ रात को दो बजे उन्होंने प्राण त्याग दिए. पंडित जी को अपने प्राणों की चिंता नहीं थी उन्हें चिंता थी तो वैदिक धर्म की।

27/02/2022

आज से दयानन्द व्याख्यान माला प्रारम्भ हो रही हैं।
आज का विषय - महर्षि दयानंद के शैक्षिक विचार
वक्ता- डॉ श्रीमती प्रेम छाबड़ा
समय 9:30 पर live अवश्य देखे

26/02/2022

महर्षि दयानंद जयंती की अनंत शुभकामनाएं।
इस उपलक्ष्य में कल से ऋषि बोधोत्सव तक मंदिर में व्याख्यान माला आयोजित की जा रही हैं। जिसका प्रसारण भी होगा।

🚩💐 *आमंत्रण* 💐🚩मान्यवर............*महाशिवरात्रि एवं ऋषि दयानंद बोधोत्सव के उपलक्ष में तीन दिवसीय व्याख्यानमाला का आयोजन*...
25/02/2022

🚩💐 *आमंत्रण* 💐🚩

मान्यवर............

*महाशिवरात्रि एवं ऋषि दयानंद बोधोत्सव के उपलक्ष में तीन दिवसीय व्याख्यानमाला का आयोजन*

अत्यंत आनंद का विषय है कि *आर्य समाज उज्जैन* ऋषि दयानंद जयंती एवं बोधोत्सव को हर्षोल्लास के साथ मनाने जा रहा है तीन दिवसीय इस उत्सव में व्याख्यानमाला का आयोजन रखा गया है जिसमे आपकी गरिमामय उपस्थिति सादर प्रार्थनीय हैं। कार्यक्रम का विवरण निम्नानुसार है-

दिनांक- 27 फरवरी 2022
वार- रविवार
समय- प्रातः 9:30 से 11

*अध्यक्षता*- *डॉ उमा वाजपेयी*
प्रांतीय उपाध्यक्ष साहित्यभारती
पूर्व हिंदी विभागाध्यक्ष, शा क महाविद्यालय उज्जैन

*विषय*- *"महर्षि दयानंद के शैक्षिक विचार"*

*मुख्यवक्ता*- *डॉ श्रीमती प्रेम छाबड़ा*
निदेशक, मनोविकास केंद्र उज्जैन

दिनांक- 28 फरवरी 2022
वार- सोमवार
समय- प्रातः 9:30 से 11

*अध्यक्षता*- *श्री गिरीश जी भालेराव*
कार्यपालन अधिकारी लोकमान्य तिलक शिक्षण संस्थान एवं अध्यक्ष हेडगेवार व्याख्यानमाला समिति

*विषय*- *"ऋषि दयानन्द और बोधतत्व"*

*मुख्यवक्ता* - *डॉ चिंतामन राठौर*
पूर्व व्याख्याता योग एवं दर्शनशास्त्र।
सेवाभारती सहसचिव उज्जैन

दिनांक- 1 मार्च 2022
वार- मंगलवार
समय- प्रातः 9:30 से 11

*अध्यक्षता*- *श्री विभाष जी उपाध्याय*
उपाध्यक्ष मप्र जन अभियान परिषद

*विषय*- *"मूलशंकर के शंकर"*

*मुख्यवक्ता*- *डॉ गोविंद जी गंधे*
प्राचार्य लोकमान्य टिळक महाविद्यालय उज्जैन

समय:- प्रातः 8:30 से 9:30 यज्ञ
9:30 से 11 तक व्याख्यान

स्थान:- आर्य समाज मंदिर, बहादुरगंज उज्जैन मप्र

निवेदक:-
मंत्री, आर्यसमाज उज्जैन।
🙏🙏🙏🙏

24/02/2022

तेरी शरण मे आकर में धन्य हो गया ।
जन्मों की प्यास थी जो सम्पन्न हो गया।।

21/02/2022

भगवान भास्कर अस्ताचल की ओर जा रहे हैं आईए इस संध्या काल में उस सच्चिदानंद स्वरूप की उपासना करते हैं
ओ३म्

आइए सन्ध्योपासना करे
19/02/2022

आइए सन्ध्योपासना करे

18/02/2022

।। ओ३म् ।।

16/02/2022

आओ उस कृपानिधान की शरण मे चलें
सांध्यकाल हैं संध्या करे

बड़े भाग्य से ये मनुज तन मिला था।गवांते गवांते उमर पार कर दी।।
13/02/2022

बड़े भाग्य से ये मनुज तन मिला था।
गवांते गवांते उमर पार कर दी।।

13/02/2022

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