Moun Tirth Sevarth Foundation

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Moun Tirth is one of the most sacred places of Ujjain which is enshrined with Navgrah Temple, Shri Ram Temple, Divine Kalpvriksha, Gaushala, 108 year old Akhand Mahayagya, Brahmarshi Ved Vidhyapeeth, Chitrakoot, Shaligram ji, Shvetark Ganesh & much more.

04/12/2018
श्री  अखंड  गुरुग्रन्थ  साहिब  पाठसद्गुरू का वांगमय स्वरूप ही श्री गुरु ग्रंथ साहब है।- गुरुग्रन्थ  साहिब जी श्री  अखंड ...
22/09/2018

श्री अखंड गुरुग्रन्थ साहिब पाठ
सद्गुरू का वांगमय स्वरूप ही श्री गुरु ग्रंथ साहब है।
- गुरुग्रन्थ साहिब जी
श्री अखंड गुरुग्रन्थ साहिब पाठ समापन एवं कीर्तन
दिनांक - २३ सितम्बर 2018
समय : सयम ७ बजे से रात्रि १० बजे तक
स्थान : श्री मौनतीर्थ पीठ चित्रकूट परिसर, गंगाघाट, उज्जैन

07/06/2018

*आपसे अनुरोध...*
मासिक पत्रिका 'मानस वंदन' का जुलाई 2018 अंक गुरु पर केंद्रित रहेगा । सभी लेखक, रचनाकारों से अनुरोध है कि अपनी रचनाएं शीघ्र प्रेषित करें, ईमेल करें या वाट्सएप्प के माध्यम से प्रेषित कर सकते हैं। ब्रह्मलीन श्री मौनीबाबा और संत श्री सुमन भाई से जुड़े अपने प्रेरक संस्मरण, आदि भी भेज सकते हैं। वाट्सएप्प 9826170040 पर भेज सकते हैं।
आप सभी को शुभकामनाएं, धन्यवाद।
_सुधीर नागर, संपादक_
Email: [email protected]

31/05/2018

जब महावतार बाबा ने सुनी रामकथा
- अद्भुत, अविश्वसनीय. चमत्कारिक
एक अत्यंत अद्भुत, अविश्वसनीय और चमत्कारिक घटना से साक्षात्कार हुआ। ऐसी अनुपम घटना जिसे जानकर, सुनकर और पढ़कर अनुभूत हुआ कि संतों की साधना अद्वितीय होती है। किसी महात्मा की असीम कृपा किसी विरले संत पर ही बरसती है। पूज्य संत, गुरुवर श्री सुमनभाई जी उनमें से एक हैं। अलौकिक , आध्यात्मिक घटना का आरंभ एक रेल यात्रा से २००२ में हुआ। भाईजी दिल्ली से धनबाद श्रीरामकथा करने जा रहे थे। ट्रेन में भाई जी की भेंट एक व्यक्ति से हुई। जिनका नाम दासगुप्ता था। भाईजी और उनके बीच कुछ आध्यात्मिक वार्तालाप शुरू हुआ। श्री दासगुप्ता ने भाईजी को स्वत: ही बताया कि आप रामकथा करने धनबाद जा रहे हो। भाईजी ने जिज्ञासावश उनके बारे में पूछा उत्तर मिला- दासगुप्ता नाम है, रॉ में काम करता था। पूज्य भाई जी कहा कि रॉ में होते हुए आपको आध्यात्म में इतनी रुचि कैसे? श्री दासगुप्ता ने बताया कि मेरे भी एक गुरु है। भाईजी ने पूछा कि आपके गुरु कौन हैं? तो श्री दासगुप्ता ने बताया कि श्री महावतार बाबा मेरे गुरु है। भाईजी ने पूछा-- आप को महावतार बाबा कहाँ मिले? श्री दासगुप्ता ने बताया कि हरिद्वार कुंभ में नीलधारा में मैं भी स्नान कर रहा था और महावतार बाबा भी स्नान कर रहे थे। बाबा ने बोला की मेरे शिष्य बन जाओ, और मैंने उनसे दीक्षा ले ली। इस तरह की चर्चा दासगुप्ता से भाईजी करते रहे।
चर्चा के अनंतर दासगुप्ता उठे और कुछ देर केबिन से बाहर चले गए। वे लौटे तो पूरे कैबिन में सिगरेट धुंए की गंध से पूरा कैबिन भर गया। दासगुप्ता ने सहज भाव से पूछा क्या आप सिगरेट पीते हैं। भाई जी ने कहा मुझे तो सिगरेट का धुआं भी सहन नहीं होता मैं कैसे सिगरेट पी सकता हूँ। कुछ देर के बाद श्री दासगुप्ता फिर कैबिन से बाहर गए और वापस आए तो पाया कि पूरा कैबिन गुलाब की सुगंध से भर गया। इस पर दासगुप्ता ने अचरज भरी नजरों से भाईजी को देखा और कहा अब तो यहां से गुलाब की सुगंध आ रही है। तो भाईजी ने कहा कि गुप्ताजी की आपके गुरुदेव आपके साथ-साथ यात्रा कर रहे हैं। महावतार बाबा सूक्ष्म शरीर से कहीं भी आ-जा सकते हैं, उनकी उपस्थिति का आभास इन्हीं दो गंध से होता है (सिगरेट के धुएं और गुलाब की सुगंध) से उनकी उपस्थिति का आभास करा देते हैं। रात के 2 बज गए थे, भाई जी ने श्री दासगुप्ता से कहा सुबह जल्दी मुझे स्टेशन पर उतरना है, अब सोते हैं। दासगुप्ता को भी नींद आने लगी थी। उन्होंने कोच के अटैण्डर को बुलाया और कहा भाई जी को सुबह 6.30 बजे उठा देना, सामान भी उतार देना क्योंकि स्टेशन पर ट्रेन केवल 3 मिनट ही रुकती है। अनंतर भाई जी विश्राम में चले गए। भोर होने पर, ठीक सुबह 6 बजे उस सहायक ने भाई जी को उठाया और सामान भी उतरवा दिया। भाई जी ने उस सहायक को 200 रुपये देना चाहे, किन्तु अटैची की चाबी निकालते उसके पहले ही श्री दासगुप्ता ने 200 रुपये उस सहायक को अपने पास से दे दिए। भाईजी ने आश्चर्य भरे शब्दों में पूछा आपने क्यों दिए? वह मुस्कुराए और कहा एक ही बात है। और भाईजी धनबाद स्टेशन पर उतर गए। ट्रेन चलने लगी, श्री दासगुप्ता ने चलती ट्रेन से भाईजी को आवाज लगाई। सुमनभाई! और अपना एक हाथ आगे बढ़ाया। भाईजी ने सौजन्यवश दोनों हाथों से दासगुप्ता का हाथ थाम लिया। टे्रन मंद गति से चल रही थी, भाईजी भी ट्रेन के साथ-साथ चल रहे थे। और उसी समय दासगुप्ता ने 1100 रुपये भाईजी के हाथ में रखे। भाई जी ने कहा ये क्या है, ये क्यों दे रहे हो? वह बोले- समझना महावतार ही मिला था। उनका आशीर्वाद समझकर रख लो।
समय बीतता रहा। पूज्य भाईजी ने इसकी चर्चा किसी से नहीं की। १५ जनवरी २०१५ में अपनी पुत्री के विवाह का आमंत्रण पत्र देने डबराल बाबा के यहाँ गए। बाबा के यहाँ भक्तों की काफी भीड़ थी। इसी दौरान किसी सेवक ने कहा कि डबराल बाबा आपको अंदर बुला रहे हैं। पूज्य भाईजी बुलावे पर अंदर चले गए। वहां डबराल बाबा ने भाईजी के लिए पहले से ही एक कुर्सी रखवाई हुई थी। डबराल बाबा ने भाईजी को उस कुर्सी पर बैठाया और महावतार बाबा का एक चित्र जो डबराल बाबा के यहां लगा हुआ था कि ओर संकेत करके कहा - बाबा बैठे हैं। पूज्य भाईजी ने महावतार बाबा जी के चित्र के समक्ष प्रणाम किया। डबराल बाबा ने फिर से कहा कि बाबा बैठे हैं। भाईजी ने फिर से प्रणाम किया। महावतार बाबा ने ही आपको अंदर बुलाया है। मुझे तो पता भी नहीं था कि आप आए हैं। फिर डबराल बाबा ने कहा कि महावतार बाबा आपको जानते हैं। पूज्य भाईजी ने कहा कि बाबा तो सबको जानते हैं। तब उन्होंने कहा कि बाबा आपसे मिले हैं। भाईजी ने पूछा- कब? महावतार बाबा ने कहा यात्रा में। भाईजी ने कहा यात्रा में कहाँ?, तब उन्होंने बताया कि दिल्ली से धनबाद रामकथा करने जाते हुए हम यात्रा में साथ थे। तब भाईजी ने कहा कि वो दासगुप्ता? बाबा हँसने लगे। कहा कि हाँ दासगुप्ता के रूप में ही मिले थे। चर्चा में पूज्य भाईजी ने बाबा से पूछा कि आपका साधना स्थल कहाँ रहा? तब महावतार बाबा ने बताया कि उन्होंने तिब्बत में साधना की है। और बहुत से लोगों ने भी वहां साधना की है। तिब्बत में सूर्य साधना का बहुत प्रभाव रहा। बनारस के भी एक साधक थे। जिनका नाम हम भूल रहे हैं, तुम्हें पता हैं क्या? इस पर भाईजी ने स्वामी विशुद्धानन्द जी महाराज का नाम लिया। तब महावतार बाबा जी नेकहा कि हाँ उनका नाम विशुद्धानंद ही था। महावतार बाबा व पूज्य भाईजी के बीच में इस तरह करीब 30 मिनट तक चर्चा होती रही। बातचीत के दौरान ही बाबा ने भाई जी से ऐसी चौपाई सुनाने को कहा जिसमें देहरी शब्द आता हो। पूज्य भाई जी ने तब रामचरितमानस की चौपाई - राम नाम मनि दीप धरु जिह देहरी द्वार... सुनाई। महावतार बाबा ने कहा कि इसका अर्थ भी बताओ। तब भाईजी ने अर्थ भी बताया। महावतार बाबा ने कहा कि हम तुम्हारी कथा सुनना चाहते हैं। पूज्य भाईजी पुलकित हो गए और प्रणाम करके कहा कि बाबा आप यदि मुझसे रामकथा सुनेंगे तो यह मेरा परम सौभाग्य होगा और मैं ऐसा मानता हूँ कि जीवन की समस्त साधना का फल आपको श्रोतारूप में पाकर मुझे प्राप्त हो जाएगा। आज्ञा करें, कहाँ सुनेंगे? तब महावतार बाबा ने कहा अयोध्या में या बनारस में भी सुन सकते हैं। भाईजी ने सहज ही कहा कि अभी तो ऐसी कोई कथा नहीं है इन स्थानों पर, संयोग बना तो इस सेवा का सौभाग्य प्राप्त हो ऐसी प्रार्थना है। फिर महावतार बाबा ने कहा कि एक बार और भी मिले हैं। भाईजी ने पूछा कहाँ? बाबा ने कहा- पर्वत पर। भाईजी ने कहा- केदारनाथ में, महावतार बाबा हँसे और कहा हाँ। भाईजी ने कहा रात में 2 बजे, जब मालकोस गाया था। तो वो बहुत हँसे। भाईजी ने वह घटना बताई- कथा के विश्राम काल में भाई जी बीकानेर हाउस की गैलरी में मनन कर रहे थे। एकाएक नीचे से किसी की आवाज सुन भाई जी गैलरी से उतरे , देखा एक साधु बैठा है, उसके पूरे शरीर पर भस्म थी। उसी ने पुकार लगाई थी। भाई जी ने कहा। बाबा चाय पीओगे? विनम्रता से मना करते हुए बोला- तुम्हारी कथा बहुत अच्छी हो रही, भाई जी ने कहा आप तो आते नहीं। वो बाबा बोला- पहाड़ पर आवाज सुनाई देती है। अन्य साधु भी वहां हैं। पर बाबा ने कहा वो तुम जो मालकोस में गा रहे थे वह शुद्ध नहीं था। भाईजी ने कहा मैं तो ऐसे ही गाता हूँ, संगीत के स्वरों का उतना अभ्यास नहीं...। इतना सुन वे बाबा ऊँचे स्वर में मालकोस में गाने लगे। उस समय देर रात हो गई थी। रात लगभग 3 बजे से 3.45 तक वे गाते रहे और इतना अद्भुत गाया, जिसका वर्णन शब्दों में नही बांधा जा सकता। गाना गाकर वे पहाड़ की ओर चल दिए और जाने से पहले भाई जी को आशीर्वाद में लौंग दे गए, कहा इसे खा लेना।

और इस तरह आमंत्रण देकर पुन: श्री मौनतीर्थ पीठ लौट आए। उसी दिन रात को 11 बजे के करीब बनारस के श्री सुरेन्द्र मिश्र 'शीलूÓ का फोन पर मैसेज आया, कहा भाई जी भक्तों का आग्रह है कि बनारस में ४ अप्रैल को आप रामकथा करें। पूज्य भाईजी की समझ चुके थे कि यह संयोग महावतार बाबा के द्वारा ही बनाया गया है। कथा की तिथि, समय, स्थान तय हो गया। और वह दिन भी आया जब भाईजी वहाँ रामकथा करने पहुँचे। पूज्य भाईजी को महावतार बाबा की बात याद थी। कथा करने से पहले भाईजी व्यासपीठ के समीप एक आसन बिछाते। कथा के पश्चात वह आसन ठीक वैसा ही सिकुड़ जाता जैसे उस पर बैठ कर किसी ने कथा सुनी हो। पूज्य भाईजी जानते थे कि उस पर और कोई नही, महावतार बाबा ही आसीन होकर पूरे समय कथा सुनते थे, किन्तु उनका शरीर किसी को दिखता नहीं था, वे अदृश्य शरीर से कथा सुनते थे। महावतार बाबा पूज्य भाईजी को अपनी उपस्थित कथाओं में, आश्रम में यदाकदा महसूस कराते रहते हैं।
- सुधीर नागर,
सम्पादक- मानस वंदन

*और, बाबा की चरण पादुकाओं के साधना स्थल पर हो गए दिव्य दर्शन...*- _एक चमत्कार,एक अनुभूति_ ...मौन साधना के ऋषि मौनीबाबा ब...
23/05/2018

*और, बाबा की चरण पादुकाओं के साधना स्थल पर हो गए दिव्य दर्शन...*
- _एक चमत्कार,एक अनुभूति_ ...

मौन साधना के ऋषि मौनीबाबा ब्रह्मलीन हो चुके हैं, स्थूल शरीर उनका भले ही इस जगत में नहीं किन्तु सद्गुरुदेव की चेतना आज भी शिप्रा तट गंगाघाट पर मौनतीर्थ आश्रम में चैतन्य है। इसकी दिव्य अनुभूति, इसकी साक्षी बनने का सुअवसर मुझे मिला। बात उस समय की है जब 13 मई 2018 को पूज्य संत श्री सुमनभाई जी का पट्टाभिषेक होने वाला था। सुबह-सवेरे का वक्त था, कोई 5 बजने वाले थे। आश्रम परिसर में आयोजन की तैयारियां आरंभ होने लगी थी। सहसा मैं परमपूज्य मौनीबाबा की उस साधना स्थली पहुँची जहां बाबा अपनी दिव्य साधना करते थे। एक चमत्कारिक घटना घटी जिस पर कोई आसानी से विश्वास नहीं कर सकता। विज्ञान की दृष्टि में इसे स्वीकार नहीं करेगी, लेकिन जो प्रत्यक्ष घटित हुआ, वो चमत्कार से कम नहीं। आस्था और विश्वास से ही इसकी दिव्यता को अनुभूत किया जा सकता है।
हुआ यह कि साधना कक्ष के समीप जहां बाबा अपने भक्तों से, अनुयायियों से मिला करते थे, वहां बाबा की अंतिम चरण पादुकाएं रखी थीं। प्रातःकाल होने पर जब द्वार खोला गया, पादुकाएं भीतर वाले उस कक्ष में थीं, जहां वे नितान्त एकांत में साधना करते थे। इस कक्ष में ताला लगा रहता है, जिसकी चाबी पूज्य भाईजी के पास ही रहती हैं। भाई जी जब पूजन कक्ष आए और आश्रम के सेवक की दृष्टि भाईजी की खड़ाऊ पर गई तो उसने भाई जी से पूछा आप अंदर गए थे क्या? भाई जी ने कहा नहीं, सेवक ने कहा फिर बाबा की ये पादुकाएं वहां कैसे चली गईं...? इस प्रश्न का उत्तर एक शिष्य को ही मिल सकता है, आस्था और विश्वास की गहराई में इस प्रश्न का उत्तर ठीक वैसे ही दिखाई दे सकता है जैसे पानी की गहराई में पड़ा सिक्का दिखाई देता है। वास्तव में उस दिन बाबा ही अपने दिव्य शरीर से पधारे थे, अपने सुपात्र शिष्य को, समस्त भक्तों को आशीर्वाद देने, क्योंकि गुरु एक अमर तत्व है, वो अपने शिष्यों के कल्याण के लिए, उनका हित करने के लिए कुछ भी कर सकता है। मेरा मस्तक उन चरण पादुकाओं के समक्ष अटूट श्रद्धा से बरबस ही झुक गया। गुरु सत्ता की इस अनुपम दिव्यता के मैंने सबसे पहले दर्शन किए, मैं धन्य हो उठी, मेरा जीवन धन्य हो गया। गुरुकृपा के जो दर्शन हुए, वे सचमुच अद्वितीय थे, अत्यंत दुर्लभ थे, जिसकी साक्षी बनने का आध्यात्मिक गौरव मिला। पट्टाभिषेक समारोह में स्वयं भाई जी के श्रीमुख से भी इस वृतांत को सुना, मैं इस घटना से अभिभूत हूँ, आप सभी से यह घटना साझा करते मुझे प्रसन्नता हो रही क्योंकि, इसी माध्यम से सभी भक्तों-श्रद्धालुओं को भी बाबा का पुनीत पावन आशीष प्राप्त हो सके।

आदरणीय भाई जी को प्रणाम
*मीनाक्षी शर्मा, देहरादून*

22/05/2018
शुभकामना संदेशश्री मौनतीर्थ पीठाधीश्वर राष्ट्रीय संत डॉ. श्री सुमन भाई जी महाराज के पट्टाभिषेक के अवसर पर अखिल भारतीय वि...
14/05/2018

शुभकामना संदेश
श्री मौनतीर्थ पीठाधीश्वर राष्ट्रीय संत डॉ. श्री सुमन भाई जी महाराज के पट्टाभिषेक के अवसर पर अखिल भारतीय विद्ववत परिषद काशी के उपाध्यक्ष डॉ. राजेश्वर शास्त्री मुसलगांवकर जी का शुभकामना संदेश ।

संपर्क करे : +91 6260010290 To subscribe channel click the link below: https://www.youtube.com/channel/UCwSFBsIzkyfArEaLWwe6gmQ?sub_confirmation=1 If You lik...

सप्त सागरों,सभी तीर्थो की रज एवं समस्त प्रमुख नदियों के पावन जल से जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी दिव्यानन्द तीर्थ के साथ शि...
14/05/2018

सप्त सागरों,सभी तीर्थो की रज एवं समस्त प्रमुख नदियों के पावन जल से जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी दिव्यानन्द तीर्थ के साथ शिष्यों द्वारा पट्टाभिषेक के पावन अवसर पर श्रीमौनतीर्थ पीठाधीश्वर संत श्री डॉ सुमन भाई जी महाराज का अभिषेक किया गया।

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